हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९९ ⇒ सुख की उत्पत्ति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुख की उत्पत्ति…“।)

?अभी अभी # ९९९ ⇒ आलेख – सुख की उत्पत्ति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिन्हें सिर्फ आम ही खाना पेड़ नहीं गिनना, उनके लिए तो यही बेहतर है कि वे सुख के उद्गम अथवा उत्पत्ति के बारे में अधिक मगजपच्ची ना करें, उनके लिए सुख की अनुभूति ही सब कुछ है। आम से हमको मतलब, गुठली से क्या लेना। रबड़ी कैसे बनती है, यह जानकर हमें क्या करना। कुछ लेना न देना, सिर्फ ऑन लाइन जोमेटो पर ऑर्डर प्लेस करना। कोई दूध खरीदे, महंगी गैस पर उसे गर्म करे, ओटाये, सुख की आस में पसीना बहाए। आजकल इंस्टेंट अर्थात् त्वरित सुख का जमाना है, सुख की खोज के लिए ज्ञानवर्धक किताबों में आजकल सर नहीं गड़ाया जाता, हमने सभी सुखों को अपने रिमोट में कंट्रोल कर लिया है फिर चाहे वह टीवी, पंखा, कूलर अथवा एयर कंडीशनर ही क्यों ना हो। हवा आने दो।

सुख भी आजकल स्विच ऑन और स्विच ऑफ होने लगा है। हमसे किसी का अधिक सुख भी नहीं देखा जाता। अधिक सुख की तो छोड़िए, जिसे निर्मल वर्मा एक टुकड़ा सुख कहते थे, उस पर भी आजकल वक्त की नज़र लग चुकी है। आज के एक आम आदमी के टुकड़े टुकड़े सुख वास्तव में क्या हैं, जिन पर नियति अपनी बुरी नज़र लगा रही है। आइए देखते हैं।।

सुख आसमान से नहीं टपकता। सुख की उत्पत्ति का मूल ही कष्ट है, पीड़ा है, संघर्ष है, एक तड़प है। प्यास के बिना पानी नहीं, भूख बिना भोजन नहीं। विरह बिन मिलन नहीं।

नदी का उद्गम पहाड़ है।

कितनी चट्टानों से टकराकर वह अपनी राह निकालती है। चंचल प्रवाह, और संघर्ष के बीच, अच्छे बुरे मौसम का सामना कर सबके सुख के लिए निरंतर बहते रहना, सबकी प्यास बुझाना ही तो नदी का स्वभाव है। सुख वही शाश्वत है, जिसका अंत अनंत सुखसागर में हो।

एक बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होती है, प्रकृति से लड़ना, जूझना, संघर्ष करना, बड़े होकर पंछी को छाया और फल देना, इसी में उसे सुख की अनुभूति होती है। कोई पेड़ पर फल तोड़ने के लिए पत्थर मारता है, वृक्ष फिर भी बदले में फल ही वापस करता है। हमारे और उसके मज़ा चखाने के अंदाज़ में बहुत अंतर है।।

नदियां ना पीएं कभी अपना जल।

वृक्ष ना खाएं कभी अपने फल।।

सुख है ही एक ऐसी वस्तु, जिसे लेने में भी सुख की अनुभूति होती है और देने में भी। लेकिन सुख का कोई पेड़ नहीं होता। थोड़ा कष्ट उठाया जाए, परिश्रम किया जाए, तब ही वास्तविक सुख का अहसास होता है। सुख और दुख विपरीत परिस्थितियों में एक दूसरे का साथ देते हैं। सर्दी में धूप से प्यार और गर्मी में ठंडी बयार। भूख में ही भोजन अमृत होता है।

आंखों में नींद हो, तब ही तो सोने का मज़ा है। रात भर करवटें बदलते रहने में काहे का सुख।

सुख एक मिट्टी के कच्चे घड़े की तरह है, इसे पकाना बहुत जरूरी है। अगर सुख के उद्गम में तप है, ताप है, तो मिट्टी होते हुए भी एक घड़ा कितने प्यासों की प्यास बुझा सकता है। इतनी तपन सहन करने के बाद ही उसमें शीतल जल समाता है। लकड़ी, लोहा, ईंट, सीमेंट, मिट मिटकर ही एक इमारत खड़ी करते हैं। सुख की नींव को बड़े जतन से सींचना, सहेजना पड़ता है।।

हमारी सुख की नींव में भी अगर त्याग है, तपस्या है, परिश्रम और संघर्ष है, तो हम उस वास्तविक सुख का अनुभव भी कर सकते हैं, जो सिर्फ लेने में ही नहीं, देने में भी है। सुख का मार्ग कभी एकांगी नहीं होता। सुख दुख हमेशा साथ चलते हैं।

सुख और दुख के छोटे छोटे बादल ही तो हैं हमारी आशाओं के आसमान में !

इसमें कहीं संतान सुख छुपा है तो कहीं सब्सिडी सुख। घटती बढ़ती पेंशन की तरह हम सुखी दुखी होते रहते हैं। बस एक जिजीविषा है जो हमारे सुख का भी उद्गम है और दुख का कारण भी। कौन नहीं बहना चाहता सुखसागर में, इसकी परवाह किए बगैर कि अनंत सुख क्या है। जो हाथ लग गया, वही वास्तविक सुख। फिर सुख के पीछे इतनी मगजमारी क्यों।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (25 मई से 31 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (25 मई से 31 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। अगर आप किसी भी कष्ट से परेशान हैं तो सबसे अच्छा उपाय श्री हनुमान जी की भक्ति है। श्री हनुमान जी की भक्ति के लिए श्री हनुमान चालीसा से उत्तम और कुछ नहीं है। इसीलिए मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको प्रति सप्ताह हनुमान चालीसा की एक चौपाई के संपुट पाठ से होने वाले लाभ के बारे में बताता हूं। इस सप्ताह की चौपाई है:-

“आपन तेज सम्हारो आपै | तीनों लोक हाँक तें काँपै ||”

 अगर आप ओज कीर्ति तथा अपना प्रभाव लोगों के बीच में जमाना चाहते हैं तो आप को इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब हम आपको इस सप्ताह अर्थात 25 मई से 31 मई 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी देते हैं।

इस सप्ताह सूर्य वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, गुरु और शुक्र मिथुन राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

बुध प्रारंभ में वृष राशि में तथा 29 तारीख के 10:02 दिन से मिथुन राशि में प्रवेश करेगा।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

यह सप्ताह आपके लिए सफलताओं का सप्ताह रहेगा। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। व्यापार उत्तम चलेगा। धन पर्याप्त मात्रा में आएगा। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। भाग्य से थोड़ा बहुत सहयोग प्राप्त होगा, परंतु आपके कर्म ही आपकी मदद करेंगे। इस सप्ताह आपको अपने जीवनसाथी के प्रति रक्त संबंधी रोगों जैसे डायबिटीज आदि के बारे में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित है। 25, 26 और 27 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें और शनिवार के दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपको मानसिक संतोष रहेगा। कचहरी के कार्यों में विजय का योग है। थोड़ा बहुत प्रयास करना पड़ेगा। धन प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा बहुत तनाव आ सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से थोड़ा कम सहयोग प्राप्त होगा। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपको थोड़ी बहुत मानसिक परेशानी हो सकती है। कर्मचारियों अधिकारियों को उनके कार्यों में थोड़ा कम सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहना चाहिए। 30 और 31 तारीख को आपके जीवनसाथी को कोई कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

अगर आपका विवाह नहीं हुआ है तो इस सप्ताह विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। कचहरी के कार्यों में आप सावधान रहें। कचहरी में धन का अपव्यय हो सकता है। भाग्य से इस सप्ताह आपको पर्याप्त सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना पड़ेगा। परिश्रम से ही आपको सफलता प्राप्त होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। आपको अपने संतान से इस सप्ताह बहुत कम सहयोग मिलेगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सफलता दायक है। 30 और 31 तारीख को आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। व्यापारियों का व्यापार बढ़ेगा। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। भाग्य से सामान्य मदद मिलेगी। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। सावधानी से कार्य करने पर सफलता मिल सकती है। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। संतान से इस सप्ताह सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। इस सप्ताह आपको 30 और 31 तारीख को अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। छात्रों के लिए भी 30 और 31 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए अच्छे हैं। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका अच्छा साथ देगा। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। धन आने का भी योग है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। आपका या आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य खराब हो सकता है। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। इस सप्ताह आपको प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26, और 27 तारीख उपयोगी है। 30 और 31 तारीख को आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके भाग्य से काम भर की मदद मिलेगी। दुर्घटनाओं से आप साफ-साफ बचेंगे। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक-ठाक रहेगा। धन आने के मार्ग में कुछ कमियां है। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख कार्यों को करने में मददगार हैं। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। 30 और 31 तारीख को आपको अपने भाई बहनों से सावधान रहना चाहिए। उनको कोई कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपके भाग्य से मदद मिलेगी। आपके जीवन साथी के लिए सप्ताह उत्तम रहेगा। दुर्घटनाओं से आपको इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। आपको अपने संतान के प्रति सतर्क रहना चाहिए। उनका कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। अधिकारी और कर्मचारियों को अपने साथियों से सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपके पिताजी को इस सप्ताह कष्ट हो सकता है। माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख लाभदायक है। 25, 26 और 27 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। 30 और 31 तारीख को धन प्राप्त होने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका व्यापार उत्तम चलेगा। अधिकारीयों और कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। कन्फ्यूजन से बचना चाहिए। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकेंगे। आपको इस कार्य के लिए बहुत थोड़ा ही प्रयास करना पड़ेगा। आपको अपने संतान से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख फलदायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अत्यंत अच्छा रहेगा। विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। अगर विश्वोत्री दशा ठीक है तो विवाह तय भी हो जाएगा। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि होगी। नए संबंध बन सकते हैं। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। भाग्य से भी थोड़ी बहुत मदद मिलेगी। यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। उनका आपको अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। शत्रु शांत रह सकते हैं परंतु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए अनुकूल है। 30 और 31 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। आपको कचहरी के कार्यों में 30 और 31 तारीख को सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। धन आने का भी अच्छा योग है। गलत और सही दोनों रास्तों से धन आ सकता है। भाग्य से सामान्य मदद ही प्राप्त हो पाएगी। पेट की बीमारियों के प्रति सतर्क रहें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख परिणाम दायक है। 30 और 31 तारीख को आप अपने धन लाभ के प्रति सतर्क रहें। 25, 26 और 27 तारीख को थोड़ा बहुत भाग्य से मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाई बहनों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। उनसे आपके संबंधभी अच्छे रहेंगे। शत्रुओं से आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। अगर आप विशेष प्रयास करेंगे तो आप उनको पराजित कर सकते हैं। आपका व्यापार ठीक चलेगा। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। सामान्य मात्रा में धन आने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्य करने की आवश्यकता है। कर्मचारी और अधिकारियों को 30 और 31 तारीख को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। लोगों के बीच में आपका सम्मान बढ़ेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। अधिकारीयों और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। आपके संतान को थोड़ा बहुत कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में रुकावट हो सकती है। दुर्घटनाओं से सावधान रहें। भाग्य से सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 25 26 और 27 तारीख परिणाम मूलक है। 30 और 31 तारीख को भाग्य के सहारे कोई भी कार्य न करें। 28 और 29 तारीख को सावधान रहे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

ग्वारीघाट से तिलवारा घाट:13 अक्टूबर 2018

ग्वारीघाट से चले दो घंटे हो चुके थे। तिलवारा घाट शाम तक पहुँचने का लक्ष्य था। तिलवारा घाट का पुल तीन किलोमीटर पहले से दिखने लगा था। उसे देखते ही लगा कि लो पहुँच गए तिलवारा घाट, परंतु चलते-चलते पुल नज़दीक ही नहीं आ रहा था। पुल के दृश्य का पेनोरमा नज़ारा जैसा का तैसा बना था। तभी सामने एक बड़ा चौड़ा पहाड़ी नाला रास्ता रोककर खड़ा हो गया। खेतों में काम कर रहे मल्लाहों से पूछा तो उन्होंने बताया कि दो किलोमीटर ऊपर चढ़कर नाला पार करके नागपुर रोड पर पहुँच कर तिलवारा घाट पहुँचा जा सकता है इसका मतलब हुआ चार किलोमीटर का चक्कर। सबके पसीने छूट गए।

टी.पी.चौधरी साहब सपत्नीक गेंदों की मालाओं, नारियल,फल और ढेर सारा प्यार व परकम्मावासियों के प्रति हृदय में सम्मान लेकर तिलवारा घाट पर खड़े हमारी स्थिति लेते रहे थे। मोबाइल से उनको निवेदन किया कि एक नाव घाट से भिजवा दें। इसके पहले कि वे घाट पर आएँ एक नाविक को हम दिख गए और हमने भी तेज़ आवाज़ के साथ हाथ हिलाए। वह आया तो उसकी नाव में बैठकर तिलवारा घाट पर उतरे। चौधरी साहब ने बड़ी आत्मीयता और सम्मान से माला पहनाकर स्वागत किया और नारियल चिरोंजी अर्पित किया मानो हम देव हो गए हों। हमेशा की तरह हम उनके चरणस्पर्श करने को झुके तो उन्होंने हमें रोक दिया क्योंकि हम परिक्रमा वासी थे। भाभी जी अभिभूत थीं, उनका मातृवत प्रेम पूरी यात्रा हमारे साथ चला। सब लोग चौधरी दम्पत्ति के बारे में बतियाते रहे।

वैराग्य पर बातें करने लगे। घर, कपड़े, बिस्तर, पानी, खाना, पंखा, फ़र्निचर, गद्दे, गाड़ी, रुपया-पैसे, रिश्ते-नाते इन सब से परे भगवान भरोसे सिर्फ़ भगवान भरोसे। न रास्ते का पता, न खाने का पता, न ठिकाने का पता। बस एक अवलंबन नर्मदा, जिसके भरोसे ईश्वर के रिश्ते की डोर आदमियत से बंधी है। बस वही बचाएगी, वही खिलाएगी, वही सुलाएगी। सब कुछ तोड़कर और सब कुछ छोड़कर उसकी धारा में जाओगे तो वह पार लगाएगी। कर्मकांड से परे एक दीपक आस्था का। जूझो धूप से, पहाड़ से, पानी से, इंसानी नादानी से। धौंकनी सा चलता दिल, पिघल कर पसीना होती देह और आत्मा में तारनहार के प्रति असीम आस्था की परीक्षा है नर्मदा यात्रा।

जिस घर के सामने पहुँचकर कंठ से “नर्मदे हर” का अलख जगाया। उत्तर में हर-हर नर्मदे का स्वर घर के सभी सदस्यों की आवाज़ में एकसाथ गूंजा और सबसे बुज़ुर्ग सदस्य की आवाज़ सुनाई देती है बैठो साहब पानी पी लो, चाय पी लो, भोजन बना दें। सिर्फ़ आदमियत का रिश्ता कि पूरी पृथ्वी के जीव एक ही ब्रह्म के अंश, सब अन्योनाश्रित हैं। वसुधेव कुटुम्बकम, भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा मूल्य, जो मानवता वादियों का सबसे बड़ा संबल है। धर्म का सच्चा रूप और दुनिया की आतंकवाद के विरुद्ध एकमात्र आशा।

अत्यावश्यक से परे न्यूनतम पर निर्वाह पर विचार हुआ। भूख, भोजन, यौनइच्छा और आराम ये चार चीज़ें मानुष और पशु को प्रकृति की अनिवार्य देन हैं क्योंकि जीवन का चक्र इन्हीं से गतिमान होता है। भूख है तो भोजन की तलाश है, शरीर की थकान से भरपेट भोजन मिला तो यौन इच्छा जागती है, जिसकी पूर्ति होते ही नींद की प्रगाढ़तावश आराम अनिवार्य हो जाता है। छः दिन भूख, भोजन, यौनइच्छा से परे सुबह से शाम तक चलते-चलते चूर होने से भूख मिट गई, भोजन नहीं मिला तो यौनइच्छा लुप्त सी रही क्योंकि काम की जननी ऊर्जा का अंश देह में बचा ही नहीं। यहाँ से प्रथम सह यात्री विनोद प्रजापति दमोह को वापिस चले गये, श्रीवर्धन नेमा व रवि भाटिया जबलपुर।

तिलवारा घाट से भेड़ाघाट: 14 अक्टूबर 2018

14 तारीख़ को हम तिलवारा घाट से चलने को तैयार हुए तो पता चला कि पुल के किनारे से एक नाला गारद और कंपे से भरा होने के कारण रास्ता दलदली हो गया है लिहाज़ा एक किलोमीटर ऊपर से नए घूँसोर, लमहेंटा, चरगवा, धरती कछार से एक रोड शाहपुरा निकल गई है, वह राह पकड़ी। लम्हेंटा घाट पर शनि मंदिर से लगा ब्रह्म कुंड देखा। ऐसी मान्यता है कि जब कोई कोढ़ी मर जाता है तो उसके शव को ब्रह्मकुंड में सिरा देते हैं। वह सीधा पाताल लोक पहुँच जाता है।

उसके बाद आया बगरई गाँव। बगरई शिल्पकारों का गाँव है। वहाँ कारीगरों के 250-300 घर हैं। चारों तरफ़ संगमरमर पत्थर की खदानें हैं। दस हज़ार रुपयों में एक ट्राली पत्थर ख़रीद कर कटर, छेनी, वसूली और दांतेदार रगड़ से पत्थर को मूर्तियों की शक्ल में ढाल देते हैं। अधिकांश कारीगरों ने बैंकों से क़र्ज़ लिए थे वे सब ख़राब हो गए, उनका रिकार्ड बिगड़ने से उनको क़र्ज़ मिलना बंद हो गया। अब निजी माइक्रो फ़ाइनैन्स कम्पनी के कारिंदे उन्हें 24% वार्षिक ब्याज की दर से क़र्ज़ उनके घर पर देते हैं और घर से ही वसूली करते हैं। बगरई गाँव में एक बसोड के घर रुक कर पानी पिया। अरुण दनायक जी ने उनसे लम्बी बातचीत की, उनके फ़ोटो उतारे। आगे रामघाट की तरफ़ चल दिए। तब पता नहीं था कि हमें बिजना घाट तक का सफ़र तय करना होगा। रामघाट पर ढीमर जाल में मछली पकड़ते मिले।

नर्मदा का सच्चा सेवक “निषाद समाज” है। केवट, निषाद, धीवर, ढीमर, मल्लाह, मछुआरे, कहार, बरुआ, बरौआ, बर्मन इन उपनाम वाले मेहनती लोग देश की अधिकांश नदियों की मचलती लहरों पर सवार होकर लोगों को पार उतारने वाली जातियों के रूप में पहचाने जाते हैं। आदमी की तरह शब्द भी पैदा होते हैं, बड़े होते हैं, बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं। इन शब्दों की जीवन यात्रा का एक विकास क्रम है। शब्द सरोकार से पैदा होते हैं, अपनी उपयोगिता सिद्ध करके संस्कृति के हिस्से बनकर चले जाते हैं। भारत में जातियाँ खेत या बगीचों की तरह व्यवस्थित रूप से उगाई फ़सल की तरह विकसित नहीं हुईं हैं। जातियाँ जंगल में विकसित पेड़-पौधों, घास-फूस, झाड़ी-झंखाड़ की तरह ज़रूरत के अनुसार उपजी और विकसित हुईं हैं। बर्मन कहलाने वाले ये लोग नर्मदा घाटी के मूल निवासी हैं। नर्मदा घाटी में बाहर से आए लोगों ने व्यापार वाणिज्य और प्रशासन के मेल मुलाक़ात से  एक तंत्र विकसित करके वाणिज्यिक गतिविधियों पर अधिकार कर लिया। ये बेचारे लघु सीमांत कृषक, मछली पालन और नाविक बनकर जहाँ के तहाँ हैं।

जबलपुर के ग्वारीघाट पर नर्मदा किनारे पहुँचते ही नाव से उस पार जाने के लिए काले स्याह बर्मन युवकों से सामना होता है। ये अर्धनग्न मेहनतकश नौजवान उछलते-कूदते नाव को घुमाते रहते हैं। उनकी बाहों, पुट्ठों, पीठ और पैर पर धूप में चमकती  मांसपेशी मछलिएँ उनके श्रमसाध्य जीवन की कहानी स्वमेव कह जाती हैं। यह समाज अमरकण्टक से भड़ौच तक नर्मदा के दोनों किनारों पर सेवा को मुस्तैद रहता है। ये लोग नर्मदा की सभी सहायक नदियों के किनारे भी जीवन के अनिवार्य हिस्से हैं।

तिलवारा घाट से परिक्रमा शुरू करने के बाद जब ख़ूब प्यास लगी तो पहला घर जिस पर दस्तक दी, वह बर्मन का था। छरछरे बदन की एक महिला ने नर्मदे हर कहने पर रुकने का इशारा किया, उनके  घर रुक गए। उन्होंने पहले ठंडा पानी फिर गरम चाय से परिक्रमावासियों को निहाल कर दिया। भोजन की ज़ुहार करने लगीं जिसे हमने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उनका परिवार नर्मदा के कछार की ज़मीन पर तरबूज़-ख़रबूज़ सागभाजी उगाता था। तीन साल पहले जबलपुर के खटीकों ने गुंडई से ज़मीन हड़प ली। वहाँ फ़ार्महाउस बन रहा है। मालूम पड़ा कि ज़मीन सरकारी थी जिसे वे लोग सैकड़ों साल से जोत रहे थे। अब कोर्ट में केस लगा है जिसकी सुनवाई पर बर्मन परिवार ने जाना बंद कर दिया है। ज़ाहिर है कि फ़ार्महाउस की फ़सली ज़मीन पर रंगीनी रातों का सिलसिला शुरू होगा। बर्मन परिवार बेदख़ल कर दिया जाएगा।

सुविधा के लिहाज़ से हम इनका सम्बोधन निषाद समाज से करेंगे। जब से नदियों के किनारे मानव सभ्यता की शुरुआत हुई है तब से निषाद समाज का अस्तित्व रहा है। नाव बनाना, जाल बुनना, नदी पार कराना, नाव खेना, मछली पकड़ना, नदी कछार में खेती करना और डूबतों को तारना इत्यादि इनकी आजीविका के साधन रहे हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५२ – कविता – अलग अलग हैं रंग ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५२ ☆

☆ कविता ☆ काव्य कथा विथिका ~ अलग अलग हैं रंग ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

 (खंड दो )

 गांव से भोलू शहर आ गया, खूब लगी थी भूख ।

 गोरा चेहरा लाल हो गया, कड़क कटीली धूप ।।

 काम किया पूरा दिन भोलू, नहीं मिली मजदूरी।

 हाथ पांव जोड़ा बेचारा, कह डाला मजबूरी ।।

*

 बच्चे मेरे भूखे साहब, आधे पैसे दे दो ।

 ईश्वर तेरा भला करेगा, विनती मेरी सुन लो।।

 पर मलिक था क्रूर कुटिल, डांट के उसे भगाया ।

 पत्नी भी ना कोई कम थी, नहीं तनिक थी माया ।।

*

 खोटी किस्मत लेकर भोलू*, घर को किया प्रस्थान ।

 पाँव सड़क पर आगे बढ़ता, कहीं था उसका ध्यान

 मन में भोले भोले कहता, भोलू खुद को भूला ।

 गमछे से आँशु को पोछे, पीठ पर लटका झोला ।।

*

 भोलू भोलू सुनो न मुझको, छत से आई आवाज ।

 एक पुरानी मालकिन उसकी, खड़ी थी  छत पर आज ।।

 दो सौ रूपये पकड़ो भोलू, ले आना तुम खाद ।

 बगिया सुखी, फूल रो रहे, पौध हुए बर्बाद ।।

*

 इसको भी पकड़ो तुम भोलू, लाल मिठाई खास ।

 बात बताओ, मेरे भोलू, क्यों हो अधिक उदास ।।

 भोलू की आँखें भर आई, देख जगत का रंग।

 यही देव-दानव दोनों है, अलग-अलग है ढंग।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-05-2026

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६७ ☆ कविता – सदा स्वार्थ-व्यवहार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सदा स्वार्थ-व्यवहार …” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६७ ☆

☆ सदा स्वार्थ-व्यवहार…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

आजादी के पहले भारत में था अंग्रेजों का राज।

लूट रहे थे वे हम सबको दीन दुखी था यहाँ समाज ॥

*

तिलक और गाँधी ने देखे सपने, चाहा देशी राज।

कष्ट सहे, समझाया सबको, लाई चेतना और स्वराज ॥

*

उनके उस निस्वार्थ त्याग का सुख हम भोग रहे हैं आज ।

किन्तु खेद है उन्हें भुला कर स्वार्थमुखी हो चला समाज

*

सदा स्वार्थ-व्यवहार जगत् में होता है दुख का आधार ।

धन सुख का आधार नहीं है, वह तो है ममता औ’ प्यार ॥

*

जो चरित्र का पतन दिख रहा यह है बड़ी हमारी हार ।

बहुत जरूरी जन हित में फिर सुधरे हम सबका व्यवहार ॥

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ३ – !!प्रगति!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!प्रगति!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ३ ☆

☆ !!प्रगति!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

☆

लक्ष्य करें निर्धारित पहले, नींद त्याग कर जब जागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

०

शुभ विचार धारण करके मन, क्षमता का विस्तार करे।

लड़ना है मुश्किल से डटकर, साहस अपने हृदय भरे।।

कदम -कदम जो आज चलेगा, वही दौड़ के कल भागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

०

निशा भले काली हो कितनी, सूर्योदय से मिट जाती।

पार करे जब चट्टानों को, नदी तभी सागर पाती।।

करें सामना बाधाओं का, सुप्त भाग्य फिर उठ जागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

०

भिन्न-भिन्न पहलू जीवन के,  प्रतिपल आते जाते हैं।

जाना है किस ओर हमें ये, हरपल ही भरमाते हैं।।

उलझाते रहते हैं हरदम, रेशम बंधन के धागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

☆

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०४ ☆ गीत – ।। जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०४ ☆

☆ गीत ।। जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

जो मिला के चलता समय से कदम वो जीत जाता है।

कैसे भी हालात   हों वक्त  बस  चलता ही   जाता है।।

**

जो करता समय काआदर वही समय सेआदर पाता है।

जो भूला देता वक्त को वह फिर अनादर ही लाता है।।

एक बात जान लो गया   समय नहीं वापिस आता है।

जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।।

**

परिश्रमऔर समय का तालमेल ही सफलता की कुंजी है।

आदमी का  जोशो – जनून ही उसकी असली पूंजी है।।

जिसने समझा समय के महत्व को वही मंजिल पाता है।

जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।।

**

आदमी नहीं समय बहुत अधिक बलवान होता है।

धैर्य बहुत जरूरी समय से ही सब समाधान होता है।।

जिसने छोड़ा समय का दामन जीतकर भी हार जाता है।

जो मिलाके चलता समय से कदम वो जीत जाता है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३१ – कविता – मस्ताने… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “मस्ताने…“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३१ ?

? कविता – मस्ताने… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

लेकर के छुट्टी घर में वो सुस्ताने चले हैं

अंगड़ाई लेके देखिये मस्ताने चले हैं

=2=

कोई सबूत हाथ न लग जाए इसलिए

पहन वो दोनों हाथ में दस्ताने चले हैं

=3=

अदालतों में पैसे देके धुलते पाप हैं

फ़िर क्यों वे गंगाघाट पे नहाने चले हैं

=4=

फ़रमाया बेवड़े ने इक, सफ़ाई में अपनी

ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम उफ़ मयखाने चले हैं

=5=

हालात अपने घर के जो सम्हाल न सके

दुनिया को ‘राजेश’ वो समझाने चले हैं

☆ 

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ४३ आणि ४४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ४३ आणि ४४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ४३ – – – 

मना सज्जना एक जीवी धरावे|

जनी आपुले हीत तुवा करावे|

रघूनायकावीण बोलो नको हो |

सदा मानसी तो निजध्यास राहो|४३|

अर्थ : हे सज्जन मना, आपल्या जीवाशी एक खूणगाठ बांधून ठेव. जीवनामध्ये आपले तू कल्याण करून घे. एकदा भगवंताशिवाय अन्य गोष्टी बोलण्याचे सोडून दे. सदासर्वदा आपल्या मनाला त्याचाच ध्यास लागू दे.

विवेचन : आपले कल्याण व्हावे ही समर्थांची तळमळ मनाच्या श्लोकांमध्ये ठायी ठायी जाणवते. म्हणून पुनरुक्तीचा दोष पत्करून काही गोष्टी ते पुन्हा पुन्हा सांगतात. आपल्या मनाला उपदेश करताना ते म्हणतात, ” हे सज्जन मना, एक गोष्ट आपल्या जीवाशी निश्चित करून ठेव. तुला जर तुझे कल्याण करून घ्यायचे असेल तर रघुनायकाचा म्हणजे भगवंताचा ध्यास घे. त्याच्याशिवाय दुसरे काही बोलू नको. “

व्यवहारात आपल्या वाणीला म्हणजे बोलण्याला अतिशय महत्त्व असते. आपल्या बोलण्यावरून आपले व्यक्तिमत्व लोकांना समजते. म्हणून व्यवहारात लोकांशी आवश्यक तेवढे बोलावेच लागेल. व्यवहार सोडता येणार नाही. समर्थांनी देखील “आधी प्रपंच करावा नेटका” असे सांगितले आहे. पण जेव्हा व्यवहारातील बोलणे संपेल तेव्हा आपल्या मुखातून भगवंताचे नामच बाहेर पडले पाहिजे. असे नाम सातत्याने येण्यासाठी मनामध्ये त्याचा विचार हवा कारण जसा विचार, तसा उच्चार आणि तसा आचारही होतो.

हा झाला बाह्य आचार. एक वेळ मुखात भगवंताचे नाम येणे, भगवंताबद्दल बोलणे सहज जमू शकते. पण आपल्या अंतरंगात भगवंताचे अनुसंधान टिकवणे सोपे नाही. त्याच्यासाठी सतत जागेपणी जेवढे शक्य होईल तेवढे भगवंताचे नाव घेत राहण्याचा अभ्यास करायला हवा. इंग्रजी शब्दांचा वापर करून सांगायचे झाले तर ट्वेंटी फोर बाय सेव्हन भगवंताच्या नामाचा ध्यास असायला हवा. ब्रह्मचैतन्य गोंदवलेकर महाराज म्हणतात तुम्ही जागेपणी मनाला नाम घेण्याची सतत सवय लावून घ्या. एकदा हे साधले की मग तुमच्या झोपेत किंवा तुमच्या आजारपणात देखील आपोआप हे नाम घेतले जाईल.

हे विवेचन वाचत असताना आपल्याला असे वाटेल की हे म्हणजे फारच झाले व्यवहारात आपल्याला एवढे शक्य नाही. परंतु समर्थांचे हे सांगणे आपल्यासारख्या सर्वसामान्यांसाठीच आहे. आपण भगवंताचे नाम का घ्यायचे ?त्याची भक्ती का करायची ? तर आपण साधना मार्गावर चालणारे साधक आहोत. सुरुवातीलाच समर्थांनी आपल्याला “गमू पंथ अनंत या राघवाचा” असे सांगितले आहे. ही गोष्ट एकदा मान्य केली की मग समर्थांचा उपदेश सहज पचनी पडतो.

जसे रोग्याला डॉक्टरांनी सांगितलेले पथ्य पाळणे त्याच्या हिताचे असते, तसेच साधकाला देखील काही गोष्टींची पथ्ये असतात. ती त्याने सांभाळायला हवीत. तुकाराम महाराज म्हणतात, ” जेणे विठ्ठल मात्रा घ्यावी, तेणे पथ्ये सांभाळावी. ” आपण साधक आहोत आणि परमेश्वराची प्राप्ती हे आपले साध्य आहे. हे जीवनध्येय एकदा ठरले की मग पुढील वाटचाल सोपी होते. परमेश्वराच्या नामात रममाण व्हायचे की लोकांमध्ये मिसळून आपला वेळ अन्य गोष्टींमध्ये व्यर्थ घालवायचा ? यातील कोणती गोष्ट निवडायची हे खऱ्या साधकाला सांगावे लागत नाही. आपल्या परमार्थाला हानिकारक होतील अशा गोष्टींपासून खरा साधक दूरच राहतो. “विठ्ठल आवडी प्रेमभावो, विठ्ठल नामाचा रे टाहो… ” असे संत नामदेव म्हणतात. तसेच आपलेही झाले पाहिजे.

स्वसंवाद :: 

१) माझ्या दिवसातील किती वेळ भगवंताचे नाम किंवा विचार माझ्या मनात असतो – प्रामाणिकपणे सांगायचे तर किती टक्के ?

२) “जसा विचार, तसा उच्चार, तसा आचार” – माझे विचार, बोलणे आणि वागणे यात सुसंगती आहे का ?

३) साधकाला पथ्य असते – माझ्या परमार्थाला हानिकारक कोणती सवय मी अजून सोडलेली नाही ?

४) गोंदवलेकर महाराज म्हणतात जागेपणी नामाची सवय लावा – मी आज या क्षणापासून हे सुरू करण्यास तयार आहे का ?

– – – – 

श्लोक क्र. ४४ – – 

मना रे जनी मौन्य मुद्रा धरावी |

कथा आदरे राघवाची करावी |

नसे राम ते धाम सोडोनी द्यावे |

सुखालागि आरण्य सेवीत जावे |४४|

अर्थ :  हे मना, समाजात वावरताना शक्यतो मौन धारण करावे. बोलायचेच झाले तर अत्यंत आदराने श्रीरामाचे गुणगान करावे. ज्या ठिकाणी श्रीरामाबद्दल म्हणजेच भगवंताबद्दल प्रेम नाही अशा ठिकाणी राहू नये. ते ठिकाण तत्काळ सोडून द्यावे. भगवंताच्या नामातील सुख प्राप्त करण्यासाठी खुशाल अरण्यात जाऊन राहावे.

विवेचन : मन म्हणजे विचार करणे. ज्याला मन आहे तो माणूस ! म्हणजेच जो विचार किंवा चिंतन करू शकतो तो माणूस होय. मौन हा शब्द देखील मन या धातूपासून तयार झाला आहे. केवळ न बोलणे म्हणजे मौन नव्हे तर ज्याच्या अंतरात भगवंताच्या नामाचे चिंतन सुरू आहे आणि अन्य काही बोलण्याची ज्याला आवश्यकता राहत नाही अशी गोष्ट म्हणजे मौन. अशी व्यक्ती केवळ भगवंताचे गुणगान करण्याकरताच बोलते. त्याचीच कथा सांगते.

मौनाचा हा अर्थ साधकांसाठी सांगितला आहे. अनेक लोक आपला स्वार्थ साधण्यासाठी सोयीस्कर मौन धारण करतात. त्या अर्थाने मौन हा शब्द इथे अपेक्षित नाही. “मौनम् सर्वार्थ साधनं” असे एक प्रसिद्ध संस्कृत वचन आहे. मौनाने सर्व काही साध्य होते असा त्याचा अर्थ आहे. जे लोक मौन पाळतात आणि वायफळ बडबड करत नाहीत, अशांच्या वाणीला सामर्थ्य प्राप्त होते. आपण बोलून जे साध्य करू शकत नाही ते मौनाने साध्य होते. अशा वेळी मौन हेच शस्त्र आणि शास्त्र ठरते. सतत बडबड करणाऱ्या लोकांच्या बोलण्याला लोक फारशी किंमत देत नाहीत.

काही अपवादात्मक साधुसंत खरोखरच साधनेसाठी मौन धारण करतात. परंतु बरेचसे साधू मौन तर धारण करतात, परंतु त्यांच्याकडे कोणी आले आणि त्यांना काही विचारले तर ते हातवारे करून बोलतात किंवा आपले म्हणणे पाटीवर लिहून सांगतात. काही साधुसंतांनी मौनाच्या काळात ग्रंथ देखील लिहिल्याचे ऐकण्यात येते. असे मौन खऱ्या अर्थाने पूर्ण मौन म्हणता येणार नाही.

समर्थांनी जनी मौन्यमुद्रा धरावी असे म्हटले आहे. एक वेळ एकांतातील मौन सोपे आहे परंतु भोवती लोकांची गर्दी असताना सोपे नाही. विपश्यना शिबिरात तर खुणेने देखील बोलायचे नसते. अशा ठिकाणी माणसे दहा दिवस कसाबसा धीर धरतात. परंतु एकदा शिबिर संपले की दहा दिवसांची भर काढून घेतात.

जो खरा साधक असतो तो भगवंताच्या चिंतनात अंतर्बाह्य बुडालेला असतो. त्यामुळे त्याला इतर अनावश्यक बडबड करण्याची आवश्यकता भासत नाही. तो जेव्हा बोलतो तेव्हा आपल्या वाणीने भगवंताच्या गुणांचे वर्णन करतो, भगवंताचे कीर्तन करतो.

जेथे त्याला सुखाने राहून भगवंताचे गुणगान करता येते असे ठिकाण म्हणजे त्याच्या दृष्टीने स्वर्ग. परंतु अशीही काही ठिकाणी असतात की जेथे भगवंताचे चिंतन नामस्मरण केलेले आवडत नाही. भगवंताला न मानणारी माणसे अशा ठिकाणी राहतात. अशा ठिकाणी खऱ्या भक्ताला राहणे कठीण होते. अशा ठिकाणी त्याचा आणि भगवंताचा देखील अवमान होतो. म्हणून ज्या ठिकाणी भगवंताचा अनादर होतो आहे, निंदा होते आहे असे दिसले तर ते ठिकाण तत्काळ सोडावे.

अशाप्रसंगी वनात जाऊन देखील राहण्यास हरकत नाही तेथे सुखाने भगवंताचे नाम घेता येते त्याच्या स्मरणात राहता येते संत तुकाराम महाराज म्हणतात, ” येणे सुखे रुचे एकांताचा वास, नाही गुणदोष अंगा येत. आकाश मंडप, पृथ्वी आसन, रमे तेथे मन क्रीडा करी. ” साधकाला मग अशा एकांतातील सुख अनुभवता येते कुठलाही व्यत्यय न येता परमेश्वराचे नामस्मरण घडते. परमेश्वराच्या चिंतनासाठी अनेक संतांनी जनामध्ये राहणे सोडून वनामध्ये निवास केला त्याचे कारण हेच आहे.

सध्या काळ बदलला आहे. हल्ली समर्थांच्या सांगण्याप्रमाणे वनात जाऊन निवास करणे सर्वसामान्य माणसांसाठी सोपे नाही. हल्ली रोजच्या व्यवहारात शांतता मिळणे कठीण झाले आहे. तीर्थस्थानांना देखील बाजारू स्वरूप प्राप्त झाले आहे. जिथे सुखाने भगवंत चिंतन करता येईल अशा जागा मिळणे कठीण झाले आहे. अशा वेळी आरण्य सेवन याचा अर्थ एकांत सेवन असा घ्यायला हरकत नाही. ज्या ठिकाणी सुखाने आपल्याला हरीचे नाम घेता येईल असे ठिकाण म्हणजे अरण्यच असे म्हटले तर हरकत नाही.

स्वसंवाद :: 

१) माझ्या बोलण्यात किती वेळ भगवंताचे गुणगान असते आणि किती वेळ निरर्थक गोष्टी असतात ?

२) मला भगवंत चिंतनासाठी मौन आवश्यक आहे ही गोष्ट पटते का ?

३) ज्या ठिकाणी भगवंताचा अनादर होतो अशा ठिकाणी राहणे मला जड जाते का, की मी त्याशी तडजोड करतो ?

४) माझ्या दैनंदिन जीवनात “आरण्य” म्हणजे एकांताची जागा कोणती आहे आणि मी ती नियमितपणे वापरतो का ? 

– क्रमशः श्लोक ४३ आणि ४४. 

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२२ ☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख वर्तमान : सुंदरतम उपहार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – सन्नाटा जब मन में पसरने लगे / स्वर- डॉ. निशा आग्रवाल, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२२ ☆

☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘अतीत लैसन है, वर्तमान गिफ़्ट और भविष्य मोटिवेशन’…इस वाक्य में ज़िंदगी का यथार्थ अथवा प्रयोजन निहित है। अतीत हमें शिक्षा देता है; पाठ पढ़ाता है; अच्छे-बुरे की पहचान कराता है। सो! अतीत से लगाव मत रखिए … उसकी स्मृतियों को अपने ज़हन से निकाल बाहर फेंकिए, क्योंकि वे आपके विकास में बाधक-अवरोधक  होती हैं… आपको पथ-विचलित करती हैं। हां! अतीत में झांकिए, परंतु उसमें लिप्त मत रहिए… जो अच्छा है, उसे ग्रहण कीजिए; संजोकर रखिए और जो बुरा है, उसे सदैव के लिए त्याग दीजिए। अतीत अर्थात् जो गुज़र गया, कभी लौटकर नहीं आता…फिर उसके लिए शोक क्यों?

आज गिफ़्ट है, उपहार है…उसकी महत्ता समझिए, उसका सम्मान कीजिए और उसे प्राप्त कर खुशी का इज़हार कीजिए…जो भी आपको वर्तमान में मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ अभिवादन-अभिनंदन कीजिए… उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए और मासूम बच्चे की भांति निरीह-निश्छल भाव से प्रसन्नता प्रकट कीजिए। वास्तव में वर्तमान ही सत्य है, क्योंकि अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अर्थात् कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस! यही एक पल है। आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने न तू’ इस भाव को सार्थक करती हैं यह पंक्तियां… आज की अथवा वर्तमान की उपादेयता पर  प्रकाश डालती हैं। बुद्धिमान लोग आज में अर्थात् वर्तमान में जीते हैं; समय की महत्ता को स्वीकारते हैं और एक भी पल व्यर्थ नहीं जाने देते। चारवॉक दर्शन भी ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ सिद्धांत का पक्षधर है, संदेश-वाहक है और प्रयोगवाद व नयी कविता का क्षणवादिता का दृष्टिकोण भी हर पल को खुशी से जीने व भोग लेने की सीख देता है, क्योंकि वे नहीं जानते कि अगला पल आएगा या नहीं…यह शाश्वत सत्य है; अनास्था की पराकाष्ठा है। हमारे ऋषि- मुनियों ने वर्तमान की सार्थकता दर्शाते हुए, हर पल को अंतिम स्वीकार, कर्मनिष्ठता का संदेश दिया है। संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सो! वर्तमान में जीना सीखिए, यही ज़िंदगी का सार है।

भविष्य प्रेरणा है; अनिश्चित है, परंतु वह हमारा प्रेरक है…जिससे तात्पर्य है कि मानव को जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और यह जानने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘वह कौन है और उसका संसार में आने का क्या प्रयोजन है? उसका लक्ष्य क्या है? लक्ष्य निर्धारण के पश्चात् ही आप उस लीक पर चल सकते हैं अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति में स्वयं को जी-जान से जुटा सकते हैं। इसके लिए हमारे पूजनीय माता-पिता, गुरु-जन व धार्मिक ग्रंथ ही हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। सो! इनके प्रति श्रद्धा भाव रखना अपेक्षित है। परंतु आजकल तो यह ‘दूर के ढोल सुहावने’ वाली बातें मात्र जुमले बन कर रह गयी हैं। पहले वे हमारे आदर्श होते थे और हम उनके व्यक्तित्व को देख स्वयं को उसी रूप में ढालने में प्रयासरत रहते थे।

परंतु आजकल तो जीवन-मूल्य दरक़ रहे हैं…उनका निरंतर पतन हो रहा है। सो! ‘यथा राजा तथा प्रजा’ अर्थात् चारों ओर अराजकता का वातावरण छाया हुआ है। सो! किसी से आस्था व विश्वास की अपेक्षा करना व्यर्थ है, निष्फल है, निष्प्रयोजन है। हिंसा, लूटपाट व अनाचार, अनास्था व भ्रष्टाचार के वातावरण में, जहां इंसान किसी भी कीमत पर अधिकाधिक धन कमाना चाहता है; वहीं उसके हृदय से स्नेह, प्रेम व सौहार्द के भाव नदारद होते जा रहे हैं। वह रिश्तों की अहमियत को नकार, परिवार की खुशियों को अपने हाथों बेदर्दी से रौंद डालता है और दूर… बहुत दूर निकल जाता है, जहां उसे अपने सभी बेग़ाने नज़र आते हैं। इस मन:स्थिति में वह केवल धन की महत्ता को सर्वोपरि मानता है और अपने परिवारजनों और परिजनों की अहमियत व अपेक्षा-आवश्यकता नहीं महसूसता।

धन-संपदा हमेशा साथ नहीं देती। लक्ष्मी स्वभाव से चंचल है… ‘आज यहां, कल वहां।’ सो! एक लंबे अंतराल के पश्चात् उसे अपने आत्मजों की याद आती है, जिन्हें समय की आंधी बहा कर बहुत दूर ले जा चुकी होती है। अब वे उसे लेशमात्र अहमियत भी नहीं देते और वह एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाता है। समय नदी की भांति सदैव बहता रहता है, कभी रुकता नहीं। इसलिए मानव को समय के महत्व व अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त करता व सचेत रहता है तथा उस ग़लती को नहीं दोहराता… ग़लत राह का अनुसरण भी नहीं करता। भविष्य हमें प्रेरणा देता है। सो! लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होना श्रेयस्कर है… जिसके लिए दरक़ार है… आत्मविश्वास व दृढ़ निश्चय की। हां! रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पांव रख कर आगे बढ़ना ही … हमारे धैर्य की  परीक्षा है।

अब्दुल कलाम जी इसलिए ‘खुली आंखों से  सपने देखने की बात कहते हैं,  बंद आंखों से नहीं।’ आप स्वयं को परिश्रम की भट्ठी में झोंक डालिए…अच्छे- बुरे का ध्यान रखते हुए, स्व-पर, राग-द्वेष व लाभ- हानि से ऊपर उठ जाइए…यही सफलता की कसौटी है। दूसरे शब्दों में संसार में आप व्यक्ति नहीं,व्यक्तित्व बन कर जिएं, क्योंकि व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, व्यक्तित्व की  नहीं…वह अपने आदर्शों के रूप में सदैव ज़िंदा रहता है। परंतु यह तभी संभव है, जब हमारा लक्ष्य सामान्य मानव की तरह जीने का न हो अर्थात् संसार के समस्त प्राणी-जगत् में खाना-पीना सोना व सृष्टि-संवर्द्धन में सहयोग देना–तो सामान्य क्रियाएं हैं; परंतु मानव को प्रदत्त सोचने-समझने की शक्ति उसे  श्रेष्ठता प्रदान करती है। मानव का मस्तिष्क अर्थात् बुद्धि उसे शेष प्राणी-जगत् से अलग स्वरूप प्रदान करती है,  जिसके बल पर वह सृष्टि पर आधिपत्य स्थापित कर, सबको अंगुलियों पर नचा सकता है। परंतु उसकी सकारात्मक सोच उसे ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ बनाने का सामर्थ्य रखती है। व्यक्तित्व अर्थात्  जिस पर दुनिया नाज़ करती है… उसके गुणों की चर्चा समस्त विश्व में होती है…  सब उसके गुणों का अनुसरण करते हैं और वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं… उसका सानिध्य पाकर वे स्वयं को धन्य अथवा सौभाग्यशाली समझते हैं। ऐसा व्यक्ति भले ही दुनिया से रुख्सत हो जाए, परंतु वह मानव-मात्र के हृदय में समाया रहता है, सबके दिलों पर राज्य करता है। इसलिए मानव को व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बनकर जीने का संदेश दिया गया है।

सोना अग्नि में तप कर ही कुंदन बनता है तथा उसकी चमक कीचड़ में गिरने के पश्चात् भी कम नहीं होती। इसलिए मानव का चरित्र भी कुंदन की भांति होना चाहिए, जिस पर आलोचनाएं प्रभावी न हो पाएं। सो! उसे स्थितप्रज्ञ होना चाहिए, जिस पर सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मान-अपमान व निंदा-स्तुति का लेशमात्र भी प्रभाव न हो। शायद! इसीलिए आलोचनाओं को साबुन स्वीकार कर, उनसे अपने अंतर्मन में निहित अहं को धोने अर्थात् त्यागने का संदेश दिया गया है, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए उससे अपने भीतर छुपी दुष्प्रवृत्तियों …काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से मुक्ति पाने का आग्रह किया गया है। इसलिए हमें आलोचकों अर्थात् निंदकों को जीवन में श्रेष्ठ स्थान देना चाहिए तथा सबसे बड़ा हितैषी स्वीकारना चाहिए, क्योंकि वे ही तो अपना सारा समय आपको, आपके दोष-दर्शन कराने में नष्ट करते हैं। वे अपने समय को आपके हित व समुन्नत करने में उपयोग करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन-कुटी छ्वाय’ अर्थात् निंदक को सदैव अपने निकट रखना चाहिए। इस तरह वे आप के विकास के निमित्त सदैव चिंतित रहते हैं और आपको व्यक्ति से व्यक्तित्व बनाने में इनका योगदान श्लाघनीय है, अविस्मरणीय है।

मानव को इन हितैषियों द्वारा सुझाए गए रास्तों का अनुसरण कर, अपने अंतर्मन को निर्मल करना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग बिना साबुन पानी के आप को, दोषों व अवगुणों से अवगत करा कर प्रसन्न होते हैं। वे आपके प्रति ईर्ष्या-भाव नहीं रखते, क्योंकि वे आपके हित-चिंतक होते हैं। वास्तव में मानव को ऐसे लोगों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जो नि:स्वार्थ भाव से स्वयं को सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोत्कृष्ट बनाने में अपने जीवन का अनमोल समय रूपी धन निवेश करते हैं, जिसका लाभ आपको मिल सकता है। यदि आप सजग व सचेत होकर स्वयं में परिवर्तन व सुधार लाएंगे, तो आपकी गणना उत्तम श्रेणी के लोगों में होने लगेगी।

इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं, वे पंक्तियां ‘जो बाहर की सुनता है, उसका बिखरना निश्चित है और जो भीतर की सुनता है, उसका निखरना अर्थात् संवरना निश्चित है, अवश्यंभावी है’…उपरोक्त विचारों की पोषक हैं। सो! आप व्यर्थ की आलोचनाओं से हताश-निराश न हों, बल्कि इनसे प्रेरित होकर स्वयं में सुधार लाएं। हां! लोग तो आपको बातों में उलझा कर आपको पथ-भ्रष्ट करना चाहते हैं। परंतु वही मनुष्य वास्तव में महान् है, जो उनके कटाक्षों व निंदा से विचलित नहीं होकर बिखरता नहीं… बल्कि अपने अंतर्मन की पुकार सुन कर संवर जाता है, निखर जाता है। सो! माया रूपी सांसारिक आंकर्षणों के पीछे न भागें और न ही दूसरों की आलोचना, व्यंग्य- बाण व कटाक्षों से हैरान-परेशान हों, बल्कि उनकी उपेक्षा कर निरंतर आगे बढ़ते जाएं … यही मानव का लक्ष्य है। हमें अपने अतीत से सीख लेकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि वर्तमान ही सत्य है…उसे सुंदर बनाना अत्यंत कारग़र है, क्योंकि जो सुंदर होगा, कल्याणकारी अवश्य होगा। वर्तमान वह उपहार है, जो प्रभु-प्रदत्त है और आप उसे अपनी इच्छानुसार रूप व आकार प्रदान करने में सक्षम हैं, समर्थ हैं।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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