हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १४४ ☆ एक मुफ़लिस रात भर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “एक मुफ़लिस रात भर “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४४ ☆

✍ एक मुफ़लिस रात भर… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

दिल में जिसके प्यार का सागर लिए फिरता रहा

मुझको नफ़रत का वही खंज़र लिए फिरता रहा

 *

शहर में मँहगे है होटल कब्जे है फुटपाथ पर

एक मुफ़लिस रात भर चादर लिए फिरता रहा

 *

पूछ मत मुझसे गुज़ारा हिज़्र मैंने किस तरह

वस्ल का आँखों में बस मंजर लिए फिरता रहा

 *

बेचकर ईमान मैंने की नहीं जब नौकरी

उम्र भर सन्दूक और बिस्तर लिए फिरता रहा

 *

उसको कोई भी कभी मंज़िल न हासिल हो सकी

ज़िंदगी भर हार का जो डर लिए फिरता रहा

 *

उम्र से पहले बुढापा आ गया उस शख़्स को

दिल पे जो भी फ़िक़्र का पत्थर लिए फिरता रहा

 *

मुझको आश्रम में अरुण वो भेजने को आ गए

मैं जिन्हें बचपन में शानों पर लिए फिरता रहा

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६१ ☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान…” ।)

☆ शेष कुशल # ६१ ☆

☆ व्यंग्य – “सांड सांड की लड़ाई में बागड़ का नुकसान – शांतिलाल जैन 

आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का,  एरीना ईरान में. दो सांड एक तरफ, एक सांड दूसरी तरफ. जोड़ी में एक सांड अंकल सैम का, एक सांड ज़ायोनिस्टों का. दूसरी तरफ एक अकेला सांड,  पर्शियन नस्ल का. ये क्या!! शुरू मेई बेईमानी! पास के वेन्यू ओमान में शांतिवार्ता चल रही थी कि जोड़ीदार सांडों ने पर्शियन सांड को अकेला पा कर अटैक कर दिया. जुबां शांति की,  अंगुलियाँ मिसाईलों के ट्रिगर पे. बुल फाईट में नुकसान  बागड़ का. कुवैत, बहरीन,  क़तर इस बागड़ पर ज़ख्मी तो लेबनान उस बागड़ पर. नुकसान तो दूर देशों तक पसरी बागड़ का भी हो रहा है. जम्बूद्वीप जैसे देश जो दो रोज़ पहले ही जाकर ‘आ सांड मुझे मार’  कर आए थे, लहुलुहान वे भी कम नहीं है. सांड लड़ वहाँ रहे हैं,  सिलेंडर की कतार में हम और आप यहाँ खड़े हैं. बाज़ार की दुनिया के सांड वाल-स्ट्रीट से दलाल-स्ट्रीट तक हर जगह दुबक गए हैं,  बीयर हावी हैं. क्षत-विक्षत है बागड़ इन्वेस्टर्स की. मज़े में हैं तो बस चीन और रूस. चतुर हैं,  बागड़ पर नहीं दर्शक दीर्घा में जा बैठे हैं. माल भी कमा रहे हैं और मज़े भी ले रहे हैं. उनकी कम्पनियाँ मुनाफ़े में है और तीसरी दुनिया लॉस में. आप देख रहे हैं बुल-फाईट में  दुनिया की शेष बागड़ का सत्यानाश.

आगे का हाल सुनाने से पहले हम आपको बताते चलें दो सांडों की जोड़ी मान कर चल रही थी एक अकेला, दुबला-पतला, कमज़ोर सांड रमजान में क्या तो खुद को बचा पाएगा, क्या आक्रमण कर पाएगा. अनावृत्त मानकर चल रहे थे उसे. सोचा क्या तो नहाएगा, क्या तो निचोड़ेगा. पर्शियन नस्ल को वे चुटकियों में मसल देंगे. मगर ऐसा होता दीख नहीं रहा. सांडो की लडाई जलिकट्टू की लड़ाई नहीं है. ये न परंपरा के लिए है, न मनोरंजन के लिए. असल मकसद तो पर्शियन सांड के कब्ज़े वाली उस दुधारू गाय का अपहरण करना है जिसे तेल का कुआँ कहा जाता है. आँखों में सपने पेट्रो डॉलर के हैं. फाईट टफ़ है, नुकसान जबरजस्त.

और ये दांव. धोबी पछाड़. जोड़ीदार सांडों का पॉवर मूव. प्रतिबंध के सींगों में फँसा कर विचारधारा बदलने का दांव….. ओह्ह मूव फिर फेल हुआ. पर्शियन सांड फिर बच निकला. अबकि बार निज़ाम से बेदख़ल कराने डबल-लेग टेकडाउन लगाया गया है. पर्शियन सांड को सींगों की बजाए पैरों में घुसकर पकड़ने का दांव लगाया गया है. मगर ये क्या…. अधिनायकवादी निज़ाम से बेदख़ल कराने निकले अंकल सैम का अपना चेहरा अधिनायकवादी निकल आया है. पर्शियन सांड है कि लीडरान-दर-लीडरान मारे जाने के बाद भी अंकल सैम के काबू में आ नहीं रहा. अलबत्ता, ड्रोननुमा छोटे छोटे सींगों से अंकल सैम को हलाकान किए दे रहा है. अभी तक दो सांडों की जोड़ी एक भी राउंड पूरी तरह से जीत नहीं पाई है. ‘परमाणु खतरे को रोकना है और मध्यपूर्व में स्थिरता लानी है’   कहते हुए अंकल सैम का सांड एक बार फिर आगे बढ़ा, एक बार फिर मुँह की खाई. न यार मिला,  न विसाले सनम. न परमाणु बम मिला न ख़तरा. जोड़ीदार सांड का हर दांव फेल हो रहा है. वे बार बार मुँह की खा रहे हैं, मगर अभी चुके नहीं हैं. अंकल सैम यूरोप से ला कर एडिशनल सांड्स उतारने के मूड में हैं. लेकिन ये क्या!! सांड-सखाओं ने मना कर दिया. बुल जर्मनी का हो, इटली का हो,  फ़्रांस या ऑस्ट्रेलिया का,  सबने अंकल सैम को अंगूठा दिखा दिया है. कह रहे हैं कि भांडों के लिए सांडों के सींग नहीं पकड़े जाते. अलग-थलग पड़ता जा रहा है पॉवरफुल पेयर ऑफ़ सांड्स. हारने की कगार पर दीखते तो हैं मगर मैच अभी ख़त्म नहीं हुआ है. तरकशों में तीर बाकी हैं. कुछ भी हो सकता है. जो यूरेनियम बुझा सींग मार दिया तो मनुष्यता की बागड़ का गहरे तक झुलस जाना तय है.

जंग जारी है. वैश्विक बागड़ पर बैठे अबोध, निहत्त्थे, निर्दोष नागरिकों को कभी ये सांड कुचल रहा है कभी वो. न कोई अस्पताल बख्श रहा है न स्कूल, न बीमार न अपाहिज, न औरतें न बच्चे, न गरीब न मजलूम. रहम किस चिड़िया का नाम है!!

आप देख रहे हैं लड़ाई सांडों की. वेन्यू फ़ारस की खाड़ी का, एरीना ईरान में.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ४९ – जाना था चला जाता… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – जाना था चला जाता ।)

☆ हेमंत साहित्य # ४९ ☆

✍ जाना था चला जाता… ☆ श्री हेमंत तारे  

क्यूं बताऊं के, खुश हूं कम में गुजारा करके

इल्तिजा है न पूछा कर, सबब खुदारा करके

मैं तो सीख ही न पाया, बेवफ़ाई के निजाम

आया हूं लौट के, मुहब्बत में खसारा करके

*

वो, यूं चलते – फिरते न बना था अहबाब मेरा

बनाया था उसे अपना, “जान” पुकारा करके

*

जब से वो मेरा जान ऐ जिगर, हमराज बना

निभाई है आशनाई मैंने, जफाऐ गंवारा करके

*

उसके चले जाने से, मेरा कुछ भी तो न बिगडा

जाना था चला जाता पर मुझसे मशविरा करके

*

गरज ये है “हेमंत” कि बेदारी से जिया जाये

यहां गुम हो जाते हैं शातिर जर्रे को शरारा करके

इल्तिजा = अनुनय-विनय, सबब =कारण, खुदारा = भगवान के लिये, निजाम = नियम, खसारा = नुकसान, अहबाब = मित्र, आशनाई = मित्रता, मशविरा = सलाह, बेदारी= जागरूकता,

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५८ ☆ कविता – मेरे घर के सामने… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “मेरे घर के सामने“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५८ ☆

✍ कविता – मेरे घर के सामने… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे घर के सामने

अशोक का पेड़ है

वसंत की बहार है

कोमल पत्तों की

बौछार है

बड़े कोमल और

सुनहरे पत्ते हैं

छोटी छोटी चिडियों ने

घोंसले बना लिए हैं

चीं चीं की आवाज

आती रहती है

अशोक की डालियाँ

नीचे झुक गई हैं

लालामी लिए

हरे हरे पत्तों ने

मेरे घर का दरवाजा

ढंक दिया है

मैं डालियों को

छाँटना चाहता हूँ

हँसिया लेकर

जब भी पास जाता हूँ

डालियाँ छाँटने

कोमल पत्ते

मुस्कुरा उठते हैं

और मेरे चेहरे पर भी

मुस्कान आ जाती है

हँसिया लिए घर में

चला आता हूँ

डाली पत्ते काटने की

हिम्मत नहीं होती।

 

पता नहीं लोग

पेड़ कैसे काट

देते हैं।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०७ – पवित्र रिश्ता… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – पवित्र रिश्ता।)

☆ लघुकथा # १०७ – पवित्र रिश्ता श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

बेटा आज शाम को तुम्हें देखने लड़के वाले आ रहे हैं थोड़ा बेसन का उबटन लगा लो रागिनी ने अपनी बेटी सुमन से कहा।

सुमन चिल्ला कर बोली – “क्यों पकौड़े बनाकर मुझे ही उन्हें खिलाने वाली हो क्या?”

सुमन ने कहा- “माँ मैं जैसी हूं वैसे ही उनके सामने आऊॅंगी बनावट का श्रृंगार मुझे नहीं करना है।”

“ठीक है अच्छा अच्छा आराम कर ले” सुमन ने गहरी सांस भरते हुए कहा।

वह रसोई में चली गई नाश्ता बनाने के लिए।

उनके मन में बड़ी उलझन थी कि क्या आज इसका रिश्ता तय होगा या नहीं पता नहीं लड़का कैसा मिलेगा?

शाम को जब लड़के वाले घर पहुंचे तब सुमन एक हल्के गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहनकर हल्के मेकअप के साथ उनके सामने उपस्थित हुई।

लड़के की माँ ने पूछा- ‘बेटा तुम्हें खाना बनाना आता है? ‘

“आंटी हाँ मैं थोड़ा बहुत बना लेती हूँ चाय नाश्ता अच्छे से बना लेती हूँ” सुमन ने कहा।

सुमन की माँ ने कहा- “बहन जी आजकल लड़कियाँ खाना कहाँ बनाती हैं नौकरी और काम से फुर्सत कहाँ मिलती है।”

रागिनी ने कहा – “बहन जी मेरी इकलौती बेटी है इसके पिताजी बिजनेस के सिलसिले में बाहर गए हैं हमारी खिलौने की बड़ी दुकान है।”

रागिनी ने पूछा- “बहन जी आपका बेटा क्या करता है?”

लड़के की माँ ने कहा – “मेरे पति का 2 साल पहले स्वर्गवास हो गया है पर पुलिस में बड़े अधिकारी थे उनकी जगह मेरे बेटे को नौकरी मिल गई है।“

रागिनी ने कहा- “बेटा अजय तुम हम लोगों से  बात नहीं करोगे क्या?”

“नहीं आंटी एक बात मैं आपको बता दूँ, मुझे भी काम के सिलसिले में दिनभर किसी भी समय इधर-उधर जाना पड़ता है।”

‘हाँ बेटा मैं समझ सकती हूँ” रागिनी ने कहा।

“आंटी सुमन शादी के बाद क्या नौकरी छोड़ देगी?”

तभी सुमन बोल पड़ी “मैं कोई रामायण की सीता नहीं हूँ यह बात आप अच्छे से समझ लीजिए?”

“मैं आधुनिक नारी हूँ, यदि आप राम बनके रहेंगे तो मैं सीता रहूंगी नहीं तो मैं काली बनना जानती हूँ, आगे आप स्वयं समझदार है” इतना कहकर अंदर चली जाती है।

रागिनी और लड़के की माँ एक दूसरे को देखती रहती हैं। इंस्पेक्टर  अजय  ने कहा – “रामराज्य नहीं है आज के जमाने में कहीं लेकिन आंटी मैं भी रावण तो नहीं हूँ।”

“आपकी बेटी का जब गुस्सा शांत हो जाएगा तब मैं उससे मिलने आऊॅगा। शादी एक पवित्र रिश्ता है जब हमारे मन मिलेंगे तभी शादी होगी” इतना कहकर माँ बेटे दोनों चले जाते हैं।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०७ ☆ चैत्र गौर… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०७ ?

☆ चैत्र गौर… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

हे दुर्गादेवी… जगत जननी

सा-या संसाराची वरदायिनी

*

तू शक्ती.तू अंबिका..तू सौदामिनी

माझ्या मनावर सदा तुझी मोहिनी

*

तू सौंदर्या, मृगनयनी , सुकेशिनी

सती, शैलपुत्री,चंडिका, शुभांगिनी

*

आई पार्वती,उमा,गौरी,कात्यायनी

अनेक नावे… परी तू माझी भवानी

*

कलियुगातली तू आहेस तारिणी

अवघ्या विश्वाची तू ….उद्धारिणी

*

आम्ही तहानलेले… तू तरंगिणी

तू कालरात्री आणि तूच शिवानी

*

चैत्र नवरात्रीत तूच माझी स्वामिनी

सदा तू प्रसन्न असावेस या जीवनी

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १६ ☆ सौ.मंजिरी येडूरकर ☆

श्री मंजिरी येडूरकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – १६ ☆ श्री मंजिरी येडूरकर ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर

रविंद्रनाथ टागोरांच्या इंग्रजी गीतांजलीला सुप्रसिद्ध आयरिश कवी विल्यम बटलर यीट्स यांची प्रदीर्घ प्रस्तावना लाभली आहे. या कवितांनी त्यांना भारावून टाकलं आहे. या कवितांचा आधारभूत पाया म्हणजे प्राचीन भारतीय अध्यात्मिक तत्वज्ञान, त्यातील साधेपणा, भाबडेपणा, खरेपणा, पारदर्शकता, स्वयं मूल्यांकन करण्याचा धीटपणा, निरपेक्ष समर्पणाची भावना यांच्या कवितेतून होणाऱ्या दर्शनाने ते स्तिमित झाले आहेत. टागोरांच्या कवितांचा गर्भितार्थ, त्यातील तत्वज्ञान त्यांच्या मनाला भिडलं आहे. म्हणूनच त्यांनी एवढी प्रदीर्घ प्रस्तावना लिहिली असावी. यीट्स यांना देखील सन १९२३ मध्ये साहित्यासाठीचा नोबेल पुरस्कार मिळाला आहे. 

केवळ गीतांजलीतील कविताच नाही तर रविंद्रनाथांच्या पूर्ण आयुष्याच्या दर्शनाने यीट्स भारावून गेले आहेत. टागोरांच्या आयुष्याबद्दल च्या कल्पना, आयुष्याबद्दलचा दृष्टीकोन त्यांना अद्भुत वाटतो. 

त्यांच्या मते रविंद्रनाथांचे वडील, भाऊ व इतर कुटुंबीय देखील असाधारण होते. भारतीय तत्वज्ञानाची अध्यात्मिक बैठक, शतकानुशतके चालत आलेला भक्तिमार्ग, बंगालचे साहित्य आणि कलेमध्ये रमलेले जनजीवन या सर्वांचे सार म्हणजे गीतांजली, असे त्यांना वाटते. 

तासनतास निसर्गाकडे बघत राहणे, जगण्याचे, व्यवहाराचे भान विसरणे हे रविंद्रनाथांच्या असामान्य असण्याचे दाखले आहेत असं त्यांचं मत आहे. 

विश्वविधात्याबद्दलच्या टागोरांच्या भावना निर्व्याज आहेत. त्यांना कसलाही राजकीय वा सामाजिक गंध नाही असं यीट्सना खात्रीपूर्वक वाटतं आणि यामुळेच ते युरोपियन तत्वज्ञांपेक्षा वेगळे आहेत असं ते म्हणतात. 

ते म्हणतात की, गीतांजलीची खरी थोरवी, तिच्या साधेपणात आहे. मोजके शब्द, खऱ्या भावना आणि स्वतःच्या मनात डोकावून घेतलेला हा चैतन्याचा शोध आहे. रविंद्रनाथ कवी म्हणून कसे उमलत गेले याबद्दल लिहितांना ते म्हणतात, ” वयाच्या १५ ते २० वर्षे या कालावधीतील त्यांच्या कविता साध्या, सोप्या व जास्त करून निसर्गाविषयी आहेत. वयाच्या २५ ते ३५ वर्षे या टप्प्यामधील कविता प्रेम आणि शोक या दोन मूलभूत भावनांविषयी भाष्य करतात आणि त्यानंतरच्या काळात ते हळूहळू अध्यात्माकडे वळतात.” 

कोणताही हेतू मनात न धरता टागोरांनी त्या त्या वेळच्या आपल्या सच्च्या भावनांना शब्दरूप दिलं आहे. त्यावेळी हे पुस्तक कोण वाचेल, कोण त्याचा अभ्यास करेल, त्याचा परिणाम काय होईल असे कोणतेही विचार त्यांच्या मनात नव्हते. यीट्सना रविंद्रनाथ एखाद्या निरागस बालकासारखे वाटत. कोणत्याही लौकिक गोष्टींनी, विचारांनी त्यांना बंदिस्त केलेले नव्हतं. 

‘देव काय आहे’ या प्रश्नाचे उत्तर आपल्याला या कवितांमधून खूप सोप्या प्रकारे मिळतं. वर्षानुवर्षे हा प्रश्न आपल्याला पडलेला असतो पण टागोरांच्या कविता वाचून आपल्याला समजतं की इतकी वर्षे देव आपल्या मधेच होता, फक्त आपल्याला ते माहित नव्हतं. आपल्या सगळ्या शुद्ध भावना म्हणजेच देवत्व म्हणजेच देव. हे मान्य करण्यासाठी लागणारी प्रामाणिक निरागसता हा टागोरांच्या लिखाणाचा गाभा आहे. स्वत:शी संपूर्ण पारदर्शक राहून, एखाद्या बालकाप्रमाणे मनाची कवाडं सताड उघडी ठेवून घेतलेला स्वत:मधल्या देवत्वाचा शोध म्हणजे गीतांजली आहे व हीच टागोरांची थोरवी आहे, असं कविवर्य यीट्सना वाटतं.

—–

☆ गीत ४६ ☆

I KNOW not from what distant time thou art ever coming nearer to meet me. Thy sun and stars can never keep thee hidden from me for aye.

In many a morning and eve thy footsteps have been heard and thy messenger has come  within my heart and called me in secret. 

I know not why to-day my life is all astir, and a feeling of tremulous joy is passing through my heart. 

It is as if the time were come to wind up my work, and I feel in the air a faint smell of thy sweet presence. 

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ४६ ☆

ठाऊक नाही कधी, सौंदर्य तुझे मज भावले

सूर्य अन् तारे तुजला, ना लपवू शकले

*

कितीक दिवस मी ऐकते, पदरव तुझा तो

प्रेषित तुझा, हृदयात माझ्या, हळूच डोकावतो

*

आज अचानक कां थरथरे मी आतुनी

हृदयातील कंपने, आनंद लहरी उठवुनी,

*

मज सांगती चल आता, कर्म इथले संपले

तुझा सुगंध येता, अस्तित्व तव जाणले

*

ठाऊक नाही मी कधी तुजकडे आकर्षिले

किती काळ लोटला, भेटीसाठी चालले

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर 

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

☆ गीत ४७ ☆

THE night is nearly spent waiting for him in vain. I fear lest in the morning he suddenly come to my door when I have fallen asleep wearied out. Oh friends, leave the way open to him ⎯ forbid him not. 

If the sound of his steps does not wake me, do not try to rouse me, I pray. I wish not to be called from my sleep by the clamorous choir of birds, by the riot of wind at the festival of morning light. Let me sleep undisturbed even if my lord comes of a sudden to my door. 

Ah, my sleep, precious sleep, which only waits for his touch to vanish. 

Ah, my closed eyes that would open their lids to the light of his smile when he stands before me like a dream emerging from darkness of sleep. 

Let him appear before my sight as the first of all lights and all forms. The first thrill of joy to my awakened soul let it come from his glance. And let my return to myself be 

immediate return to him. 

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ४७ ☆

व्यर्थ रात्र गेली, त्याची पाहता वाट

मी असे निद्राधीन, होता भली पहाट

*

नका उठवू विनवितो, आला तो जरी दाराशी

पाखरांनो नका गाऊ, पवना नको पंगा नीरवतेशी

*

निद्रेच्या तमातून तो, स्वप्नासम उलगडू दे

त्याचीच पहिली प्रतिमा, मम नयनी उमटू दे

*

मनाचे जागेपण, त्याच्या तेजातून निथळू दे

जागृती येण्याआधी, नंदनवन त्याचे गाठू दे

भावानुवाद © मंजिरी येडूरकर

संपर्क: ९४२१०९६६११

—–

☆ गीत ४८ ☆

THE morning sea of silence broke into ripples of bird songs; and the flowers were all merry by the roadside; and the wealth of gold was scattered through the rift of the clouds 

while we busily went on our way and paid no heed. 

We sang no glad songs nor played; we went not to the village for barter; we spoke not a word nor smiled; we lingered not on the way. We quickened our pace more and more as the time sped by. 

The sun rose to the mid sky and doves cooed in the shade. Withered leaves danced and whirled in the hot air of noon. The shepherd boy drowsed and dreamed in the shadow of the banyan tree, and I laid myself down by the water and stretched my tired limbs on the grass. 

My companions laughed at me in scorn; they held their heads high and hurried on; they never looked back nor rested; they vanished in the distant blue haze. They crossed many meadows and hills, and passed through strange, far-away countries. All honour to you, heroic host of the interminable path! Mockery and reproach pricked me to rise, but 

found no response in me. I gave myself up for lost in the depth of a glad humiliation ⎯ in the shadow of a dim delight. 

The repose of the sun-embroidered green gloom slowly spread over my heart. I forgot for what I had travelled, and I surrendered my mind without struggle to the maze of shadows and songs. 

At last, when I woke from my slumber and opened my eyes, I saw thee standing by me, flooding my sleep with thy smile. How I had feared that the path was long and 

wearisome, and the struggle to reach thee was hard!

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत ४८ ☆

पक्ष्यांची गीते, जागी सकाळ झाली

साज फुलांचा लेऊन, उषा नटली

*

ना खेळलो, ना हसलो, ना बोललो

ना उद्यमा गेलो, ना वाटेत रेंगाळलो

*

न कांही पाहिले, न कांही ऐकले

शोध घेता तुझा, मन पुढे धावले

*

ढगांतून सोनेरी प्रभा पसरली

तरी ना आनंदाची गाणी गायिली

*

माथ्यावर सूर्य, पाऊले वेगात निघाली

नाचऱ्या पानांनी उगाच गिरकी घेतली

*

गुराखी सावलीत पेंगुळले, हाती लाठी

गवतावर पहुडलो मी, पाण्याच्या काठी

*

अनंताच्या वाटेवरचे सहप्रवासी मज हसले

अनेक देश, टेकड्या, कुरणे; पार करण्या गेले

*

वेगात, न पलटता, अदृश्य झाले क्षितिजापार

व्यर्थ यत्न उठण्याचा केला, ऐकून तो तिरस्कार

*

शाल पांघरून आरामाची, घेतले निद्रेचे सुखासन

विसरलो, काय होते या प्रवासाचे प्रयोजन

*

जागा झालो, साक्षात् तू पडलास दृष्टी

स्मित हास्य तुझे, तूच निर्मिल्या या सृष्टी

*

मी वेडा, तुला भेटण्या वणवण करीत होतो

त्या सौंदर्या, त्या गीतांना पारखा होत होतो

– क्रमशः भाग १६.

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © सौ.मंजिरी येडूरकर

लेखिका व कवयित्री, मो – 9421096611

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४२ – बुन्देली कविता – ”नागन सी भन्नाउत जा रइ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – नागन सी भन्नाउत जा रइ।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४२ – बुन्देली कविता – नागन सी भन्नाउत जा रइ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

नागन सी भन्नाउत जा रइ

मैं ओ खें समझाउत जा रइ

*

साँप मरै, ने लठिया टूटे

एई सें बरकाउत जा रइ

*

बो तौ दैरी खूँदे खा रव

रोज-रोज टरकाउत जा रइ

*

साँप-छछूदर सी गत हो गइ

अपनी खैर मनाउत जा रइ

*

बा इतनी फरफन्दहाउ है

दो की चार लगाउत जा रइ

*

चली बिलइया हज करबे खें

सौ-सौ चुखरा खाउत जा रइ

*

‘भगवत’ हो रव आग बबूला

ओ खें गम्म खुबाउत जा रइ

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१५ – हर कवि का कर्तव्य है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हर कवि का कर्तव्य है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१५ ☆

☆ हर कवि का कर्तव्य है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

हर कवि का कर्तव्य है, कुछ न लिखें अनर्थ।

कविता न बदनाम हो, गूढ़ छिपा है अर्थ।।

*

कविता का जो धर्म है, पहले समझें आप।

मानव का यह ताप हर, दूर करे संताप।।

*

कविता मानव की सखा, जानें उसका मर्म।

कलम सिपाही है वही, समझे अपना कर्म।।

*

वेदशास्त्र इसमें लिखे, पद्य-गद्य अनमोल।

भारत के साहित्य में, मानव हित के बोल।।

*

विसंगतियों का दौर यह,स्वार्थ भाव है आज।

नैतिक मूल्यों को जगा, बदलें सकल समाज।।

*

परिहासों-चुटकुलों से, क्षण भर का आनंद।

कविता में संदेश हो, दूर करें छल-छन्द।।

*

कवियों का यह फर्ज है, कविता का यह धर्म।

गलत दिशा में जो चलें , दिखा राह सत्कर्म।।

*

कीचड़ में खुद न फँसें, सबका रखें खयाल।

मानव हित की सोच से,जग को करें निहाल।।

*

दरबारी खुद ना बने, उससे करें बचाव।

परहित में जो है लगा, उसका करें चुनाव।।

*

हर कवि को है चाहिये, करें फर्ज निर्वाह।

न्याय विवेकी ही रहें , यही कलम की चाह।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चीरहरण ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चीरहरण ? ?

औरत की लाज-सी

खींचकर धरती की हरी चुनर

उतार दिया जाता है

उसकी कोख में पिघलता लोहा,

सरियों के दम पर खड़ी कर दी जाती हैं

विशाल अट्टालिकाएँ,

धरती के सीने पर बिछा दिया जाता है

काँक्रीट, सीमेंट, रेत ऐसे

किसी नराधम ने

मासूमों को चुनवा दिया हो जैसे,

विवश धरती अपनी कोख में

पथरीली आशंका के साथ

छिपा लेती है हरी संभावनाएं भी,

काल बीतता है

इमारत साल दर साल

थोड़ी-थोड़ी खंडहर होती है,

धरती की चुनर

शनैः-शनैः हरी होती है,

इमारत की बुनियाद झर जाती है

धरती की कोख भर आती है,

खंडहर ढक जाता है, उन्हीं

पेड़-पौधों, घास-फूल-पत्तियों से

जिनके बीज कभी पेट में छिपा लिये थे धरती ने!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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