आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (44) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

षष्ठम अध्याय

( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा )

 

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।

जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ।।44।।

 

सहज पूर्व अभ्यास वश खिचंता उसका ध्यान

 केवल शाब्दिक ज्ञान से,जिज्ञासा बलवान।।44।।

 

भावार्थ :  वह (यहाँ ‘वह’ शब्द से श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पुरुष समझना चाहिए।) श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है ।।44।।

 

By that very former practice he is borne on in spite of himself. Even he who merely wishes to know Yoga transcends the Brahmic word. ।।44।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 1 – हिन्द स्वराज से ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

 

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह  गाँधी विचार, दर्शन एवं हिन्द स्वराज विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि  पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें.  आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला का प्रथम आलेख  “हिन्द स्वराज से”.)

☆ गांधी चर्चा # 1  – हिन्द स्वराज से  ☆ 

यह वर्ष गांधीजी के 150वें जन्मोत्सव का वर्ष है। शासकीय और अशासकीय स्तरों पर अनेक कार्यक्रम हो रहे हैं और देश विदेश में लोग  अपनी अपनी तरह से महामानव का जन्मोत्सव मना रहे हैं, उन्हें याद कर रहे हैं, श्रद्धांजली दे रहें है, उनके विचारों पर अमल करने की प्रतिज्ञा ले रहे हैं। मेरे स्टेट बैंक के साथी श्री जय प्रकाश पांडे ने मेरा परिचय श्री हेमन्त बावनकर के रचनात्मक कार्य, उनके ‘साहित्यिक ब्लॉग  ई- अभिव्यक्ति’ से अभी सितम्बर माह में ही करवाया और गांधीजी पर एक लेख इस पत्रिका को देने का आग्रह किया। मुझे प्रसन्नता हुयी कि श्री बावनकर ने मेरे लेख ‘चंपारण सत्याग्रह : एक शिकायत की जाँच’ को ‘ई- अभिव्यक्ति’ के गांधी विशेषांक में स्थान दिया । कुछ ही दिनों बाद उनका प्रेम भरा  आग्रह था कि इस पूरे वर्ष  ‘साहित्यिक ब्लॉग  ई- अभिव्यक्ति’ में गांधी चर्चा का स्थायी कालम शुरू करने हेतु मैं कुछ लिख कर भेजूं। नेकी और पूंछ-पूंछ, मुझे उनका यह कहना तो मानना ही था अत: मैं वर्ष पर्यंत, हर बुधवार कुछ न कुछ गांधीजी पर लिखकर प्रकाशन हेतु भेजूंगा और यह सिलसिला 02 अक्टूबर 2020 तक सतत चलता रहेगा।

महात्मा गांधी का चिंतन उनके लिखे अनेक लेखों, संपादकीयों, पत्राचारों, पुस्तकों में वर्णित है। इन्हें पढ़ पाना एक सामान्य जन के लिए असंभव है। मैंने भी इस दिशा में कुछ किताबे पढने का प्रयास कर गांधीजी को समझने की कोशिश की है। फिर मैं कोई बड़ा लेखक या चिन्तक भी नहीं हूँ जो यह दावा कर सके कि गांधीजी के विचारों को पूर्णत: समझ लिया है। फिर भी मैं कोशिश कर रहा  हूँ कि आगामी कुछ सप्ताहों तक मैं गांधीजी द्वारा लिखित कुछ पुस्तकों ‘हिंद स्वराज’, ‘सत्य के प्रयोग अथवा आत्म कथा’, ‘मेरे सपनो का भारत’, ‘ग्राम स्वराज’, ‘अनासक्ति योग’, ‘आश्रम भजनावली’ आदि   के माध्यम से गांधीजी द्वारा व्यक्त विचारों से ‘साहित्यिक ब्लॉग  ई- अभिव्यक्ति’ के पाठकों को परिचित कराने का प्रयास करूं। यह भी सत्य है कि ‘हिंद स्वराज’ में लिखी कई बातें मुझे आसानी से समझ में नहीं आती और कई विचार मेरे गले भी नहीं उतरते  हैं। मुझे गांधी जी की लिखी दूसरी पुस्तक मेरे “सपनों का भारत” पढ़ना ज्यादा पसंद है। समय समय पर मुझे गांधीजी से जुड़े अनेक संस्मरण पढने का अवसर मिलता रहता है, मैंने उन्हें भी संकलित करने का प्रयास किया है। मैं इनसे भी गांधी चर्चा के दौरान अपने मित्रों को ‘ई- अभिव्यक्ति’ के माध्यम से परचित कराने का प्रयास करूंगा।

हिंद स्वराज जिसे 1909 में लिखा गया था, जिसके अनेक संस्करण समय-समय पर प्रकाशित हुये, उनकी प्रस्तावना लिखते समय बापू ने अनेक रहस्योद्घाटन किये हैं।

प्रथम बार जब उन्होंने  22.11.2009 को किलडोनन कैसल समुद्री जहाज में  बैठकर  इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी तब उन्होंने  सबसे पहले कहा कि “इस विषय पर मैंने जो बीस अध्याय लिखे हैं, उन्हें मैं पाठकों के सामने रखने की हिम्मत करता हूँ ।”

आगे वे लिखते हैं कि “उद्देश्य सिर्फ देश की सेवा करने का और सत्य की खोज करने का और उसके मुताबिक बरतने का है। इसलिए अगर मेरे विचार गलत साबित हों तो उन्हें पकड़ रखने का मेरा आग्रह नहीं है। अगर वे सच साबित हों तो दूसरे लोग भी उनके मुताबिक़ बरतें, ऐसी देश के भले के लिए साधारण तौर पर मेरी भावना रहेगी।”

जनवरी 1921 यंग इंडिया में वे लिखते हैं कि –

“इस किताब में ‘आधुनिक सभ्यता’ की सख्त टीका की गई है। यह 1909 में लिखी गई थी। इसमें मेरी जो मान्यता प्रकट की गई है, वह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है। मुझे लगता है कि अगर हिंदुस्तान ‘आधुनिक सभ्यता’ का त्याग करेगा तो उससे उसे लाभ ही होगा।”

सेवाग्राम से 14.07.1938 को उन्होंने संदेश दिया कि ” पाठक इतना ख्याल रखें कि कुछ कार्यकर्ताओं के साथ, जिनमें एक कट्टर अराजकतावादी थे, मेरी जो बातें हुई थी, वे जैसी की तैसी मैंने इस पुस्तक में दे दी हैं। पाठक इतना भी जान लें कि दक्षिण अफ्रीका के हिन्दुस्तानियों में जो सड़न दाखिल होने ही वाली थी, उसे इस पुस्तक ने रोका था”।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – स्त्री और स्त्री ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  – स्त्री और स्त्री

एक स्त्री ठहरी है
स्त्रियों की फौज से घिरी है,
चौतरफा हमलों की मारी है
ईर्ष्या से लांछन तक जारी है,
एक दूसरी स्त्री भी ठहरी है
किसी स्त्री ने हाथ बढ़ाया है,
बर्फ गली है, राह खुल पड़ी है
हलचल मची है, स्त्री चल पड़ी है!

सहयोग और अपनत्व का हाथ सदा बढ़ाएँ।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 20 – चांदणे ☆ – सुश्री प्रभा सोनवणे

सुश्री प्रभा सोनवणे

 

(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ  “कवितेच्या प्रदेशात” में  उनकी पुरानी डायरी से  सत्रह वर्ष पूर्व हृदय में उपजी एक कविता  “चांदणे” मात्र  सितारों के गाँव में चन्द्रमा के जन्म और चाँदनी बिखेरने की ही गाथा नहीं है अपितु, सुश्री प्रभा जी के संस्मरणों की गाथा में  अंधकार में उपजे चन्द्रमा के प्रकाश  का एक अंश  प्रतीत होता है.  निःसंदेह जीवन के कितने भी वर्षों पूर्व लिखी रचना उन वर्षों की स्मृति के साथ जुडी कई गाथाएं अपने आप अंतर्मन में कह जाती हैं .सुश्री प्रभा जी की कवितायें इतनी हृदयस्पर्शी होती हैं कि- कलम उनकी सम्माननीय रचनाओं पर या तो लिखे बिना बढ़ नहीं पाती अथवा निःशब्द हो जाती हैं। सुश्री प्रभा जी की कलम को पुनः नमन।

मुझे पूर्ण विश्वास है  कि  आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप  प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी  के उत्कृष्ट साहित्य का साप्ताहिक स्तम्भ  – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते  हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कवितेच्या प्रदेशात # 20 ☆

 

☆ चांदणे ☆

 

मध्यरात्री जन्मताना घेऊन आले चांदणे

गर्द काळ्या त्या तमाला भेदून  आले चांदणे

 

जन्म जेथे जाहला त्या गावात माझा चांदवा

त्याच गावी  आठवांचे ठेवून आले चांदणे

 

ती किशोरी धीट स्वप्ने गंधाळली तेजाळली

मी दुपारी तप्त सूर्या देवून आले चांदणे

 

नेहमी मी मोह फसवे हेटाळले या जीवनी

संशायाचे बीज का हो पेरून आले  चांदणे

 

दूषणे सा-या जगाची सोसून मी तारांगणी

पौर्णिमेने ढाळलेले वेचून  आले चांदणे

 

जीवनाचे गीत गाता आसावरी झंकारली

आर्ततेचे सूर सारे छेडून  आले चांदणे

 

तारकांचा गाव  आता देतो “प्रभा” आमंत्रणे

शुभ्र साध्या भावनांचे  लेवून  आले चांदणे

 

© प्रभा सोनवणे,  

(सतरा वर्षापूर्वी ची रचनाआहे. मध्यरात्री सुचलेली)

 

“सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता – ☆ भीगी पलकों की कहानी ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी”  जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है।  आज प्रस्तुत है नारी जीवन पर  आधारित श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की एक भावप्रवण कविता भीगी पलकों की कहानी.)

 

भीगी पलकों की कहानी ☆

 

युगों युगों की रवानी

बस और नहीं हाँ अब और नहीं।।

जब भी चाहा कि चल दूं तुम्हारे साथ दो कदम

लक्ष्मण रेखा दहलीज़ देहरी पुजवा ली।।

सोचा एक बार ही सही

बैठ जाऊँ अनुरागी प्रिया बन तुम्हारे बराबर

लक्ष्मी गृहलक्ष्मी दुर्गा सरस्वती सती के आसनों पर बैठा दिया

अनसुनी कर दी भीगीं पलकों की पुकार

सुनाकर अनहद नाद ओंकार।।

गार्गी से हार कर भी शास्त्रार्थ में

बन कर ऋषि याज्ञवल्क्य बन बैठे।।

मैत्रेयी लोपामुद्रा को

अनायास नहीं सायास भुला बैठे।।

कैसे ऋषि?

अपने ही मानदंड से बँधे  जमदग्नि

माता रेणुका को मानसिक व्यभिचार का दंड देकर

पुत्र परशुराम को माँ का हत्यारा बना दिया।।

यह कैसा ब्रम्ह ज्ञान?

उर्मिला उत्तरा माधवी ही नहीं – –

यशोधरा तारा अहिल्या के अश्रु को भी नहीं पढ़ पाए।।

पूछ रहीं हैं समय की भीगीं पलकें

कब समझोगे?

बेटियों बहनों माँओं पत्नी प्रेयसी की ही नहीं

नारी हदय  की व्यथा

– – भीगीं पलकों की कथा व्यथा ।।

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – ☆ लघुकथा ☆ पहचान ☆ – डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

(डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी जी  लघुकथा, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ, बालकथा, बोधकथा, लेख, पत्र आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं.  आपकी रचनाएँ प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे पाठकों को आपकी उत्कृष्ट रचनाएँ समय समय पर पढ़ने को मिलती रहेंगी. आज प्रस्तुत है आपकी लघुकथा  “पहचान”.)

 

 ☆  पहचान ☆ 

 

उस चित्रकार की प्रदर्शनी में यूं तो कई चित्र थे लेकिन एक अनोखा चित्र सभी के आकर्षण का केंद्र था। बिना किसी शीर्षक के उस चित्र में एक बड़ा सा सोने का हीरों जड़ित सुंदर दरवाज़ा था जिसके अंदर एक रत्नों का सिंहासन था जिस पर मखमल की गद्दी बिछी थी।उस सिंहासन पर एक बड़ी सुंदर महिला बैठी थी, जिसके वस्त्र और आभूषण किसी रानी से कम नहीं थे। दो दासियाँ उसे हवा कर रही थीं और उसके पीछे बहुत से व्यक्ति खड़े थे जो शायद उसके समर्थन में हाथ ऊपर किये हुए थे।

सिंहासन के नीचे एक दूसरी बड़ी सुंदर महिला बेड़ियों में जकड़ी दिखाई दे रही थी जिसके वस्त्र मैले-कुचैले थे और वो सर झुका कर बैठी थी। उसके पीछे चार व्यक्ति हाथ जोड़े खड़े थे और कुछ अन्य व्यक्ति आश्चर्य से उस महिला को देख कर इशारे से पूछ रहे थे “यह कौन है?”

उस चित्र को देखने आई दर्शकों की भीड़ में से आज किसी ने चित्रकार से पूछ ही लिया, “इस चित्र में क्या दर्शाया गया है?”

चित्रकार ने मैले वस्त्रों वाली महिला की तरफ इशारा कर के उत्तर दिया, “यह महिला जो अपनी पहचान खो रही है….. वो हमारी मातृभाषा है….”

अगली पंक्ति कहने से पहले वह कुछ क्षण चुप हो गया, उसे पता था अब प्रदर्शनी कक्ष लगभग खाली हो जायेगा।

 

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर-5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) – 313 002

ईमेल:  chandresh.chhatlani@gmail.com

फ़ोन: 9928544749

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य # 18 – प्रत्याशी मीमांसा…… ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

 

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  एक सामयिक बेबाक रचना   “प्रत्याशी मीमांसा……। )

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 18☆

 

☆ प्रत्याशी मीमांसा…… ☆  

 

वोट डालना धर्म हमारा

और कुकर्म तुम्हारे हैं

तुम राजा बन गए

वोट देकर तो हम ही हारे हैं।

 

एक चोर इक डाकू है

ठग एक, एक है व्यभिचारी

एक लुटेरा, हिंसक है इक

और एक अत्याचारी,

ये हैं उम्मीदवार तंत्र के

पंजीकृत ये सारे हैं

तुम राजा…………।

 

चापलूस है कोई तो

कोई धन का सौदागर है

कोई है आतंकी इनमें

तो कोई बाजीगर है,

वोट इन्हीं को है देना

ये खुद के खेवनहारे हैं

तुम राजा………….।

 

इनमें हैं मसखरे कई

कोई नौटंकी वाले हैं

कुछ ने पहन रखी ऊपर

शेरों सी नकली खालें है,

संत महंत, माफ़ियाओं के

हिस्से न्यारे-न्यारे हैं

तुम राजा……………।

 

कुछ राजा कुछ संत्री-मंत्री

इनमें कुछ षड्यंत्री हैं

हैं रागी तो कुछ बैरागी

कुछ औघड़िये तंत्री हैं,

बाना जोगी, सुविधाभोगी

खबरी ये हरकारे हैं

तुम राजा…………..।

 

इनमें राष्ट्र विरोधी कुछ

कुछ काले धंधे वाले हैं

कुछ एजेण्ट विदेशों के

कुछ के अपने मदिरालै हैं,

काले पैसों के इस दंगल में

कुछ अलग नजारे हैं

तुम राजा…………….।

 

नेताओं के नाती-पोते

कुछ के बेटे बेटी हैं

भरे पेट वालों के ही तो

कब्जे में मतपेटी है,

भूखे नंगे बेबस जन के

बनते सर्जनहारे हैं

तुम राजा………….।

 

जिनके चेहरे हैं उजले

वे सब गूंगे औ’ बहरे हैं

साफ छबि वालों के मुंह पर

आदर्शों के पहरे हैं,

जब्त जमानत उनकी

जो सीधे सादे बेचारे है

तुम राजा बन गए

वोट देकर तो हम ही हारे हैं।।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (43) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

षष्ठम अध्याय

( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा )

 

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌।

यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ।।43।।

 

वहां पूर्व संयोग से ,फिर लेकर नयी आश

कुरूनंदन जाता नहीं कोई व्यर्थ प्रयास।।43।।

 

भावार्थ :  वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है ।।43।।

 

There he comes in touch with the knowledge acquired in his former body and strives more than before for perfection, O Arjuna! ।।43।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 13 ☆नया ज़माना ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “नया ज़माना ”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 13 ☆

 

☆ नया ज़माना 

ज़िंदगी के कदम कुछ परेशान, जिस्म लगता लाचार

हर कोई है चैन की खोज में, पर मिलता नहीं क़रार

 

बहला लेता है हर कोई दिल को, माना कि वो झूठ है

और इस दाग़ से लिपटे कपट की, लगती जाती कतार

 

नए ज़माने के नए रंग-ढंग हैं, किसको किसकी फिकर

पहले जो ठोस से खड़े थे रिश्ते, उनमें आ गयी दरार

 

हर कोई सोचता है अपनी-अपनी, नरमी खो गयी है

प्यार भी एक धोखे सा रह गया, मिट गया ऐतबार

 

सुकून अब कहाँ पाएंगी हवाएं, वो भी प्रदूषित हो गयीं

नीलम बैठे-बैठे सोच में खोयी है, कहाँ जा रहा संसार

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – प्राणज्योति ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  – प्राणज्योति

 

जगत में रहकर

जगत से निर्लिप्त रहने की

वृत्ति पर मुस्कराती रही,

विदेह होने के लिए

पहले देह होने का पाठ

प्राणज्योति पढ़ाती रही!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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