☆ लघुकथा ☆ ~ अंधकार ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
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बच्चे ने सूरज की किरणों को मुट्ठी में बाँध लिया। सूरज का असमंजस यह था कि उसे धरती पर नया सवेरा लाना था, जो कि उसकी किरणों के बिना संभव नहीं था। धरती लोक के लोगों की चाहत यह थी कि उन्हें हर एक ईश्वर प्रदत्त चीज को अपने बस में करना था, सो उन्होंने बच्चे को इस काम के लिए भेजा। इधर बच्चे की माँ दहाड़े मार कर इसलिए रो रही थी, क्योंकि घने अंधकार मे उसे अपना बच्चा ढूंढे नहीं मिल रहा था।
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “गिनती की साँसें…“.)
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४१ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
ब्रह्मकुण्ड से साँकल 09 नवम्बर 2019
पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के पहले देवताओं ने ब्रह्मकुंड पर तपस्या की थी दैवीय शक्तियों से दुर्गा देवी का प्रकट आविर्भाव हुआ था। दस किलोमीटर आगे भैंसा नामक गाँव है उसी के पास मुआर घाट पर देवी-भैंसासुर संग्राम हुआ था जहाँ देवी ने भैंसासुर का वध में किया था। ब्रह्मकुण्ड में देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा का वास रहा था।
ब्रह्मकुण्ड से चले एक घंटा हुआ था कि विंध्य पर्वत की भांडेर पर्वत श्रेणी के कगार से उत्तरी तट पर हीरापुर के नज़दीक हिरन नदी खरखराती आकर नर्मदा में समा गई। हिरन नदी जबलपुर जिले के कुंडम के निकट से निकलती है, दमोह जिले के तेंदुखेड़ा और सागर जिले के नौरादेही से कई नाले और बेलकुंड, सोहर और कैंर को समेटते परिअत नदी उसमें आ मिलती है। हिरन नदी जबलपुर जिले और नरसिंहपुर जिले की सीमा निर्धारित करती है।
सुबह आठ बजे साँकल के लिए रवाना हुए एक दिन पहले की थकाऊ यात्रा के बाद थोड़ा आराम से चलने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे चलना शुरू किया पहले बरगी से आती नहर के किनारे चलने लगे लेकिन एक राहगीर के सुझाव पर नर्मदा के तट पर उतर गए। रास्ता ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ सने खेतों से था, सामने से चमकते सूर्य की बढ़ती गर्मी मुश्किल बढ़ा रहीं थीं, शरीर पसीने से तरबतर माँसपेशियाँ लस्तपस्त हो चुकीं थीं, ऐसे में साँकल सराय जाने के लिए एक किलोमीटर की तंग पहाड़ी सामने आ गई। पाँच मिनट हाँफती साँस को थामा फिर चढ़ने लगे और आधा घंटे की चढ़ाई के बाद एक मकान पर धर्मशाला लिखा दिखा वहाँ पहुँचे तो पता चला कि रामप्रसाद साहू ने परकम्मा वासियों के लिए धर्मशाला बनाई है। एक कमरा खोला उसमें आमने सामने दो दरवाज़े थे और चारों कोनों में गेहूँ के बोरों की छल्ली लगी थी। अस्सी वर्षीय रामप्रसाद साहू से मुलाक़ात हुई उनके पोते-पोतियाँ आ गए। उन्होंने स्वागत करके भोजन इत्यादि के लिए आश्वस्त करके पोती को बुलाकर उनकी माँ को भोजन की व्यवस्था करने को कहा। थोड़ी देर बाद जनानख़ाना से ख़बर आई कि “मम्मी कल ग्यारस उपासी थीं, आज शनीचर उपासी हैं उनने कही है कि वे थकीं हैं न बना पाएँगी।” रामप्रसाद आँखों में पानी भरकर बोले बाबा हम परवश हैं आप सीधो लेकर बना लो। क़रीब दो घंटे बाद एक गोल लौंकी परांत में हँसिए के साथ डोलती आई, हमें हाथ आजमाते देख दादा की बहु पल्लू में मुस्कुराते हुए बोली, रहन दो बाबा हम बनाए दे रहे। चार बजे तीस रोटियों के साथ सब्ज़ी बनकर आ गईं। हरेक ने चार-चार रोटियाँ लौकी साग के साथ साफ़ कीं और दो-दो रोटियाँ बचाकर रखीं जिन्हें रात को आठ बजे दूध-गुड़ से खाईं। इस प्रकार लंच-डिनर दोनों सध गए, एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।
रात में रामप्रसाद साहू बोले “लोधी घमंडी हैं धर्मशाला के सामने हैंडपम्प नहीं लगने दे रहे, अपने खेतों के बीच में पड़ने वाली ज़मीन को किसी भी तरह धौंस धपट से ख़रीद कर एक चक बना लेते हैं। नरसिंहपुर जिले की अस्सी प्रतिशत ज़मीन उनके स्वामित्व में है।” लोधियों का थोड़ा परिचय लेते चलें। लोधी (लोधाया लोध) भारत में पायी जाने वाली एक किसान जाति है। ये मध्यप्रदेश में बहुतायत में पाये जाते हैं, मुस्लिम आक्रमण और प्रताड़ना से तंग आकर पहले विस्थापित होकर पश्चिमोत्तर सीमा से उत्तर भारत, फिर नर्मदा घाटी में आ बसे है। नरसिंहपुर जिले में लोधी हैं परंतु होशंगाबाद जिले में वे नदारत हैं, वहाँ रघुवंशी, गूज़र अधिक हैं। लोधी ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ की एक जाति है, परंतु इस जाति के लोग राजपूतो से संबधित होने का दावा करते हुए ‘लोधी-राजपूत’ कहलाना पसंद करते हैं। जबकि, इनके राजपूत मूल से उद्धृत होने का कोई साक्ष्य नहीं है और न ही इन लोगो में राजपूत परंपराए प्रचलित है। हमने आठ-दस किसानों से पूछा राजपूतों की उत्पत्ति सूर्य से, जैसे राम का इक्ष्वाकु वंश सूर्यकुल से उत्पन्न हुई या कृष्ण का यादव वंश चंद्रकुल से आया है, उनकी सिलसिलेवार वंशावली मिलती है। लोधियों की उत्पत्ति सूर्य या चंद्र, किससे हुई है। उन्होंने बताया कि लोधी ठाकुर हैं, बस इतना जानते हैं। असल में, वे पिछड़ा वर्ग का लाभ लेते हैं इसलिए खुलकर नहीं बोलते। ब्रिटिश शासन के एक प्रशासक, रोबर्ट वेन रुसेल ने लोधी शब्द के कई संभव शाब्दिक अर्थों का जिक्र किया है, उदहरणार्थ लोध वृक्ष के पत्तों से रंगो का निर्माण करने का कार्य करने के कारण ये लोग लोधी कहलाए। रुसेल ने यह भी कहा है कि ‘लोधा’ मूल शब्द है जो कि बाद में मध्य प्रदेश में ‘लोधी’ में रूपांतरित हो गया। एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार, लोधी अपने निवास अफ़ग़ानिस्तान से पंजाब के लुधियाना में आकर बसे फिर मुस्लिम आक्रमणों से परेशान होकर गंगा-यमुना के दोआब गए वहाँ वे लुधियाना के नाम से लोधी कहलाए। ब्रिटिश स्रोतो में लोधियों को उत्तर भारत से विस्थापित होना बताया गया है,जहाँ से यह लोग मध्य भारत में आ बसे। ऐसा करने में उनके सामाजिक स्तर का उत्थान हुआ, और यह लोग ब्राह्मण, बनिया व राजपूत आदि से नीचे के स्थानीय शासक तथा जमीदार बने। इनमे से कुछ बड़े जमींदार ‘ठाकुर’ की पदवी पाने में सक्षम रहे, तथा दमोह व सागर जिलो में कुछ लोधी परिवारो को पन्ना के शासक द्वारा राजा, दीवान व लंबरदार करार दिया गया। इस तरह शक्तिशाली बने लोधियों ने बुंदेला उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1857 कि क्रांति मे, लोधी भारत के विभिन्न भागो में अंग्रेज़ो के खिलाफ लड़े। हिंडोरिया रिसायत के लोधी तालुकदार जिले के मुख्य कार्यालय की तरफ कूच करने व खजाने को लूटने में शामिल थे, जबकि शरपुरा के लोधियों ने स्थानीय पुलिस को खदेड़ दिया व उन्होने घुघरी गाँव को भी लूटा। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में हीरापुर का प्राचीन राजघराना है। इसको पहले हीरागढ़ के नाम से जाना जाता था। इस वंश के पूर्वत राजा जगन्नाथ सिंह महदी माता के उपासक थे। इसीलियें ये महदेल लोधी कहलाये। हिन्डोरिया (दमोह) में लोधी वंशजों की एक प्राचीन गढ़ी है, जिसमें लोधी राजवंश के उत्तराधिकारी निवास करते हैं। इलाक़े में आज़ भी उनका मान सम्मान क़ायम है। नरसिंहपुर जिले में लोधी परिवार बहुतायत में हैं। कृषि से प्राप्त आय का बड़ाभाग कोर्ट-कचहरी वकीलों को हर साल देते आ रहे हैं।
शाम को कम्युनिस्ट विचारधारा पर प्रयास जोशी से बातचीत चल निकली, काल मार्क्स के साम्यवादी विचार से बोल्शेविक क्रांति में ज़ारशाही के अंत से बात ईसाइयत से होती हुई यहूदी और इस्लाम के मूल सिद्धांतों पर आ गई। प्रयास सहित सभी लोग बड़े तल्लीन होकर सुन रहे थे। उसी दिन बाबरी मस्जिद का निर्णय आया था अरुण भाई ने बातचीत सख़्ती से बात बंद करवा दी, उन्हें डर लगा कि कहीं कोई विडियो बनाकर दंगे न भड़का दे। जबकि ऐसी किसी सम्भावना का दूर तक अतापता नहीं था, न तो कोई विडियो बना रहा था और न ही वहाँ मुस्लिम कम्यूनिटी थी। उसके विपरीत टेलीविजन पर और अख़बारों में निर्णय की चीरफाड़ में अधिक ख़तरनाक बहसें हो रहीं थीं, लेकिन डर का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। तभी चंगेज़ खान के पोते उलूग ख़ान की पच्चीस हज़ार फ़ौज ने डरे हुए बग़दाद के ख़लीफ़ा व उसकी दो लाख अजेय फ़ौज को हरा ख़लीफ़ा को बोरे में बाँधकर पटक-पटक कर मारा था क्योंकि ख़लीफ़ा का ख़ून ज़मीन पर गिरता तो क़यामत बरपा हो जाती, डर है ही ऐसी चीज़, जीतने और हारने वाले दोनों डरे रहते हैं। असल बिंदु पर बात आने वाली थी कि कम्युनिस्ट और मुस्लिम किसी देश को अपना नहीं मानते क्योंकि पूरी दुनिया में कम्यूनिज्म और इस्लाम फैलाना उनका धर्म है इसलिए उनकी ईमानदारी रूस-चीन और मक्का से जुड़ी रहती है, कम्युनिस्ट धर्म को अफ़ीम मानते हैं लेकिन इस्लाम की कट्टर सोच के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं बोलते, दोनों लोकतंत्र पसंद नहीं करते एक सीरिया सी इस्लामिक स्टेट की तानाशाही तो दूसरा रुस सी सर्वहारा-वर्ग की तानाशाही की वकालत करते हैं, परंतु अरुण भाई ने बुरी तरह डाँट कर बात बंद करा दी। सब चुप हो गए, लम्बी चुप्पी के बाद बात के विषय को बदल दिया।
रात को रामप्रसाद साहू के परिवार के साथ वाल्मीकि रामायण, तुलसी कृत रामचरितमानस पर आधुनिक संदर्भ पर चर्चा हुई जिसमें बच्चों को शास्त्रों के शाश्वत मूल्य और सामयिक मूल्य का अंतर समझाया कि क़ुरान या बाइबिल के मानने वालों की तरह हिंदु 1500-2500 सालों पहले के सामाजिक मूल्यों से नहीं चिपके रहते, वे समाज की प्रगतिशीलता से तालमेल बिठाकर नई मानसिकता से नई सामाजिक व्यवस्था गढ़ना जानते हैं।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !! सावन अब जल बरसाओ !!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ११ ☆
☆ !! सावन अब जल बरसाओ !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – सुभाष चंद्र बोस…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २७५ ☆
☆ सुभाष चंद्र बोस… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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तेइस जनवरी जन्म दिवस है उस भारत के लाल का
जिसका प्रेरक जीवन मन में पावन याद उभारता ।।
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इस दिन ने ही भारत मां को दिया सपूत सुभाष था
जिस पर भारत जनमानस का अडिग अमर विश्वास था।।
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जिन के गौरव से गौरान्वित भारत का इतिहास है
उन महानपुरुषों में से एक अनुपम वीर सुभाष है।।
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एक चरित्र अनोखा ऐसा जिसके प्रखर प्रकाश में
सभी दूसरे तारे धूमिल दिखते हैं आकाश में।।
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जिसे गृहस्थी, सुख-सपना सब दिखता था जंजाल सा।।
पा ऊंची शिक्षा भी जिसने रखी न वैभव लालसा ।।
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उपन्यास सी जिसकी जीवन गाथा कई आयाम की
जिसने कभी न की आकांक्षा कहीं किसी आराम की।।
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दृष्टि रही पाने स्वदेश की आजादी का रास्ता
लक्ष्य एक ही रहा, रखा न अधिक और से वास्ता।।
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दल के भीतर भी विरोध का गरल पान कर शांति से
होकर दूर भ्रांति से, जिसने जोड़ा नाता क्रांति से।।
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख हॉउ से हू तक। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – मोहे भावें ना दुनिया के रंग / स्वर- विकास यशकीर्ति, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३० ☆
☆ हॉउ से हू तक… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘दौलत भी क्या चीज़ है, जब आती है तो इंसान खुद को भूल जाता है, जब जाती है तो ज़माना उसे भूल जाता है।’ धन-दौलत, पैसा व पद-प्रतिष्ठा का नशा अक्सर सिर चढ़कर बोलता है, क्योंकि इन्हें प्राप्त करने के पश्चात् इंसान अपनी सुधबुध खो बैठता है … स्वयं को भूल जाता है। तात्पर्य यह है कि धन-सम्पदा पाने के पश्चात् इंसान अहं के नशे में चूर रहता है और उसे अपने अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। उस स्थिति में उसे कोई भी अपना नज़र नहीं आता…सब पराए अथवा दुश्मन नज़र आते हैं। वह दौलत के नशे के साथ-साथ शराब व ड्रग्स का आदी हो जाता है। सो! उसे समय, स्थान व परिस्थिति का लेशमात्र भी ध्यान तक नहीं रहता और संबंध व सरोकारों का उसके जीवन में अस्तित्व अथवा महत्व नहीं रहता। इस स्थिति में वह अहंनिष्ठ मानव अपनों अर्थात् परिवार व बच्चों से दूर…बहुत…दूर चला जाता है और वह अपने सम्मुख किसी के अस्तित्व को नहीं स्वीकारता। वह मर्यादा की सभी सीमाओं को लाँघ जाता है और रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पाँव रख कर आगे बढ़ता चला जाता है और उसकी यह दौड़ उसे कहीं भी रुकने नहीं देती।
धन-दौलत का आकर्षण न तो कभी धूमिल पड़ता है; न ही कभी समाप्त होता है। वह तो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ता चला जाता है। यह प्रसिद्ध कहावत है…’पैसा ही पैसे को खींचता है।’ दूसरे शब्दों में इंसान की पैसे की हवस कभी समाप्त नहीं होती…सो! उसे उचित-अनुचित में भेद नज़र आने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। धन कमाने का नशा उस पर इस क़दर हावी होता है कि वह राह में आने वाले आगंतुकों-विरोधियों को कीड़े-मकोड़ों की भांति रौंदता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है। इस मन:स्थिति में वह पाप-पुण्य के भेद को नकार; अपनी सोच व निर्णय को सदैव उचित ठहराता है।
इस दुनिया के लोग भी धनवान अथवा दौलतमंद इंसान को सलाम करते हैं अर्थात् करने को बाध्य होते हैं… और यह उनकी नियति होती है। परंतु दौलत के खो जाने के पश्चात् ज़माना उसे भूल जाता है, क्योंकि यह तो ज़माने का चलन है। परंतु इंसान माया के भ्रम में सांसारिक आकर्षणों व दुनिया-वी चकाचौंध में इस क़दर खो जाता है कि उसे अपने आत्मज भी अपने नज़र नहीं आते; दुश्मन प्रतीत होते हैं। एक लंबे अंतराल के पश्चात् जब वह उन अपनों के बीच लौट जाना चाहता है, तो वे भी उसे नकार देते हैं। अब उनके पास उस अहंनिष्ठ इंसान के लिए समय का अभाव होता है। यह सृष्टि का नियम है कि जैसा आप इस संसार में करते हैं, वही लौटकर आपके पास आता है। यह तो हुई आत्मजों अर्थात् अपने बच्चों की बात, जिन्हें अच्छी परवरिश व सुख- सुविधाएं प्रदान करने के लिए वह दिन-रात परिश्रम करता रहा; ठीक-ग़लत काम करता रहा…परंतु उन्हें समय व स्नेह नहीं दे पाया, जिसकी उन्हें दरक़ार थी; जो उनकी प्राथमिक आवश्यकता थी।
‘फिर ग़ैरों से क्या शिक़वा कीजिए… दौलत के समाप्त होते ही अपने ही नहीं, ज़माने अर्थात् दुनिया भर के लोग भी उसे भुला देते हैं, क्योंकि वे संबंध स्वार्थ के थे; स्नेह सौहार्द के नहीं।’ मैं तो संबंधों को रिवाल्विंग चेयर की भांति मानती हूं। आपने मुंह दूसरी ओर घुमाया; अवसरवादी बाशिंदों के तेवर भी बदल गए, क्योंकि आजकल संबंध सत्ता व धन-संपदा से जुड़े होते हैं… सब कुर्सी को सलाम करते हैं। जब तक आप उस पर आसीन हैं, सब ठीक चलता है; आपको झूठा मान-सम्मान मिलता है, क्योंकि लोग आपसे हर उचित-अनुचित कार्य की अपेक्षा रखते हैं। वैसे भी समय पर तो गधे को भी बाप बनाना पड़ता है… सो! इंसान की तो बात ही अलग है।
लक्ष्मी का तो स्वभाव ही चंचल है, वह एक स्थान पर ठहरती ही कहाँ है। जब तक वह मानव के पास रहती है, सब उससे पूछते हैं ‘हॉउ आर यू’ और लक्ष्मी के स्थान परिवर्तन करने के पश्चात् लोग कहते हैं ‘हू आर यू।’ इस प्रकार लोगों के तेवर पल-भर में बदल जाते हैं। ‘हॉउ’ में स्वीकार्यता है—अस्तित्व-बोध की और आपकी सलामती का भाव है, जो यह दर्शाता है कि वे लोग आपकी चिंता करते हैं…विवशता-पूर्वक या मन की गहराइयों से… यह और बात है। परंतु ‘हॉउ’ को ‘हू’ में बदलने में पल-भर का समय भी नहीं लगता। ‘हू’ अस्वीकार्यता बोध…आपके अस्तित्व से बे-खबर अर्थात् ‘कौन हैं आप?’ ‘कैसे से कौन’ प्रतीक है स्वार्थपरता का; आपके प्रति निरपेक्षता के भाव का; अस्तित्वहीनता का तथा यह प्रतीक है मानव के संकीर्ण भाव का, क्योंकि उगते सूर्य को सब सलाम करते हैं और डूबते सूर्य को निहारना भी लोग अपशकुन मानते हैं। आजकल तो वे बिना काम अर्थात् स्वार्थ के ‘नमस्ते’अथवा ‘दुआ सलाम’ भी नहीं करते।
इस स्थिति में चिन्ता तथा तनाव का होना अवश्यंभावी है। वह मानव को अवसाद की स्थिति में धकेल देता है; जिससे मानव लाख चाहने पर भी उबर नहीं पाता। वह अतीत की स्मृतियों में अवगाहन कर संतोष का अनुभव करता है। उसके सम्मुख प्रायश्चित करने के अतिरिक्त दूसरा विकल्प होता ही नहीं। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है, तो दु:ख उसके धैर्य की…दोनों स्थितियों अथवा परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले व्यक्ति का जीवन सफल कहलाता है। यह भी अकाट्य सत्य है कि सुख में व्यक्ति फूला नहीं समाता; उस के कदम धरा पर नहीं पड़ते…वह अहंवादी हो जाता है और दु:ख के समय वह हैरान-परेशान होकर अपना धैर्य खो बैठता है। वह अपनी नाकामी अथवा असफलता का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ता है। इस उधेड़बुन में वह सोच नहीं पाता कि यह संसार दु:खालय है और सुख बिजली की कौंध की मानिंद जीवन में दस्तक देता है…परंतु बावरा मन उसे स्थायी समझ कर अपनी बपौती स्वीकार बैठता है और उसके जाने के पश्चात् वह शोकाकुल हो जाता है।
सुख-दु:ख का चोली दामन का साथ है। एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा आता है। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारों का रहना असंभव है; उसी प्रकार दोनों का एक छत्र-छाया में रहना भी असंभव है। परंतु सुख-दु:ख को साक्षी भाव से देखना अथवा सम रहना आवश्यक है। दोनों अतिथि हैं–जो आया है, उसका लौटना भी निश्चित है। इसलिए न किसी के आने की खुशी, न किसी के जाने का ग़म-शोक मनाना चाहिए। हर स्थिति में सम रहने का भाव सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम है। इसलिए सुख में अहं को शत्रु समझना आवश्यक है और दु:ख में अथवा दूसरे कार्य में धैर्य का दामन छोड़ना स्वयं को मुसीबत में डालने के समान है। जीवन में कभी भी किसी को छोटा समझ कर किसी की उपेक्षा मत कीजिए, क्योंकि आवश्यकता के समय पर हर व्यक्ति व वस्तु का अपना महत्व होता है। सूई का काम तलवार नहीं कर सकती। मिट्टी, जिसे आप पाँव तले रौंदते हैं; उसका एक कण भी आँख में पड़ने पर इंसान की जान पर बन आती है। सो! जीवन में किसी तुच्छ वस्तु व व्यक्ति की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए… उसे स्वयं से अर्थात् उसकी प्रतिभा को ग़लती से भी कम नहीं आँकना चाहिए।
पैसे से सुख-सुविधाएं तो खरीदी जा सकती हैं, परंतु मानसिक शांति नहीं। इसलिए दौलत का अभिमान कभी मत कीजिए। पैसा तो हाथ का मैल है; एक स्थान पर कभी नहीं ठहरता। परमात्मा की कृपा से पलक-झपकते ही रंक राजा बन सकता है; पंगु पर्वत लाँघ सकता है और अंधा देखने लग जाता है। इस जन्म में इंसान को जो कुछ भी मिलता है; उसके पूर्वजन्म के कर्मों का फल होता है…फिर अहं कैसा? गरीब व्यक्ति अपने कृतकर्मों का फल भोगता है…फिर उसकी उपेक्षा व अपमान क्यों? इसलिए मानव को हर स्थिति में सामंजस्य बनाए रखना चाहिए…यही सफलता का मूल है। समन्वय, सामंजस्यता का जनक है, उपादान है; जो जीवन में समरसता लाता है। यह कैवल्य अर्थात् अलौकिक आनंद की स्थिति है, जिसमें ‘हॉउ आर यू’ और ‘हू आर यू’ का वैषम्य भाव समाप्त हो जाता है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – सब रूपों में पूजित नारी..।
रचना संसार # १०३
☆ गीत – सब रूपों में पूजित नारी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चुनावी मेंढक।)
☆ चुभते तीर # ११३ – व्यंग्य – चुनावी मेंढक ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
मानसून की पहली फुहार अभी धरती को स्पर्श भी नहीं कर पाई थी कि मोहल्ले की राजनीति के गंदे नालों में हलचल तेज हो गई, और ‘लोकतंत्र के रक्षक’ कहे जाने वाले सफेदपोश जीव अपनी बिलों से बाहर निकलकर टर्राने लगे। हमारे मोहल्ले के स्वयंभू नेता, जिनके कुर्ता-पायजामा की सफेदी दूध को भी लज्जित कर दे, अचानक घर-घर जाकर इस तरह दंडवत होने लगे जैसे हर दहलीज पर साक्षात ईश्वर का वास हो। उनकी मुस्कुराहट में वह बनावटीपन था जो केवल एक्सपायरी डेट वाली मिठाई के डिब्बों पर पाया जाता है, और उनकी बातों में विकास का ऐसा शहद टपक रहा था जिसे चाटने के चक्कर में भोली जनता अपनी पुरानी कड़वाहटें भूलने को तैयार बैठी थी। गलियों में बिछी हुई धूल अब किसी चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुकी थी, जहाँ हर उड़ता हुआ कण किसी न किसी वायदे की गवाही दे रहा था। चमचों की टोली हाथ में झंडे थामे इस तरह अनुशासित दिख रही थी मानो वे कल ही ओलंपिक से स्वर्ण पदक जीतकर लौटे हों, जबकि असलियत में उनकी दौड़ केवल मुफ्त की शराब और बिरयानी के पैकेटों तक ही सीमित थी।
इस तमाशे के दूसरे अंक में, जब प्रचार का शोर अपने चरम पर पहुँचा, तो मोहल्ले की टूटी हुई सड़कें रातों-रात कागजों पर मखमली कालीन की तरह बिछ गईं और बंद पड़े नलों से गंगाजल बहने के दावे किए जाने लगे। नेताजी ने एक ऐसी जनसभा को संबोधित किया जहाँ उन्होंने अपनी छाती ठोककर घोषणा की कि यदि वे जीत गए, तो मोहल्ले का हर बच्चा सीधे अंतरिक्ष की सैर करेगा और बुजुर्गों के लिए ‘अमरत्व योजना’ लागू की जाएगी। श्रोताओं में बैठे कुछ बुद्धिजीवी अपनी अक्ल पर पत्थर पड़े होने का प्रमाण देते हुए तालियाँ बजा रहे थे, जबकि मोहल्ले का वह कुत्ता, जो पिछले पांच चुनावों से इसी तरह के भाषण सुन रहा था, अपनी पूँछ दबाकर एक कोने में चुपचाप बैठा व्यवस्था के पतन पर विचार कर रहा था। फाइलों में दर्ज आँकड़े इस कदर नाच रहे थे कि सांख्यिकी विभाग के विशेषज्ञ भी अपना सिर पीट लेते, पर यहाँ तो भावनाओं का व्यापार चल रहा था जहाँ तर्क की कोई गुंजाइश नहीं थी। हर दीवार पर चिपके हुए पोस्टर नेताजी के चेहरे को इतना मासूम दिखा रहे थे कि स्वयं यमराज भी उन्हें देखकर एक बार तो चकमा खा जाते और अपना रास्ता बदल लेते।
मतदान की पूर्व संध्या पर नेताजी ने एक गुप्त अनुष्ठान का आयोजन किया ताकि जीत सुनिश्चित हो सके, और जैसे ही उन्होंने अंतिम आहुति दी, पूरा मोहल्ला एक अजीब सी रोशनी से भर गया। सुबह जब मतदाता पोलिंग बूथ पर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि ईवीएम मशीन के पास कोई अधिकारी नहीं, बल्कि वही नेताजी एक विशालकाय मेंढक के रूप में बैठे हैं जिनकी आँखें किसी सीसीटीवी कैमरे की तरह घूम रही थीं। लोग जैसे ही बटन दबाते, मशीन से ‘बीप’ की जगह ‘टर्र-टर्र’ की आवाज आती और वोटर की उंगली पर स्याही की जगह एक चिपचिपा हरा पदार्थ लग जाता जो गायब होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अचानक वह विशालकाय मेंढक अपनी लंबी जीभ बाहर निकालता और मतदान करने आए व्यक्ति की जेब से उसकी सारी मेहनत की कमाई एक झटके में खींचकर निगल जाता। दहशत तब और बढ़ गई जब वह मेंढक अचानक इंसानी आवाज में ठहाका लगाकर बोला कि ‘वोट तुम्हारा है, पर नोट और पेट मेरा है’ और देखते ही देखते वह पूरी पोलिंग स्टेशन की इमारत को ही निगल गया। अंत में वहाँ केवल एक खाली मैदान बचा था जहाँ हवा में नेताजी के सफेद कुर्ते के चिथड़े उड़ रहे थे और जनता अपनी उंगलियों पर लगे उस कभी न छूटने वाले हरे दाग को देखकर हतप्रभ खड़ी थी।
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – माता पिता ।)