हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९७ – प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  प्रायमरी का मास्टर…२।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९७ ☆

☆ –  प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

और

जो प्रायमरी का मास्टर है

वो तो है और भी अधिक असहाय।

 

कोई धनी धोरी नहीं है उसका

उससे ज्यादा रुतबेदार होता है

सिपाही पुलिस का।

 

जाने उसकी किस्मत में

क्या बदा है,

आज वो गुरू नहीं

सिर्फ गधा है

जिसके ऊपर अनावश्यक

आदेशों और प्रतिबन्धों का

भारी बोझा लदा है।

वो जाता है स्कूल

तपती दोपहर में

या कि फिर तड़के।

थोड़ी सी जगह में बैठकर

उससे कोई दीक्षा नहीं लेता,

वो किसी को शिक्षा नहीं देता।

वो तो बढ़ाता है भीड़ को।

 

पढ़ाता है वो पचास लड़के।

और आगे चलकर

वही भीड़ नष्ट करने लगती है

प्रजातांत्रिक नीड़ को।

 

छूटता है स्कूल

तो लगता है जैसे

छूटा हो कोई खिरका,

कोई ठेका नहीं ले सकता क्या

इनकी फिकर का ?

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २९४ – “ताप रहे हैं दुख अपने सब…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “ताप रहे हैं दुख अपने सब...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “ताप रहे हैं दुख अपने सब...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

सहज उमीदों के आँगन में

पगड़ी लिये पिता ।

ताप रहे हैं दुख अपने सब

सिगड़ी लिये पिता ॥

 

रहा वेग आँसू का

तय फिर कैसे कर लेते ।

बाहों में आकार नदी का

कैसे कर लेते ।

 

ऊँचाई पर जा सकने की

चाह रही उनकी –

सुविधाओं की कितु नसेनी

लँगड़ी लिए पिता ॥

 

दर्द नहीं रोया कितना हो

आगे कठिन समय ।

पास नहीं फटका उनके ज्यों

अप्रत्याशित भय ।

 

जीवनराग रहे वे गाते

बस प्रसन्न होकर –

नये हौसलों की छोटी सी

खँजडी लिये पिता ॥

 

प्रतिभायें सब उनके

पद चिन्हो पर थीं चलती ।

सबकी आशायें प्रकाश में

थीं उनके पलती ।

 

उनके ही संदर्भ सभी को

रहे मार्ग दर्शक –

चलते रहे व्यवस्थायें

सब पिछड़ी लिये पिता ॥       

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

01-08-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ – हास्य-व्यंग्य – “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

झब्बूलाल ने पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ाया और हमेशा की तरह मेरे सामने एक लंबा प्रश्न पटक दिया। भाई साहब, देवभूमि भारत में कदम-कदम पर देवालय हैं, जहां प्रति दिन शंख और घंटों की ध्वनि के बीच दिन भर ईश्वर की आराधना होती है, साधु-संतों, महंतों, जगत गुरुओं के प्रवचन होते हैं, देवी-देवताओं की शोभा यात्राएं निकलती हैं। लाउडस्पीकर लगा कर अखंड रामायण, भागवत पाठ, नर्मदा, शिव, विष्णु एवं गरुड़ पुराण होते हैं, भंडारे होते हैं, उस भारत भूमि वासियों से देवराज इंद्र के सम्मान में क्या गुस्ताख़ी हो गई जो इस वर्ष वे कहीं तो सिर्फ छिड़काव कर रहे हैं और कहीं बेहिसाब पानी उड़ेल रहे हैं ?

मैंने कहा, झब्बू भाई, मैं ऑफिस जाने के लिए घर से निकला हूं मुझे प्रश्नों के जाल में मत उलझाओ। वह बोला, भैया मैं कल से इस बारे में कई लोगों से पूंछ चुका हूं, किसी ने संतोषजनक समाधान नहीं किया। आप पत्रकार हैं कुछ तो बताएं। जब तक मैं आपके ऑफिस के लिए पानों की पुड़िया बनाता हूं। मैंने कहा, झब्बू भाई मैं पृथ्वी लोक का पत्रकार हूं। ट्रंप, पुतिन, मोदी, योगी, राहुल की प्रसन्नता, दुख  और नाराजी की वजह बता सकता हूं देवलोक वासी इंद्र की नाराजी अथवा उनके मूड के बारे में जानने के लिए तो तुम्हें देवलोक के पत्रकार नारद जी से संपर्क करना होगा। यदि लोगों को ऐसा लग रहा है कि देवराज रुष्ठ हैं इसलिए वर्षा को प्रभावित कर रहे हैं तो उन्हें खुश करने का प्रयत्न करें।

झब्बू बोला, भाई साहब अखबारों में छप रहा है कि अच्छी वर्षा के लिए लोग जगह-जगह पूजा-पाठ, यज्ञ करवा रहे हैं। टोना टोटके भी हो रहे हैं, कहीं गधों को गुलाबजामुन खिलाए जा रहे हैं, कहीं मेंढक-मेंढकी के विवाह कराए जा रहे हैं, जमीन में उल्टे घड़े गड़ाए जा रहे हैं फिर भी इंद्र देव खुश नहीं हो रहे!

पान लगाते हुए झब्बू ने मेरी ओर नजर फेंकी और पुनः कहा, भाई साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि दुश्मन देशों ने हमारे देश के खिलाफ इंद्र के कान भर दिए हों? मैंने कहा यह भी हो सकता भाई जी क्योंकि हमारे देश के कुछ नेता भारत को विश्व गुरु बनाने पर तुले हैं जबकि अनेक देश हमें गुरु नहीं मानना चाहते।

झब्बू बोला – भाई साहब, इंद्र देव की नाराजी के और क्या कारण हो सकते हैं ? मैंने झब्बू से पान की पुड़िया ली और कहा प्यारे भाई, जाने के पहले मुझसे इंद्र देव की नाराजी का सबसे बड़ा कारण सुन लो। झब्बू मेरी ओर झुका, मैंने धीरे से कहा – तुमने सुना होगा कि जब-जब भारत भूमि पर कोई धर्मनिष्ठ, तपस्वी, लोकप्रिय राजा हुआ है तब-तब इंद्रासन डोला है। इंद्र के मन में आशंका पैदा हुई है कि भारत का वह धर्मनिष्ठ राजा कहीं उनसे उनका सिंहासन न छीन ले, तो भाई शायद यही आशंका इस समय भी इंद्र के मन में समा गई है और संभवतः इंद्र देव इस कारण ही कुपित होकर वर्षा को अस्त्र बना कर भारत भूमि के शासक को अशक्त करके उससे अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं। मेरी बात सुनकर झब्बूलाल की आँखें खुली रह गईं। मैंने उसे हतप्रभ छोड़ कर अपने स्कूटर में किक मारा और आगे बढ़ गया।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६ ☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सावन आ गया है…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७६ ☆

☆ # “सावन आ गया है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆ 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

यह तरुवर से कैसी

लिपटती हुई बेलें

प्रीत का नया

सावन में खेल खेलें

यह अठखेलियां

कर रही तुमको इशारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारें

 

वर्ष कि यह

लंबी लंबी झड़ियाँ

बूंदों की यह

लंबी-लंबी लड़ियाँ

यह लड़ियाँ यह झड़ियाँ

सब रंग है तुम्हारे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन है मधुरस

पीने का मौसम

मदहोशी में गाफिल

जीने का मौसम

रस से भरे हैं

तुम्हारे नैन कटोरे

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

सावन आ गया है

अब तुम भी आ जाओ

व्याकुल है मन

अब ना तरसाओ

भीगकर बारिश में

संग कुछ वक्त गुज़ारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे

 

यह सावन का मौसम

यह रिमझिम फुहारें

भीगा हुआ तन मन

अब तुमको पुकारे /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२० – घिर आई काली काली बदरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘घिर आई काली काली बदरी…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२० ☆

☆ घिर आई काली काली बदरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

घिर आई काली काली बदरी,

खाली गागर, वाली बदरी.

न धरती की प्यास बुझेगी,

सूखी सूखी काली बदरी.

घिर आई काली काली बदरी,

*

प्यासी धरती, बंजर धरती.

किसका पेट भरेगी धरती,

धरती को कैसे सहलाए.

खुद भी तो है प्यासी बदरी,

घिर आई काली काली बदरी.

*

हम सब तुमसे,यही मनायें,

सागर से गागर, भर लायें.

फिर धरती पर बरस बरस कर,

इस धरती की प्यास बुझायें.

बन जाओ जीवन दाता बदरी,

घिर आई काली काली बदरी.

 ☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४४ ☆ व्यंग्य – शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘शीतल भाई और शान्ति  की खोज’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ शीतल भाई और शान्ति  की खोज ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

शीतल भाई रिटायर हुए तो पानी से निकली मछली हो गये। लगा जैसे पांव के नीचे से ज़मीन खिसक गयी। समझना मुश्किल हो गया कि क्या करें और कहां जाएं। पहले सवेरे आठ बजे उठकर दफ्तर की तैयारी में लग जाते थे। टहलने- घूमने, पूजा-पाठ में कभी रुचि नहीं रही। ‘जेही विधि राखे राम, तेही विधि रहिए’ की नीति पर चलते रहे। शरीर को ज़्यादा कष्ट देने के कभी पक्षधर नहीं रहे।

अब रिटायर हुए तो नौ बजे तक पलंग पर ही लुढ़कते-पुढ़कते रहते। जब पत्नी उलाहना देती, ‘क्या अहदी बने पड़े हो, दिन कितना चढ़ गया, उठो’, तब उठते।

आदत के मारे कभी-कभी अपने पुराने दफ्तर में पहुंच जाते। कुर्सी लेकर किसी कर्मचारी के बगल में गपियाने को बैठ जाते। लेकिन कुछ दिन बाद वे प्रबंधकों की नज़र में खटकने लगे। आदेश निकल गया कि कर्मचारी किसी भी बाहरी आदमी को बगल में बैठने न दें।

दफ्तर में कार्यरत साथी भी अब उनसे कटने लगे थे। रिटायर्ड आदमी से क्या बात की जाए? शीतल भाई किसी कर्मचारी को फोन लगाते तो वह थोड़ी देर बाद ही बात बन्द करने के बहाने ढूंढ़ने लगता।

अब शीतल भाई को गांव की याद आने लगी। सोच लिया कुछ दिन गांव में रहेंगे तो मन बहलेगा। ताज़ा हवा मिलेगी, शान्ति मिलेगी। वहां अभी रिश्तेदार थे, पुराना पैतृक मकान था। पिता-माता के जीवन काल में साल दो साल में चक्कर लगाते थे, लेकिन वहां मन नहीं लगता था। शहर और दफ्तर बुलाता रहता था। एक-दो दिन में ही ऊब कर भाग खड़े होते। लेकिन अब दफ्तर का दबाव नहीं है। जाएंगे और जब तक मन लगेगा, रहेंगे।

पत्नी से पूछा तो उन्होंने अपनी गठिया का हवाला देकर जाने से मना कर दिया। शीतल भाई अकेले ही निकल पड़े। गांव पहुंचे तो भाइयों, भतीजों ने स्वागत किया। हाल-चाल का लेनदेन हुआ। पुरानी पोथियों के पन्ने पलटे गये।

रात को शीतल भाई आंगन में लेटे तो तारों से भरा आकाश दिखा। शीतल भाई चौंके। ऐसा आकाश अभी तक कहां था? शहर में तो यह कभी दिखा नहीं।

सवेरे गांव में निकले तो पाया कि गांव बदल गया है। अब उन्हें पहचानने वाला कोई नज़र नहीं आता। ढूंढ़ते हुए दो-तीन परिचितों के घर पहुंचे तो लोग उन्हें परिचय देने के बाद ही पहचान पाये। जो ठीक से पहचान पाये वे काफी बूढ़े हो चुके थे।

शीतल भाई को लगा कि यहां आकर ज़िन्दगी जैसे ठहर गयी है। सब कुछ मंथर गति से चलता है, कहीं कोई जल्दबाज़ी नहीं।

शाम को डेढ़ दो किलोमीटर टहलने निकल गये। सड़क के दोनों तरफ खेत दिखते थे। दूर जाकर नदी के पुल पर बैठ गये। बगल में पुराना मन्दिर था। सब तरफ सन्नाटा था। दो चार लोग मन्दिर में आते जाते दिखते थे। थोड़ी देर बैठकर शीतल भाई ऊब कर उठ आये।

शीतल भाई के घर से थोड़ी दूर एक सेठ की किराने की दुकान और मकान था। दूसरी रात को वहां से किसी के गुस्से से बकने- झकने की आवाज़ें आने लगीं। पूछने पर पता चला कि गांव के एक बिगड़े रईस अक्सर शराब पीकर सेठ को गालियां सुनाते हैं और सेठ जी शांत चित्त से सुनते हैं। कारण यह बताया गया कि सवेरे यही सज्जन सेठ के पास हाथ जोड़ते हुए आते थे और घर  की चीज़ें उनके पास गिरवी रख जाते थे। इस क्रम में सेठ जी उनकी खेती की ज़मीन और घर की बहुत सी चीजों के मालिक हो गये थे। इसीलिए वह गालियां सुनकर भी स्थितप्रज्ञ बने रहते थे।

तीन-चार दिन में ही शीतल भाई गांव से उकताने लगे। यहां का सन्नाटा और जीवन की सुस्त रफ़्तार उन पर भारी पड़ रही थी। शहर में थे तो दिन भर गाड़ियों का आना-जाना, ट्रेनों का हूटर, पास-पड़ोस की खटर-पटर कानों में आती रहती थी। चौराहे पर खड़े आदमी को भी शहर अपनी रफ़्तार में लपेट लेता था। ज़िन्दगी उसी रफ़्तार की आदी हो गयी थी, इसलिए सुस्त गति वाली ज़िन्दगी में ‘एडजस्ट’ होना मुश्किल लग रहा था।

शीतल भाई को याद आया कई साल पहले वे मुंबई गये थे। वहां स्टेशन पर एक आदमी ने उनसे उनके शहर का नाम पूछा और फिर बताया कि एक बार वह तीन-चार घंटे के लिए उनके शहर में गया था और वहां की ज़िन्दगी उसे इतनी सुस्त लगी कि उसका जी घबराने लगा। उसकी बात याद करके शीतल भाई को लगा कि हर जगह की ज़िन्दगी की अपनी रफ़्तार होती है और एक रफ़्तार वाली जगह के आदी आदमी को दूसरी जगह समायोजित होना आसान नहीं होता।

एक हफ्ते बाद ही शीतल भाई वापस शहर पहुंच गये। पत्नी बोलीं, ‘बड़ी जल्दी वापस आ गये ? कुछ दिन और शान्ति से रह लेते।’

शीतल भाई ने जवाब दिया, ‘वहां शान्ति कुछ ज़्यादा ही है। हम शहर वालों को ज़्यादा शान्ति की आदत नहीं रही। ज़्यादा शान्ति हो तो मन घबराने लगता है। जैसा भी है हमारे लिए शहर ही ठीक है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ११५ – लेन – देन… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– लेन – देन …” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ११५  — लेन – देन — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर’: मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

एक ध्यातव्य ग्रामीण प्रसंग है। पड़ोसी देता था और लेने वाला पड़ोसी तो लौटाता ही नहीं था। देनदार पड़ोसी कशमकश अनुभव करता था किस चितवन से वापस मांगने का साहस कर पाए। उसकी पत्नी बड़ी गंभीरता से यह सब आँकती थी। इस मामले में अपने पति की अपेक्षा वह होशियार ही थी। उसने अपने पति से बात निकाल ली अपने घर से कुछ जाने का उसे दुख तो बहुत होता है। दुख की बात हुई तो उसने पति को सुख का नुस्खा सुझाया। तुम मांगने वाला फकीर बन जाओ। बाबा दो, लेकिन वापस पाने की आशा मत करना। पत्नी से सलाह पाने पर मांगने जैसे भाव से वह चेतन हो गया। पहली बार ही मांगे जाने पर उससे कहा गया, “मिंतर, तुमसे ली हुई कुल्हाड़ी मैं वापस कर दूँगा।” वह अंदर ही अंदर खुश हुआ। उसे तो याद ही न था अपनी कुल्हाड़ी कभी वहाँ गई थी। 

 © श्री रामदेव धुरंधर

05  — 08 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८९ – जिंदगी गिरवी रखी☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८९ ☆

☆ सामयिक गीत – जिंदगी गिरवी रखी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

आबे जमजम

चाहते थे

जहर की बूँदें चखी।।

.

सात जन्मों के लिए

हों साथ हम

वादा किया।

चंद दिन में जुदा हो,

बतला उसे

जुमला दिया।

कह रहा मन चा

हिए तन नवल नूतन

नित सखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

.

कह रहा काक्रोच

पीड़ित को

अकड़ काजी जहाँ।

कहो कैसे राहतें

पाए दलित-पीड़ित वहाँ।

अशिक्षा ने भूख सह

शिक्षा गही

अब है दुखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

.

देश-हित को गौड़,

दल-हित को

प्रथम माना सदा।

अहंकारी वृत्ति

पद-मद, खुदी पर

खुद हैं फिदा।

लड़ पड़ोसी से

परेशां रात-दिन

मिथ्या मुखी।

जी लिए लम्हे

विवश हो

जिंदगी गिरवी रखी।

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (10 अगस्त से 16 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (10 अगस्त से 16 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी के पास राम नाम का रसायन है। इसका अर्थ हुआ हनुमान जी के पास राम नाम रूपी दवा है। श्री हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के सेवक हैं इसलिए उनके पास राम नामरूपी दवा है। इस दवा का उपयोग हर प्रकार के रोग में किया जा सकता है। दुनिया में सिर्फ श्रीराम नाम ही एक ऐसी दवा है जिसे सभी रोग ठीक हो जाते हैं। श्री हनुमान जी को याद करने के अद्भुत ग्रंथ श्री हनुमान चालीसा में लिखा है कि :-

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से सभी रहस्यों की प्राप्ति होती है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपको 10 से 16 अगस्त तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा परंतु सबसे पहले इस सप्ताह के ग्रहों के विचलन के बारे में बता रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य, बुध और गुरु कर्क राशि में, मंगल मिथुन राशि में, शुक्र कन्या राशि में शनि मीन राशि और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

आईये अब राशि वार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपको अपनी प्रतिष्ठा में वृद्धि प्राप्त होगी। अगर आप ध्यान देंगे तो प्रतिष्ठा में अधिक वृद्धि हो सकती है। आपका और आपके जीवन साथी को स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपको अपने संतान से थोड़ा सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए। आपके शत्रु शांत रहेंगे। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में मामूली तनाव रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख कार्यों करने के लिए सफलता दायक है। 15 तारीख के दोपहर के बाद से और 16 अगस्त को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

यह सप्ताह आपके भाई बहनों के लिए उत्तम है। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। उनके धन में वृद्धि होगी। आपके साथ उनका संबंध अच्छा रहेगा और आपको उनका अच्छा सहयोग भी प्राप्त हो सकता है। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कर्मचारियों अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। जैसे पहले चल रहा था वैसे ही चलेगा। आपके संतान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख सफलता प्राप्त करने में मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन पहले जैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का सुंदर योग है। थोड़े से परिश्रम से ज्यादा धन की प्राप्ति होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगी। भाग्य के भरोसे बिल्कुल ही ना बैठे। अपने परिश्रम पर विश्वास करें। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इसके अलावा माता जी के स्वास्थ्य के प्रति भी आपको सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके लिए अत्यंत अच्छा हो सकता है। आपको बस परिश्रम और सही सोच के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाई बहनों के स्वास्थ्य में थोड़ी कमजोरी हो सकती है। भाई बहनों से आपके प्रयासों के कारण संबंध सुधार सकते हैं। भाग्य से मामूली सहयोग प्राप्त होगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आप अपने दुश्मनों को साधारण से प्रयास से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार के दिन दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

सही ढंग से कार्य करने पर कचहरी के कार्यों में सफलता की उम्मीद है। आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाग्य से मामूली मदद मिलेगी। आपके संतान को सुख प्राप्त होगा। संतान का आपको सहयोग मिलेगा। शत्रुओं को आप आसानी से हरा सकते हैं। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त होगी। भाग्य के स्थान पर अपने परिश्रम पर आपको यकीन करना चाहिए। भाग्य से आपको मामूली मदद ही मिल पाएगी। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख फलदायक है। 10, 11 और 12 तारीख को आपको सावधानी के साथ सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में वृद्धि भी संभव है। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। धन आने का अच्छा योग है। व्यापार में आपको लाभ होगा। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह बहुत ध्यानपूर्वक कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। आपके माता जी का और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 15 तारीख के दोपहर के बाद का समय तथा 16 तारीख अनुकूल है। 13, 14 और 15 के दोपहर तक का समय सचेत रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने अधिकारियों की प्रशंसा प्राप्त होगी। कार्यालय में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। उनको अच्छे प्रोजेक्ट मिल सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु परास्त नहीं होंगे। भाग्य से आपको इस सप्ताह मदद मिलने की उम्मीद नहीं है। आपको अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख परिणाम दायक है। 15 और 16 तारीख को आपको सजग रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से अच्छी मदद प्राप्त होगी। भाग्य से आपके कई कार्य हो सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य पर अपने परिश्रम के साथ भरोसा करना चाहिए। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति भी इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। धन प्राप्ति हेतु बहुत ज्यादा प्रयास करना इस सप्ताह आपके लिए हानिप्रद हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से डरने की विशेष आवश्यकता नहीं है। दुर्घटनाओं में आपको कोई नुकसान नहीं होगा। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख कार्यों को करने के लिए लाभप्रद है। 10, 11 और 12 तारीख को आपको सतर्क रहकर अपने कार्यों को मुस्तैदी से करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए अत्यंत सुंदर रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनको ऐश्वर्य और वैभव प्राप्त होगा। उनकी मानसिक स्थिति भी अत्यंत अच्छी रहेगी। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से परास्त कर सकते हैं। भाग्य आपको कुछ विशेष ढंग से मदद करेगा। भाग्य की मदद आपको सीधे-सीधे प्राप्त नहीं होगी। परंतु आपके कई कार्य अच्छे भाग्य के कारण हो जाएंगे। व्यापारियों का व्यापार ठीक चलेगा। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख विशेष रूप से परिणाम मूलक है। 13, 14 और 15 तारीख को आपको सजगता के साथ अपने कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। उनको समाप्त करने के लिए आपको प्रयास करने चाहिए। आपके प्रयासों को सफलता प्राप्त होगी। कचहरी के कार्यों में आपको थोड़ी बहुत सफलता प्राप्त हो सकती है। परंतु सावधानी आवश्यक है। धन आने का योग है। दुर्घटनाओं से आप इस सप्ताह बाल बाल बचेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 13, 14 और 15 तारीख के दोपहर तक का समय उत्तम है। सप्ताह के बाकी दोनों में आपको सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

 यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। उनको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अगर वह नौकरी में है तो वहां उनको अच्छा प्रोजेक्ट या अच्छी सीट मिल सकती है। विवाह के प्रस्ताव के बारे में इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 15 की दोपहर के बाद से लेकर और 16 तारीख प्रभावशाली है। 13, 14 और 15 की दोपहर तक आपको सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८९ आणि ९० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८९ आणि ९० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ८९ – – 

जनीं भोजनीं नाम वाचे वदावे ।

अती आदरे गद्य घोषें म्हणावे ।

हरीचिंतने अन्न जेवीत जावे ।

तरी श्रीहरी पाविजेतो स्वभावे ।।८९।।

अर्थ : लोकांमध्ये असताना आणि जेवण करताना भगवंताचे नाम घ्यावे. हे नाम घेताना ते आदरपूर्वक आणि मोठ्याने गजर करून स्पष्टपणे म्हणावे. जेवण करताना भगवंताचे चिंतन करावे. असे केल्याने नैसर्गिकपणे भगवंताची प्राप्ती होते.

(घोषें – मोठ्याने गजर करून, हरीचिंतने – भगवंताच्या स्मरणात राहून, स्वभावे – सहजपणे)

विवेचन : अन्नाला आपण पूर्णब्रह्म म्हणतो. दुसऱ्या शब्दात सांगायचे तर आपली भारतीय संस्कृती अन्नाला परमेशराचाच दर्जा देते. अन्नाला इतका मोठा आणि पवित्र दर्जा आपण देतो हेच आपल्या संस्कृतीचे मोठे वैशिष्ट्य आहे. मग असे पवित्र अन्न सेवन करताना आपला भावही पवित्र असावा. भाव किंवा भावना या गोष्टीला प्रत्येक ठिकाणी महत्व. आपल्या मानण्यावरच सर्व काही अवलंबून असते. परमेश्वराच्या मंदिरात जाणारा भाविक मनोभावे त्या मूर्तीची पूजा करतो. त्याच्यासाठी ती केवळ मूर्ती नसून प्रत्यक्ष भगवंताला तो त्या ठिकाणी पाहतो. परंतु त्याच ठिकाणी एखादा नास्तिक माणूस गेला तर त्याच्यासाठी ती फक्त एक पाषाणाची मूर्ती असते. म्हणूनच जेवताना पवित्र भाव असावा. हा पवित्र भाव कसा येईल? तर अन्नाचा घास घेण्यापूर्वी जेव्हा आपण पवित्र असे भगवंताचे नाम उच्चारू तेव्हा.

आजकाल हॉटेलमध्ये जाण्याची, बाहेरचे खाण्याची आवड सगळ्यांमध्ये निर्माण झाली आहे. कसे जेवतो आपण हॉटेलमध्ये? जरा आठवून पहा. आजूबाजूला लोकांच्या बोलण्याची कलकल असते. त्यातच आपण वेटर केव्हा आपले जेवण आणतो त्याकडे लक्ष ठेवून असतो. जेवताना बरेच जण मोबाईल पाहतात. जेवणाला आपल्या संस्कृतीत ‘ उदरभरण नोहे जाणिजे यज्ञकर्म ‘ असे म्हणतो. पण तिथे केवळ उदरभरणच होते. त्याला परमेश्वराच्या नामाचे अधिष्ठान आपण देत नाही.

जेवण म्हणजे एक यज्ञकर्म आहे. एखादा यज्ञ करताना आपण त्या त्या देवतेचे नाव घेऊन अग्निमध्ये आहुती टाकत असतो. अशा प्रकारे दिलेली आहुती अग्निमार्फत त्या त्या देवतेपर्यंत पोचते असे आपण मानतो. आपल्या पोटात देखील जठराग्नी असतो. तो प्रदीप्त झाल्यानंतरच त्याला आहुती द्यायची असते. आपल्या जठरातील अग्नीला ‘वैश्वानर’ असे नाव आहे. हा शब्द विश्वात सर्वत्र व्यापून राहिलेल्या अग्निदेवतेचे प्रतिनिधित्व करतो. अर्थात ही अग्निदेवता म्हणजे दुसरे तिसरे कोणी नसून साक्षात भगवंताचे स्वरूप आहे. भगवद्गीतेत श्रीकृष्ण म्हणतात, ” अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।” अर्थात सर्व प्राणिमात्रांच्या शरीरात असलेला वैश्वानर अग्नी म्हणजे मी आहे.

म्हणून समर्थ म्हणतात की समूहामध्ये जेवण करताना आदरपूर्वक परमेश्वराचे नाम घ्यावे. सर्वांना कळेल, स्पष्टपणे ऐकू येईल अशा पद्धतीने ते म्हणावे. पूर्वी आपल्याकडे जेवणाच्या पंक्तीत बसताना श्लोक म्हणण्याची प्रथा होती. आजही ती काही ठिकाणी पाळली जाते. त्यामुळे अन्नाबद्दल पवित्र भाव बाळगणे, जेवणाला लगेच सुरुवात करण्याऐवजी थोडा संयम पाळणे, भगवंताचे नाम आदरपूर्वक घेणे या गोष्टींचे संस्कार सहजपणे बालमनावर होत होते. आता मात्र पंक्तीत श्लोक म्हणणे फार कमी झाले आहे. कोणी तो म्हणत असेल तर त्याच्याकडे फारसे लक्ष दिले जात नाही. घरी आपण एकटे असू तेव्हा देखील जेवणापूर्वी भगवंताचे नामस्मरण करूनच जेवणाला सुरुवात करावी.

आपण जसे अन्न खाऊ तसे विचार निर्माण होतात. सात्विक अन्न असेल तर विचार देखील चांगले निर्माण होतात. राजस किंवा तामसीअन्न विकारांना जन्म देते. आपली आई, पत्नी किंवा बहीण जेव्हा स्वयंपाक करते, त्यावेळी तिच्या मनात आपण आपल्या माणसांसाठी हे भोजन बनवतो आहोत असा भाव असतो. ते भोजन तयार करताना मनात प्रेम असते. साहजिकच ते विचार तिने तयार केलेल्या अन्नात उतरतात. आपले पूर्वज आणि ऋषीमुनी म्हणूनच वाटेल त्या ठिकाणी जेवत नव्हते. महाभारतात श्रीकृष्ण जेव्हा शिष्टाई करण्यासाठी कौरवांकडे जातो, तेव्हा दुर्योधनाने बराच आग्रह करूनही तो त्या ठिकाणी जात नाही. त्याऐवजी विदुराकडील साधेच परंतु सात्विक अन्न जेवणे तो पसंत करतो.

अनेक लोकांना नोकरी व्यवसायानिमित्त काही वेळा नाईलाजाने बाहेर जेवण घ्यावे लागते. असे जेवण घेताना त्याभोवती पाणी फिरवून आपण भगवंताचा प्रसाद ग्रहण करतो आहे अशी भावना मनात असू द्यावी. मग त्या अन्नाचे प्रसादात रूपांतर झाल्याशिवाय राहणार नाही. जेवताना भगवंताचे स्मरण असू द्यावे. असे केले म्हणजे ती आहुती खरोखरच भगवंतापर्यंत पोहोचेल. ज्याला अध्यात्मार्गावर चालायचे आहे त्याला तर अन्न सेवन करताना अशी दक्षता घ्यायलाच हवी. अन्नाचा स्थूल भाग आपल्या शरीराचे भरण पोषण करतो तर त्याचा सूक्ष्म अंश आपल्या मनाचे आणि बुद्धीचे पोषण होते. म्हणून अन्न ताजे, सात्विक, साधे असावे.

जेवताना आपले लक्ष चवीकडे जास्त असते. एखादी गोष्ट आवडली की आपण खाण्यावर नियंत्रण ठेवत नाही. रसना म्हणजे आपली जीभ यात महत्वाची भूमिका पार पाडते. जिभेची दोन कार्ये आपल्या सगळ्यांना परिचित आहेत. पहिली गोष्ट म्हणजे स्वाद किंवा चवीचे ज्ञान आपल्याला तिच्यामुळे होते. दुसरे म्हणजे जीभ हे बोलण्याचे साधन आहे. ज्याला जिभेवर नियंत्रण ठेवता आले, त्याला परमार्थ लवकर साधता येतो. खाताना आणि बोलताना अशा दोन्ही अर्थाने. ज्याला भगवंत प्राप्तीची इच्छा आहे त्याने त्याच्या स्मरणाशिवाय एक क्षणही वाया जाऊ देता कामा नये. स्वामी समर्थांच्या वाङ्मयात सांगितल्याप्रमाणे “अहो येता जाता, कार्य करीता, सदा घेता देता, उठत बसता वदनी वदता ग्रास गिळता… ” या पंक्तीप्रमाणे सदोदित त्याचे नामस्मरण करत जावे. मग भगवंत दूर नाही.

स्वसंवाद :: 

१. मी जेवण करताना केवळ जिभेच्या ‘स्वादाचा’ आणि आवडीचा विचार करतो, की ते शरीराला ऊर्जा देणारे एक ‘यज्ञकर्म’ म्हणून शांत चित्ताने स्वीकारतो?

२. आजकाल जेवताना मोबाईल पाहण्याची किंवा टीव्ही बघण्याची लागलेली सवय सोडून, मी किमान २ मिनिटे देवाचे नाव घेऊन भोजनाला सुरुवात करतो का?

३. “अन्नाचा सूक्ष्म अंश माझ्या मनाचे आणि बुद्धीचे पोषण करतो, ” हे लक्षात ठेवून मी सात्त्विक आहार घेण्याबाबत आणि अन्न शिजवताना मनात चांगले विचार ठेवण्याबाबत जागरूक आहे का?

४. “येता जाता, उठत बसता, ग्रास गिळता” माझ्या मनात आणि वाचेवर त्या जगनियंत्याचे नाव अखंड राहते का?

——- 

श्लोक क्र. ९० – – 

न ये राम वाणी तया थोर हाणी ।

जनीं वेर्थ प्राणी तया नाम काणी ।

हरीनाम हे वेदशास्त्री पुराणी ।

बहू आगळे बोलिली व्यासवाणी ।।९०।।

अर्थ : ज्याच्या मुखात रामाचे नाव येत नाही असा माणूस आपल्या जीवनाचे मोठे नुकसानच करून घेत असतो. अशा व्यक्तीचे जगणे व्यर्थ आहे. अशी व्यक्ती अत्यंत हीन समजावी. वेदशास्त्रे, पुराणे यात महर्षी व्यासांनी हरिनामाची महती विविध प्रकारे सांगितली आहे.

(हाणी – हानी/नुकसान, काणी – क्षुद्र/हीन)

विवेचन :  रामनामाचे महत्व अपरंपार आहे. आतापर्यंतच्या विविध श्लोकातून त्याचे महत्व विविध प्रकारे आपल्याला सांगितले आहे. या श्लोकात ते ज्याच्या मुखी रामनाम येत नाही अशा मनुष्याची अवस्था वर्णन करतात. मुळात मनुष्य जन्म दुर्लभ. ८४ लक्ष योनी अनेकवार फिरून हा जन्म मिळतो असे सांगितले जाते. अशा या दुर्लभ मनुष्य जन्माचे सार्थक करून घ्यायचे असेल तर मुखामध्ये हरिनाम येणे आवश्यक आहे. रामनाम म्हणजे अमृत आहे. जे रामनामाचा आश्रय घेतात अशांचा मुखातून जणू अमृत बाहेर पडते. ते मुख खरोखरच धन्य होय. अन्यथा आयुष्य व्यर्थ बडबडण्यात गेले असे समजावे. अशा व्यक्ती जगल्या काय आणि मेल्या काय सारखेच? त्यांचे जीवन व्यर्थ गेले. अशा व्यक्तींचे जगणे म्हणजे अत्यंत हीन दीन अशा प्रकारचे आहे असे समर्थ म्हणतात. समर्थानी अशा व्यक्तीसाठी ‘काणी ‘ शब्द वापरला आहे. अशा व्यक्तींचे जिणे कवडीमोलाचे. स्वा. सावरकरांचे शब्द हरिनामाबद्दल वापरायचे तर असे म्हणता येईल, ” तुजसाठी मरण ते जनन, तुजवीण जनन ते मरण, तुज सकल चराचर शरण… “

हरीनाम मुखात न येता जगणे म्हणजे मरणच आहे. ‘ हरी उच्चारणी अनंत पापराशी, जातील लयाशी क्षणमात्रें ‘ असे ज्ञानदेव म्हणतात. हरिनामाचे सामर्थ्य अगाध आहे. त्याचे नाम मुखात आले की जन्मोजन्मीचे पाप नष्ट होते. त्यासाठी ज्ञानदेव गवत आणि अग्नीची उपमा वापरतात. वाळलेले गवत अग्नीच्या संपर्कात आले की क्षणार्धात जळून नष्ट होते, अग्नीशी समरस होते. तसेच परमेश्वराचे नाम घेणारी व्यक्ती त्याच्याशी एकरूप होते. ती परमेश्वरच होऊन जाते.

असे हरिनामाचे महत्व साधुसंतांनी निरनिराळ्या प्रकारे वर्णन केले आहे. मनुष्याला त्याद्वारे सावध करण्याचा प्रयत्न केला आहे. व्यासांनी वेद, शास्त्रे, पुराणे यांची रचना केली. त्यांनी देखील विविध प्रकारे त्यात हरिनामाचे महत्व स्पष्ट केले आहे. महाभारतात एकदा दुर्योधन श्रीकृष्णाला विचारतो की धर्म म्हणजे काय हे मला कळते पण तसे वागण्याची बुद्धीच मला होत नाही. अधर्म म्हणजे काय हेही मला समजते, पण त्यातून मला बाहेर पडता येत नाही. तेव्हा श्रीकृष्ण म्हणतात, ” तुझ्या हृदयात तू मला स्थान दे म्हणजे तुला चांगले वागण्याची बुद्धी होईल. ” प्रत्येक व्यक्तीच्या हृदयात परमेश्वराचे वास्तव्य असतेच. परंतु अज्ञानामुळे त्यावर पडदा पडलेला असतो. हा पडदा ज्ञानाच्या प्रकाशाने दूर होतो. पण दुर्योधनासारख्या व्यक्ती प्रत्यक्ष भगवंताने सांगूनही त्याप्रमाणे आचरण करीत नाहीत. अशा माणसांचे जगणे खरोखरच व्यर्थ होय. संत मीराबाई म्हणतात, ” रामनाम रस पीजे मनवा, रामनाम रस पीजे, तजि कुसंग संतसंग बैठी नित, हरी -चर्चा सुणी लीजें. ” रामनामाच्या रसातील गोडी चाखल्याशिवाय कळणार नाही. तेव्हा आपणही रामनामाचा आश्रय घ्यावा. आपल्या मुखात अखंड रामनाम येईल असा सत्संग, असे वागणे असावे. मनुष्य जन्माचे सार्थक करून घ्यावे. संत एकनाथ म्हणतात, “रामनाम ज्याचे मुखी, तो नर धन्य तिन्ही लोकी. “

स्वसंवाद :: 

१. ८४ लक्ष योनी फिरून मिळालेल्या या ‘दुर्लभ मनुष्य जन्माचा’ वापर मी केवळ व्यर्थ गोष्टींमध्ये करत आहे, की रामनामाने त्याचे सार्थक करत आहे?

२. दुर्योधनाप्रमाणे मलाही बऱ्याचदा ‘चांगले काय आणि वाईट काय’ हे समजत असूनही, माझ्या मनातील अज्ञानाचा पडदा दूर करण्यासाठी मी देवाकडे ‘सद्बुद्धी’ मागतो का?

३. संत एकनाथांच्या वचनानुसार, तिन्ही लोकांत ‘धन्य’ होण्यासाठी आणि मन शांत ठेवण्यासाठी मी रोजच्या जगण्यात नामस्मरणाचा आश्रय घेतो का?

– क्रमशः श्लोक ८९ आणि ९०

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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