हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# १०७ – स्तुत्य कला… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– स्तुत्य कला…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # १०७ — स्तुत्य कला — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

सुदूर अतीत कालीन एक संत ने एक बड़ा ही भव्य ग्रंथ लिखा था। कथ्य इस तरह से था – शिल्पी इतनी सुन्दर मूर्तियाँ बनाते थे कि उन मूर्तियों में भगवान की छवि देख ली जाती थी। वह कला की पराकाष्ठा थी। निर्मित मूर्तियों में भगवान सर्पधर अथवा क्रोध के महा नायक हो कर भी मान्य होते थे। मूर्तियों में देवियाँ भी हुईं। महाकाल का वैराट्य, लेकिन महामाता की अभिनव प्रतिमा। बहुत छान बीन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया था सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की कल्पना वहीं से उद्भूत हुई थी। यह धारणा सर्व स्वीकृत हो जाने से कंठ – कंठ में बस गई थी। पर एक कमी इस कोण से रह गई संत का वह लिखित ग्रंथ कभी दिखा नहीं। इस कमी की अनुभूति तो बहुत होती है, लेकिन इतना संतोष अवश्य किया जाता है सत्यम् शिवम् सुन्दरम् का राग सदा के लिए रह गया है।

 © श्री रामदेव धुरंधर

19 — 04 — 2025

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३६ – दशपुत्रसमो द्रुम: ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३६ दशपुत्रसमो द्रुम:… ?

हमारा फ्लैट हाउसिंग सोसायटी की ऊपरी मंज़िल पर है। सोसायटी के सामने सड़क है। सड़क के दूसरी ओर शिरीष का विशालकाय वृक्ष है। इस पेड़ की फुनगियाँ गुलाबी रंग के फूलों से लकदक हैं।

यह वृक्ष लगभग 70 फीट ऊँचा और अपनी डालियों के माध्यम से लगभग इतना ही चौड़ा हो चुका है। तेज़ हवा, बरसात के साथ इसके फूल उड़ते हैं, यहाँ-वहाँ बिखरते हैं। उसमें से कुछ हमारी बालकनी में रखे पौधों के गमलों में भी गिरते हैं।

पिछले दिनों एक गमले में इसी शिरीष की एक संतान ने जन्म लिया। धरती पर खड़ा 70 फीट का विशाल पेड़  और उसके सामने गमले में जन्मा और बढ़ा लगभग 1 फुट का यह पौधा। देखता हूँ कि पेड़ की फुनगियाँ निरंतर हमारे बालकनी के निकट आ रही हैं। दूरी लगभग 10 फीट की रह गई है।

सोचता हूँ, सड़क के उस पार लगा 70 फीट का यह पेड़ भी कभी अंकुरित हुआ होगा, ऐसे ही पौधा बना होगा। धीरे-धीरे बड़ा हुआ होगा। आंधी, तूफान, भीषण गर्मी सब सहन किए होंगे। पशुओं का भक्ष्य होने से बच गया होगा। इसकी आयु कितने वर्ष है, यह तो पता नहीं पर इसे विकसित होने के समुचित अवसर मिले, फलत: यह 70 फीट का हो चला है।

सही शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक पोषण और उचित परिवेश मिले तो मनुष्य भी इसी तरह विकास कर सकता है। प्रकृति में हरेक अनुपम है। अतः अपने बच्चों पर अपने अधूरे सपने थोपने के बजाय उन्हें विकास के लिए समुचित वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। आगे वे अपने स्वभाव और अपनी मूल प्रकृति के अनुसार स्वयं विस्तार करेंगे।

नन्हा शिरीष थोड़ा बड़ा हो जाए तो किसी सुरक्षित स्थान पर इसे रोप आऊँगा। ऐसे स्थान पर जहाँ इसे विकसित होने के पर्याप्त अवसर मिल सकें।

इन दिनों गर्मी चरम पर है। सामान्यत: हमारी वृत्ति वृक्षों को काटकर बढ़ते तापमान पर सेमिनार आयोजित करने की रही है। यदि 25 से 50 वर्ष के आयुसमूह का हर भारतीय नागरिक दो पौधे भी रोपे, उनका ध्यान रखे, तो 45 डिग्री का औसत तापमान कम करने में समय नहीं लगेगा। पंछी लौटेंगे, अपने घोंसले बुनेंगे, कीटक पेड़ की खोह में घर बसाएँगे, जड़ों में सरीसृप भी बिल बनाएँगे। जैव विविधता का खंडित चक्र फिर अखंड होने की राह पर चल पड़ेगा।

कहा गया है,

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः।

दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः॥

दस कुओं के समतुल्य एक बावड़ी, दस बावड़ियों के समतुल्य एक सरोवर, दस सरोवरों के समतुल्य एक सुयोग्य पुत्र और दस पुत्रों के समतुल्य एक वृक्ष कल्याणकारी होता है।

पर्यावरण के संरक्षण के लिए अथवा पुण्य के लिए अथवा अकारण, पौधारोपण अवश्य करें। इन पौधों से विकसित होनेवाले वृक्ष, देश को हरा-भरा रख सकते हैं। अनुभव बताता है कि मनुष्य जीवन को भी पल्लवित, पुष्पित एवं सुरभित रखने में हरियाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रयास करें कि प्रकृति हरी रहे, परिसर हरा रहे, मन हरा रहे।

© संजय भारद्वाज 

(14:09 बजे, 23 मई 2026)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८० – ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – मत रोको)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८० ☆

☆ ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

मत रोको, जो होता है, हो जाने दो।

सोना खोना मत, सोना खो जाने दो।।

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सत्ता जिनका लक्ष्य उन्हें वह पाने दो।

उनको अपने मुख, अपना गुण गाने दो।।

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हम-तुम निर्धन, कम हो तो भी जी लेंगे।

चैन बिकी, बेचैन न हो बिक जाने दो।।

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क्रूर बेरहम हैं सारे सत्ताधारी।

पत्रकार चारण बनते बन जाने दो।।

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चलो पसीना सींच रोप लें आशाएँ।

कुछ कुम्हलाएँ-सूखेँ तो कुम्हलाने दो।।

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देव मूर्तियाँ दानव जैसी बना रहें।

नादां, मत रोको उनको बनवाने दो।।

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मन मंदिर में तन की पूजा मत करना।

चाह रहा जो तन, उसको तन पाने दो।।

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वनवासी के भक्त, भागते पद-पीछे।

सच को झूठ बताते तो बतलाने दो।।

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जो जा चुके, कोसकर उनको खुश होते

यदि कृतघ्न पामर कुछ तो हो जाने दो।।

.

जन-गण मौन भले हो, गूँगा मत मानो।

पलटेगा यह तंत्र समय तो आने दो।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९९९ ⇒ सुख की उत्पत्ति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सुख की उत्पत्ति।)

?अभी अभी # ९९९ ⇒ आलेख – सुख की उत्पत्ति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिन्हें सिर्फ आम ही खाना पेड़ नहीं गिनना, उनके लिए तो यही बेहतर है कि वे सुख के उद्गम अथवा उत्पत्ति के बारे में अधिक मगजपच्ची ना करें, उनके लिए सुख की अनुभूति ही सब कुछ है। आम से हमको मतलब, गुठली से क्या लेना। रबड़ी कैसे बनती है, यह जानकर हमें क्या करना। कुछ लेना न देना, सिर्फ ऑन लाइन जोमेटो पर ऑर्डर प्लेस करना। कोई दूध खरीदे, महंगी गैस पर उसे गर्म करे, ओटाये, सुख की आस में पसीना बहाए। आजकल इंस्टेंट अर्थात् त्वरित सुख का जमाना है, सुख की खोज के लिए ज्ञानवर्धक किताबों में आजकल सर नहीं गड़ाया जाता, हमने सभी सुखों को अपने रिमोट में कंट्रोल कर लिया है फिर चाहे वह टीवी, पंखा, कूलर अथवा एयर कंडीशनर ही क्यों ना हो। हवा आने दो।

सुख भी आजकल स्विच ऑन और स्विच ऑफ होने लगा है। हमसे किसी का अधिक सुख भी नहीं देखा जाता। अधिक सुख की तो छोड़िए, जिसे निर्मल वर्मा एक टुकड़ा सुख कहते थे, उस पर भी आजकल वक्त की नज़र लग चुकी है। आज के एक आम आदमी के टुकड़े टुकड़े सुख वास्तव में क्या हैं, जिन पर नियति अपनी बुरी नज़र लगा रही है। आइए देखते हैं।।

सुख आसमान से नहीं टपकता। सुख की उत्पत्ति का मूल ही कष्ट है, पीड़ा है, संघर्ष है, एक तड़प है। प्यास के बिना पानी नहीं, भूख बिना भोजन नहीं। विरह बिन मिलन नहीं।

नदी का उद्गम पहाड़ है।

कितनी चट्टानों से टकराकर वह अपनी राह निकालती है। चंचल प्रवाह, और संघर्ष के बीच, अच्छे बुरे मौसम का सामना कर सबके सुख के लिए निरंतर बहते रहना, सबकी प्यास बुझाना ही तो नदी का स्वभाव है। सुख वही शाश्वत है, जिसका अंत अनंत सुखसागर में हो।

एक बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होती है, प्रकृति से लड़ना, जूझना, संघर्ष करना, बड़े होकर पंछी को छाया और फल देना, इसी में उसे सुख की अनुभूति होती है। कोई पेड़ पर फल तोड़ने के लिए पत्थर मारता है, वृक्ष फिर भी बदले में फल ही वापस करता है। हमारे और उसके मज़ा चखाने के अंदाज़ में बहुत अंतर है।।

नदियां ना पीएं कभी अपना जल।

वृक्ष ना खाएं कभी अपने फल।।

सुख है ही एक ऐसी वस्तु, जिसे लेने में भी सुख की अनुभूति होती है और देने में भी। लेकिन सुख का कोई पेड़ नहीं होता। थोड़ा कष्ट उठाया जाए, परिश्रम किया जाए, तब ही वास्तविक सुख का अहसास होता है। सुख और दुख विपरीत परिस्थितियों में एक दूसरे का साथ देते हैं। सर्दी में धूप से प्यार और गर्मी में ठंडी बयार। भूख में ही भोजन अमृत होता है।

आंखों में नींद हो, तब ही तो सोने का मज़ा है। रात भर करवटें बदलते रहने में काहे का सुख।

सुख एक मिट्टी के कच्चे घड़े की तरह है, इसे पकाना बहुत जरूरी है। अगर सुख के उद्गम में तप है, ताप है, तो मिट्टी होते हुए भी एक घड़ा कितने प्यासों की प्यास बुझा सकता है। इतनी तपन सहन करने के बाद ही उसमें शीतल जल समाता है। लकड़ी, लोहा, ईंट, सीमेंट, मिट मिटकर ही एक इमारत खड़ी करते हैं। सुख की नींव को बड़े जतन से सींचना, सहेजना पड़ता है।।

हमारी सुख की नींव में भी अगर त्याग है, तपस्या है, परिश्रम और संघर्ष है, तो हम उस वास्तविक सुख का अनुभव भी कर सकते हैं, जो सिर्फ लेने में ही नहीं, देने में भी है। सुख का मार्ग कभी एकांगी नहीं होता। सुख दुख हमेशा साथ चलते हैं।

सुख और दुख के छोटे छोटे बादल ही तो हैं हमारी आशाओं के आसमान में !

इसमें कहीं संतान सुख छुपा है तो कहीं सब्सिडी सुख। घटती बढ़ती पेंशन की तरह हम सुखी दुखी होते रहते हैं। बस एक जिजीविषा है जो हमारे सुख का भी उद्गम है और दुख का कारण भी। कौन नहीं बहना चाहता सुखसागर में, इसकी परवाह किए बगैर कि अनंत सुख क्या है। जो हाथ लग गया, वही वास्तविक सुख। फिर सुख के पीछे इतनी मगजमारी क्यों।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (25 मई से 31 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (25 मई से 31 मई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। अगर आप किसी भी कष्ट से परेशान हैं तो सबसे अच्छा उपाय श्री हनुमान जी की भक्ति है। श्री हनुमान जी की भक्ति के लिए श्री हनुमान चालीसा से उत्तम और कुछ नहीं है। इसीलिए मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको प्रति सप्ताह हनुमान चालीसा की एक चौपाई के संपुट पाठ से होने वाले लाभ के बारे में बताता हूं। इस सप्ताह की चौपाई है:-

“आपन तेज सम्हारो आपै | तीनों लोक हाँक तें काँपै ||”

 अगर आप ओज कीर्ति तथा अपना प्रभाव लोगों के बीच में जमाना चाहते हैं तो आप को इन चौपाइयों का संपुट पाठ करना चाहिए।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब हम आपको इस सप्ताह अर्थात 25 मई से 31 मई 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी देते हैं।

इस सप्ताह सूर्य वृष राशि में, मंगल मेष राशि में, गुरु और शुक्र मिथुन राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

बुध प्रारंभ में वृष राशि में तथा 29 तारीख के 10:02 दिन से मिथुन राशि में प्रवेश करेगा।

आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

यह सप्ताह आपके लिए सफलताओं का सप्ताह रहेगा। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। व्यापार उत्तम चलेगा। धन पर्याप्त मात्रा में आएगा। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। भाग्य से थोड़ा बहुत सहयोग प्राप्त होगा, परंतु आपके कर्म ही आपकी मदद करेंगे। इस सप्ताह आपको अपने जीवनसाथी के प्रति रक्त संबंधी रोगों जैसे डायबिटीज आदि के बारे में सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित है। 25, 26 और 27 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें और शनिवार के दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपको मानसिक संतोष रहेगा। कचहरी के कार्यों में विजय का योग है। थोड़ा बहुत प्रयास करना पड़ेगा। धन प्राप्त होगा। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा बहुत तनाव आ सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से थोड़ा कम सहयोग प्राप्त होगा। जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपको थोड़ी बहुत मानसिक परेशानी हो सकती है। कर्मचारियों अधिकारियों को उनके कार्यों में थोड़ा कम सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहना चाहिए। 30 और 31 तारीख को आपके जीवनसाथी को कोई कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

अगर आपका विवाह नहीं हुआ है तो इस सप्ताह विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। कचहरी के कार्यों में आप सावधान रहें। कचहरी में धन का अपव्यय हो सकता है। भाग्य से इस सप्ताह आपको पर्याप्त सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना पड़ेगा। परिश्रम से ही आपको सफलता प्राप्त होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। आपको अपने संतान से इस सप्ताह बहुत कम सहयोग मिलेगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सफलता दायक है। 30 और 31 तारीख को आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। व्यापारियों का व्यापार बढ़ेगा। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। भाग्य से सामान्य मदद मिलेगी। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। सावधानी से कार्य करने पर सफलता मिल सकती है। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। संतान से इस सप्ताह सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। इस सप्ताह आपको 30 और 31 तारीख को अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। छात्रों के लिए भी 30 और 31 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए अच्छे हैं। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका अच्छा साथ देगा। भाग्य के सहारे आपके कई कार्य संपन्न हो सकते हैं। धन आने का भी योग है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। आपका या आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य खराब हो सकता है। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। इस सप्ताह आपको प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26, और 27 तारीख उपयोगी है। 30 और 31 तारीख को आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके भाग्य से काम भर की मदद मिलेगी। दुर्घटनाओं से आप साफ-साफ बचेंगे। शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक-ठाक रहेगा। धन आने के मार्ग में कुछ कमियां है। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख कार्यों को करने में मददगार हैं। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक है। 30 और 31 तारीख को आपको अपने भाई बहनों से सावधान रहना चाहिए। उनको कोई कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपके भाग्य से मदद मिलेगी। आपके जीवन साथी के लिए सप्ताह उत्तम रहेगा। दुर्घटनाओं से आपको इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। आपको अपने संतान के प्रति सतर्क रहना चाहिए। उनका कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। अधिकारी और कर्मचारियों को अपने साथियों से सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपके पिताजी को इस सप्ताह कष्ट हो सकता है। माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख लाभदायक है। 25, 26 और 27 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। 30 और 31 तारीख को धन प्राप्त होने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का तीन बार पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका व्यापार उत्तम चलेगा। अधिकारीयों और कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। कन्फ्यूजन से बचना चाहिए। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकेंगे। आपको इस कार्य के लिए बहुत थोड़ा ही प्रयास करना पड़ेगा। आपको अपने संतान से सामान्य सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख फलदायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अत्यंत अच्छा रहेगा। विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। अगर विश्वोत्री दशा ठीक है तो विवाह तय भी हो जाएगा। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि होगी। नए संबंध बन सकते हैं। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। भाग्य से भी थोड़ी बहुत मदद मिलेगी। यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। उनका आपको अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। शत्रु शांत रह सकते हैं परंतु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए अनुकूल है। 30 और 31 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। आपको कचहरी के कार्यों में 30 और 31 तारीख को सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। धन आने का भी अच्छा योग है। गलत और सही दोनों रास्तों से धन आ सकता है। भाग्य से सामान्य मदद ही प्राप्त हो पाएगी। पेट की बीमारियों के प्रति सतर्क रहें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख परिणाम दायक है। 30 और 31 तारीख को आप अपने धन लाभ के प्रति सतर्क रहें। 25, 26 और 27 तारीख को थोड़ा बहुत भाग्य से मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपको अपने भाई बहनों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। उनसे आपके संबंधभी अच्छे रहेंगे। शत्रुओं से आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। अगर आप विशेष प्रयास करेंगे तो आप उनको पराजित कर सकते हैं। आपका व्यापार ठीक चलेगा। आपको अपने संतान से सहयोग भी प्राप्त होगा। सामान्य मात्रा में धन आने की उम्मीद है। इस सप्ताह आपके लिए 28 और 29 तारीख लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्य करने की आवश्यकता है। कर्मचारी और अधिकारियों को 30 और 31 तारीख को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। लोगों के बीच में आपका सम्मान बढ़ेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। अधिकारीयों और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। आपके संतान को थोड़ा बहुत कष्ट हो सकता है। छात्रों की पढ़ाई में रुकावट हो सकती है। दुर्घटनाओं से सावधान रहें। भाग्य से सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 25 26 और 27 तारीख परिणाम मूलक है। 30 और 31 तारीख को भाग्य के सहारे कोई भी कार्य न करें। 28 और 29 तारीख को सावधान रहे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “कुर्सी” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “यह घर किसका है ?” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री को आमंत्रित किया। पुलिस तैनात हो गयी और आम जनता का रास्ता बंद कर‌ दिया गया। हर अधिकारी मुआयना करने आया। क्या सिविल, क्या पुलिस के अधिकारी ! सब आते रहे, मुआयना करते रहे।

आखिर सीआईडी विभाग के उच्चाधिकारी ने कहा कि जिस कुर्सी पर मुख्यमंत्री को बैठना है, वह कुर्सी ठीक नहीं। इसे तुरंत बदलो। यह हमारे उच्चाधिकारियों का आदेश है।

हम वहां सारी तैयारियां कर चुके थे। अब कुर्सी में क्या खोट निकल आया?

हमने मज़ाक मज़ाक में पूछा -फिर यह भी बता दीजिये कि कौन सी कुर्सी लायें? तीन महीने वाली या पांच साल चलने वाली?

अधिकारी हमारा मुह देखते रह गये!!

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

ग्वारीघाट से तिलवारा घाट:13 अक्टूबर 2018

ग्वारीघाट से चले दो घंटे हो चुके थे। तिलवारा घाट शाम तक पहुँचने का लक्ष्य था। तिलवारा घाट का पुल तीन किलोमीटर पहले से दिखने लगा था। उसे देखते ही लगा कि लो पहुँच गए तिलवारा घाट, परंतु चलते-चलते पुल नज़दीक ही नहीं आ रहा था। पुल के दृश्य का पेनोरमा नज़ारा जैसा का तैसा बना था। तभी सामने एक बड़ा चौड़ा पहाड़ी नाला रास्ता रोककर खड़ा हो गया। खेतों में काम कर रहे मल्लाहों से पूछा तो उन्होंने बताया कि दो किलोमीटर ऊपर चढ़कर नाला पार करके नागपुर रोड पर पहुँच कर तिलवारा घाट पहुँचा जा सकता है इसका मतलब हुआ चार किलोमीटर का चक्कर। सबके पसीने छूट गए।

टी.पी.चौधरी साहब सपत्नीक गेंदों की मालाओं, नारियल,फल और ढेर सारा प्यार व परकम्मावासियों के प्रति हृदय में सम्मान लेकर तिलवारा घाट पर खड़े हमारी स्थिति लेते रहे थे। मोबाइल से उनको निवेदन किया कि एक नाव घाट से भिजवा दें। इसके पहले कि वे घाट पर आएँ एक नाविक को हम दिख गए और हमने भी तेज़ आवाज़ के साथ हाथ हिलाए। वह आया तो उसकी नाव में बैठकर तिलवारा घाट पर उतरे। चौधरी साहब ने बड़ी आत्मीयता और सम्मान से माला पहनाकर स्वागत किया और नारियल चिरोंजी अर्पित किया मानो हम देव हो गए हों। हमेशा की तरह हम उनके चरणस्पर्श करने को झुके तो उन्होंने हमें रोक दिया क्योंकि हम परिक्रमा वासी थे। भाभी जी अभिभूत थीं, उनका मातृवत प्रेम पूरी यात्रा हमारे साथ चला। सब लोग चौधरी दम्पत्ति के बारे में बतियाते रहे।

वैराग्य पर बातें करने लगे। घर, कपड़े, बिस्तर, पानी, खाना, पंखा, फ़र्निचर, गद्दे, गाड़ी, रुपया-पैसे, रिश्ते-नाते इन सब से परे भगवान भरोसे सिर्फ़ भगवान भरोसे। न रास्ते का पता, न खाने का पता, न ठिकाने का पता। बस एक अवलंबन नर्मदा, जिसके भरोसे ईश्वर के रिश्ते की डोर आदमियत से बंधी है। बस वही बचाएगी, वही खिलाएगी, वही सुलाएगी। सब कुछ तोड़कर और सब कुछ छोड़कर उसकी धारा में जाओगे तो वह पार लगाएगी। कर्मकांड से परे एक दीपक आस्था का। जूझो धूप से, पहाड़ से, पानी से, इंसानी नादानी से। धौंकनी सा चलता दिल, पिघल कर पसीना होती देह और आत्मा में तारनहार के प्रति असीम आस्था की परीक्षा है नर्मदा यात्रा।

जिस घर के सामने पहुँचकर कंठ से “नर्मदे हर” का अलख जगाया। उत्तर में हर-हर नर्मदे का स्वर घर के सभी सदस्यों की आवाज़ में एकसाथ गूंजा और सबसे बुज़ुर्ग सदस्य की आवाज़ सुनाई देती है बैठो साहब पानी पी लो, चाय पी लो, भोजन बना दें। सिर्फ़ आदमियत का रिश्ता कि पूरी पृथ्वी के जीव एक ही ब्रह्म के अंश, सब अन्योनाश्रित हैं। वसुधेव कुटुम्बकम, भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा मूल्य, जो मानवता वादियों का सबसे बड़ा संबल है। धर्म का सच्चा रूप और दुनिया की आतंकवाद के विरुद्ध एकमात्र आशा।

अत्यावश्यक से परे न्यूनतम पर निर्वाह पर विचार हुआ। भूख, भोजन, यौनइच्छा और आराम ये चार चीज़ें मानुष और पशु को प्रकृति की अनिवार्य देन हैं क्योंकि जीवन का चक्र इन्हीं से गतिमान होता है। भूख है तो भोजन की तलाश है, शरीर की थकान से भरपेट भोजन मिला तो यौन इच्छा जागती है, जिसकी पूर्ति होते ही नींद की प्रगाढ़तावश आराम अनिवार्य हो जाता है। छः दिन भूख, भोजन, यौनइच्छा से परे सुबह से शाम तक चलते-चलते चूर होने से भूख मिट गई, भोजन नहीं मिला तो यौनइच्छा लुप्त सी रही क्योंकि काम की जननी ऊर्जा का अंश देह में बचा ही नहीं। यहाँ से प्रथम सह यात्री विनोद प्रजापति दमोह को वापिस चले गये, श्रीवर्धन नेमा व रवि भाटिया जबलपुर।

तिलवारा घाट से भेड़ाघाट: 14 अक्टूबर 2018

14 तारीख़ को हम तिलवारा घाट से चलने को तैयार हुए तो पता चला कि पुल के किनारे से एक नाला गारद और कंपे से भरा होने के कारण रास्ता दलदली हो गया है लिहाज़ा एक किलोमीटर ऊपर से नए घूँसोर, लमहेंटा, चरगवा, धरती कछार से एक रोड शाहपुरा निकल गई है, वह राह पकड़ी। लम्हेंटा घाट पर शनि मंदिर से लगा ब्रह्म कुंड देखा। ऐसी मान्यता है कि जब कोई कोढ़ी मर जाता है तो उसके शव को ब्रह्मकुंड में सिरा देते हैं। वह सीधा पाताल लोक पहुँच जाता है।

उसके बाद आया बगरई गाँव। बगरई शिल्पकारों का गाँव है। वहाँ कारीगरों के 250-300 घर हैं। चारों तरफ़ संगमरमर पत्थर की खदानें हैं। दस हज़ार रुपयों में एक ट्राली पत्थर ख़रीद कर कटर, छेनी, वसूली और दांतेदार रगड़ से पत्थर को मूर्तियों की शक्ल में ढाल देते हैं। अधिकांश कारीगरों ने बैंकों से क़र्ज़ लिए थे वे सब ख़राब हो गए, उनका रिकार्ड बिगड़ने से उनको क़र्ज़ मिलना बंद हो गया। अब निजी माइक्रो फ़ाइनैन्स कम्पनी के कारिंदे उन्हें 24% वार्षिक ब्याज की दर से क़र्ज़ उनके घर पर देते हैं और घर से ही वसूली करते हैं। बगरई गाँव में एक बसोड के घर रुक कर पानी पिया। अरुण दनायक जी ने उनसे लम्बी बातचीत की, उनके फ़ोटो उतारे। आगे रामघाट की तरफ़ चल दिए। तब पता नहीं था कि हमें बिजना घाट तक का सफ़र तय करना होगा। रामघाट पर ढीमर जाल में मछली पकड़ते मिले।

नर्मदा का सच्चा सेवक “निषाद समाज” है। केवट, निषाद, धीवर, ढीमर, मल्लाह, मछुआरे, कहार, बरुआ, बरौआ, बर्मन इन उपनाम वाले मेहनती लोग देश की अधिकांश नदियों की मचलती लहरों पर सवार होकर लोगों को पार उतारने वाली जातियों के रूप में पहचाने जाते हैं। आदमी की तरह शब्द भी पैदा होते हैं, बड़े होते हैं, बूढ़े होते हैं और मर जाते हैं। इन शब्दों की जीवन यात्रा का एक विकास क्रम है। शब्द सरोकार से पैदा होते हैं, अपनी उपयोगिता सिद्ध करके संस्कृति के हिस्से बनकर चले जाते हैं। भारत में जातियाँ खेत या बगीचों की तरह व्यवस्थित रूप से उगाई फ़सल की तरह विकसित नहीं हुईं हैं। जातियाँ जंगल में विकसित पेड़-पौधों, घास-फूस, झाड़ी-झंखाड़ की तरह ज़रूरत के अनुसार उपजी और विकसित हुईं हैं। बर्मन कहलाने वाले ये लोग नर्मदा घाटी के मूल निवासी हैं। नर्मदा घाटी में बाहर से आए लोगों ने व्यापार वाणिज्य और प्रशासन के मेल मुलाक़ात से  एक तंत्र विकसित करके वाणिज्यिक गतिविधियों पर अधिकार कर लिया। ये बेचारे लघु सीमांत कृषक, मछली पालन और नाविक बनकर जहाँ के तहाँ हैं।

जबलपुर के ग्वारीघाट पर नर्मदा किनारे पहुँचते ही नाव से उस पार जाने के लिए काले स्याह बर्मन युवकों से सामना होता है। ये अर्धनग्न मेहनतकश नौजवान उछलते-कूदते नाव को घुमाते रहते हैं। उनकी बाहों, पुट्ठों, पीठ और पैर पर धूप में चमकती  मांसपेशी मछलिएँ उनके श्रमसाध्य जीवन की कहानी स्वमेव कह जाती हैं। यह समाज अमरकण्टक से भड़ौच तक नर्मदा के दोनों किनारों पर सेवा को मुस्तैद रहता है। ये लोग नर्मदा की सभी सहायक नदियों के किनारे भी जीवन के अनिवार्य हिस्से हैं।

तिलवारा घाट से परिक्रमा शुरू करने के बाद जब ख़ूब प्यास लगी तो पहला घर जिस पर दस्तक दी, वह बर्मन का था। छरछरे बदन की एक महिला ने नर्मदे हर कहने पर रुकने का इशारा किया, उनके  घर रुक गए। उन्होंने पहले ठंडा पानी फिर गरम चाय से परिक्रमावासियों को निहाल कर दिया। भोजन की ज़ुहार करने लगीं जिसे हमने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उनका परिवार नर्मदा के कछार की ज़मीन पर तरबूज़-ख़रबूज़ सागभाजी उगाता था। तीन साल पहले जबलपुर के खटीकों ने गुंडई से ज़मीन हड़प ली। वहाँ फ़ार्महाउस बन रहा है। मालूम पड़ा कि ज़मीन सरकारी थी जिसे वे लोग सैकड़ों साल से जोत रहे थे। अब कोर्ट में केस लगा है जिसकी सुनवाई पर बर्मन परिवार ने जाना बंद कर दिया है। ज़ाहिर है कि फ़ार्महाउस की फ़सली ज़मीन पर रंगीनी रातों का सिलसिला शुरू होगा। बर्मन परिवार बेदख़ल कर दिया जाएगा।

सुविधा के लिहाज़ से हम इनका सम्बोधन निषाद समाज से करेंगे। जब से नदियों के किनारे मानव सभ्यता की शुरुआत हुई है तब से निषाद समाज का अस्तित्व रहा है। नाव बनाना, जाल बुनना, नदी पार कराना, नाव खेना, मछली पकड़ना, नदी कछार में खेती करना और डूबतों को तारना इत्यादि इनकी आजीविका के साधन रहे हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५२ – कविता – अलग अलग हैं रंग ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५२ ☆

☆ कविता ☆ काव्य कथा विथिका ~ अलग अलग हैं रंग ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

 (खंड दो )

 गांव से भोलू शहर आ गया, खूब लगी थी भूख ।

 गोरा चेहरा लाल हो गया, कड़क कटीली धूप ।।

 काम किया पूरा दिन भोलू, नहीं मिली मजदूरी।

 हाथ पांव जोड़ा बेचारा, कह डाला मजबूरी ।।

*

 बच्चे मेरे भूखे साहब, आधे पैसे दे दो ।

 ईश्वर तेरा भला करेगा, विनती मेरी सुन लो।।

 पर मलिक था क्रूर कुटिल, डांट के उसे भगाया ।

 पत्नी भी ना कोई कम थी, नहीं तनिक थी माया ।।

*

 खोटी किस्मत लेकर भोलू*, घर को किया प्रस्थान ।

 पाँव सड़क पर आगे बढ़ता, कहीं था उसका ध्यान

 मन में भोले भोले कहता, भोलू खुद को भूला ।

 गमछे से आँशु को पोछे, पीठ पर लटका झोला ।।

*

 भोलू भोलू सुनो न मुझको, छत से आई आवाज ।

 एक पुरानी मालकिन उसकी, खड़ी थी  छत पर आज ।।

 दो सौ रूपये पकड़ो भोलू, ले आना तुम खाद ।

 बगिया सुखी, फूल रो रहे, पौध हुए बर्बाद ।।

*

 इसको भी पकड़ो तुम भोलू, लाल मिठाई खास ।

 बात बताओ, मेरे भोलू, क्यों हो अधिक उदास ।।

 भोलू की आँखें भर आई, देख जगत का रंग।

 यही देव-दानव दोनों है, अलग-अलग है ढंग।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-05-2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६७ ☆ कविता – सदा स्वार्थ-व्यवहार… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सदा स्वार्थ-व्यवहार …। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६७

☆ सदा स्वार्थ-व्यवहार…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

आजादी के पहले भारत में था अंग्रेजों का राज।

लूट रहे थे वे हम सबको दीन दुखी था यहाँ समाज ॥

*

तिलक और गाँधी ने देखे सपने, चाहा देशी राज।

कष्ट सहे, समझाया सबको, लाई चेतना और स्वराज ॥

*

उनके उस निस्वार्थ त्याग का सुख हम भोग रहे हैं आज ।

किन्तु खेद है उन्हें भुला कर स्वार्थमुखी हो चला समाज

*

सदा स्वार्थ-व्यवहार जगत् में होता है दुख का आधार ।

धन सुख का आधार नहीं है, वह तो है ममता औ’ प्यार ॥

*

जो चरित्र का पतन दिख रहा यह है बड़ी हमारी हार ।

बहुत जरूरी जन हित में फिर सुधरे हम सबका व्यवहार ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ३ – !!प्रगति!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!प्रगति!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ३ ☆

☆ !!प्रगति!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

लक्ष्य करें निर्धारित पहले, नींद त्याग कर जब जागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

शुभ विचार धारण करके मन, क्षमता का विस्तार करे।

लड़ना है मुश्किल से डटकर, साहस अपने हृदय भरे।।

कदम -कदम जो आज चलेगा, वही दौड़ के कल भागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

निशा भले काली हो कितनी, सूर्योदय से मिट जाती।

पार करे जब चट्टानों को, नदी तभी सागर पाती।।

करें सामना बाधाओं का, सुप्त भाग्य फिर उठ जागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

भिन्न-भिन्न पहलू जीवन के,  प्रतिपल आते जाते हैं।

जाना है किस ओर हमें ये, हरपल ही भरमाते हैं।।

उलझाते रहते हैं हरदम, रेशम बंधन के धागे।

चले प्रगति की राहों पर तब, बढ़े सदा मानव आगे।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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