हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०४ ☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ. इन्द्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है डॉ इंद्रजीत सिंहजी द्वारा लिखित  “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’…पर चर्चा।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०४ ☆

☆ “गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’” – लेखक : डॉ इंद्रजीत सिंह ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कृति: ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’

लेखक : इंद्रजीत सिंह

प्रकाशक : प्रकाशन विभाग

मूल्य : 330 रु

आलेख: विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल

☆ यह पुस्तक संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

“अलेक्सा, प्ले हिट्स ऑफ लता…” ड्राइंग रूम के किसी कोने से महज़ इतना कहने भर की देर होती है और आधुनिक तकनीक का वह उपकरण लता दीदी के ‘अनफॉरगेटेबल’ एल्बम का कालजयी गीत बजाने लगता है, “तू जहाँ-जहाँ भी होगा, मेरा साया साथ होगा…”। तकनीक बदल गई, माध्यम बदल गए, पीढ़ियाँ बदल गईं, लेकिन जो नहीं बदला, वह है लता मंगेशकर की आवाज़ का जादुई सम्मोहन। अपनी इसी अलौकिक आवाज़ के ज़रिये लता जी आज भी हम सबके बीच चिर-जीवित हैं। सच ही तो है, कुछ शख़्सियतें मर कर भी अमर हो जाती हैं। सुख हो या दुख, राष्ट्रीय पर्व हो या कोई पावन त्योहार, हमारी हर भावना को स्वर देने के लिए लता दीदी का कोई न कोई गीत हमारी चेतना में सहज ही तैर जाता है। अक्सर लोग गीतकार या संगीतकार को बाद में याद करते हैं, वे पहले लता जी की आवाज़ से फिल्म, नायिका और उस दौर को पहचानते हैं। वे सही मायनों में भारतीय संगीत की वैश्विक ‘ब्रांड एम्बेसडर’ हैं।

ऐसी युगप्रवर्तक हस्ती पर देश-विदेश में प्रचुर काम हुआ है। नसरीन मुन्नी कबीर की ‘लता मंगेशकर-इन हर ऑन वॉइस’, हरीश भिमानी की बहुचर्चित कृति ‘इन सर्च ऑफ लता मंगेशकर’ , राजू भारतन द्वारा लिखित ‘लता मंगेशकर: ए बायॉग्रफी’, नसरीन मुन्नी कबीर व रचना शाह की ‘ऑन स्टेज विद लता’, मंदर वी. बिचू की ‘लता: वॉइस ऑफ द गोल्डन एरा’ तथा तारिकुल इस्लाम की पुस्तक जैसी कई महत्वपूर्ण कृतियाँ अंग्रेजी में आ चुकी हैं। मूलतः हिंदी में इस स्तर पर अपेक्षाकृत कम काम दिखाई देता था, जिसे यतींद्र मिश्र की सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘लता: सुर गाथा’ और सुरेश पटवा की ‘सुरमयी लता’ ने एक ठोस धरातल दिया।

इसी श्रेणी में एक बेहद प्रामाणिक, संवेदनशील और शोधपरक दस्तावेज़ के रूप में हाल ही में सामने आई है, शिक्षाविद एवं साहित्यकार डॉ. इन्द्रजीत सिंह (पूर्व प्राचार्य, केंद्रीय विद्यालय संगठन) द्वारा लिखित पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित ₹330 मूल्य की यह सुंदर कृति सुर कोकिला की जीवन यात्रा को बेहद प्रवाही और मुकम्मल अंदाज़ में पाठकों के सामने रखती है। सुप्रसिद्ध कवि और गीतकार इरशाद कामिल की प्रस्तावना इस पुस्तक के महत्व को और बढ़ा देती है।

लेखक डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने लता जी के विराट जीवन को केवल एक पार्श्वगायिका के दायरे में न समेटकर, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को बेहद सलीके से गूंथा है।

लता जी की जीवन यात्रा, संघर्ष की कहानी है, जो आज की पीढ़ी के लिए प्रेरक है। संघर्ष और दुश्वारियों भरी राह, को इंद्रजीत जी ने एक अलग अध्याय में संजोया है।

लता जी के कालजयी गीत, लता जी का क्रिकेट प्रेम, विदेशों में भारत का परचम,

गायिकी की गंगा: लता मंगेशकर, लता मंगेशकर वाया हरीश भिमानी एवं यतीन्द्र मिश्र,सम्मान और पुरस्कार अध्याय लता दीदी के जीवन को पाठक तक स्पष्ट एवं सुव्यवस्थित स्वरूप में पहुंचाने में इंद्रजीत जी की कलम सफल रही है।

डॉ. इन्द्रजीत सिंह के अनुसार लता मंगेशकर की आवाज़ शब्दों को एक नई आत्मा प्रदान करती थी। उनके गायन में भाव, अर्थ और शुद्धता का जो अद्भुत समन्वय था, वही इस पुस्तक का मुख्य कथ्य है।

1942 में पिता दीनानाथ मंगेशकर के असामयिक निधन के बाद, मात्र 13 वर्ष की नन्हीं उम्र में पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर अभिनय और गायन की दुनिया में उतरना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। शुरुआती दौर में कुछ निर्माताओं द्वारा उनकी आवाज़ को “बेहद पतली” कहकर नकार दिया जाना और फिर उसी आवाज़ का पूरे विश्व पर राज करना, यह संघर्ष गाथा पाठकों के भीतर नई ऊर्जा भरती है।

लता जी की आवाज़ में एक अनूठा जादू था। वे बच्चों सी मीठी बोली और अठखेली करती किशोरी से लेकर एक प्रौढ़ संजीदगी भरी आवाज़ तक, सुर-ताल-राग के अनुरूप गले को त्वरित प्रभाव से ढाल लेती थीं।

पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी इसका प्रामाणिक और तटस्थ होना है। लेखक ने दूरदर्शन, आकाशवाणी के आर्काइव्स तथा लता जी के तमाम साक्षात्कारों के गहन संदर्भों को सहेजा है।

पुस्तक में संगीत जगत के उन रोचक इतिहासों और विवादों को भी पूरी तटस्थता के साथ जगह दी गई है, जो अक्सर ऐसी बड़ी हस्तियों के साथ जुड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए, सन् 1974 में लता जी का नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में सबसे अधिक गाने (लगभग 25,000 गाने) गाने वाली गायिका के रूप में दर्ज होना, फिर मोहम्मद रफी साहब द्वारा उस रिकॉर्ड की संख्या को चुनौती देना, और अंततः शोधकर्ता हरमिंदर सिंह हमराज द्वारा प्रत्येक गाने को सूचीबद्ध कर वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने जैसे प्रसंगों का ज़िक्र पुस्तक को बेहद प्रामाणिक और पठनीय बनाता है। उनकी बहन आशा भोंसले जी से मिलने वाली स्वस्थ संगीतमय चुनौतियों का विश्लेषण भी इस पुस्तक के फलक को विस्तार देता है।

कवियों की पसंद का अद्भुत सर्वेक्षण: डॉ. इन्द्रजीत सिंह ने इस पुस्तक में एक अनूठा और अभिनव प्रयोग किया है। उन्होंने देश के 100 से अधिक प्रतिष्ठित कवियों और साहित्यकारों से संपर्क कर यह जानने का प्रयास किया कि उन्हें लता जी का कौन-सा गीत सर्वाधिक प्रिय है। इस सर्वेक्षण का निचोड़ यह निकला कि अधिकांश रचनाकारों के दिलों पर ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ राज करता है। साथ ही, यह तथ्य भी उभरकर आया कि साहित्यिक अभिरुचि के लोगों द्वारा पसंद किए गए अधिकांश कालजयी गीत अद्भुत गीतकार शैलेन्द्र के लिखे हुए थे। उल्लेखनीय है कि लेखक इन्द्रजीत सिंह पूर्व में गीतकार शैलेन्द्र पर भी लिख चुके हैं।

संगीत से इतर, लता जी का क्रिकेट के प्रति अगाध प्रेम और लॉर्ड्स के मैदान से लेकर भारतीय क्रिकेट इतिहास के कप्तानों के साथ उनकी आत्मीयता का जो अध्याय इसमें बुना गया है, वह पाठकों के लिए एक संदर्भ है।

इरशाद कामिल की काव्यात्मक भूमिका रोचक है । उन्होंने लता जी की तुलना एक अत्यंत पावन और निर्मल नदी से करते हुए लिखा है:”लता मंगेशकर एक नदिया का नाम है, जिसका पानी बेहद साफ़ है। निर्मल है। पावन है। जो बहती है तो लहरें नाचती हैं। जिसकी लहरों में कोई देवी संतूर लिए बैठी है। इस नदी की आवाज़ अगर ज़ख़्मों पे लगा लो तो ज़ख़्म भर जाते हैं।” यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति पठनीय है।

‘न भूतो न भविष्यति’

संगीत की लंबी और यशस्वी पारी को जीते हुए लता जी जब सराहना के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान थीं, तब उनका इस नश्वर संसार से जाना पूरी दुनिया के संगीत प्रेमियों के लिए एक मर्मांतक और स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। उस भावुक क्षण में हर संवेदनशील हृदय रो उठा था।

इसी मर्म को अभिव्यक्त करती मेरी तब प्रकाशित हुई , काव्य पंक्तियाँ इस विमर्श को पूर्णता देती हैं:

स्वर साम्राज्ञी कोकिल कंठी, हम सब का है प्यार लता,

भारत रत्न, रत्न भारत का, गीतों का सुर, सार लता ।

रागों का जादू, जादू गज़ल का, सरगम की लय, तार लता,

तबले की धिन् पर, सितारों की धड़कन, नगमों की रस धार लता ।

बनारस घराना, जयपुर तराना, गीतों का इकरार लता,

बैजू सुना था सुर बावरा वो, तानसेन दीदार लता।

सरहद की रेखा से सुर ही बड़ा है, नूपुर की झंकार लता,

भारत-पाक लाख दुश्मन हों, जनता की सरकार लता ।

तुम्हारा ये जाना न माने ज़माना, रहेंगी सदा गुलज़ार लता

… विवेक रंजन श्रीवास्तव

आज का दौर बदल चुका है। तकनीक के इस युग में ‘स्टार मेकर्स’ जैसे ऐप्स और ‘इंडियन आइडल’ जैसे कई रियलिटी शोज़ के मंच मौजूद हैं, जहाँ से नई प्रतिभाएँ बहुत आसानी से अपनी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इन मंचों पर लता जी के कई प्रतिरूप और अनुगामी शनैः-शनैः संगीत की दुनिया में अपना स्थान बना रहे हैं। परंतु, यह एक निर्विवाद शाश्वत सत्य है कि लता दीदी तो बस लता दीदी ही थीं— न भूतो, न भविष्यति। यद्यपि, सुर-साधना तो वास्तव में माँ सरस्वती की वह चिरंतन तपस्या और पूजा है, जिसमें यदि कल को कोई नई लता स्थापित होती है, तो स्वर्ग के किसी कोने में बैठी लता दीदी की आत्मा ही सर्वाधिक प्रसन्न होगी।

मशहूर शायर जावेद अख्तर ने कभी कहा था “हमारे पास एक चाँद है, एक सूरज है और एक लता मंगेशकर है।”

डॉ. इन्द्रजीत सिंह की पुस्तक ‘गायिकी की गंगा : लता मंगेशकर’ इसी अद्वितीय और ऐतिहासिक सत्य को बेहद आदर, सलीके और शोधपूर्ण दृष्टि से सहेजने का एक अत्यंत सराहनीय और सफल प्रयास है। यह पुस्तक न केवल हर संगीत प्रेमी के संग्रह में होनी चाहिए, बल्कि संगीत के शोधार्थियों के लिए भी एक मील का पत्थर है।

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

सेवा निवृत मुख्य अभियंता विद्युत मंडल

स्वतंत्र लेखक , कहानीकार , नाट्य लेखक ,समालोचक

ई अभिव्यक्ति पोर्टल के हिंदी संपादक

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७८ – देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७८ ☆ देश-परदेश – विश्व संग्रहालय दिवस : 18 मई ☆ श्री राकेश कुमार ☆

कल पूरे विश्व में संग्रहालय दिवस मनाया गया था।हमें इसकी जानकारी थी, कि इस दिन सभी संग्रहालयों में प्रवेश निशुल्क रहता हैं।

मौक़े पर चौक्का लगाते हुए हम चार साथी प्रातः ही जयपुर के संग्रहालय देखने के लिए एक मित्र की कार से रवाना हो गए।संग्रहालय में कुछ इक्का दुक्का हमारे जैसे मुफ्त के मज़े लेने वाले लोग अवश्य मिले।

अधिकतर संग्रहालयों में पार्किंग बहुत दूर रहती हैं।सुबह दस बजे ही मौसम के तेवर तेज़ हो रहे थे।चारों तरफ जेठ की तपती गर्मी ने बेहाल कर दिया था।एक मित्र ने तो हथियार डाल दिए।हम सब भी खाली हाथ लौट आए।साथी बोले ये विश्व संग्रहालय दिवस मई में ही क्यों मनाया जाता हैं ?ताकि, लोग मुफ्त में आनंद ना ले पाए।

व्यथित मन से घर आकर, अपने सब से अज़ीज़ मोबाइल में घुस गए।मन में विचार आया ये मोबाइल भी तो हमारा संग्रहालय हैं।

दुनिया भर की फोटो, बीमारियों के फर्जी नुस्खे, राजनतिज्ञों के झूठे वीडियो, अनजान लोगों के फालतू वाले ज्ञान और वो सैंकड़ों मैसेज जिन पर ये लिखा होता है, “इसको अवश्य सेव कर  लेवें” हमारे मोबाइल को संग्रहालय होने की मान्यता देते हैं।उसी संग्रहालय को देखते देखते पूरा दिन व्यतीत हो गया।

शाम के समय एक 15 वर्षीय बालक से हमने लिफ्ट में पूछा कि आज विश्व संग्रहालय दिवस है, आप इसके बारे में क्या जानते हैं ?

बालक बहुत ही नटखट निकला और बोला अंकल, हमें तो आप भी किसी संग्रहालय से कम नहीं लगते, ये पुरातन बातें और अपने बचपन के किस्से सुना सुना कर पका डालते हो, मोहल्ले के सभी बच्चे इसी लिए आप से दूर रहते है।

बालक ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, आप लोग आज की बात क्यों नहीं करते हो ? जैसे आई पी एल का चैंपियन कौन बनेगा, चिप्स का कौन सा नया ब्रांड आया हैं, कौन से पिज्जा के साथ कोल्ड ड्रिंक फ्री है, पॉप सिंगर शकीरा ने कोर्ट कैसे जीत लिया है, आदि। गंतव्य पहुंचते ही बालक मिल्खा सिंह की स्पीड से दौड़ गया।

घर वापस आकर दैनिक भास्कर में अपना भविष्य पढ़ा,उसमें लिखा था, आज का दिन अच्छा नहीं है, यात्रा ना करें।दूसरों से बुराई मिलेगी।कितना सत्य बताते है, हमारे ये भविष्य वक्ता।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३२८ ☆ पाळतात साप… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३२८ ?

☆ पाळतात साप… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

आज वावरत आहे, किती रुबाबात साप

कात टाकुन कोडगे, काही फिरतात साप

*

पाय जपुन टाकावा, जंगलात फिरताना

पाय चुकीचा पडता, येथे डसतात साप

*

जात बहिरीच त्यांची, भाषा समजत नाही

काठी पाहुन बिळात, सारे शिरतात साप

*

असो सागर वा भूमि, न्याय सर्व जगी एक,

छोट्या सापास सहज, मोठे गिळतात साप

*

किडा सावध नसावा, घात म्हणूनच झाला

दबा धरूनच येथे, काही असतात साप

*

गावामध्ये शिरतात, काही घुसखोर साप

फकिराच्या वेषातच, काही फिरतात साप

*

फार विषास मागणी, काळ्या बाजारी ह्या

नसतात ते गारुडी, तरी पाळतात साप

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ✍ 

खेत,

खलिहान

नदी,

पर्वत

नगर, गाँव और आदमी

सब बेहाल हैं

सबके एक से हाल हैं

सबकी मुट्ठियों में

जलते हुए सवाल हैं।

सवालों का न तन होता है

न मन होता है

सवालों की उम्र नहीं

केवल वजन होता है।

और/ ये वजन

घन की तरह घिरता है

गिरता है

सपना बिखरता है

मैं/

तुम/ये/ वे

सब बैठे हैं- सूखी नदियों के किनारे

हमारे

प्यारे घर

बाढ़ में बह गये हैं

हमारे पाससिर्फ जहरीली रेत के घरौंदे रह गये है।

बाढ़/नदी की होती

तो सब सह लेते

किसी तरह रह लेते

लेकिन

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८४ “बाप कवितायें लिखता है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बाप कवितायें लिखता है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बाप कवितायें लिखता है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

बेटे को अफसोस

“बाप कवितायें लिखता है।”

है अधेड़ पर अधिक आयु का

बेशक दिखता है ॥

 

चुँधियाये चश्में से सबको

ताका करता है ।

तम्बाकू को मसल हथेली

फाँका करता है ।

 

अपभ्रंश है बचा आदमी

की प्रजाति का –

डारवीन के परिकल्पन को

जाँचा करता है ॥

 

जमा हुआ रहता

चबूतरे पर हो स्थायी ।

उसको कोई सीख किसीकी

अब तक ना भायी ।

 

कोई बात सहन करने की

मगर नहीं क्षमता –

माँ के कुछ भी कहने पर

वह  भड़का करता है ॥

 

कोई महिला दरवाजे से

अगर निकल जाये ।

पता नहीं कब उनकी

भीषण त्योरी चढ़  जाये ।

 

फिर तो बस अध्याय

सजग आलोचन का लेकर ।

अपने भाषण में वह उसका

पालन करता है ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16 – 5 – 2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६ – आलेख – “चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक प्रेरणास्पद आलेख चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा।) 

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २६

☆ आलेख ☆ चिकित्सा जगत के गौरव डॉ. आर.एस. मिश्रा ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

86 वर्ष की उम्र में भी कर रहे रोगियों की सेवा

ऊंचा कद, गौर वर्ण, इकहरे बदन वाले आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी डॉ. रविशंकर मिश्रा याने डॉ. आर. एस. मिश्रा के जीवन का लक्ष्य ही पीड़ितों का उपचार कर उन्हें रोगमुक्त जीवन प्रदान करना है। मित एवं मधुर भाषी डॉ. मिश्रा गंभीर और शांत प्रकृति के व्यक्ति हैं। वे परिचतों, अपरिचितों अथवा इलाज कराने आये रोगियों की पूरी बात ध्यान से सुनते हैं और हल्की मुस्कुराहट के साथ ऐसा उत्तर देते हैं कि लोग प्रसन्न और तनाव मुक्त हो जाते हैं। रोगी का आधा इलाज तो उनकी विनम्रता और मीठी वाणी ही कर देती है। वे कहते हैं कि चिकित्सक की वाणी और व्यवहार भी रोगी की प्रतिरोधक क्षमता घटाने – बढ़ने वाला एक महत्वपूर्ण कारक है।

25 सितम्बर 1941 को देवरी, सागर में जन्में डॉ. मिश्रा 86 वर्ष की उम्र में भी अपने माता – पिता को दिया पीड़ितों की सेवा का वचन निभा रहे हैं। प्रारम्भिक शिक्षा देवरी से पूर्ण करने के उपरांत मिश्रा जी ने एम जी एम मेडिकल कॉलेज इंदौर से एम बी बी एस किया और 14 अप्रैल 1968 को शासकीय चिकित्सक के रूप में छतरपुर से सेवा प्रारंभ की। इसके उपरांत रीवा से उनकी सेवाएं आर्मी को स्थानांतरित कर दी गईं। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश के आजादी के युद्ध में सीमा पर भारतीय सेना के घायल जवानों का मनोयोग से उपचार किया। आपने पश्चिमी पाकिस्तान की सीमा पर भी लंबे समय तक सैनिकों का उपचार किया तदोपरांत पुनः जबलपुर स्थानांतरित हुए फिर दमोह, जबलपुर कोतवाली डिस्पेंसरी, मेडिकल कॉलेज अस्पताल एवं पनागर में सेवाएं देते हुए 2003 में सेवानिवृत्त हुए।

चिकित्सक के रूप में वे जहां – जहां पदस्थ रहे उनके संपर्क में आए लोग आज भी उन्हें स्नेह और श्रद्धा से याद करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवाभावी डॉ. मिश्रा ने घर में आराम करने के बजाए अंतिम सांस तक पीड़ितों की सेवा का संकल्प लिया और जबलपुर स्थित महाकौशल के सुप्रसिद्ध चिकित्सालय नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं देना प्रारंभ किया जो आज तक जारी है।

जब उनसे प्रश्न किया गया कि – “आर्मी में सैनिकों की चिकित्सा के दौरान आपने क्या विशेष अनुभव प्राप्त किया?” तब इस प्रश्न के प्रत्युत्तर में  डॉ. मिश्रा ने कुछ क्षण शून्य में निहारने के उपरांत कहा – “मुझे युद्धों से घृणा हो गई है, मैंने घायल सैनिकों के अत्यंत मार्मिक दृश्य देखे हैं। किंतु हां, नियमित जीवन शैली और लक्ष्य प्राप्ति के लिए अंतिम सांस तक संघर्ष करने की प्रेरणा मुझे सेना से ही मिली। संभवतः इसी कारण मैं सेवा के अपने लक्ष्य को जीवन के इस पड़ाव में भी निभा पा रहा हूं।”

उन्होंने नेशनल हॉस्पिटल में सेवाएं जारी रहने के प्रति संचालक डॉ. आनंद तिवारी को साधुवाद दिया।

डॉ. आर. एस. मिश्रा जी अपने 58 वर्षीय चिकित्सा सेवा काल में लगभग 25 लाख राेगियों की चिकित्सा का कीर्तिमान रच चुके हैं। अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में वे हाकी, बास्केटबाल और कबड्डी के खिलाड़ी रहे हैं। अब फुर्सत में गीत – संगीत सुनना पसंद करते हैं। डॉ. मिश्रा के सुपुत्र आनंद एयर फोर्स में वाइस एयर मार्शल के रूप में देश सेवा – सुरक्षा में रत हैं। डॉ. मिश्रा को स्वस्थ सुदीर्घ जीवन के लिए मंगलकामनाएं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता जिंदगी का आखिरी प्रहर है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆

☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆

यह माना कि जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है

 

कभी अंधेरों ने धमकाया

कभी उजालों ने भरमाया

कभी हवाओं ने जुल्म ढाया

कभी मौसम ने है रुलाया

कभी हार नहीं मानी

यह खुद्दारी का असर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

यह चिलचिलाती धूप

झुलसाती हुई रूप

लू चल रही है खूब

सांस हो रही है चुप

धरा पर भीषण गर्मी का

मचा हुआ कहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

जुल्म सहते सहते

सदियां बीत गई है

हक अधिकारों के लिए

लड़ने की क्या रीत नई है?

तोड़कर रूढ़ियों को आती

यह नई सहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

उनकी आवाज बने

जो बेबस बेघर हैं

उनके आंसू पोंछे

जिनका जीवन बदतर है

दिलों में ज्योत जलाएं 

अंधेरा बहुत पथ पर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

लाचार निर्धन शोषितों के लिए

चलो कुछ करते हैं

इनके लिए जीते हैं

इनके लिए ही मरते है

नेक इरादा हो तो

 आसान हर सफर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

हमारे पथ पर चलकर

आगे कई लोग आएंगे

आजादी के जश्न में

नए तराने गुनगुनाएंगे

इन दीवानों के कदमों में

अर्पित हमारा सर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

यह माना जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०८ – नारी तुम खुद की पहचान हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता नारी तुम खुद की पहचान हो।)

☆ अभिव्यक्ति # १०८ ☆

☆ नारी तुम खुद की पहचान हो☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

नारी, तुम खुद की पहचान हो,

छाया नहीं किसी की तुम हो,

तुम ही घर की शान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

संस्कार को देने वाली,

प्रेम सभी से करने वाली,

सृजन की पहचान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम्ही अंगनी, तुम्हीं वंदनी,

तुम्हीं संगनी, तुम्हीं नंदनी,

तुम ही लय और तान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम ही शिव की शक्ति हो,

तुम ही पावन भक्ति हो,

तुम धरा का मान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम धरा की श्रेष्ठ कृति हो,

ममता, प्रेम की अनुभूति हो,

ईश्वर का प्रतिदान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ७ ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “समिधाच सख्या या!!” – लेख क्र. ७. ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

तिनं एकवार बैठकीवर पाहिलं. ती चरकली. गोंधळली. बैठकीवर फक्त टाळ आणि चिपळ्या… बुवांशिवाय! तिला आठवले बुवांचे शब्द, ” आवले, ज्या दिवशी या टाळ-चिपळ्या माझ्या शरीरापासून वेगळ्या झालेल्या दिसतील, त्या दिवशी समज तुझा तुकाराम या जगात नाही “!

 चरकली ती… टाहो फोडला… धनी… धनी… तिचा आकांत ऐकून विठ्ठलाच्या मूर्तीचा थरकाप झाला, पायाखालची वीट थरारली… इंद्रायणी क्षणभर वहायची थांबली!!

हो… हीच ती… टाहो फोडून कोसळलेली, मनानं ढासळलेली… तुकाराम महाराजांची द्वितीय पत्नी… जिजाबाई, जिला तुकोबा प्रेमाने आवली म्हणत!

… हीच ती आवली जिला तुकोबांनी कधीतरी मनाच्या तरल मनस्थितीत, ज्यात त्यांना वाटे… ” विठो तुझे माझे राज्य, नाही दुस-याचे काज”!… मग अशा वेळी त्यांनी एका अभंगात म्हंटले…

स्त्री द्यावी गुणवंती, तरी तीते गुंते आशा,

म्हणून कर्कशा लावी पाठी”! 

– – झालं… त्यानंतर सगळेच मग आवली कडे कर्कशा पत्नी म्हणूनच बघू लागले. आजही बघतात. पण त्याच तुकोबांनी अजून एका अभंगात म्हंटलंयं…

 ” तुका म्हणे शोधून पाह्य,

 बायको नव-याची माय.

 तिजविण विसावे नाही,

 क्षणार्ध सुद्धा! 

 म्हणोनी संसार थोर! “

पण समाजधुरिणांनी, किर्तनकार, प्रवचनकार, सगळ्यांनीच आवलीवर ‘कर्कशा’… हे शिक्कामोर्तब केले ते केलेच! हाच शिक्का, हीच उमटवलेली मोहोर… पुसण्याचा हा प्रयत्न! तुकोबांच्या परमार्थ कार्य यज्ञात, आयुष्यभर… बोलंत-म्हणंत, त्याना जगरहाटी शिकवंत, लोकांपासून सावध रहाणं सांगंत, प्रापंचिक जबाबदा-यांची जाणीव देत… आणि स्वतः कोंड्याचा मांडा करून प्रपंच नेटका करण्याचा सतत प्रयत्न करंत… कधी पेटंत, कधी धुमसंत, तर कधी धगधगंत पण कुटुंब कबिल्यासाठी चेतती राहिलेली ही… समिधा!!! 

पुण्याच्या गुळवे सावकाराची, खात्या-पित्या घरातली ९-१० वर्षांची लेक… जिजाई! लग्न होऊन तुकारामांच्या घरात येते आणि साखरे सारखी विरघळून जाते त्यांच्या संसारात. द्वितीय पत्नी म्हणून आलेली असूनही, सवतीवर… रखुमाबाईंवर अगदी मनापासून प्रेम आणि तिच्या तब्येतीची काळजी घेणं, तिच्या मुलावर अपत्यवत प्रेम करणं… मोठ्या जावेवर बहिणीसारखी माया केली तिनं! जावेच्या पती विरहाच्या अव्यक्त दु:खानं दु:खी होणारी ही आवली!! प्रपंच मात्र नेटाने आणि नेटका, निगुतीचा करत होती. मोठ्या आत्मविश्वासाने संसार केला तिनं! 

पण तुकाराम मात्र एकापाठोपाठ एक पिता आणि माता यांचं छत्र हरवणं, मोठ्या भावजयीचं अकस्मात जाणं, मोठ्या भावाचं त्या दु:खात, विमनस्क अवस्थेत दूर कायमचं निघून जाणे, पहिल्या पत्नीचा मृत्यू आणि पहिल्या मुलाचा ही मृत्यू, पडलेला भयंकर दुष्काळ, होणारी उपासमार, बुडलेली सावकारी आणि प्रतिष्ठेचे निघालेले दिवाळे… या सगळ्या आपत्ती, विपत्तींच्या झंझावातात कोलमडून पडले. आणि परमार्थाची वाट धरली त्यांनी, प्रपंच जणू वा-यावर सोडून दिला. आणि दोघांच्या जगण्याच्या पातळ्याच भिन्न झाल्या. आवली ढासळली मनाने. हिंमत खचल्या सारखी झाली. आणि मग मात्र तिचा संयम कधी तरी संपला तर तिची चिडचिड होणं साहजिकच नाही कां? आपल्या नव-यानं चारचौघांसारखा संसार करावा असं त्या काळातल्या कुणाही बाईला वाटणाऱच ना? मग आवलीचं संतापणं, चिडणं, पराकोटीला ही गेलं असेल समजा… तरी तो उद्रेक तर घरा-घरांत आजही बघायला मिळतोच की! मग तिलाच ‘कर्कशा’ ठरवून, आणि तुकोबांनीच… तिच्या पतीनेच म्हंटलय़ं… असा पवित्रा घेत… आवलीचं पत्नी, सून, जाऊ, माता, गृहिणी म्हणून असलेलं समर्पण दुर्लक्षित नाहीच ना करता येणार? 

तुकोबांनी एकच उरवून आणलेला ऊस… संतापात तिने, भावनेच्या उद्रेकात फेकला, भिरकावला असेल ही त्यांच्या दिशेने… पण त्याचा विपर्यास करून… पाठीत मारला… असं म्हणणं… ही किंवदंती, आख्यायिका ही असू शकते की कदाचित! हा ही एक विचार असूच शकतो ना? पण म्हणून तिच्या या धगी पेक्षा… तिची ऊब, तिची मायेची, पती प्रेमाची पाखर त्याचा तो अलवार स्पर्श ही कधीतरी जाणवून घ्यावा ना? 

हीच आवली… भंडा-याच्या डोंगरात काटे-कुटे तुडवत तुकोबांच्या भुकेची भाकर झाली. तुकोंबावर मनापासून निरतिशय प्रेम केलं तिनं… म्हणूनच तर चिंतनासाठी कधी… भांबनाथ तर कधी भंडारा अशा विविध डोंगरावर, न सांगता गेलेल्या तुकोबांचा पत्ता तिला बरोबर कळे, आणि मग जाई ती थेट त्यांच्या पर्यंत भाकर घेऊन. तुकोबांच्या पोटात घास गेल्याशिवाय आवलीने कधीच एक घास ही खाल्ला नाही.

तुकारामा सारख्या तेजस्वी सूर्याची किरणे आवली पर्यंत नाही पोहोचू शकली. ती सतत त्यांची सावली बनून राहिली तरीही!! पण तरीही आवलीने एका अभंगात आपल्या आध्यात्मिक ज्ञानाची चुणूक, झलक दाखवलीच आहे असं वाटतं… बघा ना…

तुकारामाची कांता सांगे लोकांपाशी

 जातो पंढरीशी स्वामी माझा,

 फुटकाची वीणा त्याला दोन तारा

 घालितो येरझारा पंढरीच्या!”

– – – आवलीने आध्यात्मिक सत्यच सांगितले आहे ना यात… नऊ ठिकाणी छिद्रे असलेली ही देहरूपी वीणा आणि श्वास-उच्छवास या दोन तारा छेडीत माझा स्वामी पंढरीसी कां जातो? कळेना!! 

आवलीने… “देह ही पंढरी, आत्मा पांडुरंग! “… हेच तर सांगितलयं ना? 

तुकोबांचं सांगणं… ” आम्हां घरी धन, शब्दांचीच रत्ने! “… हे नसेल उमगलं तिला… पण तरीही तिनं तुकोबांच्या भक्तीचं वादळ पेललंच ना? आभाळ झेललं तिनं!! पण तिचं हे… पेलणं, झेलणं, घराचा सरा होऊन आख्खं घर तोलणं आणि कुटुंबाचा कणा होऊन ताठ उभं करणं… हे जगाने ओळखलंच नाही.

तुका आकाशाएवढा असेलही, आहे ही… पण आवली तर पृथ्वी सिद्ध झाली, जिच्या सोशिकतेने दगडाला ही पाझर फुटावा!!! 

कविवर्य बोरकरांनी सुद्धा तिचा महिमा वर्णिला आहे… म्हणतात…

तुक्याच्या पायाची व्हाया जिने वीट

 केली पायपीट चौ-यांशीची.

 *

 पोचवाया त्याच्या भूकेला भाकर

 काट्यांचे डोंगर पालाणिले.

 *

न चुकावी त्याची पंढरीची वारी

म्हणून वोसरी नोलांडिली!! “

*
आणि पुढे कविवर्य लिहितात…

 *

सार्थक होऊन, तुक्याच्या जन्माचे

 विमान देवाचे आले दारी,

 *

असून गर्भार पाचा महिन्यांची

 गाभण म्हशीची आई व्हाया,

 *

आलीये मुक्ती ला लाविले माघारी

 तुक्याहून थोरवी जिजाई ची!! 

अशी ही आवली तुकयाची सावली, गोठ्यातील गाभण म्हशीची माऊली… स्वतः गर्भार असूनही पतीबरोबरच मुक्ती पांडुरंगाने सुचविली, पण तिने नाकारिली… असंही म्हंटलं जातं. ही आख्यायिका जरी असली तरी, एक गोष्ट तर खरीच ना… की… तुकोबांनंतर ही आवलीने संसाराचा गाडा पुढे नेला. पती विरहाचं दु:ख पचवलं आणि त्यानंतर ४ महिन्यांनी जन्माला आलेल्या नारायणा वर अतिशय सुंदर संस्कार केले. आवलीला पतीचे महात्म्य कळले होतेच. फक्त तिची इच्छा होती की तुकोबांनी प्रपंच सांभाळून परमार्थ करावा. पण तसे नाही होऊ शकले. पण तरीही आवलीने, नारायण बापा सारखा व्हावा म्हणून त्याला वारकरी पंथाची शिकवण दिली. नारायणाचा… नारायण महाराज झाला. वारकरी पंथाची पताका तुकोबारायांनंतर नारायण महाराजांनीच खांद्यावर घेतली. ” ग्यानबा-तुकाराम”… हा गजर, नारायण महाराजांनी लिहिला, सुरू केला आणि माऊली -तुकोबांची एकत्रित पालखी ही त्यांनीच सुरू केली. म्हणूनच ते… पालखी सोहळा जनक:- तपोनिधी नारायण महाराज म्हणून ओळखले जातात. दिंडी सोहळ्याचे रूपांतर पालखी सोहळ्यात करण्याचं श्रेय त्यांच्याकडेच जाते.

– – – या सोहळ्याची पताका फडकविणा-या हातांच्या पाळण्याची दोरी मात्र त्या आवली माऊली च्याच हाती होती… हे विसरून नाही ना चालायचं! तिचेच संस्कार भिडले ना, गजर बनून थेट आभाळाला!! या… तिन्ही लोकीं च्या गुंडा पुत्राची माता… आवली… ‘कर्कशा’ कशी असेल ना मग?? 

तुका वारकरी संप्रदायाचा कळस झाला, पण त्या कळसाच्या तेजाचं स्फुल्लिंग… पाया मात्र आवलीच ठरावी, मानावी… असं वाटतं!! 

… ही बायको… तुकोबाची माय बनली, आपल्या लेकरांबरोबरंच, म्हणूनच तुकोबांच्या म्हणण्यानुसार च ते… प्रभु चरणी विसावू शकले.

हा विसावा देणारी त्यांची सावली… आवली… शेवटी त्या पांडुरंगाच्याच चरणी विसावली. खरं म्हणजे पांडुरंगाला तुकोबांपेक्षा तीच जास्त प्रिय होती… तिची विरोधी भक्ती, त्याच्या वरील रागामागचा भक्तीमय अनुराग… जाणला होता त्यानं… म्हणूनच तर ना… काटा निमित्त होते, घेई देव भक्ताचे पाय हाती!! 

– – अशी ही थोरवी त्या आवली ची ! स्वयं दीप होऊन जळत राहणाऱ्या समिधेची !!! 

– लेख क्र. ७.

© प्रा.भारती जोगी

पुणे.

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३५ ☆ व्यंग्य – दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘दलबदलुओं के लिए सहूलियत ‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३५ ☆

☆ व्यंग्य ☆ दलबदलुओं के लिए सहूलियत ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

संसद और विधानसभा में दल-बदल की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र सरकार ने दलबदलुओं की सहूलियत के लिए कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिये हैं। अभी अपनी पार्टी से तलाक लेने की इच्छा होने पर दलबदलू को नयी पार्टी के नेताओं के दरबार में जाकर चरण-वरण छूने पड़ते हैं, कुछ शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है। उन्हें इस जिल्लत से बचाने के लिए यह निर्णय लिया गया है कि संसद और राज्यों की विधानसभाओं के बाहर ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ का निर्माण किया जाए।  जब भी किसी दलबदलू के पेट में मरोड़ होगी, पुराने दल को छोड़कर किसी मलाईयुक्त पार्टी में संतरण करने की इच्छा बलवती होगी, तब वह वह इस कक्ष के भीतर प्रवेश कर आसन पर बैठ जाएगा और यह खबर तत्काल जंगल की आग की तरह फैल जाएगी कि नेताजी की ‘अक्कल दाढ़’ निकल आयी है और वे दल बदलने की मंशा से पीड़ित हैं। फिर नेताजी उम्मीद करेंगे कि दूसरी पार्टी वाले उन पर डोरे डालेंं और उन्हें बाइज़्ज़त, गाजे-बाजे के साथ अपनी पार्टी में शामिल करने के लिए ले जाएं।

पुराने ज़माने में यह काम राजाओं के ‘कोप भवन’ के द्वारा होता था। जब रानियां किसी बात पर रुष्ट हो जाती थीं तो वे कोप भवन में प्रवेश कर जाती थीं और सबको पता चल जाता था कि रानी रूठ गयी हैं। फिर राजा साहब सारा राज- काज छोड़कर रानी की रुसवाई को दूर करने में लग जाते थे। कुछ ऐसा ही असर नेताजी के ‘असंतुष्ट प्रतिनिधि कक्ष’ में प्रवेश करने से अपेक्षित है।

दलबदलुओं के साथ एक  गड़बड़ यह होती है कि दल बदलने के साथ उनके ‘सुर’ में ज़रूरी तब्दीली नहीं हो पाती। आदत न होने की वजह से कई बार असावधानी में वे पुराने दल और पुराने नेता का गुणगान और नई पार्टी को पूर्ववत गरियाना शुरू कर देते हैं। ऐसा एक दो दलबदलुओं के साथ हो चुका है। ज़्यादा दल बदलने वालों के सामने यह संकट अक्सर खड़ा हो जाता है। हमारे गायक मन्ना डे ने सही सुर साधने की इसी समस्या को एक गीत में व्यक्त किया है— ‘सुर ना सधे, क्या गाऊं मैं? सुर के बिना जीवन सूना।’ राजनीति ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाली चीज़ होती है। दलबदलू  की सही सुर पकड़ने की असावधानी उसके भविष्य के लिए घातक हो सकती है। इसलिए निर्णय लिया गया है कि संसद और विधानसभाओं के निकट ‘सुर’ सुधारने वाले क्लिनिक स्थापित किये जाएंगे जहां ऑपरेशन के द्वारा दलबदलुओं के स्वर-यंत्र में ज़रूरी सुधार किये जाएंगे ताकि वे अपने पुराने दल की भर्त्सना और नये दल की तारीफ बिना चूके कर सकें। इन क्लिनिक्स में चिकित्सा के लिए सरकार ‘सब्सिडी’ प्रदान करेगी।

इसके बाद भी जिन दलबदलुओं का सुर नहीं सुधरेगा, जो अपराध-बोध या आत्मग्लानि से पीड़ित रहेंगे, या जिनकी अंतरात्मा उन्हें फटकारती  रहेगी, उनके लिए बाकायदा ‘हार्ट ट्रांसप्लांट क्लिनिक’ स्थापित किए जाएंगे जहां दिल बदलने का काम किया जाएगा, ताकि दिल और आत्मा की खटखट ही ख़त्म हो जाए। यानी दल-बदल और दिल-बदल का कार्यक्रम साथ-साथ संपन्न होगा। इसके लिए भी सरकार ‘सब्सिडी’ का प्रावधान करेगी।

सरकार को भरोसा है कि इन सुविधाओं से प्रभावित होकर ज़्यादा से ज़्यादा सदस्य सरकारी दल में शामिल होकर उसकी ताकत में इज़ाफ़ा करेंगे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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