हिन्दी साहित्य – ☆ कथा कहानी ☆ कालजयी वैज्ञानिक फंतासी ☆ शेष विहार ☆ – सुश्री निर्देश निधि

सुश्री निर्देश निधि

आज प्रस्तुत है हिंदी साहित्य की सशक्त युवा हस्ताक्षर सुश्री निर्देश निधि  जी की कालजयी वैज्ञानिक फंतासी  “शेष विहार ”.

आदरणीय डॉ विजय कुमार मल्होत्रा जी (पूर्व निदेशक (राजभाषा), रेल मंत्रालय,भारत सरकार) के शब्दों में “बुलंद शहर (उ.प्र.) की निवासी निर्देश निधि द्वारा लिखित “शेष विहार” पढ़कर मैं न केवल भयाक्रांत हो गया था, बल्कि विचलित भी हो गया था और मैं चाहता था कि इस कहानी को विश्व-भर के पाठक पढ़ें और समय रहते ऐसे उपाय करें जिससे हम अपने इस प्यारे भूमंडल को आसन्न भयानक विभीषिका से बचा सकें.”

ऐसी कालजयी रचना को हमारे विश्वभर के पाठकों  तक पहुंचाने के लिए हम आदरणीय  कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी के सहयोग के लिए ह्रदय से आभारी हैं। कैप्टन प्रवीण रघुवंशी न केवल हिंदी और अंग्रेज़ी में प्रवीण हैं, बल्कि उर्दू और संस्कृत में भी अच्छा-खासा दखल रखते हैं. उन्होंने इस कालजयी रचना के अंग्रेजी अनुवाद को उपलब्ध कराने के आग्रह को स्वीकार किया है जिसे हम शीघ्र अपने पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।)

आप सुश्री निर्देश निधि जी की अन्य  दो कालजयी रचनाएँ निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं :

  1. सुनो स्त्रियों
  2. महानगर की काया पर चाँद

☆   शेष विहार ☆

मैं समय हूँ । मौन रहकर युगों को आते जाते देखना मेरे लिए एक सामान्य प्रक्रिया है अपनी अनुभवी आँखों से मैं  सिर्फ देख सकता हूँ । अच्छे बुरे किसी भी परिवर्तन को रोक पाना  मेरे लिए संभव नहीं था । मैं अक्सर किसी एक कहानी, जो सबसे अलग सी होती है को उठाता हूँ और आप सबके समक्ष रखता हूँ । आज मैं इस युग की एक माँ और उसके आठ वर्षीय बेटे की कहानी सुनाने जा रहा हूँ । यह कहानी भारत नाम के देश से ली है । अभी जो मैं देख रहा हूँ वह सुनाता हूँ जस का तस,

“वैन, सूरज डूबने वाला है, उठो और तैयार हो जाओ आज “शेष विहार” देखने जाना है न । जल्दी करो जिससे कि हम सूरज उगने से पहले – पहले ही सुरक्षित  वापस आ सकें । “

वैन फ्रैश रूम में गया और अपनी पसंद की ड्रेस, परफ्यूम, जूते वगैहरा कम्प्युटर में फीड किए । कम्प्युटर ने उसे पाँच मिनिट के अंदर – अंदर ऐन्टी वायरल, ऐन्टी बैक्टीरियल एयर से ड्राइक्लीन करके फीड किए हुए कपड़े, जूते वगैहरा पहनाकर पूरी तरह तैयार कर दिया ।

आठ वर्षीय वैन ही पूरे शहर में एक बच्चा है जिसने अपनी माँ की कोख से जन्म लिया है, और अब भी माँ के साथ रहता है । पिता का तो उसे पता नहीं क्योंकि उसकी माँ ने गर्भधारण के लिये राजकीय स्पर्म लैब का ही सहारा लिया था । माँ की कोख से जन्म लेने और माँ के साथ एक ही सैल में रहने  के कारण, अनुभव बांटने के लिए आए दिन, मीडिया और अनेक संस्थाओं के लोग उन दोनों माँ – बेटा का इंटरव्यू लेने आते रहते हैं । उन पर अनेक रिसर्च हो  रही हैं ।  क्यों कि इस  युग की स्त्री अपनी कोख से शिशु को जन्म देने की योग्यता खो चुकी है अगर कोई इक्का – दुक्का स्त्री योग्य हो भी तो वह गर्भधारण कर शिशु को जन्म देने का कष्ट लेने को तैयार नहीं होती ।  पिछली कई सदियों से भ्रूड़ हत्याएँ इतनी अधिक होती आ रही हैं कि प्रकृति ने स्त्री से संतति निर्माण की असाधारण योग्यता लगभग छीन ही ली है। पुरुषों में  भी कोई इक्का – दुक्का ही बचे हैं जो संतति निर्माण की प्रक्रिया सतत रख पाने में समर्थ  हैं । सभी बच्चे वैज्ञानिकों की देख – रेख में लैब से ही जीवन का प्रारम्भिक रूप पाते हैं । सरकारी संस्थाएं स्त्रियों की गर्भधारण क्षमता का टेस्ट कराती हैं । जिससे कि प्रकृति के नियम को फिर से जीवित किया जा सके ।  वैन की माँ को सरकार ने इस योग्य पाया था , अतः उसे तमाम सुविधाएँ और लाभ देने के नाम पर गर्भधारण के लिए  राजी कर लिया गया था । माँ ने भी यह सोचा था कि जिस शिशु को वह कोख से जन्म देगी वह उससे पुराने समय के पुत्रों की तरह थोड़ा बहुत प्रेम तो करेगा ही । और सरकारी लाभ मिलेंगे सो अलग , खैर …..

वैन खुद भी बड़ी हैरानी के साथ अपनी माँ से पूछता है, “माँ आपने सचमुच मुझे अपने पेट से पैदा किया है ? अमेजिंग मोम, यू आर रिएलि अमेजिंग । मेरी क्लास के सभी लड़के  लैब में ही बढ़े, और वहीं पैदा भी हुए । उनकी माएँ या  पिता भी अगर इच्छा होती तो एक विशिष्ट जार में पल रहे अपने अजन्में बच्चों को देखकर आ जाते थे  बस । काफी सुरक्षित  रहा होगा इस तरह उनके बच्चों का पलना । फिर वो वहीं से शिशु पालन गृह  चले गए,  वहीं से पढ़ने के लिए छात्रावास चले गए । कभी – कभार  ही मिले होंगे अपने बायोलोजिकल पेरेंट्स से तो, किसके पास इतना समय है माँ कि बस बच्चों से ही मिलता फिरे या बच्चों के पास भी क्या बस यही एक काम रह गया है ? “

“हाँ वैन अब तो यही होता है, पर तुम्हें मैंने वाकई अपने गर्भ में पाला है पूरे नौ महीने।“  माँ ने उत्तर दिया ।

“पर माँ आपने तो बहुत ही रिस्क लिया ।  मुझे सिर्फ इमेजिंग डिवाइस की आधुनिक तकनीक से ही देख पाई अपने पेट के अंदर, क्यों लिया आपने इतना रिस्क ? आपने तो मेरे जीवन को भयानक खतरे में ही डाल दिया था माँ ।“

“नहीं वैन ऐसा नहीं है, आदमी की देखभाल आदमी से बेहतर ही कर पाती है माँ प्रकृति परंतु हमारे पूर्वजों ने उसपर विश्वास करना छोड़ दिया था न । सो अपना तिरस्कार देख कर उसने भी  अपने हाथ खींच लिए  । उसकी हानि उठाई हमारी पीढ़ियों ने ।“

“हानि कैसे माँ ?”

“देखो जैसे अब हमें दिन की जगह रात में ही सारे काम करने पड़ते  हैं । दिन भर सूरज की ऊर्जा एकत्रित करके रात को दिन बनाने की मजबूरी है हमारी परंतु  पहले सारे  काम दिन में  सूरज के प्रकाश में ही हुआ करते थे । हमारे पूर्वजों ने धरती पर लहराते सारे जंगल काट डाले और वहाँ आधुनिक बाज़ार – हाट, आधुनिक साज – सज्जा गृह, सड़कें रास्ते , बड़ी – बड़ी फैक्ट्रियाँ, होटल, आधुनिक निवास, स्मार्ट  शहर , जिससे जंगल तो गए ही खेती – बाड़ी की ज़मीन भी गई । हमारे पूर्वजों ने धरती के प्राकृतिक  साधनों का हद से ज़्यादा दोहन कर डाला ।“

“हाँ माँ, मैंने कहीं पढ़ा भी था कि प्रकृति मनुष्य की आवश्यकताएँ तो पूरी कर सकती थी पर उसका लालच वह पूरा नहीं कर सकी । “

“हाँ वैन, तुमने ठीक पढ़ा था । पुराने समय में आज की तरह सूर्य की ऊर्जा का प्रयोग नहीं किया जाता था वाहनों में बल्कि उन्हें चलाने के लिए पेट्रोल – डीज़ल नाम के तरल ईंधन होते थे जो जलने पर बहुत प्रदूषण फैलाते थे और भी रोज़मर्रा प्रयोग होने वाले  तमाम रसायनों के प्रयोगों ने वातावरण को बुरी तरह विषाक्त बना डाला । जीवन रक्षक प्राण वायु मरती चली गई । रही – सही कसर उस समय के शक्तिशाली कहे जाने वाले राष्ट्राध्यक्षों की महत्वाकांक्षाओं ने पूरी कर दी । यानि उन्होने विश्व को चार – चार महायुद्धों की त्रासदी मे धकेल दिया । रासायनिक, जैविक आदि अनेक प्रकार के घातक हथियारों ने चहकते जीवन को शमशान की वीरानी में धकेल दिया । धन – जन और वातावरण की  अपूरणीय क्षति हुई । तमाम आयुधों के प्रयोग से उपजे  धुएं  के जहरीले  गुबारों ने धरती के रक्षात्मक कवच यानी  ओज़ोन लेयर को हमेशा के लिए जला डाला । जो हमें  सूरज की हानिकारक किरणों से बचाती थी । “

“और भी बताओ न माँ क्या – क्या हुआ। “

“ और क्या बताऊँ , धरती पशु – पक्षियों से खाली हो गई । उसकी महत्वपूर्ण फूडचेन टूट गई जिन जीवों  को तुम अब सिर्फ व्यूइंग डिवाइस पर देखते हो न वो सबके सब इसी धरती पर विचरण करते थे वैन । इन्सानों  की जनसंख्या भी बहुत अधिक थी, इतनी अधिक कि कई देशों  की सरकारें अधिक बच्चे  पैदा करने वाले लोगों की कई सुविधाएं कम कर देती थीं, कम बच्चों वालों के लिए कई सुविधाओं से लैस स्कीम चलाती थीं । अब उसका उल्टा होता है वैन । अब  बच्चे पैदा करने के बदले में सुविधाएं देती हैं सरकारें। क्यों कि इतनी विशाल धरती पर मात्र दो चार ही देशों का अस्तित्व शेष रहा है जिनमें से एक हमारा भारत है । ।“

“वैन उस दिन तुमने अपनी क्लासमेट अरुणिमा का हाथ देखा था न, सूरज की किरणों  ने किस तरह जला दिया था । अब उसे “डी एस डी” यानि “डिजीज ऑफ स्योर डैथ” होना लाज़मी है । वो मानती ही नहीं है, उसे हर रोज़ दिन में जागने की पड़ी रहती है । उसे उसकी वार्डेन ने कितनी बार मना किया था दिन में जागने से “

“माँ, जन्म के समय डॉक्टर ने उसे नैनोवाट्स नहीं दिये थे ?”

“दिए होंगे वैन , पर वो छोटी – मोटी बीमारियाँ या किसी छोटी – मोटी  चोट के घाव ही भर सकते हैं ना औटोमैटिकली, वो इंसान को सूरज की हानिकारक किरणों से तो नहीं ही बचा सकते न  । वैन सिर्फ नैनोवाट्स ही नहीं अब तो जन्म  के समय एक चिप मस्तिष्क में,  एक आई डी चिप , हियरिंग डिवाइस , कॉर्निया प्रोटेक्टिव लैंस , फेंफड़ों और दिल के लिए पंपिंग डिवाइस आदि भी बच्चे को जन्म  के समय ही लगा दी  जाती है । “

“हाँ, हाँ माँ वो तो मुझे भी पता ही है , इसमें तुम क्या नया बता रही हो । यह मुझे पता है कि हर समय मोबाइल फोन पर बातें करते रहने , लाउड म्यूजिक सुनते रहने से औए तरह – तरह की मशीनों की तेज़ आवाज़ें सुनते रहने से इंसान के कान कुदरती तौर पर खराब होने लगे थे । आँखों पर टी वी और कम्प्युटर स्क्रीन आदि के प्रभाव घातक पड़े , धरती के विषाक्त हो गए  वातावरण  ने फेफड़ों को नाकाम करना शुरू कर दिया था , रहन – सहन की दोषपूर्ण शैली ने मनुष्य  के स्वास्थ को लगभग निगल ही लिया था । तीसरे और फिर चौथे विश्वयुद्ध के बाद देखना, सुनना , सोचना, समझना, यानी जीना लगभग असंभव हो गया था, इसीलिए मानव मस्तिष्क में भी चिप लगानी पड़ी । इस चिप में कुछ तो सामान्य ज्ञान की बातें होती हैं जो सभी नागरिकों को आवश्यक रूप से पता होनी ही चाहिए और कुछ विशेष ज्ञान होता है । वह ज्ञान जो उनके कार्यक्षेत्र  निर्धारित करता है । इसी चिप के माध्यम से हम एक दूसरे को अपने संदेश पहुंचा सकते हैं बिना किसी अतिरिक्त प्रयास और बिना किसी अतिरिक्त डिवाइस के, और इसी चिप के माध्यम से हम रास्ते खोजने मे सक्षम होते हैं ।  जिनको यह चिप नहीं लगाई जाती  वो लगभग विक्षिप्त बन कर ही जीते हैं ।  ये सब पता है मुझे । “

“हाँ बिलकुल सही कहा वैन । और पता है अंतिम विश्वयुद्ध के बाद कौन बच पाये ? सिर्फ वो वैज्ञानिक जो अंडर ग्राउंड बंकरों के क्रत्रिम वातावरण में बरसों छिपे पड़े रहे जिनकी बॉडी ने इस घातक जीवन शैली को अडोप्ट कर लिया और खुद को सूरज की जानलेवा किरणों से बचाकर रखा । उन्होने ही  धरती पर मानवी  हृदय के स्पंदन का स्वर सतत रखा वैन । अब पृथ्वी पर  जितनी भी जनसंख्या है सिर्फ उन चंद वैज्ञानिकों की ही सन्तानें हैं ।  विश्व युद्धों की वजह से फैले प्रदूषण ने धरती का वातावरण ही नहीं उसके गर्भ में छिपा पानी तक भयानक रूप से विषाक्त कर दिया, पीना तो दूर नहाने के लायक तक नहीं छोड़ा ।“

“माँ, तो क्या पहले युग  में धरती  के पानी से ही नहाया  जा  सकता था ?”

“नहाया ही नहीं वैन धरती  का पानी ही खाने और पीने में भी प्रयोग किया जाता था ।“

“सच माँ !”

“हाँ हाँ बिलकुल सच , अभी जब तुम बड़ी कक्षा में जाओगे न तो तुम्हें ये सब इतिहास और विज्ञान दोनों ही विषयों की कक्षाओं में  पढ़ाया जाएगा । पानी तो तीसरे विश्वयुद्ध के बाद विषाक्त होकर पीने के अयोग्य हुआ । तब तक भी कुछ शुद्धिकरण संयन्त्रों से उसे शुद्ध किया जा सकता था परंतु चौथे महायद्ध ने यह सम्भावना  भी समाप्त कर दी  । कुछ पानी और खाने की सामग्री को बंकरों  में सुरक्षित  रखा गया था आड़े वक्त के लिए ।  बस उसी ने जीवित रखा, बच रहे कुछ विशेष वैज्ञानिकों को ।  तभी तो अब हम प्लैनेट एक्वेरियम से पानी लाते हैं और बहुत कम ला पाने की वजह से उसी को बार – बार रिसाइकिल करके प्रयोग करते रहते हैं । यही कारण है कि अब मात्र  कुछ एम एल  से ही स्पंज बाथ लेना होता है, या फिर इस आर्टिफ़िश्यली ऐन्टीबैक्टीरियल, ऐंटीवायरल की गई एयर से ही ड्राईक्लीन करना पड़ता है खुद को ।“

“तो माँ क्या हमारे सारे पूर्वज मूर्ख थे जो उन्होने इतनी बड़ी – बड़ी भूलें कीं । आपस में लड़ना , पेड़ काटना ,जंगलों का विनाश करना ज़रूरी था क्या ? हमें उन्होने क्या दिया , ये बंद घरों की जेल, जिनमें हमे दिनभर बंद रहना पड़ता है । अगर ये घर भी एयरकंडीशंड सनलाइट प्रूफ, और आक्सीजनफिल्ड न होते या हम न बना पाए होते  ऐसे घर तो  हम भी तो जीवित नहीं रहते । ”

“हाँ वैन यह सच है । पर मनुष्य हारने के लिए नहीं बना इसीलिए हम दूसरे गृह जिनमें पुरानी धरती जैसा ही प्राकृतिक और जीवन का सहयोगी वातवरण है, अपने निवास के लिए खोज पाने में लगभग सफल हो ही चुके हैं । पर हाँ वहाँ जाकर बसने तक का समय मनुष्य जाति के लिए वास्तव में ही बेहद कठिन है । “

“माँ क्या हमारे जीवन में ही हम जा सकेंगे उस नए गृह पर ?”

“मैं अपना तो नहीं कह सकती वैन पर हाँ तुम तो ज़रूर ही जा सकोगे और हाँ वहाँ जाकर भी अकेले मत रहना । अपना परिवार जिसमें एक स्त्री जिसे पत्नी कहा जाता रहा है पुराने समय में , अपने कुछ बच्चे जो तुम्हारी उस पत्नी और तुम्हारे होंगे उन्हें अपने साथ ही रखना । देखो हम कितनी ही पीरिओडिकल  फिल्मों में देखते हैं किस तरह सारा परिवार हंसी – खुशी रहता था खुले मैदानों में खेलते – कूदते हंसी मज़ाक करते कितने प्यारे लगते हैं उस परिवार के सदस्य ।“

“अरे नहीं – नहीं माँ तुम ये हाइपोथेटिकल बातें मत करो, प्रैक्टिकल बातें करो जो संभव हो सकती हों । मैं तो रहूँगा बिलकुल अकेला, आज़ाद सबकी तरह । मैं क्यों फन्सूंगा समस्या  में । “  वैन ने माँ की बात का प्रतिरोध किया ।

“अब बहुत सारी बातें हो गईं वैन और सूरज भी लगभग डूब ही चुका है । अपना जीवन रक्षक सूट पहन लो अपना फ्लाइंग कैपस्यूल चैक करो और उसकी फ्युल चिप ,ऑक्सीज़न  वगैहरा – वगैहरा चैक करो, अपनी डायट टैबलेट और ऐच2 ओ वाली टैबलेट्स का जार रखना मत भूल जाना । मैंने अपने ये सभी काम कर लिए हैं , मैं पूरी त्तरह तैयार हूँ। “

“माँ मैंने भी ये सब काम कर लिए हैं वो  भी तुमसे पहले , बस लाइफ सेवरसूट पहन लेता हूँ । पर माँ मैं बार – बार यही सोचता हूँ कि तुम सबसे अलग हो  ।  मेरे लिए तुमने  अपनी प्राइवेसी सैक्रिफ़ाइस की । “

पर वैन नहीं जानता कि माँ ने तो सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं और उसके बार – बार पड़ने वाले दबावों के कारण गर्भधारण  किया था । पूरे शहर में एक उसी का टेस्ट आया था गर्भधारण के लिए पोज़िटिव ।  पर उसे जन्म देने और साथ आ जाने पर उसे वैन का साथ बहुत अच्छा लगा था । हलाकि कभी – कभी उसे अपनी प्राइवेसी खत्म होती ज़रूर ही लगी थी और काम का कुछ अतिरिक्त अनचाहा भार भी । किसी भी सदी की सही पर थी तो वह माँ ही न, इसीलिए बेटे का सानिध्य उसे भला लगा था ।

“हाँ वैन यह तो मैंने किया पर मुझे अच्छा लगा तुम्हें साथ रखना शायद इसीलिए मैं यह कर पाई । पर जैसा कि मैंने तुम्हें पहले भी कभी बताया था कि पहले पूरा परिवार साथ – साथ ही रहता था ।“

“माँ परिवार क्या ? उसके सही मायने बताओ  ।”

“परिवार मतलब, माँ, पिता यानि जिस स्त्री और जिस पुरुष के संयोग से बच्चे का जन्म होता है , वो बच्चे के माँ – पिता होते हैं । बहन – भाई जो उन्हीं माँ पिता से दूसरे बच्चे होते हैं । माँ पिता के माँ पिता और  उनके दूसरे बच्चे आदि इसी  तरह करीबी लोगों से मिलकर बनता था  परिवार । “

“माँ पहले बताओ मेरा पिता कौन है ?”

“वैन मैं तुम्हारे पिता को नहीं जानती क्योंकि तुम्हें मैंने अपनी कोख से जन्म तो ज़रूर दिया लेकिन उसके लिए मैंने राजकीय स्पर्म लैब का ही सहारा लिया ।”

“ओह माँ ! काश कि तुम्हें पता होता तो मैं भी फिल्मों की तरह अपने पिता के साथ घूमता, खेलता ।“

“और हाँ सुनो, एक मज़े की बात यह कि उस पुराने समय में डोमेस्टिक हेल्प भी साथ ही घर में रह जाती और पशुओं के लिए भी घर के पास ही एक अलग से जगह होती थी । और कई  पक्षी भी अपने घोंसले इन्सानों के  घरों में बनाए रखते थे। “

“ओह माँ , कितनी अन्हाइजेनिक होती होंगी उस समय घर की कंडीशन ।“

“वह समय आज के जैसा नहीं था वैन , इन्फैक्शन इतनी आसानी से नहीं लगता था , मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता काफी अच्छी थी।“

“माँ जब इंसान बच पाया तो पशु – पक्षी क्यों नहीं बचे ?”

“देखो वैन इंसान काफी कुछ स्वार्थी तो था ही शुरू से , जितनी सुरक्षा वह अपनी रख पाया उतनी पशु पक्षियों  की नहीं, फिर विश्व युद्धों के बाद इतने स्थान सुरक्षित  बचे ही नहीं थे कि उनमें पशु पक्षियों  को भी रखा जा सकता अतः इंसान ने खुद को बचाना  ज़रूरी समझा । “

“अब पशु पक्षी तो क्या  स्त्री – पुरुष भी साथ नहीं रहते क्यों कि कोई भी किसी को एक पल भी सहन नहीं कर पाता । कोई दूसरे की वजह से अपनी पल भर की स्वतन्त्रता भी नहीं गंवाना चाहता ।  पता है वैन इस समय आदमी कम और मेंटल हास्पिटल ज़्यादा क्यों हैं, अब क्योंकि पुराने जमाने में लोग आपस में मिलकर, हंस – बोलकर खुद को तनाव रहित कर लेते थे।“

“माँ, तो क्या लोगों के पास हंसने – बोलने का फालतू समय था ?”

“हाँ वैन बिलकुल था ।  विचित्र  विरोधाभास हुआ है । आधुनिक मशीनों के माध्यम से घंटों के काम मिनटों में हो जाते हैं लेकिन समय कम पड़ गया है आदमी के पास । “

“धरती पर अनगिनत अनाज पैदा  होते थे लोग दिन में कई कई बार खाना खाते थे अब की तरह टैबलेट्स पर नहीं जीते थे बाकायदा स्वादग्रन्थियाँ होती थीं । आदमी ने शरीर को ताकत देने के लिए गोलियों का प्रयोग आरंभ किया और धीरे – धीरे उसे इतना बढ़ाया कि स्वादग्रन्थियाँ मरती  ही चली गईं । तुमने देखा न अपनी व्यूइंग डिवाइस पर तरह – तरह के  अनाज, तरह – तरह के खाने और मिठाइयां ।“

“माँ तो क्या धरती की  उर्वरा शक्ति आउटडेटेड हो गई थी ?”

“नहीं वैन वह तो अनंत काल तक वैसी ही बनी रह सकती थी जैसी थी परंतु वह आदमी की जरूरतें तो पूरी कर सकती थी लालच नहीं, जैसा कि तुम जानते ही हो  । इसकी संपदाओं का  हमारे पूर्वजों ने इस कदर शोषण किया कि हमें इन ऐयरकंडीशंड वाहनों और घरों का बंदी बना डाला । “

“चलो वैन बाकी बातें बाद में करते हैं ,  सूरज को डूबे लगभग पंद्रह मिनिट हो गए । तुम चैक कर लो कि तुमने अपने फ्लाइंग कैप्स्यूल में डेस्टिनेशन ठीक से भरा है या नहीं , कभी कहीं भटक जाओ । “

“नहीं माँ मैंने ठीक से फीड कर लिया है ।इस तरह की गलती अब ब्रेन में फिट हो जाने वाली ब्रेनी चिप करने ही कहाँ देती है । “

साँझ होते ही आसमान में लोगों के वाहन दिखाई देने आरंभ हो गए । वो दोनों निकलने ही वाले थे कि माँ का कोई परिचित उनके सैल यानि घर के पास से गुज़रा तो उसने देखा कि उनके सेल की इंसुलेशन फिल्म कुछ हट सी गई है । आगामी खतरा देख कर उसने वैन की माँ को आगाह किया । वैन की माँ ने सरकारी कार्यालय का कोड दिमाग में सोचा और कार्यालय को सूचना दी कि उनके सैल की फिल्म ठीक करा दी जाए । कार्यालय ने उसे  आश्वस्त किया कि उनके लौटने तक कार्य हो जाएगा । इस आश्वस्ति के मिलते ही माँ बेटा दोनों ने अपने – अपने लाइफ सेवर सूट ठीक से पहनकर, अपने – अपने ऑक्सीज़न मास्क चैक किए और दोनों ने अपने – अपने फ्लाइंग कैप्सूल में बैठकर फ्रीक्वेन्सी मॉड्युलेशन  के माध्यम से   आपस में बात करते हुए एक हज़ार किलोमीटर का सफर मात्र बारह मिनिट छह सेकेंड  में तय कर लिया ।

“शेष विहार” आ चुका था । भाग्यवश ऐसिड रेन नहीं हो रही थी । दोनों ने अपने – अपने ऑक्सीज़न मास्क पहने और कैप्सूल से बाहर आ गए । काँच के अंदर करीब दस किलोमीटर का प्राचीन धरती का छोटा मॉडल  कृत्रिम रूप से तैयार किया गया था पेड़ – पौधे , घास –  फूस, फूल –  फल, पत्ती, झरने, पहाड़, नदी, हाँ नदी भी धरती के विषाक्त जल वाली नदी, चिड़िया, तितली, शेर, गाय, बैल, मैमथ, डायनासोर,  हाथी, जिराफ,अनगिनत कीड़े मकौड़े और दुनिया भर के मनुष्यों की जातियों प्रजातियों के बैटरियों और रिमोट के माध्यम से चलते – फिरते जीवंत लोग सब कुछ बिलकुल असली जैसे, नयनाभिराम दृश्य ।

“इतनी सुंदर थी धरती ! हमारे मूर्ख पूर्वजों ने क्यों कर दिया इसका सर्वनाश ? क्या छोड़ा हमारे लिए ?” वैन अपनी माँ से यही पूछ रहा था ।

उन दोनों माँ बेटे की तरह वहाँ और भी बहुत से लोग थे । परंतु अब पिछली सदियों की तरह कहीं भी भीड़ नहीं जुटती । बच्चे लैब्स में पैदा होते हैं कुछ ही लोग हैं जो अपने लिए ऑर्डर करके बच्चे तैयार कराते हैं क्योंकि कोई भी बच्चों को समय देना और उनकी जिम्मेदारी  लेना नहीं चाहता । हाँ बच गए देशों की सरकारें ही बस ज़रूरत भर नागरिक पैदा करवाती हैं । जिनका वे ठीक से पालन – पोषण कर पाएँ । इसीलिए शहर के शहर खाली पड़े हैं । लोगों का पालन – पोषण सरकार का जिम्मा है ।  लोग मृत्यु के भय से स्वयं को दिन भर अपने घरों में कैद करके रखते हैं । रात को ही काम किए जा सकते हैं, या घर से बाहर निकल सकते हैं । अधिकांश लोग अपने कार्य क्षेत्र और घरों तक ही सीमित हैं । जिन इमारतों को  आदमी ने कभी भूकंप रोधी समझकर खड़ा किया था धरती की सीज़्मिक प्लेट्स उनमें से हजारों लाखों का मान मर्दन कर चुकी हैं कौन जाने कब बाकियों के साथ भी यही होगा हालाकि अब उन्हें खाली ही रखा गया है प्राचीन धरोहरों की तरह । अब सैल के नाम से पुकारे जाने वाले आधुनिक निवास  तो पूरी तरह से सूरज की रौशनी से रहित हैं । दूर – दूर तक कंक्रीट पसरी हुई है । न घास बची न कोई हरियाली । ऐसिड रेन ने सब कुछ तबाह कर  दिया है ।

देशों के नाम पर संसार भर में अब दो चार ही देशों का अस्तित्व बचा है । यह कहानी भारत नाम के देश से ली है जैसा कि मैं पहले भी बता ही चुका हूँ । इस सदी में अगर कुछ सकारात्मक बचा है तो वो है युद्धों का न होना । क्योंकि अब अपने आप को धरती पर जीवित रखने के लिए जो लड़ाई मनुष्य  को प्रकृति से लड़नी पड़ती है उसके बाद आपस में लड़ने की ऊर्जा बचती  ही कहाँ है ? धरती अपने ऊपर हुए अत्याचार का प्रतिशोध लेने पर उतर आई है । वैन और उसकी माँ दोनों ने जी भर कर शेष विहार देखा । हरियाली धरती का अप्रतिम रूप उनके मन पर सारी धरती के ऐसा न होने के गहरे दुख के साथ छप सा गया । वे अपने –  अपने कैप्सूल में वापस घर के लिए चल पड़े । अभी थोड़ी ही दूर चले थे कि वैन की माँ को सांस लेने में दिक्कत होने लगी । शायद उसके कैप्सूल से ऑक्सीज़न लीक कर रही थी,सामान्यतः  जिसकी आशंका न के बराबर होती, परंतु यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट रही थी   । उसने बेटे से कहा,

“वैन शायद मेरे फ्लाइंग कैप्सूल से ऑक्सीज़न लीक कर रही है, वैन सुनो । क्या करूँ ? “अब क्या हो सकता है यह तो चलते वक्त ही चैक करना चाहिए था आपको । फिर भी मैं ऑक्सीज़न सप्लायर कंपनी को सूचित कर देता हूँ ।वो स्वयं आपके कैप्स्यूल की लोकेशन देख कर आपकी मदद करेगी । तब तक आप अपना ऑक्सीज़न मास्क पहन लो ।“ बेटे ने उत्तर दिया ।

“हाँ, पहन तो लिया पर शायद यह भी ठीक से भरा नहीं है । “ माँ ने उखड़ती सांस के साथ उत्तर दिया ।

“वैन जल्दी कुछ करो मेरा दम घुट रहा है । “ माँ ने बेचैन होकर बेटे को पुकारा  ।

“माँ मैं और क्या करूँ , कर ही क्या सकता हूँ मैं ? “

“वैन हम दोनों एक ही कैप्सूल में जा सकते हैं तुम मुझे भी अपने साथ ले लो । “ माँ ने बेचैन होकर बेटे से याचना की ।

“नहीं माँ,क्या आप नहीं जानतीं कि ये कैपस्यूल  मेरे वजन के हिसाब से ही डिजाईंड है । “

“हाँ जानती हूँ पर …..” अगले शब्द उसके साँसों की तेज़ धौंकनी में खो गए।

“जानती हैं तो यह भी जानती होंगी कि कैपेसिटी  से अधिक वजन लेकर उड़ने पर इसमें भी कोई न कोई  तकनीकी खराबी आ ही सकती है । इसकी भी ऑक्सीज़न ही लीक हो गई तो मास्क कितनी देर साथ दे पाएगा माँ ? नहीं माँ मैं अपने जीवन का रिस्क नहीं ले सकता । मैंने कंपनी को सूचित कर  दिया है वो कुछ न कुछ ज़रूर करेंगे । उनकी जिम्मेदारी है माँ ।  “

“क्या तुम्हारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है वैन ?” खाँसते, दम घुटे हुए, माँ ने बेचैन  होकर बेटे से शिकायत की ।

“प्रैक्टिकल बनो माँ, मैं यहाँ खड़े रहकर भी  क्या कर सकूँगा , अपना भी जीवन खो देने के सिवा । “

“वैन मत जाओ मैं मर रही हूँ । “

मैं पिछले दस मिनिट से यहीं खड़ा हूँ आपकी वजह से , अब और नहीं रुक सकता, सॉरी माँ । “

और वो चला गया कैप्स्यूल कंपनी से अभी तक कोई मदद नहीं आ सकी है माँ की सांसें धीरे – धीरे बंद होने को हैं पीड़ा असह्य है मृत्यु उसे अपने सामने मुंह बाए खड़ी दिख रही है । अगर वो कैप्स्यूल से बाहर आती है तो धरती का वर्तमान  विषाक्त वातावरण उसे रिसती हुई ऑक्सीज़न वाले कैप्स्यूल से भी जल्दी मार डालेगा । ऊपर से ऐसिड रेन और आरंभ हो गई है । उस का मरना अब तो तय है । जिस समाज और समय में कोई अपना एक पल भी किसी को देना नहीं चाहता, कोई स्त्री किसी बच्चे को अपनी कोख से जन्म देने की कल्पना तक नहीं कर सकती उस समाज और समय में रहकर उसने एक बच्चे को , यानि वैन को अपनी कोख से जन्म दिया । यह सोचकर कि वह इस समाज के दूसरे अलग – थलग रहने वाले बच्चों से कुछ अलग बनेगा और उसमें कुछ संवेदना जीवित रहेगी और वह माँ जैसे रिश्ते की गंभीरता अधिक न सही थोड़ी सी तो ज़रूर समझेगा । लेकिन नहीं उसका  यह अनुमान  गलत निकला था । सच्चाई यही थी कि दूसरे लोगों की तरह ही उसमें भी कोई भावुकता कोई संवेदना पैदा नहीं हो सकी थी । जन्मते समय दूसरी चीजों के साथ ही चिप में प्रेम करुणा  सहानुभूति या भावना की डोज़ को भी स्थान देना आवश्यक था, जो कि संभव नहीं था  ।  माँ ने सोचा था कि कोख से पैदा करेगी तो प्रकृतिक रूप से यह सब उसमें आयेगा ही । परंतु वह गलत साबित हुई थी । वैज्ञानिकों ने तो कहा ही था कि संभावना कम थी पर हाँ हो भी सकता था कि वह  ये सब लेकर जन्मता । जिस तरह सूरज की विषाक्त किरणों ने धरती के पेड़ – पौधे, पशु – पक्षी जानवरों और असंख्य मनुष्यों को मार डाला उसी तरह उसने मानव मस्तिष्क के प्रेम करुणा वाले सभी रसायनो को सोख लिया है यह सोचते – सोचते वह अपनी अंतिम साँस ले  रही है………

मैं समय हाथ बांधे खड़ा हूँ विवश, व्यथित ………..

 

संपर्क – निर्देश निधि , द्वारा – डॉ प्रमोद निधि , विद्या भवन , कचहरी रोड , बुलंदशहर , (उप्र) पिन – 203001

ईमेल – nirdesh.nidhi@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 17 ☆ रौशनाई!☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “रौशनाई!”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 17 ☆

☆ रौशनाई!

ये क्या हुआ, कहाँ बह चली ये गुलाबी पुरवाई?

क्या किसी भटके मुसाफिर को तेरी याद आई?

 

बहकी-बहकी सी लग रही है ये पीली चांदनी भी,

बादलों की परतों के पीछे छुप गयी है तनहाई!

 

क्या एक पल की रौशनी है, अंधेरा छोड़ जायेगी?

या फिर वो बज उठेगी जैसे हो कोई शहनाई?

 

डर सा लगता है दिल को सीली सी इन शामों में,

कहीं भँवरे सा डोलता हुआ वो उड़ न जाए हरजाई!

 

ज़ख्म और सह ना पायेगा यह सिसकता लम्हा,

जाना ही है तो चली जाए, पास न आये रौशनाई!

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

 

 

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – अपवाद ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  –  अपवाद

 

एक ही पिता की

संतानों के स्वभाव

और संकल्प में

ध्रुवीय अंतर

नई बात नहीं है,

मेरी पीड़ा और

मेरी जिजीविषा भी

अपवाद नहीं हैं!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 14☆ मलाला हूँ मैं ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  सुमन बाजपेयी जी की प्रसिद्ध पुस्तक “मलाला हूँ मैं ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा . यह मलाला यूसुफजई  के संघर्ष की प्रेरक पुस्तक है । श्री विवेक जी  का ह्रदय से आभार जो वे प्रति सप्ताह एक उत्कृष्ट एवं प्रसिद्ध पुस्तक की चर्चा  कर हमें पढ़ने हेतु प्रेरित करते हैं। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 14  ☆ 

☆ पुस्तक चर्चा – मलाला हूँ मैं   

 

पुस्तक – मलाला हूँ मैं 

लेखिका  – सुमन बाजपेयी

प्रकाशक –  राजपाल एण्ड सन्स, कश्मीरी गेट दिल्ली

 

☆ मलाला हूँ मैं – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

कल मैं अपनी लाइब्रेरी में से एक किताब “मलाला हूं मैं” पलट रहा था तभी मुझे एक व्हाट्सअप मैंसेज मिला जिसमें  कुरआन शरीफ पर लिखी गयी पंक्तियाँ उद्धृत की गई थी…. उस मैसेज ने मुझे हाथ में उठाई किताब पढ़ने पर विवश कर दिया. तालिबान के सरकारो को  हिला देने वाले आतंक के सम्मुख एक बच्ची के जिजिविषा पूर्ण संघर्ष को सरल शब्दो में बताने वाली यह किताब बहुत प्रेरक है.

स्वात घाटी पाकिस्तान में वैसे ही नैसर्गिक सुंदरता बिखेरती है जैसे भारत में काश्मीर. किन्तु तालिबान के कट्टर मुस्लिमवाद ने वहां का जनजीवन छिन्न भिन्न कर रखा है. बी बी सी में अपने पेन नेम गुलमकई नाम से वहां के हालात की डायरी लिखने वाली बच्ची मलाला लड़कियो के शिक्षा, खेलने, बोलने जैसे मौलिक मानव अधिकारो की पैरोकार के रूप में ऐसी स्थापित हो गई कि कलम के सम्मुख तालिबानो की बंदूके हिलने लगी थी, और परिणामतः मलाला पर कायराना हमला किया गया था.

खुशकिस्मत मलाला इस  हमले में लंबे संघर्ष के बाद बच गई और वैश्विक सुर्खियो बन गई. उसे २०१४ में नोबल शांति पुरस्कार सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मान मिले.

इस पुस्तक में छोटे छोटे चैप्टर्स में मलाला युसुफजई के बचपन, उसके संघर्ष और प्रसिद्धि को बहुत रोचक व प्रभावी तरीके से बताने में लेखिका सफल रही हैं. किताब के अध्याय हैं  “मलाला हूंमैं”, हिम्मत की मिसाल, स्वात की बेटी, चुना संघर्ष का रास्ता, उठाई आवाज, मेरा स्वात, शाइनिंग गर्ल, बढ़ती दहशत, डायरी में लिखी सच्चाई, हो गई चर्चित, राजनीतिक कैरियर, प्रसिद्धि बढ़ती गई, हुई क्रूरता की शिकार, पूरी दुनिया साथ हो गई, हर घर में मलाला, काम आई दुआयें, सपना पूरा हुआ, बन गई एक रोशनी, संयुक्त राष्ट्र संघ में दिया गया भाषण, सम्मान व पुरस्कार, एक गजल मलाला के नाम.

किताब इसलिये भी आज प्रासंगिक है क्योकि पाकिस्तान हर मोर्चे पर धराशायी हो रहा है पर दुनियां में आतंक का नासूर खत्म होने ही नही आ रहा. भारत में सरकार तीन तलाक, मदरसो की शिक्षा पर बेहतर करने का यत्न  कर रही है किन्तु अभी भी धर्म की  सही व्याख्या समझे बिना शरीयत के पैरोकार सुधारवादी कदमो का विरोध करते दिखते हैं. मलाला सिर्फ एक महिला नही, उसके इरादे को एक आंदोलन एक वैश्विक जुनून बनाये जाने की जरूरत है.

निदा फाजली की गजल है ..

मलाला , आंखें तेरी चांद और सूरज
तेरा ख्वाब हिमाला
झूठे मकतब में सच्चा कुरान पढ़ा है तूने
अंधियारो से लड़नेवाली तेरा नाम उजाला

 

चर्चाकार.. विवेक रंजन श्रीवास्तव, ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर

मो ७०००३७५७९८

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 8– ☆ निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे – कवयित्री इंदिरा संत ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

 

(सुश्री ज्योति  हसबनीस जीअपने  “साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी ” के  माध्यम से  वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  “निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे – कवयित्री इंदिरा संत”.  यह आलेख साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित सुप्रसिद्ध मराठी कवयित्री इंदिरा संत जी  की रचनाओं पर आधारित है ।  थे। इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.)

☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 8 ☆

☆ निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे – कवयित्री इंदिरा संत☆ 

विसाव्या शतकातील एक नावारूपाला आलेली, राजमान्यता पावलेली कवयित्री म्हणून ‘इंदिरा संत’ ओळखल्या जातात. ४ जानेवारी १९१४ साली जन्मलेल्या ह्या थोर कवयित्रीने आपल्या संवेदनशील आणि सहजसुंदर लिखाणाने रसिकवाचनांवर मोहिनी तर घातलीच पण आपल्या आशयघन कविता, ललितगद्य लेखनाने मराठी साहित्यविश्व देखील अधिकच समृद्ध केले. ‘कविता हा माझ्या लेखनाचा आणि जगण्याचा गाभा आहे’ असे त्या स्वत:बद्दल म्हणत. ‘शेला’ ’मेंदी’ ’रंगबावरी’ह्या कवितासंग्रहांना राज्य शासनाचा पुरस्कार मिळाला तर त्यांच्या ‘गर्भरेशीम’ ह्या कविता संग्रहाला साहित्य अकादमीच्या पुरस्काराने गौरविले गेले. आज ह्या कवयित्रीची अतिशय गोड कविता घेऊन मी येतेय.

☆ निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे ☆

निवडुंगाच्या शीर्ण फुलाचे

झुबे लालसर ल्यावे कानी ;

जरा शीरावे पदर खोचुनी

करवंदीच्या जाळीमधुनी.

 

शीळ खोल ये तळरानातून

भणभण वारा चढ़णीवरचा;

गालापाशी झील्मील लाडीक

स्वाद जीभेवर आंबट कच्चा.

 

नव्हती जाणीव आणि कुणाची

नव्हते स्वप्नही कुणी असावे;

डोंगर चढ़णीवर एकटे

किती फीरावे… उभे रहावे.

 

पुन्हा कधी न का मिळायचे

ते माझेपण आपले आपण;

झुरते तन मन त्याच्यासाठी

उरते पदरी तीच आठवण…

 

निवडुंगाच्या लाल झुब्याची,

टपोर हिरव्या करवंदाची…

 

स्वैर बालपण, आपल्यातच दंग असलेली स्वप्नाळू, मुग्ध तारूण्यावस्था ह्या साऱ्याला मागे टाकत काळ भराभर पुढे जातो. अनेक जवाबदाऱ्या समर्थपणे पेलत कर्तेपणाची झूल आपल्या नकळतच आपण मिरवू लागतो. व्यवहाराची गणितं सोडवण्यात, य़शापयशाच्या नोंदी ठेवण्यात, जीवनाचा ताळेबंद मांडण्यात जीवाचं निवांतपण हरवल्यागत होतं. आणि मग आठव येतो तो त्या बेभान बेधुंद काऴाचा !

मन कघीच पोहोचतं त्या निवडुंगाच्या झाडापाशी. आणि असंख्य आठवणींचं मोहोळ एका क्षणात उडतं. लाल झुब्यांनी नटलेला तो निवडुंग, त्या टप्पोरल्या करवंदीच्या भरदार जाळ्या, ती डोंगराची चढण, तो दऱ्याखोऱ्यातून भणाणत्या वाऱ्याचा शीळभरला नाद, ती आंबट कच्ची करवंदाची गालात घोळणारी जीभेवर रेंगाळणारी चव, आणि स्वत:च्याच मस्तीतले स्वत:पलिकडे नसलेले बेधुंद मन ! किती वारा प्यावा, किती आसमंत निरखावा, आणि किती निसर्ग अंगावर घ्यावा…साऱ्याचा मनसोक्त आनंद लुटतांना कधी दुसऱ्या कुणाचा विचार  देखील

मनाला शिवला नाही आणि शिवणार कसा..स्वत:तच रमलेल्या मनात इतर कुणाचा शिरकाव होईलच कसा..!

पुन: ते सारं अनुभवावं ह्याची ओढ कवयित्रीला लागली आहे. तसं शांतपण, निवलेपण, भारलेपण, स्वमग्न बेधुंदपण पुन: जगता येईल का तेवढ्याच असोशीने असा एक हलका तरंगही मनात तिच्या उमटून जातो.

*पुन्हा कधी न का मिळायचे

ते माझेपण आपले आपण

झुरते तनमन त्याच्यासाठी

उरते पदरी तीच आठवण*

ह्यातून तिची साशंकता तिने व्यक्त केलीय. सारी बंधनं झुगारून द्यावीत, काळाची पावलं उलटी पडावीत, पुन: एकदा ते स्वैर क्षण अनुभवावे, रसरसून जगावे, कधी तरी आपल्याही मनात असं तरळून जातंच ना !

 

© ज्योति हसबनीस,

नागपुर  (महाराष्ट्र)

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #24 – कुर्बान जिस्म जाँ ये, मेरी यहाँ वतन पर ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक  भावप्रवण हिंदी ग़ज़ल  “कुर्बान जिस्म जाँ ये, मेरी यहाँ वतन पर”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 24 ☆

 

☆ कुर्बान जिस्म जाँ ये, मेरी यहाँ वतन पर ☆

 

कुर्बान जिस्म जाँ ये मेरी यहाँ वतन पर

मैं नाम खुद लिखूंगा मेरा वहाँ कफ़न पर

 

मैं हाथ तोड़ दूंगा गद्दार के कसम से

कोई न हाथ डाले अब देश की बहन पर

 

झंडा सफे़द लेकर शव को उठाने आओ

गिनलो निशान सारे ना’पाक’ इस बदन पर

 

बारूद कम हुआ है अल्लाह की फ़जल से

अब फूल ही खिलेंगे कश्मीर के चमन पर

 

दुनिया समझ गई है दमख़म यहाँ हमारा

अब नाम हिंद का मैं लिख दूं वहाँ गगन पर

 

शांति की राह पर हम चलते रहे निरंतर

विश्वास है हमारा गांधी के उस भजन पर

 

भूखा किसान क्यो है इसका जवाब चुप्पी

कुछ साथ दे रहे हैं नेता बडे गबन पर

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 24 – आज  की नारी ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक अतिसुन्दर  आलेख   “आज  की नारी ”। 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 24 ☆

☆ लेख – आज  की नारी ☆

कविवर जयशंकर प्रसाद की रचना है –

” नारी तुम केवल श्रद्धा हो

विश्वास रजत नग पग तल में,

पीयूष स्रोत सी बहा करो

जीवन के सुंदर समतल में।”

यूं तो सबके जीवन में कोई ना कोई कहानी अवश्य ही होती है। किसी की लंबी, किसी की छोटी  कोई रोचक, भाव प्रद, तो कोई हृदयस्पर्शी। कोई बहुत ही आक्रमक, तो कोई आकर्षण से परिपूर्ण। कोई ममता से सरोकार तो कोई हृदय विहीन। परंतु यह सब भावनाएं, कहानियाँ जिसके आसपास होती हैं वो है नारी।

परमात्मा ने हमको इस मानवीय काया के रूप में जो अनुपम उपहार दिया है। उसकी तुलना किसी भी अन्य अनुदान से कर पाना संभव नहीं है। वो जीवन जिसे प्राप्त करने के लिए देवी-देवता भी लालायित रहते हैं वह है मनुष्य जीवन। मनुष्य जीवन के रूप में मिले अवसर को यदि सौभाग्य का नाम दिया जाए तो उसे ही नारी कहा जाता है।

*यत्र नारी पूज्यंते रमंते तत्र देवता*

अर्थात जहां नारी (सृष्टि) की पूजा होती है। वहां देवता अपने आप निवास करते हैं। और नारी की गरिमा को आज सहज ही स्वीकारा जाता है। धरती माता से लेकर भारत माता, मां गंगा से लेकर मां गायत्री देवी तक नारी शक्ति का ही चित्रण और पूजन होता है। यदि कोई जीवन चाहता है और इस पृथ्वी पर उसे आना है तो बिना मां (नारी) के कृपा पात्र के बिना यह संभव नहीं हो सकता है।

नारी भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ है। अपने प्राणों कि न्योछावर कर उन्होंने संपूर्ण सृष्टि में अपना स्थान देवी के रूप में स्थापित कर लिया है। तभी शास्त्रों में पूजनीय है। इतिहास साक्षी है जब-जब घोर संकट का सामना करना पड़ा है, नारी शक्ति ही सामने आकर उनका संहार करती है।जब-जब उनकी परीक्षा लेनी चाही तब-तब उन्होंने पुरुष बल को ही अपना हथियार बना लिया। याद करिए माता अनुसूया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने स्वयं ब्रह्मा  विष्णु और शिव जी आए। मां अनुसूया ने अपने पतिव्रत धर्म और अपने पति की ताकत का वास्ता देकर तीनों भगवान को बाल रूप में कर लिया था। और अपने धर्म का पालन किया था। नारी शक्ति संपूर्ण ब्रह्मांड को हिला सकती है। आज भारतीय समाज को ऐसे ही संकल्प की धनी नारी की आवश्यकता है। जिसके संकल्प बल से त्रिमूर्ति को झुकना पड़े।

नारी सृष्टि निर्माता की आदित्य रचना है। नारी के अभाव में सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह एक ऐसा छायादार वृक्ष है जिसकी छाया के अभाव में मनुष्य अपनी आशा- आकांक्षाओं के विषय में उदासीन ही रहेगा। प्रत्येक माता-पिता की इच्छा होती है कि उनके यहां संतान उत्पन्न हो। संतान के अभाव में परिवार अपूर्ण रहता है। जिस घर के आंगन में बच्चों की किलकारियां नहीं गूंजती, वह घर बिना सुगंधी के पुष्प के समान दिखाई देता है। यह संतान रूपी धन दो रूपों में प्राप्त होता है:-पुत्र  अथवा पुत्री। पहले हमेशा से देखा जाता रहा कि माता-पिता पुत्र की कामना करते थे। पर अब समय बदल गया है बेटा हो या बेटी माता पिता अपने बच्चे के लिए सुंदर स्वस्थ और स्वावलंबी जीवन की कामना करते हैं। पुराने समय से कुछ तो अंतर आ गया है। अब समाज में यह कहा जाने लगा कि “मेरी बेटी मेरा अभिमान” मेरा गर्व और क्यों ना हो वर्तमान स्वरूप में आज हम देख रहे हैं कि राजनीति के क्षेत्र में, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में, समाज सेवा के क्षेत्र में, हवाई सेवा से लेकर रेल सेवा और अन्य उद्योग धंधों के विकास में भी नारी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। किसी ने सच ही कहा है :-

 “एक कदम जो मेरा बढाओगे

दस कदम स्वयं आगे बढ़ा लूंगी मैं,

प्रोत्साहन व सहयोग जो दोगे

अंतरिक्ष कर दिखा दूंगी मैं”

अक्सर हमें ज्ञान मिलता है कि दो रूपों को जाना जाता है। (1)आकृति (2)प्रकृति। आकृति को समझना बड़ा ही आसान है कि बाहरी वातावरण, एक रूप, रंग, बनावट जिस की संरचना हो, इसी को आकृति कहते हैं। और जब प्रकृति कहा जाता है तब इसकी आंतरिक रचना जिसमें सारा सृष्टि समाया हुआ है और इसी सृष्टि का नाम ही *नारी* है, जिसके लिए स्वयं ब्रह्मदेव ने भी कहे हैं:-

 “देख जिसकी शक्ति को।

भयभीत होता दुष्ट दल हो।।

नारी तुम ही कल।

आज और कल हो।।

संगठन की शक्ति।

विचारों का मंथन हो।।

नारी तुम ही इस सृष्टि में।

नव पल्लव हो।।”

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – सप्तम अध्याय (23) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

सप्तम अध्याय

ज्ञान विज्ञान योग

( अन्य देवताओं की उपासना का विषय )

 

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌।

देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ।।23।।

 

अल्प बुद्धि जन का रहा,अस्थिर सा विश्वास

देव भक्त पाते देव को मेरे , मेरे पास।।23।।

 

भावार्थ :  परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।।23।।

 

Verily the reward (fruit) that accrues to those men of small intelligence is finite. The worshippers of the god go to them, but my devotees come to me.।।23।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – शैली ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  –  शैली 

…हरेक की अपनी विशिष्ट शैली होती है। आपकी अपनी दृष्टि में आपकी शैली की कौन सी विशेषता उसे अन्य शैलियों से अलग करती है?

…यह शैली ज़िंदगी के मर्सिया नहीं पढ़ती बल्कि मौत के सोहर गाती है।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(31.10.2013)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिंदी साहित्य – सफरनामा ☆ नर्मदा परिक्रमा – दूसरा चरण # 5 – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से ☆ – श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

(विगत सफरनामा -नर्मदा यात्रा प्रथम चरण  के अंतर्गत हमने  श्री सुरेश पटवा जी की कलम से हमने  ई-अभिव्यक्ति के पाठकों से साझा किया था। इस यात्रा की अगली कड़ी में हम श्री सुरेश पटवा  जी और उनके साथियों द्वारा भेजे  गए  ब्लॉग पोस्ट आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। इस श्रंखला में  आपने पढ़ा श्री पटवा जी की ही शैली में पवित्र नदी नर्मदा जी से जुड़ी हुई अनेक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और पौराणिक रोचक जानकारियाँ जिनसे आप संभवतः अनभिज्ञ  रहे होंगे।

इस बार हम एक नया प्रयोग  कर रहे हैं।  श्री सुरेश पटवा जी और उनके साथियों के द्वारा भेजे गए ब्लॉगपोस्ट आपसे साझा  करने का प्रयास कर रहे हैं। उनके सहयात्री  तथा गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित श्री अरुण कुमार डनायक जी द्वारा नर्मदा यात्रा संस्मरण उनके दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहे हैं। आज के ही अंक में उनके संस्मरण की दूसरी कड़ी प्रकाशित की गई है। निश्चित ही आपको नर्मदा यात्री मित्रों की कलम से अलग अलग दृष्टिकोण से की गई यात्रा अनुभव को आत्मसात करने का अवसर मिलेगा। इन पंक्तियों के लिखे जाते तक  यह यात्रा पूर्ण हो चुकी है। आज प्रस्तुत है नर्मदा यात्रा  द्वितीय चरण पर श्री सुरेश पटवा जी  के यात्रा संस्मरण की पांचवी एवं अंतिम कड़ी।  )  

ई-अभिव्यक्ति की और से वरिष्ठ नागरिक मित्र यात्री दल को नर्मदा परिक्रमा के दूसरे चरण की सफल यात्रा पूर्ण करने के लिए शुभकामनाएं। 

☆ सफरनामा – नर्मदा परिक्रमा – दूसरा चरण # 5  – श्री सुरेश पटवा जी की कलम से ☆ 

☆ झाँसी घाट से सतधारा घाट ☆
(104  किलोमीटर) 

नर्मदा अमरकण्टक से निकलकर डिंडोरी-मंडला से आगे बढ़कर पहाड़ों को छोड़कर दो पर्वत शृंखलाओं दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में कैमोर से आते विंध्य के पहाड़ों के समानांतर दस से बीस किलोमीटर की औसत दूरी बनाकर अरब सागर की तरफ़ कहीं उछलती-कूदती, कहीं गांभीर्यता लिए हुए, कहीं पसर के और कहीं-कहीं सिकुड़ कर बहती है। उसके अलौकिक सौंदर्य और आँचल में स्निग्ध जीवन के स्पंदन की अनुभूति के लिए पैदल यात्रा पर निकलना भाग्यशाली को नसीब होता है।

यह यात्रा वानप्रस्थ के द्वारा सभ्रांत मोह से मुक्ति का अभ्यास भी है। जिस नश्वर संसार को एक दिन अचानक या रोगग्रस्त होकर छोड़ना है क्यों न उस मोह को धीरे-धीरे प्रकृति के बीच छोड़ना सीख लें और नर्मदा के तटों पर बिखरे अद्भुत प्राकृतिक जीवन सौंदर्य का अवलोकन भी करें।

पीछे टाँगने वाले  हल्के बैग में एक जींस या पैंट के साथ फ़ुल बाहों की तीन शर्ट एक जोड़ी पजामा कुर्ता, एक शाल, तोलिया और अंडरवेयर, साबुन तेल रखकर कर चले। वैसे तो आश्रम और धर्मशालाओं में भोजन की व्यवस्था हो  जाती है फिर भी रास्ते में ज़रूरत के लिए समुचित मात्रा में खजूर, भूनी मूँगफली, भुना चना और ड्राई फ़्रूट, पानी की बोतल और एक स्टील लोटा के साथ एक छोटा चाक़ू भी रख उतर पड़े समर में।

कहीं कुछ न मिले तो परिक्रमा वासियों का मूलमंत्र “करतल भिक्षु-तरुतल वास” भी आज़माना जीवन का एक विलक्षण अनुभव रहा।

 

हम सभी परिक्रमा वासियों में जगमोहन अग्रवाल सबसे वरिष्ठ हैं, लेकिन वे सबसे ज़्यादा मज़बूती और जूझारूपन से यात्रा में भाग लेते हैं। उनके पैरों में तकलीफ़ है इसलिए घुटने ज़मीन पर टेककर पंद्रह किलो का भार खड़े हो पाते हैं। अन्य शारीरिक दिक़्क़तों के बावजूद वे निरंतर यात्रा करते रहे। उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि वे परेशानी में हैं, नर्मदा जी में उनकी उनकी आस्था प्रबल है। नरसिंहपुर जिले की गाड़रवाडा तहसील के कौंडिया ग्राम के मूल निवासी हैं। जहाँ कभी कौंड़िल्य ऋषि का आश्रम हुआ करता था। जीवंतता, जीवटता और जूझारूपन उनकी सबसे बड़ी पूँजी है।

नर्मदा परिक्रमा दुनिया की सबसे कठिन यात्राओं में से दुरुह यात्रा है। हिंदू हज़ारों सालों से इस यात्रा को करते आ रहे हैं। इस यात्रा के सामने डिस्कवरी चैनल की नक़ली साहसिक यात्राएँ कहीं नहीं लगतीं क्योंकि उनमें ड्रोन केमरा, सैटलायट इमेज, फ़ोटो ग्राफ़र दल और सपोर्ट के रूप में मेडिकल टीम वहाँ साथ चलते हैं, उनके पास बेहतरीन जीवन रक्षक दवाएँ और आकस्मिक जोखिम से निपटने के अस्त्र होते हैं।

नर्मदा यात्रा का कोई तैयार रास्ता नहीं होता क्योंकि प्रत्येक वर्ष नर्मदा के भीषण प्रवाह में सारे किनारे कट कर रास्तों को धो डालते हैं। नर्मदा तेज़ बहाव से कहीं किनारों को तोड़ डालती है, कहीं कँपा छोड़ जाती है, कहीं किसान कछारी खेतों को बखर कर पैदल चलना दूभर कर देते हैं, कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई के कारण कीचड़ से से सने खेतों में क़दम रखने से ऐडी तक पैर गंपते हैं, कहीं नुकीली धारदार पहाड़ी पर चलना ठीक वैसा ही है जैसे खड़ी दीवार पर छिपकली जैसे पैर जमाकर खिसकना, कहीं पहाड़ी नालों की गहराई को फिसल कर पार करना।

उस पर भोजन और ठहरने की व्यवस्था का कोई ठिकाना नहीं, ऐसी विषम परिस्थितियों में नौ दिनों में 104 किलोमीटर की पदयात्रा सारा अहंकार तोड़ कर रख देती है। इसके सामने यूथ होस्टल की ट्रैकिंग बच्चों का मन बहलाव है।

1,65,181 क़दम की यात्रा के दौरान जिन आश्रमों और उनके स्वामियों संचालकों के आश्रय और भोजन दिया वे साधुवाद के पात्र हैं।

 

© श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।)

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