(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते …“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५२ ☆
सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – इन दिनों.…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम – “श्री कृष्ण भजन … “।)
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – संस्कारों की छाँव।)
एक छोटे से गाँव में रामरतन दुबे नाम के एक सरल और कर्मनिष्ठ शिक्षक रहते थे। वे विद्यालय में पढ़ाने के बाद प्रतिदिन आश्रम जाकर गरीब बच्चों की सेवा और शिक्षा किया करते थे।
उनकी पत्नी मंजू संतान न होने के कारण चिड़चिड़ी और उदास रहने लगी थी। एक दिन गुरु माँ के कहने पर वह भी आश्रम गई। वहाँ बच्चों की मुस्कान, सेवा और शांत वातावरण ने उसके मन को बदल दिया। वह रोज आश्रम जाने लगी और बच्चों की सेवा में उसका मन रम गया।
धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल गया। अब वह सबसे प्रेम और आदर से बात करने लगी। आश्रम के संस्कारों ने उसके जीवन में नई रोशनी भर दी। कुछ समय बाद उसे माँ बनने का सुख भी प्राप्त हुआ।
अपने बच्चे को गोद में लेकर वह अक्सर कहती—
“जीवन में धन से बड़ी संपत्ति अच्छे संस्कार होते हैं।”
☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २५ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆
श्री रविंद्रनाथ टागोर
रविंद्रनाथ टागोर व संगीत
रविंद्रनाथांना जन्मजात लाभलेल्या रूपसौंदर्यासारखंच सूर सौंदर्य देखील लाभलं होतं. ब्राह्मो समाजाचे आद्य गायक विष्णुचंद्र चक्रवर्ती हे त्यांचे पहिले गायन गुरू. यदुभट्ट यांच्याकडेही त्यांचे संगीत शिक्षण झाले मात्र कोणत्याही विशिष्ट प्रणालीत त्यांनी स्वतःला बांधून घेतलं नाही. त्यांनी जवळ जवळ २२३० स्वरचित गाण्यांना चाली लावल्या.
रविंद्रनाथांच्या कविता; नाद, सूर, लय घेऊनच त्यांच्या लेखणीतून प्रकट होत. ते त्यांच्या कवितेला कधी कविता म्हणत नाहीत, गीत म्हणतात. इंग्रजी गीतांजलीतील कविता खरंतर prose poetry किंवा गद्य काव्य या प्रकारातील आहेत पण तरीही त्यांनी तिला ‘गीतांजली, song offering’ म्हटलंय. कदाचित मूळ बंगाली कविता, ह्या गेय असल्यामुळे असेल. कविता व गेयता यांचं नातं अनादि कालापासून भारतीयांनी अनुभवलेलं आहे. आपली वेद, उपनिषदे सुद्धा गेय काव्य रूपातच आहेत.
रविंद्रनाथांनी सुरांचे सामर्थ्य लहानपणीच ओळखलं होतं. त्यांच्या कवितेचा भाव; सुख-दु:ख, हर्ष- शोक, भक्ती- प्रीती कोणताही असो, त्यांचे शब्द, सुरांचा साज लेऊनच वहीच्या मंचावर नर्तन करीत प्रवेश करत. कवितेचं गाणं होताना सुरांतून इंद्रधनुष्य निर्माण होत असतं असं त्यांना वाटे.
“मला गायला कधी येत नव्हतं असं मला आठवतच नाही. ” असं ते म्हणायचे. गाणं रचताना ते गात गात रचावं व रचता रचता तद्रूप होऊन जावं अशी तन्मयता, उन्मादावस्था त्यांनी अनेकदा अनुभवली व एकदा एका खाजगी पत्रात वर्णिली पण आहे. ही अलौकिक अशी अध्यात्मिक परमावस्था नाही काय?
रविंद्रनाथांना भारतीय अभिजात संगीताची चांगली जाण होती. अनेक रागरागिण्यांचे संस्कार घेऊन त्यांची गीतं प्रकट होत. पण लोकसंगीताच्या देखील असंख्य चाली त्यांच्या गीतांमध्ये दिसतात. बंगाली लोकसंगीत मुळात अतिशय समृद्ध आहे. बाऊल, भटियाली, कीर्तन, काका, कविगान, श्यामा संगीत, फकिरांची गाणी, सूफी गाणी, वैष्णव भक्तांची गाणी, भादू सारखी कहाण्यांची गाणी, पाँचालि, जात्रापाला असे अनेक प्रकार त्यात आहेत. आपल्या संगीतासाठी ख्याल, ध्रुपद, ठुमरी, दादरा, टप्पा इथपासून लोकसंगीतापर्यंतच्या; इतकंच नव्हे तर पाश्चात्य संगीतावर आधारित चाली देखिल वापरण्याची रविंद्रनाथांची प्रतिभा पाहून अभ्यासक देखील चकित होतात.
रविंद्र संगीताचा बंगाली संगीतावरील प्रभाव आज देखील ठळकपणे जाणवतो किंबहुना खरंतर रविंद्र संगीतापासून बंगाली संगीत वेगळं करताच येणार नाही. त्यांच्या संगीताकडे चित्रपट क्षेत्रातील सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, नितीन बोस, तपन सिन्हा, कुमार साहनी यांच्यासारखे अतिरथी, महारथी आकर्षित झाले नसते तरच नवल! त्यांनी आपल्या चित्रपटात रविंद्रनाथांची गाणी वापरली. इतकेच नव्हे तर कांही ब्रिटिश, युरोपियन व ऑस्ट्रेलियन चित्रपटांत देखील त्यांची गाणी वापरली गेली आहेत. मात्र आपल्या गीतातील शब्दच काय पण सूर देखील बदलणं त्यांना मंजूर नव्हतं. आज सुध्दा त्यांची गाणी जशीच्या तशी गायली जातात.
(संदर्भ: रविंद्रनाथ तीन व्याख्याने, ले. पु ल देशपांडे)
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☆ गीत : ७३ ☆
DELIVERANCE is not for me in renunciation. I feel the embrace of freedom in a thousand bonds of delight.
Thou ever pourest for me the fresh draught of thy wine of various colours and fragrance, filling this earthen vessel to the brim.
My world will light its hundred different lamps with thy flame and place them before the altar of thy temple.
No, I will never shut the doors of my senses. The delights of sight and hearing and touch will bear thy delight.
Yes, all my illusions will burn into illumination of joy, and all my desires ripen into fruits of love.
THE day is no more, the shadow is upon the earth. It is time that I go to the stream to fill my pitcher.
The evening air is eager with the sad music of the water. Ah, it calls me out into the dusk. In the lonely lane there is no passer by, the wind is up, the ripples are rampant in the river.
I know not if I shall come back home. I know not whom I shall chance to meet. There at the fording in the little boat the unknown man plays upon his lute.
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “जैसी करनी, जौन करत है“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४९ ☆
☆ बुन्देली कविता – “जैसी करनी, जौन करत है“☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन की बस यही अदा है…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २२१ ☆
☆ जीवन की बस यही अदा है…☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆