हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९० ☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९० ☆

☆ पुरुषोत्तम मास : आत्मशुद्धि, प्रकृति-साधना और पुण्य का पावन काल ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

भारतीय संस्कृति में पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है, आध्यात्मिक साधना, आत्ममंथन और पुण्य संचय का विशेष अवसर माना गया है। यह अतिरिक्त मास चंद्र और सौर गणना के संतुलन के लिए जोड़ा जाता है तथा भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण “पुरुषोत्तम मास” कहलाता है। धर्मग्रंथों में इस माह को जप, तप, दान, सत्संग और सेवा के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।

भारतीय परंपरा में धर्म केवल मंदिरों और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रकृति की रक्षा को भी पुण्यकर्म माना गया है। पंचतत्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से निर्मित इस सृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना भी आध्यात्मिक साधना का ही एक रूप है। इसलिए पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि के साथ-साथ प्रकृति-संरक्षण का भी संदेश देता है।

इस पावन अवधि में वृक्षारोपण, पौधों की सेवा, पक्षियों के लिए जल-पात्र रखना, जलस्रोतों की स्वच्छता, नदी-तालाबों के संरक्षण का संकल्प लेना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता फैलाना भी श्रेष्ठ सेवा मानी जा सकती है। जब हम एक पौधे को रोपते हैं या किसी जलस्रोत को स्वच्छ रखने का प्रयास करते हैं, तब वह केवल पर्यावरणीय कार्य नहीं होता, बल्कि सृष्टि के प्रति हमारी श्रद्धा का भी परिचायक बनता है।

आज जब प्रकृति अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है, तब पुरुषोत्तम मास हमें यह स्मरण कराता है कि ईश्वर की आराधना और प्रकृति की सेवा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सच्ची भक्ति वही है जो मानव, जीव-जंतु और प्रकृति—सभी के कल्याण का भाव अपने भीतर समेटे। यही भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है और यही पुरुषोत्तम मास की वास्तविक सार्थकता भी।

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©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक की पुस्तक चर्चा # २०८ ☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” – लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  जी के आभारी हैं जो  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं।

आज प्रस्तुत है श्री सुरेश पटवा जी द्वारा लिखित  व्यंग्य पच्चीसीपर चर्चा।

(१४ जून को लोकार्पित)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा#  २०८ ☆

☆ “व्यंग्य पच्चीसी…” लेखक : श्री सुरेश पटवा ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

पुस्तक : व्यंग्य पच्चीसी

लेखक:सुरेश पटवा

चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल

 मुखौटे उतारती एक बेबाक कृति – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

व्यंग्य केवल हास्य उत्पन्न करने का माध्यम नहीं, बल्कि व्यवस्था और समाज के भीतर झाँकने की एक पैनी दृष्टि है।

मैं प्रायः कहता रहा हूं कि व्यंग्यकार को गन्ने का शुगर फ्री रस निकाल कर प्रस्तुत करना आना चाहिए । वह खुद समाज से भिन्न नहीं होता । उसे समाज में रहते हुए उसकी मरम्मत का जिम्मा उठाना पड़ता है। मां की भांति दुलारते पुचकारते हुए समाज सुधार करना व्यंग्य का नैतिक कार्य है।

“व्यंग्य  स्वतंत्र विधा से पहले, एक ‘स्पिरिट’ है जो कहीं भी समाहित हो सकती है।

इन तथ्यों के साथ ” सुरेश पटवा की कृति ‘व्यंग्य पच्चीसी’ का मूल्यांकन करना  प्रासंगिक हो जाता है। पटवा एक बहुविध रचनाकार हैं, जिनकी भाषा में सहजता, शैली में चुटीलापन और दृष्टि में जन-सरोकारों की स्पष्टता है।

 एक सजग लेखक का सामाजिक आईना

‘व्यंग्य पच्चीसी’ अपने शीर्षक के अनुरूप पच्चीस विविध व्यंग्य रचनाओं का संग्रह है। यह पुस्तक न केवल पाठक का मनोरंजन करती है, बल्कि उसे आत्ममंथन के लिए बाध्य भी करती है। लेखक का व्यंग्य उपहास नहीं, बल्कि यथार्थ का ‘अनावरण’ है। वे व्यक्ति पर प्रहार करने के बजाय समाज में व्याप्त कुत्सित प्रवृत्तियों, सत्ता के छल-प्रपंच, बौद्धिक पाखंड, और बाजारवाद की विडंबनाओं को बेनकाब करते हैं।

पटवा जी की लेखन प्रक्रिया स्वयं में एक प्रयोग है। वे जिस कृति पर काम करते हैं, उसके प्रतिदिन के लेखन को सार्वजनिक कर बौद्धिक पाठकों के साथ  सतत संवाद स्थापित करते हैं। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और चुटीली है। इस संग्रह की प्रमुख शिल्पगत विशेषता , बुंदेली के स्थानीय प्रयोग, सटीक मुहावरे और ‘आइटम संत’ जैसे स्वनिर्मित शब्दों का  जीवंत प्रयोग है।

 व्यंग्य लेखों में शिल्पगत विविधता है ।।व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्ति का प्रभावपूर्ण उपयोग, रूपकों एवं फैंटेसी के माध्यम से व्यंग्य को धारदार बनाया गया है।

 अभिव्यक्ति में कटाक्ष और शिष्टता का संतुलन है। तीखे प्रहारों के बावजूद भाषा मर्यादित है। व्यक्तिगत आक्षेप या किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध फूहड़ता नहीं है, जो लेखक की परिपक्वता को दर्शाता है। वैचारिक धरातल पर

यह संग्रह समकालीन जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करता है। ‘मोबाइल व्यथा कथा’ और ‘फ़ेस्बुकिया करनी-भरनी’ आज के डिजिटल दौर की विसंगतियों पर  कटाक्ष हैं।

‘प्रखर साहित्यजीवी’ और ‘व्यंग्य लेखन की परेशानी’ जैसे व्यंग्य लेखों में पुरस्कार-लोलुपता और साहित्यिक परिवेश की विडंबनाओं का यथार्थ चित्रण है।

प्रशासनिक विडंबनाएं उजागर करते व्यंग्य  ‘छिद्दी का बकरी लोन’, ‘भ्रष्टाचार का बुल्डोजर’ और ‘ओम बजटाय नमः’ आदि रचनाएँ सत्ता और दफ्तरों की नौकरशाही मानसिकता पर चोट करती हैं। ‘सभ्य जंगल की सैर’ आधुनिकता और प्रकृति-विमुखता के अंतर्विरोधों को बखूबी रेखांकित करती है।

 

‘व्यंग्य पच्चीसी’ पारंपरिक व्यंग्य-परंपरा का विस्तार है, जिसमें व्यंग्य के ट्रायपॉड परसाई , जोशी और त्यागी जैसे पुरोधाओं की वैचारिक परंपरा की गूँज तो है, किंतु शैली पूर्णतः मौलिक और समकालीन है।

यद्यपि कहीं-कहीं लेखक की विद्वत्ता व्यंग्य की संक्षिप्तता को  प्रभावित करती है, तथापि यह पुस्तक समकालीन व्यंग्य का एक  दस्तावेज़ है।

यह संग्रह सामान्य पाठक के लिए रोचक, चिंतनशील पाठक के लिए गंभीर और नए लेखकों के लिए व्यंग्य की समझ को लेकर एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में  सक्षम है। सुरेश जी की यह कृति सिद्ध करती है कि आज व्यंग्य विधा समाज की चेतना को झकझोरने का  सशक्त माध्यम है।

 

चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से पुरस्कार प्राप्त)

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८ – पुस्तक समीक्षा – लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन  ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है श्री सुमति कुमार जैन जी द्वारा संपादित पुस्तक – “लघु की विराटताकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४८

☆ पुस्तक समीक्षा ☆ लघु की विराटता – संपादक – सुमति कुमार जैन ☆ समीक्षक – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

पुस्तक- लघु की विराटता

संपादक-  सुमति कुमार जैन

प्रकाशक- दीपज्योति ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन, महावीर मार्ग, अलवर- 301001 (राज) मोबाइल नंबर 94148 93120

पृष्ठ संख्या- 444

मूल्य- 500

समीक्षक: ओमप्रकाश क्षत्रिय प्रकाश

☆ लघु की विराटता को दर्शाती पुस्तक ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

लघु में कथा समेटे हो वह लघुकथा होती है। इसमें निदान होता है। समस्या के समाधान से दूर रहती है। बस ! अपने में एक तीक्ष्णता और व्यंग्यता को समाए रखती है। प्रारंभ में इसे लघु कथा कहा जाता था। इस मायने में भारतेंदु हरिश्चंद्र को लघुकथा का जनक माना जाता है। इन्होंने इसी पैमाने पर खरी उतरने वाली लघुकथाएं लिखी थी।

इसके पश्चात कई रचनाकारों ने इसे पुष्पित व पल्लवित किया है। इसमें मुख्य रूप से प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, वजाहत, जगदीश कश्यप, विष्णु नागर, यशपाल, चंद्रभान शर्मा गुलेरी, राजेंद्र यादव, काशीनाथ सिंह, हरिशंकर परसाई, सतीशराज पुष्करणा सहित अनेक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने इसे विकसित व स्थापित किया है।

वहीं वर्तमान में अनेक रचनाकार इसे गति प्रदान कर रहे हैं। ये नवोदित रचनाकारों को प्रशिक्षित करते हुए अपने रचनाकर्म में भी लिप्त हैं। इनमें मधुदीप गुप्ता, योगराज प्रभाकर, रूप देवगुण, राजकुमार निजात, अनिल शूर आजाद, रामकुमार घोटड़, मधुकांत, अशोक भाटिया, अशोक जैन, बलराम, सतीश दुबे  सुभाष नीरव, रामेश्वर कांबोज हिमांशु, सुकेश साहनी, कमल चोपड़ा, माधव नागदा, संतोष सुपेकर, कांताराय, चंद्रेश कुमार छतलानी आदि अनेक नामों को प्रमुखता से लिया जा सकता है।

लघुकथा के विकास में पत्र-पत्रिकाओं के साथ विभिन्न प्रतियोगिताओं और संकलनों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रस्तुत समीक्ष्य लघुकथा संकलन- लघुकथा की विराटता, उसी परिप्रेक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा। इसका संपादन- जगमग दीप ज्योति, मासिक पत्रिका के संपादक सुमति कुमार जैन ने किया है। जो अनेक वर्षों से संपादनकर्म में संलग्न है।

प्रस्तुत संकलन में लघुकथा की विराटता को रचनाओं की गुणवत्ता में समेटने का प्रयास किया गया हैं। इसमें अनेक लघुकथाएं प्रतिष्ठित रचनाकारों की सम्मिलित की गई है। लघुकथा के चमकते नामों में से प्रमुख- कमल चोपड़ा, माधव नागदा, मधुकांत, पूरणसिंह,  प्रबोधकुमार गोविल, राजकुमार निजात, रामकुमार घोटड़, रामचरण यादव, रमेश मनोहरा, रामेश्वर कांबोज, रामरतन यादव, रूप देवगुण, शराफत अली खान, मुकेश साहनी, त्रिलोकसिंह ठकुरेला सहित अनेक लघुकथाकारों को इसमें सम्मिलित किया गया है।

इसके अलावा इस पुस्तक में कई नवोदितों को स्थान देकर प्रोत्साहित किया गया है। मगर, इसी के साथ ही संपादक ने रचनाधर्मिता को प्राथमिकता देने का प्रयास किया है। इस प्राथमिकता के आधार पर जनजीवन के संघर्ष, उसके यथार्थ स्वरूप और उत्थान-पतन पर प्रश्नचिन्ह लगाती कथाओं को प्राथमिकता के साथ सम्मिलित किया है।

चार सौ छिय्यासी पृष्ठों के इस विराट संकलन में कुल मिलाकर एक सौ दस रचनाकारों की लघुकथाएं संकलित की गई है। मुख्य पृष्ठ इसकी सांकेतिकता को प्रदर्शित करता है। साज-सज्जा व छपाई उत्तम है । पृष्ठ संख्या के हिसाब से मूल्य वाजिब है। साथ ही सभी लघुकथाएं पठनीय बन पड़ी है। इस संकलन का लघुकथा के क्षेत्र में हार्दिक स्वागत किया जाएगा। ऐसा समीक्षक का विश्वास है।

——–

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

24-09-2021

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९९ ☆ प्रेरक गीत – मानव जीवन व्यर्थ गया… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९९ ☆ 

☆ प्रेरक गीत – मानव जीवन व्यर्थ गया ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

जिसने अपने को समझ लिया,

उस पर ईश्वर की कृपा रही।

जो भूला-भटका है अब तक,

उसकी नैया तो डूब चली।

 *

जो योग, ध्यान भी ना करता,

वह कितना आज अभागा है।

मानव जीवन भी व्यर्थ गया,

उस पर माया का साया है।

 *

अगला जीवन भी नरक बना,

लाख योनियां आन खड़ी।

 *

जो मरा स्वाद के ही खातिर,

उसने जिह्वा को बेच दिया।

फिर रोग सताए जीवन भर,

औषधि ने उन्हें दबोच लिया।

 *

धन,रुपया काम नहीं आया,

यह चक्र भी कहता खरी-खरी।

 *

मोबाइल टीवी देख-देख

भोजन अनदेखाकर खाते।

समय व्यर्थ हो जाता यों हीं,

बच्चे घर में उत्पात मचाते।

 *

युवक युवतियां बच्चों की भी,

आशा हो रही मरी-मरी।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४८ ☆ अंदेशा बाढ़ का ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “इंतज़ार” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४८ ☆

अंदेशा बाढ़ का ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

जेठ सी दोपहरी

अंदेशा बाढ़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

 

छप्पर से छानी तक

एक सुगबुगाहट

आँखों में तैर रही

कोई अकुलाहट

इधर आँधियों से सब

पट गई धरा है

उधर नभ के आँगन में

बूँदों की आहट

 

टूट गया भ्रम सारा

बर्फ़ के पहाड़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

 

खेतों के प्राणों में

सोंधापन महके

वन-उपवन डाल-डाल

पत्ते-पत्ते चहके

नदी ताल पोखर घट

पनघट वंशीवट

सबके मन पावस के

रंगों से दहके

 

उग आया सपना फिर

बंजर में झाड़ का

शायद लौट आया है

मौसम असाढ़ का।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५५ ☆ रूह परिंदा तन में तड़पे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “रूह परिंदा तन में तड़पे“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५५ ☆

✍ रूह परिंदा तन में तड़पे… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

जब जब मुझको याद करोगे

तन्हाई में शाद करोगे

 *

 जंगल जैसे काट रहे हो

बंजर भी आबाद करोगे

 *

अपनी सरपंची की खातिर

दुनिया क्या बर्बाद करोगे

 *

मौत बरसती है अंबर से

क्या क्या तुम ईज़ाद करोगे

 *

जोर बिना कब हक़ मिलता अब

नाहक ही फ़रियाद करोगे

 *

रूह परिंदा तन में तड़पे

कब तक रब आज़ाद करोगे

 *

इश्क़ न कर जब अच्छी सेहत

क्या तबियत नाशाद करोगे

 *

दुनिया से बातें दुनिया की

खुद से कब संवाद करोगे

 *

मक़्ता दोस्त ग़ज़ल का आया

आखिर कब इरशाद करोगे

 *

रब्त अरुण शक़ करते बिगड़े

क्या तुम इसके बाद करोगे

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५९ – वजूद… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक रचना – वजूद।)

☆ हेमंत साहित्य # ५९ ☆

✍ वजूद… ☆ श्री हेमंत तारे  

हीना की मानिंद,  अपना वजूद खो जाने के बाद

तमाम उम्र सूरज की तपिश बर्दाश्त करने के बाद

ख़ला की जानिब चल पडती है  नामालूम शै कोई

वो रूह है, फौत होती नही दफन हो जाने के बाद

 *

बेमानी है अब रहम की बेइंतिहा बरसात जनाब

गो कि फ़रमाई है इनायत आपने पर मांगने के बाद

 *

उसका दिल टूटा,  ये हरगिज कोई गजब ही न था

खोला था दर आपने पर उसके चले जाने के बाद

 *

वो नाशुक्रा भी है  “हेमंत ” और तंग दिल इंसान भी

बहाता है अश्क बेशुमार पर जश्न ऐ बर्बादी के बाद

 

हीना = मेहंदी, शै = वस्तु, मानिंद = जैसा, रूह = आत्मा, वजूद = अस्तित्व, फौत = मृत्यू, ख़ला की जानिब = शून्य की तरफ, इनायत = कृपा

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆ कविता – मन की शुद्धि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय कविता – “मन की शुद्धि“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆

✍ कविता – मन की शुद्धि… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मन की शुद्धि  चाहो तो, अपने भीतर झाँको तुम,

दोष न खोजो औरों के, अपना ही मन आंकों तुम।

*

क्रोध, कपट, अभिमान, ईर्ष्या, मन के ही रोग हैं,

प्रेम, दया, संतोष, क्षमा ही मन के सच्चे योग हैं।

*

सत्संग की पियो सुधा, सत्य प्रेम का दीप जलाओ,

हरि-नाम की मधुर तान से अंतर्मन को महकाओ।

*

सेवा रत रह जो जीवन बीते, तो निर्मल होता  मन,

परहित में जो सुख को ढूंढ़े, पाता वही है सच्चा धन।

*

लोभ-मोह का जाल छोड़कर सत्य मार्ग अपनाना है,

हर प्राणी में प्रभु को देखो, मन को यही समझाना है।

*

प्रति दिन थोड़ी देर बैठकर, अपने कर्म निहारो तुम,

क्या खोया, क्या पाया जग में, इसको भी विचारो तुम।

*

जब मन निर्मल, भाव पवित्र, तब ईश्वर का वास मिले,

अंतर के इस पावन मंदिर में आनंद का  प्रकाश मिले।

*

मन की शुद्धि कोई कठिन नहीं, बस इतना उपाय करो,

प्रेम, दया और हरि सुमिरन से जीवन को साकार करो।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – थाली और भूख।)

☆ लघुकथा # ११७ – थाली और भूख श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शहर के एक आलीशान विवाह समारोह में स्वादिष्ट व्यंजनों की लंबी कतार लगी थी। लोग प्लेटों में जरूरत से ज्यादा खाना भर रहे थे। कोई आधा खाकर छोड़ देता, तो कोई बिना छुए ही डस्टबिन में डाल देता।

भीड़ के बीच खड़े एक शिक्षक यह सब चुपचाप देख रहे थे। तभी उनकी नजर डस्टबिन के पास खड़े एक दुबले-पतले बालक पर पड़ी, जो बची हुई रोटियों को बड़ी उम्मीद से देख रहा था।

शिक्षक उसे अपने पास ले आए और भोजन की थाली देकर बोले,

“लो बेटा, पेट भरकर खाना।”

बालक ऐसे खाने लगा, मानो कई दिनों से भूखा हो। थोड़ी देर बाद उसने दो रोटियाँ चुपचाप अपनी थैली में रख लीं।

शिक्षक ने मुस्कराकर पूछा,

“और भूख लगेगी क्या?”

बालक की आँखें झुक गईं—

“नहीं मास्टर जी… ये मेरी छोटी बहन के लिए हैं। वो घर पर भूखी है। हमारे घर में तो दो जून की रोटी भी हर दिन नहीं बनती…”

बालक की बात सुनकर शिक्षक की आँखें नम हो गईं। उन्होंने सामने देखा—कुछ लोग नई प्लेट लेने जा रहे थे, जबकि पुरानी प्लेटों में भरा खाना डस्टबिन में पड़ा था।

शिक्षक ने गहरी साँस लेते हुए कहा—

“अजीब पढ़ाई है इस समाज की… डिग्रियाँ बढ़ती जा रही हैं, पर इंसानियत हर साल फेल हो रही है।”

“यहाँ लोग स्टेटस दिखाने के लिए खाना छोड़ देते हैं, और कोई भूख छिपाने के लिए आँसू पी जाता है।”

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१८ ☆ घर… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१८ ?

☆ घर ☆  प्रभा सोनवणे ☆

घरातली सगळीच घड्याळे

बंद पडली,

त्यांची टिकटिक ऐकू येत नाही!

 

बाहेर वाहनांची वर्दळ!

सवयीचे आवाज, हाॅर्नस्…

रिक्षा,बस, अँब्युलन्स…!!

सणावारी डी.जे.चं ध्वनिप्रदूषण!

 

आतल्या जगापेक्षा खूप वेगळं

बाहेरचं जग !

बाहेरच्या कोलाहलाने

काहीच बिघडत नाही,

आतल्या शांततेचं!

किती मूकं झालंय घर…

तुझ्या नसण्याने!

तू असताना—-

घड्याळे कधीच बंद

पडायची नाहीत,

इतका वेळ!

सदा टिकटिकत राहायची!

जिवंत असल्यासारखी!!!

 

कालचक्र थाबलंय जणू,

माझ्यापुरतं!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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