हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९५ ☆ गीत – हँस रहा नीला गगन है… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९५ ☆ 

☆ गीत – हँस रहा नीला गगन है ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

हर तरफ वातावरण में,

एक तीखी-सी चुभन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़ रही मन की तपन है।।

 *

धुंध, कुहरा, तिमिर गहरा,

कर बहाना लोग हँसते।

देर तक जागें निशा में,

अपनी किस्मत आप गढ़ते।

 *

सूर्य-किरणें दिव्य पाकर,

हँस रहा नीला गगन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़  रही मन की तपन है।।

 *

कालिमा भरसक छिपाए,

रात का घनघोर काजल।

खिल रहे हैं पुष्प अगणित,

चाँदनी का ओढ़ आँचल।

 *

दूर छिटकी क्षुब्ध आभा,

बिखरता टूटा सपन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़ रही मन की तपन है।।

 *

गुंजते हैं  भ्रमर, तितली,

मोहते वन बाग उपवन।

विहग गाते गीत खुश हो,

है प्रफुल्लित मुदित जीवन ।

 *

घोलते विष बोल कर के,

योग में किंचित लगन है।

अनमने से हैं व्यथित मन,

बढ़ रही मन की तपन है।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४३ ☆ जय प्रकाश के दोहे – गर्मी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय “जय प्रकाश के दोहे – गर्मी” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४३ ☆ जय प्रकाश के दोहे – गर्मी ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

पाँवों में छाले पड़े, उधड़ रही है खाल

हरियाली के गाँव में, सूखे का भूचाल।

नदी किनारे बैठकर, देख सुलगती रेत

नाव लहर को कोसती, बंजर गाते खेत।

 *

सड़क पिघलती धूप में, पगडंडी के पाँव

पनघट प्यासे रह गए, पेड़ न देते छाँव।

 *

पोंछ पसीना माथ से, बैठा समय किसान

धूप लिए कागज कलम, लिखती रोज मसान।

 *

लू लपटें अख़बार की, ख़बर सनसनीख़ेज़

सूरज पढ़ता रोज़ ही, तपते दस्तावेज़।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४८ ☆ जबसे आया है हुनर ये शाइरी का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “जबसे आया है हुनर ये शाइरी का“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४८ ☆

✍ जबसे आया है हुनर ये शाइरी का… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

आशिक़ी समझी इबादत ख़ुश पयंबर हो गया

बर्फ जैसा इश्क़ के दरिया का आज़र हो गया

 *

जबसे आया है हुनर ये शाइरी का कुछ मुझे

बोलता हिंदी फ़िदा उर्दू पे जी भर हो गया

 *

होती थी वाइज़ की इज्ज़त  ख़ास पहले सच यहाँ

अब गिरा किरदार से तो जेल में घर हो गया

 *

था हवेली जैसा पहले भाइयों  में  जब बँटा

जाल दीवारों का मेरे घर के अंदर हो गया

 *

अब सियासत में शराफ़त का न कोई काम है

जिसको अय्यारी न आई है वो बाहर हो गया

 *

नाम होते जो नदी नाला न बन उफना रहा

अपनी हद में रहके वो दिल से समुंदर हो गया

 *

खैर दुनिया की नहीं इससे बचाये अब ख़ुदा

उस्तरा ले हाथ में हज्जाम बंदर हो गया

 *

देव देवों का नहीं ऐसे ही कहते है सभी

शिव पिया विष खैर-ए-आलम को महेश्वर हो गया

 *

जिसको अंतर है नहीं अपने पराये में कोई

अय अरुण यह मान ले अब वो कलंदर हो गया

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५३ – बीज… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बीज।)

☆ हेमंत साहित्य # ५३ ☆

✍ बीज… ☆ श्री हेमंत तारे  

स्वाभाविक है,

छूट जाये बहुत कुछ

किसी मोड़, किसी पड़ाव पर,

किसी खेल में

कहते हैं जिसे

आपाधापी,

रेलमपेल,

या फिर,

ट्रांसफर- प्रमोशन का जंजाल।

 

फिर अचानक,

फ़ूट पड़ती है

विस्मयकारी लहर की तरह

पीपल की एक कोंपल

फाड़ कर एक दीवार।

 

सहसा,

मरता नहीं है बीज

बस, दब जाता है

किसी दीवार में, किसी भार तले

पर कभी-कभी

कोंपल नहीं, बीज बन जाता है, जीवाश्म

और ऐसे भी करवा देता है

बीज

अपने कभी होने का एहसास।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६२ ☆ कथा-कहानी ☆ सफेद पोश संत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “सफेद पोश संत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६२ ☆

✍ कथा कहानी ☆ सफेद पोश संत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

वे एक कवि व लेखक। पाठ्य पुस्तकों में उनकी कविताएं व लेख आदि पढ़ाए जाते। सबको बहुत अच्छे लगते थे। परंतु सुरेश उनके लेखन से बहुत प्रभावित था। उनके दर्शन पाने व उनके सानिध्य की बहुत इच्छा थी उसकी। सुरेश चाहता था उनकी तरह लेखक बने, परंतु बारहवीं में उत्तीर्ण न हो पाया। उसकी पढाई रुक गई। उसके भाई भी थोड़े निराश हुए क्योंकि वे उसे डॉक्टर बनाना चाहत रखते थे। इसीलिए फिजिक्स केमिस्ट्री और बायोलॉजी दिलाई थी आर्थिक स्थिति आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दे रही थी। बारहवीं में अच्छे् अंक आ जाते तो वजीफा वगैरह का सोचा जाता। इसलिए सोचा गया कि सुरेश नौकरी विशेष कर सरकारी नौकरी पाने के लिए कोशिश करे। उसने टाइपिंग व शार्टहैंड सीखना शुरू कर दिया क्योंकि उन दिनों सरकारी नौकरी के लिए टाइपिंग आना जरूरी था। कुछ महीने बाद उसे एक ट्रस्ट कार्यालय में स्टेनो टाइपिस्ट के पद पर जॉब मिल गया।

सुरेश बहुत परिश्रमी था। जो भी काम दिया जाता वह पूरे मनोयोग से पूरा करता। जिस ट्रस्ट कार्यालय में सुरेश को जॉब मिला था उसका काम ट्रस्ट के संयुक्त सचिव और मैनेजर देखते थे। ट्रस्ट के ट्रस्टी बहुत बड़े बड़े लोग थे और ज्यादातर दिल्ली में रहते थे। ट्रस्ट की वार्षिक बैठक में ही सब आते थे।

ट्रस्ट की वार्षिक बैठक होने वाली थी तो सुरेश का काम बहुत बढ़ गया था। उसी समय उसने ट्रस्टियों की सूची देखी। तब उसे पता चला कि वियोगी जी ट्रस्ट के सचिव थे। वियोगी जी का सुरेश शुरू से ही प्रशंसक था। उसने मैनेजर साहब से अनुरोध किया कि किसी भी तरह उसे वियोगी जी से मिलवा दें। मैनेजर साहब ने कहा कि मुश्किल है फिर भी कोशिश करेंगे। बैठक वाले कक्ष में किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। कक्ष में जाते हुए उसने सबको देखा। वियोगी जी सफेद खादी के कुर्ते और धोती में अलग ही दिखते थे। बैठक चलती रही और मैनेजर साहब के साथ एकाउंटेंट, सुरेश व अन्य स्टाफ बाहर खड़े रहे। लंच के बाद सभी ट्रस्टी निकले और गाड़ी में बैठ कर अतिथि गृह चले गए। सुरेश वियोगी जी को प्रणाम भी नहीं कर पाया, इस बात का बहुत अफसोस था।

लेकिन उसका नसीब अच्छा था। वियोगी जी ने अपना एक पत्र टाइप करने के लिए बुलाया था। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पर मन में डर भी बना हुआ था कि कहीं टाइप करने में गलती न हो जाए। आखिरकार सुरेश वियोगी जी के कक्ष में गया और चरण स्पर्श किए। उन्होंने हाथ से लिखा पत्र दिया और साथ ही अपना लैटरपैड। पत्र टाइप करके वह वियोगी जी के पास आया तो टाइपिंग देखकर वे काफी खुश हुए और आशीर्वाद दिया। सुरेश ने कमरे से निकलते समय उन्हें पत्र लिखने की अनुमति ले ली। कमरे में उसने एक महिला को भी देखा तो उन्हें भी प्रणाम किया। वह समझा कि उनकी धर्मपत्नी होंगी।

दो तीन महीने बाद सुरेश ने वियोगी जी को पत्र लिखा कि वह कबीर को समझना चाहता है। साथ ही माता जी को भी प्रणाम लिख दिया। वियोगी जी का उत्तर आया कि कबीर साहब को समझने के लिए सत्यरूप परमेश्वर की उपासना करो। साथ ही उन्होंने लिखा कि तुमने माता जी किसके लिए लिखा, मेरे साथ मेरी गोद ली बेटी थी जो मेरी बहू भी है। मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूँ। सफेद पोश में संत हूँ। उनके बारे में पूरी जानकारी न होने के कारण सुरेश को अंदर ही अंदर दुख हुआ।

समाचार मिला कि वियोगी जी आने वाले हैं , यह जानकर सुरेश बहुत खुश हो गया। सुरेश से कहा गया कि जब वियोगी जी आ जाएँ तो अतिथि गृह में उनके कमरे में टाइपराइटर लेकर जाए और दिन भर वहीं काम करे। सुरेश ने उनकी दो पुस्तकें टाइप कीं। टाइप करते समय उन पुस्तकों का आनंद भी लेता रहा।

दोनों पुस्तकें टाइप हो गई और सुरेश ने टाइप किए हुए कागज सौंपे तो वियोगी जी ने दस रुपए दिए और कहा जाकर दूध पी लेना। सुरेश ने उनसे विनम्र शब्दों में कहा – “मैं यहाँ नौकरी करता हूँ वेतन लेता हूँ तो आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ”। उन्होंने उसके गाल पर हल्की सी चपत लगाई और कहा -“मेरा कहना नहीं मानोगे। ” सुरेश निरुत्तर हो गया और पैसे रख लिए। इतना प्यार इतने बड़े लेखक कवि से मिलना उसके लिए एक उपलब्धि ही थी।

वियोगी जी दिल्ली चले गए पर सुरेश को अंदर से बदल गए। उसके सोचने का ढंग बदल गया। कविता कहानी लिखने लगा। अपने अंदर इतना बदलाव महसूस करने लगा कि शब्दों में बताया नहीं जा सकता। वह स्वत: स्फूर्त बड़ों को चरण स्पर्श कर अभिवादन करने लगा, जाति की अवधारणा समाप्त हो गई। बड़े बड़े आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ने लगा। साहित्यिक पत्रिकाएँ पढ़ने लगा। यह परिवर्तन उसके जीवन में स्थाई हो गया। जबकि घर और उसके आसपास ऐसा कोई माहौल नहीं था। बुढ़ापे में भी वियोगी जी की छवि अचानक उजागर हो जाती है और सुरेश दनक उठता है। उनकी वह बात कभी नहीं भूलता कि कबीर साहब को समझना है तो सत्यरूप परमेश्वर की उपासना करो।

एक और वजह है। एक वरिष्ठ साथी की बेटी को वनस्थली विद्यापीठ में प्रवेश दिलाना था क्योंकि अंक कुछ कम थे और ट्रस्टी अनुशंसा करें तो प्रवेश मिल सकता था। वियोगी जी ट्रस्टी थे यह सुरेश जानता था पर बिना मिले बहुत वर्ष हो गए थे, पता नहीं उन्हें याद भी होगा या नहीं। वरिष्ठ साथी के बार बार अनुरोध करने पर सुरेश दिल्ली गया और वियोगी जी के निवास पर पहुंच गया। अंदर एक स्लिप पर अपना नाम लिखकर भेजा तो वे अंदर से बोलते हुए आए कि सुरेश मेरा बेटा और अपने सब नाती पोतों को बुला लिया। सुरेश जानता था कि सफेद पोशाक में बाल ब्रह्मचारी संत हैं। एक बार बताया भी था कि उन्होंने एक हरिजन कन्या को गोद लिया और अपने परिवार के युवा से विवाह कराया और अपने पास ही रखा। वे बच्चे उन्हीं की संतान थे। जाति व्यवस्था को समाप्त करने के लिए उनका यह कदम अतुलनीय था। सब देखकर सुरेश की आंखें भर आईं। जब सुरेश ने अपने आने का कारण बताया तो उन्होंने अपना लैटरपैड उसको दे दिया और कहा कि जो चाहो लिख लो मैं हस्ताक्षर कर दूंगा क्योंकि 85 का हो गया हूँ, अब लिख नहीं पाता। ऐसे सुनामधन्य हिंदी साहित्य में अपना विशेष स्थान रखने वाले वियोगी जी को सुरेश आज भी हृदय में संजोए रखता है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – बोझिल रिश्ता।)

☆ लघुकथा # १११ – बोझिल रिश्ता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

रोमा और अरुण दोनों एक बड़ी नेशनल कंपनी में नौकरी करते थे। अनिल की मां का देहांत बचपन में ही हो गया था, मौसी ने ही पालपोस के बड़ा किया। पिताजी मर्चेंट नेवी में थे इसलिए अक्सर उन्हें बाहर ही रहना पड़ता था। मौसी ने ही मां पिताजी का प्यार दिया। मौसी बहुत ही धार्मिक एवं कम पढ़ी-लिखी महिला थी। अरुण ने अपनी मरजी से शादी की थी। रोमा भी उसके साथ काम करती थी और दोनों ने साथ में पढ़ाई भी की थी। मौसी के कारण ही दोनों की शादी हुई।वैसे तो मौसी शादी के सख्त खिलाफ थी।

शीशे के सामने बैठकर रोमा इसी विचार में खोई थी कि आज मौसी आ रही है, जाने अब क्या कहेगी?

उसके साथ तो 1 घंटे रहना भी मुश्किल है मैं कैसे रहूंगी?

तभी अचानक घंटी बजती है वह उठकर दरवाजा खोलती है-  “मौसी जी प्रणाम।”

“खुश रहो तुम। रोमा कुछ खाना भी बना कर रखा है पहले एक कप चाय पिला दो।”

“आप खाना खुद बना लेती हो” कमला मौसी ने कहा।

“अनिल को तो मैंने खाना बनाना सिखाया है। अनिल बनाता है या नौकर। तुम तो कुछ नहीं करती होगी?”

“मौसी जी आप मेरे हाथ की चाय पीजिए” रोमा ने कहा।

“चाय पीकर तुम दोनों तैयार हो जाओ आज तुम्हें एक शादी के कार्यक्रम में लेकर चलती हूं देखो हमारे यहां शादियां कैसी होती हैं?”

“मौसी जी जब आपको खाना नहीं खाना था तो हमसे क्यों खाना बनवा कर रखा” रोमा ने कहा।

“तो क्या हो गया” कमला मौसी ने कहा।

“यहां पर मैं अपनी सहेली के पोते की शादी में आई हूं तुम दोनों भी वहां चलो।”

रोमा ने कहा “मौसी मैं तो चलूंगी लेकिन क्या करूंगी वहां जाकर?”

कमला मौसी ने कहा “तू ठीक कह रही है अनिल मेरे साथ चलेगा तेरे बच्चे नहीं है इसलिए जाना अच्छा नहीं लगेगा।”

“मौसी यह कैसी बात कर रही हो” अनिल ने कहा।

“मैं कौन सा गलत बात कह रही हूं” कमला ने कहा “7 साल हो गए हैं कोई बच्चे नहीं है तुम्हारे।”

“तू ही यह रिश्ता ढो रहा है यदि मेरी सगी बहन होती तो उसकी बात तो मानता ना।”

रोमा की आंखों से आंसू निकलने लग गए और वह अंदर चली गई।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३११ ☆ पानगळ… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३११ ?

पानगळ ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

आता सुरुच झाली ऐकलेली पानगळ

कित्येक दिवसांची रोखलेली पानगळ

 *

हिर्वा ऋतू आला अंगणाच्या आतही

दिसली जरा उशिरा सांडलेली पानगळ

 *

 तो एकटा तीही एकटी या जीवनी

कोणास सांगे हे बेतलेली पानगळ

 *

 होतास तू तेव्हा कोणत्या रूपात रे

देवा तुझ्या दारी योजलेली पानगळ

 *

पानगळ होताना सावल्यांनो शांत व्हा

पाहून घ्या आता झोपलेली पानगळ

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४५ – बुन्देली कविता – ”सजनइ होन लगी गुड़ियों की” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४५ ☆

☆  बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सजनइ होन लगी गुड़ियों की

गुँथन लगी माला गुरियों की

जे नन्हे नटखट कम नइयाँ

नकल करत बुढ़वा-बुढ़ियों की

 *

साहुन में सज गईं दुकानें

छला – फूँदरा उर चुरियों की

 *

होत बाम्हनों में कइ पातें

दुबे, तिवारी, चनपुरियों की

 *

ऐंसी भइ बरसात हनक कै

धार न टूटन दइ उरियों की

 *

रंग-बिरंगे फूल झरे हैं

जेजम बिछ गइ पंखुरियों की

 *

भगवतचुगली सें घर फोरत

कमी नोंइ विष की पुड़ियों की

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०० ☆ “साफ़ – सुथरा”  – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  साफ़ – सुथरा…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०० ☆

☆ “साफ़ – सुथरा  – लेखक… श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति : लघुकथा संग्रह साफ सुथरा

लेखक :सुरेश पटवा

प्रकाशक : मंजुल पब्लिकेशन भोपाल

मूल्य : 399 रु

समकालीन विसंगतियों के बीच एक ‘साफ़-सुथरा’ हस्तक्षेप  – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लघुकथा समकालीन साहित्य की एक ऐसी सशक्त विधा है, जो सीमित शब्दों में जीवन के अनगिन पहलुओं को छूने की सामर्थ्य रखती है। इसी विधा की गरिमा को केंद्र में रखते हुए सुरेश पटवा का नवीन लघुकथा-संग्रह ‘साफ़-सुथरा’ (मंजुल पब्लिकेशन, भोपाल) सामने आया है। यह संग्रह न केवल विधागत अनुशासन को बनाए रखता है, बल्कि समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय विमर्श को नई दिशा भी प्रदान करता है। संग्रह की विविध लघुकथाएँ सामाजिक सरोकारों, धार्मिक विडंबनाओं और मानवीय अंतर्द्वंद्वों की गहरी पड़ताल करती हैं, जिनसे लेखक की वैचारिक सघनता स्पष्ट रूप से उजागर होती है।

संग्रह की कथाभूमि अत्यंत व्यापक है। जहाँ एक ओर ‘तीन-तलाक’ जैसी कथा मुस्लिम समाज में व्याप्त धार्मिक पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्री के पक्ष में मज़बूती से खड़ी होती है, वहीं ‘सौम्या का ख़्वाब’ शहरी मध्यवर्गीय मानसिकता की सूक्ष्म व्याख्या करती है। लेखक यहाँ मनोवैज्ञानिक गहराई से स्पष्ट करता है कि वास्तविक संघर्ष सपनों को देखने में नहीं, बल्कि उन्हें हर हाल में ज़िंदा रखने में है। राजनीति के क्षेत्र में सामाजिक रूप से हाशिये पर पड़ी अस्मिताओं, जैसे ट्रांसजेंडर समुदाय के उभार को ‘काँटे की टक्कर’ में बखूबी चित्रित किया गया है, जो हमारे लोकतंत्र की रूढ़ियों पर एक तीखा कटाक्ष है।

सुरेश पटवा के लेखन में दार्शनिकता और व्यंग्य का अनूठा संगम है। ‘भगवान’ जैसी कथा बच्चों के भोले प्रश्नों के माध्यम से ईश्वर की संकल्पना को संवेदनात्मक रूप में प्रस्तुत करती है, तो ‘लालच पर काबू’ आत्मनिरीक्षण के जरिए मनुष्यता की कसौटी को परिभाषित करती है। लोककथा की पुनर्रचना करती ‘राजा का परिधान’ आज के राजनेताओं के मिथ्याचार और चाटुकारिता पर प्रहार करती है, जहाँ सत्य कहने के लिए एक बच्चे जैसा निष्कलुष साहस अनिवार्य बताया गया है।

साहित्यिक जगत की विसंगतियों पर भी लेखक की दृष्टि पैनी रही है। ‘लंच का समय’ और ‘छपास सम्मान सुख में सेंध’ जैसी कथाएँ साहित्यिक आयोजनों के बौद्धिक दिखावे, खोखली आत्ममुग्धता और सम्मानों के पीछे छिपे सांस्कृतिक संकट को उजागर करती हैं। इसके विपरीत, ‘सच्चा हिंदुस्तानी’ जैसी रचनाएँ भारत की साझी संस्कृति और सहिष्णुता की पक्षधर बनकर उभरती हैं, जो यह संदेश देती हैं कि सच्ची राष्ट्रभक्ति धार्मिक कट्टरता से नहीं बल्कि मनुष्यता से शुरू होती है।

संग्रह की शीर्षक कथा ‘साफ़-सुथरा’ प्रतीकात्मकता के सहारे बाहरी स्वच्छता बनाम नैतिक गंदगी पर गहरा प्रश्न खड़ा करती है। यह कहानी अंतरात्मा की शुचिता को सर्वोपरि मानती है। अंततः, सुरेश पटवा का यह लेखन एक जागरूक दृष्टा का लेखन है, जो हास्य-व्यंग्य और तर्क की त्रयी से एक सशक्त सामाजिक आलोचना निर्मित करता है। यह संग्रह सिद्ध करता है कि लघुकथा केवल क्षणिक प्रभाव नहीं, बल्कि एक गहन विचार का बीज है, जो पाठक के मन में लंबे समय तक अंकुरित होता रहता है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१८ – मनोज के दोहे ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है  “मनोज के दोहे। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१८ – मनोज के दोहे ☆

प्रफुल्लित डाल पर आरी को चलाता वह ।

सभी के मन  में सदा लालच जगाता वह।।

 *

वृक्षों का काम, छाया और फल को देना।

कर्तव्य के भाव हर पल में बताता वह।।

 *

इंसानियत के मापदंडों को भुलाकर।

अपनी उंगलियों में सबको नचाता वह।।

 *

बढ़ रहे हैं धरा पर सब अपनी ही डगर।

ले उड़ा आकाश में सपने दिखाता वह।।

 *

कुछ के मन की चाहना तो है बड़ी विचित्र।

कंधे में गन को रख, खुद को रिझाता वह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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