हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५४ ☆ गुमान छोड़ के जीना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “गुमान छोड़ के जीना है“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५४ ☆

✍ गुमान छोड़ के जीना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

गुनाह मौन जो देखो छुपी रज़ा होती

बशर गलत न सहे दिल में जो अना होती

 *

दरख़्त नीम के जैसी पिता की फ़ितरत है

घनी दे छाँव भले कड़वी जायका होती

 *

ग़ुरूर जिस्म पै इतना न करो तुम साहिब

जो रूह ओढ़े है वो ख़ाक की रिदा होती

 *

किसी भी मुद्दे की उड़ती ख़बर पे आँख रखें

न सच हो झूठ सरासर नहीं हवा होती

 *

गुमान छोड़ के जीना है आजज़ी अपना

ये मर्ज़ ऐसा है कुछ और कब दवा होती

 *

ये ख़ास होते नुमाइंदे मान लो रब के

फ़कीर की  ज़ुबाँ पै सबको है दुआ होती

 *

हसीन कोई न मेकप से सिर्फ लगता है

हसीन वो है अगर आँख में हया होती

 *

अगर हाँ , देखते हैं, बोले तो, सही नेता

कोई भी काम बताओ नहीं मना होती

 *

अरुण ज़ुदा है जो महबूब से उसे पूछो

फ़िज़ा खिज़ा सी जुदाई में बारहा होती

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५८ – देखें हैं पतझड़… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – देखें हैं पतझड़।)

☆ हेमंत साहित्य # ५८ ☆

✍ देखें हैं पतझड़… ☆ श्री हेमंत तारे  

सब्ज़ थे, अब ये ज़र्द होने लगे हैं

पत्तों के रंग, अब बदलने  लगे हैं

देखें हैं पतझड़,  बहारें भी इन ने

उमंगों के दिन  अब ढलने लगे हैं

 

शजर संजीदा ओ गुमसुम खडे हैं

पतझड  के डर से  सहमने लगे हैं

 

सुक़ूं से था मैं, हसरते थी ग़ाफ़िल

नज़र आये वो अरमां सुलगने लगे हैं

 

मैख़ाना था बन्द हम प्यासे खडे थे

साक़ी  के आते  ही बहकने लगे हैं

 

खौफ़ ए सैय्याद अब बाकी रहा ना

परिंदों के बच्चे  अब चहकने लगे हैं

 

ग़ुंचे तो हसीं थे पर ख़ुशबू नदारद

आते ही उनके ग़ुल महकने लगे हैं

 

कुछ तो हुआ है ‘हेमन्त’ यहां पर

अपने भी अब तो परखने लगे हैं

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆ लघुकथा – उपयोग… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “उपयोग“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆

✍ लघुकथा – उपयोग… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

जबसे बच्चे अलग रहने लगे हैं तबसे वह बदल गई है। किसी से कोई शिकायत नहीं करती। बेटे बहू नहीं चाहते कि उनकी माँ जीवन काम करती रहे इसलिए खाना बनाने के लिए बाई नियुक्त करदी है। पूरे समय सोना आसान नहीं है। बाकी के लोग अपने काम में लगे रहते हैं।उसे व्यर्थ की राजनीति की बातें अच्छी नहीं लगती। इसलिए यूट्यूब पर भगवान कृष्ण संबंधी कार्यक्रम सुनती रहती है। आपने एक बार कोई कार्यक्रम यूट्यूब पर देखा तो दूसरे दिन अपने आप एक दर्जन कार्यक्रम आज जाते हैं और उनमें से चयन करना पड़ता है। अब सर्च नहीं करना पड़ता।

एक दिन एक रेसिपी का वीडियो अपने आप आ गया। उसने देखा तो हर रोज नये नये रेसिपी वीडियो आने लगे। उसे वे अच्छे लगने लगे। न सास बहू का टेंशन न नंद भौजाई की नोंक झोंक, क्योंकि पारिवारिक वीडियो में यही सब कुछ रहता है। इसलिए आज उसने एक नई डिश बनाई भाप पर और फिर एक चम्मच तेल से छोंक दिया। चखने के लिए कहें या खाने के लिए, एक पति ही उपलब्ध है तो सारे एक्सपेरीमेंट उसी पर। पति को अच्छी लग गई तो पड़ोसियों को भी अच्छी लगेगी इसलिए बाँट आई। उसके बाद देखा गया कि उस नई डिश का जो कुछ बचा खुचा था उसे वह खा रही थी।डिस्कवरी और डिश बनाने का उपाय करती रहती है खाने को तो दो ही जाने हैं तीसरा तो कोई है कुछ बना करके और कोशिश करने लगी कोई अच्छा करें वह वही करें वह अपने लिए बचा कुछ खाने को बैठे हैं । मेरी समझ में नहीं आया लोग अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाते हैं और खाते हैं लेकिन  यह महिला है कैसी कि अपने लिए ना बनाकर औरों के लिए बनाती है। हालांकि अब उम्र का प्रभाव हो गया है और अब उतना कम नहीं कर पाती फिर भी दूसरों के लिए काम करने की भावना उसमें है । रेसिपी के नये वीडियो उसका समय अवश्य काटने में मदद कर रहे हैं। लगता है मोबाइल का अच्छा उपयोग सीख लिया है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – टूटता हुआ घर।)

☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

संध्या धीरे-धीरे रात की बाँहों में समा रही थी। आँगन में रखे तुलसी चौरे का दीपक टिमटिमा रहा था। हल्की हवा में चमेली की भीनी सुगंध घुली थी, पर घर के भीतर वातावरण भारी और उदास था।

रसोई में खड़ी सविता दर्द से कराहते हुए भी चुपचाप खाना बना रही थी। सुबह से पैरों में सूजन थी, शरीर बुखार से तप रहा था, लेकिन पति और परिवार की चिंता में उसने अपनी तकलीफ़ को जैसे भीतर ही कैद कर लिया था।

चूल्हे की आँच से उसका चेहरा लाल हो गया था। माथे से पसीने की बूंदें लगातार टपक रही थीं।

उधर बैठक में बैठे उसके पति विकास बार-बार घड़ी देख रहे थे। स्वभाव से वह अत्यंत गुस्सैल और अहंकारी थे। उन्हें ज़रा-सी देरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी।

सविता ने थरथराती आवाज़ में कहा—

“खाना तैयार है…”

बस इतना सुनना था कि विकास भड़क उठे।

“अब याद आया खाना? क्या कर रही थी इतनी देर से?”

उन्होंने क्रोध में भरी गरम दाल की थाली उठाकर ज़ोर से फर्श पर फेंक दी।

थाली पलट गई।

उबलती दाल पास खड़ी सात वर्ष की बेटी गुड़िया के हाथ और चेहरे पर गिर गई।

“माँऽऽ…!”

उसकी दर्दभरी चीख पूरे घर में गूँज उठी।

सविता का कलेजा काँप गया।

वह बदहवास होकर बेटी को सीने से चिपकाए अस्पताल की ओर भागी।

डॉक्टर मरहम लगाते हुए बोले—

“जलन तो ठीक हो जाएगी… लेकिन बच्ची बहुत डर गई है।”

गुड़िया लगातार काँप रही थी।

उसकी छोटी-सी उँगलियाँ माँ का आँचल कसकर पकड़े थीं।

सविता की आँखों से आँसू बहते रहे।

शायद दर्द बेटी के हाथ से ज्यादा उसके अपने हृदय में था।

रात गहरा चुकी थी। घर लौटकर वह चुपचाप बरामदे में बैठ गई।

पास ही बैठी दादी सब देख रही थीं। उनकी बूढ़ी आँखों में अनगिनत प्रश्न तैर रहे थे।

उन्होंने मन ही मन सोचा—

“कैसा दुर्भाग्य है… लोग मंदिरों में सिर झुकाते हैं, रामायण-महाभारत देखते हैं, पर अपने भीतर बैठे रावण को नहीं पहचानते।”

इतने में दरवाज़ा खुला।

विकास भीतर आए।

चेहरा बुझा हुआ था। हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में टूटा हुआ अभिमान।

माँ ने धीरे से पूछा—

“क्या हुआ बेटा?”

विकास कुर्सी पर ढहते हुए बोले—

“आज मेरा प्रमोशन रुक गया…

बॉस ने साफ कह दिया—

‘जिस इंसान को अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं, वह दूसरों का नेतृत्व नहीं कर सकता।’”

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

माँ उठीं, बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—

“बेटा…अहंकार इंसान से पहले उसका सुख छीनता है, फिर अपनों का विश्वास… और अंत में उसका सब कुछ।”

फिर उनकी भर्राई आवाज़ कमरे में गूँज उठी—

“अहंकार की आग में, जल जाते संबंध, रावण जैसा ज्ञान भी, नहीं बचा पाया वंश।”

विकास की नज़र धीरे-धीरे गुड़िया के जले हाथों पर गई…

फिर सविता के सूजे पैरों पर…

और अंत में अपने हाथ में पकड़े अस्वीकृत प्रमोशन पत्र पर टिक गई।

उन्हें पहली बार एहसास हुआ—

आज उनका प्रमोशन नहीं रुका था…

आज उनका घर टूटते-टूटते बचा था।

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

वह धीरे से सविता के पास गए और काँपती आवाज़ में बोले—

“सविता… मुझे माफ़ कर दो…

मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि तुम्हारा दर्द भी नहीं देख पाया।”

सविता ने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी आँखों से बहते आँसू वर्षों से दबे दर्द की कहानी कह रहे थे।

उधर तुलसी चौरे का दीपक अब भी जल रहा था—

धीमा, शांत…मानो टूटते रिश्तों को फिर से रोशनी देने की प्रार्थना कर रहा हो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१७ ☆ गझल… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१७ ?

☆ गझल ☆  प्रभा सोनवणे ☆

मी मानले स्वतःला गंधाळता धुलीकण,

सारे समग्र जीवन केले तुलाच अर्पण

*

त्या पावसात जाता,वारा मुजोर झाला,

सारे ऋतू सुखाचे मी ठेवलेत तारण !

*

गेल्या बुजून तेव्हा साऱ्या वसंतवाटा,

मग शुष्क भावनांनी केली पुन्हा भलावण !

*

नाही,नको म्हणाले घेण्यास उंच झोका,

आकाश चांदण्याचे त्याने दिलेच आंदण !

*

आल्या फुलून बागा,वणवा विझून जाता,

 आयुष्य सांजवेळी झाले कसे विलक्षण !

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares
2

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २७ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

डॉ. शोभना आगाशे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २७ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर  

नाटककार रविंद्रनाथ – २ 

वयाच्या विसाव्या वर्षी म्हणजेच १८८१ साली त्यांनी ‘वाल्मिकी प्रतिभा’ हे गीत नाट्य लिहिले. त्या काळात प्रसिद्ध असलेल्या बिहारीलाल रचित ‘शारदा मंगल’ या दीर्घ काव्यावर हे नाटक बेतलेले होतं. त्याच वर्षी २५ फेब्रुवारीला या नाटकाचा पहिला प्रयोग ठाकूर कुटुंबाच्या जोराशांको वाड्याच्या गच्चीवर झाला. टागोरांच्या विशाल कुटुंबातील लोक, मित्रपरिवार व बंकिमचंद्रांसारखे अनेक सुजाण रसिक आमंत्रित होते. या नाटकातील सर्व गाणी रविंद्रनाथांनी संगीतबद्ध केली होती. कांही गाणी रागदारी वर आधारित होती तर काही चक्क इंग्रजी बॅन्ड च्या चालीवर बांधली होती. या नाटकामुळे टागोर कुटुंबीय काळाच्या पुढे एक पाऊल असल्याचं सिद्ध झालं. कारण या नाटकात स्वतः रविंद्रनाथांनी वाल्मिकीची तर त्यांची पुतणी प्रतिभा हिने सरस्वतीची भूमिका केली होती. एकोणिसाव्या शतकात कुलीन घरच्या मुलींनी रंगमंचावर पाऊल टाकणे ही गोष्ट क्रांती पेक्षा कमी नव्हती. यावर वर्तमानपत्रांतून टागोर कुटुंबावर टीका देखील झाली.

आपल्या अन्य नाटकातून देखिल त्यांनी समाजसुधारणेचा एल्गार केला होता. ‘रथयात्रा’ मध्ये चातुर्वर्ण्य पद्धतीवर टीका आहे तर ‘रक्तकरबी’ मध्ये स्वातंत्र्याच्या कल्पनेविरोधातली राजसत्ता दाखवली आहे. ‘राजा’ नाटकात सामान्य जनतेचा सत्तेत सहभाग असण्या विषयीचा आग्रह आहे. ‘विसर्जन’ मध्ये देवीला बळीचे रक्त वाहण्याच्या प्रवृत्ती विरुद्ध संघर्ष आहे. ‘अचलायतन’ मध्ये पोपटपंचीलाच ज्ञान म्हणणाऱ्या शिक्षण पद्धतीवर भाष्य आहे. ‘डाकघर’ मध्ये नियतीचे कठोर दर्शन आहे. ‘फाल्गुनी’ नाटकातल्या कवीच्या तोंडी एक वाक्य आहे, “काव्यरचनेचं रसग्रहण करण्यापेक्षा तिच्या निर्मितीतला आनंद साजरा केला पाहिजे. ” ‘जत्रा’ नाटकात संस्कृत नाटकातल्या सूत्रधारासारखं एक सर्वगामी पात्र आहे.

‘राजा’ नाटकात प्रजासत्ताकाची कल्पना मांडल्यामुळे, हा इंग्रजांविरोधातला राजद्रोह आहे अशी हाकाटी तथाकथित राजनिष्ठांनी मारली होती. गीतनाटक, नृत्यनाटक याबरोबरच त्यांनी रोचक विनोदी शैलीत नाटकं लिहून आपल्या सर्वांगीण मुक्तीच्या विषयाचा पुरस्कारही केला आहे. ‘वैकुंठेर खाता’, ‘छात्रेर परिक्षा’, ‘सूक्ष्म विचार’, ‘अन्त्येष्टी संस्कार’

अशी उपहासात्मक विनोदी नाटके लिहून त्यांनी प्रचलित सामाजिक रूढींवर प्रहार केला आहे. ‘ताशेरे देश’, ‘शोध बोध’, ‘चिर कुमार प्रभा’ ही देखील अशीच सामाजिक रूढींवर, अंधानुकरणावर विनोदी अंगाने प्रहार करणारी नाटके आहेत.

चित्रांगदा हे नृत्यनाट्य त्यांनी वयाच्या ७५व्या वर्षी लिहिलं, ते सुद्धा अवघ्या सात दिवसांत! ‘प्रकृतीर परिशोध’ या नाटकात, मुक्तीच्या शोधात संसारातून पळून जाणं म्हणजे भ्याडपणा असल्याचं प्रतिपादन आहे. नाट्यक्षेत्रात एवढी मोलाची भर घालणाऱ्या रविंद्रनाथांना; नटश्रेष्ठ शिशिर भादुरी व श्रेष्ठ नाट्यदिग्दर्शक शंभू मित्रा यांचा अपवाद वगळता, व्यावसायिक बंगाली रंगभूमीने मात्र साथ दिली नाही.

(संदर्भ- रविंद्रनाथ तीन व्याख्याने ले. पु ल देशपांडे)

—– 

☆ गीत : ७९ ☆

IF it is not my portion to meet thee in this my life then let me ever feel that I have missed thy sight ⎯ let me not forget for a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my 

dreams and in my wakeful hours.

As my days pass in the crowded market of this world and my hands grow full with the 

daily profits, let me ever feel that I have gained nothing ⎯ let me not forget for a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours.

When I sit by the roadside, tired and panting, when I spread my bed low in the dust, let me ever feel that the long journey is still before me ⎯ let me not forget for a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours.

When my rooms have been decked out and the flutes sound and the laughter there is 

loud, let me ever feel that I have not invited thee to my house ⎯ let me not forget for a 

moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours.

—–

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ७९ ☆

तुला ना पाहीन,

जर हेच प्राक्तन,

सुनेसुनेच जीवन,

डोळे असुनि, आंधळा गा॥

*

इथल्या बाजारी,

नफ्यात कारभारी,

दर्शनाची उधारी,

ठेउनि व्यर्थ जन्म हा॥

*

दमुनि सांजेला,

टेकुनि माथ्याला,

येईल ध्यानाला,

अजुनि प्रवास लांबचा हा॥

*

घर माझे सजेल,

सूर सनई वाजेल,

मधु हास्यही फुलेल,

तुझ्याविना सर्व व्यर्थ बा॥

*

दर्शनास मी मुकावे,

वैषम्य मज न साहवे,

दुःख हे सतत वहावे,

स्वप्नी वा जागृतीत म्या॥

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—– 

☆ गीत : ८० ☆

I AM like a remnant of a cloud of autumn uselessly roaming in the sky, O my sun everglorious! Thy touch has not yet melted my vapour, making me one with thy light, and 

thus I count months and years separated from thee.

If this be thy wish and if this be thy play, then take this fleeting emptiness of mine, paint it with colours, gild it with gold, float it on the wanton wind and spread it in varied wonders.

And again when it shall be thy wish to end this play at night, I shall melt and vanish away 

in the dark, or it may be in a smile of the white morning, in a coolness of purity transparent.

—–  

☆ मराठी भावानुवाद : गीत : ८० ☆

हे दिनमणी!

हेमंती मेघावशेष फिरे नभी मी अनासक्त

जल माझे विरू दे, होऊ दे मला रिक्त

*

तव प्रकाशी लुप्त होऊ दे।

धवल रूप ते तुझे घेऊ दे।

दोघांमधले अंतर ढळू दे।

*

अशक्य जर हे!

पोकळी जाणवे अंतरात मज

विविध रंगी तव रंगू दे तिज

*

सुवर्ण मुलामा त्यावरी देई।

सोडून उनाड वार्‍यावर देई।

दिशा दिशांना पसरत जाई।

*

या नाट्याचा अंक अंतिम!

होईन निशेच्या मी तमात लुप्त

अथवा दिवसाच्या प्रकाशी लिप्त

*

अस्तित्वहीन मज रूप मिळू दे।

पारदर्शी अन् पवित्र बनू दे।

समर्पणातच लीन होऊ दे।

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९४५०२२८६५८

—– 

☆ गीत : ८१ ☆

ON many an idle day have I grieved over lost time. But it is never lost, my lord. Thou hast taken every moment of my life in thine own hands.

Hidden in the heart of things thou art nourishing seeds into sprouts, buds into blossoms, and ripening flowers into fruitfulness.

I was tired and sleeping on my idle bed and imagined all work had ceased. In the morning I woke up and found my garden full with wonders of flowers.

—– 

☆ मराठी भावानुवाद : गीत :८१ ☆

पळे वाया जावी।

खंत का करावी।

त्याच्या हाती द्यावी।

सारी सत्ता॥

*

अंकुर बियांचे।

फूल कळीयांचे।

फळ हो फुलांचे।

त्याच्या हाता॥

*

दमुनि झोपतो।

स्वप्नात बघतो।

काजा संपवितो।

विठू माझा॥

*

– क्रमशः भाग २७

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © शोभना आगाशे

सांगली 

दूरभाष क्र. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५१ – बुन्देली कविता – ”अंगरेजन से जौन लड़ी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – अंगरेजन से जौन लड़ी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५१ ☆

☆  बुन्देली कविता – अंगरेजन से जौन लड़ी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

अंगरेजन सें जौन लड़ी है

हमने ऊ की किसा पढ़ी है

समर भूम में झाँसी बारी

सीना ताने रई अड़ी है

 *

प्रान निछावर करे देश पै

दुश्मन खें दै दई तड़ी है

 *

खूब लड़ी मर्दानी बारी

कविता कई-कई बार पढ़ी है

 *

झाँसी में लक्ष्मी बाई की

ऊँची मूरत उतइ खड़ी है

 *

अमर भई झाँसी की रानी

हर दिल में तस्वीर जड़ी है

 *

भगवतनाँव लेत रानी कौ

जयकारों की लगत झड़ी है

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२३ – मानवता की ज्योति जलाएँ  ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “मानवता की ज्योति जलाएँ । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२३ ☆

☆ मानवता की ज्योति जलाएँ  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

मनुज परिस्थिति से लड़ता है।

जीवन को जीना पड़ता है।।

*

मानवता की ज्योति जलाएँ ।

किसी धर्म में कुछ जड़ता है।।

*

मधुरिम-मधुर सँवारो जीवन।

बुरी सोच से मन सड़ता है।।

*

गलत कर्म से दूरी रखिए।

लज्जित हो भू में गड़ता है।।

*

चिंताओं से चिता सँवरती।

वय का पौधा तब झड़ता है।।

*

सद्पुरुषों की धरा रही यह।

कट्टरता पर कब अड़ता है??

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०६ ☆ “आकांक्षा” (काव्य संग्रह) – कवि : श्री परमानन्द सिन्हा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री परमानन्द सिन्हा जी द्वारा लिखित  काव्य संग्रह आकांक्षापर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०६ ☆

☆ “आकांक्षा” (काव्य संग्रह) – कवि : श्री परमानन्द सिन्हा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

काव्य संग्रह : आकांक्षा

कवि : श्री परमानन्द सिन्हा

प्रकाशक : बुक्स क्लिनिक, बिलासपुर

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

☆ ‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का निचोड़ है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

साहित्य में काव्य की सार्थकता केवल शब्दों के चयन या तुकबंदी में नहीं, बल्कि उन जीवन मूल्यों में निहित होती है जो समाज को संबल प्रदान करते हैं। कविता , अभिव्यक्ति की सर्वाधिक प्राचीन विधा है।  कंठस्थ रहने में सुगमता एवं साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के चलते बरसों से काव्य,  साहित्य के शिखर पर है। एक रचनाकार जब अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उतारता है, तो वह स्वयं को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि अपने युग की धड़कनों को स्वर देता है।

‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह इसी उदात्त परंपरा का निर्वहन करता है, जहाँ कविता मनोरंजन की परिधि से बाहर निकलकर आत्म-चिंतन और नैतिक बोध का माध्यम बनती है। काव्य मूल्यों की कसौटी पर यह संग्रह इसलिए खरा उतरता है क्योंकि इसमें सत्य की कटुता और संवेदना की कोमलता का अद्भुत संतुलन है। जब मैं इन कविताओं से गुजरा  तो मैंने पाया कि रचनाकार मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर के सहपाठी , वहां मेरे प्रारंभिक साहित्यिक सफर के सहयात्री भाई परमानंद सिन्हा जी ने जीवन के प्रति एक सकारात्मक और मूल्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है, जो आज के अस्थिर परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है।

इस संग्रह की समालोचना करते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी रचनाओं में भाव और यथार्थ का जो शाश्वत तथ्यों का ताना-बना बुना है, वह अत्यंत सुदृढ़ है। उदाहरण के लिए,

सुगंधित फूलों के संग,

काटें भी तो बेशुमार है।

खुशियों की नदी बहती है,

पर दुख भी तो अपार है।

 इसी प्रकार,  कवि की लेखनी मर्म स्पर्शी हो जाती है,  वे लिखते हैं

अंधियारे को देखा पिघलते हुये,

रवि की किरणों को मचलते हुये।

शीतल सुखद थी, सुबह की बयार,

पंछी उड़ चले, चह चहाते हुये।

इन पंक्तियों में छायावादी गीत चेतना परिलक्षित होती है। जो प्रकृति परिवेश का शाब्दिक चित्र बनाती है।

एक मिजाज के गीत एक खंड में संजोकर उन्होंने पाठकों के लिए अलग अलग गुलदस्ते एक साथ प्रस्तुत किए हैं।

लंबे अंतराल में मनोभावों को शब्दों में प्रस्तुत कविताओं को संग्रह के अंतिम स्वरूप में प्रकाशित कर एक विशद साहित्यिक , संपादन का उनका प्रयास स्तुत्य है।

संग्रह के काव्य विधान, शैली और भाषा की बात करें तो इसमें एक सहज प्रवाह और माधुर्य है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कवि ने क्लिष्ट और बोझिल शब्दावली के स्थान पर ऐसी सुगम भाषा का प्रयोग किया है जो जनमानस से सीधे संवाद करती है। उनकी शैली वर्णनात्मक होते हुए भी प्रतीकों और बिंबों से इस प्रकार सजी हुई है कि कविता पढ़ते समय दृश्य जीवंत हो उठते हैं।

यहाँ उपमा और रूपक अलंकारों का प्रयोग किसी कृत्रिम साज-सज्जा की तरह सायास नहीं, बल्कि भावों की तीव्रता बढ़ाने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है।

छंदों की गति और लय  में एक आंतरिक संगीत है, जो इन रचनाओं को केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गुनगुनाने योग्य भी बनाता है। शिल्प और कथ्य का यह सामंजस्य श्री परमानंद सिन्हा जी के काव्य संग्रह ‘आकांक्षा’ को एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान दिलाता है।

अंततः, ‘आकांक्षा’ काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का वह निचोड़ है जो समाज के लिए उनकी अप्रतिम भेंट सिद्ध होगा । इस काव्य कृति के माध्यम से कवि ने अपनी रचनात्मकता का जो परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। मैं रचनाकार से यह मंगलमयी आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनकी लेखनी इसी प्रकार सा+हित के  रचनात्मक लोक कल्याणी मार्ग पर प्रशस्त रहेगी। पाठकों को उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वे मानवीय संवेदनाओं के और भी सूक्ष्म धरातलों को अपनी लेखनी से स्पर्श करेंगे और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए निरंतर सृजनरत रहेंगे।  यह साहित्यिक यात्रा निरंतर पल्लवित हो और ‘आकांक्षा’ पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बनाए, यही मेरी हार्दिक मनोकामना है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६७ – शोभा की सुंदरता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा शोभा की सुंदरता ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६७  ☆

🌻लघु कथा🌻 शोभा की सुंदरता 🌻

आज सुबह शोभा कार्यक्रम का वीडियो बना रही थी। सामने मोबाइल पर अपना चेहरा देख अंर्तमन से आवाज आई– अब तुम बूढ़ी हो चली। सफेद होते केश झुर्रियाँ लटकते गाल, शिकन पड़े ललाट और होठों पर बरसों की चुप्पी साधे। वह घटना जिसने उसके मुस्कान पर ताला लगाया।

जीना तो सीखा, धैर्य सहनशीलता की मूरत बन पति का असमय संग छोड़ जाना, पूरा कारोबार संभाला, बच्चों की परवरिश करते उसने हिम्मत और हौसला बुलंद रखा।

मोबाइल का स्क्रीन बंद करते हुए वह बोल पड़ी— अब मैं बूढ़ी हो चली। सामने बैठी सहेली उठी धीरे से मुस्कुराया और उसने शोभा के उलझे बंधे लटों को खोल होठों पर लाली लगाई और छोटी सी लाल बिंदी माथे पर लगा बोली– शोभा कभी बूढ़ी नहीं होती। चाहे सृष्टि हो, सरिता हो, सृजन हो, प्रकृति हो, पूजन हो, धर्म हो, कर्म हो, अपने हो, सपने हो, खुशियाँ हो और हरियाली हो, कल आज और कल शोभा न कभी बूढ़ी हुई है और न कभी होगी।

उसकी सुंदरता सदैव रहती है तुम वही शोभा हो। दोनों एक दूसरे के गले लग मुस्कुरा उठी।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares