हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४९ – बुन्देली कविता – ”जैसी करनी, जौन करत है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जैसी करनी, जौन करत है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४९ ☆

☆  बुन्देली कविता – जैसी करनी, जौन करत है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

जैसी करनी, जौन करत है

बैसइ भरनी बोइ भरत है

कब सें कइ ती दुरबा तक ले

अब लौ बैठो इतइ मरत है

 *

बच्चों खें दो जून खबाउत

जब दिन भर जाँगर पेरत है

 *

अंड-गंड नइयाँ खाबे कौ

इतनो भर लव, अब उछरत है

 *

मरो जात डुकरा ब्यारी खें

दिन को खाओ नोइ पचत है

 *

कौनउँ पहुना आ जाउत जब

बरा – भात उर दार बनत है

 *

केरा खें कितनउ सींचो तुम

भगवतकाटो तबइ फरत है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२१ – जीवन की बस यही अदा है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन की बस यही अदा है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२१ ☆

☆  जीवन की बस यही अदा है…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

जीवन की बस यही अदा है।

कब तक किसका साथ बदा है।।

 *

जियो जिंदगी जी भर यारो।

मन पर भारी बोझ लदा है।।

सत्य सनातन की यह बेला।

हनुमत जी की बड़ी गदा है।।

 *

कितना भी वह सत्य छुपा लें।

होना उसकी जीत सदा है।।

 *

नेक राह पर चलना सीखो।

मिले सफलता यदा-कदा है।।

 *

बंग भूमि की दुखद कहानी।

अधिक गरीबी यदा-तदा है।।

 

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

22/5/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०४ ☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ. इन्द्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ इंद्रजीत सिंहजी द्वारा लिखित  “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०४ ☆

☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ इंद्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति: ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’

लेखक : इंद्रजीत सिंह

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग

मूल्य : 330 रु

आलेख: विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

☆ यह पुस्तक संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

“अलेक्सा, प्ले हिट्स ऑफ लता…” ड्राइंग रूम के किसी कोने से महज़ इतना कहने भर की देर होती है और आधुनिक तकनीक का वह उपकरण लता दीदी के ‘अनफॉरगेटेबल’ एल्बम का कालजयी गीत बजाने लगता है, “तू जहाँ-जहाँ भी होगा, मेरा साया साथ होगा…”। तकनीक बदल गई, माध्यम बदल गए, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन जो नहीं बदला, वह है लता मंगेशकर की आवाज़ का जादुई सम्मोहन। अपनी इसी अलौकिक आवाज़ के ज़रिये लता जी आज भी हम सबके बीच चिर-जीवित हैं। सच ही तो है, कुछ शख़्सियतें मर कर भी अमर हो जाती हैं। सुख हो या दुख, राष्ट्रीय पर्व हो या कोई पावन त्योहार, हमारी हर भावना को स्वर देने के लिए लता दीदी का कोई न कोई गीत हमारी चेतना में सहज ही तैर जाता है। अक्सर लोग गीतकार या संगीतकार को बाद में याद करते हैं, वे पहले लता जी की आवाज़ से फिल्म, नायिका और उस दौर को पहचानते हैं। वे सही मायनों में भारतीय संगीत की वैश्विक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं।

ऐसी युगप्रवर्तक हस्ती पर देश-विदेश में प्रचुर काम हुआ है। नसरीन मुन्नी कबीर की ‘लता मंगेशकर-इन हर ऑन वॉइस’, हरीश भिमानी की बहुचर्चित कृति ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’ , राजू भारतन द्वारा लिखित ‘लता मंगेशकर: ए बायॉग्रफी’, नसरीन मुन्नी कबीर व रचना शाह की ‘ऑन स्टेज विद लता’, मंदर वी. बिचू की ‘लता: वॉइस ऑफ द गोल्डन एरा’ तथा तारिकुल इस्लाम की पुस्तक जैसी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ अंग्रेजी में आ चुकी हैं। मूलतः हिंदी में इस स्तर पर अपेक्षाकृत कम काम दिखाई देता था, जिसे यतींद्र मिश्र की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘लता: सुर गाथा’ और सुरेश पटवा की ‘सुरमयी लता’ ने एक ठोस धरातल दिया।

इसी श्रेणी में एक बेहद प्रामाणिक, संवेदनशील और शोधपरक दस्तावेज़ के रूप में हाल ही में सामने आई है, शिक्षाविद एवं साहित्यकार डॉ. इन्द्रजीत सिंह (पूर्व प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन) द्वारा लिखित पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ₹330 मूल्य की यह सुंदर कृति सुर कोकिला की जीवन यात्रा को बेहद प्रवाही और मुकम्मल अंदाज़ में पाठकों के सामने रखती है। सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार इरशाद कामिल की प्रस्तावना इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा देती है।

लेखक डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने लता जी के विराट जीवन को केवल एक पार्श्वगायिका के दायरे में न समेटकर, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को बेहद सलीके से गूंथा है।

लता जी की जीवन यात्रा, संघर्ष की कहानी है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरक है। संघर्ष और दुश्वारियों भरी राह, को इंद्रजीत जी ने एक अलग अध्याय में संजोया है।

लता जी के कालजयी गीत, लता जी का क्रिकेट प्रेम, विदेशों में भारत का परचम,

गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर, लता मंगेशकर वाया हरीश भिमानी एवं यतीन्द्र मिश्र,सम्मान और पुरस्कार अध्याय लता दीदी के जीवन को पाठक तक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित स्वरूप में पहुंचाने में इंद्रजीत जी की कलम सफल रही है।

डॉ. इन्द्रजीत सिंह के अनुसार लता मंगेशकर की आवाज़ शब्दों को एक नई आत्मा प्रदान करती थी। उनके गायन में भाव, अर्थ और शुद्धता का जो अद्भुत समन्वय था, वही इस पुस्तक का मुख्य कथ्य है।

1942 में पिता दीनानाथ मंगेशकर के असामयिक निधन के बाद, मात्र 13 वर्ष की नन्हीं उम्र में पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर अभिनय और गायन की दुनिया में उतरना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। शुरुआती दौर में कुछ निर्माताओं द्वारा उनकी आवाज़ को “बेहद पतली” कहकर नकार दिया जाना और फिर उसी आवाज़ का पूरे विश्व पर राज करना, यह संघर्ष गाथा पाठकों के भीतर नई ऊर्जा भरती है।

लता जी की आवाज़ में एक अनूठा जादू था। वे बच्चों सी मीठी बोली और अठखेली करती किशोरी से लेकर एक प्रौढ़ संजीदगी भरी आवाज़ तक, सुर-ताल-राग के अनुरूप गले को त्वरित प्रभाव से ढाल लेती थीं।

पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका प्रामाणिक और तटस्थ होना है। लेखक ने दूरदर्शन, आकाशवाणी के आर्काइव्स तथा लता जी के तमाम साक्षात्कारों के गहन संदर्भों को सहेजा है।

पुस्तक में संगीत जगत के उन रोचक इतिहासों और विवादों को भी पूरी तटस्थता के साथ जगह दी गई है, जो अक्सर ऐसी बड़ी हस्तियों के साथ जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1974 में लता जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक गाने (लगभग 25,000 गाने) गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज होना, फिर मोहम्मद रफी साहब द्वारा उस रिकॉर्ड की संख्या को चुनौती देना, और अंततः शोधकर्ता हरमिंदर सिंह हमराज द्वारा प्रत्येक गाने को सूचीबद्ध कर वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने जैसे प्रसंगों का ज़िक्र पुस्तक को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाता है। उनकी बहन आशा भोंसले जी से मिलने वाली स्वस्थ संगीतमय चुनौतियों का विश्लेषण भी इस पुस्तक के फलक को विस्तार देता है।

कवियों की पसंद का अद्भुत सर्वेक्षण: डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने इस पुस्तक में एक अनूठा और अभिनव प्रयोग किया है। उन्होंने देश के 100 से अधिक प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्हें लता जी का कौन-सा गीत सर्वाधिक प्रिय है। इस सर्वेक्षण का निचोड़ यह निकला कि अधिकांश रचनाकारों के दिलों पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ राज करता है। साथ ही, यह तथ्य भी उभरकर आया कि साहित्यिक अभिरुचि के लोगों द्वारा पसंद किए गए अधिकांश कालजयी गीत अद्भुत गीतकार शैलेन्द्र के लिखे हुए थे। उल्लेखनीय है कि लेखक इन्द्रजीत सिंह पूर्व में गीतकार शैलेन्द्र पर भी लिख चुके हैं।

संगीत से इतर, लता जी का क्रिकेट के प्रति अगाध प्रेम और लॉर्ड्स के मैदान से लेकर भारतीय क्रिकेट इतिहास के कप्तानों के साथ उनकी आत्मीयता का जो अध्याय इसमें बुना गया है, वह पाठकों के लिए एक संदर्भ है।

इरशाद कामिल की काव्यात्मक भूमिका रोचक है । उन्होंने लता जी की तुलना एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी से करते हुए लिखा है:”लता मंगेशकर एक नदिया का नाम है, जिसका पानी बेहद साफ़ है। निर्मल है। पावन है। जो बहती है तो लहरें नाचती हैं। जिसकी लहरों में कोई देवी संतूर लिए बैठी है। इस नदी की आवाज़ अगर ज़ख़्मों पे लगा लो तो ज़ख़्म भर जाते हैं।” यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति पठनीय है।

‘न भूतो न भविष्यति’

संगीत की लंबी और यशस्वी पारी को जीते हुए लता जी जब सराहना के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान थीं, तब उनका इस नश्वर संसार से जाना पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों के लिए एक मर्मांतक और स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। उस भावुक क्षण में हर संवेदनशील हृदय रो उठा था।

इसी मर्म को अभिव्यक्त करती मेरी तब प्रकाशित हुई , काव्य पंक्तियाँ इस विमर्श को पूर्णता देती हैं:

स्वर साम्राज्ञी कोकिल कंठी, हम सब का है प्यार लता,

भारत रत्न, रत्न भारत का, गीतों का सुर, सार लता ।

रागों का जादू, जादू गज़ल का, सरगम की लय, तार लता,

तबले की धिन् पर, सितारों की धड़कन, नगमों की रस धार लता ।

बनारस घराना, जयपुर तराना, गीतों का इकरार लता,

बैजू सुना था सुर बावरा वो, तानसेन दीदार लता।

सरहद की रेखा से सुर ही बड़ा है, नूपुर की झंकार लता,

भारत-पाक लाख दुश्मन हों, जनता की सरकार लता ।

तुम्हारा ये जाना न माने ज़माना, रहेंगी सदा गुलज़ार लता

… विवेक रंजन श्रीवास्तव

आज का दौर बदल चुका है। तकनीक के इस युग में ‘स्टार मेकर्स’ जैसे ऐप्स और ‘इंडियन आइडल’ जैसे कई रियलिटी शोज़ के मंच मौजूद हैं, जहाँ से नई प्रतिभाएँ बहुत आसानी से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन मंचों पर लता जी के कई प्रतिरूप और अनुगामी शनैः-शनैः संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। परंतु, यह एक निर्विवाद शाश्वत सत्य है कि लता दीदी तो बस लता दीदी ही थीं— न भूतो, न भविष्यति। यद्यपि, सुर-साधना तो वास्तव में माँ सरस्वती की वह चिरंतन तपस्या और पूजा है, जिसमें यदि कल को कोई नई लता स्थापित होती है, तो स्वर्ग के किसी कोने में बैठी लता दीदी की आत्मा ही सर्वाधिक प्रसन्न होगी।

मशहूर शायर जावेद अख्तर ने कभी कहा था “हमारे पास एक चाँद है, एक सूरज है और एक लता मंगेशकर है।”

डॉ. इन्द्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’ इसी अद्वितीय और ऐतिहासिक सत्य को बेहद आदर, सलीके और शोधपूर्ण दृष्टि से सहेजने का एक अत्यंत सराहनीय और सफल प्रयास है। यह पुस्तक न केवल हर संगीत प्रेमी के संग्रह में होनी चाहिए, बल्कि संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

सेवा निवृत मुख्य अभियंता विद्युत मंडल

स्वतंत्र लेखक , कहानीकार , नाट्य लेखक ,समालोचक

ई अभिव्यक्ति पोर्टल के हिंदी संपादक

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७८ – देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७८ ☆ देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

कल पूरे विश्व में संग्रहालय दिवस मनाया गया था।हमें इसकी जानकारी थी, कि इस दिन सभी संग्रहालयों में प्रवेश निशुल्क रहता हैं।

मौक़े पर चौक्का लगाते हुए हम चार साथी प्रातः ही जयपुर के संग्रहालय देखने के लिए एक मित्र की कार से रवाना हो गए।संग्रहालय में कुछ इक्का दुक्का हमारे जैसे मुफ्त के मज़े लेने वाले लोग अवश्य मिले।

अधिकतर संग्रहालयों में पार्किंग बहुत दूर रहती हैं।सुबह दस बजे ही मौसम के तेवर तेज़ हो रहे थे।चारों तरफ जेठ की तपती गर्मी ने बेहाल कर दिया था।एक मित्र ने तो हथियार डाल दिए।हम सब भी खाली हाथ लौट आए।साथी बोले ये विश्व संग्रहालय दिवस मई में ही क्यों मनाया जाता हैं ?ताकि, लोग मुफ्त में आनंद ना ले पाए।

व्यथित मन से घर आकर, अपने सब से अज़ीज़ मोबाइल में घुस गए।मन में विचार आया ये मोबाइल भी तो हमारा संग्रहालय हैं।

दुनिया भर की फोटो, बीमारियों के फर्जी नुस्खे, राजनतिज्ञों के झूठे वीडियो, अनजान लोगों के फालतू वाले ज्ञान और वो सैंकड़ों मैसेज जिन पर ये लिखा होता है, “इसको अवश्य सेव कर  लेवें” हमारे मोबाइल को संग्रहालय होने की मान्यता देते हैं।उसी संग्रहालय को देखते देखते पूरा दिन व्यतीत हो गया।

शाम के समय एक 15 वर्षीय बालक से हमने लिफ्ट में पूछा कि आज विश्व संग्रहालय दिवस है, आप इसके बारे में क्या जानते हैं ?

बालक बहुत ही नटखट निकला और बोला अंकल, हमें तो आप भी किसी संग्रहालय से कम नहीं लगते, ये पुरातन बातें और अपने बचपन के किस्से सुना सुना कर पका डालते हो, मोहल्ले के सभी बच्चे इसी लिए आप से दूर रहते है।

बालक ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, आप लोग आज की बात क्यों नहीं करते हो ? जैसे आई पी एल का चैंपियन कौन बनेगा, चिप्स का कौन सा नया ब्रांड आया हैं, कौन से पिज्जा के साथ कोल्ड ड्रिंक फ्री है, पॉप सिंगर शकीरा ने कोर्ट कैसे जीत लिया है, आदि। गंतव्य पहुंचते ही बालक मिल्खा सिंह की स्पीड से दौड़ गया।

घर वापस आकर दैनिक भास्कर में अपना भविष्य पढ़ा,उसमें लिखा था, आज का दिन अच्छा नहीं है, यात्रा ना करें।दूसरों से बुराई मिलेगी।कितना सत्य बताते है, हमारे ये भविष्य वक्ता।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२८ ☆ पाळतात साप… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२८ ?

☆ पाळतात साप… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

आज वावरत आहे, किती रुबाबात साप

कात टाकुन कोडगे, काही फिरतात साप

*

पाय जपुन टाकावा, जंगलात फिरताना

पाय चुकीचा पडता, येथे डसतात साप

*

जात बहिरीच त्यांची, भाषा समजत नाही

काठी पाहुन बिळात, सारे शिरतात साप

*

असो सागर वा भूमि, न्याय सर्व जगी एक,

छोट्या सापास सहज, मोठे गिळतात साप

*

किडा सावध नसावा, घात म्हणूनच झाला

दबा धरूनच येथे, काही असतात साप

*

गावामध्ये शिरतात, काही घुसखोर साप

फकिराच्या वेषातच, काही फिरतात साप

*

फार विषास मागणी, काळ्या बाजारी ह्या

नसतात ते गारुडी, तरी पाळतात साप

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ✍ 

खेत,

खलिहान

नदी,

पर्वत

नगर, गाँव और आदमी

सब बेहाल हैं

सबके एक से हाल हैं

सबकी मुट्ठियों में

जलते हुए सवाल हैं।

सवालों का न तन होता है

न मन होता है

सवालों की उम्र नहीं

केवल वजन होता है।

और/ ये वजन

घन की तरह घिरता है

गिरता है

सपना बिखरता है

मैं/

तुम/ये/ वे

सब बैठे हैं- सूखी नदियों के किनारे

हमारे

प्यारे घर

बाढ़ में बह गये हैं

हमारे पाससिर्फ जहरीली रेत के घरौंदे रह गये है।

बाढ़/नदी की होती

तो सब सह लेते

किसी तरह रह लेते

लेकिन

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८४ “बाप कवितायें लिखता है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बाप कवितायें लिखता है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बाप कवितायें लिखता है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

बेटे को अफसोस

“बाप कवितायें लिखता है।”

है अधेड़ पर अधिक आयु का

बेशक दिखता है ॥

 

चुँधियाये चश्में से सबको

ताका करता है ।

तम्बाकू को मसल हथेली

फाँका करता है ।

 

अपभ्रंश है बचा आदमी

की प्रजाति का –

डारवीन के परिकल्पन को

जाँचा करता है ॥

 

जमा हुआ रहता

चबूतरे पर हो स्थायी ।

उसको कोई सीख किसीकी

अब तक ना भायी ।

 

कोई बात सहन करने की

मगर नहीं क्षमता –

माँ के कुछ भी कहने पर

वह  भड़का करता है ॥

 

कोई महिला दरवाजे से

अगर निकल जाये ।

पता नहीं कब उनकी

भीषण त्योरी चढ़  जाये ।

 

फिर तो बस अध्याय

सजग आलोचन का लेकर ।

अपने भाषण में वह उसका

पालन करता है ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16 – 5 – 2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६ – आलेख – “चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरणास्पद आलेख चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा।) 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६

☆ आलेख ☆ चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

86 वर्ष की उम्र में भी कर रहे रोगियों की सेवा

ऊंचा कद, गौर वर्ण, इकहरे बदन वाले आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी डॉ. रविशंकर मिश्रा याने डॉ. आर. एस. मिश्रा के जीवन का लक्ष्य ही पीड़ितों का उपचार कर उन्हें रोगमुक्त जीवन प्रदान करना है। मित एवं मधुर भाषी डॉ. मिश्रा गंभीर और शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं। वे परिचतों, अपरिचितों अथवा इलाज कराने आये रोगियों की पूरी बात ध्यान से सुनते हैं और हल्की मुस्कुराहट के साथ ऐसा उत्तर देते हैं कि लोग प्रसन्न और तनाव मुक्त हो जाते हैं। रोगी का आधा इलाज तो उनकी विनम्रता और मीठी वाणी ही कर देती है। वे कहते हैं कि चिकित्सक की वाणी और व्यवहार भी रोगी की प्रतिरोधक क्षमता घटाने – बढ़ने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।

25 सितम्बर 1941 को देवरी, सागर में जन्में डॉ. मिश्रा 86 वर्ष की उम्र में भी अपने माता – पिता को दिया पीड़ितों की सेवा का वचन निभा रहे हैं। प्रारम्भिक शिक्षा देवरी से पूर्ण करने के उपरांत मिश्रा जी ने एम जी एम मेडिकल कॉलेज इंदौर से एम बी बी एस किया और 14 अप्रैल 1968 को शासकीय चिकित्सक के रूप में छतरपुर से सेवा प्रारंभ की। इसके उपरांत रीवा से उनकी सेवाएं आर्मी को स्थानांतरित कर दी गईं। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश के आजादी के युद्ध में सीमा पर भारतीय सेना के घायल जवानों का मनोयोग से उपचार किया। आपने पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा पर भी लंबे समय तक सैनिकों का उपचार किया तदोपरांत पुनः जबलपुर स्थानांतरित हुए फिर दमोह, जबलपुर कोतवाली डिस्पेंसरी, मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं पनागर में सेवाएं देते हुए 2003 में सेवानिवृत्त हुए।

चिकित्सक के रूप में वे जहां – जहां पदस्थ रहे उनके संपर्क में आए लोग आज भी उन्हें स्नेह और श्रद्धा से याद करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवाभावी डॉ. मिश्रा ने घर में आराम करने के बजाए अंतिम सांस तक पीड़ितों की सेवा का संकल्प लिया और जबलपुर स्थित महाकौशल के सुप्रसिद्ध चिकित्सालय नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है।

जब उनसे प्रश्न किया गया कि – “आर्मी में सैनिकों की चिकित्सा के दौरान आपने क्या विशेष अनुभव प्राप्त किया?” तब इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में  डॉ. मिश्रा ने कुछ क्षण शून्य में निहारने के उपरांत कहा – “मुझे युद्धों से घृणा हो गई है, मैंने घायल सैनिकों के अत्यंत मार्मिक दृश्य देखे हैं। किंतु हां, नियमित जीवन शैली और लक्ष्य प्राप्ति के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की प्रेरणा मुझे सेना से ही मिली। संभवतः इसी कारण मैं सेवा के अपने लक्ष्य को जीवन के इस पड़ाव में भी निभा पा रहा हूं।”

उन्होंने नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं जारी रहने के प्रति संचालक डॉ. आनंद तिवारी को साधुवाद दिया।

डॉ. आर. एस. मिश्रा जी अपने 58 वर्षीय चिकित्सा सेवा काल में लगभग 25 लाख राेगियों की चिकित्सा का कीर्तिमान रच चुके हैं। अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में वे हाकी, बास्केटबाल और कबड्डी के खिलाड़ी रहे हैं। अब फुर्सत में गीत – संगीत सुनना पसंद करते हैं। डॉ. मिश्रा के सुपुत्र आनंद एयर फोर्स में वाइस एयर मार्शल के रूप में देश सेवा – सुरक्षा में रत हैं। डॉ. मिश्रा को स्वस्थ सुदीर्घ जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता जिंदगी का आखिरी प्रहर है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆

☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆

यह माना कि जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है

 

कभी अंधेरों ने धमकाया

कभी उजालों ने भरमाया

कभी हवाओं ने जुल्म ढाया

कभी मौसम ने है रुलाया

कभी हार नहीं मानी

यह खुद्दारी का असर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

यह चिलचिलाती धूप

झुलसाती हुई रूप

लू चल रही है खूब

सांस हो रही है चुप

धरा पर भीषण गर्मी का

मचा हुआ कहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

जुल्म सहते सहते

सदियां बीत गई है

हक अधिकारों के लिए

लड़ने की क्या रीत नई है?

तोड़कर रूढ़ियों को आती

यह नई सहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

उनकी आवाज बने

जो बेबस बेघर हैं

उनके आंसू पोंछे

जिनका जीवन बदतर है

दिलों में ज्योत जलाएं 

अंधेरा बहुत पथ पर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

लाचार निर्धन शोषितों के लिए

चलो कुछ करते हैं

इनके लिए जीते हैं

इनके लिए ही मरते है

नेक इरादा हो तो

 आसान हर सफर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

हमारे पथ पर चलकर

आगे कई लोग आएंगे

आजादी के जश्न में

नए तराने गुनगुनाएंगे

इन दीवानों के कदमों में

अर्पित हमारा सर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

यह माना जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०८ – नारी तुम खुद की पहचान हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता नारी तुम खुद की पहचान हो।)

☆ अभिव्यक्ति # १०८ ☆

☆ नारी तुम खुद की पहचान हो☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

नारी, तुम खुद की पहचान हो,

छाया नहीं किसी की तुम हो,

तुम ही घर की शान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

संस्कार को देने वाली,

प्रेम सभी से करने वाली,

सृजन की पहचान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम्ही अंगनी, तुम्हीं वंदनी,

तुम्हीं संगनी, तुम्हीं नंदनी,

तुम ही लय और तान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम ही शिव की शक्ति हो,

तुम ही पावन भक्ति हो,

तुम धरा का मान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम धरा की श्रेष्ठ कृति हो,

ममता, प्रेम की अनुभूति हो,

ईश्वर का प्रतिदान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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