(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – महाराज छत्रपति शिवाजी…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २७४ ☆
☆ महाराज छत्रपति शिवाजी… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़रूरतें व ख्वाहिशें। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – ये दुनिया है दो दिनों का मेला/ स्वर- रुखसार, सौजन्य – तरूनम चैनल)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३२९ ☆
☆ ज़रूरतें व ख्वाहिशें… ☆ डॉ. मुक्ता ☆
‘ज़रूरत के मुताबिक ज़िंदगी जीओ; ख्वाहिशों के मुताबिक नहीं, क्योंकि ज़रूरतें तो फ़कीरों की भी पूरी हो जाती हैं, मगर ख्वाहिशें बादशाहों की भी अधूरी रह जाती हैं।’ इच्छाएं सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं, जिनका अंत संभव नहीं होता। उनका आकाश बहुत विस्तृत है, अनंत है, असीम है और एक इच्छा के पश्चात् दूसरी इच्छा तुरंत जन्म ले लेती है, परंतु इन पर अंकुश लगाने में ही मानव का हित है। ख्वाहिशें एक ओर तो जीने का मक़सद हैं, कर्मशीलता का संदेश देती हैं, जिनके आधार पर हम निरंतर बढ़ते रहते हैं और हमारे अंतर्मन में कुछ करने का जुनून बना रहता है। दूसरी ओर संतोष व ठहराव हमारी ज़िंदगी में पूर्ण विराम लगा देता है और जीवन में करने को कुछ विशेष नहीं रह जाता।
ख्वाहिशें हमें प्रेरित करती हैं; एक गाइड की भांति दिशा निर्देश देती हैं, जिनका अनुसरण करते हुए हम उस मुक़ाम को प्राप्त कर लेते हैं, जो हमने निर्धारित किया है। इनके अभाव में ज़िंदगी थम जाती है। इंसान की मौलिक आवश्यकताएं रोटी, कपड़ा और मकान हैं। जहाँ तक ज़रूरतों का संबंध है, वे आसानी से पूरी हो जाती हैं। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है और अंत में उन में ही समा जाता है। वैसे भी यह सब हमें प्रचुर मात्रा में प्रकृति प्रदत्त है, परंतु मानव की लालसा ने इन्हें सुलभ-प्राप्य नहीं रहने दिया। जल तो पहले से ही बंद बोतलों में बिकने लगा है। अब तो वायु भी सिलेंडरों में बिकने लगी है।
कोरोना काल में हम वायु की महत्ता जान चुके हैं। लाखों रुपए में एक सिलेंडर भी उपलब्ध नहीं था। उस स्थिति में हमें आभास होता है कि हम कितनी वायु प्रतिदिन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़कर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। परंतु प्रभुकृपा से वायु हमें मुफ्त में मिलती है, परंतु प्रदूषण के कारण आजकल इसका अभाव होने लगा है। प्रदूषण के लिए दोषी हम स्वयं हैं। जंगलों को काटकर कंक्रीट के घर बनाना, कारखानों की प्रदूषित वायु व जल हमारी श्वास-क्रिया को प्रदूषित करते हैं। गंदा जल नदियों के जल को प्रदूषित कर रहा है, जिसके कारण हमें शुद्ध जल की प्राप्ति नहीं हो पाती।
सो! ज़रूरतें तो फ़कीरों की भी पूरी हो जाती है, परंतु ख़्वाहिशें राजाओं की भी पूरी नहीं हो पाती, जिसका उदाहरण हिटलर है। उसने सारी सृष्टि पर आधिपत्य प्राप्त करना चाहा, परंतु जीवन की अंतिम वेला में उसे ज्ञात हुआ कि अंतकाल में इस जहान से व्यक्ति खाली हाथ जाता है। इसलिए आजीवन राज्य विस्तार के निमित्त आक्रमणकारी नीति को अपनाना ग़लत है, निष्प्रयोजन है। सम्राट अशोक इसके जीवित प्रमाण हैं। उसने सम्राट के रूप में सारी दुनिया पर शासन कायम करना चाहा और निरंतर युद्ध करता रहा। अंत में उसे ज्ञात हुआ कि यह जीवन का मक़सद अर्थात् प्रयोजन नहीं है। सो! उसने सब कुछ छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना लिया।
‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक ठहर पाएगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यहाँ हर इंसान मुसाफ़िर है। वह खाली हाथ आता है और खाली हाथ चला जाता है। इसलिए संचय की प्रवृत्ति क्यों? ‘यह दुनिया है दो दिन का मेला/ हर शख़्स यहाँ है अकेला/ तन्हाई संग जीना सीख ले/ तू दिव्य खुशी पा जाएगा।’ स्वरचित गीतों की पंक्तियाँ इन भावों को पल्लवित करती हैं कि वैसे तो यह जन्म से पूर्व निश्चित हो जाता है कि वह कितनी साँसें लेगा? इसलिए मानव को अभिमान नहीं करना चाहिए तथा सृष्टि के कण-कण में परमात्मा की सत्ता अनुभव करनी चाहिए, जो उसे प्रभु सिमरन की ओर प्रवृत्त करती है।
सो! मानव को स्वयं को इच्छाओं का गुलाम नहीं बनाना चाहिए। यह बलवती इच्छाएं मानव को ग़लत कार्य करने को विवश करती हैं। उस स्थिति में वह उचित-अनुचित के भेद को नहीं स्वीकारता और नरक में गिरता चला जाता है। अंतत: वह चौरासी के चक्कर से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता। इससे मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय है प्रभु सिमरन। जो व्यक्ति शरणागत हो जाता है, वह निर्भय होकर जीता है आगत- अनागत से बेखबर…उसे भविष्य की चिंता नहीं होती। जो गुज़र गया है, वह उसका स्मरण नहीं करता, बल्कि वह वर्तमान में जीता है और प्रभु का नाम स्मरण करता है और गीता का संदेश ‘जो हुआ, अच्छा हुआ/ जो होगा, अच्छा ही होगा ‘ वह इसे जीने का मूलमंत्र स्वीकारता है। प्रभु अपने भक्तों की कदम-कदम पर सहायता करता है।
अक्सर ज़्यादा पाने की चाहत में हमारे पास जितना उपलब्ध है, उसका आनंद लेना भूल जाते हैं। इसलिए संतोष को सर्वश्रेष्ठ धन स्वीकारा गया है। इसलिए कहा जाता है कि ‘श्रेय मिले ना मिले, अपना श्रेष्ठ देना बंद ना करें। आशा चाहे कितनी कम हो, निराशा से बेहतर होती है।’ इसलिए दूसरों से उम्मीद ना रखें और सत्कर्म करते रहें, क्योंकि यह ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल व ग़लती है, जो हमें पथ-विचलित करती है। इंसान का मन भी एक अथाह समुद्र है। किसी को क्या मालूम कि कितनी भावनाएं, संवेदनाएं, सुख-दु:ख, हादसे, स्मृतियाँ आदि उसमें समाई हैं। इसलिए वह मुखौटा धारण किए रखता है और दूसरों पर सत्य उजागर नहीं होने देता। परंतु इंसान कितना भी अमीर क्यों ना बन जाए, तकलीफ़ बेच नहीं सकता और सुक़ून खरीद नहीं सकता। वह नियति के हाथों का खिलौना है; विवश है, क्योंकि वह अपने निर्णय नहीं ले सकता।
‘जो तकलीफ़ तुम ख़ुद बर्दाश्त नहीं कर सकते, वो किसी दूसरे को भी मत दो।’ महात्मा बुद्ध का यह कथन अत्यंत कारग़र है। इसलिए वे दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करने का संदेश देते हैं, जिसकी अपेक्षा आप दूसरों से नहीं करते हैं। संसार में जो भी आप किसी को देते हैं, वह लौट कर आपके पास आता है। इसलिए दूसरों की ज़रूरतों की पूर्ति का माध्यम बनिए ताकि आपकी ख़्वाहिशें पूरी हो सकें। इसके साथ ही अपनी इच्छाओं आकाँक्षाओं, तमन्नाओं व लालसाओं पर अंकुश लगाइए, यही जीवन जीने की कला है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हे राम धरा पर आ जाओ…।
रचना संसार # १०२ – गीत – हे राम धरा पर आ जाओ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – संवाद।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय मुक्तक – प्यार और ऐतवार… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३११ ☆
☆ संतोष के मुक्तक – प्यार और ऐतवार ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपका आलेख ‘समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # १६ ☆
आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
आज मैं आपको ले चलती हूँ भारत के एक ऐसे जिले के किस्से सुनाने जो असीम विषमताओं को समेटे, सिंधुघाटी संस्कृति या हड़प्पा सभ्यता या सिंधु-सरस्वती सभ्यता से लेकर अत्याधुनिक बंदरगाह और ट्रेड के लिये जाना जाता हैl यहाँ की प्रजा खुमारी में जीती हैl यहाँ हड़प्पन वर्ल्ड संस्कृति का चौथा शहर धोलावीरा हैl वो धोलावीरा जो उस समय का एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र थाl यहाँ ओमान, अरब, इराक के व्यापारी समुद्र मार्ग से आकर व्यापार करते थेl इस बात की पुष्टि के लिये व्यापार के अवशेष यहाँ देखने को मिलते हैंl यह इतिहास का वह काल था जब मनुष्य ने टिन और ताम्बे के औजार और हथियार बनाने शुरू किये थेl यूनेस्को ने धोलावीरा को विश्व धरोहर में स्थान दिया है और भारत सरकार ने इसे गुजरात राज्य के चौथे विश्व धरोहर का नाम दे दियाl
पढ़ने में आता है कि जलवायु परिवर्तन एवं नदियों के सूखने के कारण वहाँ बहुत भयंकर सूखा पडा जिसके चलते लोगो को शहर छोड़ देना पड़ा और आज ये धोलावीरा खंडहर बन गयाl
ऐसा जिला जिसने अपने आप को विनाशकारी, दर्दनाक भूकंप से धराशाई होने पर भी पुनः संगठित कियाl ऐसा जिला जिसकी भूमि जो आज भी 23 प्रकार के खनिज सम्पदा अपने में समेटे हैl ऐसा जिला जहाँ दो बंदरगाह, चार हवाई अड्डे, दो ट्रेन टर्मिनस, पहाड़, रेगिस्तान और समुद्र सभी एक ही जगह पर दिखते हैंl
यह जिला हिंदूस्तान में क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है, जिसकी ब्रिटिश सरकार के समय अपनी स्वयं कि मुद्राएँ होती थींl
हाँ जी आप में से बहुत लोगों ने इसे पहचान ही लिया होगाl यह जिला हमारे देश भारत के उत्तर पश्चिम का, समुद्र में तैरते हुए कछुए जैसा दिखने वाला कच्छ हैl इसकी धरती शांत और रहस्यमयी जरूर है परन्तु यह धरती प्राकृतिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से अति संवेदनशील भी हैl हमारी सीमा सुरक्षा बल की सुरक्षा के कारण इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का अभेद्य प्रहरी भी कहा जाता हैl
इस जिले की पूर्वी सीमा राजस्थान को एक छोटे रण द्वारा छूती हैl पश्चिमी सीमा पर विशाल अरब सागर रेत के धोरों और लहरों का एक अद्वितीय संगम हैl उत्तर में पाकिस्तान और कच्छ का महान रण हैl साथ ही दक्षिण में कच्छ की खाड़ी हैl
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पतिव्रता…“।)
अभी अभी # १०४१ ⇒ आलेख – पतिव्रता श्री प्रदीप शर्मा
००० पतिव्रता ०००
जो पत्नी अपने पति के लिए व्रत-उपवास रखे, वह पतिव्रता कहलाती है। ये पतिव्रताएं भारतवर्ष में बहुतायत से पाई जाती हैं। पति, देव भी है, और परमेश्वर भी। पत्नी केवल धर्म-पत्नी है। धर्म-पिता, धर्म-भाई और धर्म-बहन तो होते हैं, लेकिन धर्म-पति नहीं होते।
पति चूँकि परमेश्वर होते हैं, इसलिए वे व्रत-उपवास नहीं रखते! हड़ताली तीज और करवा चौथ की तरह पत्नी के लिए कोई भी व्रत-उपवास के बंधनों से वे मुक्त रहते हैं। विवाह के वक्त सात फेरों में ही सात जन्मों का एडवांस बुकिंग हो जाता है। बहु-पत्नी होने पर सात जन्मों तक इन पत्नियों को बहुतायत से झेलना भी पड़ सकता है।।
अक्सर पतिव्रताएं, अगले जनम मोहे यही पति दीजो, के लिए और पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं, लेकिन अपने पति को भूखा नहीं रखती। पतिव्रता का यही त्याग रिज़र्व बैंक के गवर्नर की तरह अगले जन्म में उसी पति के लिए वचन-बद्ध होता है, लेकिन नोटबन्दी की तरह इस वचन में शिथिलता भी लाई जा सकती है।
आदतन सभी पतिव्रताएं धार्मिक ही होती हैं। लेकिन उनके पुण्य एक अलिखित विधान के तहत 50 प्रतिशत पतिदेव को ट्रांसफर हो जाते हैं। पति तो एक धार्मिक, सुशील पत्नी पाकर ही धन्य हो जाता है, जब कि एक पतिव्रता, जैसा भी है, मेरा पति देवता है, मानकर अपने जीवन को धन्य मान लेती है।।
पत्नी को अन्नपूर्णा भी कहा गया है और गृह-लक्ष्मी भी! लेकिन यह अन्नपूर्णा अपने पति के भोजन करने के बाद ही अन्न ग्रहण करती है। दहेज में लक्ष्मी लाने के कारण ही वह लक्ष्मी कहलाती है और पति लक्ष्मी-पति होता है, स्वामी होता है, घर वाला होता है। पड़ोसियों की दृष्टि में ज़रूर वह उसकी घर-वाली होती है।
जब देश डिजिटल हो रहा है, तो पुरानी मान्यताएँ भी बदल रही हैं। पतिदेव भी आजकल धर्म-पत्नी के लिए व्रत-उपवास रखने लगे हैं। चाँद सी महबूबा के होते हुए वे क्यूँ पति-व्रताओं की देखादेखी करवा-चौथ के दिन चलनी की आड़ में चाँद को देख अपना व्रत तोड़ें।।
21 वीं सदी साथ-साथ चलने की है। महिला सशक्तिकरण ने पति-व्रताओं के दायरे बढ़ा दिए हैं।
अब वह पति के चरणों की दासी नहीं, पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली सह-धर्मिणी हो गई है। अपनी मर्यादा में रहते हुए वह सभी कर्त्तव्यों का पालन भी कर लेती है और घर-गृहस्थी सुचारू रूप से चलाते हुए, तीज-व्रत-उपवासों का भी मनोयोग से पालन करते हुए, अपने जीवन को धन्य करती है।
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘बारिश की बूंदे…‘।)