हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “खोया हुआ कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “खोया हुआ कुछ…” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

-सुनो।

-कौन?

-मैं।

-मैं कौन?

– अच्छा। अब मेरी आवाज भी नहीं पहचानते?

– तुम ही तो थे जो काॅलेज तक एक सिक्युरिटी गार्ड की तरह चुपचाप मुझे छोड़ जाते थे। बहाने से मेरे काॅलेज के आसपास मंडराया करते थे। सहेलियां मुझे छेड़ती थीं। मैं कहती कि नहीं जानती।

– मैं? ऐसा करता था?

– और कौन? बहाने से मेरे छोटे भाई से दोस्ती भी गांठ ली थी और घर तक भी पहुंच गये। मेरी एक झलक पाने के लिए बड़ी देर बातचीत करते रहते थे। फिर चाय की चुस्कियों के बीच मेरी हंसी तुम्हारे कानों में गूंजती थी।

– अरे ऐसे?

– हां। बिल्कुल। याद नहीं कुछ तुम्हें?

– फिर तुम्हारे लिए लड़की की तलाश शुरू हुई और तुम गुमसुम रहने लगे पर उससे पहले मेरी ही शादी हो गयी।

-एक कहानी कहीं चुपचाप खो गयी।

– कितने वर्ष बीत गये। कहां से बोल रही हो?

– तुम्हारी आत्मा से। जब जब तुम बहुत उदास और अकेले महसूस करते हो तब तब मैं तुम्हारे पास होती हूं। बाॅय। खुश रहा करो। जो बीत गयी सो गयी।

☆

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६३ – आलेख – वाकई लेखक होना गौरव की बात है ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६३ ☆

☆ आलेख ☆ ~ वाकई लेखक होना गौरव की बात है ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

आज बड़ी तेज बरसात हो रही थी। ऑफिस पहुंचने में विलंब तो हो ही रहा था, लेकिन  किया ही क्या जा सकता था। बेटे ने कार स्टार्ट  की और यह कहते हुए  कि –  “पापा, बरसात तेज हो रही है मैं आपको मेट्रो स्टेशन तक छोड़ आता हूँ। आप कार चला कर जा सकते हो लेकिन उम्र के लिहाज से और जब इतनी बरसात हो रही हो, सड़कें पानी से लबालब भरी हों, तो आपको कार से जाना उचित नहीं है।”

मेट्रो रेल ही सिर्फ ऐसा साधन है जिससे आप, भीषण बारिश, भारी जाम के बावजूद भी निश्चित समय में लखनऊ के एक छोर एयरपोर्ट से इंदिरानगर के मुंशी पुलिया तक आप जा सकते हैं।

“पापा, यदि बिलम्ब हो रहा तो आप मेट्रो से ही चले जाइये, समय से पहुंचने की गारंटी मेट्रो के सिवाय कोई दूसरा नहीं देगा। आप बिना किसी तनाव के अपने ऑफिस समय से पहुंच सकेंगे।”

मुझे उसका सुझाव बिल्कुल अच्छा लगा। अपने आगामी उपन्यास के कुछ पंक्तियों को मन में संजोये मै कार में बैठा और टीपी नगर मेट्रो स्टेशन पहुँच गया।  लेखक अपने मन के अंदर आए भाव को एक झटके में कलम से कागज़ पर उतार देना चाहता है, ऐसा एक लेखक की फितरत होती है। मन में आयी पंक्तियां कहीं विस्मृति न हो जाए, मैं मेट्रो में बैठने के साथ ही फोन के स्क्रीन की ओर मुँह करके बकबकाना शुरू कर दिया। मैं धारा प्रवाह बोल रहा था, मोबाइल के नोटपैड पर मेरे अगले भोजपुरी उपन्यास का कथानक बड़ी ही मस्ती के साथ अपना स्थान बनाते हुए आगे बढ़ रहे थे। मैं अपनी धुन में इतना मगन था कि मैं बायें -दाएँ कुछ भी नही देख रहा था कि लोग क्या सोचते होंगे या मेरा उपहास कर रहे होंगे।

इस आलेख के बीच में लेखन और उसके लेखन के विषय में एक बात कहता चलूँ, नहीं तो यह बात भूल जाएगी – 

“कभी-कभी तो लेखकों को यह कहते सुनता हूँ। भाई मैं नही लिखता हूँ, वह जो ऊपर वाला है वह लिखवाता है। यह ऊपर से ही उतरता है। मुझे इस विषय में बहुत ज्यादा नहीं कहना क्योंकि  सच में होता तो वही है जो ऊपर वाला चाहता है। लेकिन यह बात थोड़ी अतिशयोक्ति सी लगती है।  दरअसल जब लेखक की दृष्टि किसी एक चीज पर म एकाग्र भाव के साथ पड़ती है, और उस विषय में दिल और दिमाग़ दोनों  एक साथ समन्वय स्थापित करते हैं, तब मन  के भीतर उस विषय पर एक कहानी, कविता और उपन्यास रचने के लिए भाव प्रकट हो उठते हैं। शब्दों की तेज बौछार शुरू हो जाती है जो वाणी और कलम के माध्यम से, वर्षो पहले सिर्फ कागज़ पर और अब कागज  या कंप्यूटर मोबाइल के स्क्रीन पर छपने लगते है। यानि ये शब्द भाव ऊपर से न  उतरकर, मन के अंदर से निकलतें है। लेखक समय, परिस्थिति अपने इर्द-गिर्द के वातावरण- जैसे दिल तक पहुंची गहरी चोट, खुशी से उछल कर बाहर निकल आने वाले दिल, क्या दिन थे वे, होगा क्या आगे, कहीं गम -कहीं खुशी, ब्रह्मांड में चमकते तारे, पहाड़ों से निकलती नदियां, झुरमुट में छुप कर बैठे हुए जीव, गांव की मिट्टी की भीनी भीनी सुगंध, शहर की चमक दमक,  ब्रह्म एक है, चौरासी कोटि देव हैं, हमहुँ लिखिबे, हमहुँ लिखव, हमउ लिखेंगे, हमाऊँ भी लिखियै, आम्ही सुद्धा लिहू”, अमारो लिखबो, हर चीज से कथानक ढूढ़ निकालता है। फिर तैयार होती है,  एक लघु कथा, एक नाटक, एक उपन्यास, एक संस्मरण, एक यात्रा वृतांत, एक पत्र, कुछ व्यंग, कुछ हास्य एक गद्य एक पद्य की क्षणिका, कुछ छंद, कुछ दोहे, कुछ सवैईया, कुछ मुक्तक, कुछ गजल कुछ सजल, कुछ छंद मुक्त कुछ छंद बद्ध, कुछ अगेय, कुछ गेय, कविताएं।”

बात कहां से शुरू हुई कहां चली गयी, मैं तो इस धारा प्रवाह लेखन में भूल ही गया। आइये पुनः वही से शुरु करें, जहाँ छोड़ा था – अब आगे क्या घटित हुआ।

दरअसल मेरे मोबाइल में देसी हिंदी गूगल टाइपिंग का एक ऐप है, जो मेरी आवाज को पहचान कर हिंदी टाइप करता है। उसके साथ मेरी दोस्ती का आलम यह है, मुझे टाइपिंग में लिखने में त्रुटि हो जाएगी लेकिन मेरे बोलने और उसके लिखने में बिल्कुल ही त्रुटि नहीं होती है। लेखन का नशा ऐसा कि शर्म भी बेशर्म हो जाती है।

अब भीड़ भरी मेट्रो में कौन इस संवाद को सुन रहा था, यह कौन नहीं सुन रहा था, इससे मुझको कुछ भी लेना देना नहीं था। हालांकि मैं इतना भी तेज नहीं बोल रहा था कि किसी को दिक्कत हो,  मुझे तो लगता है कि शायद मेरे बगल के व्यक्ति को छोड़कर कोई सुन ही नहीं पा रहा था। बस सुन रहा था मेरे होठों से सटा हुआ मेरा प्यारा मोबाइल। अपना तो हर हाल में दिल में आए भाव को मोबाइल पर उतारने का नशा रहता है। मैं वही काम कर रहा था। अचानक एक बुजुर्ग से दिखने वाले लेकिन दिव्य व्यक्तित्व और आभामंडल वाले शालीन, शिष्ट- भद्र  व्यक्ति मेट्रो में हमारे सीट के सामने आए हैं। स्थानाभाव के कारण वे आगे बढ़ जाना चाहते थे। मेट्रो में आस-पास कोई जगह नहीं थी। अचानक मुझे और मेरे बगल में बैठी हुई एक बिटिया दोनों के मन में एक साथ यह भाव आया कि अभी तो इतनी जगह रिक्त ही है कि यदि हम लोग थोड़ा-थोड़ा खिसक जाए तो एक व्यक्ति के बैठने के लिए पर्याप्त जगह हो जाएगी। सच में हम दोनों ने ऐसा ही किया।

वे भद्र व्यक्ति जो मुझसे करीब 4-5 साल उम्र में बड़े ही थे, आगे निकलने ही वाले थे कि हमने टोका –

“भाई साहब!  ठहरिये, आइये आप भी बैठ लीजिए।” इतना कुछ सोचने और अपनी बात को कहने के बीच ट्रेन खुली। इसी बीच भाई साहब का संतुलन बिगड़ा लेकिन मैंने उन्हें अपने हाथों से पकड़ा और वे हमारे बगल में बैठ गए। यह बताना उचित होगा कि यह सब काम मैंने अपने लेखन को विराम देकर किया था।

खैर फिर मैं भूल गया कि मुझे कौन देख रहा है मैं धीरे-धीरे बोलकर लिखना शुरू किया। मुझे शायद मेरे पड़ोसी से अधिक कोई नहीं सुन समझ रहा था कि मैं उपन्यास लिख रहा हूँ या किसी से बात कर रहा हूँ।

मैंने लिखना बंद किया तब तक बगल वाले उसे भद्र व्यक्ति ने मुझसे कहा-

“सर ! आप राइटर है क्या?” उन्होंने मुझसे यह कह कर कहा मेरा सिर गर्व से ऊपर उठा दिया। वाह, मुझे राइटर बोल रहे हैं। आप बताएंगे कि आप कैसे इसे लिखते हैं?  कौन सा ऐप यूज करते हैं?

मैंने उन्हें विधिवत सब कुछ समझा दिया, इतना ही नहीं उनके मोबाइल में इस ऐप को डाउनलोड और एक्टिव भी कर दिया।

जीवन के चौथे पड़ाव पर लेखन शक्ति, स्मरण शक्ति, चलने फिरने में सब कुछ में दिक्कत आती है। ऐसे में यह ऐप काफी कारगर है। ईश्वर से कामना करता हूं कि सब शक्ति कमजोर हो जाए लेखन शक्ति और स्मरण शक्ति बनी रहे।

हम दोनों के बीच आपसी परिचय हुआ, बातचीत हुई, मुझे पता चला कि मेरे बगल में बैठे हुए अग्रज पुलिस डिपार्टमेंट के बड़े सीनियर अफसर रह चुके थे और अभी हाल में दो-तीन साल पूर्व सेवानिवृत हुए थे। लेखक के रूप में उनके मन में मेरे प्रति  बहुत सारा सम्मान का भरा प्रतीत हो रहा था। बात की बात में उन्होंने कहा कि मेरे एक सीनियर डीआईजी साहब थे, उन्होंने भी कई किताबें लिखी है। मैं भी मन ही मन कहा, चलो मैंने भी लगभग एक दर्जन पूरे कर लिए।

खैर तब तक अगला मेट्रो स्टेशन हजरतगंज आ गया हम दोनों ने एक दूसरे का   हाथ जोड़कर  अभिवादन किया और वे हजरतगंज मेट्रो स्टेशन उतर गये। मुझे भी अगले मेट्रो स्टेशन केडी सिंह बाबू स्टेडियम  पर उतरना था। लेकिन मेरे बगल में बैठे दूसरे सज्जन की दृष्टि मेरे ऊपर पड़ी उन्होंने बड़े ही आदर से कहा, भाई साहब आप लेखक है ?

 मैं भी शरमाते और सकुचाते हुए कहा –

“जी.. हाँ थोड़ा बहुत जरूर लिख लेता हुँ। नहीं भाई साहब आप जिस तरह से बोलकर लिख रहे थे वाकई कहानी मेरे दिल तक पहुँच रही थी।” मैं तो बिल्कुल भाव विभोर हो गया था। आप अच्छा लिखते हैं। मुझे अपने उपन्यास लेखन के बीच ही श्रोता और पाठक दोनों मिल चुका था। मै बहुत ख़ुश था।

भाई साहब आप रहते कहाँ हैं?.. मैने उन्हें बताया, तो वे भी बोल पड़े,

“जी, मैं भी इधर रायबरेली रोड पर ही रहता हूँ।” वे सज्जन किसी  गवर्नमेंट जॉब में तो नहीं थे, लेकिन किसी कारपोरेट सेक्टर के  पदाधिकारी थे,  जैसा उन्होंने मुझे अपना परिचय दिया।

अब मेरा मेट्रो स्टेशन आ चुका था। मैंने अपना पिट्ठू बैग अपने पीठ पर लादा और  मन में यह सोचता हुआ बाहर निकला कि वाकई लेखक होना गौरव की बात है।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

गरारू घाट से समनापुर 12 नवम्बर 2019

आज कार्तिक मास  की चौदहवीं के चाँद की रात है, आज तक चौदहवीं के चाँद के रूप में रूपहले परदे पर वहिदा रहमान का चेहरा शकील बदायुनी के गीत

और रवि के संगीत की धुन पर मुहम्मद रफ़ी  के दिलकश गायन के साथ गुरुदत्त की अदायगी को जानते थे। सोचा आज नर्मदा के लावण्यमय सलिल प्रवाहित धुन पर चाँदनी को लहरों पर लास्य करते देखेंगे। रात दो बजे कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में सुवासित वसुन्धरा का अवलोकन किया तो मैथिलीशरण गुप्त लिखित पंचवटी काव्य सहज ही फूट पड़ा।

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती धरती, हरित तृणों की नोकों से,

मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

सोचा यहाँ टेंट में लेटे हुए इतना सुंदर दृश्य है तो नर्मदा के कल-कल जल में चाँदनी का नृत्य लास्य कैसा होगा, हमसे रहा नहीं गया। नर्मदा किनारे पहुँचे तो अलौकिक सौदर्य से स्तब्ध रह गए, ऐसा लगा जीवन को सम्पूर्णता प्राप्त हुई, यदि अभी यमराज आकर चलने को कहें तो चाँदनी के डोले में बैठकर ख़ुशी-ख़ुशी यमलोक चल देंगे। फिर तंद्रा टूटी तो क्या देखा…!

क्या ही स्वच्छ चाँदनी यह, क्या ही निस्तब्ध निशा;

है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?

बंद नहीं अब भी चलते हैं, नियति के कार्य-कलाप,

कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप।।

क़रीब एक घंटा शांत और चुपचाप चार चीजें हमसे बतियाती रहीं, नर्मदा, चाँदनी, कलकल ध्वनि और शीतल पवन, ब्रह्म मुहूर्त होने को था,  एक झपकी लेने इन शब्दों को गुनगुनाते वापस लौट पड़े…!

है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर।

और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है,

शून्य श्याम-तनु जिससे नया रूप झलकाता है।

सौंदर्य रसपान के बाद की निद्रा चार बजे नर्मदा उसपार से आती मुर्ग़े की बाँग से टूटी और हम पंचवटी के किरदारों की तर्ज़ पर लोटा भरकर प्रकृतिजन्य निस्तार को निकल गए।

गरारू घाट पर नर्मदा के अद्भुत सौंदर्य के दर्शन होते हैं। पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय गरूड़ देव ने तपस्या की थी, दो आमने-सामने पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर हैं जिन्हें गौड़ राजा बलवंत सिंह ने सत्रहवीं सदी में इंडो-पर्शियन शैली में बनवाया था। गुंबद व आर्च पर्शियन शैली और तोरण व गर्भगृह भारतीय शैली में बने हैं। असल में जिसे पर्शियन कला कहा जाता है वह पूरी तरह पर्शियन नहीं है, सिकंदर द्वारा पर्शिया याने ईरान को जीतने के बाद ग्रीक मूर्तिकला और भवन निर्माण ईरानी तरीक़ों में घुल मिल गए हैं। गुंबद और आर्च में वही मिलाजुला रूप दिखता है।

सोलहवीं सदी में मुग़ल सेनापति आसफ़ख़ान द्वारा रानी दुर्गावती के पराभव के बाद अकबर ने गोंडवाना को अधीनस्थ करके कराधीन राज्य के रूप में मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया जिसकी राजधानी मदनमहल रही आई लेकिन राज्य व्यवस्था गोंडवाना राजाओं के हाथ में रही। मुग़लों को सालाना एकमुश्त रक़म बतौर नज़राना मिल जाती थी। गोंडवाना राजा छोटी रियासतों और जागीरों के माध्यम से राज्य का प्रबंधन और लगान वसूली करता था। फ़तहपुर, मकड़ाई, शोभापुर, देवगढ़, छिन्दवाड़ा और छत्तीसगढ़ी  रियासतें तथा जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद और छिन्दवाड़ा जिलों में हर्रई जागीर जैसी सैकड़ों जागीरें थीं। राजा बलवंत सिंह मुग़ल दरबार में जाते रहते थे। वे शाहजहाँ के समकालीन थे जो कि मुग़ल स्थापत्य कला का स्वर्णकाल माना जाता है। राजा बलवंत सिंह ने मुग़ल स्थापत्य कला से प्रभावित होकर इन मंदिरों का निर्माण और मरम्मत कार्य करवाया था। इन मंदिरों का रख रखाव अच्छा नहीं है। पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर से नर्मदा का पूर्व की तरफ़ दस किलोमीटर से पश्चिम में दस किलोमीटर तक प्रवाह का विहंगम दृश्य दिखता है। संभवतः नर्मदा के पूरे प्रवाह में ऐसा नज़ारा सिर्फ़ वहीं से नज़र आता होगा। उत्तरी तट पर बिखरी हरियाली और पेड़ों के प्रतिबिम्ब नर्मदा में झिलमिल करते लुभावने लग रहे थे। पहाड़ियों के दक्षिण में दलहन के पीले खेतों के साथ गन्ने के खेतों के हरियाली बिखेरते नज़ारे थे।

जब हम गरारू घाट से सात बजे चले तब केरपानी घाट पर बना नर्मदा पुल और उसके बारह पाए स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन वह पाँच किलोमीटर दूर था। नर्मदा किनारे बखेरे खेतों से पगडंडी पकड़ी कहीं-कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई से मिट्टी गीली होने से रेतीले रास्ते पर चलना पड़ा। तीन नालों की गहराई बड़ी मुश्किल से पार कर पाए। बारह बजे के आसपास केरपानी पुल के नीचे डेरा जमाया वहाँ से दो किसान विधिविधान से अखंड परिक्रमा उठा रहे थे। उन्होंने भंडारा का आयोजन किया था, उसी में भरपेट प्रसादी ग्रहण की। उन दोनों ने कर्मकांड पूरा करके भोजन किया फिर विदाई देने आए साथियों के साथ गाँजे की संगत जमाई।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१ – सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४१  ?

? सावन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

आग लिए तुम बदन में अपने,मुझे जलाने आ जाओ

अपनी रेशम सी ज़ुल्फ़ों में,मुझे सुलाने आ जाओ

=2=

हरियाली चहुँ ओर  छा गई,आया देखो सावन

अधरों से रस छलक न जाए, मुझे पिलाने आ जाओ

=3=

लता वृक्ष उपवन मदमाए, झूम उठी अमराई

अपनी बाहों के झूले में, मुझे झुलाने आ जाओ

=4=

पक्षी लगे मारने ताने,दर्द पपीहा बढ़ा रहा

अपनी कोकिल बोली से,मुझे बुलाने आ जाओ

=5=

आ भी जाओ सजनी अब,ये विरह सताये

चंद ख़ुशी की चाह में ‘राजेश’, ग़म को भुलाने आ जाओ ll

☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २० ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५‘।)

☆ मंजिरी साहित्य # २० ☆

? कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ५ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

26 जनवरी 2001 जब सम्पूर्ण भारत अपना राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस मना रहा था तभी सुबह के 8.46 मिनट पर कच्छ की भूमी में कंपन हुआl कंपन भी सामान्य नहीं अपितु अति भयंकरl जिसे देश ने सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा का नाम दे दियाl देखते ही देखते यहाँ के घर मलबों में परिवर्तित हो गयेl मलबों में लाखों लोग दब गयेl जहाँ कुछ बच्चों ने अपने माता -पिता को खो दिया वहीं कुछ पालकों ने अपनी आखों के सामने अपने लाड़लो को काल के मुँह में समाते देखाl देखते ही देखते लोग बेघर हो गयेl इतनी संख्या में मृत जन थे कि जलाने के लिये लकड़ियाँ भी कम पड़ गई थींl

जैसे ही ये समाचार सामने आया तब भारत की सरकारी, प्राइवेट, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय जैसे संगठन एकजुट होकर मदद करने हेतु सामने आये l इन सभी ने निशुल्क स्वास्थ्य शिविर, भोजन, कपड़े और रहने हेतु टेंट देने शुरु कियेl

आश्चर्य ये था कि यहां के भुंगे मकानों को कुछ भी नहीं हुआl क्यूंकि ये भुंगे गोलाकार होते हैं जिससे भूकंप का इसके किसी एक कोने की दीवार पर दबाव नहीं पड़ताl हवा का दबाव इन्हें क्षति नहीं पहुँचाताl इनमे लगी ईटे मिट्टी, गोबर और घास फूस से बनी होती हैं l छत शंकु आकार की लकड़ी के खम्भों से बनी होती है तो हल्की हो जाती है जिससे भीतों पर वजन नहीं पड़ताl

इस भूकंप ने कच्छ को झिंझोड़कर कर रख दियाl पर ये अद्भुत शक्ति के लोग कहाँ हार मानने वाले थेl इन सभी ने पुनः मिलकर कच्छ के नवीनीकरण की शपथ ग्रहण लीl आज खावड़ा में सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा हाइब्रिड रीयूजेबल एनर्जी पार्क बनाया जा रहा हैl

इसी समय भारत सरकार ने तुरंत ही मुंद्रा पोर्ट को भारतीय रेल से जोड़ना शुरु कर दिया l सरकार ने यहां उद्योगों में करों में भारी छूट दे दीl इस पोर्ट को कार्गो हेतु पुरी तरह ऑटोमेटीक किया जिससे कम समय में ज्यादा सामान उतरने और चढ़ने लगा l देश की बड़ी कंपनियों ने यहां थर्मल पॉवर प्लांट लगाये जिससे विद्युत उत्पत्ति बढ़ गईl देखते ही देखते यह पोर्ट देश के कंटेंनर का करीब करीब 60% व्यापार देखने लगाl पोर्ट के विकास होने से लेबर से लेकर इंजीनियर को हर तरह का रोजगार मिलाl

वहीं कंडला पोर्ट जिसे हम दीनदयाल नाम से भी जानते है, ये पोर्ट हमारे देश के साथ एशिया का सबसे बड़ा सरकारी पोर्ट बन गयाl यह पोर्ट भी देश के सभी राज्यों से जुडा हुआ हैl ये पोर्ट मुख्य रूप से देश की बड़ी रिफाइनरी को कच्चा तेल सप्लाई करता हैl यह लिक्विड कार्गो पोर्ट की तरह काम करता हैl

आज ये दोनों पोर्ट फोर ट्रैक सड़क से जुड़ गये हैं l

दुनिया का कोई एसा देश नहीं जहाँ कच्छीयों ने अपना अधिपत्य न जमाया हो l ये कच्छी अति परिश्रमी, कभी ना हार मानने वाले, किसी भी परिस्थिति में कामयाबी पाने वाले होते हैंl

 हैं ना अद्भुत भूमि अद्भुत लोग?

☆

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆ मुक्तक – ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१५ ☆

☆ मुक्तक ।। एक दिन कहानी बन कर रह जाता है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

जीवन में इतना भी नहीं   होना   सामान चाहिए।

क्यों भर रहे इतना कि कुछ लेना आराम चाहिए।।

जीवन के अंत समय बस दुआएं ही हैं साथ जाती।

जीवन में कुछ  अच्छा कमाया हुआ नाम चाहिए।।

=2=

क्रोध में वह सब मत गवाओं कि जो पास आया है।

शांत रह कर के जिन रिश्तों को    आपने कमाया है।।

संघर्ष को  बनाएं अपना दोस्त येआगे ले जाएगा।

बुद्धिविवेक धैर्य परिश्रम सेआदमी ने सब पाया है।।

=3=

संसार में जो भी समस्या उसका बना निदान भी है।

मत गवाओं अपना जीवन जो अनमोल महान भी है।।

एक दिन हम सब   कहानी  बन कर ही रह जाएंगे।

लोग कहें बाद में कि यह  एक अच्छा इंसान भी है।।

=4=

जिसने मुश्किलों का    सामना किया वो आगे बढ़ा है।

जिसने भाग्य को ही   कोसा वह आज वहीं खड़ा है।।

यह जीवन प्रभु  वरदान जैसा कि एक बार है मिलता।

वही बनता विजेता जाकर कि जो हालातों से लड़ा है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १४ – सैनिक भारत माता के!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता सैनिक भारत माता के!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १४ ☆

☆ सैनिक भारत माता के!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

मार भगाते सीमा से ही,

आता जो भी दुश्मन पास ।   

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

रक्षा करते हैं सरहद की,

छोड़ चले अपना घर बार ।

मारे देखो अरि को ऐसे,‌

शोणित बहता सीमा पार ‌‌।।

केवल हित भारत का चाहे,

नहीं हृदय में दूजी आस ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

राह निहारे बूढ़ी मैया,

खड़े हुए हैं बाबा द्वार ।

घर कब आओगे प्रियतम जी,

सजनी पूछे है हर बार ।।

कर्तव्यों को पूरा करके,

 आऊंगा रखना विश्वास ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

*

तन मन सब न्योछावर करके,

मातृभूमि की रखते आन ।

बनता है कर्तव्य हमारा,

शीश झुका कर दे सम्मान ।।

बांँध कफन वह सर पर रखते,

नहीं कराते हैं आभास ।

सैनिक ये भारत माता के,

वीर साहसी सबसे खास ।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८७ आणि ८८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८७ आणि ८८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ८७ – – 

मुखी राम त्या काम बाधू शकेना ।

गुणे इष्ट धारिष्ट त्याचे चुकेना ।

हरिभक्त तो शक्त कामास मारी ।

जगी धन्य तो मारुती ब्रह्मचारी ।।८७।।

अर्थ : ज्या व्यक्तीच्या मुखी रामनाम आहे, त्याला कामवासना त्रास देऊ शकत नाही. नामाच्या शक्तीमुळे कामवासनेवर ताबा मिळवण्यासाठी लागणारे धैर्य त्याला आपोआप प्राप्त होते. नामामुळे सामर्थ्य प्राप्त झालेला भगवंताचा भक्त कामवासनेला सहज नष्ट करू शकतो. या गोष्टीचे मूर्तिमंत उदाहरण असलेला आणि ब्रह्मचर्याचे पालन करणारा मारुती जगामध्ये खरोखरच धन्य झाला आहे.

(काम – कामवासना, गुणे – त्या योगाने, शक्त – सामर्थ्य)

विवेचन :  काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर हे माणसाचे मोठे शत्रू आहेत. ठरवले तर क्रोध, मद, मोह आदी विकारांवर नियंत्रण मिळवणे सोपे असते. परंतु काम हा माणसाचा सर्वात मोठा शत्रू. त्यावर नियंत्रण प्राप्त करणे भल्याभल्यांनाही अवघड. विश्वामित्रांसारख्या तपस्वी ऋषींची तपश्चर्या मेनकेने भंग केली. पराक्रमी आणि विद्वान असलेला रावण आपल्या कामवासनेवर नियंत्रण मिळवू शकला नाही. त्यामुळे कामवासना जिंकणे अत्यंत अवघड. संसारी माणसाला कामवासनेचा मर्यादित उपभोग घेण्यास शास्त्रांची ना नाही. परंतु साधना करायची असेल तर संसारी व्यक्तीने देखील कामवासनेवर नियंत्रण ठेवणे क्रमप्राप्त असते. आपण ‘ काम ‘ आणि ‘ राम ‘ दोन्ही एकाच वेळी साध्य करू शकत नाही. ‘ राम ‘ हवा असेल तर ‘ काम ‘ सोडावा लागेल.

परंतु ज्याच्या मुखी रामनाम येते आहे, अशी व्यक्ती कामवासनेवर विजय मिळवू शकते. त्याला कामवासना बाधित करू शकत नाही. रामभक्त हनुमान हे याचे सर्वोत्तम उदाहरण आहे. त्याच्या हृदयात रामनामाचा अखंड जप सुरु आहे. त्यामुळे ‘ काम ‘ भावनेला तेथे थारा नाही. हनुमंत म्हणजे अखंड ब्रह्मचर्य पालन करणारा. मुखात रामनाम आणि ब्रह्मचर्य पालन यामुळे त्याच्या अंगी धैर्य, शक्ती यासारखे इष्ट गुण निर्माण झाले आहेत. त्याला ‘ काम ‘ विचलित करू शकत नाही. जेव्हा सीतेचा शोध घेण्यासाठी तो लंकेत गेला तेव्हा रावणाच्या अंतःपुरात अनेक सुंदर स्त्रिया नको त्या अवस्थेत त्याच्या नजरेस पडल्या. परंतु सदैव जो रामनामातच रंगला आहे, अशा महाबली हनुमंताला ते दृश्य विचलित करू शकले नाही. सीतेच्या समोरही तो आपल्या स्वतःचा तिचा पुत्र म्हणून उल्लेख करतो. म्हणूनच ब्रह्मचारी असलेला हनुमान जगात धन्य आहे.

म्हणून समर्थ म्हणतात, ” हरिभक्त तो शक्त कामास मारी ” जो कायम हरीची भक्ती करतो, असा सामर्थ्यशाली माणूस कामवासनेला मारून टाकण्यासाठी समर्थ असतो. अशा व्यक्तीचे नाम परा वाणीपर्यंत पोहोचलेले असते. परा वाणीचे केंद्र हे नाभीजवळ आहे असे म्हटले जाते. कामवासनेचे केंद्र देखील त्याच ठिकाणी आहे. एकदा का नाम नाभीपर्यंत परा वाणीच्या माध्यमातून पोहोचले की तेथे कामवासना राहूच शकत नाही. संत कबीर म्हणतात, ” जहाँ काम तहाँ राम कहाँ । जहाँ राम तहाँ काम कहाँ।”

स्वतः समर्थच या श्लोकाचे उत्तम उदाहरण आहेत. मुखी अखंड रामनाम आणि ब्रह्मचर्य पालन. त्यामुळे शक्ती, धैर्य हे गुण आपोआपच त्यांच्या ठायी वास करीत होते. त्यामुळे रामसेवेचे मोठे कार्य त्यांच्या हातून घडले. म्हणूनच तेही जगात धन्य आहेत.

स्वसंवाद :: 

१. माझ्या दैनंदिन व्यवहारात माझे मन बाह्य आकर्षणे किंवा विकारांमुळे विचलित होते का? अशा वेळी मी हनुमंताप्रमाणे रामानामाचा आश्रय घेतो का?

२. “जिथे काम तिथे राम नाही, आणि जिथे राम तिथे काम नाही, ” हे कबीरांचे वचन लक्षात ठेवून मी माझ्या मनात प्रभू श्रीरामांना अढळ स्थान दिले आहे का?

३. माझ्या हातून होणारे नामस्मरण केवळ ओठांवर (वैखरी) आहे, की ते नाभीपर्यंत (परा वाणी) पोहोचून माझ्या विकारांचे शुद्धीकरण करत आहे?

४. समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे, स्वतःमध्ये ‘धैर्य आणि शक्ती’ हे उत्तम गुण निर्माण करण्यासाठी मी रोजच्या धावपळीत जाणीवपूर्वक भगवंताचे नाम घेतो का?

===== 

श्लोक क्र. ८८ – – 

बहू चांगले नाम या राघवाचे ।

अती साजिरे स्वल्प सोपे फुकाचे ।

करी मूळ निर्मूळ घेता भवाचे ।

जिवा मानवा हे चि कैवल्य साचे ।।८८।।

अर्थ :  या रामाचे नाव अतिशय चांगले आहे. ते सुंदर, छोटेसे, म्हणायला सोपे आणि बिनखर्चाचे आहे. हे नाम भवाचे म्हणजे संसाराचे मूळ कारणच नाहीसे करते. हे नाम मोक्ष किंवा परमात्म्याचे दर्शन घडवणारे आहे.

(साजिरे – सुंदर /शोभून दिसणारे, स्वल्प – छोटेसे, फुकाचे – बिनखर्चाचे, मूळ – मूळ कारण, निर्मूळ – समूळ उच्चाटन करणे, कैवल्य – मोक्ष/चिरंतन सुख, साचे – नक्कीच/खरोखर)

विवेचन :  या श्लोकात समर्थ नामाचे महत्व पुन्हा एकदा स्पष्ट करतात. ‘ राम ‘ हे नावच किती चांगले आहे! सुंदर आहे, अल्पं आहे. ते घेण्यास कोणताही खर्च करावा लागत नाही. बरं, हे नाव घ्यायचे तरी कशासाठी? तर समर्थ सांगतात की हे नाम ज्या संसारात येऊन माणूस सुखदुःखे भोगतो, जन्ममरणाच्या फेऱ्यात अडकतो, त्याचे मूळ कारणच नाहीसे करणारे आहे. हे मूळ कारण नाहीसे करते म्हणजे तरी काय करते? तर हे नाम कैवल्यप्राप्ती करून देणारे आहे. कैवल्य म्हणजे मोक्ष. मोक्ष म्हणजे चिरंतन सुख! तेच प्राप्त करून देणारे हे रामनाम.

एखादी छोटीशी परिणामकारक गोळी असावी आणि ती घेतल्याने आजार समूळ नाहीसा व्हावा तशी ही गुटिका आहे. दिसायला छोटी पण अत्यंत परिणामकारक. ज्याने ज्याने ती घेतली, त्याचा भवंताप नाहीसा झाला. पण खरे कारण असे की आमचा विश्वासच यावर बसत नाही. एक छोटेसे दोन अक्षरांचे नाम. त्याच्यात एवढे सामर्थ्य कसे असेल? पण त्याच्यातील सामर्थ्याचा प्रत्यय तेव्हाच येईल, जेव्हा ते मनापासून घेतले जाईल. वाल्या कोळ्याने रामनाम घेतले आणि अखिल विश्वाला वंदनीय अशा वाल्मिक ऋषींमध्ये त्याचे रूपांतर झाले. त्यांच्या हातून ‘ रामायण ‘ हा अजरामर ग्रंथ लिहिला गेला. रामाचे नाव काय करू शकत नाही. समुद्रात सेतू बांधणाऱ्या वानर सेनेने दगडावर फक्त ‘ राम ‘ असे लिहिले आणि काय आश्चर्य! ज्या दगडांचा मूळ गुणधर्म पाण्यात बुडण्याचा, ते चक्क पाण्यावर तरले. एवढेच नाही तर त्यावरून रामाची सेना लंकेला पोचली.

या भवसागरात आपल्यालाही तरून जायचे असेल तर हृदयामध्ये ‘ रामनामाला ‘ स्थान देणे जरूर आहे. अन्यथा पाषाणात आणि आपल्यात काही फरक राहणार नाही. बुडणे हे ठरलेले. रामनाम ही या भवसागरातून तारून नेणारी नौका आहे. बरं, हे नाम तरी किती सोपं, सुंदर आणि बिनखर्चाचे. बसल्या बसल्या, काम करताना तुम्ही केव्हाही ते घेऊ शकता. त्यातली गोडी ही अनुभवावी लागते. ती सांगून कळत नाही. अनुप जलोटा यांनी गायिलेले भजन ‘ जगमें सुंदर हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम.’ आपल्याला माहिती असेल. ‘ राम ‘ या दोन अक्षरी शब्दात ‘ र ‘ हे अक्षर अग्निवर्णाचे निदर्शक आहे तर ‘ म ‘ हे अक्षर चंद्राची शीतलता दाखवणारे आहे. थोडक्यात म्हणजे ‘राम ‘ या शब्दात सूर्यशक्ती आणि चंद्रबल यांचा मिलाफ आहे. ते संतुलित आहे. म्हणूनच ज्याने ते घेतले, त्याच्या आयुष्यात संतुलन साधले जाते. ‘ जय जय राम, जय श्रीराम, दो अक्षर का प्यारा नाम, रामनाम के जपनेसेही बन जाते सब बिगडे काम. ‘

रामनाम घेण्याची मनाला सवय लावली तरच आयुष्याच्या अखेरीस मुखात रामनाम येईल. हे घडले तर कैवल्यप्राप्ती आहेच. मन विषयविकारात अडकले तर अखेरीस ओठावर रामनाम न येता अन्य कशात तरी मन अडकेल आणि मग पुन्हा जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यात आपण अडकू. रामनामाचा जप केल्याने साधक रामरूप होतो. तुकाराम महाराज म्हणतात, “राम म्हणता रामच होईजे, पदी बैसोनि पदवी घेईजे. “

स्वसंवाद :: 

१. जे नाम अतिशय सुंदर, सोपे आणि ‘फुकाचे’ (बिनखर्चाचे) आहे, ते घेण्यासाठी मी आळस करतो की अत्यंत आदराने त्याचा स्वीकार करतो?

२. संसारातील सुखांमध्ये रमून मी केवळ ‘बुडणाऱ्या पाषाणासारखे’ आयुष्य जगत आहे, की रामनामाची नौका धरून या भवसागरातून ‘तरून’ जाण्याचा प्रयत्न करत आहे?

३. माझ्या आयुष्यात सुख-दुःखाचे प्रसंग येताना मानसिक संतुलन राखण्यासाठी, मी रामनामातील सूर्यशक्ती आणि चंद्रबलाचा अनुभव घेतो का?

४. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे, “राम म्हणता रामच होईजे” या अवस्थेपर्यंत पोहोचण्यासाठी मी माझ्या मनाला नामस्मरणाची अखंड सवय लावत आहे का?

क्रमशः श्लोक ८७ आणि ८८

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३३ ☆ अहं या वहम… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख अहं या वहम…। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया है दो दिन का मेला / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३३ ☆

☆ अहं या वहम… अत्यंत घातक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जल्दी जागना हमेशा फ़ायदेमंद होता है, फिर चाहे वह अपनी नींद से हो; अहं से हो; वहम से हो या  सोए हुए ज़मीर से… इनसे जितनी शीघ्रता से मुक्ति पा ली जाए; शरीर व मन के लिए उपयोगी है।’ जितनी शीघ्रता से मानव भोर होते, सूर्योदय से पूर्व नींद से जाग जाए… स्वास्थ्य-प्रदायक है। ‘जो सोवत है, सो खोवत है’ अर्थात् जो जागता है, वही पाता है। सो! समय से पूर्व जागने वाला व्यक्ति सदैव लाभ प्राप्त करता है और देर तक सोने वाले की हानि होना निश्चित है। यह सार्वभौमिक सत्य है कि कुछ पाने के लिए, कुछ खोना अवश्य पड़ता है। हम अगली सांस तब तक ग्रहण नहीं कर सकते, जब तक हम पहली श्वास का त्याग नहीं करते। प्रकृति की सब वस्तुएं हमें मुफ़्त में प्राप्त होती हैं, पर्याप्त हैं–परंतु संग्रहणीय नहीं हैं। यदि हम सीमा में रहते हुए उनका उपयोग करते हैं, तो उनका अभाव कभी नहीं खलता। परंतु जब हम आवश्यकता से अधिक उनका संग्रह करना प्रारंभ कर देते हैं, तो प्रकृति अपना विकराल रूप दिखा कर, मानव को सचेत करती है कि समय रहते चेत जाओ … अपनी बढ़ती लालसाओं पर अंकुश लगाओ … अपने संसाधनों का अतिरिक्त दोहन मत करो, अन्यथा तुम्हें इसका हर्ज़ाना अथवा दुष्परिणाम अवश्य भुगतना पड़ेगा। परंतु मदहोश मानव उसकी ग़ुहार की ओर ध्यान नहीं देता, बल्कि उपेक्षा भाव दर्शाता है–तो प्रकृति भीषण आपदाओं के रूप में अपना रोष प्रकट करती है।

हरी-भरी धरा को कंक्रीट के जंगल बनाने के कारण तापमान निरंतर बढ़ रहा है; ग्लेशियर पिघल रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहा है; ज्वालामुखी पर्वत फटने से भूकंप आ रहे हैं; सुनामी दस्तक दे रहे हैं; धरती फट रही है और मानव का सर्वस्व सैलाब में बह रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि प्रकृति अपनी असीम वेदना व अथाह दु:ख प्रकट करते हुए आंसू बहा रही है। परंतु फिर भी मानव प्रकृति से खिलवाड़ कर रहा है; अपनी सीमाओं का उल्लंघन कर प्रतिबंधित क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहा है और उसके आक्रोश को समझने की ज़ेहमत नहीं पा रहा, क्योंकि वह चिरनिद्रा में सो रहा है।

अहम् और वहम एक सिक्के के दो पहलू हैं, जिनका चोली-दामन का साथ है। अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, जो इस वहम में जीता है कि उससे अधिक बुद्धिमान, समझदार व शक्तिशाली कोई दूसरा हो ही नहीं सकता है। सो! वह पूरी सृष्टि पर अधिपत्य स्थापित कर, अपने अहम् की पुष्टि करना चाहता है। वह अहंनिष्ठ प्राणी केवल अपने बारे में चिंतित रहता है; अपनी सुख-समृद्धि के निमित्त प्रयासरत रहता है तथा दूसरों पर विजय प्राप्त करने के बारे में सोच- विचार कर योजनाएं ही नहीं बनाता, बल्कि उसके कार्य-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने की अनाधिकार चेष्टा भी करता है। सो! वह राह में आने वाले प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति को मिटा डालना चाहता है; भले ही उसे कितने ही निम्नतम स्तर पर ही क्यों न उतरना पड़े? वह किसी अन्य को समान स्तर पर देख आत्म- नियंत्रण खो बैठता है; अपने आपे से बाहर हो जाता है… मानव-मूल्यों को तज, उचित-अनुचित को नकार सभी सीमाओं को लांघ जाता है। इस स्थिति में मर्यादा भी उसकी राह का रोड़ा नहीं बनती, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है … भले ही वह उसका वहम क्यों न हो? लाख प्रयास करने पर भी वह दम्भी मनुष्य उस स्वनिर्मित चक्रव्यूह से बाहर निकलना ही नहीं चाहता। सो! ऐसे अहंनिष्ठ व्यक्ति का व्यवहार सामान्य कैसे रह सकता है और वह अपनी अंतरात्मा की आवाज़ कैसे सुन सकता है? उसके लिए अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य कोई मायने नहीं रखता। वह बॉस की भांति केवल स्वयं को सदैव ठीक मानता है… अपनी सोच को उचित ठहराता है,  क्योंकि ग़लती तो वह कभी कर ही नहीं सकता। ऐसे व्यक्ति को यदि आप हिटलर की संज्ञा भी देंगे, तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी।

काश! मानव सोच पाता कि संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। संसार रूपी रंगमंच पर सबको अपना क़िरदार अदा कर, ज़िदगी के सफ़र पर चल देना है। कोई भी व्यक्ति इस संसार में सदैव नहीं रहा तथा मृत्यु समय आने पर उसे लाख परदों के पीछे से भी ढूंढ लेती है। सो! मानव को अपना अहं त्याग कर, सबको समान दृष्टि से देखना चाहिए; उनसे अच्छा व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि जैसा व्यवहार आप दूसरों के साथ करते हैं, वही प्रतिध्वनि के रूप में लौट कर आपके पास आता है।

‘जैसा बोओगे, वैसा काटोगे’ अथवा ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाए’ अर्थात् जैसे कर्म करोगे, वैसा ही फल आपको प्राप्त होगा। इसलिए जो व्यक्ति आप का अहित चाहता है; आपके पथ में कांटे बिछा कर अवरोध उत्पन्न करता है; उस स्थिति में आपके लिए वैसा ही प्रत्युत्तर न देना बेहतर है,

अर्थात् अपना रास्ता बदल लेना अधिक कारग़र है, क्योंकि मानव को अपने कृत-कर्मों के अनुसार फल अवश्य मिलता है। यदि कोई आपके साथ बुरा भी करता है, तो भी आपको उसके साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए…यही जीने का सबसे सर्वश्रेष्ठ व उत्तमोत्तम मार्ग है। परंतु कुछ परिस्थितियां अपवाद भी हो सकती हैं।

वहम सब रोगों की जड़ है। वहम केवल एक आदत नहीं… स्वयं को, अपनी सोच को ठीक व उचित समझने का मात्र जज़्बा नहीं है। यह भ्रम की वह स्थिति है, जिसमें अवगाहन कर मानव अपने सम्मुख सबको हेय समझता है तथा उनके अस्तित्व को नकार देता है। वह लाज-मर्यादा तज, जीवन-मूल्यों का तिरस्कार कर, सब पर दोषारोपण कर सुक़ून पाता है तथा सबको एक ही लाठी से हांकने में विश्वास रखता है। उसका सुप्त अहं व मृत्त ज़मीर उसके सोचने-समझने की शक्ति का हरण कर लेता है। इस स्थिति में सब उससे घृणा करने लग जाते हैं; कोई भी उससे बात तक करना पसंद नहीं करना चाहता। परंतु एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब उसकी शारीरिक शक्तियां क्षीण हो जाती है; मनो- मस्तिष्क साथ नहीं देता… एकांत की त्रासदी झेलता वह अहंनिष्ठ शख़्स अपनों के बीच; अपनों के साथ जीवन का आखिरी समय व्यतीत करना चाहता है, परंतु उसके हाथ केवल निराशा ही लगती है। इन परिस्थितियों में वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है…पागलों जैसा असामान्य व्यवहार करने लगता है और प्रायश्चित-स्वरूप उन्हें जीवन के समस्त सुख प्रदान कर, अपने दायित्व का निर्वहन करना चाहता है…अपने सुख-दु:ख साझे करना तथा अपनी विवशता व अप्रत्याशित परिस्थितियों से अवगत कराना; उसकी प्राथमिकता बन जाती है… परंतु सब निष्फल। उसके आत्मज उस स्थिति में उसे अतिव्यस्त, आत्मनिष्ठ, आत्ममुग्ध व आत्मलीन  भासते हैं… जिसका अंजाम उसे नियति के अनुसार अपने कर्मों के अनुरूप अवश्य भुगतना पड़ता है।

काश! मानव का ज़मीर ज़िंदा रहता… संवेदनाएं मृत्त नहीं होतीं… संबंधों की गरिमा बनी रहती… रिश्तों की अहमियत बरक़रार रहती..जीवन-मूल्य प्रासंगिक रहते, तो मानव संवेदनहीनता के दायरे में प्रवेश करके दुष्कर्म, फ़िरौती, कन्या भ्रूण-हत्या आदि के हादसों को अंजाम न देता; बालिकाओं की अस्मत सुरक्षित रहती; मां, बहन, बेटी को मात्र उपयोगिता की वस्तु न समझा-स्वीकारा जाता, लूट-खसोट, फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या की घटनाएं आम नहीं होतीं और उन पर अंकुश लग पाता। परंतु यह तभी संभव हो सकता था; यदि हमारा ज़मीर ज़िंदा होता।

आइए! लौट चलें ,अपनी संस्कृति की ओर… जहां ज्ञान-रूपी सूर्योदय सबसे पहले होता था। जहां सांस्कृतिक एकता के रूप में, विविधता में एकता विद्यमान थी। सभी धर्म-जातियों के लोग मिल-जुल कर रहते थे। पारस्परिक स्नेह-सौहार्द व मर-मिटने का भाव था, सब मर्यादा की सीमा-रेखा का स्वेच्छा से पालन करते थे और अधिकारों के स्थान पर कर्तव्यनिष्ठता व्याप्त थी। सब परमात्म-सत्ता के सम्मुख नत रहते थे…इसलिए असामान्य व अमानवीय हादसे घटित नहीं होते थे और समाज में समन्वय व सामंजस्यता व्याप्त रहती थी।

इए! हम लौट चलें! अपने स्वर्णिम अतीत की ओर.. जहां सुक़ून था, शांति थी, सुख का साम्राज्य था। मानव राग-द्वेष व स्व-पर से ऊपर था; वहां नकारात्मकता का लेशमात्र भी स्थान नहीं था तथा सर्वहिताय व सर्वमंगल की भावनाएं जन-मानस में निहित थीं। सो! हमें अहं का त्याग कर, वहम से मुक्ति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि प्राणी-मात्र में परमात्म-सत्ता उसी प्रकार व्याप्त है, जैसे सूर्य आकाश में दिखाई पड़ता है और वह विभिन्न घड़ो के जल में भी समान रूप में प्रति- भासित होता है। इसलिए हमें सम्पूर्ण जीव-जगत् में उस ब्रह्म की सत्ता को अनुभव करना चाहिए, ताकि ऐसे सुदृढ़ समाज की संरचना हो सके; जहां सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का साम्राज्य हो।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६५ ☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ।)

☆ शेष कुशल # ६५ ☆.☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” – शांतिलाल जैन ☆

उधर सात समंदर पार निज़ाम-ए-अमेरिका अपनी कामकाज की मेज़ पर लिखवा कर रखते हैं – ‘बक स्टॉप्स हियर’.  इधर आर्यावर्त में ‘बक स्टॉप्स नो व्हेयर’. अंग्रेजी का बक श्रीमान्, आला हाकिम से लेकर अदने से मुलाज़िम तक कोई उसे अपनी डेस्क पर ठहरने नहीं देता. पास देने में सब प्रवीण. हॉकी फुटबाल में होते तो खूबसूरत पास दे रहे होते. बहरहाल, मैंने बक को जबरन रोककर पूछा – यार ये परीक्षाओं के पेपर बार बार लीक हो रहे हैं –  तुम किसी की डेस्क पर जाकर तो रुकोगे?

उसने कहा – ठहरेंगे तो मारे जाएँगे शांतिबाबू. हमें जहाँ ठहरना चाहिए वहाँ शिकारी बैठे होते हैं. समय आने पर जो आदमखोर हो जाने का भी दम रखते हैं. मुझ निरीह गरीब प्राणी को क्या ही छोड़ेंगे?  आदम जो कभी किसान के रूप में मरता है कभी छात्र के तौर पर,  कभी महिला पहलवानों के तौर पर तो कभी रिटायर्ड सैनिक के तौर पर. हमें ठहरना तो वहीं चाहिए जिनके कारण वे मरते हैं. मगर, क्या मजाल है कि हाकिम की नाक पर मक्खी और कामकाज की डेस्क पर कोई बक ठहर जाए. ठहरने का तो इन दिनों हमने सोचना ही बंद कर दिया है.

‘कभी, कहीं तो ठहरे होगे तुम?’  –  मैंने पूछा.

‘लाल बहादुर शास्त्री के समय ठहरे थे हम. ट्रेन अरियालुर में दुर्घटनाग्रस्त हुई और हम  दिल्ली में रेलमंत्री की डेस्क पर जा कर ठहर गए. अब हम कहीं नहीं ठहरते. आर्यावर्त के  ओहदेदार ‘पास द बक’ में निपुण जो हो गए हैं. जो जितना बड़ा ओहदेदार पास देने की कला में वो उतना ही माहिर.’

आर्यावर्त का मामला श्रीमान्,  मैं भी क्या ही कहता उसे. उसी ने कहना जारी रखा – ‘यहाँ हर संकट के साथ तीन चीज़ें तत्काल पहुँचती हैं — कैमरा,  बयान और उच्च स्तरीय जांच समिति. समिति जवाबदेही तय करेगी. रियाया उम्मीदें पाल लेती है,  समिति के निष्कर्ष आएँगे,  जिम्मेदार लोग दोषी ठहराए जाएँगे, समिति कहेगी मुझसे बक, यू स्टॉप हियर.  मगर ऐसा होता नहीं. वो क्या है कि समिति उच्च स्तरीय होती है. रियाया निच्च. उच्च भी इतनी कि सीढ़ी आप चढ़ नहीं पाएँगे और लिफ्ट आपको कोई देगा नहीं.  गर्दन दुखने लगती है तो जनता उच्च स्तर पर देखना ही बंद कर देती है. समिति उच्च स्तर पर जाँच करती है, निष्कर्ष हैं कि नीचे तक आ नहीं पाते.’

पिछले दिनों एक पुल टूट गया, सैकड़ों की संख्या में लोग मर गए. मैंने बक से कहा – ‘सेतु निगम के अधकारियों से लेकर लोक निर्माण विभाग के वज़ीर तक किसी की डेस्क पर तो तुम्हें रुकना ही पड़ेगा?’

उसने कहा – ‘बहुत भोले हैं आप शांतिबाबू,  बल्कि बेवकूफ़ हैं. गिरनेवाला यह पहला पुल नहीं है. न ओहदेदार नए हैं, न मेरे जैसा बक ही नया है. कुछ क्लासिक पास देखिएगा – निर्माण एजेंसी दोषी है. एजेंसी कहेगी तकनीकी स्वीकृति प्रशासन ने दी थी. प्रशासन कहेगा बजट सीमित था. वित्त विभाग कहेगा वैश्विक परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं. पुल कमज़ोर था, चेतावनी लिखी थी फिर भी बड़ी संख्या में लोग पुल पर आ गए.’  कुछ हुआ कि मरहूम मासूमों को याद करते करते गला भर आया बक का. बोला – ‘कभी किसी रसूखदार को टूटते पुल पर मरते हुए देखा है ? वे पुलों को न पैदल पार करते हैं, न टूटने से मरते हैं.’

बोला – ‘इस तरह पास दिए जाने से बेहतर है हाराकिरी कर ली जाए. यूँ भी सफलता के सौ बाप होते हैं,  विफलता अनाथ. सड़क समय पर बन जाए तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. सड़क बरसात में बह जाए तो यह अप्रत्याशित वर्षा का परिणाम है. महँगाई घटे तो नीति सफल है,  बढ़े तो अंतरराष्ट्रीय कारण हैं. परीक्षा अच्छे से हो जाए तो प्रशासन दक्ष है,  प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो कुछ शरारती तत्व सक्रिय थे. निज़ाम का फण्डा क्लियर है,  काम अच्छा हुआ तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. खराब हुआ तो यह मौसम के कारण हुआ. ईरान युद्ध के कारण हुआ. तकनीकी खामी के चलते हुआ. स्थानीय प्रशासन दोषी है. विपक्ष के समय भी हुआ. आला हाकिम का कोई कसूर नहीं.’

‘आपके आर्यावर्त की रियाया शांतिबाबू, एकदम उदारमना!! हर बार भरोसा कर लेती है बक कभी तो किसी विभाग में किसी की डेस्क पर जा कर ठहरेगा. उधर निज़ाम भी उतने ही मुतमइन हैं – अगली घटना घटने तक रियाया पिछली घटना भूल जाएगी. जब कोई नहीं मिलेगा तो नेहरू है ना! बक स्टॉप्स देयर.’ – उसने धीमे से कान में कहा –  ‘बौने कद के ओहदेदार और कामकाज की ऊँची मेज़ें,  तो कैसे लिखवाईएगा – ‘बक स्टॉप्स हियर’. फिर वह चला गया.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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