(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “अब लौटे रुदित पिता ...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८९ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “अब लौटे रुदित पिता...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका समसामयिक विषय पर एक विचारणीय व्यंग्य “रामचंद्र कह गए सिया से…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३१ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “रामचंद्र कह गए सिया से…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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वर्षों पहले एक फिल्म आई थी गोपी जिसमें दिलीप कुमार पर फिल्माया गया एक गाना बहुत चर्चित हुआ था।
“रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,
हँस चुनेगा दाना जुन का कौवा मोती खाएगा।”
अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिये गए दान के पैसों और आभूषणों की चोरी ने इस वर्षों पुराने गीत को सही साबित कर दिया। गीत लंबा है और इसमें जितनी भी बातें कही गई हैं वे सभी सच साबित हो रहीं हैं। राम मंदिर में चोरी की चर्चा न सिर्फ भारत वरन पूरी दुनिया में हो रही है। दान की चोरी करने वालों को श्रद्धालु और तमाम ईमानदार लोग तो धिक्कार ही रहे हैं, ईश्वर पर आस्था रखने वाले सिद्धांतवादी चोर, डाकू, लुटेरे, रिश्वतखोर, जमाखोर भी मंदिर के दान और चढ़ोत्तरी पर हाथ साफ करने वालों की निंदा कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि मंदिर में दान राशि – संग्रह के लिए बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन नहीं हुआ। वैसे देखा गया है कि तमाम नियमों कानूनों के बाद भी देश में अरबों के घोटालों, चोरियों, धोखाधड़ी से लेकर प्रश्न पत्रों व अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी का लम्बे इतिहास के साथ – साथ वर्तमान भी है।
चोर, चौकीदार से शातिर होते हैं। वे लोगों की आंखों के काजल से लेकर दिल तक चुरा लेते हैं और पता चोरी होने के बाद ही चल पाचौड़ाता है। इसलिए तो कहा गया है कि डाल – डाल चलने वाले चौकीदारों की अपेक्षा पात – पात चलने वाले चोर हमेशा सफलता प्राप्त कर लेते हैं। यह ठीक है कि चोरी बुरी बात है पर चोर होना कोई मामूली बात नहीं। चोरी के लिए 56 इंच का सीना होना चाहिए ये तो मैं नहीं कहूंगा क्योंकि इस नाप का सीना निर्विवाद है, लेकिन विशाल सीना होना आवश्यक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों विशेषकर संस्कृत साहित्य जैसे “दशकुमारचरितम्” में चोरी को चतुषष्टिक कलाओं में से एक विशेष विद्या “चौर्य कला” के रूप में उल्लेखित किया गया है। अर्थात चोरी एक कला है इस आधार पर यह मानना पड़ता है कि राम मंदिर के चोर पहुंचे हुए साहसी कलाकार हैं।
एक लोक प्रिय कहावत भी है “राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत; खाओ चिड़िया भर-भर पेट“। जो हमारी नजर में चोर हैं वे शायद चंदे को अपना ही समझ कर खा रहे थे। “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सब के दाता राम॥” कहीं ये राम मंदिर में बैठे अजगर तो नहीं थे।
श्रीरामचरितमानस के रचनाकार संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में वर्षों पूर्व ही बालकाण्ड में लिख दिया था -“होइ है वही जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।” अर्थात् संसार में वही होकर रहेगा जो भगवान श्रीराम ने पहले से तय कर रखा है। व्यर्थ के तर्क – वितर्क करके कौन इसे बढ़ाए। दान के करोड़ों रुपयों और जेवरों का गबन हुआ है। जांच जारी है, कई लोगों से सघन पूछताछ की जा रही है, अनेक लोग गिरफ्तार हुए हैं। संभवतः जांच से सब सामने आ जाए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाए। शायद न भी हो क्योंकि “होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥” हम तो सिर्फ परिणाम की प्रतीक्षा कर सकते हैं। वैसे यदि चोर राम मंदिर में चोरी करने की जगह कृष्ण मंदिर में चोरी करते तो सफाई में कुतर्क कर सकते थे कि हमने चोर (माखनचोर) के घर चोरी की है, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर में चोरी करके वे बुरी तरह फंस चुके हैं। यों आज के युग में लोग बेशर्मी से चिल्ला – चिल्ला कर चोरी कर रहे हैं, कई लोगों के जीवन यापन का साधन ही फिल्म “चोरी मेरा काम” के हीरो की तरह खुल कर चोरी करना है, ऐसे लोगों पर अब तक क्या प्रतिबंध लगे ? इस फिल्म के गाने के बोल ही देख लीजिये –
चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम।
अरे वो करते हैं चोरी चोरी करून मैं खुले आम।
सुना था स्वतंत्रता पूर्व चोरों – डाकुओं को राजाओं – जमीदारों आदि का संरक्षण प्राप्त रहता था। संरक्षण प्राप्त चोर – डाकू दूसरे राज्यों – क्षेत्रों में चोरी – डकैती करते थे और लूट का धन अपने राज्य राजकोष में जमा करके कमीशन, सुरक्षा व सम्मान प्राप्त करते थे। कहां तक बात करें, दुनिया चोरों से भरी पड़ी है। बहरहाल राम मंदिर के चोरों को राम जी भले ही माफ कर दें लेकिन सरकार और राम भक्त जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तुम आ रही हो…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कुहू कुहू,कुहू कुहू गाए कोयलिया…‘।)
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३९ ☆
गोस्वामी जी ऑफिस के बड़े बाबू के पास पहुंचे। कहा, ‘बड़े बाबू, वाइफ का ट्रांसफर कराना है। छः साल से सीतापुर में पड़ी हैं। परेशानी बनी हुई है।’
बड़े बाबू सुंघनी का एक डोज़ लेकर बोले, ‘हो जाएगा। हम किस दिन काम आएंगे?’
गोस्वामी जी ने पूछा, ‘कुछ चंदन-पानी लगेगा क्या?’
बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘तीन लाख का रेट चल रहा है। ले आओ और हफ्ते भर में आर्डर ले लो।’
गोस्वामी जी की आंखें फैल गयीं, बोले, ‘तीन लाख? यह तो बहुत है। इतना कौन देगा?’
बड़े बाबू इत्मीनान से फाइल पलटते हुए बोले, ‘देख लो। हमने सीधा रास्ता बता दिया। काम बिलकुल सही और ईमानदारी से होगा। हफ्ते भर में आर्डर मिल जाएगा।’
गोस्वामी जी हाथ उठाकर बोले, ‘न बाबा! यह तो बहुत ज्यादा है। मेरी मंत्री जी के पीए से रसाई है। मेरी कॉलोनी में ही रहते हैं। उनसे कहूंगा। वह ज़रुर मदद करेंगे।’
बड़े बाबू बोले, ‘देख लो। हमने तो आपको सीधा-सादा रास्ता बता दिया, एकदम एक्सप्रेस वे वाला। आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते पसंद हैं तो उन्हीं को पकड़ो। आपकी मर्जी।’
गोस्वामी जी पंद्रह दिन बाद फिर आकर बड़े बाबू के पास बैठ गये। मायूसी के स्वर में बोले, ‘हमें पीए साहब ने आश्वासन दिया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सब झटका देते हैं। कोई भरोसे के लायक नहीं है। अब तो ट्रांसफर बंद भी हो गये ।’
बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘हमने तो आपको पहले ही सलाह दी थी कि सीधे रास्ते पर चलो, लेकिन आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते ही पसंद हैं तो हम क्या कर सकते हैं? जमाने के हिसाब से नहीं चलोगे तो तकलीफ तो उठानी पड़ेगी।’
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४3 ☆💧 बूँदें… 🌧️
लगभग एक घंटे पहले छिटपुट बारिश हुई है। भोजन के पश्चात घर की बालकनी में आया तो वहाँ का दृश्य देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा। सुरक्षा जाली की सलाखों पर पानी की मोटी बूँदें झूल रही थीं। बालकनी के पार खड़े विशाल पेड़ अपनी फुनगियों पर गुलाबी फूलों से लकदक यों झूम रहे थे मानों सुबह-सवेरे कोई मुनिया अपनी चोटियों पर दो गुलाबी रिबन कसे इठलाती हुई स्कूल जा रही हो। इस दृश्य को कैमरे में उतारने का मोह संवरण न कर सका।
मोबाइल के कैमरे ने चित्र उतारा तो मन का कैमरा चित्र को मस्तिष्क की तरंगों तक ले गया और मन-मस्तिष्क का गठजोड़ विचार करने लगा। क्या हमारा क्षणभंगुर जीवन साँसों का आलंबन लिए इन बूँदों जैसा नहीं है? हर बूँद को लगता है जैसे वह कभी न ढलेगी, न ढलकेगी। सत्य तो यह है कि अपने ही भार से बूँद प्रतिपल माटी में मिलने की ओर बढ़ रही है।
कालातीत सत्य का अनुपम सौंदर्य देखिए कि बूँद माटी में मिलेगी तो माटी उम्मीद से होगी। माटी उम्मीद से होगी तो अंकुर फूटेंगे। अंकुर फूटेंगे तो पौधे पनपेंगे। पौधे पनपेंगे तो वृक्ष खड़े होंगे। वृक्ष खड़े होंगे तो बादल घिरेंगे। बादल घिरेंगे तो बारिश होगी। बारिश होगी तो बूँदें टपकेंगी। बूँदें टपकेंगी तो सलाखें भीगेंगी। सलाखें भीगेंगी तो उन पर पानी की मोटी बूँदें झूलेंगी…!
वस्तुत: सलाखें, बूँदें, पेड़, सब प्रतीक भर हैं। जीवात्मा असीम आनंद के अनंत चक्र की चौरासी कोसी परिक्रमा कर रहा है। बरसाती बादल की तरह छिपते-दिखतेे इस चक्र को अद्वैत भाव से देख सको तो जीवन के ललाट पर सतरंगा इंद्रधनुष उमगेगा।…इंद्रधनुष उमगने के पहले चरण में चलो निहारते हैं सलाखें, बूँदें और पेड़…!
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – नवगीत – राम लला की राम निधि।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८४ ☆
☆ नवगीत – राम लला की राम निधि ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (6 जुलाई से 12 जुलाई 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
इस समय दुनिया विभिन्न प्रकार के संकटों से जूझ रही है। रूस और यूक्रेन का युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ अमेरिका और ईरान में युद्ध चल ही रहा है तेल का भीषण संकट पूरे विश्व में व्याप्त हो रहा है। परंतु हमारी रक्षा इस समय भी पवन पुत्र श्री हनुमान कर कर रहे हैं। श्री हनुमान जी से प्रार्थना करने का सबसे अच्छा उपाय हनुमान चालीसा है। हनुमान चालीसा की आज की चौपाई है –
सब पर राम तपस्वी राजा |
तिन के काज सकल तुम साजा ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से राजकीय कार्यों मे सफलता प्राप्त होती है। अगर आपके कार्य शासकीय कार्यालय में रुक रहे हो तो आप इस चौपाई का संपुट पाठ करें। आपका कार्य सिद्ध होगा।
अब मैं आप पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 6 जुलाई से 12 जुलाई 2026 तक के सप्ताह के ग्रहों के गोचर के बारे में बताऊंगा।
इस सप्ताह सूर्य मिथुन राशि में, मंगल वृष राशि में, गुरु कर्क राशि में, शुक्र सिंह राशि में, शनि मीन राशि में, और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। बुध प्रारंभ में कर्क राशि में वक्री रहेगा तथा 7 तारीख के 1:20 दिन से मिथुन राशि में वक्री हो जाएगा।
आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपकी कुंडली के गोचर में प्रबल गज केसरी योग बन रहा है। इस योग के कारण आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी और आपके कार्य आसान होंगे। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से बहुत कम मदद मिलेगी। आपके सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। भाग्य से आपको मदद मिलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 8 तारीख के दोपहर से लेकर 9 और 10 तारीख कार्यों को करने में मददगार हैं। 6, 7 और 8 के दोपहर तक का समय आपके लिए सावधान रहने का है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान दें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर किसी सफेद चीज का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों के साथ अच्छा संबंध रहेगा। इस सप्ताह आपके पास धन आने की भी अच्छी उम्मीद है। व्यापार में इस सप्ताह आपको ध्यान देना चाहिए। अगर आप व्यापार में ध्यान नहीं देंगे तो व्यापार में घाटा हो सकता है। इस सप्ताह आपको अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना चाहिए। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने प्रतिष्ठा पर भी ध्यान देना चाहिए। अगर आप अपने प्रतिष्ठा पर ध्यान देंगे तो उसमें वृद्धि होगी। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख समस्त प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। 8, 9 और 10 तारीख को आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मिथुन राशि
इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आपके कई कार्य आसानी से भी हो सकते हैं। परंतु आपको भाग्य के सहारे नहीं बैठना चाहिए। इस सप्ताह अपने शत्रुओं को थोड़े से प्रयास से ही पराजित कर सकते हैं। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको सावधान रहना है। कार्यालय में आपकी स्थिति सामान्य रहेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव हो सकता है। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 6, 7 और 8 तारीख कार्यों को करने में परिणाम दायक हैं। 11 और 12 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपको भाग्य से थोड़ी सी मदद मिल सकती है। इसका सहारा लेकर आप बहुत सारे कार्यों को पूर्ण कर सकते हैं। धन प्राप्त होने का मामूली योग है। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। पैसे का खर्च काफी हो सकता है। भाई बहनों के साथ संबंधों में सावधान रहें। संबंध तनावपूर्ण भी हो सकते हैं। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। जीवन साथी को पेट की समस्या हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख कार्यों को सिद्ध करने के लिए उचित है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। 10, 11 और 12 को धन प्राप्त होने का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
सिंह राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। धन प्राप्ति का अच्छा योग है। इस सप्ताह अगर आप प्रयास करेंगे तो आपको अच्छी मात्रा में धन की प्राप्ति हो सकती है। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह अपने कार्यालय में सावधानी से कार्य करना चाहिए। उनको अपने अधिकारियों से सचेत रहना चाहिए। दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख लाभदायक है। 6, 7 और 8 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
कन्या राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। प्रयास करें धन की प्राप्ति हो सकती है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। जीवनसाथी के कमर या गरदन में दर्द हो सकता है। पिताजी और माताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 6, 7 और 8 की तारीख की दोपहर तक का समय किसी भी कार्य के लिए फलदायक है। 10, 11 या 12 तारीख को आपको भाग्य से मदद मिल सकती है। 8 तारीख के दोपहर के बाद से एवं 9 तथा 10 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
तुला राशि
इस सप्ताह भाग्य आपका विशेष रूप से साथ देगा। भाग्य के सहारे आपके कुछ कार्य हो सकते हैं परंतु बहुत ज्यादा भाग्य पर विश्वास ना करें। क्योंकि आपके भाग्य भाव पर राहु की सीधी दृष्टि पड़ रही है। इसलिए कर्म पर ज्यादा विश्वास करें। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनके द्वारा किए गए कार्यों की प्रशंसा भी हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े तनावपूर्ण हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 8 तारीख के दोपहर के बाद से लेकर 9 और 10 तारीख के दोपहर तक का समय फल दायक है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्य करने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
वृश्चिक राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाग्य से इस सप्ताह आपको काफी मदद मिल सकती है। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। भाई बहनों के साथ थोड़ा तनाव हो सकता है। आपको अपने संतान से मामूली सहयोग प्राप्त होगा। दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करें। कर्मचारी एवं अधिकारियों को अपने कार्यालय में सावधानी पूर्वक कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके संतान को कुछ लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों को कुशलता पूर्वक करने के लिए उचित है। 8 तारीख के दोपहर से लेकर 9 और 10 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। माता और पिताजी का स्वास्थ्य भी सामान्य रहेगा अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। विशेष सतर्कता बढ़ाने पर इस सप्ताह आप कचहरी के कार्यों में सफल हो सकते हैं। भाग्य से थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह पहले जैसा ही रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंध खराब हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 6, 7 और 8 तारीख विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। 10, 11 और 12 तारीख को आपको सावधानीपूर्वक कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
मकर राशि
यह वर्ष आपके जीवन साथी के लिए काफी अच्छा रहेगा। अविवाहित जातकों के लिए भी यह समय ठीक है। उनके विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं एवं विवाह हो सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे। अगर आप समाप्त करने का प्रयास करेंगे कि वे समाप्त भी हो सकते हैं। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8, 9 और 10 तारीख परिणाम दायक है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
कुंभ राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। नए-नए प्रेम संबंध बनेंगे। विवाह के उत्तम प्रस्ताव आएंगे। इस सप्ताह आप को अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। उनकी प्रतिष्ठा पर आंच आ सकती है। धन प्राप्त होने की उम्मीद है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 10, 11 और 12 तारीख उत्तम है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
इस सप्ताह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रशंसा प्राप्त होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। भाग्य से इस सप्ताह आपको लाभ प्राप्त होगा। आपको अपने संतान से भी सहयोग प्राप्त होगा। संतान की उन्नति भी हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 6, 7 और 8 तारीख विभिन्न प्रकार से अनुकूल है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ६९ आणि ७० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆
श्लोक क्र. ६९ – –
सुखानंदकारी निवारी भयाते ।
जगीं भक्तिभावे भजावे तयाते ।
विवेके तजावा अनाचार हेवा ।
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ।।६९।।
अर्थ – –भगवंत हा सुख आणि आनंद देणारा आणि भयाचे निवारण करणारा आहे. त्याला भक्तिभावाने आराधना करावी. विवेकाच्या साहाय्याने अनाचार म्हणजे अनीतीने वागणे आणि इतरांचा हेवा किंवा द्वेष यांचा त्याग करावा. प्रभात समयी श्रीरामाचे (भगवंताचे) चिंतन करावे.
(सुखानंदकारी – सुख आणि आनंद देणारा, तजावा – सोडून द्यावा, अनाचार – अनीतीचे वागणे)
विवेचन – –भगवंताचे गुण वर्णन करताना समर्थ म्हणतात की भगवंत हा सुख आणि आनंद देणारा आहे. सुख आणि आनंद हे शब्द आपण सामान्यपणे समानार्थी समजतो पण त्यात फरक आहे. सुख हे क्षणिक असून इंद्रिये आणि भौतिक गोष्टींवर अवलंबून असते. माणूस आयुष्यभर या सुखाच्या मागे धावत असतो. आनंद ही एक वृत्ती किंवा मानसिक अवस्था असून ती दीर्घकाळ टिकणारी आहे. ती परिस्थितीवर अवलंबून नसते. जो स्वस्वरुपी स्थिर असतो, त्याच्याकडे कायमच आनंदी वृत्ती असते. भगवंत या दोन्हींचा दाता आहे. तो सुखकर्ता आणि दुःखहर्ता आहे. दुःख हरण केल्यानंतर उरतो तो आनंद आणि सुख.
भगवंत हा भयाचे देखील हरण करतो. माणसाला या ना त्या कारणाने आयुष्यभर कुठल्यातरी भयाने पछाडलेले असते. माझा पैसा टिकेल का, मुलेबाळे मला म्हातारपणी विचारतील का? एक ना दोन अशा अनेक चिंतांनी मनुष्य ग्रस्त असतो. पण सर्वात मोठे भय असते ते मरणाचे. भगवंत या भीतीतून देखील आपली मुक्तता करतो. जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यातून आपली सुटका झाली तर मृत्यूचे देखील भय नाहीच!
पण या सुखानंदकारी अशा भगवंताच्या कृपेचा अनुभव यायचा असेल तर त्यासाठी कोणती अट आहे? ती समर्थ पुढील ओळीत सांगतात. ते म्हणतात, “जगी भक्तिभावे भजावे तयाते. ” अत्यंत भक्तिभाव आपल्या ठायी असला पाहिजे. त्यासाठी मनाने आपण त्याचे होऊन जावे. आपले सर्वस्व त्याला अर्पण करावे. भगवंत माझा आहे आणि मी भगवंताचा आहे अशी दृढ भावना आपल्या ठायी असली पाहिजे. तुकाराम महाराज म्हणतात…
नामसंकीर्तन साधन पै सोपे । जळतील पापे जन्मतारीची ।
न लगती सायास जावे वनांतरा । सुखे येतो घरा नारायण ।।
ठायींच बैसोनि करा एकचित्त । आवडी भगवंत आळवावा ।
रामकृष्णहरी विठ्ठल केशवा । मंत्र हा जपावा सर्वकाळ ।।
भगवंत प्राप्तीसाठी वनात जाण्याची जरुरी नाही. कोणतेही कष्ट, उपासतापास करण्याची गरज नाही. आपण आहोत तेथेच त्याचे नामस्मरण करावे. मनाने त्याचेच होऊन राहावे.
पण भगवंत प्राप्तीसाठी निर्मळ, शुद्ध अंतःकरणाची गरज असते. जी माणसे अनाचाराने म्हणजे अनीतीने वागतात, दुसऱ्यांचा द्वेष किंवा मत्सर करतात, अशांना भगवंत कसा प्राप्त होईल? स्वच्छ पाण्यातच प्रतिबिंब दिसते. तसेच मनही शुद्ध, स्वच्छ हवे. अनीती, मत्सर, हेवेदावे हा मनातील गाळ आहे. तो काढून टाकायला हवा. अनीती आणि अनाचाराने वागणारी माणसे कितीही शक्तिमान आणि बलवान असली तरी शेवटी त्यांचा नाश अटळ असतो. रावण दुराचारी होता. शक्तिमान आणि विद्वान होता. पण त्याचा नाश झाला. तो स्वतः, त्याची मुले यांचा नाश झाला. अनीतीने वागणारे कौरव युद्धात मारले गेले आणि त्यांचे राज्यही नष्ट झाले. आपण जसे वागतो, तेच कर्माच्या सिद्धांतानुसार आपल्याकडे परत येते. हेवा किंवा मत्सर केल्याने दुसऱ्याचे फारसे नुकसान होणार नाही. पण हे दोष आपल्यालाच आतून संपवतात. द्वेष केला तर द्वेषच वाट्याला येईल. प्रेम दिले तर प्रेम परत मिळेल. म्हणून अनीतीने वागणे, दुसऱ्यांचा द्वेष करणे यासारख्या गोष्टींचा त्याग करायला हवा.
या गोष्टी परमार्थातील अडथळा आहेत. त्यांचा त्याग विवेकाने म्हणजे विचारपूर्वक करावा. मला इतरांनी माझ्याशी जसे वागायला हवे असे वाटते, तसेच मी इतरांशी वागायला हवे. मला कोणी खोटे बोललेले आवडत नाही, कोणी माझा द्वेष केला तर मला आवडत नाही. मग मीही इतरांशी तसेच वागायला हवे, नाही का? मागील एका मनाच्या श्लोकात समर्थ म्हणतात, ” विचारे बरे अंतरा बोधवीजे । मना सज्जना राघवी वस्ती कीजे. ” असा विचारपूर्वक मनाला बोध करून, संयम, विवेक आणि वैराग्य यांची कास धरून वाटचाल केली तर भगवंत दूर नाही. त्यासाठी पहाटेच्या वेळी भगवंताचे चिंतन करावे आणि पुढेही दिवसभर आपली कामे करताना त्याचे विस्मरण होऊ देऊ नये.
स्वसंवाद ::
१. मी क्षणिक ‘सुख’ शोधतो की चिरंतन ‘आनंद’?
२. माझ्याकडून नकळत का होईना पण कोणाचा ‘हेवा’ (मत्सर) किंवा द्वेष घडतो का?
३. “इतरांनी माझ्याशी जसे वागावे असे मला वाटते, तसेच मी इतरांशी वागतो का? “
४. पहाटे उठल्यानंतर मी प्रथम श्रीरामाच्या रूपगुणांचे चिंतन करतो का?
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श्लोक क्र. ७० – –
सदा रामनामे वदा पूर्णकामे ।
कदा बाधिजेनापदा नित्यनेमे ।
मदालस्य हा सर्व सोडूनि द्यावा ।
प्रभाते मनी राम चिंतीत जावा ।।७०।।
अर्थ –अगदी मनापासून रामनाम घ्यावे. नित्यनेमाने नाम घेणाऱ्यास संकटांचा त्रास होत नाही. अहंकार आणि आळस या दुर्गुणांचा त्याग करावा. आणि प्रभात समयी श्रीरामाचे चिंतन करावे.
(वदा – म्हणा, पूर्णकामे – अगदी मनापासून, बाधणे – त्रास होणे, आपदा – संकट, मद – अहंकार, आलस्य – आळस)
विवेचन –या श्लोकात भगवंताचे नाम अगदी मनापासून घ्यावे असे समर्थ आपल्याला सांगत आहेत. त्यासाठी त्यांनी ‘ पूर्णकामे ‘ हा सुंदर शब्द वापरला आहे. व्यवहारात कोणतीही गोष्ट आपण केली तर आपल्याला तिचे काय फळ मिळेल याकडे आपले लक्ष असते. फळाची अपेक्षा ठेवूनच आपण कर्म करीत असतो. पण जेव्हा रामनाम किंवा भगवंताचे नाम आपण घेतो तेव्हा त्यापासून आपल्याला काय फळ मिळेल अशी अपेक्षा ठेवू नये. नाम फक्त नामासाठीच किंवा भगवंतासाठीच घ्यावे. असे नाम जेव्हा आपण घेऊ त्यावेळी इतर सर्व अपेक्षा आपोआपच नाहीशा होतील. ते नाम मग मनापासून घेतले जाईल म्हणजेच समर्थ सांगतात तसे ‘ पूर्णकामे. ‘
तसेच समर्थ म्हणतात की नित्यनेमाने नाम घेणाऱ्याला संकटे त्रास देत नाहीत. नित्यनेमामुळे संकटे येत नाहीत असे नाही, तर संकटातही मनाचा समतोल राखण्याची आणि त्या आपदा सोसण्याची शक्ती रामनामामुळे मिळते असा याचा अर्थ आहे. संकटांची धाव देहापर्यंतच असते परंतु अखंड नामस्मरण करणाऱ्याला त्यांचा त्रास होत नाही.
परंतु असे अगदी मनापासून नाम घेण्याच्या आड दोन मोठया अडचणी उभ्या राहतात. एक म्हणजे आपला अहंकार. मी कशाला नाम घेऊ? मला त्याची काय आवश्यकता? नाम घेणे हे रिकामटेकड्या लोकांचे काम आहे. त्याशिवाय नुसते नाम घेऊन काय होणार? त्याच्या जोडीला ज्ञान नको का? असे नानाविध विचार मनात येऊन माणूस नाम घेण्याच्या विचारापासून परावृत्त होतो. पण इथे आपण एक गोष्ट लक्षात घेतली पाहिजे की सगळ्याच संतांनी नामस्मरणाचा महिमा वर्णन केला आहे. भगवंत प्राप्तीसाठी नामसारखे सोपे साधन नाही असे ते म्हणतात. गोंदवलेकर महाराजांनी तर आपल्या प्रत्येक प्रवचनात निरनिराळ्या प्रकारे केवळ नाम घेण्याचा उपदेश केला आहे.
नाम घेण्याच्या आड येणारी दुसरी गोष्ट म्हणजे आळस. आळसाने मोठमोठी कार्ये नासतात. चौऱ्यांशी लक्ष योनींचा प्रवास करून आपल्याला हा नरदेह प्राप्त होतो असे म्हटले जाते. मनुष्य प्राण्यांखेरीज इतरांना विचार करण्याची शक्ती परमेश्वराने दिलेली नाही. या नरदेहाचे सार्थक करून घ्यायचे असेल तर आपल्या मूळ स्वरूपाचे ज्ञान करून घेतल्याशिवाय पर्याय नाही. मूळ स्वरूप म्हणजेच भगवंताचे ज्ञान. आपली नित्यकर्मे करता करता आपण सहज भगवंताचे नाम घेऊ शकतो. परंतु प्रत्येक वेळी आपला आळस आपल्याला या गोष्टीपासून प्रतिबंध करतो आणि नामस्मरण करायचे तर निवृत्तीनंतर करू. आताच काय घाई आहे अशा प्रकारचा सोयीस्कर विचार आपण करत असतो. पण तो बालपण खेळात जाते, तरुणपण धुंदीत निघून जाते. मग म्हातारपणी काही करू म्हटले तर शरीर साथ देत नाही. म्हणूनच समर्थ आपल्याला एका अभंगात सांगतात, “काळ जातो क्षणाक्षणा, मूळ येईल मरणा… ” म्हणून जोवर शरीर साथ देते आहे तोवरच परमेश्वराचे नामस्मरण नित्यनेमाने करावे असे समर्थांचे सांगणे आहे.
स्वसंवाद ::
१. मी करत असलेल्या उपासनेच्या किंवा चांगल्या कामाच्या मागे काही ‘भौतिक फळाची अपेक्षा’ असते का? की मी ते निरपेक्ष भावनेने करतो?
२. “नामस्मरण ही केवळ निवृत्तीनंतर करण्याची गोष्ट आहे” असा सोयीस्कर विचार करून मी आजचा वेळ ‘आळसात’ घालवत आहे का?
३. माझ्या ज्ञानाचा, पदाचा किंवा संपत्तीचा ‘अहंकार’ मला भगवंताच्या चरणी लीन होण्यापासून रोखत आहे का?
४. काळाचा प्रत्येक क्षण वेगाने पुढे जात असताना, मी माझ्या नरदेहाचे सार्थक करण्यासाठी दिवसातील काही वेळ नित्यनेमाने नामस्मरणाला देतो का?
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “महिला लेखन”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
युवा लेखिका की पहली पहली किताब के विमोचन पर जाना हुआ। सबने न केवल लेखिका बल्कि उनके परिवार और खासतौर पर पति की जमकर तारीफ की। एक सफल कवयित्री के पीछे पति का जिक्र बार बार होता रहा। सभागार तालियों से गूंजता रहा।
समारोह के बाद घर पहुंचते ही पतिदेव ने कहा- देखो। बहुत हो गया यह साहित्य वाहित्य। बस। तुम्हारा शौक पूरा करवा दिया। अब बच्चों को देखो। पढ़ाओ लिखाओ इन्हें और एक औरत की तरह घर संभालो। समझी?
नयी नवेली किताब एक तरफ पड़ी मानो मुंह चिढ़ा रही थी।