(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में अवश्य मिली है किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय लघुकथा ‘माँ आज भी गाती है !‘। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # १६६ ☆
☆ लघुकथा – माँ आज भी गाती है ! ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆
माँ बहुत अच्छा गाती है, अपने समय की रेडियो कलाकार भी रही है। पुरानी फिल्मों के गाने तो उसे बहुत पसंद हैं। भावुक होने के कारण हर गाने को इतना दिल से गाती कि कई बार गाते-गाते गला भर आता और आवाज भर्राने लगती। तब आँसुओं और लाल हुई नाक को धोती के पल्लू से पोंछकर हँसती हुई कहती- अब नहीं गाया जाएगा बेटा! दिल को छू जाते हैं गाने के कुछ बोल!
‘तुझे सूरज कहूँ या चंदा, तुझे दीप कहूँ या तारा’, ‘ऐ मेरे प्यारे वतन, ए मेरे उजड़े चमन’ जैसे गाने माँ हमेशा गुनगुनाती रहती थी। वह ब्रजप्रदेश की है इसलिए वहाँ के लोकगीत तो बहुत ही मीठे और जोशीले स्वर में गाती है। लंगुरिया, होरी और गाली (गीत) गाते समय उसका चेहरा देखने लायक होता था। माँ गोरी है और सुंदर भी, गाते समय चेहरा लाल हो जाता। लोकगीतों के साथ-साथ थोड़ी हँसी-ठिठोली तो ब्रजप्रदेश की पहचान है, वह भला उसे कैसे छोड़ती? जैसा लोकगीत हो, वैसे भाव उसके चेहरे पर दिखाई देने लगते।
हम अपने समधी को गारी न दैबे,
हमरे समधी का मुखड़ा छोटा,
मिर्जापुर का जैसा लोटा….
लोटा कहते-कहते तो माँ हँस- हँसकर लोटपोट हो जाती। ढ़ोलक की थाप इस गारी (गीत) में और रस भर देती थी।
उम्र के साथ माँ धीरे-धीरे कमजोर होने लगी है। कुछ कम दिखाई देने लगा है, थोड़ा भूलने लगी है लेकिन अब भी गाने का उतना ही शौक और आवाज में उतनी ही मिठास। हाँ पहले जैसा जोश अब नहीं दिखता। अक्सर माँ फोन पर मुझसे कहती – ‘बेटा ! संगीत मन को बडी तसल्ली देता है। कभी-कभार अपने को बहलाने के लिए भी गाना चाहिए। जीना तो है ही, तो खुश रहकर क्यों ना जिया जाए। इस जिंदादिल माँ की आवाज में उदासी मुझे फोन पर अब महसूस होने लगी थी
वह अपने दोनों बेटों के पास है। बहुएँ भी आ गयी हैं, अपने-अपने स्वभाव की। पिता जब तक जिंदा थे माँ अपना सुख-दुख उनसे बाँट लेती थी। उनकी मृत्यु के बाद वह बिल्कुल अकेली पड़ गयी। ‘नाम करेगा रौशन जग में मेरा राज-दुलारा’ गा-गाकर जिन बेटों को पाल-पोसकर बड़ा किया, उनकी बुराई करे भी तो कैसे? पर वह यह समझने लगी कि अब बेटों को उसकी जरूरत नहीं रही।
माँ उदास होती है तो छत पर बैठकर पुराने गाने गाती है। एक दिन माँ छत पर अकेली बैठी बड़ी तन्मयता से गा रही थी- ‘भगवान! दो घड़ी जरा इन्सान बन के देख, धरती पर चार दिन मेरा मेहमान बन के देख तुझको नहीं पता कोई कितना…’
‘निराश’ शब्द आँसुओं में डूब गया। गीत के बोल टूटकर बिखर रहे थे, या माँ का दिल, पता नहीं।
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “पितरों की स्मृति में…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # ३०० ☆
☆पितरों की स्मृति में… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆
पितृपक्ष चल रहा है। क्वार का यह समय आश्विन मास के नाम से भी जाना जाता है। वर्षा ऋतु की हरियाली अभी धरती पर बनी हुई है और पेड़-पौधे नई ऊर्जा से भरे दिखाई देते हैं। ऐसे समय में यदि हम अपने पूर्वजों की स्मृति को किसी जीवंत रूप से जोड़ना चाहें, तो एक पौधा लगाना और उसकी सेवा करना कितना सुंदर संकल्प हो सकता है।
हमारी भारतीय परंपरा में वृक्षों को केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं माना गया, बल्कि उन्हें देवतुल्य सम्मान दिया गया है। पीपल और बरगद जैसे वृक्षों की पूजा और उनकी सेवा की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इन वृक्षों के नीचे बैठना, उन्हें जल अर्पित करना और उनकी छाया में कुछ समय बिताना हमारे जीवन में प्रकृति के प्रति श्रद्धा का भाव जगाता है।
पितृपक्ष में हम अपने पूर्वजों को स्मरण करते हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनके दिए संस्कारों को आगे बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। ऐसे में उनके नाम से लगाया गया एक पौधा उस स्मृति को जीवंत रखने का माध्यम बन सकता है। पौधा छोटा होगा, लेकिन उसके साथ जुड़ा भाव बहुत बड़ा—आज हम उसे सींचेंगे, कल वह छाया देगा, फूल देगा, फल देगा और आने वाली पीढ़ियों को जीवन देगा।
शायद यही पूर्वजों को सच्ची श्रद्धांजलि भी है—उनकी स्मृति में ऐसा जीवन रोपना, जो हमारे बाद भी चलता रहे।
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जिनसे जीवन चलता जाता, उनका शुभ आशीष रहे।
दीप जलाएं प्रेमभाव से, मंगलमय हर ईश रहे।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चल जाएँ, संस्कारों के साथ रहे।
उनके चरणों में श्रद्धा से, झुकता नित प्रति माथ रहे।।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे ” ।)
वे भी हमारे जैसे ही इंसान हैं। वही दो आँखें, दो कान, दो हाथ-पैर और सबसे बढ़कर वही दिमाग। हार्डवेयर में कोई खास फर्क नहीं।
फर्क केवल सॉफ्टवेयर का है।
दुनिया भर के बच्चों को बचपन में दिमाग में कहानियाँ, कविताएँ, संस्कार और सवाल अपलोड किए जाते हैं।
पर कहीं-कहीं सवाल पूछने की जगह जवाब पहले ही इंस्टॉल कर दिए जाते हैं। फिर रोज पाँच बार उसका अपडेट होता है। कभी पैकेज में नफरत होती है, कभी श्रेष्ठता का भ्रम, कभी दूसरे को मिटा देने का अंधा जुनून।
कमाल यह है कि सॉफ्टवेयर पुराना होता जाता है और उसे ‘अपडेटेड विचार’ बताया जाता रहता है!
पीढ़ियाँ कन्फ्यूज्ड हैं।
नतीजा सामने है।
इंसान आधुनिक हो गया, तकनीक अत्याधुनिक हो गई, हथियार स्मार्ट हो गए ,लेकिन सोच का ऑपरेटिंग सिस्टम अब भी पिछली कई सदियों में अटका हुआ है।
फिर हम आतंकवाद को देखकर पूछते हैं, ये लोग ऐसे क्यों हैं?
सवाल थोड़ा बदलकर पूछिए, इनके भीतर ऐसा बनने की प्रोग्रामिंग किसने की?
हवाई जहाज हाईजैक करने वाले दिखाई देते हैं।बम बनाने वाला हाथ दिखाई देता है, कोड लिखने वाला दिमाग दिखाई नहीं देता।
आतंकवादी दिखाई देता है, आतंक की मैन्युफैक्चरिंग फैक्टरी दिखाई नहीं देती।
इसलिए यदि दुनिया से आतंकवाद मिटाना है तो केवल सुरक्षा घेरा कुछ नहीं कर सकता।ट्रिगर पर उँगली रोकना पर्याप्त नहीं होगा। उँगली से पहले दिमाग तक पहुँचना होगा।
सॉफ्टवेयर बदलना होगा।
और यह काम किसी बाहरी इंजीनियर से नहीं होगा। जिसे बचपन से कोई विचार हर दिन समझाया गया है, उसे ही यह शिक्षा बदलने की असली जिम्मेदारी, उसी समाज को उठानी होगी, जिसने वह विचार डाला है।
जो लोग दुनिया बदलने निकले थे, उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि दुनिया बदलने से पहले अपने भीतर का वायरस निकालना जरूरी है।
वे दूसरों को मिटाने निकले और धीरे-धीरे अपने ही समाज की शांति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और भविष्य को मिटाने लगे।
नफरत की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह जिस घर से निकलती है, लौटकर उसी घर की खिड़कियाँ तोड़ती है।
एक दिन शायद उन्हें भी समझ आएगा कि आतंक का कारोबार पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने वाला है।
क्योंकि गोली यह नहीं पूछती कि सामने वाला शरीर किसका है।
बम यह नहीं देखता कि मलबे में कौन-सा धर्म दबा है।
आग को पासपोर्ट पढ़ना नहीं आता।
और मौत किसी विचारधारा की सदस्य नहीं होती।
इसलिए लड़ाई किसी धर्म, जाति या देश से नहीं, उस खतरनाक सॉफ्टवेयर से है जो इंसान को इंसान से नफरत करना सिखाता है।
हार्डवेयर वही रहेगा।
प्रोग्राम बदलना होगा।
और शायद बदलाव की सबसे बड़ी मजबूरी भी वहीं से आएगी, जब उन्हें दिखाई देने लगेगा कि जिस नफरत को वे दूसरों के लिए डाउनलोड कर रहे थे, उसका वायरस उनके अपने घरों में फैल चुका है। पर्दे के भीतर घुटन है।
“गलती उनकी कतई नहीं है।” आत्मघाती हौसला बिरला होता है।
यह जज़्बा इंसानी बेहतरी के लिए अपडेट किया जाए तो यह इतिहास का सबसे बड़ा अपडेट होगा ।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जीका हिन्दी बाल -साहित्य एवं हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 ₹51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य” के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्रीराजकुमार जैन ‘राजन’जी द्वारा लिखित बाल कहानी संग्रह – “टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना” की समीक्षा।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २५१☆
☆ पुस्तक चर्चा – टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना – लेखक : श्री राजकुमार जैन ‘राजन’ ☆ समीक्षा – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
पुस्तक : टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना
विधा : बाल कहानी-संग्रह
कहानीकार : राजकुमार जैन ‘राजन’
प्रकाशक : ज्ञानमुद्रा पब्लिकेशन, भोपाल
संस्करण : 2026
मूल्य : 200 रुपए
समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
☆ ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’ : बालमन में जिज्ञासा, संवेदना और सामाजिक चेतना जगाता कहानी-संग्रह – ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
राजकुमार जैन ‘राजन’ ऐसे कहानीकार हैं जिनकी रचनात्मक चिंतन का केंद्र बालक होता है। उनकी दृष्टि में बाल कहानी केवल बच्चे का मनोरंजन करने वाली रचना नहीं होती है, बल्कि उसके भीतर जिज्ञासा, संवेदना, साहस, विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करने वाला माध्यम होती है। टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना की ‘अपनी बात’ में स्वयं लेखक कहानी को अंधेरे में राह दिखाने वाला दीपक और छोटे-छोटे हाथों में बड़े सपने भरने वाला माध्यम मानते हैं। वे विशेष रूप से इस बात पर बल देते हैं कि आज के बच्चे के पास सूचना बहुत है, लेकिन समय कम है; इसलिए ऐसी कहानियों की जरूरत है जो छोटी हों, रोचक हों और पढ़ने के बाद बच्चे को सोचने के लिए विवश करें।
रचनाकार अपने आसपास के वातावरण, अपने अनुभवों, गाँव की गलियों, विद्यालय की कक्षाओं और बच्चों की सहज बातचीत से कहानियों के कथानक ग्रहण करता है। यह बात उनकी रचना-दृष्टि को कृत्रिम होने से बचाती है। उनके पात्र प्रायः हमारे आसपास के बच्चे, माता-पिता, शिक्षक, दादा-दादी और ग्रामीण समाज से आते हैं। पुस्तक के समर्पण में वे वरिष्ठ साहित्यकार स्व. गोविंद शर्मा को अपना प्रेरणास्रोत और संरक्षणदाता बताते हुए उन्हें अपनी कृति समर्पित करके अपनी रचनाधर्मिता को प्रदर्शित करके उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
राजन की रचना-दृष्टि की विशेषता यह है कि वे बच्चों को केवल ‘सिखाने’ की मुद्रा में नहीं आते; वे उन्हें परिस्थितियों से गुजरते हुए सीखने का अवसर देते हैं। यही कारण है कि उनकी अनेक कहानियों में बाल पात्र स्वयं प्रश्न करते, पहल करते, समस्या पहचानते हैं और उसके समाधान में भाग लेते हैं।
बाल साहित्य की उपयोगिता : मनोरंजन से आगे की यात्रा
बाल साहित्य बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास का महत्त्वपूर्ण साधन होता है। कहानी बालक को संसार से परिचित कराने के साथ-साथ उसे दूसरों की परिस्थितियों को समझना, प्रश्न करना, कल्पना करना और निर्णय लेना सिखाती है। अच्छी बाल कहानी में मनोरंजन और संस्कार के बीच संतुलन होना चाहिए। केवल उपदेश बालक को आकर्षित नहीं करता और केवल मनोरंजन उसके व्यक्तित्व को आवश्यक दिशा नहीं देता है।
राजकुमार जैन ‘राजन’ की दृष्टि भी इसी संतुलन की ओर दिखाई देती है। पुस्तक की ‘अपनी बात’ में वे स्पष्ट करते हैं कि बच्चे उपदेश से नहीं, उदाहरण से सीखते हैं। इसलिए संग्रह की कहानियों में पर्यावरण-संरक्षण, शिक्षा, समान अवसर, स्वतंत्रता, ईमानदारी, सहयोग, पढ़ने की आदत और मानवीय संवेदना जैसे विषय कथा-स्थितियों के माध्यम से सामने आते हैं।
आज जब बच्चों के सामने इंटरनेट, मोबाइल और त्वरित सूचना का संसार भरा पड़ा है, तब भी पुस्तक की भूमिका समाप्त नहीं हुई है; बल्कि उसका स्वरूप और महत्त्व और अधिक बढ़ गया है। पुस्तक में लेखक स्वयं यह प्रश्न उठाते हैं कि बच्चों के पास जानकारी बहुत है, पर समय कम है। इसलिए ऐसी कहानियाँ आवश्यक हैं जो कम समय में प्रभावी अनुभव दें और पढ़ने के बाद भी मन में बनी रहें।
इस दृष्टि से टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना उपयोगी बाल साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है, क्योंकि इसकी कहानियाँ ज्ञान को कथा के भीतर पिरोने का प्रयास करती हैं।
इस समीक्ष्य संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैं—‘पारूल का सपना’, ‘पौधा रोपण का महत्त्व’, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’, ‘शिक्षा का उजाला’, ‘खिलौना रोबोट’, ‘सच्ची दिवाली’, ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’, ‘स्वतंत्रता का उत्सव’, ‘दीपू ने ठग पकड़वाए’, ‘खुशी दो, खुशी लो’ और ‘बच्चों का वाचनालय’।
‘पारूल का सपना’ बालिका के स्वप्न, आत्मविश्वास और अवसर की समानता को केंद्र में रखकर लिखी गई है। पारूल विमान देखकर पायलट बनने का सपना देखती है। परिवार की ओर से आरंभिक संकोच के बावजूद वह अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ रहती है, अध्ययन करती है, विज्ञान मेले में विमान का मॉडल बनाती है और अंततः अपने सपने की दिशा में आगे बढ़ती है। यह कहानी बालिकाओं की आकांक्षाओं को सामाजिक रूढ़ियों से ऊपर देखने की प्रेरणा देती है।
‘पौधा रोपण का महत्त्व’ में दादाजी और बच्चों के माध्यम से पर्यावरण-संरक्षण की चेतना विकसित होती है। कहानी की विशेषता यह है कि वृक्षारोपण किसी भाषण का विषय न रहकर बच्चों की सक्रिय भागीदारी बन जाता है। दादाजी बच्चों को पौधे लगाने, उनकी देखभाल करने और प्रकृति के महत्त्व को समझने का अवसर देते हैं।
‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में बच्चों का सामूहिक प्रयास सामाजिक परिवर्तन का रूप लेता है। बच्चे प्लास्टिक से पशुओं और मनुष्यों को होने वाले नुकसान को समझते हैं, अभियान चलाते हैं, कपड़े की थैलियों का प्रयोग बढ़ाते हैं और पशुओं के लिए भोजन-पेटियाँ रखते हैं। कहानी की उपयोगिता इस से समझा जा सकता है कि इसमें बालक समस्या के दर्शक नहीं, समाधान के सहभागी बनते हैं।
‘शिक्षा का उजाला’ शिक्षा के अभाव, गलत संगति और आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों से जूझते रोहित की कथा प्रस्तुत करती है। उसके भीतर की प्रतिभा को परिस्थितियाँ दबाती हैं, लेकिन आगे चलकर जीवन के अनुभव उसे अपनी भूल का अहसास कराते हैं। कथा शिक्षा को केवल रोजगार पाने का साधन न मानकर जीवन को दिशा देने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करती है।
‘खिलौना रोबोट’ आधुनिक तकनीक, बालमन और पारिवारिक संबंधों से जोड़ती है। रोबोट बच्चे के लिए आकर्षण का केंद्र है, लेकिन कथा का वास्तविक केंद्र मानवीय संबंध और समझ है। इस कहानी में आधुनिक वस्तु धीरे-धीरे आगे चलकर मानवीय संवेदना का माध्यम बन जाती है।
‘सच्ची दिवाली’ त्यौहार के अर्थ को सामाजिक संवेदना से जोड़कर प्रस्तुत करती है। घर को रोशन करने के साथ दूसरों के घरों का अँधेरा दूर करना ही सच्चे उत्सव का अर्थ है—कहानी इसी मानवीय विचार को कथा में रूप में हमारे सम्मुख लाती है।
‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’ संग्रह की शीर्षक-कहानी है और विज्ञान, कल्पना तथा ज्ञान को एक साथ उभारती है। प्रोफेसर, बच्चे और रोबोट मिलकर समय की यात्रा की कल्पना करते हैं। कहानी का महत्त्व इस बात से उजागर होता है कि समय-यात्रा के रोमांच को केवल चमत्कार न बनाकर अतीत से सीखने और वर्तमान को बेहतर बनाने के विचार से जोड़ा गया है। अंततः ज्ञान बाँटने को ही वास्तविक उपलब्धि माना गया है।
‘स्वतंत्रता का उत्सव’ कहानी स्वतंत्रता के अर्थ को पक्षी के माध्यम से प्रतीकात्मक ढंग से सामने लाती है। सोने का पिंजरा भी पिंजरा ही है—यह बिंब स्वतंत्रता के वास्तविक मूल्य को बालमन तक सरलता से पहुँचाया जाता है।
‘दीपू ने ठग पकड़वाए’ साहस, निरीक्षण-शक्ति और तर्कबुद्धि की कहानी है। जहाँ बड़े लोग अंधविश्वास और भय के प्रभाव में आ जाते हैं, वहाँ दीपू परिस्थितियों को समझने की कोशिश करता है। वैज्ञानिक दृष्टि से रहस्य का समाधान करना कहानी को विशेष रूप से उपयोगी बनाता है।
‘खुशी दो, खुशी लो’ इस संग्रह की सबसे अधिक मानवीय और संवेदनात्मक कहानियों में एक है। जादुई रूमाल का बाहरी आकर्षण अंततः इस बोध में बदल जाता है कि खुशी किसी वस्तु में नहीं, बल्कि दूसरों के प्रति किए गए छोटे-छोटे सद्भावपूर्ण व्यवहार में निहित है। कहानी का अंतिम बोध—खुशी देने वाले के हृदय में होती है—बालक के लिए सहज और प्रभावशाली है।
‘बच्चों का वाचनालय’ संग्रह की सबसे उपयोगी सामाजिक कल्पनाओं में से एक है। पारूल और उसके भाई गाँव के एक पुराने खंडहर को बच्चों के वाचनालय में बदलने की योजना बनाते हैं। बच्चे स्वयं सफाई करते हैं, पुस्तकें जुटाते हैं, पढ़ने का कार्यक्रम बनाते हैं और धीरे-धीरे पूरा समुदाय उससे जुड़ जाता है। अंततः प्रशासन भी इस पहल को देखकर भवन को पुस्तकालय में बदल देता है।
कथा-तत्त्वों की दृष्टि से मूल्यांकन:
कहानी के प्रमुख तत्त्वों में कथानक, पात्र, संवाद, वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य और प्रभाव को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इस कसौटी पर यह संग्रह अनेक उल्लेखनीय विशेषताएँ प्रस्तुत करता है।
कथानक
संग्रह के अधिकांश कथानक सरल, रैखिक और बालकेंद्रित हैं। इनमें समस्या आती है, पात्र उसके सामने खड़े होते हैं और प्रयास के माध्यम से समाधान तक पहुँचते हैं। ‘पारूल का सपना’ में सपना लक्ष्य बनता है, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में समस्या सामाजिक अभियान में बदलती है और ‘बच्चों का वाचनालय’ में एक छोटी-सी कल्पना सामुदायिक आंदोलन का रूप लेती है।
कथानकों की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी क्रियाशीलता है। बच्चे केवल घटना के साक्षी नहीं रहते; वे घटनाओं को आगे बढ़ाते हैं। यह बाल साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण गुण है।
पात्र-योजना
राजन की कहानियों में बाल पात्र अपेक्षाकृत सक्रिय और आत्मविश्वासी रूप में सामने आते हैं। पारूल, रोहित, दीपू और वाचनालय के बच्चे अपनी परिस्थितियों से संवाद करते हैं। दादाजी, शिक्षक और परिवार के बड़े पात्र मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं।
विशेष रूप से पारूल का चरित्र उल्लेखनीय है। उसका सपना केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं रह जाता है; वह बालिका के आत्मविश्वास और समान अवसर की आकांक्षा का प्रतीक बन जाता है। इसी प्रकार वाचनालय की कहानी में बच्चों का सामूहिक चरित्र एक व्यक्ति से आगे बढ़कर ‘बच्चों की सामूहिक शक्ति’ का प्रतिनिधित्व करता है।
संवाद
संवादों की भाषा सामान्यतः सहज और बोलचाल की भाषा है। यह बाल पाठक को पात्रों के अधिक निकट लाती है। कई जगह संवाद ही कहानी का विचार स्पष्ट करते हैं। उदाहरण के लिए ‘पारूल का सपना’ में पायलट बनने के प्रश्न पर पारूल का आत्मविश्वास कहानी के विचार को सीधे सामने लाता है।
हालाँकि कुछ स्थानों पर संवाद अपेक्षाकृत अधिक व्याख्यात्मक हो जाते हैं। पात्र कभी-कभी उतना ही कहते हैं जितना लेखक पाठक को समझाना चाहता है। यदि ऐसे संवादों को थोड़ा संक्षिप्त और स्वाभाविक किया जाए तो कथा की कलात्मकता और बढ़ सकती है।
वातावरण
ग्रामीण जीवन की प्रस्तुति इस संग्रह की बड़ी ताकत है। गाँव की गलियाँ, विद्यालय, बगीचे, खेत, खंडहर, पंचायत और परिवार—ये सब कहानियों को स्थानीय धरातल प्रदान करते हैं। इससे बच्चे कथाओं से सहज जुड़ते हैं। स्वयं लेखक ने भी स्पष्ट किया है कि उनकी कहानियों का स्रोत गाँव की गलियाँ, स्कूल की कक्षाएँ और बच्चों की मासूम बातें हैं।
वातावरण केवल सजावटी नहीं है। ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’ में गाँव अभियान का क्षेत्र बनता है, ‘पौधा रोपण का महत्त्व’ में बगीचा सीखने का स्थल और ‘बच्चों का वाचनालय’ में खंडहर ज्ञान के केंद्र में बदल जाता है।
भाषा-शैली
लेखक ने जान-बूझकर सरल भाषा अपनाई है। कठिन शब्दों और भारी-भरकम उपदेशात्मक भाषा से बचने का प्रयास पुस्तक की ‘अपनी बात’ में भी स्पष्ट दिखाई देता है।
यह सरलता बाल पाठक के लिए उपयोगी है। वाक्य सामान्यतः सीधे, सरल और सहज हैं और घटनाएँ क्रम से आगे बढ़ती हैं। कई जगह हास्य, कौतूहल और भावुकता का संतुलित प्रयोग भी दिखाई देता है।
लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यही सरलता कुछ जगहों पर अतिसरलीकरण में बदल जाती है। कुछ कहानियों के अंत में संदेश अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप से बता दिया जाता है, जबकि साहित्यिक कहानी में कई बार संकेत पाठक पर छोड़ देना अधिक प्रभावी होता है। बालक को निष्कर्ष तक स्वयं पहुँचने का अवसर मिले तो कहानी का प्रभाव अधिक स्थायी हो सकता है।
कल्पना और फैंटेसी
संग्रह की शीर्षक-कहानी में टाइम मशीन और रोबोट का प्रयोग तथा ‘खुशी दो, खुशी लो’ में जादुई रूमाल जैसे तत्व कल्पना को विस्तार देते हैं। इनका उद्देश्य केवल चमत्कार पैदा करना नहीं, बल्कि ज्ञान और मानवीय मूल्यों को रोचक बनाना है।
यहाँ लेखक की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामने आती है—वे विज्ञान और कल्पना को नैतिक बोध से जोड़ते हैं। टाइम मशीन अतीत की यात्रा का उपकरण होने के साथ सीखने का माध्यम बनती है और जादुई रूमाल अंततः वस्तु से अधिक मनुष्य के व्यवहार का प्रतीक बन जाता है।
उद्देश्य और संदेश
लगभग सभी कहानियों के पीछे स्पष्ट सामाजिक या नैतिक उद्देश्य है—शिक्षा, पर्यावरण, स्वतंत्रता, सहयोग, वैज्ञानिक दृष्टि, समान अवसर, पढ़ने की आदत और मानवीय संवेदना। यह उद्देश्यपरकता पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति भी है और आलोचना की दृष्टि से इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी।
शक्ति इसलिए कि बालक कहानी समाप्त होने के बाद किसी विचार के साथ लौटता है; चुनौती इसलिए कि कहीं-कहीं कथा से संदेश स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय लेखक द्वारा स्पष्ट कर दिया जाता है।
समीक्षात्मक समालोचना:
टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना मूलतः उद्देश्यपरक और मूल्यपरक बाल कहानी-संग्रह है। इसका केंद्रीय आग्रह यह है कि बालक जिज्ञासु बने, पढ़े, प्रश्न करे, अपने आसपास की समस्याओं को पहचाने और उन्हें बदलने के लिए स्वयं पहल करे। यह दृष्टि संग्रह को महज मनोरंजनात्मक बाल साहित्य से अलग करती है।
संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि है बालक को समस्या-समाधानकर्ता के रूप में प्रस्तुत करना। पारूल अपने सपने के लिए प्रयास करती है, बच्चे गाँव को प्लास्टिक से मुक्त करने का अभियान चलाते हैं, दीपू ठगों की चाल समझता है और बच्चे खंडहर को वाचनालय में बदल देते हैं। इस तरह लेखक बच्चों के भीतर निहित परिवर्तनकारी शक्ति पर विश्वास व्यक्त करते हैं।
दूसरी बड़ी उपलब्धि है विषय-विविधता। पर्यावरण से लेकर शिक्षा तक, तकनीक से लेकर स्वतंत्रता तक और व्यक्तिगत सपने से लेकर सामुदायिक पुस्तकालय तक—कहानीकार ने बच्चों के जीवन से जुड़े अनेक विषयों को कथा में समेटा है। विषय-सूची भी इस विविधता को स्पष्ट करती है।
तीसरी विशेषता है स्थानीयता और जीवन-संबंध। कहानियाँ किसी अमूर्त आदर्शलोक में नहीं घटतीं। गाँव, घर, स्कूल, बाजार, बगीचा और परिवार उनके संसार का हिस्सा हैं। इसलिए बच्चों को इनमें अपना परिवेश दिखाई देता है।
फिर भी एक गंभीर समीक्षक के रूप में कुछ सीमाओं की ओर संकेत करना आवश्यक है। पहली सीमा यह है कि अनेक कहानियों में उपदेश का अनुपात कथा की तुलना में कुछ अधिक हो जाता है। लेखक जिस बात को कहानी के माध्यम से पाठक तक पहुँचाना चाहते हैं, उसे कई बार पात्रों के संवाद में सीधे कह देते हैं। इससे कहानी का कलात्मकता प्रभावित होती है।
दूसरी सीमा आदर्श समाधान की तीव्रता है। कुछ कथाओं में समस्या अपेक्षाकृत शीघ्र और सुंदर ढंग से हल हो जाती है। वास्तविक जीवन की जटिलताओं की तुलना में ये समाधान कभी-कभी बहुत सरल प्रतीत होते हैं। यदि कहीं-कहीं संघर्ष, असफलता, संशय और पुनः प्रयास के लिए अधिक स्थान दिया जाता, तो पात्र अधिक त्रिआयामी और कथाएँ अधिक विश्वसनीय बन सकती थीं।
तीसरी बात चरित्र-विकास से जुड़ी है। कुछ पात्र कथा के उद्देश्य को पूरा करने के लिए निर्मित प्रतीत होते हैं। यदि उनके भीतर अधिक मनोवैज्ञानिक द्वंद्व, व्यक्तिगत कमजोरियाँ और परिवर्तन की क्रमिक प्रक्रिया दिखाई जाती, तो संग्रह का साहित्यिक स्तर और ऊँचा हो सकता था।
इन सीमाओं के बावजूद हमें बाल साहित्य को लक्षित पाठकीयता के संदर्भ में देखना चाहिए। लेखक का प्राथमिक उद्देश्य जटिल मनोवैज्ञानिक कथा रचना नहीं, बल्कि बच्चों में पढ़ने, सोचने, प्रश्न करने और सकारात्मक कार्य करने की प्रवृत्ति पैदा करना है। इस दृष्टि से उनकी कथात्मक रणनीति समझ में आती है। जिसकी वजह से वे सरल, सहज और आकर्षक कहानियां प्रस्तुत कर पाए हैं।
निष्कर्ष:
संक्षेप में कहे तो टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना ऐसा बाल कहानी-संग्रह है जिसमें ज्ञान और कल्पना, मनोरंजन और संस्कार, व्यक्ति और समाज तथा वर्तमान और भविष्य के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
इस संग्रह की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि लेखक बच्चों को केवल ‘अच्छा बच्चा’ बनने का उपदेश नहीं देते; वे उन्हें कुछ करने, प्रश्न उठाने और अपने आसपास परिवर्तन लाने वाले पात्रों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक की ‘अपनी बात’ में भी लेखक का आग्रह है कि बच्चों से कहानियों पर चर्चा की जाए और उनसे पूछा जाए कि वे पारूल की जगह होते तो क्या करते या अपने गाँव-मोहल्ले के लिए क्या कर सकते हैं। यही आग्रह इस संग्रह की वास्तविक शैक्षिक शक्ति है।
विशेष रूप से ‘पारूल का सपना’, ‘प्लास्टिक मुक्त गाँव’, ‘टाइम मशीन और ज्ञान का खजाना’, ‘दीपू ने ठग पकड़वाए’ और ‘बच्चों का वाचनालय’ जैसी कहानियाँ बालक को निष्क्रिय पाठक न बनाकर सहभागी बनाने की कोशिश करती हैं। ‘बच्चों का वाचनालय’ तो पुस्तक-पठन को सीधे सामुदायिक जीवन से जोड़ते हुए यह विश्वास पैदा करती है कि संसाधनों की कमी हमेशा ज्ञान की कमी नहीं होती; इच्छा, सहयोग और पहल हो तो एक खंडहर भी ज्ञान के केंद्र में बदला जा सकता है।
अंततः कहा जा सकता है कि राजकुमार जैन ‘राजन’ का यह संग्रह बालमन में जिज्ञासा जगाने, संवेदना विकसित करने और सकारात्मक कर्म की प्रेरणा देने वाला उपयोगी प्रयास है। साहित्यिक कसौटी पर इसमें उपदेशात्मकता और आदर्शवादी समाधान जैसी सीमाएँ अवश्य हैं, लेकिन इसकी विषयगत विविधता, सरल भाषा, बाल-केंद्रित दृष्टि, सामाजिक सरोकार और बच्चों को सक्रिय भूमिका देने की प्रवृत्ति इसे समकालीन बाल साहित्य में महत्त्वपूर्ण बनाती है।
यह पुस्तक बच्चे को केवल यह नहीं बताती कि क्या अच्छा है, बल्कि बार-बार यह प्रश्न उसके सामने रखती है कि अच्छा करने के लिए वह स्वयं क्या कर सकता है। यही इस कहानी-संग्रह का सबसे मूल्यवान पक्ष है। इस बेहतरीन कहानी संग्रह के लिए राजकुमार जैन राजन को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
☆ महावस्त्राचे पदर – भाग १३ – ‘पिता-पुत्र’ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
आजचा हा तेरावा भाग लिहिताना माझे मन पित्याविषयीच्या अथांग कृतज्ञतेच्या आणि आदराच्या भावनेने दाटून येत आहे. पिता म्हणजे मायेची अबोल सावली आणि जगण्याचा भक्कम आधार! जोपर्यंत त्याचं छत्र शिरावर असतं, तोपर्यंत माणूस संपूर्ण जगाशी लढायला निर्धास्त असतो. पण या जीवनसागरात जेव्हा आपलं गलबत वादळात हेलकावे खातं आणि दिशाहीन होतं, तेव्हा तो दीपस्तंभ बनून अचूक मार्गदर्शन करीत राहतो.
नुकतेच माझे एका शासकीय अधिकाऱ्याशी या विषयावर बोलणे झाले. ते तरुण असून एमपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण होऊन एका मोठ्या पदावर कार्यरत आहेत. त्यांच्याशी बोलताना जाणवले की ते आपल्या वडिलांबद्दल अगदी भरभरून आणि आदरयुक्त प्रेमाने बोलत होते; वडिलांविषयीची कृतज्ञता त्यांच्या प्रत्येक शब्दातून पाझरत होती. मी त्यांना सहज विचारले, “तुम्ही आता एवढे मोठे अधिकारी झालात, तरी वडिलांबद्दल इतक्या आदराने बोलता! ” ते नम्रपणे म्हणाले, “होय सर, माझे वडील प्राथमिक शिक्षक होते. त्यांनी माझ्यावर तसे संस्कार केले; त्यांच्यामुळेच आज मी या पदापर्यंत पोहोचू शकलो. माझ्या नोकरीत जेव्हा जेव्हा मोहाचे किंवा कसोटीचे प्रसंग येतात, तेव्हा तेव्हा माझे वडील माझ्या डोळ्यांसमोर उभे राहतात. त्यांचे शब्द कानात घुमतात आणि मग कधीही माझे पाऊल वाकडे पडत नाही! ” डॉ. नरेंद्र जाधव यांचे ‘आमचा बाप आणि आम्ही’ हे पुस्तक आपल्यापैकी बहुतेकांनी वाचले असेलच. त्यांचे वडील स्वतः अशिक्षित होते; पण त्यांनी दाखवलेली जिद्द आणि मार्गदर्शनामुळेच डॉ. नरेंद्र जाधव जीवनात एवढे मोठे यश संपादन करू शकले.
आई-मुलीचं नातं जितकं बोलकं, हळवं आणि पारदर्शक असतं; त्याच्या अगदी उलट, वरून शांत, शिस्तप्रिय पण आतून अथांग काळजी आणि जबाबदारीने भारलेलं नातं म्हणजे ‘बाप आणि लेक’ (वडील-मुलगा)! हे नातं वरवर पाहता अबोल असतं, पण त्याच्या मौनातच संसाराचा संपूर्ण भार पेलण्याची ताकद दडलेली असते.
माझे वडील हे माझ्यासाठी केवळ एक पालक नव्हते, तर ते माझे खरेखुरे मार्गदर्शक आणि संस्कारांचे उगमस्थान होते. आमची आर्थिक परिस्थिती तशी अगदी साधारण होती. पण आपल्या मुलांचे शिक्षण उत्तम व्हावे, त्यांच्या पंखांना बळ मिळावे म्हणून वडिलांनी स्वतःच्या प्रकृतीची तमा न बाळगता दोन दोन नोकऱ्या केल्या; पण आमच्या शिक्षणात कधी खंड पडू दिला नाही. स्वतः अपार कष्ट उपसून मुलांच्या भविष्याची पायाभरणी करणारा बाप काय असतो, हे मी त्यांच्याकडे पाहून शिकलो.
त्यांनी मला केवळ जगण्याचे संस्कारच दिले नाहीत, तर वाचनाची नितांत सुंदर गोडी लावली. लहानपणी माझ्यासाठी निवडून छान छान पुस्तके आणून देणारे माझे वडीलच होते. त्यांना स्वतःलाही वाचनाची प्रचंड आवड होती. विविध धार्मिक ग्रंथांचे त्यांचे सखोल वाचन होते; पण विशेष म्हणजे, ग्रंथांचे वाचन असूनही त्यांचे विचार अत्यंत आधुनिक आणि पुरोगामी होते. जुन्या रूढी-परंपरांना केवळ परंपरेचा भाग म्हणून घट्ट चिकटून बसण्यापेक्षा, काळाच्या कसोटीवर जे योग्य आणि विवेकवादी वाटते, तेच सहजपणे स्वीकारावे असा त्यांचा ठाम दृष्टिकोन होता. नवीन गोष्टी आणि बदल ते मोकळेपणाने आत्मसात करत असत.
वडिलांचा स्वभाव अतिशय शिस्तप्रिय होता. वेळेचे अचूक नियोजन हा त्यांचा स्थायीभाव होता; वेळ वाया घालवणे त्यांना मुळीच आवडत नसे. ठराविक वेळेला ठराविक गोष्टी न चुकता करण्याची त्यांची शिस्त होती. माझी पुस्तके किंवा शाळेचे दप्तर घरात अस्ताव्यस्त पडलेले त्यांना अजिबात आवडायचे नाही. घरातली ती शिस्त आणि कष्टांचे मोल यामुळेच माझ्या आयुष्याला एक योग्य आकार मिळाला.
मी शिक्षक म्हणून नोकरीला लागलो, तेव्हा आपले काम अत्यंत प्रामाणिकपणे आणि वरिष्ठांना पसंत पडेल अशा तळमळीने करण्याचा मोलाचा सल्ला त्यांनी मला दिला. “वर्गावर शिकवायला जाताना नेहमी पूर्वतयारी आणि अभ्यास करून जा, ” असे त्यांचे ठाम सांगणे असायचे. त्यावेळी माझे एम. ए. चे पहिले वर्ष पूर्ण झाले होते; पण नोकरी लागल्याने मी पुढील शिक्षण अर्धवट सोडले होते. तेव्हा त्यांचा मला सतत आग्रह असायचा की, राहिलेले एम. ए. चे वर्ष कसेही करून पूर्ण कर. त्यांच्या याच आग्रहामुळे मी पुढे ते शिक्षण पूर्ण केले. नोकरी सांभाळून ते करताना थोडा त्रास नक्कीच झाला; पण पुढे संपूर्ण सेवाकाळात त्याचा मला खूप मोठा फायदा झाला. या सगळ्या पितृऋणांतून मी कसा उतराई होऊ?
कवी आरती प्रभू यांची एक अजरामर कविता आहे—
“गेले द्यायचे राहुनी तुझे नक्षत्राचे देणे,
माझ्यापाशी आता कळ्या आणि थोडी ओली पाने… “
कधी कधी नात्यांमध्ये असं सुंदर आणि आवश्यक असलेलं नक्षत्रांचं देणं द्यायचं राहून जातं. काळ हातातून वाळूसारखा निसटून जातो आणि राहून गेलेल्या छोट्या-मोठ्या गोष्टींची एक अनामिक बोच मात्र आयुष्यभर मनाला लागून राहते.
माझं ज्यांच्यावर जिवापाड प्रेम होतं, असे माझे हे पूज्य वडील आयुष्याच्या शेवटी शेवटी खूप थकले होते. त्यांचं वय बरंच झालं होतं. मी त्यावेळी शाळेत शिक्षक म्हणून कार्यरत होतो. मी सकाळी शाळेत जायला निघालो, की त्यांचं लक्ष माझ्याकडे असायचं; ते मोठ्या आशेने माझ्या चेहऱ्याकडे पाहत राहायचे. “बाबा, येतो मी… ” असं जाताना सहज जरी म्हटलं, तरी त्यांच्या वृद्ध चेहऱ्यावर आनंदाचे हास्य फुलायचे! बऱ्याचदा मी त्यांना सांगूनच निघायचो; पण कधी कधी सकाळच्या घाईगडबडीत आणि धावपळीत माझ्याकडून तेवढंही बोलणं व्हायचं नाही. मी तसाच निघून जायचो आणि त्यांचे डोळे आशेने माझ्या वाटेकडे लागलेले असायचे. मग नंतर दिवसभर मलाच स्वतःची अपराध्यासारखी रुखरुख लागायची. काय हवं असायचं त्या प्रेमळ पित्याला? जाताना आपल्या मुलाने आपल्याकडे प्रेमभराने पाहावे, दोन शब्द सांगून जावे, एवढीच त्यांची माफक अपेक्षा असायची.
शाळेत कामाचा प्रचंड ताण असायचा. वर्गात दिवसभर मोठमोठ्याने शिकवून घसा दुखायचा, मुलांची ती अखंड कलकल; शाळा सुटून घरी आलो की डोकं अक्षरशः भणाणून गेलेले असायचे. अशा वेळी घरात आल्यावर वाटायचे की आता कोणाशीच काही बोलू नये, शांत पडून राहावे. मी तसा प्रयत्न करायचोही. पण त्याच वेळी पुन्हा वडिलांची हळवी अपेक्षा असायची की मुलाने क्षण-दोन क्षण आपल्याजवळ बसावे, आपली मायेने विचारपूस करावी. पण त्या थकलेल्या मनःस्थितीत कधी कधी तेही माझ्याकडून राहून जायचे.
बाबा तर आज या जगात नाहीत; पण आता ते क्षण आठवले की प्रामाणिकपणे वाटते की आपलं चुकलं! आपण कितीही दमलेलो असलो, तरी त्या आधारवड असलेल्या वडिलांजवळ दोन मिनिटे शांत बसायला हवे होते. त्यांना वेळच्या वेळी जेवण, खाणपान, औषधपाणी सगळं काही उत्तम मिळत होतं; पण एका वृद्ध बापासाठी तेवढंच पुरेसं नसतं, त्याला मुलाचा सहवास आणि प्रेमाचे दोन आश्वासक शब्द हवे असतात. हे सगळं आज कळतंय, पण आता सांगायला माझे बाबा मात्र राहिले नाहीत! या आठवणींनी डोळे आजही नकळत भरून येतात. हे नक्षत्रांचे देणे खरोखर द्यायचे राहून गेले…
वडिलांनी मुलासाठी आपल्या कर्तव्यात कधी कोणतीही कसर ठेवली नव्हती; मुलानेही त्यांच्या शब्दाबाहेर कधी पाऊल टाकले नाही. पण तरीही, “बाबा, माझं तुमच्यावर खूप प्रेम आहे, तुम्ही मला हवे आहात! ” हे चार शब्द जोपर्यंत ते हयात होते, तोपर्यंत प्रत्यक्ष त्यांच्या डोळ्यांत पाहून बोलण्याचे राहूनच गेले. हा संकोच म्हणा की अहंकार म्हणा बहुधा जगातल्या प्रत्येक बाप-लेकाच्या नात्यात आडवा येत असावा.
बापाचं प्रेम हे जमिनीखाली खोलवर गेलेल्या वटवृक्षाच्या मुळांसारखं असतं; ते वरून हिरवंगार दिसत नाही, पण संपूर्ण संसाराला वादळात घट्ट रोवून धरतं. मुलगा वयात आला, की वडिलांच्या चपला त्याच्या पायात बसू लागतात. मग सुरू होतो एक आदरयुक्त संकोच. बाप मुलाच्या तोंडावर कधी कौतुक करत नाही, पण बाहेर चारचौघांत अभिमानाने सांगतो, “माझ्या पोराने नाव काढलं बरं का! “
आणि जेव्हा हा वटवृक्ष अचानक कोसळतो, तेव्हा संसाराचे सारे ऊन-पाऊस थेट मुलाच्या अंगावर येऊन आदळतात. त्यावेळी खांद्यावर पडलेल्या जबाबदाऱ्या पेलताना मुलाला पदोपदी जाणीव होते की आपल्यासाठी वडिलांनी आयुष्यभर किती खस्ता खाल्ल्या होत्या! म्हणून हा वटवृक्ष जोपर्यंत आपल्या डोक्यावर उभा आहे, तोपर्यंत त्याच्या सावलीत बसण्याचा कृतज्ञ आनंद प्रत्येकाने घेतला पाहिजे. या वटवृक्षाच्या पारंब्या होऊन आपण जमिनीत घट्ट रुजावे आणि पुढे स्वतः वटवृक्ष होऊन कुटुंबाची धुरा सांभाळावी, हीच खरी पित्याची शिकवण असते.
नात्यांच्या या भरजरी ‘महावस्त्रा’चा हा ‘पिता-पुत्र’ नावाचा पदर अबोल त्यागाचा, कर्तव्याचा आणि नक्षत्रांच्या देण्यासारखा अनमोल आहे. ‘न ऋण जन्मदेचे फिटे’ या उक्तीप्रमाणे हे पितृऋण कधीही न फिटणारे आहे; पण हे देणं जरी पूर्णपणे कधीच फेडता येत नसलं, तरी ते संस्कारांच्या आणि आठवणींच्या रूपाने कृतज्ञतेने जपणे म्हणजेच या नात्याचा खरा सन्मान!
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “बेचकर ईमान आया हूँ…”।)
जय प्रकाश के नवगीत # १६३ ☆
☆ बेचकर ईमान आया हूँ…☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “कभी कभी…“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – बदलते मौसम…।)