(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
आज प्रस्तुत है लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा दर्शाती सुप्रसिद्ध लघुकथाओं में से एक सर्वश्रेठ लघुकथा – स्टिकर। हम आपके साथ भविष्य में भी श्री कमलेश भारतीय जी की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ आपसे साझा करते रहेंगे। कृपया आत्मसात करें।
☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा : स्टिकर ☆
एक पार्टी के लोग मुझसे चंदा मांगने आए । उनके भले चेहरों को देखकर मैं इंकार न कर सका । चलते चलते वे अपनी पार्टी का स्टिकर भी ड्राइंगरूम में लगा गये । मैं विचारों से सहमत न होते हुए भी लोकलज्जावश चुप रह गया ।
अब जो भी आता, पहले मुझको, फिर स्टिकर को घूरने लगता । घुमा फिरा कर पूछ ही लेता कि क्या मैं फलां पार्टी का सदस्य हूं । मैं इंकार में सिर हिला देता । अगला सवाल फिर होता, यदि सदस्य नहीं तो क्या इस पार्टी के हमदर्द हो ? मैं मासूम सा इंकार फिर कर देता । फिर तो जैसे तोप का मुंह मेरी ओर हो जाता ।
मोटी सी बात कही जाती- जब सदस्य नहीं, हमदर्द नहीं, तो फिर चंदा किसलिए ?
अब मेरा माथा ठनका । यह मामूली सा स्टिकर मेरी जान का जंजाल बन गया । बात ठीक भी लगने लगी । यदि किसी पार्टी का स्टिकर मेरे ड्राइंगरूम में लगेगा तो मेरे ही विचारों का प्रतिरूप माना जायेगा । मैं मामूली से स्टिकर को अपना मुखौटा क्यों बनने दूं ? किसी की विचारधारा को मैं क्यों ढोता फिरूं ?
एक फैसले के तहत मैने चाकू लेकर स्टिकर को काट दिया और मुक्ति की सांस ली
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४३ ☆ श्री सुरेश पटवा
7.पग-पग नर्मदा यात्रा
नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण
घुग़री से गरारू घाट 11नवम्बर2019
घुग़री से आगे बढ़ने के पहले लोगों से आगे के रास्ते के बारे में जानकारी लेने नीचे घाट पर उतरे तो पता चला कि नर्मदा किनारे का रास्ता ख़राब है। बहुत ऊबड़-खाबड़ या कीचड़ मिलेगी इसलिए नहर के किनारे चलने लगे। सुबह जब चलना शुरू करते हैं तब स्फूर्ति से लंबा रास्ता तय करने का प्रयास रहता है लेकिन एकाध किलोमीटर चलने पर माँस पेशियाँ तैयार होतीं हैं परंतु साँस को आराम देने के लिए थोड़ा आराम ज़रूरी रहता है। कोई दो किलोमीटर दूर एक गौड़ परिवार का खुला घर दिखा, नर्मदे हर उद्घोष के बाद रुके। उनका नाम मुन्ना ठाकुर राजगौड़ था, उनके तीन मुस्कुराते निश्छल चेहरे वाले बच्चों से बच्चा बनकर बतियाया, एक बच्चे ने सीताफल खाने को दिया और भैंस का ताजा दूध बासी रोटी के साथ पिया। उसकी बीबी चतुर थी उसने वहाँ 30 रुपए लीटर मिलने वाला दूध का भाव हमसे 40 रुपए लीटर तय करके ठग लिया। हमें कबीर की उलटवासी याद आ गई।
कबीरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय
आप ठगाए सुख ऊपजे, और ठगे दुःख होय।
वैसे हम भी ठगाए नहीं थे क्योंकि शहरों में 50 रुपए मिलने वाले नक़ली दूध की जगह सामने भैंस से दुहता असली दूध 40 रुपए लिया था। अरुण भाई ने ख़ुश होकर उसे 100 रुपए दिए। इस मामले में अरुण भाई काइयाँ गुज़ारती न होकर ठेठ बुंदेलखंडी हैं, दिल ख़ुश-तिजोरी फुक्क। मुन्ना ठाकुर राजगौड़ की पत्नी तीन बच्चों की माँ होने के बाद भी स्वाभाविक सुंदर, फ़ुर्तीली व चपल थी, वह मेहनतकश नारी देह की मालकिन थी। उसने शायद ही कभी ब्यूटी पार्लर का मुँह देखा हो जहाँ शहरी औरतें शरीर में क़ैद माँस पिंडों को क्रीम से थ्रेडिंग करवा कर सौंदर्य का आभास ख़रीदती रहती हैं। उनके भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों हैं। उन्हें बटेर, खरगोश और मछली भोजन हेतु आसानी से मिल जाते हैं। उन्होंने खुलकर हमसे बातें कीं। असल में इंसान प्यार और बातचीत का भूखा होता है, लोगबाग अहंकारी चित्त होने के कारण खुलना नहीं चाहते।
रहीमन पैडा प्रेम को निपट सिलसिली गैल
बिलछत पैर पीपिलि को लोग लदावत बैल।
प्रेम व्यवहार की गली अत्यंत चिकनी फिसलन भरी है, लोग उस पर भी कंधों पर अहंकारी बैल को लादकर चलना चाहते हैं, यह कैसे सम्भव है।
हमारे एक साथी की बवासीर भड़क गई बहुत सारा ख़ून बह जाने से कमज़ोरी स्वाभाविक थी, अविनाश भाई ने उन्हे ग्लूकोज़ का घोल पिलाया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यात्रा करना जारी रखा। रास्ते में एक स्थान पर चढ़ाई करते हुए उन्हें चक्कर आ गया। पुनः खजूर और गुड खिलाया, वे दस मिनट में दुरुस्त होकर चलने लगे। उन्हें समझाया कि ज़्यादा तेज़ चलना ठीक नहीं है। उन्होंने सामान्य गति से चलते हुए नियत यात्रा पूरी की लेकिन आख़िरी दिन सतधारा में नहाते हुए मुँह के बल गिरे, उनकी नाक पर गहरी चोट आई। उन्हें तैरना नहीं आता था। ग़नीमत है कि वे नर्मदा की गहराई में नहीं गिरे वरना बड़ा हादसा हो सकता था।
नरसिंहपुर जिले का पूरा इलाक़ा लोधियों से आबाद है। लोधी एक बहुत मेहनतकश और जूझारू क़ौम है। खेतों में बेतहाशा मेहनत करते दिखते हैं। चारों तरफ़ गन्ने की दस-बारह फ़ुट ऊँची और पीले फूल से सजी तुअर दाल की फ़सल लहरा रही थी। एक खेत में एक लोधी किसान उसकी पत्नी और दो पुत्र सहित आलू की बौनी कर रहे थे। उन्होंने बताया छोटे अंकुरित आलुओं की ख़रीद नरसिंघपुर से करके लाए हैं। चार भैंसों का गोबर इकट्ठा करके खाद बनाकर क्यारियों में पहले खाद बिछाते हैं फिर अंकुरित आलू रखकर मिट्टी से पूर देते हैं। एक आलू से दस-बारह आलू उपजते हैं। आलुओं की बातों में हमने धीरे से बात ऊठाई कि यार आलू चिप्स के साथ चाय मिल जाती तो मज़ा आ जाता। कहने भर की देर थी, किसान की पत्नी चाय बना लाई। किसान ने बताया कि किसानी से घर का ख़र्च मुश्किल से निकलता है। किसान की क़िस्मत छलनी में दूध छानने जैसी है। अच्छी फ़सल आए तो दाम गिर जाते हैं और फ़सल ख़राब हो जाए तो लागत नहीं निकलती है। आदर्शवादियों ने “किसान को अन्नदाता बताकर” उसकी आशान्वित समृद्ध सम्भावनाओं को निरस्त कर दिया। व्यापारियों और कारोबारियों के हाथों किसान दोहरे शोषण के शिकार हैं, वे एक तरफ़ खाद, बीज, कीटनाशक और उपकरणों की क़ीमत बढ़ाकर भारी मुनाफ़ा कमाते हैं वहीं दूसरी तरफ़ किसान के उत्पाद अनाज मंडी, फल मंडी, सब्ज़ी मंडी में औने-पौने में ख़रीद कर तिजोरी भरते हैं। इस शोषण तंत्र को किसान-नेता और कारोबारियों का नेतृत्व राजनैतिक दबंगई से किसान हितैषी बनकर बड़ी कुशलता पूर्वक चलाते हैं, वे किसानों की ऋण माफ़ी का आंदोलन करके उन पर अहसान का बोझ डालकर वोट-बैंक पक्का कर सत्ता के भागीदार हो शोषण तंत्र अनवरत चलाते रहने में सफल हैं। किसान अब सिर्फ़ किसान नहीं बना रहना चाहता वह यूरोप और अमेरिकी किसानों की तर्ज़ पर यथार्थवादी कारोबारी बनना चाहता है, लेकिन कारोबारी शोषण तंत्र का शिकंजा उसे साँस नहीं लेने देता उसका दम घुटते रहता है किसानों की मानसिक प्रताड़ना की भयावहता आए दिन उनकी आत्महत्या की घटनाओं से समझी जा सकती है। स्वार्थी और कलुषित मनुष्यों का षड़यंत्रकारी तंत्र देखिए किसान को अन्नदाता कहकर भिखारी और क़र्ज़ न चुकाने वाला बेईमान बना दिया और महिलाओं को देवी बताकर उनकी इज़्ज़त लूट साक्ष्य मिटाने हेतु जलाने लगे।
गरारू घाट के एक आश्रम में पहुँचने पर एक अद्भुत स्वामी जी के दर्शन हुए। वे बंगाली स्वामी पहुँचते से ही बोले यहाँ जगह नहीं है, आप लोग चाय पीजिए और आगे मंदिर पर रुकने का इंतज़ाम कीजिए। हमने कहा “स्वामी जी यहाँ रुकते तो आपसे वेदांत ज्ञान लेते।” उन्होंने डाँटते हुए कहा वेदांत जानने के लिए एक-दो साल भी कम है फिर तुरंत पैंतरा बदल कर बोले “ब्रह्म क्या है, हम, तुम सबमे यहाँ तक कण-कण में ब्रह्म है, आपको जानकारी मिल गई न, अब आप स्वयं पढ़ो और जानो, आप आगे जाओ।” हमने कहा “स्वामी जी ज्ञान हेतु गुरु का माध्यम ज़रूरी है।” वे फुफकारते हुए बोले बाबा “लो चाय पीओ आगे बढ़ो।” बाद में अगले दिन उनके एक सेवक ने बताया कि बंगाली बाबा अपने व्यवहार के लिए दुखी हो रहे थे।
तक़रीबन एक किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर ऊपर पहुँचे वहाँ एक कथा वाचक का पंडाल लगा था उनके सेवक नरेश लोधी ने स्वागत किया और खुले में टेंट में सोने की जगह दे दी। रात में एक भद्र महिला द्वारा भेजे दूध में अविनाश भाई का पोहा शक्कर मिलाकर खाकर सोने की कोशिश की तब नर्मदा के बहाव की ध्वनि सुनाई दी, पूरे खिले चाँद की चटक चाँदनी में दूर से आती कलकल मद्धिम ध्वनि लोरी सी लग रही थी। सोने के पूर्व प्रयास भाई ने कविताएँ सुनाईं। दो-चार जुगलबंदी हमने भी बांचीं।
(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता जरा इतिहास को पढ़ लो !!)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १३ ☆
☆ जरा इतिहास को पढ़ लो !! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८३ आणि ८४ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ८३ – – –
जेणे जाळिला काम तो राम ध्यातो ।
उमेसी अती आदरे गूण गातो ।
बहू ज्ञान वैराग्य सामर्थ्य जेथे ।
परी अंतरी नामविश्वास तेथे ।।८३।।
अर्थ : मदनाला म्हणजेच कामदेवाला ज्या भगवान शंकरांनी जाळून भस्म केले, ते शंकर स्वतः रामाचे ध्यान करतात. श्रीरामांचे गुण अत्यंत आदरपूर्वक पार्वतीला सांगतात. ज्यांच्या ठायी महान सामर्थ्य, ज्ञान आणि वैराग्य हे गुण एकवटले आहेत, अशा भगवान शंकरांच्या अंतरंगात नामाबद्दलचा दृढ विश्वास वास करून आहे.
(ध्यातो – ध्यान करतो, उमा – पार्वती)
विवेचन : या श्लोकातही समर्थ रामनामाचे महत्व आपल्याला पटवून देत आहेत. रती आणि मदन ही जोडी म्हणजे कामभावनेच्या देवता मानल्या जातात. कामभावनेचे मानवी जीवनात काही एक महत्व जरूर आहे. परंतु जेव्हा ही कामभावना अतिरेकी रूप धारण करते, तेव्हा ती माणसाला विनाशाकडे नेते. रावणासारख्या पौराणिक व्यक्तिरेखा आणि नंतरच्या काळातही अगदी आजपर्यंत अतिरेकी कामवासनेने ज्यांचा विनाश घडवून आणला अशा अनेक व्यक्तींची नोंद इतिहासात आढळते. त्यातूनच युद्धे देखील उद्भवली आहेत. कामवासना जर ज्ञान, वैराग्य आणि कर्तव्याच्या आड येत असेल तर तिला जाळून भस्म करणेच योग्य ठरते. तेच भगवान शंकरांनी आपला तृतीय नेत्र उघडून केले. तिसरा डोळा हा ज्ञानाचे प्रतीक मानला जातो. त्याचा दुसरा अर्थ असा की ज्ञानाच्या साहाय्याने कामभावनेवर नियंत्रण मिळवावे.
भगवान शंकरांनी त्यांची तपस्या भंग करणाऱ्या कामदेवाला आपला तिसरा डोळा उघडून भस्म केले. एवढे सामर्थ्य असणारे भगवान शंकर पार्वती मातेला श्रीरामांचे गुणवर्णन करून सांगतात. भगवान शंकर म्हणजे सामर्थ्य, ज्ञान आणि वैराग्य यांचे मूर्तिमंत प्रतीक! माता पार्वती देखील काही कमी नाही. ती देखील ज्ञान, वैराग्य आणि साधना यांचे प्रतीक आहे. पण या दोघांमध्ये एक समानता आहे. दोघांच्याही अंतरात रामनामाबद्दल अतूट श्रद्धा आहे. एवढे प्रचंड सामर्थ्य ठायी असलेले भगवान शंकर आणि पार्वती जेथे प्रभू श्रीरामाचे ध्यान करतात तेव्हा रामनामाची महती सांगण्यासाठी आणखी कोणते उदाहरण द्यायला हवे?
आपल्या मनातील कामवासना अनियंत्रित होत असेल, तर त्यावर नियंत्रण मिळवण्यास रामनाम हे अचूक आणि अमोघ अस्त्र आहे. परंतु अशा व्यक्तींनीच रामनाम घ्यावे असा याचा अर्थ नाही. ज्यांच्या ठायी ज्ञान, वैराग्य आणि शक्ती आहे अशा व्यक्ती देखील रामाचे ध्यान करतात. किंबहुना ज्ञान, वैराग्य आणि शक्ती प्राप्त होण्यासाठी रामनामासारखा दुसरा उपाय नाही असे देखील म्हणता येते. ज्ञान, वैराग्य आणि शक्ती यांचे अधिष्ठान रामनाम आहे. संत कबीर म्हणतात, ” कबिरा राम हृदय बसे, काम कहाँ घर होय? ” जिथे हृदयात रामाला स्थान दिले, तिथे कामासारख्या गोष्टींसाठी जागाच कुठे उरते?
स्वसंवाद ::
१. भगवान शंकर आणि माता पार्वती अत्यंत आदराने रामगुणांचे गायन करतात तरी देखील रामनामाचे महत्व मला स्वतःला पटवून देण्यासाठी अन्य गोष्टींची आवश्यकता वाटते का?
२. ज्ञान, वैराग्य आणि सामर्थ्य हे गुण माझ्याकडे नसले, तरी या तिन्ही गुणांचे अधिष्ठान असणारे ‘रामनाम’ घ्यावे असे मला वाटते का?
३. माझ्या मनात जेव्हा एखादा वाईट विचार किंवा अनावर वासना डोके वर काढते, तेव्हा मी माझ्या ‘ज्ञानाचा तिसरा डोळा’ (विवेक) उघडून तिला भस्म करतो का?
– – – –
श्लोक क्र. ८४ – – –
विठोने शिरी वाहिला देवराणा ।
तया अंतरी ध्यास रे त्यासि नेणा ।
निवाला स्वये तापसी चंद्रमौळी ।
जिवा सोडवी राम हा अंतकाळी ।।८४।।
अर्थ : प्रत्यक्ष विठ्ठलाने देवराणा म्हणजे श्रीशंकराला डोक्यावर धारण केले आहे. त्या श्रीशंकराच्या हृदयात मात्र रामनामाचा ध्यास आहे हे आपल्याला माहिती नाही का? मस्तकी चंद्र धारण करणाऱ्या महान तपस्वी अशा भगवान शंकराचा दाह रामनामाने शांत झाला. आपल्या अंतकाळी रामनामच आपल्याला सोडवणार आहे.
(विठोने – विठ्ठलाने, देवराणा – देवांचा राजा /महादेव, नेणा – जाणत नाही, तापसी – तपश्चर्या करणारा, चंद्रमौळी– शिरावर चंद्र धारण करणारा (शंकर), निवाला – शांत झाला)
विवेचन : रामनामाचे महत्व पुन्हा स्पष्ट करणारा हा सुंदर श्लोक आहे. पंढरपूरचा पांडुरंग म्हणजे सर्व संत, वारकरी यांचे दैवत. पांडुरंग हा श्रीकृष्णाचाच अवतार मानला जातो. असा हा भक्तांचा लाडका असणारा पांडुरंग स्वतःच्या मस्तकावर श्रीशंकराला धारण करतो. पांडुरंगाच्या डोक्यावर शिवाच्या पिंडीचा आकार दिसतो. दुसरी गोष्ट म्हणजे पांडुरंग स्वतःच श्रीशंकराचे गुणगान करतो. या अर्थाने देखील तो शंकराला डोक्यावर घेतो असे म्हणता येईल. कारण एखाद्याचे गुणगान करणे म्हणजे त्याला मस्तकी बसवणे. तेच पांडुरंगाने केले आहे. पण समर्थ पुढे म्हणतात की ज्या विठ्ठलाने श्रीशंकराला आपल्या शिरावर घेतले आहे, त्या भगवान शंकरांच्या हृदयात देखील रामानामाचा ध्यास आहे. या ठिकाणी श्रीरामाचे आणि रामनामाचे महत्व फारच सुंदररित्या आपल्याला पटवून दिले आहे. आणखी एक गोष्ट म्हणजे समर्थ रामनामाचे श्रेष्ठत्व आपल्या मनावर ठसवण्यासाठी वारंवार श्रीशंकराचे उदाहरण का देत आहेत याचाही विचार केला पाहिजे. ज्यांच्याकडे अथांग ज्ञान आणि वैराग्य आहे, तेच जर नामाचा आश्रय घेत असतील, तर आपल्यासारख्या सामान्य माणसाचा अहंकार गळून पडायला हवा, हाच समर्थांचा यामागील हेतू असावा.
श्रीशंकरांना रामनामाचा ध्यास लागलेला आहे. रामनाम म्हणजे जणू त्यांचा श्वास आहे. अशा पद्धतीचा ध्यास आपल्यालाही लागावा अशीच समर्थांची अपेक्षा आहे. दुसरी गोष्ट म्हणजे महान तपसामर्थ्य अंगी असणारे भगवान शंकर जेव्हा सातत्याने रामनाम जपतात, तेव्हा आपण तर सामान्य माणसे! या श्लोकात भगवान शंकरांबद्दल बोलताना समर्थ म्हणतात, “स्वये निवाला तापसी चंद्रमौळी. ” इथे निवाला शब्दाचे दोन अर्थ घेता येतात. पहिला अर्थ म्हणजे रामनामामुळे त्यांच्या जीवाला शांती लाभली. दुसरा अर्थ आपल्याला परिचित आहे. तो म्हणजे भगवान शंकरांनी जेव्हा हलाहल (विष) प्राशन केले तेव्हा त्यांच्या कंठाचा जो दाह होऊ लागला, तो कशानेही शमेना. त्यांनी मस्तकी गंगा धारण केली, गळ्याभोवती शीतल नाग धारण केला, शीतल असणारा चंद्र मस्तकी धारण केला. परंतु त्यांचा दाह केवळ रामनामानेच शांत झाला. या अर्थानेही ‘ निवाला ‘ हा शब्द वापरला आहे.
श्रीराम हे समर्थांचे आराध्य दैवत आहे. त्यांना नेहमी तो समोर दिसत असतो. म्हणून ते कधीही ‘ तो राम ‘ म्हणत नाही. तर ‘ हा राम ‘ असे म्हणतात. एवढी त्यांची रामाशी एकरूपता आहे. पांडुरंगाने ज्यांना मस्तकी धारण केले आहे असे श्रीशंकर सुद्धा रामानामाचा ध्यास घेतात, तेव्हा असे पावन, पवित्र असे रामनाम आपली देखील अंतकाळी या भवसागरातून सुटका करील असे समर्थांना सांगायचे आहे.
स्वसंवाद ::
१. पंढरीचा विठ्ठल आणि कैलासीचा राणा शिव यांच्यात जर कोणतेही द्वैत नाही, तर मी मात्र जाती-पाती, पंथ किंवा संप्रदायांच्या खोट्या भेदांमध्ये का अडकून पडलो आहे?
२. संसारातील वेगवेगळ्या संकटांमुळे किंवा वासनांमुळे जेव्हा माझ्या मनाचा ‘दाह’ होतो, तेव्हा मी तो शांत करण्यासाठी बाह्य गोष्टींकडे धावतो, की भगवान शंकरांप्रमाणे रामनामाचा आश्रय घेतो?
३. समर्थांना प्रभू श्रीराम जसे ‘हा राम’ म्हणून अगदी जवळ (अंतर्यामी) भासतात, तशी आत्मीयता आणि ओढ मला कधी नाम घेताना जाणवते का?
४. “अंतकाळी हाच राम आपल्याला सोडवणार आहे” हे अंतिम सत्य ठाऊक असूनही, मी माझा आजचा अमूल्य वेळ केवळ नश्वर गोष्टींची चिंता करण्यातच घालवत आहे का?
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सहनशक्ति बनाम दण्ड। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया दो दिन का मेला / स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३३२ ☆
☆ सहनशक्ति बनाम दण्ड… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘युगों -युगों से पुरुष स्त्री को उसकी सहनशीलता के लिए ही दण्डित करता आ रहा है,’ महादेवी जी का यह कथन कोटिश: सत्य है,जिसका प्रमाण हमें गीता के इस संदेश से भी मिलता है कि ‘अन्याय करने वाले से अधिक दोषी अन्याय सहन करने वाला होता है’,क्योंकि उसकी सहनशीलता उसे और अधिक ज़ुल्म करने को प्रोत्साहित करती है। इसलिए एक सीमा तक तो सहनशक्ति की महत्ता स्वीकार्य है,परंतु उसे आदत बना लेना कारग़र नहीं है। इसलिए मानव में विरोध व प्रतिकार करने का सामर्थ्य होना आवश्यक है। वास्तव में वह व्यक्ति मृत के समान है,जो ग़लत बात को ग़लत ठहरा कर विरोध नहीं जताता। इसके प्रमुखत: दो कारण हो सकते हैं– आत्मविश्वास की कमी और असीम सहनशीलता। यह दोनों स्थितियां ही भयावह और मानव के लिए घातक हैं। आत्मविश्वास से विहीन मानव का जीवन पशु-तुल्य है,क्योंकि जो आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकता; वह परिवार,समाज व देश के लिए क्या करेगा? वह तो धरती पर बोझ है; न उसकी घर-परिवार में इज़्ज़त होती है,न ही समाज में उसे अहमियत प्राप्त होती है। अत्यधिक सहनशीलता के कारण वह शत्रु अर्थात् प्रतिपक्ष के हौसले बुलंद करता है। परिणामत: समाज में आलसी व कायर लोगों की संख्या में इज़ाफा होने लगता है। प्राय: ऐसे लोग संवेदनहीन होते हैं और उनमें साहस व पुरुषत्व का अभाव होता है।
नारी को सदैव दोयम दर्जे का प्राणी स्वीकारा जाता है, क्योंकि उसमें अपना पक्ष रखने का साहस नहीं होता और वह शांत भाव से समझौता करने में विश्वास रखती है। इसके पीछे कारण कुछ भी रहे हों; पारिवारिक,सामाजिक,आर्थिक या उसका समर्पण भाव– सभी नारी को उस मुक़ाम पर लाकर खड़ा कर देते हैं,जहां वह निरंतर ज़ुल्मों की शिकार होती रहती है। पुरुष दंभ के सम्मुख वह प्रतिकार व विरोध में अपनी आवाज़ नहीं उठा सकती। इस प्रकार पुरुष उस पर हावी होता जाता है और समझ बैठता है कि वह पराश्रिता है; उसमें साहस व आत्म-विश्वास की कमी है। सो! वह उसके साथ मनचाहा व्यवहार करने को स्वतंत्र है। इस प्रकार यह सिलसिला चल निकलता है। अवमानना,तिरस्कार व प्रताड़ना उसके गले के हार अर्थात् विवशता बन जाते हैं और उसके जीने का मक़सद व उपादान बन जाते हैं,जिसे वह नियति स्वीकार अपना जीवन बसर करती रहती है।
यदि हम उक्त तथ्य पर दृष्टिपात करें, तो नियति व स्वीकार्यता-बोध मात्र हमारी कल्पना है,जिसे हम सहजता व स्वेच्छा से अपना लेते हैं। यदि व्यक्ति प्रारंभ से ही ग़लत बात का प्रतिरोध करता है और अपने कर्म को अंजाम देने से पहले सोच-विचार करता है,उसके हर पहलू पर दृष्टिपात करता है– शत्रु के बुलंद हौसलों पर ब्रेक लग जाती है। मुझे स्मरण हो रही हैं, 2007 में प्रकाशित स्वरचित काव्य-संग्रह की अंतिम कविता की पंक्तियां– ‘बहुत ज़ुल्म कर चुके/ अनगिनत बंधनों में बाँध चुके/ मुझ में साहस ‘औ’ आत्म- विश्वास है इतना/ छू सकती हूं मैं/ आकाश की बुलंदियां।’ जी हाँ! यह संदेश है नारी जाति के लिए कि वह सशक्त,सक्षम व समर्थ है। वह आगामी आपदाओं का सामना कर सकती है। परंतु वह पिता,पुत्र व पति के बंधनों में जकड़ी,ज़ुल्मों को मौन रहकर सहन करती रही,क्योंकि उसने अंतर्मन में संचित शक्तियों को पहचाना नहीं था। परंतु अब वह स्वयं को पहचान चुकी है और आकाश की बुलंदियों को छूने में समर्थ है। आज की नारी ‘अगर देखना है मेरी उड़ान को/ थोड़ा और ऊंचा कर दो/ आसमान को’ में झलकता है उसका अदम्य साहस व अटूट विश्वास,जिसके सहारे वह हर कठिन कार्य को कर गुज़रती है और ऐलान करती है कि ‘असंभव शब्द का उसके शब्दकोश में स्थान है ही नहीं; यह शब्द तो मूर्खों के शब्दकोश में पाया जाता है।’
परंतु 21वीं सदी में भी महिलाओं की दशा अत्यंत शोचनीय व दयनीय है। वे आज भी पिता,पति व पुत्र द्वारा प्रताड़ित होती है,क्योंकि तीनों का प्रारंभ ‘प’ से होता है। सो! वे उनके अंकुश से आजीवन मुक्त नहीं हो पाती। घरेलू हिंसा,अपनों द्वारा उसकी अस्मिता पर प्रहार, फ़िरौती, दुष्कर्म, तेज़ाब कांड व हत्या के सुरसा की भांति बढ़ते हादसे उनकी सहनशक्ति के ही दुष्परिणाम हैं। यदि बुराई को प्रारंभ में ही दबाकर समूल नष्ट कर दिया जाता तो परिदृश्य कुछ और ही होता। महिलाएं पहले भी दलित थीं,आज भी हैं और कल भी रहेंगी। उनके अतीत,वर्तमान व भविष्य में कोई परिवर्तन संभव नहीं हो सकता; जब तक वे साहस जुटाकर ज़ुल्म करने वालों का सामना नहीं करेंगी।
वैसे यह नियम बच्चों,युवाओं व वृद्धों सब पर लागू होता है। उन्हें आगामी आपदाओं,विषम व असामान्य परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए,क्योंकि हौसलों के सम्मुख कोई भी टिक नहीं सकता। ‘लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती/ कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ सोहनलाल द्विवेदी जी इस कविता के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि यदि आप तूफ़ान से डर कर व लहरों के उफ़ान को देख कर अपनी नौका को बीच मंझधार नहीं ले जाओगे तो नौका कैसे पार उतर पाएगी? संघर्ष रूपी अग्नि में तप कर ही सोना कुंदन बनता है। इसलिए कठिन परिस्थितियों के सम्मुख कभी भी घुटने नहीं टेकने चाहिएं तथा मैदान-ए-जंग में मन में इस भाव को प्रबल रखने की दरक़ार है कि ‘तुम कर सकते हो।’ यदि निश्चय दृढ़ हो, हौसले बुलंद हों,दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। नैपोलियन बोनापार्ट भी यही कहते थे कि असंभव शब्द मूर्खों के शब्द कोश में होता है। इस नकारात्मक भाव को अपने ज़हन में प्रविष्ट न होने दें –’जैसी दृष्टि,वैसी सृष्टि तथा नज़रें बदलते ही नज़ारे बदल जाते हैं और नज़रिया बदलते ज़िंदगी।’ यदि नारी यह संकल्प कर ले कि वह अकारण प्रताड़ना सहन नहीं करेगी और उसका साहसपूर्वक विरोध करेगी, ‘तो क्या’ और अब मैं तुम्हें दिखाऊँगी कि ‘मैं क्या कर सकती हूं।’ उस स्थिति में पुरुष भयभीत हो जायेगा और अपने मिथ्या सम्मान की रक्षा हेतु मर्दांनगी नहीं दिखायेगा। धीरे-धीरे दु:ख भरे दिन बीत जायेंगे व खुशियों की भोर होगी,जहाँ समन्वय,सामंजस्य ही नहीं; समरसता भी होगी और ज़िंदगी रूपी गाड़ी के दोनों पहिए समान गति से दौड़ेंगे।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – शारदे प्यार दो…।
रचना संसार # १०५
☆ गीत – जगपालक हो कुंज बिहारी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – गुरु।)
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं।
आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ४‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १९ ☆
कविता – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – ४ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
कच्छ का रबारी समुदायl इनका काम पशुपालन होता हैl ये पुरुष रबारी, तन पर सफ़ेद केडियु और नीचे सफ़ेद सूती धोती पहनते हैं जो इनके शरीर को ठंडा रखते हैंl सर पर सफ़ेद या लाल रंग की पगड़ी जो धूप से बचाती है साथ ही विपत्ती में रस्सी भी बन जातीl कान में सोने की वेढ और गले में चांदी का कड़ा पहनते हैंl इनकी स्त्रियां कंजरी के साथ बहुत घेर वाला घाघरा जिस पर कांच के साथ का कच्छी भरत काम किया होता है वो पहनती हैंl सर सदैव काले या लाल रंग की ओढ़नी से ढका होता हैl ये अपने गले में चांदी की हंसली, कमर में कंडोरा और हाथों में हाथी दाँत के चूड़े पहने रहती हैंl
इनके पास इनके स्वयं के ऊँट, भेड़, गाय और भैंसे होती हैंl इनकी जीवन शैली घुमंती होती हैl रेगिस्तान में अपने पशुओं को ढूंढने हेतु इन्होने अपना जीपीएस बनाया कि ये रेत पर उकेरे पद चिन्हों को पढ लेते हैंl
पशुओं के तलवे का कौन सा हिस्सा रेत के अंदर गया है जिससे पशु के चलने की दिशा का अनुमान लगता हैl
इनको इस तरह पदचिन्हों को पढ़ने का बहुत अभ्यास हो गया हैl इतना कि आदमी के पैर की एड़ी और अंगूठे के रेत में धंसने से इन्हें मालूम होता था कि वह कितना भारी सामान लिये हैl रेत में धंसे क़दमों की दूरी नापकर उस व्यक्ति की लम्बाई बता देते हैंl रेत में धंसे पैरों के निशानों से पता चलता है कि आदमी जवान है या बूढाl पैरों के निशान से स्त्री, पुरुष, बच्चे का भी अनुमान लगा लेते हैंl पैरों के निशान से बता देते कि मानव है या पशु? कौन सी दिशा में कितने लोग, कितनी उम्र वाले, कितने वजन वाले और कितने वेग से गये हैंl
है ना अद्भुत भूमि सह अद्भुत लोग??
ये पगी दिन तो दिन पर रात के समय भी ये हाथ और पैरों से महसूस कर वो सारी बातें रात को भी बता देते हैंl
इनको तारों और नक्षत्रों की भी पूरी जानकारी होती हैl ध्रुव तारे की स्थिति देखकर ये चारों दिशाए बता देते हैंl नक्षत्रों को देखकर ये सही समय का भी पता बता देते हैंl
रेगिस्तान की अपनी एक अलग विशेषता होती है कि यहाँ दिन में रेत बहुत गर्म होती है और सूर्यास्त पश्चात बहुत जल्दी ठंडी भी हो जाती हैl यही कारण है कि रात में रेगिस्तान के ऊपर की हवा भारी और ठंडी होकर हाय प्रेशर बनाती है और वह कम प्रेशर वाली दिशा में बहती हैl इसीलिए अक्सर यहाँ रात को हवाएँ एक ही दिशा में चलती हैंl
ये पगी रात को सफर में निकलने से पहले थोड़ी सूखी रेत को हाथ में लेकर हवा में उड़ा देते हैंl रेत जिस दिशा में उड़ती उससे ये हवा का रुख पहचान लेते हैंl
रात के समय ये रेत में पड़े गड्ढे को छूतेl यदि अंगूठे से आगे को रेत धकेली होती तो वे समझ जाते कि मानव का पैर है या जानवर काl
आज भी यहाँ के बीएसएफ अपने देश को सावधान रखने हेतु साथ एक पगी जरूर रखते हैंl
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘सुभोर…’।)