हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४०६ ☆ कविता – तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०६ ☆

?  कविता – तलाश है प्यार की पैट्रियाड मिसाइल की ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कुरुक्षेत्र,

अक्षौहिणी सेनाओं का टकराव

महान, गीता का ज्ञान

अधर्म पर धर्म की जय।

 

गागामेला,

सिकंदर की प्यास

विश्व विजय की आस

यूनान का उदय, फारस का त्रास।

 

कलिंग,

अशोक का शोक

शस्त्र से शास्त्र की ओर देश

हृदय परिवर्तन, शांति का संदेश।

 

तराईन, पानीपत, प्लासी,

वाटरलू, पहला, दूसरा विश्व युद्ध

कपट, गुप्तचर, ताकत

संघर्ष, झड़प, घात, प्रतिघात

अनवरत नई नई बिसात।

 

जिनके नाम पर है शांति पुरस्कार,

उन्हीं नोबल का था आविष्कार

डायनामाइट।

तोप, विस्फोट

शंखनाद, रणभेरी, दहाड़, टंकार, चीत्कार

अंततः वही सिसकी, दर्द, सीत्कार।

 

युद्ध थोपता है कोई और

जान से हाथ धोकर

कीमत चुकाता आया है कोई और

जलती मशालें, धूल के गुबार

कूच, अल्ग़ार, वार,

शौर्य, वीरता, गद्दार,

कूटनीति की जीत, हार।

 

रक्त सरिता, ध्वस्त मुकुट,

नियति विकट

हर युद्ध का अंत, परिवर्तन

एक नया राज्याभिषेक,

बनता है हल, युद्ध भी कभी।

 

लोग जो, मानते हैं

मानवता से ज्यादा,

धर्म या अपना बनाया कायदा

देखते हैं जो सिर्फ फायदा

 

मैं यह सब अनुभव कर,

पसीने से लतपथ छटपटाता हुआ हूं

बिस्तर पर,

सिर्फ अपने कलम कागज के साथ

उसी पक्षी सा आक्रांत,

जिसे देवदत्त ने

मार गिराया था

तीक्ष्ण बाणों से।

 

सिद्धार्थ हो कहां ?

आओ बचाओ

इस तड़पते विश्व को

जो मिसाइलों

की नोक पर

लगे

परमाणु बमों से भयाक्रांत

है सहमा सा।

 

युद्धोन्मादियों को समझा पाने को,

छोटी है मेरी कविता!

तलाश है मुझे

प्यार की ऐसी पैट्रियाड मिसाइल की,

जो, ध्वस्त कर सकती,

नफरत की स्कड मिसाइलें,

लोगों के दिलों में बनने से पहले ही

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० – कविता – अंबिके ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक कविता  अंबिके”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६० ☆

🌻कविता🌻 अंबिके 🌻

*

हे अंबिके माँ ज्ञान देना, कर सकूं आराधना।

नित ध्यान में बैठी रहूँ मैं, पूर्ण कर माँ साधना।।

*

मारे सभी दानव दलों को, शस्त्र तू ही धारती।

रण भेद करती अंबिका तू, निर्बलों को तारती।।

 काली बनी कल्याण करती, रक्त खप्पर साजती।

नारायणी तूअंबिके नित, क्रोध में ललकारती।।

*

दानव दलों के अंग सारे, धार लेती देह में।

दो नैन जलते राह में है, छल रहे सब नेह में।।

 आगे बढ़ी माँ छोड़ के सब, रौंदती अंगार है।

ममता जगी है भाव में माँ , प्रेम के भंडार है।।

*

शिव जानते हैं अंबिका को, क्रोध में जलती रही।

 चरणों पड़े फिर आपके ही, जीभ तो निकली रही।।

हर अंग में लाली जगी है, लाज भरते नैन है।

हे अंबिके जगदंबिके माँ, आप ही तो चैन है।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७१ – देश-परदेश – विश्व निद्रा दिवस : 13 मार्च 2026 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७१ ☆ देश-परदेश – विश्व निद्रा दिवस : 13 मार्च 2026 ☆ श्री राकेश कुमार ☆

जब निद्रा दिवस की जानकारी मिली तो आरंभ में लगा, ये अवश्य ही कुंभकरण का जन्मदिवस होगा। हमारे जैसे निद्रा प्रेमी उसकी याद में इसको मनाते होंगे।

आखिर, आज वो दिन आ ही गया, जिसका हम पूरे साल भर इंतजार करते करते, सोते ही रहते हैं। इस खुशी को मानने के लिए हमारी पूरी योजना रहती हैं।

सभी संबंधित आवश्यक सामग्री ऑनलाइन मंगवा कर रखी पड़ी रहती हैं। शयन कक्ष की खिड़कियों को मोटे पर्दे से ढकना हो, या आंख पर पहनने वाली पट्टी से लेकर कान में ठूसने वाली रुई, सब तैयार हैं।

घर के द्वार पर बाहर से ताला लगवा दिया जाता हैं। टीवी, मोबाइल, पेपर सब कोसों दूर रख कर सोने की शुरुआत होती हैं।

भरपेट गरिष्ठ भोजन के पश्चात मीठी लस्सी की ओवरडोज लेकर, वातानुकूल कमरे में नींद लेने में सहायक सभी उपकरणों का उपयोग कर, मखमली शैय्या पर शांत चित्त लेटते ही, दूसरी दुनिया में चल देते हैं।

कितना मज़ा आता है, इसकी कल्पना करना भी संभव नहीं हैं। आप भी इसका आनंद लेवें।

अभी आंखें बंद ही हुई थी, हमारे कमरे के दरवाजे पर इतनी तेज आवाज़ आई, मानो पश्चिम एशिया की कोई मिसाइल हमारे कक्ष के दरवाजे के बाहर गिरी हैं। हड़बड़ाहट के मारे गिरते पड़ते दरवाजा खोला, बाहर श्रीमती जी खाली गैस के सिलेंडर के साथ खड़ी थी, और बोली गैस एजेंसी जाएं और सिलेंडर भरवा कर आए, ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम बंद पड़ा है, घर में गैस खत्म हो गई, अब खाना नहीं बन सकता हैं।

मरता क्या ना करता, खाली सिलेंडर लेकर डीलर के यहां कूच कर रहें हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२१ ☆ गुणगान माझे… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२१ ?

गुणगान माझे… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

(चाल : पुकारता चला हूँ)

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

*

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

*

मैत्रिणीच्या सोबती असायची

उठून त्यांत तीच तर दिसायची

मैत्रिणीकडे तिच्या मी पाहता

व्यर्थ का ती दात ओठ खायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

*

मीही चोरुनी तिला पाहातसे

अनंत काळजावरी तिचे ठसे

गप्प ती तरीही कान ऐकती

अखंड गुणगान माझे गायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

खुशालचेंडू मी असा

उगाच ती झुरायची

विचारणा करायची

माझ्यावरी मरायची

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७७ – कुछ दिनों से – २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं।

आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘उजास ही उजास‘ की एक भावप्रवण कविता – कुछ दिनों से।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७७ – कुछ दिनों से – २ – ✍

(काव्य संग्रहउजास ही उजास से )

हाँ दुख को पढ़ना भी एक कला

आजकल ये रिवाज

आम हो चला है

कि लोग

दूसरों के दुख का ढोल

अपने गले में टाँग लेते हैं

और

सूचनात्मक बाग देते हैं।

सवाल दुख-सुख का नहीं

सवाल है नियत का

अगर नियत में खोट है

तो फूल से छूना भी चोट है।

मैंने नहीं सीखा

दुख में दीन होना

शोभा नहीं देता

मनु राजा के बेटे को

कौड़ी के तीन होना/ हीन होना।

अरे, दुख आया है

केमिक

तो सहेंगे

हम भवानी कवि के वंशज

रोकर नहीं

गाकर कहेंगे।

दुख में गाना

कि

पागलपन नहीं/ कलेजे का काम है,

दुनिया है दुखदाता

है

और सुखदाता

पुरुषार्थी पुरुषोत्तम राम है।

आज के जमाने में राम का नाम

पुरानी मूर्तियों की तरह म्यूजियम में

रखा जाता है

और स्मगल के काम आता है

खैर कोई कुछ करे

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७६ – “वे अव्यक्त हुये जाते हैं …” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “वे अव्यक्त हुये जाते हैं ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

दिखते पिता इस तरह

बैठे अगले कमरे में ।

कभी किसी के लहजे में

तो घर के चेहरे में ॥

 

टँगी गंध है रही खूँटियों

पर वो  जिस्मानी ।

उनके कपड़ो से आती जो

जानी पहचानी ।

 

वहीं हृदय के घाव रहे

बेशक बिन मरहम के –

विवश पड़ा हो ज्यों कोई

चौपाया  कचरे में ॥

 

धुँधली हुई निगाह

पाँव में आ बैठा कम्पन ।

जिससे पता चला करता

बाकी है स्पन्दन ।

 

कभी बोलते तो ऐसा

सब लोग सुना करते –

कोई शख्स कुयें से बोले

काफी गहरे में ॥

 

छड़ी, पास की बुझी बुझी सी

दिखती कोने में ।

वे अव्यक्त हुये जाते हैं

जीवित होने में ।

 

पर कराहना उनका

जैसे बतला जाता है –

कोई कंकड़ कहीं

गिरा हो पानी ठहरे में ॥

 

रहते थे चुपचाप घरेलू

सब सम्बंधों पर ।

चले गये चुपचाप चार

लोगों के कन्धों पर ।

 

समझ न पाये उन्हें कभी

जाने अनजाने ही –

उलझे रहे निदान खोजते

भ्रम के पहरे में ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

09-03-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ – हास्य-व्यंग्य – “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम हास्य व्यंग्य रचना हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३

☆ हास्य व्यंग्य ☆ “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

 मैं सुबह चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहा था तभी दरवाजा थपथपाते हुए पड़ोसी वर्मा जी ने आवाज लगाई – भाई साहब।

दरवाजा खोलते हुए मैंने कहा – आइए वर्माजी। आज क्या खबर लाए हैं ? वे सोफा संभालते हुए बोले – भाई साहब ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है ? मैंने वर्मा जी के लिए चाय लाने पत्नी को आवाज लगाई और फिर अखबार पढ़ने लगा। कुछ देर की चुप्पी के बाद बेचैन वर्माजी ने पुनः प्रश्न किया – भाई साहब, ये मोनालिसा का क्या लफड़ा है? मैंने नाक की नोंक पर रखे चश्मे के ऊपर से वर्मा जी पर तरछी नजर फेंकते हुए कहा – भाई जी लफड़ा ही लफड़ा है। इतालवी कलाकार लियोनार्डो दा विंची ने सोलहवीं शताब्दी में मोनालिसा की सुन्दर पेंटिंग बनाई थी। जानकारी के अनुसार मोनालिसा का असली नाम लीसा था जो फ्लोरेंस के एक कपड़ा व्यापारी फ्रांसेस्को डेल की पत्नी थी। मैं वर्मा जी को मोनालिसा के बारे में बता रहा था और वे लगातार भाई साहब, , , भाई साहब कहते हुए मुझे टोक रहे थे। मैंने कहा भाई जी, यदि मोनालिसा के बारे मैं सुनना है तो टोका टाकी मत करो। वे मेरी ओर झुकते हुए बोले – मैं इस मोनालिसा की बात नहीं कर रहा मैं तो उस बड़ी बड़ी शराबी आंखों वाली सांवली सलोनी मोनालिसा की बात कर रहा हूं जो टीवी चैनलों और सोशल मीडिया की मेहरबानी से कुंभ के मेले में माला बेचते बेचते मिस इंडिया जैसी फेमस होकर युवा दिलों की धड़कन बन गई। अनेक युवा तो कुंभ नहाने के बहाने उसे देखने, उससे मिलने के लिए ही इलाहाबाद गए। उसकी झील सी गहरी आंखों में डूब कर दस गुने ज्यादा दाम देकर उससे मालाएं खरीदीं।

मैंने मुस्कुराकर चुटकी लेते हुए कहा भाई जी कुंभ मेला तो आप भी गए थे, नहाया की सिर्फ मोनालिसा से मिलकर आ गए ? वर्मा जी शर्माते हुए बोले भाई साहब अब आपको क्या बताऊं ! उसे देखकर तो मुझे फिल्म आरजू का वह गाना याद आ गया जो राजेंद्र कुमार ने साधना की आंखें देखकर गया था –

छलके तेरी आंखों से शराब और ज्यादा

खिलते रहें होंठों के गुलाब और ज्यादा

मैंने कहा भाई जी फिर तो “आंखों ही आंखों में इशारा और बैठे बैठे जीने का सहारा” हो गया होगा। मेरी बात सुनकर वर्मा जी उदास हो गए बोले – भाई साहब क्या बताऊं, वहां सौ बीमार होते तब भी मैं बाज़ी मार लेता लेकिन वहां तो एक अनार के लाख बीमार वाली स्थिति थी। आखिर उसे फिल्म में हीरोइन बनाकर मुनाफा कमाने एक निर्माता निर्देशक ले उड़ा। गंगाघाट पर खिल उठे लाखों दिल चकनाचूर हो गये। भाई साहब बचे खुचे युवा दिलों पर उस समय नश्तर चल गया जब मोनालिसा ने बड़ी उमर के एक दाढ़ी वाले से शादी कर ली। भाई साहब बताइए मोना ने ऐसा क्यों किया ? मैंने कहा वर्मा जी आपने वह गाना सुना है –

“पसंद आ गई है एक काफिर हसीना,

दाढ़ी वाले को भी वह पसंद आ गई होगी, उसकी मेहनत सफल हुई। मेरी बात सुनकर वर्मा जी के आंसू निकल आए, वे बोले – भाई साहब दाढ़ीवाले ने ऐसा क्यों किया ? मैंने वर्मा जी को सांत्वना देते हुए कहा – प्यारे भाई दुनिया के सब मर्द फिल्म “आई मिलन की बेला” के राजेंद्र कुमार जैसे नहीं हैं जो प्रेम निवेदन कर रही कम उम्र की लड़की से साफ – साफ कह दें –

अभी कमसिन हो, नाजुक हो, नादां हो, भोली हो…

सोचता हूं मैं कि तुम्हें प्यार न करूं…

वर्मा जी के चेहरे को देखकर लग रहा था कि उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आया है। मैंने कहा भाई जी मैं आपके दुख में आपके साथ खड़ा हूं। “हाय मोनालिसा ये तुमने क्या किया?” कहते हुए वे बाहर निकल गए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆ # “कविता का साया…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता कविता का साया…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५७ ☆

☆ # “कविता का साया…” # ☆

मैं सुबह-सुबह घर से घूमने निकलता हूं

धीरे-धीरे नपे तुले कदमों से चलता हूं

तब वह भी मेरे साथ साथ चलती है

 

गार्डन में घूमते हुए

प्रकृति के नजारों को आंखों से चूमते हुए

सूर्य की कोमल किरणों से लिपटकर

कलियों को धीरे-धीरे उमलते हुए

मैं देखता हूं

कुछ देर बेंच पर बैठता हूं

वह भी बैठती हैं

जब मैं उठकर चलता हूं

वह भी मेरे साथ-साथ चलती है

 

जब वॉकिंग से घर आता हूं

फ्रेश होकर अखबार पढ़ता हूं

चाय की चुस्कियों के संग

समाचार की सुर्ख़ियों को पढ़कर

अपने विचार अपनी सोच गढ़ता हूं

अपनी दुनिया में पहुंच जाता हूं

तब भी वह मेरे साथ-साथ वहां भी चलती है

 

दिनभर कुछ ना कुछ करते रहता हूं

कभी पढ़ते रहता हूं

कभी लिखते रहता हूं

कभी घर के कामों में व्यस्त रहता हूं

और जब मैं आराम करता हूं

तब वह भी मेरे साथ-साथ आराम करती है

 

शाम को मित्रों के साथ

टी” पॉइंट पर

बैठकर गप्प मारते हुए

चाय पीते हुए

संसार की समस्याओं पर

आपसी विचार विमर्श

डिबेट करते हुए

शाम रात में ढलती है

तब मैं घर जाने को निकलता हूं

तब भी वह मेरे साथ साथ चलती है

 

रात में बिस्तर पर सोते हुए

जो बातें मन में उतरती है

आंखों के आगे आती है

दिल को झकझोरती है

तब भी वह मेरे साथ साथ होती है

 

फिर मैं अचानक उठकर

टेबल लैंप की रोशनी में

कुछ सोच कर

कलम उठाकर

लिखने बैठता हूं

तब वह मेरे कलम के

शब्दों के साथ-साथ चलती है

कागज पर उतरती है

नई रचना बनती है

वह मेरा साया नहीं

वह मेरी प्रिय कविता होती है

वह मेरी प्रिय कविता होती है /

 

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०० – यही प्रेम है, प्रियवर! ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता यही प्रेम है, प्रियवर!।)

☆ अभिव्यक्ति # १०० ☆ यही प्रेम है, प्रियवर! ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

आज सवेरे उठ कर मैने,

इंद्रधनुष जब देखा,

सात रंग चमकीले थे, पर,

रंग प्यार का ना था,

 

सोचा शायद देर हो गई,

मुझको सोते सोते,

रंग प्यार का सिमट गया है,

इंद्रधनुष के पीछे,

 

जब प्रकृति दुल्हन बनकर,

स्नेह सुधा बरसाए,

हरियाली की चादर ओढ़े,

धरती भी शरमाए

 

तब धरती पर रंगों से, रंग,

निखर कर आए,

प्रेम रंग हो सबसे निखरा,

प्रेम सदा बरसाए,

 

बदली की ओट से चंदा,

अवनी को है, झांके,

पृथ्वी पर व्याकुल चकोर,

चंदा को है ताके,

 

कांच के टुकड़े, मुट्ठी में हों,

लहू गिरे रिस कर,

पर मुस्काए, दुख में भी,

यही प्रेम है, प्रियवर!

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ “सन्मान निधी…” – लेखक : अज्ञात ☆ शोभा जोशी ☆

शोभा जोशी 

? वाचताना वेचलेले ?

☆ “सन्मान निधी…” – लेखक : अज्ञात ☆ शोभा जोशी

“आई,  तूपण ना! काय हे? बाबांच्या फक्त १२,००० रुपयांच्या पेन्शनसाठी इतकी धावपळ कशाला? आपण आपल्या एका कर्मचाऱ्याला यापेक्षा जास्त पगार देतो…! “

मोहित चिडून आईला म्हणाला.

 केवळ लाईफ सर्टिफिकेट देण्यासाठी स्टेट बँक ऑफ इंडियाच्या लांब रांगेत उभं राहण्यापेक्षा घरी जाऊ या,  असा तो आग्रह करू लागला.

 मोहितचं म्हणणं काही अंशी खरंच होतं.

त्यांचा कोट्यवधींचा व्यवसाय होता. वर्षभरात लाखो रुपये पगार-भत्त्यांत जात होते.

मग फक्त १२,००० रुपयांसाठी इतका वेळ का घालवायचा?

 

मोहितचे वडील एकनाथराव गेल्या महिन्यात अल्पशा आजाराने वारले होते. ते सरकारी शाळेत शिक्षक होते आणि १२ वर्षांपूर्वी निवृत्त झाले होते. त्यांना पेन्शन मिळत होती. त्यांच्या निधनानंतर शासनाच्या नियमानुसार अर्धी पेन्शन त्यांच्या पत्नी सरला यांना मिळणार होती. त्यासाठीच आज त्या बँकेत लाईफ सर्टिफिकेटची औपचारिकता पूर्ण करण्यासाठी आल्या होत्या.

 

महिनाभरापूर्वी एके दिवशी मोहितचा मुलगा कुशाग्रचा आठवा वाढदिवस होता. त्याने आजीकडे सायकलची मागणी केली होती.

 

सरलाताईंच्या खात्यात फारसे पैसे उरले नव्हते. म्हणून त्यांनी मोहितकडे १०,००० रुपये मागितले. मोहित ऑफिसला निघायच्या तयारीत होता. थोडं आश्चर्याने पाहून त्याने पत्नी श्रेयाला आईला पैसे द्यायला सांगितले. श्रेया पैसे देताना हलकंसं पुटपूटली,

“आजकाल खूप मंदी आहे बरं का! जरा सांभाळून खर्च करा. ”

 

संध्याकाळी सरलाताईंनी त्या पैशांतून कुशाग्रसाठी सायकल घेतली आणि घरात पुन्हा हशा-आनंद पसरला.

 

पण पुढच्या आठवड्यात मोहितची मोठी बहीण माहेरी आली.

 

नवरा जिवंत असताना सरलाताईंना कधीच पैशांसाठी कुणाकडे पाहावं लागत नव्हतं. ते स्वतःच पेन्शनमधून त्यांना थोडेफार पैसे देत असत.

आता मात्र मुलीच्या निरोपासाठीही त्यांना सुनबाईकडे हात पसरावा लागणार होता.

श्रेयाचे तेच शब्द त्यांच्या मनात घुमत होते,

“ मंदी आहे… जपून खर्च करा! ”

 

मन खट्टू करून त्या मुलीला रिकाम्या हाताने निरोप देऊ लागल्या,  तेवढ्यात श्रेया स्वतः पुढे आली आणि २००० रुपये त्यांच्या हातात ठेवत म्हणाली,

“ मुलीला रिकाम्या हाताने कसं पाठवणार? ”

पण त्या शब्दांत आपलेपणा कमी आणि टोमणा जास्त होता हे सरलाताईंना जाणवलं.

 

सरलाताईंच्या आयुष्यात पैशांची खरी कमतरता नव्हती. औषधं,  रिचार्ज,  छोट्या गरजा—मोहित लगेच पैसे देत असे.

पण मंदिरात दान करायचं असो,  सणासुदीला नोकरांना काही द्यायचं असो,  नातेवाईकांना भेट द्यायची असो,  प्रत्येक वेळी मागणं त्यांच्या स्वाभिमानाला टोचत होतं.

 

अलीकडे त्यांची बहीण आली होती. तिची आर्थिक परिस्थिती बेताची होती. तिला मदतीची अपेक्षा होती. पण सरलाताई स्वतःच पैशासाठी सुनेकडे पाहताना दिसल्यावर तिने काहीच मागितलंच नाही.

 

आणि मग एक दिवस मोबाईलवर मेसेज आला — State Bank of India कडून.

 

सहा महिन्यांची पेन्शन — ७२,००० रुपये — त्यांच्या खात्यात जमा झाल्याचा संदेश होता. सरलाताई जवळच्या ATM मधून १०,००० रुपये काढून घरी येत होत्या. त्यांच्या चालण्यातला आत्मविश्वास,  चेहऱ्यावरचे तेज सांगत होतं — पेन्शनला “सन्मान निधी” का म्हणतात ते.

 

कोट्यवधींच्या संपत्तीपेक्षा त्यांच्या पतींच्या त्या १२,००० रुपयांच्या पेन्शनमध्ये त्यांना अधिक वजन,  अधिक आधार आणि सर्वात महत्त्वाचं — स्वाभिमान जाणवत होता.

 

आई-वडिलांचं आयुष्य आपल्या आरामासाठी झिजलेलं असतं. आणि आपण मात्र त्यांच्या गरजांकडे ‘रक्कम’ म्हणून पाहतो.

 

गोष्ट पैशांची नाही,  स्वाभिमानाची आहे.

सन्मानाची आहे, भावनांची आहे.

 

पेन्शन म्हणजे फक्त पैसे नसून ती ‘सन्मानाची सही’ आहे.

लेखक : अज्ञात 

प्रस्तुती :  शोभा जोशी

कार्यकर्ती, जनजाती कल्याण आश्रम, पुणे महानगर. 

मो ९४२२३१९९६२ 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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