मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२५ ☆ शेतकऱ्यांचे प्रश्न… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२५ ?

☆ शेतकऱ्यांचे प्रश्न… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

वावरात या इतके कांदे पिकले होते

जागोजागी त्यांचे डोंगर रचले होते

*

उठाव नाही या कांद्याला काय करावे

कवडीच्या भावातच सारे विकले होते

*

भाग भांडवल सुद्धा वसूल झाले नाही

कास्तकार तर सारे येथे खचले होते

*

डोळ्यांचा हा पहा कालवा झाला त्याच्या

काळजात त्या सारे पाणी मुरले होते

*

अंधाराशी रोज लढाई करता करता

कोसळणारे तारे दिवसा दिसले होते

*

सटवाईने कायम केली त्याची थट्टा

त्याचमुळे का नशीब त्याचे रुसले होते

*

लग्न ठरेना म्हणून त्याने फास घेतला

शेतकऱ्यांचे प्रश्न कधी का सुटले होते

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८२ – संकल्पित रहो…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८२ – संकल्पित रहो – १ ✍

लूट, हत्या, बलात्कार

आज/समाज

बेशर्मी की चादर ओढ़कर सो गया है

इसीलिये भ्रष्टाचार/ राष्ट्रीय धर्म हो गया है।

ईमान को दकियानूसी

और अहिंसा को कहा जा रहा है

कायरता का पर्याय

हाय!

क्या हो गया है मुझे और मेरे देश को

कौन तोड़ेगा जड़ता के परिवेश को?

शायद

झंकृत हो रहे हैं कृष्ण चेतना के तार

खुल रहे हैं किरनों के द्वार

कोई कहता है

कैसे हुआ होगा/ सृष्टि का जन्म और विस्तार

और हर बार कैसे होता है संहार!

है

अन्तः करण होता है मुखर

निकलते हैं स्वर

जब सम्बन्धों की सुगंध चुक जाती है।

जीवन की प्रगति रुक जाती है

और आरंभ होता है/ महाप्रलय महाविनाश

काश ! हम सोचते

कि हम अमृतपुत्र हैं

हमारी जिन्दगी वरदान है बाजार नहीं

और हम

मनुष्य हैं चीज नहीं

मगर हमें इतना भी तमीज नहीं

हम भूलते हैं भ्रमते हैं

और बाट जोहते हैं।

किसी अवतार की

गौतम, महावीर शंकराचार्य

या गाँधी की

 

या किसी चमत्कारिक आँधी की ।

दोस्तो!

चमत्कार एक भ्रम है

अट्टू अथक श्रम ही

परिवर्तन का उद्गम है।

संकल्पित रहो

आतंक का अंगुलिमाल

शरण में आयेगा

मन की दृढ़ता से

पूरा पर्यावरण शुद्ध हो जायेगा।

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८१ “माँ तो माँ है, नहीं…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत माँ तो माँ है, नहीं...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “माँ तो माँ है, नहीं...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

सिकुडी, सिमटी पडी हुई

खटिया पर बूढ़ी माँ ।

जैसे फँसी हुई लकड़ी

में कोई चूड़ी, माँ ॥

 

फिर भी दिया करे

आशीषें सभी सदस्यों को ।

हाथ जोड़ कर रचती है

करुणा के दृश्यों को ।

 

और निरंतर किडनी की

बीमारी के कारण –

सूज गई है देह, लगे

ज्यों फूली पूड़ी, माँ ॥

 

इतनी बीमारी फिर भी

कुछ करने की चाहत ।

उसकी आँखों में दिखती

न मिल पाती राहत –

 

लेटे-लेटे चिल्लाती –

लाओ मैं कर देती

नहीं हो चुकी हूँ अब

इतनी भी मैं बूढ़ी,माँ ।

 

माँ तो माँ है, नहीं

समझते हैं तीनों बेटे ।

लगी हुई माँ किस

उधेड़ बुन में लेटे – लेटे

 

बहुओं को यों तो वह

चौकीदार सरीखी है ।

लेकिन काम बताये तो

लगती है जूड़ी*  माँ ॥

जूड़ी = बुखार का एक प्रकार

 

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

06-04-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६२ ☆ # “जिंदगी दुश्वार हो गई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता जिंदगी दुश्वार हो गई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६२ ☆

☆ # “जिंदगी दुश्वार हो गई है…” # ☆

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

झूठ ही झूठ है यहां

सच की तो हार हो गई है

 

जो सपने दिखाए जाते हैं

वह हमको बहुत भाते हैं

वह कभी पूरे नहीं हो पाते हैं

उम्मीदें ना उम्मीदों में बदल

पेचदार हो गई हैं

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

 

सूनी आंखें आसमान में तकती है

ऊपर वाले से कितनी आशाएं रखती है

चोट खाकर भी नहीं थकती है

यह परंपरा अब हर बार हो गई है

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

 

आम आदमी अब करें तो क्या करें

किसका भरोसा या एतबार करें

कब तक अच्छे दिनों का इंतजार करें

टूटती आकांक्षाएं, चाहत की भरमार हो गई है

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

 

जनमानस का सब्र छूटता जा रहा है

हर पल हर घड़ी वो लुटता जा रहा है

कशमकश में उसका दम घुटता जा रहा है

विद्रोह की छुरी अब धारदार हो गई है

जिंदगी कितनी दुश्वार हो गई है

झूठ ही झूठ है यहां

सच की तो हार हो गई है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०५ – यादें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता यादें।)

☆ अभिव्यक्ति # १०५ ☆ यादें☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

यादें मिटती नहीं,

यादें रुकती नहीं,

जिंदगी के साथ साथ,

चलती हैं याद,

यादें जिंदगी नहीं,

यादें बंदगी नहीं,

वक्त के साथ साथ,

ढलती हैं याद,

यादें बदली नहीं,

यादें धुंधली नहीं,

बढ़ती उम्र के साथ,

उभरी हैं याद,

अपनी हैं,क्या यादें,

झलक हैं ये यादें,

गुजरा है जो कल,

सिसकी में याद,

हंसाती हैं यादें,

रुलाती हैं  यादें,

इनमें क्या है बात,

आती है क्यों याद.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ४ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ४. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

एमिली शेंकल

समिधाच सख्या या!! …

सन १९४५, ऑगस्ट महिना, संध्याकाळ ची वेळ! ती स्वयंपाकघरात नेहमीसारखी कामात… आणि अचानक रेडिओ वर ऐकायला येते… ‘ सुभाषचंद्र बोस यांचा विमान अपघातात मृत्यू! ‘

 ती हळूच उठते, बेडरूममध्ये जाते, जिथे तिची जेमतेम ३ वर्षे वयाची मुलगी झोपलेली असते. बिछान्याजवळ गुढगे टेकून बसते आणि आयुष्यात पहिल्यांदाच मनाने कोसळते… अश्रूंचा बांध फुटतो, मनसोक्त रडते. जिच्या दृढतेसाठी, साहसी स्वभावासाठी तिचा पती बाघिन म्हणत असतो… ती रडत होती, शक्तीच संपल्या सारखी!!

 ती होती… एमिली शेंकलकॉंग्रेस योद्धा म्हणून ओळखल्या जाणाऱ्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस यांची पत्नी!!

 एमिली च्या डोळ्यांपुढून सगळा जीवनपट सरकू लागला. आठवला तिला तो दिवस… सुभाषबाबूंच्या परिचयाचा!

सविनय कायदेभंगाच्या चळवळीमुळे तुरूंगात गेलेल्या सुभाष बाबूंची तब्येत ढासळू लागली, ब्रिटिश सरकारने उपचारासाठी त्यांना व्हिएन्ना मध्ये ठेवले. हॉस्पिटलमध्ये सुद्धा देशाचाच विचार करणा-या सुभाष बाबूंनी, भारतीय युवकांना स्वातंत्र्य लढ्यासाठी एकत्रित करण्याचं ठरवलं. द इंडियन स्ट्रगल या नावाने पुस्तक लिहायला घेतलं. त्यासाठी टाइपिस्ट ची गरज भासली. आणि मुलाखतीत निवड होऊन एमिली शेंकल चा सुभाषबाबूंच्या आयुष्यात प्रवेश झाला. हळूहळू रोजच्या भेटीतून… सौम्य स्वभाव, हसतमुख, स्पष्टवक्ती, निस्वार्थी, कामाला वाघ… अशा एमिली कडे सुभाषबाबू आकर्षित झाले. देशप्रेम अग्रस्थानी असलेल्या मनात… एका उदात्त अशा प्रेमाने अलगद प्रवेश केला. आजपर्यंत घरच्यांना लग्नासाठी नेहमीच नकार देणारे दोघेही… नकळतपणे गुंतले.

२६ डिसेंबर १९३७ या दिवशी… एमिली च्या वाढदिवशी… दोघांनी अखेर गुप्त विवाह केला. आणि शेवटपर्यंत तो गुप्तच ठेवला. कारण सुभाष बाबूंसाठी देश सर्वोपरि होता. हे एमिली पूर्णपणे जाणून होती. म्हणूनच उदात्त हेतू आणि एक शोकांतिका असलेलं नातं तिने जोडलं. उदात्त हेतू ला उदात्त अशी साथ देऊन त्यांची खरी हमराज बनली. तिनं सुभाष बाबूंच्या संघर्षाला समजून घेतलं. त्या नात्यात एमिली ने अदम्य साहस, सर्वोच्च गरिमा आणि उच्च त्यागाची भावना… हे गुण पेरले, रूजवले.

लग्नबंधनात बांधल्या नंतरही तिने सुभाषचंद्र ना मात्र आपल्या प्रेमात बांधून न ठेवता… आजाद ठेवलं.

सुभाषचंद्र जरी एक सैनिक, एक योद्धा, एक कूटनीतिचा महारथी होते तरीही… या सगळ्याच्या आंत/आड आणखी एक सुभाष आहे… हे एमिली ने ओळखलं होतं. आणि फक्त त्या मौन स्नेहातलं एक आगळं-वेगळं प्रेम, ते जपणं तिनं ओळखलं. त्यामुळे च तर… १२ वर्षांच्या लग्नाच्या आयुष्यात फक्त ३ वर्षे सहवास लाभला तरीही एमिली ने हे… दुराव्यातलं दृढ नातं ही जपलं! कधीच दुरावू दिलं नाही. सुभाषबाबू आणि तिच्यातलं हे अनोखे, गुप्ततेतले पती-पत्नीचं नातं, हे स्नेहबंध… ख-या अर्थाने बद्ध झाले ते… सुभाषबाबूंनी विविध ठिकाणाहून एमिली ला पाठवलेल्या पत्रांमध्ये! ही पत्रे त्यांच्या मर्मबंधातली ठेव बनली.

पण ही पत्रे… प्रेम पत्रे होती कां? की दोन जीवांचं तादात्म्य पावणं? एकमेकांसाठी संबल… सहयोगी, आधार, ख-या अर्थाने, सहचर बनंत, दूर राहूनही एकमेकांना भेटणं, जपंत रहाणं होतं ते! नात्यातील संबोधने सुद्धा बघा… ते फ्राऊलिन शेंकल ने सुरूवात करीत, आणि तिच्या पत्राची सुरूवात असे.. श्री बोस!!

 त्यांनी एकमेकांना लिहिलेल्या पत्रात… राजनीती, विविध पुस्तके संगीत, विनोद, आध्यात्मिकता, आणि एकमेकांच्या नाजूक तब्येतीची चौकशी… हा असे… पत्रातल्या मायन्याचा आयना!!!

सुभाष बाबूंनी एकदा आपल्या मनातलं प्रेम व्यक्त करणा-या… गोएथे या कवीच्या, कालिदासाच्या शाकुंतल मधल्या अनुवादित ओळी शोधायला सांगून… अप्रत्यक्षरित्या भावना प्रकट केल्या. त्या ओळी अशा…

क्या तुम युवा वर्ष के फूलों और उसके पतन के फूलोंको पसंद करोगे?

और वह सब जिससे आत्मा आनंदित हो, तृप्त हो…

 क्या तुम स्वर्ग और पृथ्वी को एक ही नाम से मिला दोगे?

 हे, शकुंतले, मैं तुम्हारा नाम लेता हूं!

बस्स्… हीच ती मनतळातली जाणीव… जिच्या बोधावर एमिली ने नंतरंचं संपूर्ण आयुष्य एक… समर्पित पत्नी, एक आदर्श माता, वृद्ध आईची काठी, लेक अनिता ची सखी, बनून स्वाभिमानाने, स्वबळावर व्यतित केलं.

एमिली ने आपल्या लेकीला… एक अतिशय बुद्धीमान आणि शैक्षणिक रूची असलेली स्त्री बनवलं. एक अर्थशास्त्रज्ञ बनली तिची लेक. विश्वविद्यालयात प्रोफेसर झाली. प्रोफेसर मार्टीन फाफ यांच्या शी विवाह बद्ध झाली.

एमिली… एक आदर्श पत्नी च नाही, तर एक आदर्श माता ही सिद्ध झाली. तिने आपल्या लेकीत… पित्याच्या नावाने मोठी न होता, स्व प्रयत्नाने आपलं आयुष्य उभं करण्याचे, आणि स्व कर्तृत्वाने मोठं होण्याचे, जगाला काहीतरी सकारात्मक देण्याचे संस्कार रूजवले!!!

अशी ही एमिली… जी एका महानायका च्या पाठीशी खंबीरपणे उभी राहिली, त्याच्या नंतर ही तितक्याच खंबीरपणे, स्वाभिमानाने, पतीच्या परिवाराकडून भारतात येण्याचा आग्रह नाकारून, एका छोट्या टेलिग्राफ ऑफिस मध्ये, कमी पगारावर नोकरी करून, वृद्ध मातेचा सांभाळ करंत, लेकीला सत्याचा सामना करणारी लढवय्यी बनवंत… शेवटच्या श्वासापर्यंत आपल्या मनातल्या नायका ची आणि जनातल्या महानायका ची मूक नायिका बनून जगली.

या मौन, मूक संवेदनेला, देश प्रेमासाठी राखरांगोळी करणा-या त्या त्यागकुंडातील राखेच्या कणातला एक भाग बनणारी ही… समिधा च ना?

– लेख क्र. ४.

© प्रा.भारती जोगी

पुणे.

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३३ ☆ व्यंग्य – साहित्यकारी के दांव-पेंच ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘साहित्यकारी के दांव-पेंच‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ साहित्यकारी के दांव-पेंच डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

सयानेलाल ‘साहित्यप्रेमी’ जल्दी ही साहित्य के मामले में सयाने, समझदार हो गये। कुछ दिन कविता कहानी लिखी, फिर समझ गये कि इससे कुछ ठोस हासिल होने वाला नहीं। ऊसर में खेती करना है। संपादक, प्रकाशक के चक्कर काटते रहो। कोई लेखक दूसरे को पढ़ता नहीं, पाठक पीठ देकर बैठा है। कितनी भी चिरौरी करो, कान नहीं देता।

लेकिन इस मायूसी के बीच सयानेलाल ने साहित्य में निहित मुनाफे की संभावनाओं को खोज लिया। लिखने से भले कुछ न मिले, साहित्य-सेवा के और भी आयाम हैं जो फलदायी हो सकते हैं। ‘जिन खोजा तिन पाइयां।’ सिर्फ  अक्ल दौड़ाने की ज़रूरत है। उन्होंने सोच विचार करके लेखन के बजाय सम्मान-विमोचन का तुरत फल देने वाला धंधा शुरू कर दिया। अब दस-बीस लेखक उनके चक्कर लगाते रहते हैं, दिन भर फोन आते हैं— ‘बड़े भैया, दो साल से सम्मान नहीं हुआ। कब तक सबर करें? एक बार तो करा दो।’

जल्दी ही सयानेलाल पूरे प्रदेश में सम्मान-विमोचन के विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हो गये। अब साल में तीन चार सम्मान कार्यक्रम हो ही जाते हैं। हर कार्यक्रम में कवि-लेखक परिवार और इष्ट-मित्रों सहित पहुंचते हैं। मेले का माहौल बन जाता है। कई सम्मानित भावुक होकर परिवार से लिपटकर रोते हुए दिखायी पड़ते हैं।

सयानेलाल जी की पॉलिसी बिल्कुल साफ है। सम्मान-विमोचन का पूरा खर्चा लेखक को उठाना पड़ेगा। खर्चे की रकम और हिसाब सयाने लाल जी  के पास रहेंगे। हिसाब पूछने की मुमानियत है। जो पूछे उससे आंखें तरेरकर कहते हैं, ‘हिसाब मांगना है तो अब आगे सम्मान कराने के लिए हमारे पास मत आना। दो ठो दोहे लिखे नहीं कि सम्मान की लाइन में लग गये।’ सम्मानित सिकुड़ जाता है, दांत निकाल कर कहता है— ‘रहने दीजिए। गुस्सा मत होइए। हमने तो वैसइ पूछ लिया था।’ ज़ाहिर है खर्चे में से सयानेलाल पर्याप्त सेवा-शुल्क बचा लेते हैं।

सयानेलाल पर दबाव सिर्फ विमोचन और सम्मान के लिए ही नहीं होता, उनके कार्यक्रमों में अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए भी होता है। कुर्सी-प्रेमी अनेक लोग अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए कुछ ‘त्याग’ करने को भी तैयार हो जाते हैं।

एक दिन सयानेलाल नगर के जाने-माने विद्वान डॉक्टर त्रिपाठी के पास पहुंचे। चरण छूकर  बोले, ‘आदरणीय,16 तारीख को बीस पच्चीस लेखकों का सम्मान करना है। आप कृपा करके कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वीकार कर लें तो कार्यक्रम में चार चांद लग जाएंगे।’ त्रिपाठी जी भले आदमी थे। राज़ी हो गये। बोले, ‘वाहन की व्यवस्था कर देना। मैं आ जाऊंगा।’

सयानेलाल जी पुन: चरण छूकर खुशी खुशी विदा हुए।

कार्यक्रम से तीन दिन पहले अचानक वे फिर त्रिपाठी जी के घर उपस्थित हुए। बड़ी देर तक बैठे उंगलियां मरोड़ते रहे, जैसे किसी असमंजस में हों। थोड़ी देर में बोले, ‘आदरणीय, बड़े धर्मसंकट में हूं। कैसे कहूं? आप विकल जी को जानते होंगे। कविता लिखते हैं। वे पीछे पड़ गये हैं कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता का मौका उनको दूं। दरअसल वे अगले महीने बेटी के पास बंबई जा रहे हैं। कह रहे थे पता नहीं कब लौटना हो, इसलिए मेरे मार्फत आपसे प्रार्थना की है कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता उन्हें कर लेने दें। कहा है कि इस कृपा के लिए आपके बहुत आभारी होंगे। लेकिन मेरे लिए यह बड़े संकट की बात है।’

त्रिपाठी जी ठहरे सज्जन व्यक्ति। तुरंत बोले, ‘ठीक है। वे ही अध्यक्षता करें। क्या फर्क पड़ता है?’

सयाने जी चेहरे पर पश्चात्ताप का भाव पहने बाहर निकले, लेकिन स्कूटर पर बैठते ही उनका भाव बदला और वे मुस्कराते हुए आगे बढ़ गये।

दूसरे दिन त्रिपाठी जी के पास नगर के साहित्यकारों में ‘नारद’ की उपाधि पाये ‘बेदर्द’ जी का फोन आ गया। पूछने लगे, ‘सुना है आप सयाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता नहीं कर रहे हैं?’ त्रिपाठी जी ने पूरी जानकारी दी तो ‘बेदर्द’ जी बोले,  ‘सयानेलाल बहुत काइंयां है और आप बहुत भोले हैं। विकल जी बड़े प्रचार-प्रेमी हैं। उन्होंने  अध्यक्षता के लिए सयाने  को ग्यारह  हज़ार रुपये का वादा किया है। वे अपने साथ सौ रुपये की दिहाड़ी पर बीस पच्चीस श्रोता भी लाएंगे। साथ ही वे सभी श्रोताओं की चाय का खर्चा भी उठाएंगे। यह सब मुझे खुद सयानेलाल ने बताया। वह विकल जी को बुलाकर बहुत खुश है। आप आजकल की साहित्यकारी के लटके झटके से वाकिफ़ नहीं हैं।’

त्रिपाठी जी हंसकर बोले, ‘ठीक कहते हो, भैया। यह आजकल की साहित्यकारी समझना हम जैसे अनाड़ियों के बस का नहीं है।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०४ – कसौटी… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– कसौटी…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०४ — कसौटी — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

ईश्वरीय कसौटी की एक अद्भुत कहानी है। सम्राट अनादिकाल से जन्म लेता आया है और उसी अनुपात से उसकी मृत्यु होती रही है। उसके जन्म और मृत्यु के इस परिवेश में देखा तो यही जाता है आधा संसार ही उसकी जीत में आता है और आधा उसकी जीत से मुक्त रह जाता है। शेष आधे की जीत उसके वश में हो भी नहीं सकती। यह ईश्वरीय है। ईश्वर उसे आधा ही ताज पहनाता है और आधा पहनाये बिना उसे बुला लेता है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

27 – 04 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३३ – स्टैच्यू..! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३३ स्टैच्यू..! ?

संध्याकाल है। शब्दों का महात्म्य देखिए कि प्रत्येक व्यक्ति उनका अर्थ अपने संदर्भ से ग्रहण कर सकता है। संध्याकाल, दिन का अवसान हो सकता है तो जीवन की सांझ भी। इसके सिवा भी कई संदर्भ हो सकते हैं। इस महात्म्य की फिर कभी चर्चा करेंगे। संप्रति घटना और उससे घटित चिंतन पर मनन करते हैं।

सो अस्त हुए सूर्य की साक्षी में कुछ सौदा लेने बाज़ार निकला हूँ। बाज़ार सामान्यत: पैदल जाता हूँ। पदभ्रमण, निरीक्षण और तदनुसार अध्ययन का अवसर देता है। यूँ भी मुझे विशेषकर मनुष्य के अध्ययन में ख़ास रुचि है। संभवत: इसी कारण एक कविता ने मुझसे लिखवाया, ‘उसने पढ़ी आदमी पर लिखी किताबें/ मैं आदमी को पढ़ता रहा।’

आदमी को पढ़ने की यात्रा पुराने मकानों के बीच की एक गली से गुज़री। बच्चों का एक झुंड अपने कल्लोल में व्यस्त है। कोई क्या कह रहा है, समझ पाना कठिन है। तभी एक स्पष्ट स्वर सुनाई देता है, ‘गौरव स्टेच्यू!’ देखता हूँ एक लड़का बिना हिले-डुले बुत बनकर खड़ा हो गया है। . ‘ ऐ, जल्दी रिलीज़ कर। हमको खेलना है’, एक आवाज़ आती है। स्टैच्यू देनेवाली बच्ची खिलखिलाती है, रिलीज़ कर देती है और कल्लोल जस का तस।

भीतर कल्लोल करते विचारों को मानो दिशा मिल जाती है। जीवन में कब-कब ऐसा हुआ कि  परिस्थितियों ने कहा ‘स्टैच्यू’ और अपनी सारी संभावनाओं को रोककर  बुत बनकर खड़ा होना पड़ा! गिरना अपराध नहीं है पर गिरकर उठने का प्रयास न करना अपराध है। वैसे ही नियति के हाथों स्टैच्यू होना यात्रा का पड़ाव हो सकता है पर गंतव्य नहीं। ऐसे स्टैच्यू सबके जीवन में आते हैं। विलक्षण होते हैं जो स्टैच्यू से निकलकर जीवन की मैराथन को नये आयाम और नयी ऊँचाइयाँ देते हैं।

नये आयाम देनेवाला ऐसा एक नाम है अरुणिमा सिन्हा का। अरुणिमा, बॉलीबॉल और फुटबॉल की उदीयमान युवा खिलाड़ी रही। दोनों खेलों में अपने राज्य उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी थी। सन 2011 में रेलयात्रा करते हुए बैग और सोने की चेन लुटेरों के हवाले न करने की एवज़ में उन्हें चलती रेल से नीचे फेंक दिया गया। इस बर्बर घटना में अरुणिमा को अपना एक पैर खोना पड़ा। केवल 23 वर्ष की आयु में नियति ने स्टैच्यू दे दिया।

युवा खिलाड़ी अब न फुटबॉल खेल सकती थी, न बॉलीबॉल। नियति अपना काम कर चुकी थी पर अनेक अवरोधक लगाकर सूर्य के आलोक को रोका जा सकता है क्या? कृत्रिम टांग लगवाकर अरुणिमा ने पर्वतारोहण का अभ्यास आरम्भ किया।  नियति दाँतो तले उँगली दबाये देखती रह गयी जब 21 मई 2013 को अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट फतह कर लिया। अरुणिमा सिन्हा स्टैच्यू को झिंझोड़कर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचने वाली पहली दिव्यांग पर्वतारोही बनीं।

चकबस्त का एक शेर है,

कमाले बुज़दिली है, पस्त होना अपनी आँखों में

अगर थोड़ी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं।

स्टैच्यू को अपनी जिजीविषा से, अपने साहस से स्वयं रिलीज़ करके, अपनी ऊर्जा के सकारात्मक प्रवाह से अरुणिमा होनेवालों  की अनगिनत अद्भुत कथाएँ हैं। अपनी आँख में विजय संजोने वाले कुछ असाधारण व्यक्तित्वों की प्रतिनिधि कथाओं की चर्चा उवाच के अगले अंकों में करने का यत्न रहेगा। प्रक्रिया तो चलती रहेगी पर कुँवर नारायण की पंक्तियाँ सदा स्मरण रहें, ‘हारा वही जो लड़ा नहीं।’..इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ हनुमान साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी। 🕉️ 💥 

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७८ – कहमुकरी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – कहमुकरी)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७८ ☆

☆ कहमुकरी ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

उसकी संगत शीतल छाँव

भेद-भाव बिन मिलती ठाँव

उसकी यादें जैसे सौध

क्या सखि पौध?

नहिं हरिऔध।

क्यों मुँह पर है नहीं उजास?

मन में क्यों है नहीं हुलास?

क्या कारण मन हुआ उदास?

ग्रहण खग्रास?

नहिं, प्रिय प्रवास।

तन्हाई में साथ निभाते

हो उदास तो तुरत हँसाते

चोट करें फिर भी मन भाते

बच्चे पीठ लदे?

ना, चुभते चौपदे।

भू पर उतर स्वर्ग से आए

पहले मैंका द्वंद मचाए

सिय रघुवर लछमन हनुमान

हुआ अवध का नया विकास

ना गुइयाँ! वैदेही वनवास।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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