हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 9 – हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

 

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें.  आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अगला आलेख  “हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ”.)

☆ गांधी चर्चा # 9 – हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ☆ 

श्री रामचंद्रन ने गांधीजी से सरल भाव से पूंछा :  “ क्या आप तमाम यंत्रों के खिलाफ हैं?

गांधीजी ने मुस्कराते हुए कहा : ‘ वैसा मैं कैसे कह सकता हूँ, जब मैं जानता हूँ कि यह शरीर भी एक बहुत नाजुक यंत्र ही है? खुद चरखा भी एक यंत्र ही है, छोटी दांत-कुरेदनी  भी यंत्र है। मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है, बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है, उसके लिए है। आज तो जिन्हें मेहनत बचाने वाले यंत्र कहते हैं, उनके पीछे लोग पागल हो गए हैं। उनसे मेहनत जरूर बचती है, लेकिन लाखों लोग बेकार होकर भूखों मरते हुए रास्तों पर भटकते हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूँ, पर वह किसी ख़ास वर्ग की नहीं बल्कि सारी मानव जाति की होनी चाहिए। कुछ गिने गिनाये लोगों के पास सम्पत्ति जमा हो ऐसा नहीं, बल्कि सबके पास जमा हो ऐसा मैं चाहता हूँ। आज तो करोडो की गर्दन पर कुछ लोगों के सवार हो जाने में यंत्र मददगार हो रहे हैं। यंत्रो के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण हैं वह श्रम की बचत नहीं है, बल्कि धन का लोभ है। आज की इस चालू अर्थ-व्यवस्था के खिलाफ मैं अपनी तमाम ताकत लगाकर युद्ध चला रहा हूँ।

श्री रामचंद्रन ने आतुरता से पूंछा : ‘तब तो बापूजी, आपका झगड़ा यंत्रों के खिलाफ नहीं, बल्कि आज यंत्रों का जो बुरा उपयोग हो रहा है उसके खिलाफ है?’

गांधीजी ने कहा : ‘ज़रा भी आनाकानी किये बिना मैं कहता हूँ कि ‘हाँ’। लेकिन मैं इतना जोड़ना चाहता हूँ कि सबसे पहले यंत्रों की खोज और विज्ञान लोभ के साधन नहीं रहने चाहिए। फिर मजदूरों से उनकी ताकत से ज्यादा काम नहीं लिया जायेगा, और यंत्र रुकावट बनने के बजाय मददगार हो जायेंगे। मेरा उद्देश्य तमाम यंत्रों का नाश करने का नहीं है, बल्कि उनकी हद बाँधने का है।

श्री रामचंद्रन ने कहा: ‘इस दलील को आगे बढ़ाएं तो उसका मतलब यह होता है कि भौतिक शक्ति से चलने वाले और भारी पेचीदा तमाम यंत्रों का त्याग करना चाहिए।‘

गांधीजी ने मंजूर करते हुए कहा: ‘त्याग करना भी पड़े। लेकिन एक बात मैं साफ़ करना चाहूँगा। हम जो कुछ करें उसमे मुख्य विचार इंसान के भले का होना चाहिए। ऐसे यंत्र नहीं होने चाहिए, जो काम न रहने के कारण आदमी के अंगों को जड़ और बेकार बना दें। इसलिए यंत्रों को मुझे परखना होगा। जैसे सिंगर की सीने की मशीन का मैं स्वागत करूँगा। आज की सब खोजों में जो बहुत काम की थोड़ी चीजें हैं, उनमे से एक यह सीने की मशीन है। उसकी खोज के पीछे अद्भुत इतिहास है। सिंगर ने अपनी पत्नी को सीने और बखिया लगाने का उकतानेवाला काम करते देखा। पत्नी के प्रति रहे उसके प्रेम ने गैर-जरूरी मेहनत से उसे बचाने के लिए सिंगर को ऐसी मशीन बनाने की प्रेरणा दी। ऐसी खोज करके उसने ना सिर्फ अपनी पत्नी का श्रम बचाया, बल्कि जो भी ऐसी सीने की मशीन खरीद सकते हैं, उन सबको हाथ से सीने के उबानेवाले श्रम से छुड़ाया है।‘

श्री रामचंद्रन ने कहा: ‘लेकिन सिंगर की सीने की मशीनें बनाने के लिए तो बड़ा कारखाना चाहिए और उसमे भौतिक शक्ति से चलने वाले यंत्रों का उपयोग करना पडेगा।‘

गांधीजी ने मुस्कराते हुए कहा : ‘हाँ, लेकिन मैं इतना कहने की हद तक समाजवादी तो हूँ ही कि ऐसे कारखानों का मालिक राष्ट्र हो या जनता की सरकार की ओर से ऐसे कारखाने चलाये जाएँ। उनकी हस्ती नफे के लिए नहीं, बल्कि लोगों के भले के लिए हो। लोभ की जगह प्रेम को कायम करने का उसका उद्देश्य हो। मैं तो चाहता हूँ कि मजदूरों की हालत में कुछ सुधार हो। धन के पीछे आज जो पागल दौड़ चल रही है वह रुकनी चाहिए। मजदूरों को सिर्फ अच्छी रोजी मिले, इतना ही बस नहीं है। उनसे हो सके ऐसा काम उन्हें रोज मिलना चाहिए। ऐसी हालत में यंत्र जितना सरकार को या उसके मालिक को लाभ पहुंचाएगा, उतना ही लाभ उसके चलाने वाले मजदूर को पहुंचाएगा। मेरी कल्पना में यंत्रों के बारे में जो कुछ अपवाद हैं,उनमे से एक यह है। सिंगर मशीन के पीछे प्रेम था,इसलिए मानव-सुख का विचार मुख्य था। उस यंत्र का उद्देश्य है कि मानव श्रम की बचत। उसका इस्तेमाल करने के पीछे मकसद धन के लोभ का नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रामाणिक रीति से दया का होना चाहिए। मसलन, टेढ़े तकुवे को सीधा बनाने वाले यंत्र का मैं बहुत स्वागत करूंगा। लेकिन लोहारों का तकुवे बनाने का काम ही ख़तम हो जाय, यह मेरा उद्देश्य नहीं हो सकता। जब तकुवा टेढा हो जाय तब हरेक कातने वाले के पास तकुवा सीधा कर लेने के लिए यंत्र हो, इतना ही मैं चाहता हूँ। इसलिए  लोभ की जगह हम प्रेम को दें। तब फिर सब अच्छा ही अच्छा होगा।‘

महादेव हरी भाई देसाई इस चर्चा के समापन में लिखते हैं कि : ‘ मुझे नहीं लगता कि ऊपर के संवाद में गांधीजी ने जो कहा है, उसके बारे में इन आलोचनाओं में से किसी का सिद्धांत के दृष्टी में विरोध हो। देह की तरह यंत्र भी, अगर वह आत्मा के विकास में मदद करता हो तो, और जितनी हद तक मदद करता हो उतनी हद तक ही उपयोगी है।‘

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सच्चा फैसला ☆ – श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

 

( आज प्रस्तुत है  श्रीमती छाया सक्सेना जी का एक विचारणीय  व्यंग्यात्मक किन्तु सत्य के धरातल पर रचित विचारणीय आलेख “सच्चा फैसला”. हम भविष्य में भी उनकी चुनिंदा रचनाएँ अपने पाठकों से साझा करते रहेंगे.)

☆ सच्चा फैसला☆

जब भी सम्मान पत्र बँटते हैं, उथल -पुथल, गुट बाजी,  किसी भी संस्था का दो खेमों में बँट जाना स्वाभाविक होता है ।  कई घोषणाएँ सबको विचलित करने हेतु ही की जाती हैं  जिससे जो जाना चाहे चला जाए क्योंकि ये दुनिया तो  कर्मशील व्यक्तियों से भरी है ऐसा कहते हुए संस्था के एक प्रतिनिधि  उदास होते हुए माथे पर हाथ रखकर बैठ गए।

इस समूह में कुछ विशिष्ट जनों पर ही टिप्पणी दी जाती है, वही लोग आगे- आगे  बढ़कर  सहयोग करते दिखते हैं या नाटक करते हैं पता नहीं ।

क्या मेरा यह अवलोकन ग़लत है …?  मुस्कुराते हुए एक सामान्य सदस्य ने पूछा ।

वर्षो से संस्था के शुभचिन्तक रहे विशिष्ट सदस्य ने गंभीर मुद्रा अपनाते हुए, आँखों का चश्मा ठीक करते हुए कहा बहुत ही अच्छा प्रश्न है ।

सामान्य से विशिष्ट बनने हेतु सभी कार्यों में तन मन धन से सहभागी बनें, सबकी सराहना करें, उन्हें सकारात्मक वचनों से प्रोत्साहित  करें, ऐसा करते ही सभी उत्तर मिल जाएंगे ।

सामान्य सदस्य ने कहा मेरा कोई प्रश्न ही नहीं, आप जानते हैं, मैं तो ….

अपना काम और जिम्मेदारी पूरी तरह से निभाता हूँ । आगे जो समीक्षा कर रहा है कामों की वो जाने।

एक अन्य  विशिष्ट  सदस्य  ने कहा आप भी  कहाँ की  बात ले बैठे  ये तो सब खेल है कभी भाग्य, कभी कर्म का, बधाई पुरस्कृत होने के लिये आपका भी तो नाम है ।

आप हमेशा ही सार्थक कार्य करते हैं, आपके कार्यों का सदैव मैं प्रशंसक हूँ ।

तभी एक अन्य सदस्य  खास बनने की कोशिश करते हुए कहने लगा,  कुछ लोगों को गलतफहमी है मेरे बारे में, शायद पसंद नहीं करते ……मुँह बिचकाते हुए बोले,  मैं तो उनकी सोच बदलने में असमर्थ हूँ और समय भी नहीं  ये सब सोचने का….।

पर कभी कभी लगता है  चलिए  कोई बात नहीं ।

जहाँ लोग नहीं चाहते मैं रहूँ सक्रियता कम कर देता हूँ । जोश उमंग कम हुआ बस..।

सचिव महोदय जो बड़ी देर से सबकी बात सुन रहे थे  कहने लगे #इंसान की कर्तव्यनिष्ठा उसके कर्म सबको आकर्षित करते हैं। समयानुसार  सोच परिवर्तित  हो जाती है।

मुझे ही देखिये  कितने लोग पसंद करते हैं.. …. हहहहहह ।

अब भला संस्था के दार्शनिक महोदय भी  कब तक चुप रहते  कह उठे #जो_व्यक्ति_स्वयं_को_पसंद_करता_है उसे ही सब पसंद करते हैं ।

सामान्य सदस्य जिसने शुरुआत की थी बात काटते हुए कहने लगा शायद यहाँ वैचारिक भिन्नता हो ।

जब सब सराहते हैं  तो किये गए कार्य की समीक्षा और सही मूल्यांकन होता है तब खुद के लिये भी अक्सर पाजिटिव राय बनती है और बेहतर करने की कोशिश भी ।

दार्शनिक महोदय ने कहा दूसरे के अनुसार चलने से हमेशा दुःखी रहेंगे अतः जो उचित हो उसी अनुसार चलना चाहिए जिससे कोई खुश रहे न रहे कम से कम हम स्वयं तो खुश होंगे।

#सत्य_वचन, आज से आप हम सबके गुरुदेव हैं, सामान्य सदस्य ने कहा  ।

सभी ने #हाँ_में_हाँ मिलाते हुए फीकी  सी मुस्कान  बिखेर दी और अपने-अपने गंतव्य की ओर चल  दिए ।

 

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘ प्रभु 

जबलपुर (म.प्र.)
मो.- 7024285788

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 27 – भैंस उसी की……. ☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  एक  विचारोत्तेजक कविता   “भैंस उसी की…….। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 27☆

☆ भैंस उसी की……. ☆  

 

भैंस उसी की,जिसकी लाठी

खूब  चल  रही  बांटा – बांटी।

 

चोर पुलिस का खेल चल रहा

धनिया पुनिया हाथ मल रहा

बिचौलियों की बन आई है

धंधा इनका खूब फल रहा,

जीवन भर कुछ लुच्चों ने

बेशर्मी से है फसलें काटी।

भैंस उसीकी,….

 

इधर – उधर से,  देते  झांसे

आम आदमी को सब फांसे

इक – दूजे से भिड़ा रहे हैं

इन्हें नहीं दिखती है लाशें,

वोटों औ’ नोटों के  मद में

भूले शुष्क जड़ों की माटी।

भैंस उसी की….

 

आज इधर कल उधर हो लिए

स्वांग  अनेक  धरे  बहुरूपिए

पैसे,पद,कुर्सी की खातिर

बन  बैठे  निर्मम  बहेलिए,

कैसे करें भरोसा इन पर

ये  हैं  कोरे  गल्प गपाटी।

भैंस उसी की….

 

लेपटॉप फोकट में देंगे

किंतु वोट बदले में लेंगे

ऋण माफी कंबल दारू में

खुशी-खुशी हम सभी बिकेंगे,

स्वाभिमान निज भूल गए हैं

भूल गए वह हल्दीघाटी।

भैंस उसी की…..

 

वंश वाद के  ढंग  निराले

तन उजले मन से हैं काले

अजब  पहेली  कैसे  बूझें

ये सब तो मकड़ी के जाले

नर-वानर में होड़ मची है,

लगा रहे हैं सभी गुलाटी।

भैंस उसी की जिसकी लाठी।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 989326601

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 5 ☆ लघुकथा ☆ टूटते मकान ☆ – श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है  एक लघुकथा   “टूटते मकान ”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य  # 5 ☆

☆ लघुकथा – टूटते मकान   ☆

अभी-अभी नजूल की जमीन सरकार  ने खाली करवानी शुरू की. यह तो अच्छा हुआ कि पहले नोटिस और समय देकर फिर मकान तोड़े जा रहे थे.

पहाड़ी पर बने मकानों को पूरी तरह से पहाड़ ही रहना है सुन्दरता को बरकरार रखने हेतु यह कार्य किया जा रहा था.

बहुत समय पहले हमारा मकान बनाने आये कुछ मजदूरों में एक सुखिया भी आई थी. सुन्दर, धीमी आवाज, उसका मधुर स्वभाव और काम जी तोड़कर करना. ईमानदारी भी कूट कूटकर भरी थी.उसका यह स्वभाव हम सभी को बहुत पसंद आया था. मकान तैयार होने पर  काम खतम हुआ तो उसने घर पर काम करने की इच्छा जाहिर की. हमने उसे रख लिया. वह बहुत खुश होकर काम करती. पति ईंट गारा का काम और सुखिया घर-घर जाकर बर्तन पोंछा करती थी.

आज अभी-अभी दोनों पति-पत्नी हमारे घर आये और बड़े दुखी स्वर में बताने लगे “बाई जी बड़ी मेहनत मजदूरी से घर का सामान बनाया है. बोल्डर चलवा रहे हैं. हम कहाँ जायें बाईजी गाँव छोड़कर काम की तलाश में इहाँ आ गये. फ्रिज, कूलर, अलमारी पेट काट, काटकर बनाये हैं. हम सभी को उन पर दया आई. पहमने उनसे कहा. हमारे एक कमरे में अपना सभी सामान रख लो. जब तक सरकार तुम्हारा पूरी तरह रहने-खाने का इन्तजाम नहीं कर देती तुम यहीं रहो और काम करते रहो. जब तुम्हारा घर बन जाये तब कमरा खाली कर देना. इतना सुनते ही उन दोनों की आँखे भर आईं थी. वे हमें पल भर के लिए इतनी पवित्र लगी कि जैसे यह हमारे किये अच्छे काम का फल था या भ्रम…. उस समय इतनी पवित्र, प्यार और अहसान मंद थी आँखे  कि हम सभी भावुक हो गये. मैने कमरे की चाबी दी सुखिया की आँखों से खुशियाँ झलकने लगी थी. इतमीनान था, शान्ति थी. शायद यह उसकी अच्छाई का नतीजा था.

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – नवम अध्याय (2) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

नवम अध्याय

( प्रभावसहित ज्ञान का विषय )

 

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्‌ ।

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्‌ ।।2।।

 

सब विद्याओं में प्रमुख,गुप्त,पवित्र महान

धर्म सुखद,अनुभूत सहज,करने में आसान।।2।।

 

भावार्थ :  यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनीयों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है।।2।।

 

This is the kingly science, the kingly secret, the supreme purifier, realisable by direct intuitional knowledge, according to righteousness, very easy to perform and imperishable.

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 22 ☆ वो नज़्म ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “वो नज़्म ”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 22 ☆

☆ वो नज़्म

किसी ने समझा कि मेरी नज़्म गुलाब थी

किसी ने समझा कि साज़ छेड़ती रबाब थी

 

किसी ने कहा उसकी धार बहुत ही पैनी थी

लोग समझ बैठे कातिलाना कोई तेज़ाब थी

 

किसी ने पढ़कर “वाह-वाह” तो की, पर कहा

वो एहसासों को अच्छे से छुपाती नकाब थी

 

कोई रात भर एक टक बांधे निहारता रहा

कि उसे ऐसा महसूस हुआ वो महताब थी

 

मेरे लब चुप रहे, किसी से कभी कह न सके

वो नज़्म तेरे ही लिए लिखी थी, बेहिसाब थी

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ किसान दिवस पर विशेष ☆ किसान ☆ – डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  आज प्रस्तुत है  किसान दिवस पर विशेष डॉ मुक्ता जी  की कविता  “kisaan” )    

☆ किसान दिवस पर विशेष  – किसान

 

किसान —अन्नदाता

कर्ज़ के बोझ तले दबा

दाने-दाने को मोहताज़

पत्नी व बच्चों को

भूख से बिलबिलाते देख

उसका कलेजा मुंह को आता

माता-पिता की

शून्य में ताकती आंखें

उसकी असहायता

विवशता को आंकती

और मौन रहकर

सब कुछ कह जातीं

 

वह अभागा

खून के आंसू पीता

और एक दिन आत्महत्या कर

अपनी जीवन लीला का अंत कर

असाध्य दु:खों से मुक्ति पा जाता

 

उसकी ब्याहता

इस बेदर्द जहान में अकेली

ज़िंदगी के थपेड़ों का

सामना करती

उसकी जीवन नैया

बीच भंवर डूबती-उतराती

हिचकोले खाती

बच्चों को भूख से बिलबिलाते

बूढ़े सास-ससुर को

दवा के अभाव में तड़पते देख

अपनी अस्मत का सौदा करती

‘बिकाऊ हूं

खरीद लो मुझे,क्या दोगे’

यह देख मन में

आक्रोश फूटता

 

कौन है दोषी

अपराधी ‘औ’ गुनाहग़ार

वह मासूम या हमारी सरकार के

तथाकथित स्वार्थी राजनेता

जो अपनी-अपनी रोटियां सेकते

बड़ी-बड़ी रेलियां करते

लोकसभा में मुद्दा उठाते

परंतु उनकी सुध नहीं लेते

 

और युगों-युगों से

यह सिलसिला चला आता

अमीर और अधिक अमीर

और गरीब कर्ज़ के

बोझ तले दबा जाता

यह अंतर भारत

और इंडिया में

स्पष्ट नज़र आता—–

यह फ़ासला निरंतर

बढ़ता चला जाता

जिसे देख

बावरा मन कुनमुनाता

परंतु कुछ भी करने में

स्वयं को असमर्थ पाता

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ‘मेरे’/’मैं ‘ उत्थान और पतन ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  –  ‘मेरे’/’मैं ‘ उत्थान और पतन  

बेहद गरीबी में जन्मा था वह। तरह-तरह के पैबंदों पर टिकी थी उसकी झोपड़ी। उसने कठोर परिश्रम आरम्भ किया। उसका समय बदलता चला गया। अपनी झोपड़ी से 100 गज की दूरी पर आलीशान बिल्डिंग खड़ी की उसने। अलबत्ता झोपड़ी भी ज्यों की त्यों बनाए रखी।

उसकी यात्रा अब चर्चा का विषय है। अनेक शहरों में उसे आईकॉन के तौर पर बुलाया जाता है। हर जगह वह बताता है, “कैसे मैंने परिश्रम किया, कैसे मैंने लक्ष्य को पाने के लिए अपना जीवन दिया, कैसे मेरी कठोर तपस्या रंग लाई, कैसे मैं यहाँ तक पहुँचा..!”

एक बड़े प्रकाशक ने उसकी आत्मकथा प्रकाशित की। झोपड़ी और बिल्डिंग दोनों के फोटो पुस्तक के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित किए। आत्मकथा का शीर्षक था, ‘मेरे उत्थान की कहानी।’

कुछ समय बीता। वह इलाका भूकम्प का शिकार हुआ। आलीशान बिल्डिंग ढह गई। आश्चर्य! झोपड़ी का बाल भी बांका नहीं हुआ। उसने फिर यात्रा शुरू की, फिर बिल्डिंग खड़ी हुई।

प्रकाशक ने आत्मकथा के नए संस्करण में झोपड़ी, पुरानी बिल्डिंग का मलबा और नई बिल्डिंग की फोटो रखीं। स्वीकृति के लिए पुस्तक उसके पास आई। झुकी नज़र से उसने नई बिल्डिंग के फोटो पर बड़ी-सी काट मारी। अब मुखपृष्ठ पर झोपड़ी और पुरानी बिल्डिंग का मलबा था। कलम उठा कर शीर्षक में थोड़ा-सा परिवर्तन किया। ‘मेरे उत्थान की कहानी’ के स्थान पर नया शीर्षक था ‘मेरे ‘मैं’ के पतन की कहानी।’

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(6.57 बजे, 23.12.2019)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 18 ☆ दार्शनिक क्रांतिकारी – संस्मरणात्मक कथा –  अमर शहीद भगत सिंह ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  अनुव्रता श्रीवास्तव चौधरी जी की प्रसिद्ध पुस्तक “दार्शनिक क्रांतिकारी – संस्मरणात्मक कथा –  अमर शहीद भगत सिंह का पुनर्स्मरण ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा.  यह पुस्तक आज  के  धार्मिक एवं सामाजिक परिपेक्ष्य में पढ़ी जानी अत्यंत आवश्यक है । साथ ही आज की युवा पीढ़ी को उनकी विचारधारा से अवगत कराने की महती आवश्यकता है। श्री विवेक जी  का ह्रदय से आभार जो वे प्रति सप्ताह एक उत्कृष्ट एवं प्रसिद्ध पुस्तक की चर्चा  कर हमें पढ़ने हेतु प्रेरित करते हैं। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 18☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – दार्शनिक क्रांतिकारी – संस्मरणात्मक कथा –  अमर शहीद भगत सिंह का पुनर्स्मरण 

 

पुस्तक –दार्शनिक क्रांतिकारी – संस्मरणात्मक कथा –  अमर शहीद भगत सिंह का पुनर्स्मरण

लेखिका – अनुव्रता श्रीवास्तव चौधरी
प्रकाशक – रवीना प्रकाशन दिल्ली
मूल्य –  300 रु

☆ दार्शनिक क्रांतिकारी – संस्मरणात्मक कथा –  अमर शहीद भगत सिंह का पुनर्स्मरण  – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव 

समय की मांग है कि देश भक्त शहीदो के योगदान से नई पीढ़ी को अवगत करवाने के पुरजोर प्रयास हों . भगतसिंह किताबों में कैद हैं. उनको किताबों से बाहर लाना जरूरी है . उनके विचारो की प्रासंगिकता का एक उदाहरण साम्प्रदायिकता के हल के संदर्भ में देखा जा सकता है . आजादी के बरसो बाद आज भी साम्प्रदायिकता देश की बड़ी समस्या बनी हुई है, जब तब हिन्दू मुस्लिम दंगे भड़क उठते हैं .
भगत सिंह के युवा दिनो में 1924 में बहुत ही अमानवीय ढंग से हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए थे , भगतसिंह ने  देखा कि दंगो में दो अलग अलग धर्मावलंबी परस्पर लोगो की हत्या किसी गलती पर नही वरन केवल इसलिये कर रहे थे , क्योकि वे परस्पर अलग धर्मो के थे, तो उनका युवा मन आक्रोशित हो उठा . स्वाभाविक  रूप से दोनो ही धर्मो के सिद्धांतो में हत्या को कुत्सित और धर्म विरुद्ध  बताया गया है . क्षुब्ध होकर व्यक्तिगत रूप से स्वयं भगत सिंह तो नास्तिकता की ओर बढ़ गये  उन्होने जो अवधारणा व्यक्त की , कि धर्म व्यैक्तिक विषय होना चाहिये, सामूहिक नही वह आज भी सर्वथा उपयुक्त है.
उनके अनुसार ” साम्प्रदायिक दंगों की जड़ खोजें तो  इसका कारण आर्थिक ही जान पड़ता है।  सभी दंगों का इलाज यदि कोई हो सकता है तो वह भारत की आर्थिक दशा में सुधार से ही हो सकता है . भूख और दुख से आतुर होकर मनुष्य सभी सिद्धान्त ताक पर रख देता है। सच है, मरता क्या न करता। कलकत्ते के दंगों में एक  अच्छी बात भी देखने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियन के मजदूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था हुए, वरन् सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े प्रेम से कारखानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्ग हित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्ग चेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है।”
भगत सिंह की विचारधारा और उनके सपनों पर  बात कर उनको बहस के केन्द्र में लाना युवा पीढ़ी को दिशा दर्शन के लिये वांछनीय है.  भगतसिंह ने कहा था कि देश में सामाजिक क्रांति के लिये किसान, मजदूर और नौजवानो में एकता होनी चाहिए. साम्राज्यवाद, धार्मिक-अंधविश्वास व साम्प्रदायिकता, जातीय उत्पीड़न, आतंकवाद, भारतीय शासक वर्ग के चरित्र, जनता की मुक्ति के लिए क्रान्ति की जरूरत, क्रान्तिकारी संघर्ष के तौर-तरीके और क्रान्तिकारी वर्गों की भूमिका के बारे में उन्होने न केवल मौलिक विचार दिये थे बल्कि अपने आचरण से उदाहरण बने . उनके चरित्र का अनुशीलन और विचारों को आत्मसात कर आज समाज को सही दिशा दी जा सकती है . उनके विचार शाश्वत हैं , आज भी प्रासंगिक हैं .
इस दृष्टि से वर्तमान स्थितियों में युवा लेखिका अनुव्रता श्रीवास्तव की यह किताब पठनीय व अनुकरणीय है जो संस्करणात्मक तरीके से भगत सिंह को समझने में मदद करती है . यदि कभी अखण्ड भारत का पुनर्निमाण हुआ तो  लाहौर बाघा बार्डर ही वह द्वार होगा जहां दोनो ओर के जन समुदाय एक दूसरे  को गले लगाने बढ़ आयेंगे , और तब लाहौर स्वयं सजीव हो बोल पड़े जैसा इस कथा में लेखिका ने उसके माध्यम से अभिव्यक्त किया है तो किंचित आश्चर्य नही , क्योंकि सच यही है कि राजनेता कितना ही बैर पाल लें पर बार्डर पार निर्बाध आती जाती हवा , स्वर लहरी और पक्षियो की बिना पासपोर्ट आवाजाही को कोई सेना नही रोक सकती .  भगत सिंग भारत पाकिस्तान दोनो ही मुल्कों के हीरो थे हैं और सदैव रहेंगे. किताब बार बार पठनीय व मनन करने योग्य है .
चर्चाकार .. विवेक रंजन श्रीवास्तव , जबलपुर

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #29 – बिन पंखाचा पारवा ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक  भावप्रवण कविता  “बिन पंखाचा पारवा”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 29☆

☆ बिन पंखाचा पारवा ☆

 

थेंब पावसाचा आला

पान जोजवते त्याला

दिला पाळण्या खालून

होता दुसऱ्या पानाला

 

खेळवती त्याला पाने

गाती सळसळ गाणे

पेंग येता डोळ्यावर

पाट टेके धरणीला

 

होता निजला रे थेंब

तिथं आला एक कोंब

हात काढून बाहेर

देई सावली मातीला

 

काम थेंबाचे संपले

माती आड ते लपले

त्याने भुरळ घातली

किती शेधते मी त्याला

 

गेला आकाशी उडून

पंख आणले कोठून

बिन पंखाचा पारवा

पुन्हा येईल भेटीला

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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