हिन्दी साहित्य – कविता ☆ फिर, फिर, फिर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – फिर, फिर, फिर…!

☆ ॥ कविता॥ ☆

☆ फिर, फिर, फिर…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

फिर   बिसात   बिछाए हैं,

फिर    पियादे   बिठाए हैं,

फिर    ख्वाब     जगाए हैं,

फिर   चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  नगाड़े बजने लगे हैं,

फिर  योद्धा सजने लगे हैं,

फिर  शोले बरसने लगे हैं,

फिर  चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  परस्पर ठना ठनी है,

फिर  जंग में असि तनी है,

फिर  बीच कुर्सी ठगनी है,

फिर  चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  हार-जीत के दावे हैं,

फिर  धोखे हैं, बहकावे हैं,

फिर  दलदल बीच नावें हैं,

फिर   चुनावी दिन आए हैं…!

फिर  ढोल  पीटे जा रहे हैं,

फिर  वादे  किए जा रहे हैं,

फिर  सिर  झुके जा रहे हैं,

फिर   चुनावी दिन आए हैं…!

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – यौवन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – यौवन ? ?

वह परिभाषित

नहीं करती यौवन को,

यौवन उससे

परिभाषित होता है,

वह परिभाषा को

यौवन प्रदान करती है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७४ ⇒ किताब और कैलेंडर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “किताब और कैलेंडर।)

?अभी अभी # ९७४ ⇒ आलेख – किताब और कैलेंडर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

किताबें रोज छपती हैं, कैलेंडर हर वर्ष छपते हैं। किताब में क्या छपेगा, इसका निर्णय लेखक करता है, कैलेंडर में क्या छपेगा, इसका निर्णय समय करता है, इसीलिए किताब को कृति और कैलेंडर को काल निर्णय भी कहा जाता है। एक लेखक को लोग कम जानते हैं, लाला रामस्वरूप को कौन नहीं जानता।

मैं समय हूं। मेरे समय में किताब को पुस्तक कहा जाता था और टीचर को शिक्षक। टेक्स्ट बुक, पाठ्य पुस्तक कहलाती थी और lesson पाठ कहलाता था। सर और टीचर को अध्यापक और गुरु जी कहा जाता था और अटेंडेंस को हाजरी। जब क्लास में नहीं, कक्षा में हाजरी भरी जाती थी, तब छात्र यस सर अथवा प्रेजेंट सर नहीं, उपस्थित महोदय कहा करते थे।।

कैलेंडर की तरह हर वर्ष पाठ्य पुस्तकें भी बदली जाती थी। उधर कैलेंडर का साल बदलता, इधर हमारी कक्षा भी बदलती और पाठ्य पुस्तक भी।

किताबें पढ़कर और पढ़ लिखकर ही व्यक्ति पहले ज्ञान अर्जित करता है और फिर बाद में किसी किताब की रचना करता है। एक किताब की तुलना में एक कैलेंडर छापना अधिक आसान है। इसीलिए जो अधिक पढ़ लिख जाते हैं वे किताबें ही छापना पसंद करते हैं, कैलेंडर नहीं।।

हम भारतकुमार मनोजकुमार का उपकार नहीं भूलेंगे, जिसने कैलेंडर को एक नया अर्थ दिया और वह भी एक, इकतारे के साथ। हर साल कैलेंडर छाप दिया, और उसके बाद ? इकतारा बोले, सुन सुन, क्या कहे ये तुझसे, सुन सुन, सुन सुन सुन।

सृजन, सृजन होता है, चाहे फिर वह किसी कैलेंडर का हो, अथवा किसी पुस्तक का। उत्सव तो बनता है, कहीं सृजन की मेहनत कुछ महीनों की है, तो कहीं कई वर्षों की। प्यार के खत की तरह, किसी पुस्तक के सृजन में, किसी बालक के जन्म में, वक्त तो लगता है।।

जिन्हें गुरु नहीं मिलता, वे निगुरे कहलाते हैं, जिनकी संतान नहीं होती, वे निःसंतान कहलाते हैं लेकिन जो लेखक किसी पुस्तक का सृजन नहीं कर पाए, उसे आप क्या कहेंगे।

आप कैलेंडर छापें, ना छापें, एक पुस्तक अवश्य छापें, आप पर मां सरस्वती की कृपा हो।

जो खुशी एक मां को अपने बालक के जन्म पर होती है, वही खुशी किसी लेखक को अपनी पहली रचना प्रकाशित होने पर होती है। खुशी तो बनती है, एक विमोचन तो बनता है।।

हर साल कैलेंडर छपते हैं, लाखों करोड़ों किताबें छपती हैं, लेकिन समय का विधान देखिए, जब देश दुनिया की जनसंख्या बढ़ती है, तो हमें जनसंख्या नियंत्रण का खयाल आता है। लेकिन इसमें गलत कुछ भी नहीं।

जो गलत है, वह गलत है।

खूब किताबें छापो, खूब कैलेंडर छापो, खूब पैसा कमाओ, लेकिन जब कमाने वाले हाथों से खाने वाले हाथ बढ़ जाते हैं, तो गरीबी में आटा गीला हो ही जाता है। बच्चे दो ही अच्छे, लेकिन हां, मगर हों भी अच्छे।।

एक लेखक को भी अपनी रचना से उतना ही प्रेम होता है जितना मां बाप को अपनी औलाद से। पुत्र मोह तो महाराज दशरथ को भी था और महाराज धृतराष्ट्र को भी। कहां एक के चार और कहां एक के सौ। आजकल हमारे लेखक भी तेंदुलकर और विराट कोहली की तरह अपनी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या, रनों की तरह बढ़ा रहे हैं। कोई रन मशीन है तो कोई बुक मशीन। हाल ही में कुछ लेखक अपनी प्रकाशित पुस्तकों का अर्द्ध शतक तो मार ही चुके हैं। कुछ नर्वस नाइंटीज़ में अटके हैं, उनकी मां शारदे सेंचुरी पूरी करे।

आप कैलेंडर चाहे मोहन मीकिंस का लें, अथवा किंगफिशर का, एक लाइफ टाइम पंचांग से ही काम चला लें, हर साल नया कैलेंडर भी खरीदें, लेकिन कृपया खुद कैलेंडर ना छापें। अगर छापने का इतना ही शौक है, तो अपनी किताबें छापें, कोई बैन नहीं, कोई नियंत्रण नहीं।

और हां जो छाप रहे हैं, उनसे जलें नहीं। विमोचन तो पुस्तक के जन्म का अवसर होता है, उस पर बच्चा और जच्चा को आशीर्वाद दें, अनावश्यक कुढ़कर अपशुकन तो ना करें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१८ ☆ सरस्वती वंदना ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपके द्वारा रचित – सरस्वती वंदना )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१८ – साहित्य निकुंज ☆

🙏 सरस्वती वंदना 🙏 डॉ भावना शुक्ल ☆

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

तेरे चरणों में मैया मेरा माथा होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

श्वेत कमल पर तू राजे

कर में वीणा धार।

मधुर-मधुर स्वर निकले

प्यारी – सी झंकार।

मन मंदिर में आना होगा।

माँ सरस्वती तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

नाद से तेरे गूंजे जग सारा

चारों दिशी  फैले उजियारा।

ज्ञान सुधा का अमृत बरसता

जीवन रस  बरसाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

 *

 तेरी कृपा से मिलता  ज्ञान।

मन में सुमंगल गाते गान।

चरणों में तेरे शीश झुकाता।

भक्ति भाव का पुष्प चढ़ाता  ।

हर हृदय में प्रकाश फैलाना होगा।

माँ शारदे तुम्हें आना होगा।

ज्ञान सुधा बरसाना होगा।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # ९० – नवगीत – जीवन को वसंत करो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – जीवन को वसंत करो

? रचना संसार # ९० – गीत – जीवन को वसंत करो…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

पतझड़ से इस जीवन को तुम,

आकर कंत वसंत करो।

नीरस ,नीरव संप्रेषण को,

गुप्त ,निराला ,पंत करो।।

*

शब्द -शब्द  माणिक कर  दो तुम,

भरो प्रेम की गागर तुम।

गुंजित सारा जग हो जाए,

वंशी तुम नटनागर तुम।।

भाव  सुपावन गंगाजल कर,

लेखन को जीवंत करो।

*

श्वेता की वीणा बजती हो,

सात सुरों की सरगम हो।

अलंकार रस छंद  निराले,

नवल सृजन का उद्गम हो,

नव रस की रसधारा में तुम,

पीडाओं का अंत करो।

*

निष्ठाओं की डोर पकड़कर ,

तन -मन अर्पण करना है।

दिनकर -सा उजियारा करने ,

सार्थक चिंतन  करना है।।

जग -कल्याण भावना रखकर,

मन को सज्जन संत करो ।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #३०० ☆ गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०० ☆

गीत – बड़ो नटखट कृष्ण कन्हैया☆ श्री संतोष नेमा ☆

इत पकड़त वो उत झट धावें, हाथ बढ़ावें मैया

दधि-माखन की मटकी फोड़ें, खाबें खूब मलैया

*

प्रेम -जाल सखियों पै फेंके, बाँके बंशी बजैया

बालापन बहु असुर संहारे, हर्षित यशुमति मैया

*

भू मंडल मुँह खोल दिखाया, चकित भई तब मैया

बाल रूप “संतोष” सुहावे, चाहे प्रभु की छैयां

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २० – कविता – अभी बाकी है… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता अभी बाकी है।)

☆ शशि साहित्य # २० ☆

? कविता – अभी बाकी है…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

बहुत लुटाया है…

उससे ज्यादा बाकी है..

 

थाम कर हाथ चल दूं, खुद का,

राह अभी वह बाकी है..

 

आईने में देख खुद को,

मुस्कुरा सकूं,

सम्मान अभी वह बाकी है..

 

आसमान दामन में भर लूं,

अरमान अभी वह बाकी है..

 

जरा तौल लूं पंखों को,

उड़ान अभी तो बाकी है..

 

आवाज सुनकर थम जाऊं..

पुकार में अब क्या बाकी है????

 

भोर का सूरज चमक उठा,

ना अब अंधियारा बाकी है..

 

मन उम्मीदों से भरा हुआ है,

“उसको”  गुहार  सुनना पड़ेगी,

प्रार्थना दिल से जारी है..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ इशारा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  इशारा।)

? कविता – इशारा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(महाश्रृंगार छंद)

?

जिंदगी बदले रंग हजार,

तभी तो पाना मुश्किल पार l

इशारा देती है हर बार,

भटकते रहते हैं लाचार ll

नजर को पढना मुश्किल यार,

सत्य ही है सबका आधार l

झूठ तो कर्ता है लाचार,

सोच लो क्या होगा उपचार ll

*

इशारा करना अब तो छोड़,

सामने आकर मन से बोल l

हृदय की धड़कन कहती देख, प

कड़ कर मुझको आँखें खोल ll

प्रेम के देखो लाखों रंग,

तभी तो होती रहती जंग l

इसे जो समझे जाता हार,

निराले होते उसके ढंग ll

*

इशारा कर्ता है जब ईश,

नहीं देता है मानव ध्यान l

बाद में रोता प्रभु को कोस,

मिले जब कर्मो से अपमान ll

करो तुम सरल शील व्यवहार,

तभी होती है जस जयकार l

बने हम प्रकृति का आधार,

दिए हो यह अनुपम उपहार ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९० – विचारगाथा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९० – विजय साहित्य ?

☆ विचारगाथा…!

माणूस नाही,धर्मा करीता

धर्म पाहिजे, माणूसकीचा

गेले सांगून‌‌, बाबासाहेब

मार्ग दावीला, विश्व शांतीचा.

*

मानव मूल्ये, हवी एकता

भाव असावा,‌ विश्व‌बंधुता

संघर्ष न्यारा, मार्ग अनोखा

नको कुणाच्या,‌मनी कटूता.

*

शिका लढा नी, संघटीत व्हा 

शिका लोकहो, सुशिक्षीत व्हा

करा स्वतःला, पदवीधर

दिली प्रेरणा, संरक्षीत व्हा.

*

शिक्षण आहे, वाघीण माया

जाईल कैसे, पोषण वाया

हक्क माणसा, मिळवायाला

स्वावलंबनी, झिजवा काया.

*

लोकशाहीची, तंत्र प्रणाली

कसे जगावे, तत्व कळाली

जबाबदारी, कर्तव्ये‌ सारी

मानवतेच्या, पदी वळाली.

*

आत्म बलाने, वावरणारी

सक्षम व्हावी समाज नारी

माया ममता, शांती करूणा

बुद्धिनिष्ठता, जगता भारी.

*

नको कुणाची, साहू गुलामी

संविधान‌ ही, घटना नामी

वैज्ञानिकता, ध्येय ठेवूनी

रहा सुखाच्या, सदैव धामी.

*

महामानवी, विचार गाथा

आठवताना, झुकतो माथा

शब्द बोलती, भीमरायाचे

नका खाऊरे,‌ जुलमी लाथा.

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ नित्य युद्धाचा प्रसंग… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ नित्य युद्धाचा प्रसंग… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

छातीवरती तीर, मी

सहज झेलले होते.

प्रत्यंचा होउन धनुष्याची

ताण पेलले होते.

मी असा अद्भुत योद्धा

हरुन विजयी झालो.

युयुत्सु नसलो तरीही

युद्धास प्रत्ययी आलो.

नि:शस्त्र निहत्ता वीर

मी अहिंसेने लढलो.

झेलताझेलता वार

वीरगतीस प्राप्त झालो.

आम्हास नित्य युद्धाचा प्रसंग

उक्तीस शरण मी गेलो.

लढतालढता स्वत:शी

मग धारातिर्थी पडलो.

 

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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