(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के मुक्तक – सावन।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१६ ☆
☆ एक बुंदेली गीत – घर आंगन की नन्ही चिरैया… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “शेर और शेर दिल…“।)
अभी अभी # १०७२ ⇒ आलेख – शेर और शेर दिल श्री प्रदीप शर्मा
शेर तो खैर जंगल का राजा है, और उसका दिल शेर का दिल ही कहलाएगा। हर इंसान जो शेर दिल होता है, किसी राजा से कम नहीं होता। एक शायर भले ही शेर कहता हो, लेकिन उसका दिल कभी शेर दिल नहीं होता। जिसका दिल बार बार टूटे, उसे आप शेर दिल नहीं कह सकते।
शेर दिल को आप दरिया दिल तो कह सकते हैं, लेकिन kind hearted, यानी दयालु नहीं कह सकते। जो आसानी से पिघल जाए, वह कैसा दिल। जिसका दिल दरिया दिल के साथ मजबूत भी हो, वही शेर दिल कहलाने का अधिकारी होता है।
बहादुर बच्चे गिरने पर रोते नहीं, किसी से मार खाने पर घर आकर मम्मी से शिकायत नहीं करते। पूरा हिसाब बराबर करने के बाद ही विजयी मुस्कान लिए घर लौटते हैं, और उनके घर लौटने के पहले ही उनकी बहादुरी के किस्से घर पहुंच जाते हैं। ऐसे होते हैं शेर बच्चे।।
शेर का दिल किसी बच्चे का दिल नहीं होता। एक शायर दिवाना हो सकता है, एक शेर का दीवानगी से क्या काम। हमने नहीं सुना, किसी शेर ने कभी किसी को दिल दिया हो। एक मदारी भले ही पब्लिक में बंदर बंदरिया को रस्सी से बांधकर नचा ले, उनकी शादी करा दे, सर्कस में भी शेर, शेर ही होता है। उसे नचाने के लिए भी हंटर की जरूरत पड़ती है। वैसे असली शेर आजकल जंगल में नहीं संसद में दहाड़ते हैं, जिनकी दहाड़ आज तक में भी सुनी जा सकती है।
कल विश्व शेर दिवस था। हम जंगल तो नहीं जा पाए, लेकिन संसद में कल एक शेर दो घंटे तेरह मिनिट तक दहाड़ा, किसी भी शेर का यह विश्व रेकॉर्ड है। मैने देखा, उसने देखा, सबने देखा, कहां देखा, टीवी पर देखा, अपने मोबाइल में देखा।।
एक शायर बदनाम हो सकता है, लेकिन उसके शेर का भी बहुत नाम होता है। शेर कभी चरित्रहीन नहीं होते, कोई सुंदर हिरनी कभी उसे अपने जाल में नहीं फांस सकती। वह शेर दिल होता है, दिल फेंक नहीं। वह किसी को दिल नहीं देता, उसका कलेजा चीर देता है।
हमने कभी शेर को घास खाते नहीं देखा। गुजरात के गिर में कुछ सफेद शेर होते हैं, जो खेतों में भी घूमते पाए जाते हैं, एक खोजी फोटोग्राफर का तो यह भी कहना है कि ये सफेद शेर इतने शांत होते हैं कि इन्हें वहां मशरूम भी
खाते देखा गया है। हमारे कल के एंग्री यग मैन महानायक और आज के शेर दिल, केबीसी के बिग बी आपको यदा कदा गुजरात आने का निमंत्रण दिया करते हैं।।
अगर आपकी वास्तविक शेर में रुचि हो तो जंगल में नहीं, भारतीय संसद में जाएं, जहां एक अकेला सब पर भारी है और अगर आपकी रुचि शेर दिलों में है तो हमारे पंजाब आइए। यहां आपको शेर, सिंह, सभी मिलेंगे।
जितने शेर आज जंगल में नहीं हैं, उतने सिंह हमारे अकेले पंजाब में हैं और सभी जाबांज, शेरदिल। यहां के सभी सिंह आपको भांगड़ा करते नजर आएंगे। ये सभी सिंह जंगल में मंगल ही करते हैं, दंगल नहीं। अगर ये सिंह गुरुद्वारे में शीश नवाते हैं तो मुल्क के लिए अपना शीश कटाते भी हैं। इनके राज में कोई प्राणी भूखा नहीं सोता, इनका लंगर सबके लिए है। सेवा ही इनकी सीख है, समर्पण ही इनकी सीख है, बलिदान ही इनकी सीख है, मुल्क की रक्षा ही इनकी सबसे बड़ी सीख है।।
जो निर्भय है, निडर है, अपने मुल्क की रक्षा में सक्षम है, वही सच्चा शेर है। आज शेर दिल लायंस क्लब में नहीं, बहादुर इंसानों में पाये जाते हैं, जो खुद भी चैन से रहते हैं, और सबके अमन चैन की चिंता करते हैं। शेर बनें, शेर दिल बनें, भीगी बिल्ली नहीं ..!!
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरे भीतर…‘।)
☆ शशि साहित्य # ३६ ☆
कविता – मेरे भीतर… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
☆
किसने रखे हैं कदम इस चमन में,
पत्थर भी खिल के फूल हो गए हैं…
कुछ आहट है पहचानी सी,
वीरानियां भी खोकर, मधुमास हो गई है…
क्या हुआ जो आसमान से गिरने वाली यह बूंदें,
आजकल क्यों मोतियों की लड़ी होने लगी हैं…
बहुत लंबी, धनी काली रात, का साया…
अंधियारी को चीर कर किरणें नाचने लगी हैं…
यह कमजोर लरजते भीगे पंख,
हिम्मत करके ये छोटी चिरैया, पंख फड़फड़ाने लगी है…
यह कदमों की आहट, यह मधुमास का होना…
यह मोतियों की लड़ी, ये नाचती हुई किरणें…
यह छोटी सी चिड़िया की, बड़ी सी हिम्मत…
ये सब तो मेरे भीतर है, आंखें बाहर क्या खोजने लगी हैं??
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ९३ आणि ९४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ९३ – –
जगी पाहता देव हा अन्नदाता ।
तया लागली तत्त्वता सार चिंता ।
तयाचे मुखी नाम घेता फुकाचे ।
मना सांग पा रे तुझे काय वेचें ।।९३।।
अर्थ :खरे पाहिले तर जगामध्ये परमेश्वर हा सर्वांचे भरणपोषण करणारा आहे असे दिसते. त्याला खरोखरच सर्वांची काळजी आहे. तेव्हा, हे मना, त्याचे फुकटचे नाम घेण्यासाठी तुला काही खर्च करावा लागतो का?
विवेचन :या जगात आपण जन्माला आलो आहोत, तेव्हा आपल्या उदरनिर्वाहाची काळजी परमेश्वराला असतेच. कोणत्याही जीवाला जन्माला घालण्यापूर्वी त्याच्या जगण्याची व्यवस्था तो करतो. मूल जन्माला येण्यापूर्वी आईच्या स्तनात दूध निर्माण होते. मूल थोडे मोठे होईपर्यंत मग त्याला बाहेरचे काही द्यावे लागत नाही. आई त्याचं सर्व प्रकारचं भरणपोषण करते. जशी त्याची शारीरिक भूक ती भागवते, तसेच आईच्या सहवासात बाळाचे मानसिक आणि भावनिक देखील भरणपोषण होते. पुढे मग ती आपल्याजवळ उपलब्ध असणारे अन्न त्याला भरवते. जशी आई, तशीच परमेश्वर ही आपली माउली आहे. तिला आपली चिंता असतेच. आपल्याभोवती असणारा निसर्ग आपल्याला फळे, फुले देतो. शेतातील अन्न आपले भरणपोषण करते. ते पिकवण्यासाठी लागणारी बुद्धीदेखील आपल्याला त्यानेच दिली आहे. आईप्रमाणेच निसर्ग सुद्धा आपल्याला मानसिक, भावनिकदृष्टया समृद्ध करीत असतो. निसर्गातील नदी, वृक्ष, समुद्र असा प्रत्येक घटक आपल्याला कसे वागावे याचा काही ना काही संदेश देत असतो.
पण परमेश्वराने जरी व्यवस्था केलेली असली तरी कोणतेही अन्न आपल्याला जागेवर बसून मिळत नाही. ते मिळवण्यासाठी हालचाल, कष्ट करावेच लागतात. ही धडपड हेच त्याच्या जगण्याचे बळ आहे. या धडपडीतूनच सजीवाला जगण्याचे ध्येय आणि जीवन जगण्यासाठीची ऊर्जा प्राप्त होत असते. पण होते काय की इतर प्राणी सोडले तर या जगण्याच्या शर्यतीत मनुष्य कमालीचा स्वार्थी बनतो. तो आपल्या गरजेपुरते न घेता इतरांच्या वाट्याचेही ओरबाडून घेतो. निसर्गालाही ओरबाडतो. त्यामुळे परमेश्वराने निर्माण केलेल्या या सुंदर जगात कोणाजवळ संपत्तीचा प्रचंड साठा केंद्रित होतो, तर कोणाला दोन वेळच्या जेवणाचीही भ्रांत पडते. ही विषमता मानवनिर्मित आहे. सध्या जगात सुरु असलेली युद्धे याच संपत्तीच्या आणि सत्तेच्या हव्यासापायी होताना दिसत आहेत.
या जगात आपण मोजू शकणार नाही इतके अगणित प्राणी आणि जीवजंतू आहेत. त्यांची जगण्याची व्यवस्था आपण करतो का? तो परमेश्वरच त्यांना जन्माला घालतो, तोच त्यांचे भरणपोषण करतो. इतके असूनही माणसाला आपल्या कर्तृत्वाचा किती अहंकार असतो! घरात एखादा कुटुंबप्रमुख एकटा कमावता असेल तर त्याला वाटते मी कमावतो म्हणून या सर्वांना बसून खायला मिळते. माझ्यामुळेच घर चालले आहे. आपण नोकरी करतो. जिथे काम करतो तो मालक किंवा ते व्यवस्थापन आपल्याला त्याबद्दल पगार देते. पण त्या मालकाला देखील देणारा कोणीतरी असतोच ना! थोडक्यात म्हणजे मालकाचा देखील कोणीतरी मालक आहेच. त्या मालकाला तुम्ही आम्ही का ओळखत नाही? हा मालक म्हणजे परमेश्वर. व्यापक अर्थाने तो सर्वांचे हित पाहणारा आहे.
नवऱ्याने एखादा दागिना घेतला तर बायकोला कोण आनंद होतो! ती मोठया कौतुकाने सगळ्यांना सांगत सुटते. आपल्या नवऱ्याची तारीफ करते. पण ज्या भगवंताने तो दागिना घालण्यासाठी तुला हे सुंदर शरीर दिले आहे, त्याची कधी आठवण येते? त्याची तारीफ तू करतेस का? म्हणूनच समर्थ म्हणतात की परमेश्वर जर सर्वांची काळजी घेतो, पालनपोषण करतो, तर त्याचे स्मरण आपण का करत नाही? जेवल्यानंतर आपण ‘ अन्नदाता सुखी भव ‘ असे म्हणून जेवण देणाऱ्याला धन्यवाद देतो. मग खरा अन्नदाता तर तो आहे. त्याला देतो का आपण धन्यवाद? त्याचे नाम घेण्यासाठी तर काही पैसे खर्चावे लागत नाहीत. ‘ कृतघ्नता ‘ हे सर्वात मोठे पाप आहे. अन्नदाता असणाऱ्या भगवंताबद्दल आपण कृतज्ञ राहून त्याचे नित्य स्मरण करायला हवे. त्यासाठी काही खर्च करावा लागतो का? तुकाराम महाराजांचा अभंग फार सुंदर आहे. ते म्हणतात
का रे नाठविसी कृपाळू देवासी । पोसतो जनासी एकला तो ।
बाळा दुधा कोण करितें उत्पत्ति । वाढवी श्री-पति सवें दोन्हीं ॥
*
फुटे तरुवर उष्ण-काळ-मासीं । जीवन तयांसी कोण घाली ।
तेणें तुझी काय नाहीं केली चिंता । राहें त्या अनंता आठवूनी ।
तुका म्हणे ज्याचे नांव विश्वंभर । त्याचे निरंतर ध्यान करीं ॥
स्वसंवाद ::
१. “माझ्यामुळेच माझे घर आणि कुटुंब चालले आहे” अशा कुठल्या खोट्या अहंकाराच्या ओझ्याखाली मी वावरत आहे का?
२. रोज जेवताना ‘अन्नदाता सुखी भव’ म्हणताना, चराचरातील अनंत जीवांचे विनासायास पालनपोषण करणाऱ्या त्या खऱ्या ‘विश्वंभराची’ मला आठवण होते का?
३. ज्या भगवंताने मला हे सुंदर शरीर, बुद्धी आणि जगण्याची साधने दिली, त्याच्याप्रती कृतज्ञता व्यक्त करण्यासाठी विनामूल्य असणारे नाम घेताना माझे काय ‘वेचते’ (खर्च होते)?
४. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे उन्हाळ्यात वाळलेल्या झाडांनाही पालवी फुटणारे पाणी देणारा तो ‘अनंत’ जर माझी काळजी वाहण्यास समर्थ आहे, तर मी संसाराची व्यर्थ चिंता का करत बसलो आहे?
=====
श्लोक क्र. ९४ – –
तिन्ही लोक जाळू शके कोप येता ।
निवाला हरू तो मुखे नाम घेता ।
जपे आदरे पार्वती विश्वमाता ।
म्हणोनि म्हणा तेचि हे नाम आता ।।९४।।
अर्थ :भगवान शंकर जर कोपले आणि त्यांनी आपला तिसरा नेत्र उघडला तर तिन्ही लोक जाळून भस्म करू शकतात.अशा महासामर्थ्यशाली भगवान शंकरांनी जेव्हा त्यांच्या अंगाचा दाह होऊ लागला, तेव्हा रामनामाचा आश्रय घेतल्यावरच तो शांत झाला. माता पार्वती देखील अत्यंत आदराने रामनाम जपते. म्हणून आपण देखील त्याच रामनामाचा आश्रय घ्यावा.
(तिन्ही लोक -स्वर्ग-मृत्यू-पाताळ, निवाला – शांत झाला, हरू – भगवान शंकर)
विवेचन : या ठिकाणी रामनामाचे महत्व स्पष्ट करण्यासाठी समर्थ पुन्हा भगवान शंकरांचे उदाहरण देतात. त्यामागे आपल्या हिताची कळकळ आहे. एखाद्या अभ्यास न करणाऱ्या मुलाला आईवडील जसे एखाद्या अभ्यास करणाऱ्या मुलाचे उदाहरण पुन्हा पुन्हा देतात, तसेच हे आहे. भगवान शंकर देवांमध्ये श्रेष्ठ. म्हणून ते ‘ महादेव ‘ ब्रह्मदेव जगाची निर्मिती करतात, विष्णू जगाचे पालनपोषण करतात तर शंकर हे संहारकर्ते मानले जातात. त्यांच्या ठायी एवढे सामर्थ्य आहे की त्यांनी केवळ आपला तिसरा नेत्र उघडला तर क्रोधाने ते हे त्रिभुवन जाळून भस्म करून टाकू शकतात.
अशा सामर्थ्यशाली भगवान शंकरांनी जेव्हा अखिल प्राणिमात्रांच्या कल्याणाच्या हेतूने हलाहल विष प्राशन केले, तेव्हा त्यांच्या कंठाचा प्रचंड दाह होऊ लागला. शीतल चंद्र माथी धारण करून, पवित्र आणि शीतल अशा गंगेला शिरावर धारण केले. एवढे करून देखील त्यांचा दाह शमला नाही. पण अमोघ अशा रामनामामुळे त्यांचा दाह शांत झाला. एवढे सामर्थ्य रामनामाचे आहे. जी विश्वमाता आहे, जगज्जननी आहे अशी माता पार्वती देखील रामनामाचा जप करते. म्हणून आपणही तेच नाम घ्यायला हवे असे समर्थ आपल्याला उदाहरणासह पटवून देतात.
या श्लोकाचा अर्थ आपल्याला वेगळ्या प्रकारेही घेता येतो. आपण मानव म्हणजे गुणदोषांचे पुतळे असतो. क्रोध हा आपला एक प्रमुख शत्रू असतो. क्रोध म्हणजे राग किंवा संताप. त्यामध्ये अनेक चांगल्या गोष्टी, नातेसंबंध भस्म करण्याची शक्ती असते. त्यासाठी रामनामाचा आश्रय घेणे हाच सर्वश्रेष्ठ उपाय आहे. रामनामामुळे मन शांत होऊ लागते, क्रोध कमी होऊ लागतो. भगवंताचे नाम हे शांती आणि सौख्य प्रदान करणारे आहे. म्हणून तेच आदरपूर्वक घ्यावे.
स्वसंवाद ::
१. माझ्या मनात जेव्हा ‘क्रोधाचा’ (रागाचा) भडका उडतो, तेव्हा मी माझे विवेक आणि नातेसंबंधांचे ‘त्रिभुवन’ जाळून खाक करतो का? त्यावर नियंत्रण मिळवण्यासाठी मी काय करतो?
२. जर तिन्ही लोकांना कवेत घेणारे महादेव आणि अखिल विश्वाची माता असणारी पार्वती अत्यंत आदराने रामनाम जपतात, तर संसारी विवंचनेत अडकलेल्या माझ्या मनाला नामस्मरणाचा संकोच का वाटावा?
३. माझ्या आयुष्यातील वेगवेगळ्या चिंता आणि संतापाचा दाह शांत करण्यासाठी, मी कधी शांत चित्ताने रामनामरूपी शीतलता अनुभवली आहे का?
४. “म्हणोनि म्हणा तेचि हे नाम आता” हा समर्थांचा आग्रहाचा शब्द ऐकून, मी उद्याची वाट न बघता ‘आता’ या क्षणापासून नामस्मरण करायला तयार आहे का?
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सहनशक्ति बनाम दण्ड। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मेरे मन आन बसो गिरधारी / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३४ ☆
☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘युगों -युगों से पुरुष स्त्री को उसकी सहनशीलता के लिए ही दण्डित करता आ रहा है,’ महादेवी जी का यह कथन कोटिश: सत्य है,जिसका प्रमाण हमें गीता के इस संदेश से भी मिलता है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है’,क्योंकि उसकी सहनशीलता उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। इसलिए एक सीमा तक तो सहनशक्ति की महत्ता स्वीकार्य है,परंतु उसे आदत बना लेना कारग़र नहीं है। इसलिए मानव में विरोध व प्रतिकार करने का सामर्थ्य होना आवश्यक है। वास्तव में वह व्यक्ति मृत के समान है,जो ग़लत बात को ग़लत ठहरा कर विरोध नहीं जताता। इसके प्रमुखत: दो कारण हो सकते हैं– आत्मविश्वास की कमी और असीम सहनशीलता। यह दोनों स्थितियां ही भयावह और मानव के लिए घातक हैं। आत्मविश्वास से विहीन मानव का जीवन पशु-तुल्य है,क्योंकि जो आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकता; वह परिवार,समाज व देश के लिए क्या करेगा? वह तो धरती पर बोझ है; न उसकी घर-परिवार में इज़्ज़त होती है,न ही समाज में उसे अहमियत प्राप्त होती है। अत्यधिक सहनशीलता के कारण वह शत्रु अर्थात् प्रतिपक्ष के हौसले बुलंद करता है। परिणामत: समाज में आलसी व कायर लोगों की संख्या में इज़ाफा होने लगता है। प्राय: ऐसे लोग संवेदनहीन होते हैं और उनमें साहस व पुरुषत्व का अभाव होता है।
नारी को सदैव दोयम दर्जे का प्राणी स्वीकारा जाता है, क्योंकि उसमें अपना पक्ष रखने का साहस नहीं होता और वह शांत भाव से समझौता करने में विश्वास रखती है। इसके पीछे कारण कुछ भी रहे हों; पारिवारिक,सामाजिक,आर्थिक या उसका समर्पण भाव– सभी नारी को उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देते हैं,जहां वह निरंतर ज़ुल्मों की शिकार होती रहती है। पुरुष दंभ के सम्मुख वह प्रतिकार व विरोध में अपनी आवाज़ नहीं उठा सकती। इस प्रकार पुरुष उस पर हावी होता जाता है और समझ बैठता है कि वह पराश्रिता है; उसमें साहस व आत्म-विश्वास की कमी है। सो! वह उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने को स्वतंत्र है। इस प्रकार यह सिलसिला चल निकलता है। अवमानना,तिरस्कार व प्रताड़ना उसके गले के हार अर्थात् विवशता बन जाते हैं और उसके जीने का मक़सद व उपादान बन जाते हैं,जिसे वह नियति स्वीकार अपना जीवन बसर करती रहती है।
यदि हम उक्त तथ्य पर दृष्टिपात करें, तो नियति व स्वीकार्यता-बोध मात्र हमारी कल्पना है,जिसे हम सहजता व स्वेच्छा से अपना लेते हैं। यदि व्यक्ति प्रारंभ से ही ग़लत बात का प्रतिरोध करता है और अपने कर्म को अंजाम देने से पहले सोच-विचार करता है,उसके हर पहलू पर दृष्टिपात करता है– शत्रु के बुलंद हौसलों पर ब्रेक लग जाती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, 2007 में प्रकाशित स्वरचित काव्य-संग्रह की अंतिम कविता की पंक्तियां– ‘बहुत ज़ुल्म कर चुके/ अनगिनत बंधनों में बाँध चुके/ मुझ में साहस ‘औ’ आत्म- विश्वास है इतना/ छू सकती हूं मैं/ आकाश की बुलंदियां।’ जी हाँ! यह संदेश है नारी जाति के लिए कि वह सशक्त,सक्षम व समर्थ है। वह आगामी आपदाओं का सामना कर सकती है। परंतु वह पिता,पुत्र व पति के बंधनों में जकड़ी,ज़ुल्मों को मौन रहकर सहन करती रही,क्योंकि उसने अंतर्मन में संचित शक्तियों को पहचाना नहीं था। परंतु अब वह स्वयं को पहचान चुकी है और आकाश की बुलंदियों को छूने में समर्थ है। आज की नारी ‘अगर देखना है मेरी उड़ान को/ थोड़ा और ऊंचा कर दो/ आसमान को’ में झलकता है उसका अदम्य साहस व अटूट विश्वास,जिसके सहारे वह हर कठिन कार्य को कर गुज़रती है और ऐलान करती है कि ‘असंभव शब्द का उसके शब्दकोश में स्थान है ही नहीं; यह शब्द तो मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।’
परंतु 21वीं सदी में भी महिलाओं की दशा अत्यंत शोचनीय व दयनीय है। वे आज भी पिता,पति व पुत्र द्वारा प्रताड़ित होती है,क्योंकि तीनों का प्रारंभ ‘प’ से होता है। सो! वे उनके अंकुश से आजीवन मुक्त नहीं हो पाती। घरेलू हिंसा,अपनों द्वारा उसकी अस्मिता पर प्रहार, फ़िरौती, दुष्कर्म, तेज़ाब कांड व हत्या के सुरसा की भांति बढ़ते हादसे उनकी सहनशक्ति के ही दुष्परिणाम हैं। यदि बुराई को प्रारंभ में ही दबाकर समूल नष्ट कर दिया जाता तो परिदृश्य कुछ और ही होता। महिलाएं पहले भी दलित थीं,आज भी हैं और कल भी रहेंगी। उनके अतीत,वर्तमान व भविष्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं हो सकता; जब तक वे साहस जुटाकर ज़ुल्म करने वालों का सामना नहीं करेंगी।
वैसे यह नियम बच्चों,युवाओं व वृद्धों सब पर लागू होता है। उन्हें आगामी आपदाओं,विषम व असामान्य परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए,क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी टिक नहीं सकता। ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ सोहनलाल द्विवेदी जी इस कविता के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि यदि आप तूफ़ान से डर कर व लहरों के उफ़ान को देख कर अपनी नौका को बीच मंझधार नहीं ले जाओगे तो नौका कैसे पार उतर पाएगी? संघर्ष रूपी अग्नि में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। इसलिए कठिन परिस्थितियों के सम्मुख कभी भी घुटने नहीं टेकने चाहिएं तथा मैदान-ए-जंग में मन में इस भाव को प्रबल रखने की दरक़ार है कि ‘तुम कर सकते हो।’ यदि निश्चय दृढ़ हो, हौसले बुलंद हों,दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। नैपोलियन बोनापार्ट भी यही कहते थे कि असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोश में होता है। इस नकारात्मक भाव को अपने ज़हन में प्रविष्ट न होने दें –’जैसी दृष्टि,वैसी सृष्टि तथा नज़रें बदलते ही नज़ारे बदल जाते हैं और नज़रिया बदलते ज़िंदगी।’ यदि नारी यह संकल्प कर ले कि वह अकारण प्रताड़ना सहन नहीं करेगी और उसका साहसपूर्वक विरोध करेगी, ‘तो क्या’ और अब मैं तुम्हें दिखाऊँगी कि ‘मैं क्या कर सकती हूं।’ उस स्थिति में पुरुष भयभीत हो जायेगा और अपने मिथ्या सम्मान की रक्षा हेतु मर्दांनगी नहीं दिखायेगा। धीरे-धीरे दु:ख भरे दिन बीत जायेंगे व खुशियों की भोर होगी,जहाँ समन्वय,सामंजस्य ही नहीं; समरसता भी होगी और ज़िंदगी रूपी गाड़ी के दोनों पहिए समान गति से दौड़ेंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – चक्रव्यूह…।
रचना संसार # १०७
☆ गीत – चक्रव्यूह… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆