हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९६ ☆ बाल गीत – ओम-ओम की जय हो भैया… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९६ ☆ 

☆ बाल गीत – ओम-ओम की जय हो भैया ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

ओम-ओम की जय हो भैया,

जय-जय-जय बलिदानी है।

भारत माता की भी जय हो,

जय वेदों की वाणी है।

ऋषियों को भी भूल न जाना,

जिनने जीवन दान दिया।

अमर हो गए जो सेनानी ,

उनने अपना प्राण दिया।

 *

जय-जय बोलो राम-कृष्ण की,

प्रेरक सदा कहानी है।

 **

भूल न जाना पंच-तत्व को,

जिनसे हमें शरीर मिला।

स्वच्छ सदा इनको है रखना,

वायु आदि सब नीर मिला।

 *

ईश्वर की सृष्टि निराली है,

वह ही राजा दानी है।

 **

सूर्य-चंद्र-सा मिलकर दमको,

परहित में भी जी लेना।

मानव जीवन यह अमूल्य है,

प्रेम-सु़धा  भी पी लेना।

 *

जय- जय – जय – जय  दयानंद की,

ना ही कोई सानी है।

 **

जिए देश के हित में जो भी,

उनका भी गुणगान करें।

सत्य मार्ग पर चलें सभी जो,

उनका भी सम्मान करें।

 *

श्रद्धानंद संत की जय-जय,

वेद पताका तानी है।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश की कविता # १४४ ☆ गर्मी के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपके भावप्रवण एवं विचारणीय “गर्मी के दोहे” ।)

✍ जय प्रकाश की कविता # १४४ ☆ गर्मी के दोहे ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

दिन जलता है आग से,भरती रात उसाँस

पानी पी पी प्यास भी,बनी गले की फाँस।

पत्ता पत्ता मौन है,मौन हवा के बोल

सूरज तपती आग की,बैठा गठरी खोल।

 *

चिड़िया खोजे रेत में,गुमी नदी की धार

घाट बँधी हर नाव का,डूब गया व्यापार।

 *

लू लपटों की बाढ़ में,बहे पसीना खूब

हरियाली के गाँव में,रही सूखती दूब।

 *

धरती का आँचल फटा,फटी बिवाई पाँव

तरुवर तरुवर खोजती,धूप तनिक सी छाँव।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ (1) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ (1) ? ?

वे निरंतर कोंच रहे हैं मुझे-

……लिखो!

मैं चुप हो गया हूँ..,

अपनी सुविधा

में ढालकर

मेरे लेखन की

शक्ल देकर

अब बाज़ार में

चस्पा की जा रही है

मेरी चुप्पी..,

बाज़ार में मची धूम पर

क्या कहूँ दोस्तो,

मैं सचमुच चुप हूँ!!!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ नौजवान… ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आई आई एम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। आप सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत थे साथ ही आप विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में भी शामिल थे।)

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी ने अपने प्रवीन  ‘आफ़ताब’ उपनाम से  अप्रतिम साहित्य की रचना की है। आज प्रस्तुत है आपकी अप्रतिम रचना “नौजवान…

? नौजवान ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम् ☆ ?

(श्री संजय भारद्वाज जी की कविता से प्रेरित)

वह उम्र नहीं,

एक दहलीज़ होता है

 

जहाँ बीते समय की

थकी हुई स्मृतियाँ और

आने वाले कल के

अनगिनत स्वप्न

एक-दूसरे का हाथ थामते हैं

 

उसी संधि-क्षण पर

जो स्वयं की तिलांजलि देकर

सेतु बनकर

पथ प्रशस्त करता है,

 

बीता समय

आने वाला कल

काल उसे ही

नौजवान कहता है…

~ प्रवीन रघुवंशी ‘आफताब’

© कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

पुणे

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५१ ☆ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रब का वो आसरा नहीं पाता“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५१ ☆

✍ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

धूप औ छाँव क्या नहीं पाता

कर्म का फल बता नहीं पाता

 *

तेज कितना भी सूर्य तपता हो

फिर भी सागर सुखा नहीं पाता

 *

इश्क़ कैसा है बेवफ़ा को भी

चाहकर मैं भुला नहीं पाता

 *

साथ बरसों का है मेरा उससे

क्या है दिल में हवा नहीं पाता

 *

इंतिहां इंतज़ार की है अब

सब्र का फल पका नहीं पाता

 *

डर  हो क़ानून का भला कैसे

सच्चा मुज़रिम सज़ा नहीं पाता

 *

रौनकें रह की देख जो बहके

वो सही रासता नहीं पता

 *

दीन दुखियों के जो न काम आए

रब का वो आसरा नहीं पाता

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५५ – अदृश्य शक्ति… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – अदृश्य शक्ति।)

☆ हेमंत साहित्य # ५५ ☆

✍ अदृश्य शक्ति… ☆ श्री हेमंत तारे  

नभ के वितान पर

शुभ्र- श्वेत जलधर का डेरा

खो जाता है जिस में सबकुछ

हाँ सबकुछ

विमान भी, जो उड़ रहा हो ऊंचाई पर ।

 

जानता है व्योम

अपरिमित है विस्तार उस का

पर,  है कोई शक्ति कहीं

जो रच रही, लीलाएं  सभी

उसके

चाहे- अनचाहे,  जाने- अनजाने ।

 

होता है बहुत कुछ हूबहू वैसा

चाहते हैं हम जैसा

लेकिन

होता है कुछ ऐसा भी

चाहता है वो जैसा

जो बसता है,  शायद बादलों के परे भी

या फिर,

यहीं कहीं,  मेरे आपके आसपास ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५० ☆ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रब का वो आसरा नहीं पाता“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५० ☆

✍ रब का वो आसरा नहीं पाता… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

धूप औ छाँव क्या नहीं पाता

कर्म का फल बता नहीं पाता

तेज कितना भी सूर्य तपता हो

फिर भी सागर सुखा नहीं पाता

 *

इश्क़ कैसा है बेवफ़ा को भी

चाहकर मैं भुला नहीं पाता

 *

साथ बरसों का है मेरा उससे

क्या है दिल में हवा नहीं पाता

 *

इंतिहां इंतज़ार की है अब

सब्र का फल पका नहीं पाता

 *

डर  हो क़ानून का भला कैसे

सच्चा मुज़रिम सज़ा नहीं पाता

 *

रौनकें रह की देख जो बहके

वो सही रासता नहीं पता

 *

दीन दुखियों के जो न काम आए

रब का वो आसरा नहीं पाता

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४८ – बुन्देली कविता – ”सजनइ होन लगी गुड़ियों की” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४८ ☆

☆  बुन्देली कविता – सजनइ होन लगी गुड़ियों की ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

सजनइ होन लगी गुड़ियों की

गुँथन लगी माला गुरियों की

 *

जे नन्हे नटखट कम नइयाँ

नकल करत बुढ़वा-बुढ़ियों की

 *

साहुन में सज गईं दुकानें

छला – फूँदरा उर चुरियों की

 *

होत बाम्हनों में कइ पातें

दुबे, तिवारी, चनपुरियों की

 *

ऐंसी भइ बरसात हनक कै

धार न टूटन दइ उरियों की

 *

रंग-बिरंगे फूल झरे हैं

जेजम बिछ गइ पंखुरियों की

 *

भगवतचुगली सें घर फोरत

कमी नोंइ विष की पुड़ियों की

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कलम मेरी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “कलम मेरी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

मैं कागज़ की श्वेत धरा बनूँ,

तुम स्याही की धार बन जाना,

मैं सपनों की रेखा खींचूँ,

तुम उनका विस्तार बन जाना।

 *

मैं मन के भाव सजाऊँ जब,

तुम अक्षर-अक्षर खिल जाना,

मेरी हर मौन पुकारों में,

तुम स्वर बनकर मिल जाना।

 *

मैं शब्दों का सागर बनूँ,

तुम लहरों की तान बन जाना,

मैं रचना की राह दिखाऊँ,

तुम उसका सम्मान बन जाना।

 *

जब थक जाए ये कलम मेरी,

तुम ऊर्जा बन बह जाना,

मैं कागज़ का रूप धारण करूँ,

तुम मुझमें जीवन भर जाना।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद एवं पाठयपुस्तक लेखिका 

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – असहाय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – असहाय  ? ?

आकाश आज

फिर उतरा था

ज़मीन पर,

जाति संघर्ष में

पति और

दो मासूम बच्चों की

चिता जलाती

असहाय औरत के लिए

धरती छोटी पड़ गई थी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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