हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२४ – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल)  

☆  चुभते तीर # १२४ – व्यंग्य  – चाय की पत्ती और सरकारी फाइल ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

गुप्ता जी के दफ़्तर की मेज़ पर एक फाइल पिछले तीन महीनों से इस तरह सोई हुई थी, जैसे इतवार की सुबह कोई अलार्म बजने के बाद तकिया ओढ़कर सोता है। उस फाइल का नाम था ‘जनहित याचिका 402’। गुप्ता जी चाय के बड़े शौकीन थे। उनके लिए चाय सिर्फ़ एक पेय पदार्थ नहीं थी, बल्कि काम टालने का सबसे पवित्र औजार थी। जब भी कोई फाइल उनके सामने आती, वे चाय का कुल्हड़ उठाते, एक लंबी सांस खींचते और कहते, “मामला गंभीर है, थोड़ा पकाने की जरूरत है।”

दफ़्तर के सभी लोगों को लगता था कि गुप्ता जी बड़े ईमानदार और फुर्तीले अफ़सर हैं, जो हर कागज़ की बारीकी में उतरते हैं। लेकिन सच्चाई यह थी कि गुप्ता जी को उस फाइल का ताला खोलने की चाबी, यानी फाइल के अंदर छिपा मुख्य पन्ना कभी मिला ही नहीं था। वह पन्ना गायब था। अगर यह बात बाहर आ जाती, तो गुप्ता जी की नौकरी की मलाई में मक्खी गिर जाती। इसलिए वे हर रोज़ फाइल पर एक नया नोट लिखकर उसे अलमारी के सबसे गहरे कोने में सरका देते थे।

एक दिन अचानक बड़े साहब का बुलावा आया। बड़े साहब का गुस्सा ऐसा था जैसे बिना अदरक वाली उबली हुई चाय, जो गले से नीचे उतरते ही मूड खराब कर दे। साहब ने मेज़ पर मुक्का मारा और कहा, “गुप्ता, जनहित याचिका 402 का फैसला आज शाम चार बजे तक मेरी मेज़ पर होना चाहिए। मंत्री जी खुद इस पर नज़र बनाए हुए हैं।”

गुप्ता जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उनके माथे पर पसीने की बूंदें ऐसे चमकने लगीं जैसे बारिश के बाद पत्तों पर ओस। फाइल खोली गई, लेकिन गायब पन्ना अब भी गायब था। दोपहर के तीन बज चुके थे। दफ़्तर की घड़ी की सुइयां गुप्ता जी की धड़कनों से शर्त लगा रही थीं। उन्होंने तुरंत अपने चपरासी रामदीन को आवाज़ लगाई, “रामदीन, एक कड़क चाय बनाओ। आज ज़िंदगी और मौत का सवाल है।”

रामदीन चाय का कुल्हड़ लेकर आया। गुप्ता जी ने कांपते हाथों से कुल्हड़ उठाया। जैसे ही उन्होंने पहला घूंट लिया, उन्हें चाय के नीचे कागज़ का एक छोटा सा टुकड़ा चिपका हुआ दिखाई दिया। वह टुकड़ा वही गायब पन्ना था, जिसे रामदीन ने महीनों पहले चाय के कुल्हड़ को मेज़ पर टिकाने के लिए फाइल के बीच से निकालकर ‘कोस्टर’ की तरह इस्तेमाल कर लिया था।

गुप्ता जी ने राहत की सांस ली और फाइल पूरी करके साहब की मेज़ पर रख दी। साहब ने फाइल देखी, मुस्कुराए और बोले, “मान गए गुप्ता जी, आपकी पारखी नज़र से कोई सच छिप नहीं सकता।”

पूरा दफ़्तर ताली बजाने लगा। गुप्ता जी ने मुस्कुराकर चाय का आखिरी घूंट पिया और मन ही मन कहा कि इस देश में फाइलें काम से नहीं, सही समय पर मिली चाय की पत्ती से आगे बढ़ती हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६८ ⇒ अट्टहास ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “अट्टहास ।)

?अभी अभी # १०६८ ⇒ आलेख – अट्टहास ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(HEE HAW )

हँसने के कई तरीके होते हैं। जब हँसी छूटती है, तब वह भीड़ की तरह दिशाहीन होती है। कहीं मंद मंद हँसी, तो कहीं हँसी के फव्वारे। कभी कभी तो भरे हुए बादलों की तरह हँसी फूट पड़ती है। आखिर हँसी में ऐसा क्या है, कि जब यह वेग में होती है, तो रोके नहीं रुकती।

हमारे अंदर गम और खुशी के गोदाम हैं, आप चाहें तो उन्हें गोडाउन भी कह सकते हैं। गोदाम अक्सर भरते रहते हैं, और खाली होते रहते हैं। आजकल इन्हें कोल्ड स्टोरेज भी कहा जाने लगा है। जब चीजों के दाम बढ़ते हैं, तब गोदाम भरे रहते हैं, और जब चीज़ों के दाम घटने लगते हैं, तो गोदाम खाली होते चले जाते हैं। गोदाम का भरना और खाली होना, वस्तुओं के दाम बढ़ने और घटने, से जुड़ा रहता है। दाम के अप और डाउन होने, अर्थात् घटने बढ़ने से गोडाउन की सेहत पर असर पड़ता है।।

हँसना सेहत के लिए अच्छा है। सेहत सुधारने के लिए आजकल लोग हेल्थ क्लब की तरह लाफ्टर क्लब भी जाने लग गए हैं। रोना तो इंसान जन्मजात लेकर आया है, लेकिन वह बड़ा होकर हँसना भूल गया है। हँसने की कोचिंग क्लास है लाफिंग क्लब, जहां हँसना सिखाया जाता है।

गम के गोदाम अक्सर भरे हुए ही रहते हैं और खुशी के खाली, क्योंकि गम के खरीददार कम होते हैं, और खुशी तो इंसान हर कीमत पर खरीदने को तैयार होता है। पहले खुशी खरीदने के लिए ढेर सारा पैसा लेकर बाजार जाना पड़ता था, आजकल खुशी भी ऑनलाइन पेमेंट पर अमेजान और फ्लिपकार्ट पर चढ़कर घर चली आती है। गम पर डिस्काउंट बढ़ता जा रहा है, पर कोई खरीद नहीं रहा। खुशी, लोग खुशी खुशी अपने घर ले जा रहे हैं।।

हँसना, खुशी जाहिर करने का पारंपरिक तरीका है। यूं तो हँसी के कई भेद हैं, लेकिन प्रमुख भेद पुरुष और स्त्री की हँसी का है। महिलाएँ, हँसती नहीं, खिलखिलाती हैं। लगता है, कहीं घंटियाँ बज रही हों।

चूड़ी की खनक और पायल की झंकार उनकी हँसी में शामिल होती है, क्योंकि ईश्वर ने उनके गले में सुर और स्वर दिया है।

पुरुष का स्वर खुरदुरा होता है क्योंकि रिश्ते में वे किसी के बाप लगते हैं। जितनी मोटी आवाज़, उतनी ही मर्दानी आवाज़ और ऊपर से हँसी के ठहाके। हा, हा, हि ही और हु हू की पूरी बारहखड़ी हं, ह:, ह : ह :। बिना कुछ कहे, कहकहे ही कहकहे के ऐसे फव्वारे छूटते हैं, कि लोग भीग जाने के अंदेशे से, चार कदम दूर ही खड़े रहते हैं।।

एक और धांसू हँसी होती है, जिसे अट्टहास कहते हैं। अट्टहास शब्द से ही ऐसा प्रतीत होता है, मानो अचानक कोई चट्टान की हँसी फूट पड़ी हो। हमारे धार्मिक सीरियल में अक्सर राक्षसों को हँसते हुए दिखाया जाता है। वह हँसी थमने का नाम ही नहीं लेती। हर एक दो डायलॉग के बाद फिर वही हँसी का टेप। आप इस हँसी को अट्टहास का परिहास भी कह सकते हैं, क्योंकि इस हँसी पर किसी को हँसी नहीं आती।

कभी कभी हँसते हँसते भी, आँखों में आँसू निकल आते हैं तो कभी रोते रोते भी हँसी निकल आती है। हँसना, रोना सहजता की निशानी है। किसी बात पर हँसना, किसी घटना पर हँसना अथवा परिस्थिति पर हँसना बुरा नहीं लेकिन किसी पर हँसना मना है। जो झरने की तरह फूटे, वह हँसी। फिर चाहे वह ठहाका हो, कहकहा हो, या फिर अट्टहास। लेकिन इस बात का जरूर रखें खयाल, कोई बीमार, दुखी, लाचार ना हो आसपास।।

खुशियों में शामिल हों, लोगों को अपनी खुशी में शामिल करें। गम के गोदाम खाली पड़े रहें, खुशियों को कैद ना करें, आज़ाद करें। सुना है खुशी बांटने से बढ़ती है और हँसी की फुहार भी तो रंगबिरंगी होली की फुहार ही होती है। जिस चेहरे पर हंसी ना,

वह काहे की हसीना। अब तो हँसी ना, हँसी ना …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३६ ☆ भिडले लोचन… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३६ ?

☆ भिडले लोचन… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

कसे अचानक जलधारांनी घिरले लोचन

आनंदाची वर्षा होता झरले लोचन

*

जे दिसले ते ह्या डोळ्यांना मृगजळ होते

फसवे पाणी फसवत होते फसले लोचन

*

चंद्र सूर्य अन् कुणीच साक्षी नव्हते तेव्हा

या प्रेमाचे केवळ साक्षी ठरले लोचन

*

मूक युद्ध हे दोघांमध्ये चालू होते

तेव्हा तेव्हा प्राणपणाने भिडले लोचन

*

दोघांचेही दुःख सारखे होते तरिही

तुझेच केवळ सहजपणाने रडले लोचन

*

डोळ्यांमधले सुख पाहू मी नाही शकलो

ओठांवरती ओठ ठेवता मिटले लोचन

*

शृंगाराची ती श्रीमंती उधळत गेली

असा अचानक धनाढ्य झालो हसले लोचन

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ आषाढ भेट… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ शब्द भाव... ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

(प्रमाणिकाः अक्षरगण-समवृत्त.)

जळात दिसता कुणी

गळास मासळी फणा

मनात भावना तशी

भ्रमात प्रेयसी विना.

ऋतूत श्रावणी क्षणा

स्मृतीत धारही घना

शब्दात काव्य जे ऋणी

प्रतिभ साधना प्रणा.

 *

क्वचित भासते कवण

नभास ग्रासते नयन

हव्यास मिलनी पवन

शब्दास लाभते प्रणय.

  

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सावध व्हा… ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

दीपा नारायण पुजारी

?विविधा ?

☆ सावध व्हा…  ☆ दीपा नारायण पुजारी ☆

रात्रीचे अकरा वाजत आले होते. शेजारच्या घरातील भजनसंध्या अजून सुरुच होती. भजनात रंगलेल्या त्या कुटुंबाला संध्यासमय उलटून निशाराणी अवतरली आहे हे कळलं नसावं. भक्तीरसात ते चिंबचिंब चिंबोरे झाले होते.

भक्तीरसात, शांतरस असतो हे त्यांना ठाऊक नसावं. गायनातला गोडवा संपला होता आणि त्या भगवंताला आपला आवाज ऐकू जावा म्हणून कंठघोष सुरू झाला होता. शेजारी दवाखाने आहेत. आजूबाजूच्या घरात वृद्ध, जेष्ठ लोक रहात आहेत. कुणी परिक्षार्थी, अभ्यास करण्याचा प्रयत्न करत असतील या गोष्टींचं भान त्यांना उरलं नसावं. देवाचं नाव घेताना, त्यानंच निर्माण केलेल्या या सृष्टीवर ते केवढा अन्याय करताहेत, हे कोणी, कसं पटवून द्यायचं बरं? सगळे उच्चविद्याविभूषित, कलासक्त,. त्यांच्या भक्तीत विघ्न कसं आणायचं?

हा भक्तीरस श्रवणीय, आनंददायी न राहता, ध्वनीप्रदूषणास कारणीभूत ठरतो. ध्वनीप्रदूषणाचे अनेक परिणाम होतात. डोकेदुखी, रक्तदाब वाढणं, डोळ्यांच्या बाहुल्या मोठ्या होणं आणि कायमचं कमी ऐकू येणं अर्थात बहिरेपणा. मोठ्या आवाजात बोललेलं ऐकण्याची सवय कायमसाठी लागू शकते. मग हळू आवाजात बोललेलं ऐकण्याची क्षमता कमी होते. एकाग्रता कमी होते. हा त्रास सगळ्यांना सोसावा लागतो. आवाज कमी ठेवा असं सांगावं तर, आम्ही आमच्या घरात गातोय आणि ते ही देवभक्तीपर अभंग. तुमच्या कानांना त्रास का होतो? अशा प्रकारची उत्तरं ऐकावी लागतात. केवळ कर्णबधीर नाही तर मनबधीर झालेल्या या लोकांना कसं समजवायचं? असो.

माझ्या झोपेचं मात्र या भजनानं पुरतं खोबरं केलं होतं. काणठळ्या बसवणारा आवाज कानावरुन हात बाजूला सारू देत नव्हता. अशा बेभान झालेल्या भक्तीरसात न्हालेले चिंबोरे गणेशोत्सवात भक्तीनं निथळून नाचताना दिसतातच नं आपल्याला. लग्नसमारंभ असो किंवा वाढदिवस, गौराईंचं आगमन असो किंवा निवडणूक जिंकल्याचा जल्लोष आपला आनंद व्यक्त करण्याची पद्धत कर्णकटू तर असतेच, पण सामाजिक शांतता बिघडवणारी असते. समाजात राहताना नीतीनियमांचं पालन न करणारे अनेक महाभाग दिसतात. ध्वनी प्रदूषण हा शब्द यांच्या शब्दकोशात नसावाच. कोणता कृष्ण, कोणता राम यांना प्रसन्न होत असेल? बिचारे देव सुद्धा कपाळावर आठ्या घालून, कान बंद करुन बसत असतील.

निसर्गाच्या साध्या सरळ नियमांना धाब्यावर बसवून चाललेल्या अशा कितीतरी कृतींना ही अवनी कंटाळली आहे. तिला आता हा आक्रोश सहन होत नाहीये. मोठ्या आवाजात, वेगानं, धुराड्यातून धूर सोडत पळणारी वाहनं, तिचं शरीर तुडवतात. आधुनिकीकरणाच्या नावाखाली, तिची हिरवी बाळं, मुळासकट उखडून टाकली जातात. ती तापलेल्या तप्त तव्यागत किती उसासे सोडत आहे. सजीवांना संजीवन देणारी ही अवनी, आपलं काम चोख बजावत आहे. तरीही वेगवेगळे संकेत देऊन ती तिच्यावर होणारा अन्याय सांगत असते. त्यातूनच जंगलात लागणारा वणवा, असह्य उष्मा, दुष्काळ, पाण्याचं दुर्भिक्ष्य अशा गोष्टींना आपल्याला सामोरं जावं लागतं. त्सुनामी, महापूर, भूकंप, ज्वालामुखी अशा उद्रेकाच्या रुपानं पृथ्वी तिचा राग व्यक्त करत असते. या वर्षी पावसानं दिलेली हुलकावणी याचंच लक्षण आहे.

आपण सावध व्हायला हवं. संकेत समजून घ्यायला हवेत. अन्यथा ही सर्जनशीलता गमावून बसलेली, रुष्ठ झालेली पृथ्वी, आग ओकणारा सूर्य, संतुलन बिघडलेलं निसर्गचक्र यांना तोंड देणं अवघड होऊन बसेल. आपल्या पुढच्या पिढीला तप्त दाह देणारं वाळवंट म्हणजे पृथ्वी अशी व्याख्या करावी लागेल. हरित अवनी म्हणजे काय असतं हे कळणं दुरापास्त होईल. हिरवे डोंगर, नदीनाले, सरोवरं, तलाव या गोष्टी चित्रात बघाव्या लागतील. हिरवे गालीचे अदृश्य होतील. पक्षांचा गोड किलबिलाट बंद होईल. सूर रुसून बसतील. संगीताचा वसंत हरवेल आणि फक्त ग्रीष्म राहील. म्हणूनच.. म्हणूनच सावध व्हा..

© दीपा नारायण पुजारी

इचलकरंजी

9665669148

deepapujari57@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/ सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अवघा रंग एक झाला… ☆ प्रणिता खंडकर ☆

प्रणिता प्रशांत खंडकर

? जीवनरंग ❤️

☆ अवघा रंग एक झाला… ☆ सुश्री प्रणिता खंडकर ☆

पार्लरची वेळ संपली होती. अपर्णा पर्स घेऊन निघण्याच्या तयारीत होती. पण सायली मात्र विचारात गढल्यासारखी खुर्चीवर बसून होती.

“सायली, चल निघूया ना? ” अपर्णा म्हणाली, तशी सायली पटकन आवरून उठली. दोघींनी शटर ओढून पार्लरला कुलूप घातलं आणि घरी निघाल्या आपापल्या वाटेने. सायलीच्या डोळ्यांपुढे तिचा भूतकाळ अवतरला होता.

पाच वर्षांपूर्वी तिचं आणि समीर’चं लग्न झालं. समीर एका सुप्रसिद्ध वाद्यवृंदात गिटारवादक होता. वाद्यवृंद खूपच जोरात चालला होता. एकामागून एक तारखा लागलेल्याच असायच्या. त्यामुळे समीरची कमाईही भरपूर होती.

सायलीनी बारावी झाल्यावर ब्युटी पार्लरचा कोर्स केला होता आणि नववधूच्या मेकअप’च्या ऑर्डर घ्यायला सुरूवात केली होती.

एका मध्यस्था मार्फत समीरचं स्थळ आलं आणि दोन महिन्यात लग्न झालं सुद्धा. दोघंही खुश होती एकमेकांवर. सगळं काही छान चाललं होतं. सासू-सासरेही जीव लावणारे होते. दीड वर्षानी त्यांच्या घरात विशालचं आगमन झालं. नातवाच्या कौतुकात आजी-आजोबा दंग झाले. सायली आणि समीरचाही तो लाडोबा होता.

डहाणूहून कार्यक्रम संपवून समीर आणि त्याचे साथीदार

ट्रॅक्सनी कल्याणला निघाले होते. शीळफाट्या’च्या अलीकडेच एका भरधाव येणाऱ्या ट्रकची धडक बसली त्यांच्या ट्रॅक्सला आणि तो भयंकर अपघात घडला. जागच्या जागीच सारा खेळ संपला होता. समीर आणि रवी त्याचा मित्र दोघेही जागीच. सायलीचं घर या प्रसंगामुळे पार कोलमडून गेलं. जाणारा निघून जातो, पण मागे राहिलेल्याला तर जगणं चालूच ठेवावं लागतं नां.

समीरचं थोडं फार सेव्हिंग होतं. सायलीचे सासरे शिक्षक होते. एक वर्षापूर्वीच ते निवृत्त झाले होते. त्यांना मिळणारं पेंशन घर चालवायला पुरेसं नव्हतं. सासूबाई गृहिणी. सायली जेमतेम पंचवीस वर्षाची आणि विशाल एक वर्षाचा.

सात-आठ महिन्यांनंतर सायली थोडी सावरली. तिचं माहेरही मध्यमवर्गीय. त्यामुळे आर्थिक मदतीची अपेक्षा करणं शक्यच नव्हतं. आई-वडील तिला ठाण्यात माहेरी येऊन रहायला म्हणत होते. पण तिला ते योग्य वाटलं नाही. तिने मग घरातच पार्लर सुरू केलं. सगळ्यांनाच थोडी गैरसोय होणार होती. पण आत्ता दुसरीकडे जागा घेणं परवडणारं नव्हतंच. शिवाय आजी घरात असली तरी विशालकडे’ही तिला लक्ष द्यायलाच हवं होतं.

हळू हळू तिचा जम बसला. एके ठिकाणी अपर्णाची भेट झाली आणि दोघींनी मिळून ही आत्ताची जागा भाड्याने घेतली पार्लरसाठी. जागा मुख्य बाजारपेठेत होती, त्यामुळे पार्लरचे ग्राहक खूपच वाढले होते.

सुधाताईंशी ओळख पार्लर मध्येच झाली. त्या बरेचदा यायच्या तिथे. सायली पार्लरमध्ये नसताना एकदा त्या फेशियल करायला आल्या होत्या. सहज बोलता बोलता अपर्णाने त्यांना सायली बद्दल सांगितले आणि नंतर एकदा त्या दोघींची ओळखही करून दिली.

त्यांना खूप वाईट वाटलं ऐकून, एवढ्या लहान वयात, असा प्रसंग, सायलीने परत लग्न करून संसार थाटावा, आनंदात आयुष्य घालवावं असं त्यांना मनापासून वाटलं.

त्यांच्या मुलाच्या मित्राची, विवेकची त्यांना आठवण झाली. विवेक तिशीचा, एका मल्टिनॅशनल कंपनीत अधिकारी होता. रंगाने सावळा असला तरी रूबाबदार वाटायचा. शिवाय स्वभावही दिलखुलास. दोन वर्षापूर्वी डेंग्यूचं निमित झालं आणि वैदेही, त्याची बायको, विवेक आणि दोन वर्षाची स्वरा यांना मागे ठेवून देवाघरी गेली.

विवेकचं आयुष्य’ही त्यामुळे भरकटलं होतं. नोकरी आणि स्वराचं संगोपन यात त्याची फरपट होत होती. हसणं-बोलणं जणू विसरूनच गेला होता तो, विवेकचे आई-वडील सध्या त्याच्याकडे येऊन राहिले होते. पण कायम इकडे राहणं त्यांना शक्य नव्हतं. गावाकडे घर आणि आंब्याची बागाईत होती, त्याची व्यवस्था कोण बघणार? भावनिक दृष्ट्या आणि शिक्षणाच्या दृष्टीने स्वराला कोकणात पाठवायची विवेकची तयारी नव्हती. विवेकला एक मोठी बहिण होती, ती लग्न होऊन रत्नागिरीला रहात होती.

सायली आणि विवेक तसे समदुःखीच. पण एकत्र आले तर दोघांच्या जीवनात आनंद निर्माण होईल आणि दोन्ही मुलांनादेखील आई-बाबा मिळतील. असा विचार करून सुधाताईंनी विवेकच्या आई-बाबांना सायलीबद्दल सुचवलं. ‘विवेक तयार असेल तर आम्हाला आनंदच आहे’, त्यांनी संमती दर्शविली. कधी स्वतः, तर कधी मुलामार्फत विवेकशी बोलून त्यांनी त्याला तयार केलं.

सायलीचंही मन वळवण्याचा खूप प्रयत्न केला. पण सासू-सासऱ्यांना सोडून, पुन्हा एकदा लग्न करायचा विचार तिला पटत नव्हता. शिवाय विशालचा ही प्रश्न होताच. अखेरीस सुधाताईंनी ‘त्यांच्याशी मला बोलू तरी दे एकदा’, म्हणून तिची परवानगी मिळवली. आज त्या तिच्या घरी जाणार होत्या.

सुधाताई, सहा वाजता सायलीच्या घरी पोहोचल्या. त्यांनी स्वतःची ओळख सांगून, मूळ विषयालाच हात घातला. सायलीच्या आयुष्याच्या दृष्टीने हे पटत असले तरी, नातवाला आपल्यापासून दूर करण्याचा विचार त्यांना सहन होण्यासारखा नव्हता. तरीही आपण यावर विचार करू, असं आश्वासन त्यांनी दिलं आणि सुधाताई तिथून निघाल्या. म्हणूनच सायलीला घरी जायचं टेंशन आलं होतं.

‘आज सुधाताईंच्या बोलण्यावर विभाताई आणि वसंतरावांची काय प्रतिक्रिया असेल? ‘ तिचं मन सैरभैर झालं होतं. काय झालं होतं. काय करावं हेच तिला कळत नव्हतं.

ती घरी पोहोचली तर घरातलं वातावरण तिला आज वेगळं वाटलं. एक प्रकारचा ताण जाणवत होता. ती मग विशालला घेऊन गॅलरीतल्या झोपाळ्यावर जाऊन बसली. दुपारची भाजी-आमटी शिल्लक होती. त्यामुळे स्वयंपाकाचं जास्त काम नव्हतं. संध्याकाळी चार भाकरी, विभाताईच करायच्या. बाकीचं ती करायची. आज जेवणंही जरा मुकाट्यानेच झाली.

सकाळी उठल्यावर चहा घेताना मात्र त्या दोघांनी तिला पुन्हा लग्न करण्याला त्यांची संमती असल्याचं सांगितलं. विशालला सोडून राहणं त्यांना खूप अवघड होईल हे सांगताना दोघांचे डोळे भरून आले होते. तरीही ‘तू जे ठरवशील त्याला आम्ही होकार देऊ. तुझं आयुष्यही सुखात जावं असं आम्हाला वाटतं’, असं म्हणून विभाताईंनी तिला प्रेमाने जवळ घेतले.

कोणताही निर्णय घेण्याआधी, सायली आणि विवेकची भेट होणं, एकमेकांचे विचार त्यांनी समजून घेणं हे देखील आवश्यक होतंच. मग सगळ्यांनी दुसर्‍या दिवशी विवेकच्या घरी भेटावं असं ठरलं.

विवेकचा फ्लॅट पाच खोल्यांचा, म्हणजे तसा मोठा होता. त्यामुळे मोठ्यांना एका खोलीत आणि विवेक – सायलीला दुसऱ्या खोलीत बसून मोकळे पणाने बोलणं शक्य होणार होतं. मुलांनाही हाॅलमध्ये खेळायला जागा होतीच.

एकमेकांशी बोलून थोडं सैलावल्यावर, सायलीने तिच्या सासू-सासऱ्यांचं मतही विवेकला सांगितलं. विवेकला सायली आणि तिचं एकूण वागणं-बोलणं आवडलं होतं. सायलीच्या मनात काय आहे, ते मात्र त्याला कळत नव्हतं.

“तुझा काय विचार आहे सायली? हवं तर थोडा वेळ घे अजून आणि मग ठरव” विवेकने तिला आपला होकार देत सुचवले.

ते दोघं बाहेर आले तर स्वरा आणि विशालची छान गट्टी जमली होती. ती दादा-दादा करत त्याच्या मागे पळत होती आणि तोही तिच्याशी छान खेळत होता. वडील मंडळींच्याही दुसर्‍या खोलीत गप्पा रंगल्या होत्या. या दोघांना आलेलं पाहून त्यात खंड पडला. विवेकचा चेहरा काहीसा ठाम निर्णय घेतल्यासारखा तर सायली मात्र जरा संभ्रमात वाटत होती. तिचा निर्णय अजून होत नव्हता.

विवेक सायलीला म्हणाला, “साॅरी, पण तुला माझी एक अट सांगायची राहिलीच. “

‘कोणती? ‘, सायलीच्या चेहऱ्यावर अजूनच गोंधळल्याचा भाव.

‘जर विशालचे आजी-आजोबा स्वरालाही नात मानून आपल्याबरोबर रहायला तयार असतील, तरच मी तयार आहे लग्नाला. ‘

सायलीचा चेहरा एकदम खुलला होता आणि ती मोठ्या अपेक्षेने आपल्या सासू-सासऱ्यांकडे पहात होती. ती दोघंही चकित होऊन विवेककडे पहात होती. विवेकच्या आई-बाबांचीही या गोष्टीला संमती होती. ती दोघं अधून-मधून येणार होतीच. पण मुलांना आजी-आजोबांचा सहवास रोजच मिळावा, हे त्यांनाही हवे होते.

हो – ना करता करता, वसंतराव आणि विभाताई, नातवंडांच्या प्रेमासाठी या गोष्टीला तयार झाले. विशाल आणि स्वरा टाळ्या पिटत नाचायलाच लागले. सायली आणि विवेक एकमेकांचा चेहेरा वाचण्यात रंगून गेले.

© प्रणिता खंडकर

संपर्क – सध्या वास्तव्य… डोंबिवली, जि. ठाणे.

ईमेल pranitakhandkar@gmail.com केवळ वाॅटसप संपर्क.. 98334 79845.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “आबई” ☆ श्री अशोक ल. देशपांडे ☆

श्री अशोक ल. देशपांडे

? मनमंजुषेतून ?

☆ “आबई” ☆ श्री अशोक ल. देशपांडे ☆

जन्मांध आबई ही गावकऱ्यांची आधार होती आदिवासी समाजाची प्रनिनिधी. एकटीच. नाही म्ह‌णायला मुंगशी नावाची एक गोरीभराड बहिण, तीचा नवरा दगड्या व त्यांचं एक अपत्य ‘ मानीक ‘ हा आबईचा गणगोताधार होता. सबंध उमरी गावं आबई‌ची काळजी वहात होता.

आबईच्या हातात काठीचा आधार फार उशीरा आला. मारोतीच्या पारासमोर एका खोपटात ती एकटी रहात होती. समोरच असलेल्या बिन-खिराडीच्या (चाकाच्या) विहीरीवर ही रात्री सुद्धा बिनदिक्कत पाणी भरायची. स्वतःची भाजी भाकर स्वतःच करायची.

दळण कांडण हा तीचा मुख्य धर्म होता. त्याची मजुरी हीच तीची मिळकत. ही मजुरी पैशाच्या तसेच वस्तुरुपानं तर कधी भाजी भाकर तर चहा अशा अनेक स्वरुपात असायची. अर्थात ‘चहा’ हा काही मजुरीचा भाग नसायचा तसेच तीला खाऊ घालणं हे देखील मजुरी म्हणून नसायचे. अर्थात उमरी गावानं तीला सांभाळून घ्यावं हीच तीची अपेक्षा नव्हे पण भावना असावी.

त्यावेळी गावाल चक्की (पीठाची गिरणी) नुकतीच सुरु झाली होती. त्यापूर्वीपासून व चक्की सुरु झाली तरी आबईच्या पाठचे दळण कांडण काही सुटले नाही. सपीट, ज्वारीच्या कण्या, बाजरीच्या कण्या, बेसन (चून), भाजलेले तांदूळ, भरडा, उडीद – मुगाच्या डाळी दळून भरडून देणे.

या अव्याहत कामानं आबईचे हात सतत गुंतलेले असत. आज काय पाटलीनबाई कडे तर उद्या काय पांडेबुवाकडलं तर परवा काय महादूमाळया कडलं असा तीचा संचार असायचा. दुपार झाली की कामाच्याच ठिकाणी तीची थोडी विश्रांती असायची. दुपारचा चहा झाला की परत जात्याची घरघर, खलबत्याचा खणखणाट, तर कधी उखळातील मुसळासोबतची धपधप. घरच्या मिरच्याचं तीखट व विकतच्या हळकुंडा ची हळद हा ही प्रकार तीच्या नित्यकर्माचा भाग होता. अर्थात हे प्रकार वर्षातून एकदा किंवा दोनदा होत असत.

आबई ने लुगडं कधी विकत घेतलं नसावं. पाटील पांडे बुवा कडील बायकांची जुनेरं तीच्या कामी येत असत.

काळा म्हणता येईल असा वर्ण, आठवड्यातून किंवा महिन्यातून एकदा कधी तरी डोक्याला लागलेले खोबरेल तेल, अंध असल्याने तीक्ष्ण असेलेले कान, गावातील प्रत्येकाच्या आवाजावरून माणूस ओळखण्याची प्रचंड क्षमता, अंगावर जुनेर, डोक्यावरून नीट पदर घेतलेली, गावचे तीन चारच रस्त्ये पाठ असलेली, कुणाचाही आधार न घेता कामाच्या ठीकाणी पोहचणारी, गावाच्या कुत्र्याच्याही ओळखीची असलेली आबई-हळूवार पायाने गंतव्य स्थानी सुखरूप पोहचणारी व दिवेलागणीच्या ठीक आधी परत एकटीच आपल्या झोपडीत विसावणारी अशी विलक्षण, सर्वांच्या जीवनाची अविभाज्य भाग असलेली.

आम्ही पोरं तिच्या समोर उभे राहून “मला ओळखलं का व आबये’ असं मुद्दाम विचारित असू “.. आम्ही वर्षभर यवतमाळला शिक्षणाकरीता रहात असू, सुट्यात घरी आलो की कुतुहलाने हा प्रश्न आबईला हटकून विचारित असू. ती लगेच म्हणायची ” मले का म्हाईत न्हाई काय रे असोक ” तसेच विलास ला सुद्धा. माहेरपणाला आलेल्या पोरींचा आवाज ऐकला की ” सुमनबाई कवा आली? ” ‘ईमलबाई कवा आली ” असं म्हणायची.

सतत कष्टरत असलेल्या आबईला “पांडुरंग प्रिय होता. पण अंध, असहाय्य अशा तीला पंढरपूरची ओढ लागून काय उपयोग होता? तीला ती यात्रा व दर्शन कोण घडविणार? पण नित्यनेमाने पंढरपूर यात्रा करणारे, सात्वीक प्रकृतीचे, अत्यंत साधे भोळे असे आमच्याच गावचे “महादू माळी ‘’, ह्यांनी ही जबाबदारी आपल्या शिरावर घेतली व इतरही गावकऱ्यांना सोबत घेऊन एकदा आबईला विठ्ठलाचे दर्शन घडवून आणले.

आबई ने हातातील हार पांडुरंगाकडे दूरुनच फेकला व आश्चर्य असे की तो हार पांडूरंगाच्या गळ्यातच पडला. आबईला महादजी म्हणाले, “बरुबर पडला व माय तुहा हार पांडूरंगाच्या गळ्यात “.

आबई, कृतकृत्य झाली. जे कधीही घडणे संभव नव्हते ते घडले होते. आबईचा चेहरा शेवटपर्यंत ह्या दर्शनाने प्रसन्नच होता.

– — – हाच उजळ चेहरा घेऊन आबई आपल्या गावी परतली होती.

© श्री अशोक ल. देशपांडे

अमरावती

मो. 92257 05884

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ जग सुंदर करणारे अनामिक देवदूत – – – लेखक : श्री विशाल अडे ☆ प्रस्तुती – अंजली दिलीप गोखले ☆

अंजली दिलीप गोखले

? मनमंजुषेतून ?  

☆ जग सुंदर करणारे अनामिक देवदूत – – – लेखक : श्री विशाल अडे ☆ प्रस्तुती –  अंजली दिलीप गोखले ☆

भर पावसात भिजत उभ्या असलेल्या तरूणास विचारले,

“नुसताच भिजतो कश्याला? “

तो उत्तरला “नही साब”..

त्याच्या डाव्या बाजूला जमिनीकडे बोट दाखवतं तो म्हणाला,

“इधर निचे बडा मेन होल का गार है. ढक्कन निकल गयेला है”

तो त्या मॅनहोलमध्ये कोणी पडू नये, म्हणून तिथे ऊभा होता?

रस्त्याखालचे मेनहोल भरले असावे, अन्यथा पाणी चक्राकार आत घुसताना दिसले असते.

फुटभर उंचीचे पाणी वरून वेगाने जात होते.

पायी चालणाऱ्याला वा दुचाकीवरून जाणाऱ्या कोणाला जाणवलेही नसते, की खाली खोल सांडपाण्याचे मेनहोल आहे?

मी अवाक झालो?

कोण होता हा?

कोणासाठी हा असा पाण्यात उभा राहिलायं?

मी भर पावसात खाली उतरलो.

त्याला म्हटले,

“बहोत बढिया, भाई?”

तो फक्त कसनूसं हसला आणि म्हणाला,

“बस, कोई गिरना नै मंगता इधर”

“कबसे खडा है? “

“दो बजे से”

घड्याळात पाच वाजले होते..?

३ तास तसेचं ऊभे राहून याला भूक लागली असणारं.

दुर्दैवाने माझ्याकडे काहीच नव्हते.

सगळी दुकानेही बंद.

हा भूक लागल्यामुळे जागा सोडेल, असे काहीच चिन्ह नव्हते?

कुठल्या प्रेरणेने तो हे करतं होता?

त्या घाण गुडघाभर ऊंचीच्या पाण्यात उभे राहून तो तीन तासांपासून कोणाला वाचवतं होता?

आणि का?

दोन वाजल्यापासून त्याने कित्येक जणांना वाचवले असणार.

कोणाला त्याची जाणीवही नव्हती, नसेल.

खुद्द याला तरी त्याची कुठे पर्वा होती?

*ही अशी छोटी छोटी माणसें हे जग सुंदर करून जातात?*

मागच्या डिसेंबरमध्ये दादरला फुटपाथवर एक आंधळा म्हातारा ‘कालनिर्णय’ विकतं बसलेला दिसला.

दुकानातून घेण्याऐवजी, याच्याकडून घेतलेले काय वाईट, असा विचार करून थबकलो.

“केवढ्याला ‘कालनिर्णय’, काका? “

“फक्त बत्तीस रूपये, साहेब”

केविलवाणे तो म्हणाला.

सकाळपासून एकही विकले गेलेले दिसत नव्हते.

मी एक घेतले.

पन्नासची नोट होती. ती त्याला दिली.

हाताने चाचपडत तो ती नोट तपासतच होता, तेवढ्यात अचानक उंची कपडे घातलेला साठीतला एक देखणा गृहस्थ खाली वाकला.

“कितने का है ये? “

“बत्तीस रुपया”

“कितने है? “

“चौदा रहेंगे, साब”

ज्याला मराठी येतं नाही, असा हा माणूस मराठीतले कालनिर्णय कशासाठी विकत घेतोयं?

त्या माणसाने खिशातून साडेचारशे रुपये काढून त्याला दिले आणि ते सगळे कालनिर्णय बखोटीला मारले?

मी आश्चर्यचकित..?

छापील किंमतीत विकत घेतोय, म्हणजे पुनर्विक्रीसाठी निश्चितच घेत नाहीये.

तसाही, कपड्यांवरूनही हा असले किरकोळ धंदा करणाऱ्यातला वाटतं नव्हता.

तो गृहस्थ थोडा पुढे गेला असेल.

मला राहवलेचं नाही.

मी थांबवून त्यांना विचारलेच?

हे मुळचें लखनौचे महोदय.

एअरइंडियातल्या मोठ्या पदावरून नुकतेचं निवृत्त झाले होते.

शिवाजीपार्कात स्वत:चे घर होते.

एकुलता एक मुलगा अमेरिकेत स्थायिक झाला होता.

लठ्ठ पेन्शन येत होती.

“वो बेचारा पंधरा कालनिर्णय बेचके कितना कमाता होगा?

सौ, डेढसौ?

वैसे भी बेचारे को सौ रुपये के लिए दिनभरं ऐसेही धुप मे बैठना पडता था.

मैने ऊसका काम थोडा हलका करं दिया.

बस इतनाही?”

मला काही बोलणेचं सुचले नाही?

पण एवढ्या चौदा कालनिर्णयांचे तो करणारं काय होता?

“सोसायटी मे बहोत मराठी फ्रेंडस है, उन को बांट दूंगा?”

मी दिग्मूढ?

“तु एक मिनीट लेट आता, तो तुझे भी फोकट मे देता?”

मला डोळा मारतं, हसतं तो लखनवी देवदूत रस्ता पार करून गेला सुद्धा?

*माणूसकी याहून काय वेगळी असते? *

एखाद्या हॉस्पिटलबाहेर ‘तात्काळ रक्त हवे’ असा फलक वाचून, ऑफिसला वा घरात जायला ऊशीर होईल, याची तमा न बाळगतां रक्त देणारे कोण असतात?

ते ही रांग लावून?

कोण असतात हे?

कुठल्या जातीचे?

कोणत्या धर्माचे?

‘भैये’ असतात की ‘आपले’ मराठी?

हिन्दू की मुसलमान?

मुंबईत रस्त्यावर चहा विकणारे लाखो ‘चायवाले’ आहेत.

सकाळी चहा बनवल्यावर पहिला कपभरं चहा ते रस्त्यावर फेकतात.

दिवसाचा पहिला चहा रस्त्यावर न फेकता भिकाऱ्याला पाजणारा बांद्र्याचा एक ‘चायवाला’ मला माहिती आहे?

सकाळी सकाळी भिकारी आलाचं नाही, तर एका भांड्यात तेवढा चहा बाजूला काढून, धंद्याला सुरूवात करतो?

“बरकत आती है” एवढीचं कारणमिमांसा त्याने दिली होती.

डोळे ऊघडून पाहिले, तर असे असंख्य अज्ञात देवदूत आपल्याला ठायीठायी आढळतात, पण आपली नजरचं मेलेली असते.

काही दिवसांपूर्वी थायलंडमध्ये गुहेत अडकलेल्या मुलांना बाहेर काढण्यासाठी हजारो अनामिक हात मदतीस आले.

गुहेतले पाणी पंपाने बाहेर काढावे लागले.

ते पाणी कुठे फेकले?

बाजुच्या शेतजमिनीत.

ज्याच्या शेतातं ते पाणी फेकावे लागले, त्या शेतातलें तीन एकरातले ऊभे पिक या पाण्याने अक्षरशः वाहून गेले.

एका छोट्या शेतकऱ्यासाठी हे प्रचंड नुकसान?

एका पत्रकाराने त्या शेतकऱ्याला झालेल्या नुकसानीविषयी विचारले.

” नुकसानीचे काय एवढं?

मुले वाचली ना? पेरणी परतं करता येईल.

मुलांचे प्राण परतं आणता आले असते का? “

हे ऊत्तर ऐकूनचं डोळ्यात पाणी आले?

हे जग सुंदर आहे.

ते सुंदर करणारे अनामिक देवदूत आजही या जगात आहेत आणि राहतीलही.

फक्त तो तिरस्काराचा, आत्मकेंद्री स्वार्थाच्या काळ्या काचांचा गॉगल डोळ्यावरून काढला पाहिजे?

*”सोप्पं आहे. चला, जमवू या?”*

 

लेखक : विशाल अडे 

प्रस्तुती : अंजली दिलीप गोखले

मो ८४८२९३९०११

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ पर्यावरणाचे सदिच्छादूत : दिलीप आणि डॉ. सौ. पौर्णिमा कुलकर्णी- भाग – १ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

पर्यावरणाचे सदिच्छादूत : दिलीप आणि डॉ. सौ. पौर्णिमा कुलकर्णी– भाग – १ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

तुम्हाला का जगायचं हे जर कळले तर कसे जगायचं या प्रश्नाचे उत्तर आपोआप मिळत जाते. आणि जीवनाचं हे ध्येय ज्याला कळलं तो आपलं जीवन समृद्ध तर करतोच, पण इतरांचंही जीवन समृद्ध करण्यासाठी हातभार लावतो. अशाच एका ऋषितुल्य दाम्पत्याचा परिचय आज आपल्याला करून द्यायचा ठरवला आहे. त्यांचं नाव आहे दिलीप कुलकर्णी आणि डॉ सौ पौर्णिमा कुलकर्णी. एकमेकांना सर्वच बाबतीत अनुरूप आणि साथ देणारी ही जोडी. हे दोघंही पर्यावरणाचे सदिच्छा दूत आहेत असं म्हटलं तर अजिबात अतिशयोक्ती होणार नाही. साधी राहणी आणि उच्च विचारसरणी याचं मूर्तीमंत उदाहरण म्हणजे दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई. या दोघांची यु ट्यूबवरील वेध या सदरात डॉ आनंद नाडकर्णी यांनी घेतलेली मुलाखत मी पाहिली आणि त्यांची जीवनशैली, साधेपणा पाहून मी आश्चर्यचकित झालो. मग मी आंतरजालावरून आणखी माहिती घेतली. तीच साररूपाने तुमच्यापुढे ठेवतो आहे.

दिलीप कुलकर्णी म्हणजे एक मनमोकळा माणूस चेहऱ्यावर हास्य. मुक्तपणे वाढेल तशी वाढू दिलेली दाढी. अंगावर इस्तरी न केलेले परंतु स्वच्छ असे सुती कपडे. तेवढेच साधं स्वच्छ आणि पारदर्शक असं हे व्यक्तिमत्व? आधी ते पुण्यात टेल्कोमध्ये इंजिनिअर म्हणून कार्यरत होते. पण लवकरच त्यांच्या लक्षात आलं की आपण ही नोकरी फार काळ करू शकत नाही कारण आपण जीवन जगण्यासाठी जी तत्त्वं मनाशी ठरवली आहेत, ती यामुळे साध्य करता येणार नाही. सुखवस्तू आणि आरामदायी जीवनशैली प्रदान करणाऱ्या नोकरीमुळे येणारा सुखवस्तूपणा त्यांनी येऊ दिला नाही. किंबहुना तसे जगणे त्यांना मान्यच नव्हते. म्हणून त्यांनी उत्तम पगार आणि प्रतिष्ठा देणारी ही नोकरी सोडली आणि कन्याकुमारीच्या स्वामी विवेकानंद केंद्राशी स्वतःला जोडून घेतलं. काही वर्षे हे काम त्यांनी केलं. त्याबरोबरच ग्राहक चळवळ, ग्रामायन यासाठी काम करायला सुरुवात केली. काही काळ ‘ विवेक विचार ‘ या नियतकालिकाचं संपादन केलं. याच काळात त्यांची पौर्णिमाताईंशी ओळख झाली. पौर्णिमाताई या आयुर्वेदाच्या पदवीधर. दोघांचेही विचार आयुर्वेदाला आणि पर्यावरणाला पूरक असे होते. दोघांचे सूर जुळले आणि दोघांनी लग्न करून एकत्र आपल्या ध्येयासाठी कार्य करायचे ठरवले.

पौर्णिमाताईंच्या संसाराच्या कल्पना चारचौघींपेक्षा वेगळ्या होत्या. गाडी, बंगला, साड्या, दागिने या गोष्टीत त्यांचं मन रमणे शक्यच नव्हते. कमीतकमी गरजा ठेवणे, उपभोगाच्या वस्तूंवर नियंत्रण आणणे, ऊर्जेचा, नैसर्गिक साधनसंपत्तीचा कमीतकमी वापर करणे ही तत्वे त्यांनी मनाशी ठरवली होती.

१९९३ मध्ये दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई आपल्या मुलासह कोकणातील पंचनदी या गावी राहायला आले. त्या ठिकाणी त्यांच्या काही मित्रांनी एक प्रकल्प सुरु केला होता. दिलीपजींनी चार वर्षे त्या प्रकल्पाचे काम पाहिले. पण पुढे काही कारणामुळे तो प्रकल्प बंद पडला. त्यानंतर या दोघांनी १९९७ मध्ये रत्नागिरी जिल्ह्यातील दापोली तालुक्यात असलेल्या कुडावळे या गावी जाण्याचा निर्णय घेतला. तिथे त्यांनी १० गुंठे जमीन भाडेकराराने घेतली. दिलीपदादा, पौर्णिमाताई यांचा संसार या ठिकाणी सुरु झाला. दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई हे दोघंही खरे समाजशिक्षक. त्यांचं वाचन, चिंतन सतत सुरूच होतं. त्यातून त्यांच्या पर्यावरणविषयक जाणिवा अधिकाधिक समृद्ध होत होत्या. त्यातून जे विचारमंथन झालं त्यावरून दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई या निर्णयाला आले की लोकांना केवळ सल्ला देण्यापेक्षा आपण स्वतःच अशी पर्यावरणपूरक जीवनशैली जगण्याचा प्रयत्न करू या.

स्वतः पौर्णिमाताई या आयुर्वेदाच्या पदवीधर असल्याने आयुर्वेदिक औषधे, जीवनशैली त्यांना उत्तम प्रकारे परिचित होती. पण त्यांच्या असे लक्षात आले की लोकांना केवळ औषधे सांगण्यापेक्षा त्यांची जीवनशैली जर आयुर्वेदाच्या तत्वांशी मिळतीजुळती असेल तर त्याचा जास्त चांगला उपयोग होईल. त्यांना हेही लक्षात आलं की पर्यावरणस्नेही जीवनशैली आणि आयुर्वेदाची तत्वे यात कुठेही विसंवाद नाही. ते परस्पर पूरक आहेत. त्यामुळे आधी तसे वागून दाखवायचे आणि मगच लोकांना काही सांगायचे असे दोघांनी ठरवले.

कुडावळे ठिकाणी दिलीपजींनी त्यांना हवे तसं घर बांधलं. त्यांना पर्यावरणपूरक असं मातीचच घर हवे होतं. तस त्यांनी बांधून घेतलं. जमिनीचा तळही मातीचाच. ही जमीन शेणाने सारवायची. थोडी शेती, थोडं बागकाम करायचं असा त्यांचा दिनक्रम सुरु झाला. छोट्याशा कौलारू घरात शांत, सुखी आणि समाधानी जीवन जगण्याचा आनंद ते घेतात. पण केवळ शेती, बागकाम यातच त्यांना अडकून पडायचं नव्हतं. ‘ आधी केले मग सांगितले ‘ या उक्तीचा प्रत्यय या दोघांनी लोकांना आणून दिला. त्यांनी प्रबोधनात्मक लेखनाला सुरुवात केली. हळूहळू त्यांच्याकडे विचित्र नजरेने पाहणाऱ्या लोकांच्या नजरा कौतुकात बदलायला सुरुवात झाली. त्यांना व्याख्यानांची निमंत्रणे यायला लागली.

त्यातूनही त्यांना जनजागृतीचा एक मार्ग गवसला. हे सगळं सुरु असताना त्यांनी ‘ गतिमान संतुलन ‘ हे मासिक सुरु केलं. त्याशिवाय हसरे पर्यावरण, दैनंदिन पर्यावरण, निसर्गायण, विकसित भारत, बदलू या जीवनशैली, अणू विवेक, सम्यक विकास, बसू चरित्र, अहेड टू नेचर, वेगळ्या विकासाचे वाटाडे आदी पुस्तके लिहिली. याच कालावधीत त्यांना ‘ निसर्गायण ‘ शिबिराची कल्पना सुचली. पर्यावरणविषयक गोष्टी जाणून घेण्याची ज्यांना उत्सुकता आहे, ज्यांना पर्यावरणासाठी काहीतरी करावेसे वाटते अशांसाठी त्यांनी निवासी आणि अनिवासी शिबिरे सुरु केली.

दिलीपदादा आणि पौर्णिमाताई यांना असा प्रश्न जेव्हा विचारण्यात येतो की तुम्ही अशा प्रकारची जीवनशैली जगण्यासाठी मोठी किंमत मोजत आहात का? तेव्हा ते म्हणतात, ‘ किंमत तर शहरी लोकांना मोजावी लागते. ट्रॅफिक जाम, प्रदूषण, निरनिराळे आजार या रूपाने शहरी लोक ही किंमत मोजतात. आजकाल आपण खूप उपभोगवादी झालो आहोत. उपभोगामुळे अधिकाधिक वस्तूंची हाव वाढत जाते. त्यामुळे उत्पादन वाढवावे लागते. उत्पादन वाढले म्हणजे विकास झाला असे आपण समजतो. पण हा विकास पर्यावरणाची म्हणजे बाह्य आणि आपली आंतरिक हानी करतो. अधिक उत्पादन यावे म्हणून रासायनिक खते, कीटकनाशके आपण वापरतो. यामुळे जमिनीची आणि पर्यावरणाची हानी तर होतेच पण अन्नधान्य, फळे, भाजीपाला, पाणी इ. च्या माध्यमातून हे घातक पदार्थ आपल्या शरीरात जातात. त्यातून अनेक नवनवीन आजारांना आमंत्रण मिळते.

मग सगळ्यांनी त्यांच्यासारखं शहर सोडून खेड्यात राहायला जावं का? याचं उत्तर त्यांच्या दृष्टीनं ‘ नाही ‘ असं आहे. आपण शहरात राहूनही पर्यावरणस्नेही जीवन जगण्याचा प्रयत्न करू शकतो. आपल्या गरजा आणि उपभोगवादी प्रवृत्ती आपल्याला कमी आली पाहिजे. प्लास्टिक, कागद इ सारख्या वस्तूंचा अनावश्यक वापर टाळला पाहिजे. पाणी जपून वापरले पाहिजे.

– क्रमशः भाग पहिला 

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मोक्ष…  भाग – १ ☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

विभावरी कुलकर्णी

🌈 इंद्रधनुष्य 🌈

☆ मोक्ष…  भाग – १ ☆ विभावरी कुलकर्णी ☆

ओतूरच्या कपर्दिकेश्वराची भावयात्रा – – 

माणसाचा स्वभाव मोठा गमतीशीर असतो. कुणी जर म्हणाले, “चला, आज मी तुम्हाला एक छान गोष्ट सांगणार आहे, ” की माणसे अगदी मनापासून सावरून बसतात, कान टवकारतात आणि उत्सुक्तेने ऐकू लागतात. पण तेच जर कुणी म्हटले, “आज आपण जरा ज्ञान-माहिती किंवा एखादे तात्विक भाषण ऐकूया, ” की लगेच लोकांचा धीर सुटतो. पूर्वीच्या काळी अशा वेळी लोक सतरंजीचे दोरे काढत बसत असत. पण आजच्या आधुनिक आणि डिजिटल युगात सतरंजीच्या दोऱ्यांची जागा आपल्या हातातील मोबाईलच्या अंगठ्याने घेतली आहे. माहिती किंवा भाषण सुरू झाले की, अंगठा भरकन वर सरकतो आणि स्क्रीन स्क्रोल (Scroll) होते! म्हणूनच, हे कोणते शुष्क भाषण नाही; तर ही एका साध्या, निखळ आणि गमतीशीर भावयात्रेची रंजक कथा आहे.

आषाढ संपून जेव्हा श्रावण महिना सुरू होतो, तेव्हा निसर्गासोबतच माणसाचे मनही एका वेगळ्याच मांगल्याने न्हाऊन निघते. श्रावण म्हणजे सण, उत्सव, व्रतवैकल्ये आणि उपवास यांची एक अखंड पर्वणीच! मंदिरातून येणारा घंटानाद, धूपाचा सुगंध आणि वातावरणात असणारा एक सात्विक गारवा मनात वेगळाच उत्साह भरतो. त्यातही ‘श्रावणी सोमवार’ या दिवसाचे महत्त्व तर काही वेगळेच! वर्षभरात इतर वेळी फारसा देवधर्म न करणारी माणसेही श्रावणी सोमवारी आवर्जून उपवास करतात आणि महादेवाच्या दर्शनाला जातात.

आता हे सगळे वाचून तुम्हाला वाटले असेल, की मी नेहमीप्रमाणे श्रावण महिन्याचे अथवा महादेवाचे मोठे कौतुक सांगत बसणार आहे की काय? पण तसे अजिबात नाही हो! श्रावणाचे महत्त्व तर आपल्या सर्वांना बालपणापासून माहीतच आहे. आणि आपल्या महाराष्ट्रात तर गावोगावी, डोंगरदऱ्यांत शंकराची अथांग मंदिरे पसरलेली आहेत.

माझेही अगदी तसेच होते. दरवर्षी श्रावण महिना जवळ आला, की माझ्या आतला भाविक जागा व्हायचा. मग चालू व्हायची शोधमोहीम! ‘या श्रावणात नक्की कोणत्या शिवमंदिरात दर्शनाला जायचे? ‘ मग तशाच देवाची आवड असणाऱ्या मैत्रिणींना फोन करणे, प्लॅन आखणे हे माझे ठरलेले गणित.

मागच्या वर्षी असाच श्रावण महिना उजाडला आणि मैत्रिणींच्या ग्रुपमध्ये चर्चा सुरू झाली. अनेक मंदिरांची नावे समोर आली, पण शेवटी ओतूर येथील ‘कपर्दिकेश्वर’ मंदिरावर शिक्कामोर्तब झाले. ओतूरच्या कपर्दिकेश्वराचे वेगळेपण मी अगदी लहानपणापासून ऐकून होते. अगदी लहान असताना घरातील मोठ्या माणसांसोबत तिथे गेले होते, पण बालवयात घेतलेले ते दर्शन काळाच्या ओघात विस्मृतीत जमा झाले होते. म्हणूनच या श्रावणी सोमवारी कपर्दिकेश्वराच्याच दरबारी जायचे, असा पक्का बेत आखला गेला.

ज्या ठिकाणी आपण जातो, त्या जागेची थोडीफार पार्श्वभूमी आणि इतिहास आपल्याला माहीत असावा, हा माझा जुना नियम. म्हणून मी नेहमीप्रमाणे आपल्या ज्ञानी ‘गुगल बाबांना’ शरण गेले. गुगल बाबांनीही एका क्लिकवर कपर्दिकेश्वराचा सविस्तर आणि सचित्र इतिहास माझ्यासमोर उघडून ठेवला. ते वाचून मी अगदी अचंबित झाले!

ऐतिहासिक आणि सांस्कृतिक वारसा लाभलेल्या पुणे जिल्ह्यामध्ये अनेक पुरातन शिवमंदिरे आहेत. त्यातील काही मंदिरे तर शेकडो वर्षांची जुनी आहेत. पुणे शहराच्या उत्तरेला असणाऱ्या जुन्नर तालुक्यातील ओतूर नावाच्या शांत शहरामध्ये, मांडवी नदीच्या सुंदर तीरावर हे ‘कपर्दिकेश्वर मंदिर’ वसलेले आहे. या मंदिराला तब्बल ९०० वर्षांचा प्रदीर्घ आणि पावन इतिहास आहे! दरवर्षी श्रावण महिन्यातील प्रत्येक सोमवारी या ठिकाणी महादेवाचा मोठा उत्सव आणि भव्य यात्रा भरते.

पण या मंदिराचे सर्वात मोठे आश्चर्य आणि प्रमुख आकर्षण म्हणजे ‘तांदळापासून बनवलेली आणि एका लिंबावरती उभी असणारी शिवलिंगाची पिंडी! ‘

हो, अगदी बरोबर ऐकलेत तुम्ही! कोरड्या तांदळाचे दाणे जोडून बनवलेली ही अत्यंत नाजूक आणि अद्भुत पिंडी एका छोट्याशा लिंबावर संतुलित (Balance) करून उभी केली जाते. हे नयनरम्य रूप पाहण्यासाठी आणि महादेवाच्या कृपेचा वर्षाव अनुभवण्यासाठी प्रत्येक श्रावणी सोमवारी तिथे तब्बल एक लाखाहून अधिक भाविक हजेरी लावतात. यात्रेनिमित्त मंदिराच्या परिसरात कुस्त्यांचे भव्य फड रंगतात.

तसेच, या मंदिराला आणखी एक महान आध्यात्मिक परिमाण लाभले आहे. मंदिराच्या अगदी शेजारीच संत तुकाराम महाराजांचे गुरु श्री बाबाजी चैतन्य महाराज यांचे संजीवन समाधी मंदिर आहे. महाराष्ट्रातील प्रमुख तीन संजीवन समाधींपैकी ही एक मानली जाते. विशेष म्हणजे, ज्या मंत्राने संपूर्ण महाराष्ट्र वारकरी संप्रदायात दुमदुमून जातो, त्या ‘राम कृष्ण हरी‘ या जगप्रसिद्ध महामंत्राचे उगमस्थानही हेच पावन क्षेत्र आहे!

मंदिराचा अलौकिक इतिहास आणि नामकरण

गुगल बाबांनी मंदिराच्या स्थापनेची ही कथा अत्यंत रंजकपणे सांगितली होती. सन १२०० च्या शतकात श्री बाबाजी चैतन्य महाराज मांडवी नदीच्या तीरावर एकाग्र चित्ताने अनुष्ठानाला बसले होते. अनुष्ठान करत असताना त्यांनी भक्तीभावाने नदीकाठच्या वाळूचे एक शिवलिंग तयार केले. वाळूचे शिवलिंग बनवत असताना, त्या वाळूमध्ये महाराजांना अचानक एक छोटीशी ‘कवडी’ सापडली. आश्चर्य म्हणजे, जेव्हा त्यांनी ती कवडी निरखून पाहिली, तेव्हा त्या चिमुकल्या कवडीच्या पोटात त्यांना नैसर्गिक शिवलिंग आढळून आले!

संस्कृत भाषेमध्ये ‘कवडी’ला ‘कपर्दीक’ असे म्हटले जाते. याच कवडीत सापडलेल्या शिवलिंगावरून या मंदिराचे नाव ‘कपर्दिकेश्वर’ असे पडले. पुढे सन १२-१३ व्या शतकात या शिवलिंगाची रीतसर भव्य मंदिरामध्ये स्थापना करण्यात आली.

मंदिराचे भौगोलिक स्थान तर अप्रतिम आहे. चंद्राकार वळण घेणाऱ्या मांडवी नदीच्या तीरावर, हिरव्यागार निसर्गाच्या कुशीत हे पुरातन, भव्य दगडी मंदिर दिमाखाने उभे आहे. शिवलिंगाच्या स्थापनेच्या काळापासूनच येथील पुजाऱ्यांनी एक अनोखी परंपरा सुरू केली. श्रावणातील प्रत्येक सोमवारी शिवलिंगावर कोरड्या तांदळाची भव्य पिंडी बांधायची आणि ती एका लिंबावर तोलून धरायची! शतके उलटली, पिढ्या बदलल्या, पण ही तांदळाच्या पिंडीची अद्भुत परंपरा आजही तितक्याच श्रद्धेने आणि निष्ठेने सुरू आहे.

या मंदिरात वर्षभर अनेक सण उत्साहात साजरे होतात:

१. पवित्र श्रावण महिन्यातील सर्व सोमवार

२. महाशिवरात्रीचा उत्सव

३. त्रिपुरारी पौर्णिमा

४. बाबाजी चैतन्य महाराजांचा पावन समाधी सोहळा

ही सर्व माहिती वाचल्यानंतर माझ्या मनातील ओतूरला जाण्याची उत्कंठा हजार पटीने वाढली होती.

माझा असा वैयक्तिक विचार आहे, की ज्या ठिकाणी आपण दर्शनाला किंवा फिरायला जाणार असू, त्याची माहिती आधीच मिळवावी; आणि तिथे जाऊन आल्यावर मिळालेला आनंद आणि अनुभव इतरांना सांगावा.

त्यानुसार, ठरलेल्या श्रावणी सोमवारी आम्ही सर्व मैत्रिणी भल्या पहाटेच गाडी काढून ओतूरच्या दिशेने निघालो. मनात कपर्दिकेश्वराच्या दर्शनाची तीव्र ओढ होती, तांदळाची ती अद्भुत पिंडी डोळ्यांत साठवून घ्यायची होती आणि लहानपणी पाहिलेली ती जत्रा पुन्हा एकदा अनुभवायची होती. गाडीत जाताना आम्ही आपापसात गप्पा मारत होतो “आपण पहाटेच निघालोय, म्हणजे सकाळी लवकर पोहोचू. फार गर्दी नसेल. तासभरात दर्शन आटोपले की मग आजूबाजूला अजून कुठे कुठे फिरता येईल? ” आम्ही तर दुपारच्या नंतरचा प्लॅनही गाडीतच आखून टाकला होता.

पण आमचा खरा हेतू त्या ‘मोक्षदात्या’ कपर्दिकेश्वराचे दर्शन घेणे हाच होता.

सकाळी सकाळी आम्ही ओतूर येथे पोहोचलो. पण तिथे पोहोचताच आमचा पहिला अंदाज चुकला! मंदिराच्या २ किलोमीटर आधीच भव्य गाडी पार्किंगची व्यवस्था करण्यात आली होती. पुढे गाड्या नेण्यास सक्त मनाई होती. गाडी पार्क करून आम्ही बाहेर आलो, तर समोर अथांग जनसागर पसरला होता! पार्किंगपासून मंदिरापर्यंतचा तो २ किलोमीटरचा रस्ता म्हणजे एक भलीमोठी आणि रंगीबेरंगी जत्रा होती.

त्या जत्रेतील दुकाने पाहून कोणत्याही स्त्रीचे मन भुलून जावे, असा तो नजराणा होता! निरनिराळी चमकणारी ज्वेलरी, काचेच्या आणि धातूच्या बांगड्या, स्वयंपाकघरासाठी लागणारी नवनवीन भांडी, नक्षीदार पिशव्या, हेअर पिन्स, रंगीबेरंगी क्लिप्स… अगदी काय बघू आणि काय नको, अशी आमची अवस्था झाली होती. सोबतच विविध खाद्यपदार्थांचे आणि मिठाईचे खमंग स्टॉल्स सुटलेल्या वासाने आमची परीक्षा घेत होते.

पण आम्ही अगदी निग्रहाने, मनावर दगड ठेवून त्या सगळ्या मोहाकडे दुर्लक्ष केले. गर्दी इतकी अलोट होती, की एकमेकींचा हात सुटण्याची भीती होती. म्हणून आम्ही एकमेकींचे हात घट्ट धरून चालत होतो. मैत्रिणी एकमेकींना समजावत होत्या, “आधी दर्शन घेऊया. मग येताना निवांत खरेदी करू! ” कारण पुढे काय वाढून ठेवले आहे, याची आम्हा कोणालाच कल्पना नव्हती.

— क्रमशः भाग पहिला 

©  विभावरी कुलकर्णी

सांगवी, पुणे

मोबाईल नंबर – ८०८७८१०१९७

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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