हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆ हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “हम और जीवन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७२ ☆

✍ कविता – हम और जीवन ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

औरों का श्रम खरीदते हैं हम

और महंगे दामों पर बेचते हैं हम

जितना सस्ता खरीदे महंगा बेचे,

उसी को बड़ा आदमी कहते हैं हम।

*

वही बड़े आदमी नीतियाँ बनाते हैं

गरीबों के नाम पर स्वहित साधते हैं

विकास करते हैं और खूब कमाते हैं,

श्रम करने वाले श्रम करते ही जाते हैं।

*

मन के श्रम को कीमत सदा मिलती

शरीर को श्रम करते बीमारी मिलती

दोनों से ऊपर समझता है अब आदमी,

ईश्वर समझने की सदा इच्छा है रहती।

*

सब सुनाना चाहते हैं पर सुनना नहीं

फोलोवर चाहते हैं, फोलो करना नहीं

कोई हम से मैं कोई मैं से हम बनता है

पर आदमी बनना कोई चाहता नहीं।

*

क्षण भंगुर जीवन को जी न पाते हम

धरती आसमान पर कब्जा जमाते हम

और कर्ता बन समझ इठलाते हैं हम,

जड़ चेतन पर फिर भी बतियाते हैं हम।

*

कुछ नाटक करके जागरूक कर रहे

कुछ जागरूकता का नाटक कर रहे

पता ही नहीं कुछ नाटक के पात्र बने,

हम ऐसे ही अब जीवन यापन कर रहे।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुविधा शुल्क।)

☆ लघुकथा # १२२ – सुविधा शुल्क श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सुबह से सीमा घर के कामों में लगी थी। किसी को चाय चाहिए, किसी के लिए नाश्ता, बच्चों का टिफिन, सास की दवा—हर आवाज़ पर वह दौड़ रही थी।

“सीमा! मेरी कमीज़ प्रेस हुई कि नहीं?”

“मम्मी, मेरी बोतल भर दो।”

“बहू, ज़रा चश्मा तो ढूँढ़ दो।”

एक साथ उठती आवाज़ों के बीच वह रसोई से बाहर निकली ही थी कि उसका पैर फिसल गया। वह ज़ोर से गिरी और दर्द से चीख उठी।

पति दौड़े, पर पहला वाक्य था, “इतनी भी क्या जल्दी थी? अब सारा काम रुक जाएगा!”

सास बड़बड़ाईं, “ज़रा-सा भी ध्यान नहीं रहता।”

बच्चे बोले, “अब हमारा टिफिन कौन बनाएगा?”

तभी कामवाली बाई आई। उसने सबकी बातें सुनीं, बिना कुछ कहे सीमा को सहारा दिया, ऑटो बुलाया और अस्पताल ले गई।

पीछे घर में बहस छिड़ गई—”खाना कौन बनाएगा?” “बर्तन कौन धोएगा?” “बच्चों को कौन देखेगा?”

अस्पताल से लौटते समय सीमा खामोश थी। बाई मुस्कुराकर बोली, “बीबीजी, आज समझ आया… इस घर में आपकी नहीं, आपके काम की कीमत है।”

सीमा ने खिड़की से बाहर देखा। उसे पहली बार महसूस हुआ कि इस घर में वह सदस्य कम, सुविधा अधिक है।

घर पहुँची तो सबने एक साथ पूछा, “अब कैसी हो?”

सीमा हल्की-सी मुस्कुराई और बोली— “सुविधा चाहिए… तो अब उसका शुल्क भी लगेगा।”

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५६ – बुन्देली कविता – ”बे तौ चादर तानें सो रय ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – बे तौ चादर तानें सो रय ।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५६ ☆

☆  बुन्देली कविता – बे तौ चादर तानें सो रय  ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

बे तौ चादर तानें सो रय

जिनकी चिन्ता में हम खो रय

 *

जिनके लाने फूल बिछाये

बेइ गैल में काँटे बो रय

 *

जाँच-परख के करौ भरोसो

अपनइ आज पराये हो रय

 *

सगे हमाये हितू रये जुन

बेइ हमाई नाव डुबो रय

 *

गैरी नदिया नाव पुरानी

उतावले चढ़बे हो रय

 *

बरन लगो घर, कुँआ खोद रय

उर अपनी किस्मत पे रो रय

 *

भगवतपोसत रये जिन्हें हम

ओइ हमाये बैरी हो रय

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२८ – सजल – चोरों के मन चोरी भाई… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – चोरों के मन चोरी भाई…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२८ ☆

☆  सजल – चोरों के मन चोरी भाई…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

चोरों के मन चोरी भाई।

अवसर मिलते करी सफाई।।

*

रामलला मंदिर के भीतर।

देख रहे उनकी चतुराई।।

*

फूट गया जब भाँडा उनका।

जेल गए जग हुई हँसाई।।

*

ऋद्धा जिनके रग-रग में थी।

भक्ति भाव की दौलत पाई।।

*

राजनीति के थके खिलाड़ी।

मिलकर सबने धूम मचाई।।

*

नहीं कभी विश्वास धर्म पर।

उनने भी किस्मत अजमाई।।

*

आस्था पर जब चोट लगी तो।

नेताओं में छिड़ी लड़ाई।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २१० ☆ “परिपाटी (कहानियां)” – लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है सुश्री जनक कुमारी सिंह बघेल जी द्वारा लिखित  “संपरिपाटी (कहानियां)पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २१० ☆

☆ “परिपाटी (कहानियां)” – लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक : परिपाटी (कहानियां)

लेखिका : जनक कुमारी सिंह बघेल

प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर

समाहित कहानियाँ : 21

☆ समय की संवेदनाओं का दस्तावेज़ : परिपाटी – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

(पारिवारिक संबंध, सामाजिक सरोकार, मानवीय संवेदनाएँ और जीवन-मूल्य की कहानियों का संग्रह)

हिन्दी कहानी का वर्तमान परिदृश्य अनेक दिशाओं में विकसित हो रहा है। एक ओर प्रयोगधर्मी लेखन है तो दूसरी ओर जीवन के साधारण अनुभवों से असाधारण अर्थ खोजने वाली पारंपरिक कहानियाँ भी लिखी जा रही हैं। जनक कुमारी सिंह बघेल का कहानी-संग्रह परिपाटी इसी दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करता है। संग्रह की इक्कीस कहानियाँ किसी बड़े वैचारिक विमर्श का शोर नहीं मचातीं, बल्कि परिवार और समाज के भीतर घटित होने वाले उन सूक्ष्म परिवर्तनों को दर्ज करती हैं, जिनसे आज का मनुष्य प्रतिदिन गुजर रहा है। यही कारण है कि इन कहानियों का संसार पाठक को अपरिचित नहीं लगता। वह स्वयं को इन कहानियों के पात्रों और परिस्थितियों के बीच खड़ा पाता है।

संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषय विविधता है। यहाँ बुज़ुर्गों की उपेक्षा है, रिश्तों में आती औपचारिकता है, स्त्री की मौन पीड़ा है, बच्चों का मनोविज्ञान है, सामाजिक रूढ़ियों से टकराती मानवीय संवेदना है और बदलती जीवन-शैली से उत्पन्न अकेलापन भी नजर आता है। लेखिका इन विषयों को किसी आंदोलनकारी मुद्रा में नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। उनकी दृष्टि आरोपित नहीं करती वह अनुभवजन्य लेखन है। इसलिए कथाएँ सहज विश्वसनीय बन पड़ी हैं।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘परिपाटी’ की वैचारिक धुरी कही जा सकती है। कहानी उस त्रासद सामाजिक सत्य को उद्घाटित करती है कि परिवारों में बुज़ुर्गों के प्रति अपनाई गई उपेक्षा धीरे धीरे एक परंपरा बनती जा रही है। आज जो व्यवहार हम अपनी पूर्व पीढ़ी के साथ करते हैं, वही कल अगली पीढ़ी हमारे साथ दोहराती है। कहानी का शीर्षक इसी विरासत में मिलती अमानवीयता की ओर संकेत करता है। बिना किसी भाषण या नाटकीयता के यह कहानी पाठक के भीतर यह गहरा नैतिक प्रश्न उठाती है।

‘अनकहे जज़्बात’ संग्रह की भिन्न और स्मरणीय कहानियों में है। इसमें पुस्तकों को मानवीय संवेदनाओं का रूप देकर लेखिका ने अत्यंत मौलिक शिल्प अपनाया है। अलमारी में सजी पुस्तकें  अपने पाठकों की प्रतीक्षा करती,  चेतन पात्र बन जाती हैं। यह कहानी केवल पुस्तकों के उपेक्षित होने की नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक स्मृति के क्षीण होते जाने की कथा है जो किसी भी समाज की आत्मा होती है। पुस्तक-प्रेमियों के लिए यह कहानी विशेष आत्मीयता और कसक उत्पन्न करती है। प्रयोग नवाचारी है।

अन्य कहानियाँ भी अपने-अपने स्तर पर सामाजिक यथार्थ को विविध आयाम देती हैं। कहीं पुनर्विवाह के प्रश्न के माध्यम से जीवन को दूसरा अवसर देने की बात है, कहीं आत्मग्लानि से उपजे प्रायश्चित का भाव है। कुछ कहानियाँ यह विश्वास जगाती हैं कि मनुष्य के भीतर करुणा  समाप्त नहीं हुई है, तो कुछ कथानक आधुनिक जीवन की विडंबनाओं को उजागर करते हैं ,जहाँ सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर आत्मीयता सिकुड़ती चली गई है।

रिश्तों की ऊष्मा, विश्वास, संवाद और नैतिक उत्तरदायित्व इन कहानियों में बार-बार लौटने वाले मूल्य हैं।

भाषा की दृष्टि से लेखिका का लेखन सरल, संप्रेषणीय और प्रवाहपूर्ण है। वे अनावश्यक अलंकरण या भाषिक चमत्कार से बचती हैं। उनकी कलम में सहज भाव संप्रेषण की कला है, वे सामर्थ्यवान लेखिका हैं।संवाद पात्रों के स्वभाव के अनुरूप हैं और कथानक बिना कृत्रिमता  के आगे बढ़ते हैं। यह सादगी ही उनकी शक्ति है, क्योंकि पाठक का ध्यान भाषा की सजावट पर नहीं, कथा के भाव पर केंद्रित रहता है। कहीं-कहीं भावुकता का पुट अवश्य मिलता है, किंतु वह कथ्य की संवेदनात्मक प्रकृति से स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है।

आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो संग्रह की कुछ कहानियाँ अपने अंत को और अधिक खुला तथा बहुअर्थी बन सकती थीं। कई स्थानों पर आदर्शवादी समाधान यथार्थ की जटिलताओं को अपेक्षाकृत सरल बना देते हैं। फिर भी यह कमी संग्रह की मूल संवेदनात्मक शक्ति को कम नहीं करती। इन कहानियों का उद्देश्य पाठक को चमत्कृत करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सोई हुई मानवीय संवेदना को स्पर्श करना है, और इस उद्देश्य में वे पर्याप्त सफल हैं।

आज जब साहित्य का बड़ा हिस्सा बाज़ार, उपभोक्तावाद और तात्कालिक सनसनी के दबावों से जूझ रहा है, किसी न किसी “वाद” का लबादा ओढ़कर प्रस्तुत हो रहा है।परिपाटी जैसे कहानी संग्रह यह विश्वास दिलाते हैं कि मनुष्य और उसके संबंध अभी भी हिन्दी कहानी के केंद्र में हैं। यह संग्रह पाठक को अपने परिवार, अपने व्यवहार और अपने सामाजिक दायित्वों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। इसकी यही विशेषता इसे केवल कहानी-संग्रह नहीं, बल्कि समकालीन सामाजिक जीवन की संवेदनात्मक दस्तावेज़ के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

परिपाटी ऐसी पुस्तक है जिसे केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि पढ़ने के बाद देर तक महसूस किया जाता है। रिश्तों की ऊष्मा, मानवीय करुणा और नैतिक चेतना में विश्वास रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए संग्रह की लगभग हर कहानी एक सार्थक और पठनीय कृति है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११५ – आधुनिक डाइट और उपवास – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – आधुनिक डाइट और उपवास)  

☆  चुभते तीर # ११५ – व्यंग्य  – आधुनिक डाइट और उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

आजकल लोग वजन घटाने के लिए ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ करते हैं, जिसे हमारे पूर्वज साधारण शब्दों में ‘भूखा रहना’ कहते थे। पुराने ज़माने में उपवास में भगवान याद आते थे, आज के उपवास में केवल कैलोरी काउंटिंग ऐप याद आता है। इंसान चौबीस घंटे में से सोलह घंटे घड़ी देखता है कि कब खाने का समय होगा। जैसे ही खाने की खिड़की खुलती है, वह इस तरह टूट पड़ता है मानो अकाल पीड़ित हो। सलाद के नाम पर घास-फूस को इस तरह खाया जाता है जैसे वह कोई दिव्य जड़ी-बूटी हो। एवोकाडो और चिया सीड्स जैसी विदेशी चीज़ों ने हमारी रसोई पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। जो इंसान कल तक दो पराठे घी लगाकर खाता था, वह आज ग्रीन-टी पीकर खुद को संन्यासी घोषित कर रहा है। विडंबना देखिए, इस पूरी प्रक्रिया में वजन भले ही न घटे, लेकिन इंसान का मानसिक संतुलन और जेब का वजन ज़रूर घट जाता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ – सिलाई मशीन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆

🌻लघु कथा🌻 सिलाई मशीन 🌻

पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।

नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन  उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।

सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८५ – देश-परदेश – World Day for International Justice: 17th July ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८५ ☆ देश-परदेश – World Day for International Justice: 17th July ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज प्रातः ज्ञात हुआ कि आज विश्व न्याय दिवस है। मन को बड़ी शांति मिली कि पूरा विश्व न्याय व्यवस्था को मानता है।

न्यायालय में कार्यरत कर्मचारी, अधिकारी और न्यायधीश के बारे में हम मुंह ना ही खोलें तो अच्छा है। इस विषय पर मित्र मंडली में चर्चा होती रहती है, वैसे हमारे व्हाट्स ऐप ने इनकी व्यवस्था के चिथड़े उखाड़ने में कोई कमी नहीं रखी है।

एक मित्र बोले अब तो न्याय की देवी की आँखों से पट्टी उतार दी गई है, अब न्याय सब देख सकता है। कुछ जानकारों का कहना है, पट्टी हटाने के बाद से न्याय व्यवस्था में कार्य करवाने का नगद में होने वाला खर्च भी अब पहले से एक चौथाई बढ़ गया है।

अब कोई सम्राट विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठ कर न्याय तो नहीं कर रहा है, या बत्तीस पुतलियां हैं, जो न्याय पर सवाल उठाए जाएंगे। इतिहास में तो बादशाह जहांगीर की न्याय जंजीर की चर्चा भी है। हमारा इतिहास लिखने वाले कौन से राजा हरीश चंद्र के वंशज थे ? जो सब सच लिखा होगा।

देश के दक्षिण भाग में एक “संगोल राजदंड” प्रतीकात्मक रूप में संसद स्पीकर के पास रखा हुआ। उसके आने के बाद भी सांसद अपने घटिया व्यवहार में कोई बदलाव नहीं ला पाए हैं।

“Justice Delayed is Justice Denied” या कानून अंधा होता है, वाली कहावते अमर हो चुकी हैं। न्याय व्यवस्था की पैरवी करने वाले भी न्याय व्यवस्था को नीचा दिखाने में भरपूर सहयोग करते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९४ – काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन… १ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९४ ☆

☆ – काव्यधर्मी दृष्टि-चिन्तन ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

समाज या शासन से

कोई तकरार

या द्वन्द्व नहीं है,

मगर

विचारों पर पाबन्दी लगे

कतई पसन्द नहीं है।

(नौकरी एक अलग बात है

वह सौदा है, व्यवसाय है,

समझौते का पर्याय है।)

और

इसीलिए

मेरा काव्यधर्मी

मन मुक्तभाव से

वही लिख रहा है

जो उसे दिख रहा है।

 

मुझे ऐसा लगता है

जैसे हम सबने

मरी माँ का दूध पिया है,

और अब तक का जीवन

अकारथ ही जिया है।

क्रान्तिदृष्टा तो सब हैं

मगर क्रान्तिसृष्टा थोड़े हैं,

पौरुषहीन बेगैरत जमातों के लोग

अहिंसा का कफन ओढ़े हैं।

 

सारा देश

रेगिस्तान की तरह जल रहा है

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९१ – “बहुत पुरानी थी मियार…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बहुत पुरानी थी मियार...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बहुत पुरानी थी मियार...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

पहले बेचे बैल बाद में

दोनों खेत बिके

बेटेकी शिक्षापर दम्पति

के अरमान टिके

 

माँ कैसे भी खोंसे रहती

खुद को साड़ी में

जो फट कर चीथड़े हुई

है आँगन बाड़ी में

 

रहा कर्ज का बोझ पिता

की रीढ़ हुई दोहरी

माता की ममता पर अंधड़

जीवन की गति के

 

आस बड़ी पर एक जून

का भोजन है दूभर

खेत गये, तो रामधनी

अब जोत रहा ऊसर

 

किस किस का भुगतान

करे वह दीन हीन मानुस

और चुकाये पैसा बिन

पत्नी की सहमति के

 

बहुत पुरानी थी मियार

पिछवाड़े के घर की

बारिश तेज हुई तो

बिखरी भीटें बाहर की

 

भीगे नहीं अनाज,

सोचते जो परसों आया

कैसे भी दोनो की

काया में हैं प्राण छिके

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

14-7-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares