English Literature – Poetry – ☆ Introspection ☆ – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Poetry “ आत्ममंथन” published in today’s edition as  संजय दृष्टि  – आत्ममंथन  We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation.)

 

☆ Introspection  ☆

 

I meet myself

A new creation emerges,

Looking back today

Counted my creations

Then I felt

Though lived such a long life

But,

How seldom

Could I meet myself..!

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

 

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – # 28 ☆ हिल मिलकर चल ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी  एक शिक्षाप्रद बालकथा “हिल मिलकर चल” बच्चों के लिए ही नहीं बड़ों के लिए भी। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं – #28 ☆

☆ हिल मिलकर चल ☆

जीभ अपनी धुन में चली जा रही थी. तभी उस ने देखा कि वह ट्राफिक में फंस गई. चारों ओर मोटर कार ट्रक चल रहे है. वह बीच में है. निकलने का रास्ता नहीं है. वह घबरा कर दौड़ी. अचानक एक ट्रक उस के ऊपर से गुजर गया. उस का एक भाग कट गया.

वह जोर से चींखीं,‘‘ ऊंई मां, मरी. कोई बचाओ ?’’

‘‘क्या हुआ ? क्यों चींख रही हो ?’’ दांत ने डपट कर जीभ से कहा.

जीभ चौंकी. उस ने इधर उधर नजर दौड़ाई. वह अपने मुंह में सुरक्षित थी. पास का दांत उसे डपट रहा था.

‘‘तू कहां खो गई थी. तूझे मालुम नहीं पड़ता है. मेरे दांत को बदरंग कर दिया.’’

जीभ ने नजर उठा कर दाढ़ को देखा. वह सफेद से लाल हो चुकी थी. उस का रंग बदरंग हो गया था. तभी उसे अपने कोने पर दर्द हुआ. वहां नजर दौड़ाई. जीभ का एक भाग दांत से कट गया था.

‘‘देख कर काम नहीं करती हो.’’ दाढ़ ने कहा,‘‘ अंधी हो कर चल रही थी. समझ में नहीं आता है. आखिर हम कब तक बचाते. तुम हमारे बीच आ ही गई.’’

जीभ परेशान थी. उसे दर्द हो रहा था. दाढ़ का इस तरह बोलना उसे अच्छा नहीं लगा. वह चिढ़ पड़ी,‘‘अबे अकल के लट्ठ ! कब से मुझे परेशान कर रहा है. एक तो तूने ध्यान नहीं रखा. मुझे काट दिया. फिर जोरजोर से बोल कर मुझे डरा रहा है.’’

दांत को जीभ से इस तरह बोलने की आशा नहीं थी. वह मुलायम जीभ को मुलायम लहजे में बोलने की आशा कर रहा था. दांत स्वयं कठोर था. मगर, जीभ कठोर भाषा में बोलेगी, यह वह नहीं जानता था.

दांत चिढ़ गया,‘‘ अबे ओ लाल लंगूर. एक तो गलती करती हो और ऊपर से शेर बनती हो. जानती हो, तुम्हारा काम, मेरे बिना नहीं चल सकता है. इसलिए मुझ से संभल कर बातें कर करों. समझी ?’’

जीभ कब पीछे रहने वाली थी. उस का काम बातबात पर जोर ज़ोर से चलना था. कोई उसे उलटा सीधा बोले, उसे समझाएं, यह वह कैसे बर्दाश्त कर सकती थी,‘‘ अबे जा. किसी और को डराना. तेरे बिना भी मेरा काम चल सकता है.’’

दांत को भी गुस्सा आ गया,‘‘ क्या कहा. तेरा, मेरे बिना भी काम चल सकता है.’’ यह कहते हुए दांत जीभ की ओर लपका. दांत की सेना को अपने ऊपर आता देख कर जीभ तालू से चिपक गई.

जीभ जानती थी कि वह दांत के हमले से पहले ही घायल हो चुकी है. यदि वापस दांतों ने हमला कर दिया तो उस के टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे. मगर, वह जबान चलाने में पक्की थी. इसलिए उस ने कहा,‘‘अबे ओ. बेसूरे की तान. तेरा, मेरे बिना नहीं चलना काम.’’

‘‘देखते हैं किस का, किस के बिना काम नहीं चलता है ?’’ दाढ़ ने चुनौती दी.

जीभ कब पीछे रहने वाली थी,‘‘हां हां देख ले. कौन हारता है ?’’

जीभ ने अपना काम बंद कर दिया. दांत भूखा था. उसे प्यास लग रही थी. मगर, वह बर्दाश्त करता रहा. उस के ऊपर खाने की गंदगी लगी हुई थी. उसे समझ में नहीं आया कि उसे कैसे साफ करें.

दांत ने अपने आप को जोर से हिलाया. मगर, उस पर लगी गंदगी साफ नहीं हुई. जीभ ने स्वाद भेजना बंद कर दिया था. मुंह में पानी आना बंद हो गया.

दांत पर लगी मिर्ची से दांत जलने लगे.

जीभ पर मिर्ची लगी हुई थी. वह भी जलने लगी. उस ने मुंह में पानी लाने के लिए संदेश भेजा. मुंह में पानी आ गया. मगर, वह अंदर नहीं जा रहा था. दांत ने हिलना बंद कर दिया था. जीभ की जलन कम नहीं हुई.

जीभ ने चिल्लाने की कोशिश की. मगर दांत ने हिलना बंद कर दिया था. जीभ बोल नहीं पाई. बंद मुंह में जीभ हिलती रही मगर आवाज बाहर नहीं निकल रही थी.

दांत को भूख लगी. उस ने मुंह खोल लिया. रोटी मुंह में ली. चबाई. मगर, यह क्या ? रोटी जहां पड़ी थी, वही पड़ी रही. रोटी को पलटाने वाली जीभ चुपचाप पड़ी थी. दांत रोटी को नहीं खा पाया.

दाढ़ ने कटर दांत से कहा,‘‘ भाई, रोटी काटो.’’

कटर दांत रोटी काट चुका था,‘‘ इसे कोई उलटे पलटे तो मैं दूसरी जगह से रोटी काटूं,’’ उस ने असमर्थता जताई.

दाढ़ बोली, ‘‘तब तो मैं भी रोटी को पीस नहीं पाऊंगी.’’

जीभ को प्यास लग रही थी. उस ने पानी पीने के लिए संदेश भेजा. हाथ ने गिलास उठाया. मुंह तक लाया. मगर, दांत ने काम करने से मना कर दिया. मुंह नहीं खुला. जीभ पानी नहीं पी पाई.

जीभ समझ गई कि दांत के बिना उस का काम नहीं चल सकता है. दांत को अपने को साफ करना था. वह भी चाहता था कि पानी मुंह में आ जाए. मगर, वह जीभ को सबक सीखाना चाहता था. इसलिए कुछ नहीं बोला पाया.

एक दाढ़ बहुत बूढ़ी हो गई थी. वह गिर कर मरने वाली थी. उस ने मजबूत दाढ़ से कहा,‘‘ बेटा ! मुंह मैं रह कर जीभ से लड़ना अच्छी बात नहीं है.’’

यही बात उस ने जीभ से कही,‘‘ बेटी ! तुम्हारा काम दांत के बिना नहीं चल सकता है. दांत का काम तुम्हारे बिना नहीं चल सकता है. दोनों जब एक दूसरे की सहायता करोगे तब ही मुंह का काम चलेगा.

‘‘अन्यथा, न मुंह बोल पाएगा. न खा पाएगा. दांत भोजन को पीसेगे, मगर उसे पलटेगा कौन ? जीभ बोलेगी, मगर दांत के बिना उस का उच्चारण नहीं हो पाएगा . इसलिए बिना एकदूसरे की किसी का काम चलने वाला नहीं है.’’

जीभ यह बात समझ चुकी थी. दाढ़ को भी इस बात का पता चल गया था. दोनों का एकदूसरे के बिना काम चलने वाला नहीं है.

जीभ बोली, ‘‘हां दादा, गलती मेरी थी. मैं ध्यान से काम नहीं कर रही थी. इस कारण आप के बीच में आ गई. आपं ने अनजाने में मुझे काट लिया.’’

इस पर दांत ने कहा,‘‘ नहीं नहीं बहन, गलती तुम्हारी नहीं, हमारी है. हम ने अपने बहन की रक्षा नहीं की.’’

यह सुनते ही जीभ की आंखें भर आई. वह अपने दांतभाई के गले से लिपट कर रोने लगी,‘‘भाई, मुझे माफ कर देना. मैं इतनी सी बात समझ नहीं पाई कि हिलमिल कर रहने में ही भलाई है.’’

‘‘हां बहन, यह बात मैं भी भूल गया था,’’ कहते हुए दांत ने काम करना शुरू कर दिया.

जीभ भी चलने लगी.

दांत की सफाई हो गई. उस की प्यास बूझ गई. जीभ की जलन बंद हो गई.

जीभ और दांत दोनों चमक कर हंसने लगे.

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य – # 24 ☆ व्यंग्य – हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं. अब आप प्रत्येक गुरुवार को श्री विवेक जी के चुनिन्दा  रचनाओं को “विवेक साहित्य ”  शीर्षक के अंतर्गत पढ़ सकेंगे.  आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का व्यंग्य  “हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और ”.  इस व्यंग्य को पढ़कर कमेंट बॉक्स में बताइयेगा ज़रूर। श्री विवेक रंजन जी ऐसे बेहतरीन व्यंग्य के लिए निश्चित ही बधाई के पात्र हैं.  )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक के व्यंग्य – # 24 ☆ 

☆ हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और ☆

आज जब मैं अखबार पढ़ रहा था तो मुझे लगा कि जीव विज्ञान के शाश्वत सिद्धान्त के आधार पर बनी भाषा विज्ञान की यह कहावत कि हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और समय के साथ संशोधन योग्य है ! आजकल दाँत केवल खाने और दिखाने मात्र के ही नहीं होते ! हमारे राजनेताओ के विरोधियों को काटने वाले दाँत दिखते तो नहीं पर सदा सक्रिय रहते हैं ! इन नेताओं की बडे ओहदो पर सुप्रतिष्ठित प्रतिष्ठित अधिकारियों के खींसे निपोरकर चाटुकारिता करने वाले दाँत भी आपने जरूर देखे ही होंगे ! मुस्कराकर बडी से बडी बात टाल जाने वाले पालिश्ड दाँतों की आज बडी डिमाँड है ! विज्ञापन प्रिया के खिलखिलाते दाँत हर पत्र पत्रिका की शोभा होते हैं जिस में उलझकर आम उपभोक्ता पता नही क्या क्या खरीद डालता है ! हमारे नेता दिखाने के सिर्फ दो और खाने के बत्तीस पर जाने कितने ही दाँत अपने पेट मे संग्रह कर छिपाये घूम रहे हैं ! जिनकी खोज में विरोधी दल इनकम टैक्स डिपार्टमेंट सी बी आई वगैरह लगे ही रहते हैं ! बेचारे हाथी के तो दो दो दाँतों के व्यापार में ही वीरप्पन ने जंगलों मे अपनी जिंदगी गुजार दी सरकारें हिल गई वीरप्पन के दाँत खट्टे करने के प्रयासों में ! दाँत पीस पीस कर रह गईं पर उसे जिंदा पकड नही पाई !

माँ बताती थीं कि जिसके पुरे बत्तीस दाँत होते हैं उसका कहा सदा सच होता है मुझे आज किसी का कहा सच होते नहीं दिखता इससे मेरा अनुमान है कि भले ही लोगों के दिखने वाले दाँत बत्तीस ही हों पर कुछ न कुछ दांत वे अवश्य ही छिपाये रहते होंगे ! कुथ कहना कुछअलग सोचना और उस सबसे अलग कुछ और ही करना कुशल राजनीतिज्ञ की पहली पहचान है !

सांप का तो केवल एक ही दाँत विषग्रंथि लिये हुये होता है पर मुझे तो अपने प्रत्येक दाँत में एक नये ही तरह का जहर दीखता है ! आप की आप जाने !

चूहा अपने पैने दाँतों के लिये प्रसिद्ध है ! वह कुतरने के लिये निपुण माना जाता है ! पर थोडा सा अपने चारों तरफ नजर भर कर देखिये तो सही आप पायेंगे कि हर कोई व्यवस्था को कुतरने में ही लगा हुआ है ! बेचारी ग्रहणियां महीने के आखीर में कुतरी हुई चिंधियों को जोड कर ग्रहस्थी की गाडी चलाये जा रहीं हैं !

शाइनिंग टीथ के लिये विभिन्न तरह के टुथपेस्ट इस वैश्विक बाजार ने सुलभ करा दिये हैं ! माँ बाप बच्चों को सोने से पहले और जागने के साथ ही आर्कषक टुथ ब्रश पर तरोताजा रखने वाला तुथ पेस्ट लगाकर मुँह साफ करने की नैतिक एवं स्वास्थ्य शिक्षा देते हैं पर पीलापन बढ़ता ही जाता है ! नये नये डेंटल कालेज खुल रहे हैं जिनमें वैद्य अवैद्य तरीकों से एद्मीशन पाने को बच्चे लालायित हैं !

एक चीनी संत ने अपने आखिरी समय में शिष्यों को बुलाकर अपना मुँह दिखा कर पूछा कि क्यों जीभ बाकी है पर दाँत गिर गये हैं जबकि दाँत बाद में आये थे जीभ तो आजन्म थी और मृत्युपर्यंत रहती है ! शिष्य निरुत्तर रह गये ! तब संत ने शिक्षा दी कि दाँत अपनी कठोरता के चलते गिर जाते हैं पर जीभ मृदुता के कारण बनी रहती है ! मुझे लगता है कि यह शाश्वत शिक्षा जितनी प्रासंगिक तब थी आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है ! आइये अपने दाँतों का पैना पन कुछ कम करें और दंतदंश उतना ही करें जितना प्रेमी युगल परस्पर करता है !

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर .

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ सुजित साहित्य # 26 – झुळूक ☆ – श्री सुजित कदम

श्री सुजित कदम

 

(श्री सुजित कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजितजी की कलम का जादू ही तो है!  आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर कविता झुळूक )

☆ साप्ताहिक स्तंभ – सुजित साहित्य #26☆ 

 

☆  झुळूक ☆ 

 

नभ दाटूनीया येता

मज तूच आठवते

आठवणी स्मरताना

मन पुन्हा हेलावते. . . . !

 

शहारतो बोलताना

जातो कबुली देऊन

आहे प्रेम तुझ्यावर

शब्द जाती ओठातून. . . . !

 

ऐकताच बोल माझे

येतो पाऊस ही गाली

थेंब थेंब पावसाचे

गाती प्रेमाचीच गाणी. . . . !

 

झुळुकही गंधाळते

वाट पाहे उत्तराची

मौनांतून कळे सारे

वेळ होते परतीची. . . . !

 

असा चाले मनामध्ये

पाठ शिवणीचा  खेळ

तुझ्या माझ्या गं मेघांचा

कधी जमणार मेळ ?

 

© सुजित कदम, पुणे

7276282626

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – अष्टम अध्याय (24) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अष्टम अध्याय

(ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादि के विषय में अर्जुन के सात प्रश्न और उनका उत्तर )

( शुक्ल और कृष्ण मार्ग का विषय)

 

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌।

तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ।।24।।

 

अग्नि ज्योति दिन शुक्ल पक्ष उत्तरायण छःमास

ब्रम्ह ज्ञानियों के लिये थे अवसर है खास।।24।।

 

भावार्थ :  जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। ।।24।।

 

Fire, light, daytime, the bright fortnight, the six months of the northern path of the sun (northern solstice)-departing then (by these), men who know Brahman go to Brahman.।।24।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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रंगमंच स्मृतियाँ – ☆ डॉ श्रीराम लागू – विनम्र श्रद्धांजलि ☆

स्व डॉ श्रीराम लागू 

 ☆ सुप्रसिद्ध अभिनेता डॉ श्रीराम लागू नहीं रहे ☆ 

जन्म  – 16 नवम्बर 1927 ( सातारा )

निधन – 17 दिसंबर 2019 ( पुणे )

 

सुप्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता और रंगकर्मी श्रीराम लागू का 92 साल की उम्र में निधन हो गया. सातारा में जन्मे श्रीराम लागू पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे. उन्हें मराठी थिएटर के 20वीं सदी के सबसे बेहतरीन कलाकारों में गिना जाता है. उन्होंने 100 से अधिक हिंदी और मराठी फ़िल्मों में काम किया था तथा वे मराठी, हिंदी और गुजराती रंगमंच से भी जुड़े रहे. श्रीराम लागू ने 20 से अधिक मराठी नाटकों का निर्देशन भी किया.

पेशे से ENT  विशेषज्ञ डॉ श्रीराम लागू  जी ने 42 साल की उम्र में थिएटर और फ़िल्मों की दुनिया में कदम रखा और  1969 में वह पूरी तरह मराठी थिएटर से जुड़ गए.

‘नटसम्राट’ नाटक में उन्होंने गणपत बेलवलकर की भूमिका निभाई थी जिसे मराठी थिएटर के लिए मील का पत्थर माना जाता है.  नटसम्राट के इस रोल के बाद डॉक्टर लागू को भी दिल का दौरा पड़ा था.

कई पुरस्कारों से सम्मानित / अलंकृत  थे.  उन्हें घरौंदा के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता का अवॉर्ड मिला था. उन्होंने नटसम्राट, सिंहासन, सामना, पिंजरा जैस मराठी फिल्मों और चलते-चलते, मुक़दर का सिंकदर, सौतन और लवारिस जैसे कई हिंदी और मराठी फ़िल्मों में  काम किया. रिचर्ड एटनब्रा की फ़िल्म गांधी में गोपाल कृष्ण गोखले  की उनकी छोटी सी भूमिका को हमेशा याद रखा जायेगा।  उनकी आत्मकथा ‘लमाण’ प्रत्येक अभिनेता के लिए प्रेरणा स्त्रोत से कम नहीं है.

 

ई- अभिव्यक्ति की ओर से उन्हें सादर विनम्र श्रद्धांजलि

 

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 27 – मी ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी एक  पुरानी कविता  “सोनपरी .  सुश्री प्रभा जी  ने  की लेखनी में  वर्तमान ही नहीं अपितु बीते हुए दिनों के संस्मरणात्मक लेखन की अद्भुत क्षमता है।  उनकी कविता के एक एक शब्द और एक एक पंक्तियाँ  हमें स्वप्न सा अहसास दिलाती हैं।  ऐसा अनुभव होता है जैसे वे क्षण चलचित्र की भांति हमारे नेत्रों के समक्ष व्यतीत हो रहे हों।  वे पुराने दिन, वो गांव का घर, वो स्वप्निल वातावरण और ऐसे में स्वप्नों में सोनपरी का आगमन।  अद्भुत, अद्भुत कविता । मैं यह लिखना नहीं भूलता कि  सुश्री प्रभा जी की कवितायें इतनी हृदयस्पर्शी होती हैं कि- कलम उनकी सम्माननीय रचनाओं पर या तो लिखे बिना बढ़ नहीं पाती अथवा निःशब्द हो जाती हैं। सुश्री प्रभा जी की कलम को पुनः नमन।

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 28 ☆

☆ सोनपरी ☆ 

(एक जुनी कविता)

 

मी झोपेत असते की जागेपणी?

मनाच्या गुहेत दाटून येतात,

असंख्य आठवणी!

एक चिमुकलं गाव मला साद घालतं,

तेव्हा आठवणींचे कळप

बेलगाम धावू लागतात,

शेतातून, मळ्यातून, फळांच्या बागातून, चिरेबंदी वाड्यातून!

आठवत रहाते….बैठकीची खोली,

माजघर, स्वयंपाकघर….खोल्याच खोल्या…

शेणानं सारवलेली हिरवीगार जमीन,

माडीवर जाणारा लाकडी जीना,

दारंच दारं….खिडक्याच खिडक्या….

दारादारास अडविणारा उंबरठा!

वाड्याभोवती दाट झाडी,

पिंपर्णीच्या झाडाखाली..

आजोबांची काळी घोडी!

पक्षांची किलबिल, ओढ्याची खळखळ…

मुलं माणसं, लगबग, वर्दळ!

पेटलेल्या चुली, पाट्यावरचं वाटण,

रांजणातलं लोणी, साखरेच्या गोणी,

धान्यांची पोती, शेंगा चे ढीग,

सारेच होते शिगोशिग!

तेव्हाच तिथे शिरली मनात,

एक स्वप्नाळू सोनपरी,

गोष्ट फार जुनी नाही,

याच काही वर्षातली !

सोनपरी चा नाॅस्टेल्जिया छेडत रहातो,

तिच धून, तिच गाणी….

मी झोपेत असते की जागेपणी?

मनाच्या गुहेत दाटून येतात….

असंख्य आठवणी!

 

-प्रभा सोनवणे

© प्रभा सोनवणे

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – साहित्यकार ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  – साहित्यकार  ☆

(कविता संग्रह ‘योंही’ से)

नमन तुम्हें

भरत, विष्णु, कालिदास,

वंदन तुम्हें

रहीम, कबीर, सूरदास,

तुम्हारे अक्षय संग्रह से

पाती हमारी अनुभूति आकार,

तुम्हारी पहरनें ओढ़कर

हम कहलाते साहित्यकार।

हमारी चेतना अक्षय रहे।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 8 – हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

 

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें.  आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का अगला आलेख  “हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ”.)

☆ गांधी चर्चा # 8 – हिन्द स्वराज से (गांधी जी और मशीनें) ☆ 

 

मशीनों को लेकर गांधीजी के विचारों पर लोगों ने समय समय पर प्रतिक्रियाएं दीं। इसका संकलन महादेव हरी भाई देसाई ने हिन्द स्वराज के अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना में इस प्रकार लिखा है:

‘हिन्द स्वराज’ की प्रसंशाभरी समालोचना में सब लेखकों ने एक बात का जिक्र किया है : वह है गांधीजी का यंत्रों के बारे में विरोध। समालोचक इस विरोध को नामुनासिब और अकारण मानते हैं। मिडलटन मारी कहते हैं : ‘ गांधीजी अपने विचारों के जोश में भूल जाते हैं कि जो चरखा उन्हें बहुत प्यारा है, वह एक यंत्र ही है और कुदरत की नहीं, लेकिन इंसान की बनायी हुई एक अकुदरती- कृत्रिम चीज है। उनके उसूल के मुताबिक़ तो उसका भी नाश करना होगा।‘ डिलाइल बंर्स कहते हैं : ‘यह तो बुनियादी विचार-दोष है। उसमे छिपे रूप से यह बात सूचित की गयी है कि जिस किसी चीज का बुरा उपयोग हो सकता है, उसे हमें नैतिक दृष्टी से हीन मानना चाहिए। लेकिन चरखा भी तो एक यंत्र ही है। और नाक

पर लगाया गया चश्मा भी  आँख की मदद करने को लगाया गया यंत्र ही है। हल भी यंत्र है। और पानी खींचने के पुराने से पुराने यंत्र भी शायद मानव जीवन को सुधारने के मनुष्य की हज़ारों बरस की लगातार कोशिश के आख़िरी फल होंगे। किसी भी यंत्र का बुरा उपयोग होने की संभावना रहती है। लेकिन अगर ऐसा हो तो उसमे रही हुई नैतिक हीनता यंत्र की नहीं, लेकिन उसका उपयोग करने वाले मनुष्य की है।‘

इन आलोचनाओं का सन्दर्भ लेते हुए महादेव हरी भाई देसाई लिखते हैं कि मुझे इतना तो कबूल करना चाहिए कि गांधीजी ने  अपने विचारों के जोश में’ यंत्रो के बारे में अनगढ़ भाषा इस्तेमाल की है और आज अगर वे इस पुस्तक को फिर से सुधारने बैठे तो उस भाषा को खुद बदल देंगे।  क्योंकि मुझे यकीन है कि मैंने ऊपर समालोचकों के जो कथन दिए हैं उनको गांधीजी स्वीकार करेंगे; और जो नैतिक गुण यंत्र का इस्तेमाल करनेवाले रहें हैं, उन गुणों को उन्होंने यंत्र के गुण कभी नहीं माना। मिसाल के तौर पर १९२४  में उन्होंने जो भाषा इस्तेमाल की थी वह ऊपर दिए हुए दो कथनों की याद दिलाती है। इसी सन्दर्भ में उन्होंने आगे उसी साल दिल्ली में गांधीजी का रामचंद्रन के साथ जो संवाद हुआ उसका पूरा ब्योरा  अपनी इस प्रस्तावना में लिखा है।

स्वयं गांधीजी ने १९२१ में कहा कि ‘ मिलों के सम्बन्ध में मेरे विचारों में इतना परिवर्तन हुआ है कि हिन्दुस्तान की आज की हालत में मैनचेस्टर के कपडे के बजाय हिन्दुस्तान की मिलों को प्रोत्साहन देकर भी हम अपनी जरूरत का कपड़ा हमें अपने देश में ही पैदा कर लेना चाहिए । (गांधीजी के यह विचार हिन्द स्वराज के परिशिष्ट -1 में लिखे हैं)।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 26 – ये भगोड़े दिन……. ☆ डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  एक  विचारोत्तेजक कविता   “ये भगोड़े दिन…….। )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 25☆

☆ ये भगोड़े दिन……. ☆  

 

रोज आते

मुँह चिढ़ाते

चिहुंकते से

फिर, निकल जाते

भगौड़े दिन ।

 

की शिकायत

सूर्य पहरेदार से

विहंसकर उसने कहा

क्यों, झांकते हो द्वार से,

अजब बहुरूपिया

पकड़ पाना असंभव

शीत,वर्षा,घाम, सुख-दुख

रूप इस फनकार के।

मुखोटे अनगिन, पहिन

सब को झिंजोड़े दिन

चिहुंकते से ……….।

 

रोज छिप जाता

अंधेरी खोह में, और

प्रातः फिर निकल आता

किसी की टोह में,

कौन सी बेचैनियां

तिल-तिल जलाये

व्यथित मन,भटके दिवस भर

किस अबूझ,व्यामोह में।

उबाते मन, डुबाते से

ये निगोड़े दिन

चिहुंकते से………।

 

गुणनफल और जोड़

विस्मृत हो गए

भाग दे कर, घटाने से जो

बचा है शेष, सपने धो गए,

वक्त प्रहरी गिन रहा

सांसें निरंतर

मन-पटल पर, विरक्ति के

बीज, अपने बो गए।

आवरण खुशफहमियों के

व्यर्थ ओढ़े दिन

चिहुंकते से ,

फिर निकल जाते

भगोड़े दिन।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 989326601

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