(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…२।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९७ ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
और
जो प्रायमरी का मास्टर है
वो तो है और भी अधिक असहाय।
कोई धनी धोरी नहीं है उसका
उससे ज्यादा रुतबेदार होता है
सिपाही पुलिस का।
जाने उसकी किस्मत में
क्या बदा है,
आज वो गुरू नहीं
सिर्फ गधा है
जिसके ऊपर अनावश्यक
आदेशों और प्रतिबन्धों का
भारी बोझा लदा है।
वो जाता है स्कूल
तपती दोपहर में
या कि फिर तड़के।
थोड़ी सी जगह में बैठकर
उससे कोई दीक्षा नहीं लेता,
वो किसी को शिक्षा नहीं देता।
वो तो बढ़ाता है भीड़ को।
पढ़ाता है वो पचास लड़के।
और आगे चलकर
वही भीड़ नष्ट करने लगती है
प्रजातांत्रिक नीड़ को।
छूटता है स्कूल
तो लगता है जैसे
छूटा हो कोई खिरका,
कोई ठेका नहीं ले सकता क्या
इनकी फिकर का ?
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “ताप रहे हैं दुख अपने सब...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “ताप रहे हैं दुख अपने सब...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४८ ☆ दो किनारे…
लोग प्राय: कहते हैं कि हमारा / उनका / फलां का प्रेम नदी के दो किनारो की तरह है, जो साथ बहता तो है, समानांतर चलता तो है पर आपस में कभी मिल नहीं पाता। ध्यान देना, नदी के दो किनारे आपस में जुड़े होते हैं अपनी लहरों, अपने प्रवाह, अपने भीतर के बहाव अर्थात जलराशि के माध्यम से। कभी देखा तुमने कि एक किनारा पूर्व की ओर बढ़ रहा हो और दूसरा पश्चिम की ओर। वे आजीवन साथ चलते हैं, जलराशि उन्हें जोड़े रखती है, अंतर्भूत भावनाओं की तरह। दो तटों के बीच एक अनदेखा सेतु बना रहता है। एक किनारे यदि थपेड़े बढ़ते हैं तो दूसरा किनारा उसे संतुलित करने का प्रयास करता है। दूसरी ओर थपेड़े बढ़ते हैं तो पहला संतुलन की भूमिका में आ जाता है। आशंका, संभावना सबको मिलकर थाम लेते हैं दोनों किनारे।
भीतर तूफान के थपेड़े,
बाहर सैलानियों के फेरे,
आशंका-संभावना में
समन्वय साधे रखता है,
कितने अंतर्विरोधों को
हर तट थामे रखता है..!
इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि सच्चा प्रेम यही है। सच्चा प्रेम एक दूसरे का साथ निभाने में, एक दूसरे के प्रति मोहित रहने में, साथ चलने में है। कुछ हद तक विरह में है। ऐसा इसलिए कि मिलन के बाद होता है विकर्षण पर विरह में बना रहता है सदैव परस्पर आकर्षण।
ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि का वरदान दिया है। विचार करना कि दोनों किनारे यदि मिलकर एक हो जाएँ तो एक पतली-सी जलधारा तो होंगे पर नदी नहीं हो सकते। नदी का पाट किनारों के विस्तार का पाठ है।नदी किनारे बस्तियाँ बसती हैं, नदी किनारे सभ्यताएँ पनपती हैं। नदी में मछलियों का वास है, नदी में छोटे-बड़े जीव जंतुओं का अधिवास है। नदी जल का स्रोत है। जल के बिना जीवन की कल्पना नहीं हो सकती। कल्पना कीजिएगा, नदियाँ नहीं होतीं तो मनुष्य का जीवन कैसा होता? कल्पना को पीछे छोड़ता यथार्थ तो यह है कि नदी या जलस्रोत के अभाव में जीवन संभव भी नहीं होता।
और जीवन क्या है? दर्शन कहता है, जीवन अद्वैत का जागरण है। अद्वैत जीवन में प्रेम को जगाता है। और प्रेम का अर्थ केवल मिलन नहीं होता। यूँ मिलन किसे कहते हो तुम? पार्थिव मिलन ही यदि मिलन की परिभाषा होती तो फिर विरह का अस्तित्व कैसे होता? विरह में भी सूक्ष्म का मिलन तो समाहित है ही न! स्मरण रखना, प्रेम बहुआयामी होता है, एकांगी नहीं।
नदी के दो किनारे प्रेम के शाश्वत प्रतीक हैं। सच्चा प्रेम वही है जिसमें साथ चलें, समानांतर चलें, एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें। सृष्टि को कुछ दे सकें, जगत से जो पाया, उसका कुछ अंश लौटा सकें। जगत में प्रेम-संजीवनी बनकर बह सको, बिना किसी अपेक्षा के निरंतर चल सको तो जीवन कल-कल बहती सार्थकता में परिवर्तित हो जाता है। जीवन के किनारे रह जाना है या किनारा बनकर पाट का पाठ पढ़ना और पढ़ाना है, इसका निर्णय तुम्हें स्वयं करना है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.
His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.
His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.
Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.
Key Accolades and Works
Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.
Some precious moments of life
Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.
Today we present his satire The Paradox of Celebrity Activism.
☆ Witful Warmth# 102 ☆
☆ Satire ☆ The Paradox of Celebrity Activism… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆
There is nothing quite as inspiring as a multi-millionaire celebrity lecturing the public about carbon footprints while sitting in their private jet. During global crises, celebrities gather via video call to sing a pop song in their sprawling mansions, expecting their collective tone-deafness to cure poverty. They attend glamorous galas wearing dresses with political slogans written on them, posing for paparazzi before eating a five-course meal cooked by Michelin-star chefs. They deeply care about the plight of the common man, provided that the common man continues to buy their movie tickets and makeup lines. It is a beautiful, symbiotic relationship where they give us moral guidance, and we give them the attention they desperately need to survive.
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रुग्ण मानसिकता…!
☆ लघुकथा ☆ रुग्ण मानसिकता…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(आज के समय में दम तोड़ती हुई संवेदना से उपजी लघुकथा…!)
☆
रमिया जिन साहब के घर झाड़ू-पोंछे और बर्तन साफ़ करने का काम करती है। उनकी उम्र यही कोई अस्सी और मेम साहब की लगभग पचहत्तर की होगी। पति-पत्नी दोनों पढ़े-लिखे और सेवानिवृत्त हैं। बेटा और बेटी लक्ष्मी जी की कृपा से साधन-सम्पन्न हैं।
पिछले दिनों रमिया के साहब की आधी रात के लगभग अचानक साँस हलक में अटकने से पलक झपकते निधन हो गया। मेम साहब ने रमिया को मोबाइल लगाकर दुखद समाचार दिया कि साहब नहीं रहे हैं। वह भागी-भागी साहब के घर पहुँची और रात भर मेम साहब के आँसू पोंछती रही।
मेम साहब आँसू बहाते हुए बोली- ‘हाय राम! देख, तो री! रमिया… मेरे दाँए पड़ोसी को कैंसर और बाँए पड़ोसी को हार्ट की बीमारी है, बावजूद उनको कुछ नहीं हुआ और मेरे अच्छा-ख़ासा, खाता-पीता, चलता-फिरता आदमी मेरी आँखों के सामने चल बसा।
यह सुनकर कम पढ़ी-लिखी, पर समझदार रमिया ने अपना सर दीवार से ठोक लिया और सोचने लगी… क्या कथित शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग ऐसी रुग्ण मानसिकता के होते हैं जो अपनों की मौत पर बीमार पड़ोसियों के मरने की कामना करते हैं…!
☆ साहित्य भूषण महाकवि आचार्य भगवत दुबे व्यक्तित्व एवं कृतित्व – संपादक डा . संध्या जैन ‘श्रुति’ ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(एक साहित्यिक मूल्यांकन)
☆
संस्कारधानी जबलपुर की उर्वरा साहित्यिक धरा पर जिस कालजयी प्रतिभा का उदय हुआ, वे हैं महाकवि आचार्य भागवत दुबे। एक ऐसा रचनाकार, जिसका संपूर्ण जीवन साहित्य की आराधना और लोक-मंगल के समर्पण में व्यतीत हुआ। यह व्यक्तित्व मात्र एक कवि का नहीं, अपितु उन मानवीय संवेदनाओं के संवाहक का है, जो शब्दों के माध्यम से समाज को नई दिशा और दृष्टि प्रदान करता है।
डा . संध्या जैन ‘श्रुति’
आचार्य दुबे का कृतित्व अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है। हिंदी काव्य और गद्य की लगभग सभी विधाओं—गीत, नवगीत, दोहे, कुंडलियाँ, मुक्तक, गजल, बालगीत, हाइकू, कहानी और महाकाव्य—पर उनका समान अधिकार है।
पिछले कुछ दिनों पहले सुप्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रपति प्राप्त पुरस्कार शिक्षा विद डा. संध्या जैन श्रुति के कुशल और सफल संपादन में श्रद्धेय आचार्य जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर एक संग्रहणीय ग्रंथ का प्रकाशन किया गया। डा. संध्या जैन श्रुति एवं उनके संपादक मंडल के सुयोग्य सदस्यों श्री राजेश पाठक प्रवीण, डा.अभिजात कृष्ण त्रिपाठी, डा.डी .सी . जैन, श्री अशोक मनोध्या, डाअरुणा पांडेय, डा.श्याम मनोहर सिरोठिया, श्री मथुरा जैन उत्साही, श्री राजेन्द्र मिश्रा, श्री आशुतोष तिवारी, श्री सोहन परौहा सलिल, डा . अनिल कोरी, डा.मोहन तिवारी आनंद के महत्वपूर्ण मार्गदर्शन एवं सराहनीय प्रयासों से 404 पृष्ठों का यह शोध परक ग्रंथ आचार्य जी की साहित्य साधना पर आधारित साहित्य जगत की एक स्मरणीय और संग्रहणीय प्रस्तुति सिद्ध होगी ऐसी मेरी ही नहीं बल्कि साहित्यिक क्षेत्र के सुधी पाठक वर्ग की सार्थक सोच है।
राष्ट्रीय स्तर पर संस्कारधानी को गौरवान्वित करने वाले आचार्य भगवंत दुबे जी ने गद्य और पद्य दोनों ही में काफी लिखा है काफी अच्छा लिखा है और उनकी अभी तक शताधिक कृतियां प्रकाशित भी हो चुकी हैं और चर्चित भी।
आचार्य जी की सशक्त लेखनी से उपजी प्रत्येक पंक्ति आज साक्षात् अनुभूति का प्रमाण है। ‘दधीचि’ जैसा महाकाव्य उनके गंभीर चिंतन, सूक्ष्म शोध और निरंतर साधना का प्रतिफल है, जिसने उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य के मूर्धन्य हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित किया है। उनका साहित्य केवल बाह्य सृजन नहीं, अपितु अंतस की वह निस्पृह साधना है, जो प्रकृति के मोहक परिवेश और सामाजिक यथार्थ के बीच एक सेतु का कार्य करती है।
उनकी रचनाधर्मिता में राष्ट्रीय चेतना, मानवतावाद और लोक-सरोकारों का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है। वे बुंदेली जन-संस्कृति के वाहक हैं, जो लोक-भाषा की मिठास और भावों की गहराई को मानक हिंदी की गंभीरता के साथ पिरोने में सिद्धहस्त हैं। उनके साहित्य में व्याप्त ‘रस-शृंगार’ और ‘लोक-संवेदना’ का अनूठा मिश्रणu पाठक को मंत्रमुग्ध कर देता है। वे एक ऐसे ‘लोक-मंगल’ के कवि हैं, जिन्होंने जीवन के कटु सत्य और विसंगतियों पर प्रहार करते हुए भी सदैव मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा है।
आचार्य दुबे का साहित्य सृजन समय की वह उत्कृष्ट पहचान है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करेगी। उन्होंने केवल काल को शब्दों में नहीं बाँधा, बल्कि काल के प्रवाह में मानवता के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन भी किया है। यह कृतित्व उनकी उस विराट सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना निहित है। सरल, सौम्य और बहुभाषी व्यक्तित्व के धनी आचार्य जी का संपूर्ण जीवन ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का साक्षात उदाहरण है।
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “कहीं सूखा कहीं बाढ़ : देवराज क्यों कुपित”।)
झब्बूलाल ने पान लपेट कर मेरी ओर बढ़ाया और हमेशा की तरह मेरे सामने एक लंबा प्रश्न पटक दिया। भाई साहब, देवभूमि भारत में कदम-कदम पर देवालय हैं, जहां प्रति दिन शंख और घंटों की ध्वनि के बीच दिन भर ईश्वर की आराधना होती है, साधु-संतों, महंतों, जगत गुरुओं के प्रवचन होते हैं, देवी-देवताओं की शोभा यात्राएं निकलती हैं। लाउडस्पीकर लगा कर अखंड रामायण, भागवत पाठ, नर्मदा, शिव, विष्णु एवं गरुड़ पुराण होते हैं, भंडारे होते हैं, उस भारत भूमि वासियों से देवराज इंद्र के सम्मान में क्या गुस्ताख़ी हो गई जो इस वर्ष वे कहीं तो सिर्फ छिड़काव कर रहे हैं और कहीं बेहिसाब पानी उड़ेल रहे हैं ?
मैंने कहा, झब्बू भाई, मैं ऑफिस जाने के लिए घर से निकला हूं मुझे प्रश्नों के जाल में मत उलझाओ। वह बोला, भैया मैं कल से इस बारे में कई लोगों से पूंछ चुका हूं, किसी ने संतोषजनक समाधान नहीं किया। आप पत्रकार हैं कुछ तो बताएं। जब तक मैं आपके ऑफिस के लिए पानों की पुड़िया बनाता हूं। मैंने कहा, झब्बू भाई मैं पृथ्वी लोक का पत्रकार हूं। ट्रंप, पुतिन, मोदी, योगी, राहुल की प्रसन्नता, दुख और नाराजी की वजह बता सकता हूं देवलोक वासी इंद्र की नाराजी अथवा उनके मूड के बारे में जानने के लिए तो तुम्हें देवलोक के पत्रकार नारद जी से संपर्क करना होगा। यदि लोगों को ऐसा लग रहा है कि देवराज रुष्ठ हैं इसलिए वर्षा को प्रभावित कर रहे हैं तो उन्हें खुश करने का प्रयत्न करें।
झब्बू बोला, भाई साहब अखबारों में छप रहा है कि अच्छी वर्षा के लिए लोग जगह-जगह पूजा-पाठ, यज्ञ करवा रहे हैं। टोना टोटके भी हो रहे हैं, कहीं गधों को गुलाबजामुन खिलाए जा रहे हैं, कहीं मेंढक-मेंढकी के विवाह कराए जा रहे हैं, जमीन में उल्टे घड़े गड़ाए जा रहे हैं फिर भी इंद्र देव खुश नहीं हो रहे!
पान लगाते हुए झब्बू ने मेरी ओर नजर फेंकी और पुनः कहा, भाई साहब कहीं ऐसा तो नहीं कि दुश्मन देशों ने हमारे देश के खिलाफ इंद्र के कान भर दिए हों? मैंने कहा यह भी हो सकता भाई जी क्योंकि हमारे देश के कुछ नेता भारत को विश्व गुरु बनाने पर तुले हैं जबकि अनेक देश हमें गुरु नहीं मानना चाहते।
झब्बू बोला – भाई साहब, इंद्र देव की नाराजी के और क्या कारण हो सकते हैं ? मैंने झब्बू से पान की पुड़िया ली और कहा प्यारे भाई, जाने के पहले मुझसे इंद्र देव की नाराजी का सबसे बड़ा कारण सुन लो। झब्बू मेरी ओर झुका, मैंने धीरे से कहा – तुमने सुना होगा कि जब-जब भारत भूमि पर कोई धर्मनिष्ठ, तपस्वी, लोकप्रिय राजा हुआ है तब-तब इंद्रासन डोला है। इंद्र के मन में आशंका पैदा हुई है कि भारत का वह धर्मनिष्ठ राजा कहीं उनसे उनका सिंहासन न छीन ले, तो भाई शायद यही आशंका इस समय भी इंद्र के मन में समा गई है और संभवतः इंद्र देव इस कारण ही कुपित होकर वर्षा को अस्त्र बना कर भारत भूमि के शासक को अशक्त करके उससे अपनी गद्दी बचाना चाहते हैं। मेरी बात सुनकर झब्बूलाल की आँखें खुली रह गईं। मैंने उसे हतप्रभ छोड़ कर अपने स्कूटर में किक मारा और आगे बढ़ गया।
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सावन आ गया है…”।)