हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७५ – ग़ज़ल – हरिऔध  ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़ल – हरिऔध )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७५ ☆

☆ ग़ज़ल – हरिऔध ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

(अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध'(15 अप्रैल, 1865-16 मार्च, 1947) हिन्दी के कवि, निबन्धकार तथा सम्पादक थे।)

हिंदी माँ के पुत्र यशस्वी हैं हरिऔध।

देह मिट गई सृजन सनातन हैं हरिऔध।।

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प्रिय प्रवासकर रहे जहाँ है लोक जगत।

राधा-विरह लोक हित से जोड़ें हरिऔध।।

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कृष्ण न केवल व्यक्ति, समष्टि समाए हैं।

निज सुख का परित्याग निरंतर है हरिऔध।।

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वैदेही वनवासत्याग-तप की गाथा।

सहन शक्ति नारी की, गायक हैं हरिऔध।।

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मंत्र-तंत्र है प्रकृति-चित्रण अलबेला।

मातृभूमि की चरण वंदना हैं हरिऔध।।

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गौरव गान विरासत का संबल बनता।

शीश उठाकर जीने का परचम हरिऔध।।

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सत्य-अहिंसा-जनसेवा को लक्ष्य बना।

स्वतंत्रता सत्याग्रह विजय ध्वजा हरिऔध।।

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दृष्टि कलात्मक फूल अधखिलालोक जुड़ी।

निज भाषा सम्मान प्रवर्तक हैं हरिऔध।।

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ऐक्य भाव, समरसता, सत्याग्रह, जनहित

जन कल्याण, लोक सेवा राही हरिऔध।।

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सुरवाणी-जनवाणी का छांदस संगम।

ठाठ ठेठ हिन्दी काहै चोखा हरिऔध।।

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वर्ण वृत्त से सजे चौपदे चोखेहैं।

राष्ट्रवाद के सच्चे गायक हैं हरिऔध।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१०.४.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९७० ⇒ च ख ना ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “च ख ना ।)

?अभी अभी # ९७० ⇒ आलेख – च ख ना ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मुख हमारे शरीर का प्रवेश द्वार है। आप इसे सिक्योरिटी चेक भी कह सकते हैं। बत्तीस दांतों के बीच एक जीभ है जो शरीर रूपी नगरी में प्रवेश के पूर्व मीठे शब्दों से आगत का स्वागत करती है। उसके स्टाफ के अन्य सदस्य भी हैं। पहले नाक उसे सूंघती है, फिर आंखें उसे घूरती है, और पश्चात जीभ उसे चखती है। मीठा मीठा गप, कड़वा कड़वा थू।

राम नाम अति मीठा है, कोई गा के देख ले। लीजिए, मीठा चखने के लिए जीभ तैयार है और कोई वहां मीठा गा रहा है। कानों में रस घोल रहा है। एक और प्रवेश द्वार ! कंठ गा रहा है, और स्वाद कानों को मिल रहा है। इतने में कानों में एक स्वर और गूंजता है, कोई पीयो रे पियाला(प्याला) राम रस का। अजीब खेल हैं भाई इस रसना और चखना के। अच्छा समागम है रस और इन्द्रियों का।।

यूं तो यह जबान बीस तालों के बीच बंद रहती है लेकिन जब खुलती है तो बड़ी मुश्किल से काबू में आती है। कुछ होते हैं मौन मोहन, जो इस पर तो लगाम कसते हैं, लेकिन उनकी डोर किसी और के ही हाथों में होती है। वैसे कैंची और छुरी से भी तेज होती है इसकी धार। जब यह जीभ अनशन पर चली जाती है, तो सत्ता रूपी स्वर्ग में भूचाल आ जाता है।

वैसे जीभ का मुख्य काम सिर्फ चखना है। जब यह ललचाती है, तो इसकी तो सिर्फ लार टपकती है, पूरे मुंह में तो पानी भी आ जाता है। पानी पूरी खाता तो मुंह है, लेकिन पूरा स्वाद जीभ ले लेती है। बड़ी चटोरी है यह जीभ। नमक, मिर्ची का स्वाद यह पहचानती है। खट्टे, मीठे और कड़वे की भी इसको खूब पहचान है।।

इसको मीठे के साथ नमकीन भी पसंद है और कड़वे के साथ चखना। मीठे के साथ नमकीन तो समझ में आ गया लेकिन सुना है कड़वा तो यह थूक देती है, फिर कड़वे के बाद भी एक और चखना ! क्या यह डबल सिक्योरिटी चेक है ? अजीब पहेली है यह अथवा कोई कड़वा सच।

बताओ सच सच।

अच्छा चलिए, राम नाम से

ही शुरू करते हैं। राम नाम अति मीठा है और हमने राम रस का प्याला भी पीकर देख लिया। गजब नशा है भाई साहब राम नाम में। लेकिन क्या है आजकल मीठा ज्यादा हजम नहीं होता इसलिए हमने राम की मात्रा थोड़ी कम करके रम का सहारा ले लिया है। रम कड़वी है, लेकिन नशा इसमें भी है। आपने सुना नहीं, जब दिल को सताए गम, तू छेड़ सखी सरगम। बस यह रम ही हमारी वह सरगम है। अगर मीठे के साथ नमकीन तो कड़वे के साथ चखना।।

चखना बुरा नहीं। चखने में मज़ा है, लेकिन जब भी पीना हो तो बस राम रस का ही प्याला पीएं और सबको पिलाएं। दुश्मनी और गम की अंधेरी रातों को भूल जाएं, सुबह का इंतजार करें, राम नाम का मज़ा चखें, सबको चखाएं। रम को हमेशा के लिए राम राम जी और आप सबको सुबह की राम राम जी।

कोई पीयो रे पियाला राम रस का ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (13 अप्रैल से 19 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम।  श्री रामचंद्र जी के सबसे बड़े सेवक और हमारे स्वामी श्री हनुमान जी के चरणों में शत-शत नमन के साथ आज की चौपाई है :-

तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना,

लंकेस्वर भए सब जग जाना॥

हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने से राजकीय मान सम्मान प्राप्त होता है। हनुमत कृपा पर विश्वास आपको चतुर्दिक सफलता दिलाएगा।

“नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में हनुमान चालीसा की चौपाइयों के संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब हम आपको इस सप्ताह, ग्रहों के विचरण की जानकारी देते हैं।

इस सप्ताह मंगल, बुध और शनि मीन राशि में, गुरु मिथुन राशि में, शुक्र मेष राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। सूर्य प्रारंभ में मीन राशि में रहेगा तथा 14 तारीख को 11:45 दिन से मेष राशि में प्रवेश करेगा। मेष राशि में सूर्य उच्च के होते हैं अतः उनके असर के कारण परिणाम बेहद चौंकाने वाले होंगे।

आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह सूर्य आपके लग्न में बैठा हुआ है तथा यह उच्च का है अर्थात परम शक्तिशाली है। इस कारण से आपका आत्मविश्वास बहुत अच्छा रहेगा और अपने आत्मविश्वास के बल पर आप बहुत सारे कार्यों को कर सकेंगे। अविवाहित जातकों के विवाह के प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ में संबंध पहले जैसा ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में सतर्कता से कार्य करने पर सफलता की उम्मीद की जा सकती है। आपको अपने संतान का सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 17 की दोपहर के बाद से लेकर 18 और 19 तारीख सफलता दायक हैं। 15, 16 और 17 के दोपहर तक का समय आपके लिए सोच विचार कर कार्य करने का समय है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में आपके लिए सफलता का योग है। धन प्राप्ति की उम्मीद भी की जा सकती है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सावधानी से कार्य करने का है। अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए सप्ताह सामान्य है परंतु आपको अपने अंदर क्रोध की मात्रा को नियंत्रित करना पड़ेगा। संतान से आपको इस सप्ताह सहयोग मिलने की उम्मीद है। इस बात की संभावना हो सकती है कि यह सहयोग कम मात्रा में प्राप्त हो छात्रों को सीमित सफलता प्राप्त हो सकती है आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 13 और 14 अप्रैल उपयोगी है सत्र 18 एवं 19 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विश्व सहस्त्रनाम का पाठ करें सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपको अपने व्यवसाय में लाभ की मात्रा में बढ़ोतरी होगी। धन आने की मात्रा भी बढ़ेगी। व्यापारियों और सभी के लिए धन के मामले में यह सप्ताह अच्छा रहेगा। अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए सप्ताह ठीक है। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको सहयोग प्राप्त करने के स्थान पर अपने परिश्रम पर विश्वास करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। संतान से आपको सामान्य रूप से सहयोग प्राप्त हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 15, 16 और 17 तारीख यह दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

अधिकारियों कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। अगर प्रमोशन ड्यू है तो वह भी हो सकता है। अच्छे स्थान पर पोस्टिंग का भी योग है। इस सप्ताह भाग्य आप सभी का साथ देगा। भाग्य के कारण जो कार्य रुके हुए हैं वह सभी कार्य सप्ताह संपन्न हो सकते हैं। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य है। जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक-ठाक है। आपको अपने संतान से इस सप्ताह कोई विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होगा। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। कचहरी के कार्यों में किसी भी प्रकार का रिस्क ना लें। वहां पर सफलता का योग बहुत कम है। इस सप्ताह आपके लिए 17, 18 और 19 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए फलदायक है। 13 और 14 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आप सभी को भाग्य से बहुत अच्छी मदद मिलेगी। आपके जो भी कार्य भाग्य की वजह से रुके हैं वह सभी कार्य संपन्न हो सकते हैं। आपको इस सप्ताह का बहुत अच्छा इस्तेमाल करना चाहिए। अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। उनको अच्छे पद स्थापना मिलने का भी योग हो सकता है। दुर्घटनाओं से आप साफ-साफ बचेंगे। आपका या आपके जीवन साथी दोनों में से किसी एक का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। माता और पिता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से उत्तम सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपके लिए 13 और 14 तारीख समस्त प्रकार के कार्यों के लिए लाभदायक है। 15, 16 और 17 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपको भाग्य से अच्छा सहयोग मिल सकता है। आपके कई कार्य भाग्य की कारण हो सकते हैं। धन आने के संयोग बन सकते हैं। आपके जीवनसाथी और आपके लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। व्यापार में आपको लाभ होगा अर्थात व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। ‌अधिकारियों कर्मचारियों के लिए सप्ताह ठीक है। जनप्रतिनिधियों को इस सप्ताह अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। आपके शत्रु शांत रहेंगे। परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे इस सप्ताह आपके लिए 15 और 16 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों में परिणाम दायक रहेंगे। सप्ताह के बाकी दिन आपको सचेत रहकर कार्यों को संपन्न करने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अब बहुत अच्छा रहेगा। उनका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। मानसिक तौर पर वह बहुत स्वस्थ रहेंगे। भाग्य से आपको थोड़ी कम मदद मिलेगी। आपको अपने संतान के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह अगर आप थोड़ा सा भी प्रयास करेंगे तो अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। कचहरी के कार्यों में आपको सावधानी बरतना चाहिए। ‌धन आने के मार्ग में कुछ बाधायें हैं। व्यापार आपका ठीक चलेगा। इस सप्ताह आपके लिए 17 के दोपहर के बाद से लेकर 18 और 19 तारीख विभिन्न का प्रकार के कार्यों के लिए शुभ है। 15, 16 और 17 की दोपहर तक आपको सावधानीपूर्वक कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनके विवाह के नए-नए प्रस्ताव प्राप्त होंगे। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि हो सकती है। आपको अपने पेट की परेशानियों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह कम ठीक है। उनको सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 13 और 14 अप्रैल किसी भी कार्य को करने के लिए परिणाम मूलक हैं। 17, 18 और 19 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को पूर्ण करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। जनता के बीच में उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। अधिकारियों कर्मचारियों के लिए सप्ताह ठीक-ठाक है। यह सप्ताह आपके संतान के लिए अच्छा रहेगा। उनको हर तरह से सफलताएं प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे, परंतु समाप्त नहीं रहे होंगे। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। विवाह के प्रस्ताव आ सकते हैं। प्रेम संबंधों में वृद्धि हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 15, 16 और 17 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विद्यार्थियों के बीच में पुस्तकों का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह जन प्रतिनिधियों के लिए बहुत अच्छा रहेगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा सावधान रहने वाला है। उनको अपने अधिकारियों से सावधान रहना चाहिए। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा। भाई बहनों के साथ आपके संबंध सामान्य रहेंगे। आपके पेट में कुछ तकलीफ हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 17, 18 और 19 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयुक्त हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है व्यापारिक कार्यों में सावधान रहें अन्यथा आपको हानि हो सकती है भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे इस सप्ताह आप अपने संतान से काम सहयोग प्राप्त होगा छात्रों को पढ़ाई में नुकसान हो सकता है परीक्षाओं में आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है भाग्य के स्थान पर सप्ताह आपको अपने परिश्रम पर विश्वास करना चाहिए भाग्य पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करना चाहिए आपके माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा आपकी और आपके जीवनसाथी में से किसी एक का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है इस सप्ताह आपके लिए 13 और 14 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए सफलता प्रदान करने वाली है सप्ताह के बाकी दिन ठीक हैं इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वचन करें सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। व्यापारिक कार्यों में आपको सफलता प्राप्त होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह थोड़ा सा सावधानी रखने वाला है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह अच्छा रहेगा। अविवाहित जातकों के विवाह के नए-नए प्रस्ताव आ सकते हैं। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहना चाहिए। भाग्य से थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 15, 16 और 17 तारीख उत्तम है। 13 और 14 अप्रैल को आपको हर कार्य में सावधानी रखना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मनातले आभाळ! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? कवितेचा उत्सव ?

🙏 मनातले आभाळ! 🙏 श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

मनी दाटल्या आभाळाला

कधीतरी मोकळे करा,

डोह दुःखी आठवांचे

नित्य नेमाने रिते करा!

मनी दाटल्या आभाळाला

फिरू दे मुक्त आभाळी,

लादू नका तुमची घुसमट

तुम्ही त्याच्या कपाळी!

 *

मनी दाटल्या आभाळाला

नका घालू तुम्ही वेसण,

करून त्या मोकळे ढाकळे

करा साजरा रोज सण!

 *

मनी दाटल्या आभाळाला

भरू दे स्वतः आपले रंग,

कुवत त्याची जोखा तुम्ही

ते समर्थ रचण्या अभंग!

ते समर्थ रचण्या अभंग!

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “उपवास… आणि…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “उपवास… आणि…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

उपवास आपल्याला काही नवीन नाही. उपवास करण्याची अनेक कारणं, आणि प्रकार सुध्दा आहेत. अगदी ठराविक दिवशी, ठराविक वारी, ठराविक देवांच्या नावाने उपवास करण्याची किंवा तो सांगण्याची पध्दत आहे.

काही वेळा आपण उपवास करतो, काही वेळा तो घडतो, तर काहीवेळा मोडतो सुध्दा. कोणता उपवास कोणत्या पध्दतीने करायचा हे काही वेळा आपणच ठरवतो.

सकाळी उपवासाचे ठरलेले म्हणजे आपणच ठरवलेले पदार्थ खायचे व रात्री तो सोडायचा. सोडायचा म्हणजेच खायचे. उपवास करायचा तरी खायचे, आणि सोडायचा तरी खायचेच. फक्त या खाण्याच्या पध्दती आपल्या आणि आपल्या सोयीनुसार.

मग कोणी सकाळी उपवासाचे पदार्थ खातात, कोणी सकाळपासून रात्रीपर्यंत काहीच खात नाहित. कोणी फक्त फलाहार घेतात. तर कोणी फक्त द्रवपदार्थ. यात चहा, काॅफी, दूध, ताक, सरबत याच पोटभरेपर्यंत सेवन असत. पण असतो उपवास.

काही उपवास हे आठवड्यात, महिन्यात सातत्याने येतात, तर काही वर्षात एकदाच येतात. नवरात्रात करायचे वर्षात एकदाच पण सलग काही दिवस असतात. तर हरतालीका, वडपौर्णीमा या सारखे काही फक्त महिलाच करतात. यातही नवरात्रात केले जाणारे उपवास परत करणारा आपल्या पध्दतीने करतो. म्हणजे नवरात्र असे पर्यंत सकाळ संध्याकाळ उपवासाचेच खायचे. किंवा सकाळी उपवासाचे खायचे, व रात्री नेहमीचे. किंवा उपवासाच्या सगळ्या दिवसात रोज रात्री ठराविक पदार्थच जसे डाळ आणि दशमीच खायची.

यातही नेहमीच्या डाळ दशमीत लसूण, कांदा घातल्याशिवाय चव येत नाही अस म्हणत असलो तरी उपवास सोडतांना मात्र लसूण, कांदा खायचा नाही, कारण उपवास.

काहि धार्मिक कार्यक्रमात तर फक्त ते कार्य संपेपर्यंतच उपवास असतो, आणि मग नेहमीचे असले तरी खास जेवण. पण ते धार्मिक कार्य संपेपर्यंत मधल्या काळात खायचं ते उपवासाचच.

यात धार्मिक कार्याला हजेरी लावणारे उपवासाचे, व उपवासाला न चालणारे दोन्ही पदार्थ खातात. अस ऊपवासाबद्दल अनेक पध्दतीने सांगीतल तरी सगळा प्रकार खाण्याबद्दलच जाणवतो आणि खाण्याच्या बाबतीत थोडा गोंधळ उपवास न करणार्‍यांचा कदाचित होतो.

हे सगळ उपवास पुराण, उपवास, तो करण्याची पद्धत, वेेळ, वार, दिवस, खायला चालणाऱ्या किंवा लागणाऱ्या गोष्टी बर्‍याच आणि वेगळ्या आहेत. अशाच अनेक गोष्टी ऊपवास… आणि… या आणि नंतर जाणवल्या.

हे आणि म्हणजे दुसरं काहिही नाही. सध्या सुरु असणाऱ्या निवडणूकांच्या तयारीतली युती, महायुती, आघाडी, महाआघाडी, बंडखोरी, अपक्ष यांची चर्चा. ही युती, महायुती, आघाडी, महाआघाडी सुध्दा राष्ट्रीय पातळीवर वेगळी, स्थानिक पातळीवर वेगळी. काही ठिकाणी स्वबळाचा नारा, तर कुठे मैत्रीपूर्ण लढत. कुठे विरोधकांशीच हात मिळवणी. तर कुठे हातातला हात काढून घ्यायची तयारी. आम्हाला सत्ताच हवी अस काही नाही आम्ही विकासासाठी लढतो. अस म्हणतांना सगळ्या हालचाली असतात त्या सत्ता मिळवण्यासाठिच.

आमच्यात मतभेद असतील, पण मनभेद नाहीत. आमच्या समविचारी व्यक्तींसाठी आमचे दरवाजे उघडे आहेत अस म्हणतांना चर्चा मात्र बंद दाराआड. याच उघड्या ठेेवलेेल्या दाराने कोणी बाहेर जाणार नाही याचीही काळजी. आम्ही उमेदवारी देतांना राजकारण करणार नाही अस म्हणतांना उमेदवार मात्र राजकारण करणारा, करु शकणाराच लागतो. यात कस लागतो तो निष्ठावान असणारे, आणि निष्ठावान म्हणून घेणारे यांचा. यातले काही निवडून येतात, तर काही निवडून, निवडून आणावे लागतात. कुठे भावनिक साद घातली जाते, तर कुठे भावनेच्या आहारी जाऊ नका याचा नारा असतो. संघर्ष मिटवून एकत्र येण्याचा जल्लोष केला जातो, पण विभक्त होण्याची कारणं गुलदस्त्यातच राहतात.

अनेक वर्षांपासून आपसात संघर्ष असणारे रात्रीतून एकत्र येतात. तर घरोबा असणारे रात्रीतून बाहेर पडतात. हे सगळ सोयीनुसार, सोयीच्या ठिकाणी सोयीस्कर सुरु होत. उपवास करण्याच्या अनेक पध्दती असतील तशाच राजकारणाच्याही अनेक पध्दती आहेत अस म्हणाव लागेल.

अस आहे हे उपवास… आणि… राजकारण.

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ संस्कार…!  लेखक : श्री चंद्रशेखर गोखले ☆ प्रस्तुती – प्रभा हर्षे ☆

प्रभा हर्षे

? जीवनरंग ?

☆ संस्कार…!  लेखक : श्री चंद्रशेखर गोखले ☆ प्रस्तुती – प्रभा हर्षे

दुसरीत असताना एक धडा होता, एका शाळेत वार्षिक तपासणी सुरू असते. पाहुणे येतात, दोन मुलांना वर्गासमोर उभे करून विचारतात… सांगा बघू या दोघात श्रीमंत कोण आहे? एक दात किडका, हडकुळा मुलगा उभा असतो पण त्याच्या अंगावर मखमली सदरा असतो, टेरीकाँट्ची विजार असते, गळ्यात सोन्याची साखळी असते, पायात महागडे बुट असतात.

दुसरा मुलगा सुदृढ असतो, स्वच्छ दातांचा, हसतमूख, पण त्याचा गणवेश साधा असतो, त्याच्या गळ्यात दत्तात्रेयाचा काळा धागा असतो, पायात साध्या चपला असतात. मुलं काय पहिल्या मुलाकडॆ श्रीमंत म्हणून बोट दाखवतात.

कसले हे धडे? या पासून काय धडा घ्यायचा आम्ही? गरीब श्रीमंत हा भेद मात्र. त्या कोवळ्या वयात मनात जो ठसला तो पन्नाशी गाठे पर्यंत… तेंव्हा माझ्या डोळ्या समोर श्रीमंत मुलगा म्हणून यायचा तो आमच्या वर्गातला अर्णव तळवलकर… तो राहायलाही आमच्या समोर होता. ज्या काळात शेखर, मकरंद, उदय, शैलेश, दिलीप अशी ठरलेली नावं ऐकीवात होती त्या काळात या तळवलकारांच्या मुलाचं नाव अर्णव होतं. त्याच्या धाकट्या बहिणीचं नावही असच खास… जयजयवंती.

तशी अर्णवकडची प्रत्येक गोष्टच खास होती, त्या काळात त्याच्या हॉलमधे फ्रीज होता, घरात गुळगुळीत फरशी होती, शोभिवंत कार्पेट होतं, जेवायला बसण्यासाठी डायनींग टेबल होतं, फुलदाणीत कायम ताजी फुलं ठेवलेली असायची. टेबलावर डीशमधे रसरशीत फळं ठेवलेली असायची.

त्याची आई बिनबाह्यांचा ब्लाऊज घालायची, घरात वावरताना पायात स्लीपर घालायची, अर्णवच्या बाबांना अरे तुरे करायची..

आणि आमच्याकडे? सतत ओचा पदर खोचलेली, सतत कामात गर्क असलेली माझी आई. एक अंधारं स्वैपाकघर जिथे सतत तळणीचं काम चालायचं, एक दुरमुखलेली बैठकीची खोली.. दोन खुर्च्या कधीकाळी घेतलेल्या. आलेली पत्र अडकवण्यासाठी एक तार खिडकीत लटकलेली असायची. वेलजी भाई अँड सन्सचं फुकटात मिळालेलं बटबटीत कँलेंडर दुसर्‍या खिळ्यावर फडफडत असायचं.

केवढा हा विरोधाभास? कधी अर्णवकडे जावं लागलं तर, तर त्याची आई भूतदया दाखवल्यासारखं माझ्याशी चांगलं वागायची, अर्णवला माझ्याशी बोलण्यात इंटरेस्ट नसायचा. पण त्याची आई माझ्यासमोरच त्याला समजवायची.. “असं नाही करायचं, शेखर तुझ्या वर्गात आहेना? ” तो माझ्याकडे आणखिनच तुच्छतेने बघायचा. कारण शाळेत बाई माझ्याशी कशा वागतात हे त्याला माहीत होतं. म्हणूनच मला सुद्धा त्याच्याघरी जायला मनापासून आवडायचं नाही. पण जावं तर लागायचच

कारण अर्णवची आई आमच्या आईकडून थालीपिठाची भाजणी, चकल्या, चिवडा, कुळथाचं पीठ असं काही ना काही घेत असायची. आणि दुसरी गोष्ट म्हणजे पैसे नकद द्यायची. आणि माझ्या हातावर पेपरमिंटची गोळी. एव्हाना पंचक्रोशीत माझ्याकडे दयेनं पाहणार्‍यांची संख्या वाढतच होती. त्यात अर्णवची आई आघाडीवर होती, ‘ छायाताई बघ किती कष्ट करतात? कुणासाठी? तुझ्यासाठीच ना? मग अभ्यास नको करायला? ’ हे समीकरण मला तेंव्हाही लक्षात यायचं नाही.. अजूनही येत नाही, आई कष्ट करते त्या बदल्यात मी अभ्यास करायचा? … मग आईचं सामान पोहचवून यायचो, गरम गरम पातेलं शेगडीवरून उतरवायला मदत करायचो, वाळवणं सांभाळायचो ते कशाच्या बदल्यात होतं?

पण कोणताही प्रश्न विचारायचा मला अधिकार नव्हता. कारण एक दोन वर्ष माझी दांडी उडाली होती. आता अर्णवही माझ्या वरच्या इयत्तेत गेला होता. तो काळ असा होता की, तुम्ही शालेय जीवनात अपयशी ठरलात की तुमचा जन्म वाया गेला. मग नाही नाही ते दोष तुम्हाला येऊन चिकटणार, जो बोलणार नाही तो आळशी… समोरचा आपल्याशी असा का वागतो? हे तेव्हा बरेचदा लक्षातच यायचं नाही.. एकदा असच झालं… ,

तेंव्हाचं आमचं पार्लं म्हणजे तुरळक वस्तीचं टुमदार गाव होतं. तिन्हीसांजेआधीच सामसूम व्हायची. इतकी की लोकलचा आवाज गावात घुमायचा, तशी त्या काळातही अर्णवची आई सोबत कामवाली घेतल्याशिवाय फिरायची नाही, ते ही ती दोन पावलं मागे.. अर्णवची आई पुढे, बाईच्या हातात पिशव्या, अर्णवच्या आईच्या हातात फक्त पर्स. पण त्या दिवशी काय झालं कोण जाणे… प्रार्थना समाजच्या इथल्या चिंचोळ्या रस्त्यावरून ती एकटीच चालली होती, वातावरण अंधारलेलं, रस्त्यावर तुरळक रहदारी, तिच्या हातात सामानाच्या पिशव्या… योगायोग असा की माझ्या आधी अर्णव तिथूनच सायकलवरून पास झाला, तेंव्हा आम्ही दोघे टिळक मंदिराच्या व्यायाम शाळेत जायचो. एकदमच बाहेर पडायचो. पण त्याच्या बाबानी त्याला नवीन स्टायलीश सायकल घेऊन दिल्यापासनं त्याच्या लेखी माझा भाव आणखीनच घसरला होता. तो पुढे निघून गेला.

मला आश्चर्य वाटलं. आम्हाला आई रस्त्यात अचानक दिसली की कोण आनंद व्हायचा,… अक्षरश: आम्ही उड्या मारायचो.. जरा हातातली पिशवी घे असं आईला सांगावं लागायचं नाही. ते आपोआपच आमच्याकडून घडायचं. आम्ही सगळीच भावंड आईसाठी वेडी होतो. पण अर्णव मात्र भुर्र्कन निघून गेला, मी त्याच्या आईपाशी थांबलो. म्हंटलं ‘आज उशीर झाला तुम्हाला…’

त्या ‘हो अरे…’ म्हणत काहीतरी बोलल्या. मी म्हणालो, द्या पिशव्या मी घरी नेऊन पोहोचवतो. त्याना पण ओझं जडच झालं होतं. त्या सुखावल्या. पटकन पिशव्या माझ्या सायकलला लावल्या, आणि मी निघणार… तेव्हढ्यात त्यांनी मला थांबवलं. क्षणात, क्षणापुरता त्यांचा अविर्भाव बदलला.

तो बदल, त्यांचा तो सावधपणा, त्याही वयात मला खटकणारा होता. सावध होत, त्यांनी सहजपणाचा आव आणत त्यांची पर्स काढून घेतली. त्यांच्या या कृतीला अनेक पदर होते. माझी कौटूंबीक पार्श्वभूमी, माझी शालेय प्रगती, माझ्याबद्दल मारले जाणारे शेरे, ताशेरे… निमूट राहण्याशिवाय गत्यंतर नव्हतं. मी निमूट पुढे झालो.

काळही पुढे जात होता. अर्णव वारेमाप शिकला. मधे दोन तीन वर्ष अमेरिकेला सुद्धा होता… मी पण सुचेल ते लिहित होतो. नशिबाने हात दिला होता, त्या आधी घर सोडलं. पार्लं कायमचं सुटलं होतं, अर्णवचं लग्न झालं, त्याचे बाबा गेले, जयजयवंती सासरी गेली, हे सगळं कानावर येत गेलं. माझी गोष्टही माझ्या परीने पुढे सरकत होती.

मग “मी नवा ” हे आणखी एक पुस्तक बाजारात आलं. या पुस्तकाच्या निमित्ताने दिलिपभाईनी एक कार्यक्रम पार्ल्याचा मार्केटमधल्या राममंदिरात ठेवला. तिथे अर्णवची आई आली आणि मला भेटायला थांबली. जाताना इतकेच म्हणाली, “ उद्या मला इथेच भेटशील का? माझं महत्वाचं काम आहे. ”

मी उमाकडे बघितलं. तिने मला कळेल अशी मान तुकवली आणि भेटायची वेळ ठरली. आणि ठरल्याप्रमाणे आम्ही भेटलो सुद्धा… औपचारीक बोलणं गरजेपुरतं झाल्यावर त्या म्हणाल्या, “ माझं एक महत्वाचं काम आहे “… असं म्हणत त्यानी एक पुरचूंडी माझ्या हवाली केली. म्हणाल्या यात चवदा तोळे सोनं आहे. कसंही करून तू हे जयूला नेऊन दे. मी जाणं शक्य नाही आणि ती आली तरी मी हे करू शकत नाही. कारण माझ्यावर सुनेचा आणि नातवंडाचा पहारा असतो. हे अर्णवच्या हाती लागलं, तर हे सुद्धा तो गिळून टाकेल. घर आणि काही पाँलीसीज त्याने फसवून माझ्या सह्या घेऊन बळकावलं आहेच, घर त्याने त्याच्या नावावर करून घेतलंय, हे त्याच्या सी ए नेच मला सांगितलय. मी मला माहीत नसल्याचा आव आणून त्या घरात खोट्या मानाने राहते, पण मी पुर्णपणे त्याच्या कह्यात आहे.

… आधी घर स्वच्छ ठेवायला धडपडत होते. आता सगळं नीट आहे हा लोकांचा गैरसमज टिकवायला धडपडते आहे. मला माहीत आहे, मी गेल्यावर हा जयुच्या तोंडाला पानं पुसणार आहे. देवदयेनं तिला काही कमी नाही, पण तरी आईकडून असं काहीतरी मला तिला द्यायचं आहे… पिशवीतून पर्स काढून घेणार्‍या त्याच होत्या. ती पुरचुंडी स्विकारणारा मीच होतो. भोवतीचं पार्लंही तेच होतं पण.. पण काळ बदलला होता..

– – मला काय वाटतं माहितिये, यशाने तो माणूस बदलत नाही, पण त्याच्याकडे बघण्याचा इतरांचा दृष्टिकोन बदलतो…

त्यांनी जयजयवंतीचा घाटकोपरचा पत्ता दिला, सवड झाली की जा म्हणाल्या..

मी घाईने म्हणालो “ इतकं जोखमीचं काम, सवडीनं जा काय… मी उद्याच जातो. तुम्ही तिला तसं कळवून ठेवा…”

– – खरं सांगतो ती चवदा तोळ्यांची पुरचुंडी खिशात जपून ठेवली आणि डॊळ्यासमोर त्या धड्यातली दोन मुलं उभी राहीली… त्यांच्या जागी अर्णव आणि मी दिसायला लागलो आणि श्रीमंतीचा खरा अर्थ समजला…

… घेतलेली कामगिरी उद्या चोख बजावल्यावर तर, अर्णव माझ्याशेजारी उभा राहूच शकत नव्हता…

लेखक : श्री चंद्रशेखर गोखले

प्रस्तुती : प्रभा हर्षे

 ९८६०००६५९५

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ सृजनाचे क्षण… भाग – १ ☆ उज्ज्वला केळकर ☆

उज्ज्वला केळकर

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☆ सृजनाचे क्षण… भाग – १ ☆ उज्ज्वला केळकर

परवा एक गंमतच झाली. हरियाणा येथे रहाणारे माझे स्नेही श्री. बलजीत गढवाल ‘भारती’ यांचा मला एक मेसेज आला. खरं तर त्यांचा माझा अलीकडे दोन-तीन वर्षात संपर्क नव्हता. मेसेजचा साधारण आशय असा होता, ‘मी एक पुस्तक काढतोय. ‘लेखक का लिहितात? सुमारे 150 लेखकांकडून मी याबद्दल लेख मागवले आहेत. तुम्हीही तुमचे विचार कळवा. तुम्ही का लिहिता? आणि तुमच्या लेखनप्रवासाबद्दलही लिहा. ’ मेसेज वाचला आणि मी विचारातच पडले. खरंच! मी आत्तापर्यन्त विचारच केला नव्हता, मी का लिहिते? मनात आलं की मी आपली लिहित सुटायची. आता मात्र मी विचार करू लागले, आपण का लिहितो? एकूणच लेखक का लिहितात?

‘लेखक का लिहितात? ’ या विचाराभोवती मन रेंगाळताना, थोडा पूर्वसूरींचा धांडोळा घ्यावासा वाटला. ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम, रामदास या संतांनी काव्यरचना केली, ती ’लोककल्याणासाठी’, त्याचप्रमाणे भगवंताच्या भक्तीचा अनावर उमाळा मनात दाटून आल्यामुळे तो व्यक्त करण्यासाठी. त्यानंतरच्या काळात पंत कवींनी काव्यलेखन केले, ते आपल्या विव्द्त्तेचं प्रदर्शन करून कीर्ती मिळवण्यासाठी. त्यापुढील टप्प्यावर तंत कवींनी काव्ये रचली, ती एक तर वीरश्रीच्या चेतनेसाठी पोवाडे आणि मनोरंजनासाठी लावण्या. नंतरच्या ब्रिटीश काळात, लो. टिळक, आगरकर, म. गांधी, म. फुले यांनी लेखन केलं, ते लोकजागृतीसाठी. स्वातंत्र्याची आकांक्षा, समाज सुधारणा, अंध:श्रद्धेला विरोध, जाती-जातीत आणि स्त्री-पुरुषातील समानता, स्त्री शिक्षणाची गरज आणि महत्व इ. उद्देशाने लेखन केले जात होते. पुढे पुढे लेखनाची आणखीही एक धार यात येऊन मिसळली. इंग्रजी शिक्षणाबरोबरच, इंग्रजी वाङ्मयाचाही परिचय झाला आणि त्या अनुकरणातून पारलौकिक विषयांबरोबर लौकिक विषयांकडेही लेखकांचे मन ओढ घेऊ लागले. आपला परिसर, नातेवाईक, परिचयातले, कल्पनेतले विषय यावर लेखन होऊ लागले.

लेखनातले हे सारे टप्पे मनात येतायेताच, मन विचार करू लागले, ‘आज लेखक का लिहितात? ‘ मी माझ्या एका नावलौकिक असलेल्या मैत्रिणीला विचारले, ‘ तू का लिहितेस? ‘ ती म्हणाली, ‘आपण का बोलतो? दुसर्‍याला काही तरी सांगावसं वाटतं म्हणून! . मीही नेमकी त्याच कारणासाठी लिहिते. ‘ तिचं हे उत्तर ऐकलं आणि मला ‘खूल जा सिम सिम’ म्हंटल्यावर आलिबाबाची गुहा उघडावी, तसं वाटलं. बरोबर! मीदेखील नेमकी याच कारणासाठी लिहिते. व्यक्त होण्याची अनावर ऊर्मी मनात दाटून येते आणि लेखणी कागदावर लिहिती होते. आपण काही पाहिलेलं असतं, ऐकलेलं असतं, अनुभवलेलं असतं. ते दुसर्‍याला सांगावसं वाटतं. पण ते सगळं जसंच्या तसं सांगितलं जातच असं नाही. कधी त्यात काट-छाट होते. कधी भर पडते. कधी वाटतं, हा किंवा ही आत्ता असा न वागता, तशी वागली असती तर? परिस्थिती कशी बदलली असती? मग मनात अनेक विचार, कल्पना रुंजी घालू लागतात. मग त्या वेगळ्या शक्यतांच्या आधारे कविता, कथा, कादंबर्‍या निर्माण होतात. घटितातून अघटिताची पुनर्मांडणी होते. हीच लेखकाची नवनिर्मिती असते. अनुभव प्रत्यक्षच घ्यायला हवा, असे नाही. कल्पनेच्या पातळीवरही घेता येतो.

घटितातून अघटिताची पुनर्मांडणी केलेल्या माझ्या ‘जन्म’ शीर्षकाच्या कवितेचे उदाहरण मी इथे देते. एकदा क्युरेटीन करायचं म्हणून मी दवाखान्यात अ‍ॅडमिट होते. मला ऑपरेशन टेबलवर झोपवले होते. अ‍ॅनॅस्थेसिस्ट येणार म्हणून त्यांची वाट बघत सगळे बाहेर थांबले होते. रूममध्ये मी एकटी. भिंतींवर अनेक शो केसेस. त्यात सर्जरीची हत्यारे, वेगवेगळ्या सुर्‍या, कात्र्या, चिमटे वगैरे… मला एकदमच वस्तुस्थितीचं वर्णन करणारी कविता सुचू लागली. त्याचं सर्वसाधारण स्वरूप असं –

घटका भरत आलेली

जीवघेणी कळ

मस्तक भेदून गेलेली.

ललाटीची रेषा,

वाट हरवून बसलेली.

घड्याळाची टिक टिक 

जिण्याचा तोल साधत 

सांडत असलेली.

एवढ्यात डॉक्टर आले. मला अ‍ॅनॅस्थेशिया दिला गेला. क्युरेटीन झाले. मी शुद्धीवर येऊ लागले. डोक्यात तीच कविता…

ईथरची बाधा, नसानसातून 

शरीरभर भिनलेली….

डोळ्यापुढची वर्तुळे

लाल… हिरवी.. पिवळी… निळी…

काळवंडत गेलेली…

कोसळत्या काळोखात होणार्‍या

पांढर्‍या शुभ्र ठिपक्यांच्या 

लयबद्ध हालचाली.

पाजळत्या रक्तपिपासू हत्यारांची 

लांबच लांब पसरलेली 

अशुभ सावली.

… तेव्हा मी काही बाळंतीण होणार नव्हते, पण मला कवितेचा शेवट सुचला…

संज्ञा बधीर होताना, सारं सारं दूर सरतय.

रक्तात उमलणार्‍या, गुलबकावलीचं हसू,

लाटालाटांनी मनभर उसळतय. अणूरेणू व्यापून उरतय.

जणू ते गुलबकवलीचं फूल म्हणजे बाळ, आता माझ्या हातात येणार आहे…..

– – अशी ही वास्तव आणि कल्पनेची सरमिसळ. दवाखान्यातून घरी येताना मी बाळ नाही, पण कविता घेऊन आले.

वास्तवाचं प्रभावी वर्णन करण्यासाठी योग्य, उचित शब्दकळा निवडतानाही कल्पनेची देणगी लगतेच आणि तितकाच अभ्यासही हवा.

– – एकदा एका संस्थाभेटीने मला दोन कथा दिल्या. संस्थेचं नाव करुणा निकेतन क्रेश. क्रेश म्हणजे संगोपनगृह. मी डी. एड. कॉलेजला होते, तेव्हाची गोष्ट. मला बर्‍याचदा ‘समाजसेवा’ हा विषय शिकवायला असे. या विषयांतर्गत एक उपक्रम होता, समाजसेवी संस्थांना भेटी. यात अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम, रिमांड होम, मूक-बधीर मुलांची शाळा, गतिमंद मुलांची शाळा अशा अनेक संस्था असत. एका वर्षी मला कळलं, कॉलेजपासून पायी वीस मिनिटांच्या अंतरावर एक चर्च आहे. त्या चर्चने एक क्रेश चालवलं आहे. या क्रेशची माहिती घेण्यासाठी मी माझ्या विद्यार्थिनींना घेऊन तिथे गेले.

 तिथे असलेल्या मदतनीस बाई आम्हाला क्रेशची माहिती सांगत होत्या. क्रेशला आर्थिक मदत जर्मन मिशनची होती. इथे आसपासच्या वस्तीतली आर्थिकदृष्ट्या दुर्बल असणार्‍यांची मुले येत. त्या बोलत असतानाच तिथे एक दीड – पावणे दोन वर्षाची, नुकतीच चालायला लागलेली मुलगी लडखडत आली आणि खाली बसून त्या मदतनीस बाईंच्या पायाला तिने मिठी मारली. त्यांनी तिला उचलून कडेवर घेतले. मग म्हणाल्या, ‘क्रेशने अ‍ॅडॉप्ट केलेली ही पहिली मुलगी. एका लेप्रसी झालेल्या भिकारी दांपत्याची ही मुलगी. सिस्टर मारियाच्या मनात ही मुलगी भरली. त्यांनी त्या भिकारी दांपत्याला संगितले, की ‘आम्ही तुमच्या मुलीला सांभाळू. तिला खूप शिकवू. तिला चांगलं जीवन जगायला मिळेल. पण आमची एक अट आहे. तुम्ही तिला आपली ओळख अजिबात द्यायची नाही. बघा. तिचं कल्याण होईल. ’.. त्या दोघांनी एकमेकांकडे पाहिलं. थोडं एकमेकांशी बोलले. त्यांना वाटलं असणार, निदान मुलीला तरी आपल्यासारखी भीक मागत जगायला नको. त्यांनी नन मारियाची अट मान्य केली. आम्ही हिला खूप शिकवणार आहोत. डॉक्टर करणार आहोत आणि पुढे उच्च शिक्षणासाठी जर्मनीला पाठवणार आहोत. ’ एव्हाना त्यांनी त्या मुलीला आपल्या दुसर्‍या मैत्रिणीकडे सोपवले होते आणि त्या पुढे माहिती सांगू लागल्या. पण माझं तिकडे लक्षच नव्हतं.

माझं मन त्यावेळी, ती लहान मुलगी, तिचे लेप्रसी झालेले आई-वडील, त्या मुलीला डॉक्टर करून जर्मनीला पाठवायचे क्रेशचे लोक बघत असलेले स्वप्न, यातच गुंतून गेले होते आणि मनात कुठे तरी कथा आकार घेऊ लागली होती.

क्रेशच्या कार्याची माहिती त्या पुढे सांगू लागल्या. क्रेशला आर्थिक मदत जर्मन मिशनची होती. इथे आसपासच्या वस्तीतली आर्थिकदृष्ट्या दुर्बल असणार्‍यांची मुले येत. सकाळी ८ वाजता मुले येत. तिथे त्यांना दूध, नाश्ता दिला जाई. शिक्षण, दुपारचे जेवण, पुन्हा शिक्षण, खेळ, गाणी, चित्रे काढणे, सगळं तिथे करायला मिळे. दुपारी बिस्किटे, फळे वगैरे दिली जात. संध्याकाळी ६ वाजता मुले आपआपल्या घरी जात.

तिथल्या मदतनीस क्रेशबद्दलची माहिती सांगत होत्या. ‘ इथल्या मुलांना जर्मनीतील काही लोकांनी दत्तक घेतले आहे. त्यांचा खर्च ते करतात. तिथल्या मुलांना खेळणी पाठवतात. चित्रे पाठवतात. ग्रीटिंग्ज पाठवतात. आम्ही ते सगळं मुलांना देतो पण इथे खेळायला. बघायला. त्यांना खेळणी वगैरे घरी नेऊ देत नाही. आपल्या घराचे फोटोही मुलांचे दत्तक पालक पाठवतात. पत्रे पाठवतात. त्यांनी मग आम्हाला अशी काही पत्रे, खेळणी, ग्रीटिंग्ज दाखवली.

त्या दिवशी त्या क्रेशमध्ये आणखी एक कार्यक्रम होता. थंडीचे दिवस होते. त्यामुळे तिथे मुलांसाठी त्या दिवशी चादरी वाटण्यात येणार होत्या. प्रमुख व्यवस्थापिका रेमंड मॅडमनी त्या दिवशी मुलांच्या आयांना बोलावून घेतले होते. हॉलमध्ये सगळे जमले. दोघे शिपाई सोलापुरी चादरींचे गठ्ठे घेऊन आले.

प्रार्थना, सर्व उपस्थितांचे स्वागत झाले. प्रभू येशूची शिकवण, तो सगळ्यांकडे कसा कनवाळू दृष्टीने बघतो, असं सगळं बोलून झालं. मुलांच्या परदेशातील पालकांनी चादरीचे पैसे दिल्याचे सांगितले गेले. तिथे चादरी वाटप सुरू झाले आणि माझ्या मनात कथा साकारू लागली. त्या दिवशी मी घरी आले ती दोन कथांची बीजे घेऊन. एक ‘तहान’ आणि दुसरी ‘पांघरूण. ’

प्रथम ‘तहान कथेविषयी. मी माझ्या कथेत ती लहान मुलगी, जस्मिन, डॉक्टर झालीय, असं दाखवलं. तिथून कथेची सुरुवात. ती मोठी होत गेली, तसं तिला कळलं, आपण लेप्रसी झालेल्या भिकार्‍याची मुलगी आहोत. चर्चपुढे बसलेले ते भिकारी. तिला येता जाता त्यांना न्याहाळायचा, यापैकी आपले कोण आई-वडील असतील ते शोधण्याचा छंद लागतो. आज ती जर्मनीला निघालीय. तिचा निरोप समारंभ होतोय. स्टेजच्या पुढल्या भिंतीवर एक मोठे पोस्टर आहे. येशू ख्रिस्त कुणा शिरमोणी नावाच्या पापी महिलेच्या ओंजळीत पाणी घालतोय. खाली लिहिलं आहे. त्याने दिलेल्या पाण्याने जो तहान भागवतो, त्याला तहान लागत नाही. (वरील पोस्टर मी मिशन हॉस्पिटल – मिरज इथे पाहिलं होतं. ते कथेत इथे वापरलं) जस्मिनला वाटतं, आपण कळायला लागल्यापासून त्याने दिलेल्या पाण्यानेच तर तहान भागावतोय. पण आपल्याला खूप खूप तहान लागलीय. आपले खरे आई-वडील कोण आहेत, हे जाणून घेण्याची तहान. ती निघते. टॅक्सीत बसता बसता त्या भिकार्‍यांकडे जाते. त्यांच्या थाळीत, वाडग्यात हाताला लागतील तसे पैसे टाकते. मनोमन म्हणते, ‘माझ्या अज्ञात माता-पित्यांनो, मला आशीर्वाद द्या. टॅक्सी निघून जाते. चार विझू विझू झालेले डोळे टॅक्सी दृष्टिआड होईपर्यंत त्या दिशेने बघत रहातात.

तर अशी ती ‘तहान’ कथा.

– क्रमशः भाग पहिला 

©  उज्ज्वला केळकर 

संपर्क – निलगिरी, सी-५ , बिल्डिंग नं २९, ०-३  सेक्टर – ५, सी. बी. डी. –  नवी मुंबई , पिन – ४००६१४ महाराष्ट्र

मो. 836 925 2454, email-id – kelkar1234@gmail.com 

≈ संस्थापक संपादक –  श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २५ आणि २६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक २५ आणि २६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. २५ – – 

मना वीट मानू नको बोलण्याचा ।

पुढे मागुता राम जोडेल कैचा?

सुखाची घडी लोटता दुःख आहे ।

पुढे सर्व जाईल काही न राहे ।।२५।।

अर्थहे मना, माझ्या या बोलण्याचा—एकच गोष्ट पुन्हा पुन्हा सांगण्याचा—तू कंटाळा मानू नकोस. कारण तसे झाले तर ज्या भगवंतप्राप्तीसाठी तू प्रयत्न करीत आहेस, तो राम तुला कसा प्राप्त होईल? या संसारात सुख-दुःखाचे चक्र अखंड सुरू असते. सुखाचा क्षण संपला की दुःख येतेच. आणि शेवटी ज्याला तू सुख मानतोस तेही नाश पावणारेच आहे—काहीही शाश्वत राहात नाही.

विवेचनया श्लोकात समर्थांची लोककल्याणाची विलक्षण तळमळ पुन्हा एकदा प्रकर्षाने जाणवते. आपण वारंवार सांगत असलेला उपदेश ऐकून लोकांना कंटाळा येऊ शकतो, याची त्यांना जाणीव आहे. म्हणूनच ते प्रेमाने सांगतात—

माझ्या बोलण्याचा वीट मानू नकोस.

आपल्या व्यवहारातही असेच घडते. कोणी आपल्या हितासाठी एखादी गोष्ट सांगितली, उपदेश केला तर तो आपल्याला लगेच पटत नाही. उलट, आपले भले व्हावे या उद्देशाने स्पष्ट बोलणाऱ्या व्यक्तीपासून आपण दूर राहण्याचा प्रयत्न करतो. अशा व्यक्तीबद्दल अनेकदा नकारात्मक मत तयार केले जाते—

“तो खूप स्पष्टवक्ता आहे”, “तो नेहमी नकारात्मकच बोलतो”, “त्याचे ऐकले तर व्यवहार कसा करायचा? ”

परंतु सत्य हे असे आहे की अप्रिय पण हितकारक बोलणारा माणूस दुर्मिळ असतो, आणि त्याचे ऐकणारा त्याहूनही दुर्मिळ!

संसारात सुख आणि दुःख यांचे चक्र अखंड चालू असते. सुखाचा काळ संपला की दुःख येणारच—ही अटळ गोष्ट आहे. एखादा माणूस मोठ्या पदावर पोहोचतो—आमदार, खासदार किंवा मंत्री होतो. पण त्या सत्तेचा उपयोग लोककल्याणासाठी करण्याऐवजी तो स्वतःच्या स्वार्थासाठी करतो. सत्तेची नशा चढते. परंतु एक दिवस सत्ता जाते, आणि त्याला वास्तवाला सामोरे जावे लागते.

एखाद्या उद्योगपतीचा भरभराटीला आलेला व्यवसाय अचानक तोट्यात जातो. जोपर्यंत सुख आपल्या वाट्याला असते, तोपर्यंत आपण त्यातच रमून जातो. त्या सुखात इतके गुंततो की परमेश्वराची आठवणही होत नाही. आपल्याला वाटते—हे सुख कायम राहील.

परंतु हे सर्व प्रारब्धावर अवलंबून असते. जसे सुख आपल्या कर्मानुसार मिळते, तसेच दुःखही भोगावे लागते. सुख-दुःखाचे हे चक्र, जन्म-मरणाचा हा फेरा—कोणालाही टाळता येत नाही.

म्हणूनच, जर आपल्याला या चक्रातून मुक्त व्हायचे असेल, तर परमेश्वराशी नाते जोडणे आवश्यक आहे. आणि त्यासाठी जो कोणी आपल्याला सत्य, श्रेयस्कर आणि हितकारक मार्ग दाखवेल, त्याचे बोलणे कंटाळा न करता ऐकणे गरजेचे आहे.

अर्थात, अशी शिकवण संतच देऊ शकतात. समर्थांसारख्या संतांच्या वचनांमध्ये गूढार्थ, अनुभव आणि करुणा दडलेली असते. त्यांचे प्रत्येक शब्द आपल्याला योग्य दिशेने नेणारे असतात.

खरा साधक कधीच त्यांच्या बोलण्याचा कंटाळा करत नाही; उलट तो त्या मार्गावर निष्ठेने चालत राहतो.

स्वसंवाद :: 

  • माझ्या हितासाठी कोणी सत्य सांगितले तर मी ते खुलेपणाने स्वीकारतो का?
  • सुखाच्या काळात मी परमेश्वराला विसरतो का, की त्याचे स्मरण ठेवतो?
  • सुख-दुःख हे क्षणभंगुर आहे याची जाणीव ठेवून मी जीवनाकडे पाहतो का?
  • संतांचे किंवा हितचिंतकांचे मार्गदर्शन मी मनापासून ऐकतो आणि आचरणात आणतो का?

 – – – – 

श्लोक क्र. २६ – – 

देहे रक्षणाकारणे येत्न केला ।

परी सेवटी काळ घेऊनि गेला ।

करी रे मना भक्ती या राघवाची ।

पुढे अंतरी सोडी चिंता भवाची ।।२६।।

अर्थ : मनुष्य आपल्या देहाचे रक्षण व्हावे म्हणून खूप प्रयत्न करतो, त्याची काळजी घेतो. परंतु शेवटी काळ (मृत्यू) त्याला घेऊन जातोच. म्हणून हे मना, तू राघवाची भक्ती कर आणि मनातील संसाराची (भवाची)चिंता सोडून दे.

विवेचनमागील श्लोकात समर्थांनी सुख-दुःखाच्या चक्राचे वास्तव आपल्यासमोर ठेवले. या श्लोकात त्याच विचाराला पुढे नेत ते देहाभिमानाचे वास्तव आपल्यासमोर मांडतात.

आपण आयुष्यभर देहाच्या रक्षणासाठी झटत असतो. देहबुद्धी इतकी प्रबळ असते की देहसुखालाच आपण खरे सुख मानतो. शरीराला आनंद मिळावा म्हणून माणूस विविध भोग-विलासात रमतो. काही जण तर केवळ खाणे-पिणे आणि मौजमजा हाच जीवनाचा उद्देश समजतात.

पूर्वी चार्वाकांनीही “यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्” असा भोगवाद मांडला होता. आज अनेकजण नकळत त्याच विचारसरणीचा स्वीकार करताना दिसतात.

पण येथे समर्थांचा हेतू देहरक्षणाला नाकारण्याचा नाही. देहाची काळजी घेऊ नये असे ते म्हणत नाहीत. उलट, देह ही एक मौल्यवान देणगी आहे.

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”. शरीर हेच धर्मसाधनेचे पहिले साधन आहे.

म्हणून देहाची योग्य काळजी घेणे आवश्यकच आहे. निरोगी आयुष्य जगणे, जीवनाचा आनंद घेणे हेही चुकीचे नाही. परंतु याचबरोबर एक गोष्ट लक्षात ठेवावी लागते की हा देह नश्वर आहे आणि एक दिवस तो सोडून जावेच लागणार आहे.

वेदकाळातील ऋषींनीही आपल्या निरोगी दीर्घायुष्याची कामना केली, पण मिळालेल्या त्या आयुष्याचा उपयोग त्यांनी ईश्वरप्राप्तीसाठी आम्ही करणार आहोत असे स्पष्ट सांगितले.

आपल्या जीवनात आपले काहीतरी ध्येय असते. आस्तिक व्यक्ती परमेश्वर प्राप्तीसाठी झटते तर नास्तिक किंवा बुद्धिवादी मंडळी मानवसेवा, समाजसेवा, वैज्ञानिक प्रगती यासारख्या गोष्टींना आपल्या आयुष्याचे ध्येय मानतात. परंतु बरेचदा आपण मात्र ध्येय बाजूला ठेवून देहासाठीच अधिक वेळ खर्च करतो.

माणूस स्वतःच्या देहाबरोबरच संसाराची, घरदाराची, मुलाबाळांची चिंता करीत राहतो. पण प्रारब्धानुसार जे घडायचे ते घडणारच असते. म्हणून समर्थ सांगतात

– – – “करी रे मना भक्ती या राघवाची”

श्रीरामाबद्दल बोलताना समर्थ नेहमी “या राघवाची” भक्ती करावी असे म्हणतात. त्यांचे आराध्य दैवत असलेला श्रीराम जणू त्यांच्यासमोर उभा आहे. त्या राघवाची असे ते कधीही म्हणत नाहीत. समर्थांसाठी श्रीराम हे केवळ तत्त्व नाही, तर सजीव अनुभव आहे. जणू समोर उभा असलेला ईश्वर!

म्हणूनच ते आपल्याला सांगतात की बाबारे, संसाराची चिंता करण्याऐवजी मनाला राघवाच्या स्मरणात गुंतव. एकदा का मन त्याच्याकडे लागले, की मग संसाराची चिंता आपोआप कमी होत जाते. आणि हळूहळू अशी भावना दृढ होते की राम कर्ता आहे, सर्व काही त्याच्याच कृपेने घडते आहे.

अशी श्रद्धा निर्माण झाली की मन हलके होते, चिंता निवळते आणि जीवन अधिक शांत, समाधानी बनते.

स्वसंवाद :: 

  • मी माझ्या देहाची काळजी घेताना त्यालाच अंतिम सत्य मानून चालतो का?
  • जीवनाचे खरे ध्येय लक्षात ठेवून मी देहाचा उपयोग करतो आहे का?
  • संसाराच्या चिंतेत मी इतका गुंततो का की परमेश्वराचे स्मरण विसरतो?
  • माझ्या मनाला राघवाच्या नामस्मरणाची सवय लागली आहे का?

– क्रमशः श्लोक २५ आणि २६

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ”ARE YOU DEAD?” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “ARE YOU DEAD?” ☆ संध्या बेडेकर ☆

काही लोक असे आहेत, जे सकाळी मोबाईल हातात घेतल्यावर आपल्या गृप्समध्ये पहिला मेसेज Good morning चा टाकतात. बरोबर एखाद गुलाबाचे फूल पण पोस्ट करतात. खरतर हा एक अभिवादन करायचा प्रकार आहे.

मी कधी कोणाला Good morning चा मेसेज पाठवत नाही. गुलदस्ता पाठवत नाही. आणि कोणी मेसेज पाठवला तर मी उत्तरही देत नाही. मला हे उगीचच, waste of time, काय गरज आहे या सगळ्याची? अस वाटत. बहुतेक यात माझा उद्धटपणा दिसतो.

काहीच रिसपोन्स मिळत नसल्यामुळेच, पूढे असे मेसेज मला येत नाहीत. कदाचित फारच शिष्ठ आहेत या असा शिक्का पण माझ्या नावावर मारला जात असावा.

वर्तमानपत्रात एक लेख वाचल्यावर या Good Morning msg कडे बघायचा माझा दृष्टिकोन बदलला. आता हा असा मेसेज किती महत्वाचा असू शकतो. हे लक्षात आल. दृष्टिकोन बदलला की विचार बदलतात. हे खरय.

आता एका वेगळ्या अर्थाने Good morning msg पटला.

Are you dead? हा लेख वाचला.

चीनमध्ये हा app वापरणारे बरेच लोक आहेत. आजकाल फॅमिलीच्या नावाखाली जास्तीत जास्त 3 जणांची संख्या असते. त्यातील मुलगा/ मुलगी शिक्षणासाठी, लग्न झाल्यावर दूर गेले की फॅमिलीत फक्त 2 जण उरतात. जसजस वय वाढत तस ज्येष्ठांच्या समस्यांना तोंड देत, एक वेळ अशीही येते की दोघांपैकी फॅमिलीत एकच उरतो.

आधीच्या काळात एका मुलाला वाढवायला आजूबाजूचे अनेक लोक असायचे. घरातच कमित कमि आठ दहा जण असायचे. आता तर हम दो हमारे दो हा हिशोब पण गेलाय, आता एकच.. किंवा मुल नकोच. आता DINK चा जमाना आहे (double income no kids), मग एकटे राहणार्यांचा नंबर वाढणारच. त्यात 996 कल्चर.

9 to9 job, मग इतक काम केल्यावर दोन दिवस आराम, भटकंतीत. 6 days busy. त्यामुळे आजूबाजूला राहणार्या लोकांशी संबंध नाही, भेटीगाठी नाही, बोलण नाही. शेजारी कोण. राहतय? हे सुद्धा खूपदा माहित नसत. social life as such नाहीच.

अशा वेळेस त्यांच्या घरात काय घडलय/ काय घडतय? हे कळायला मार्ग नाही. त्यात privacy च्या नावाने वागण्या बोलण्यात मोकळीक नाही. विदेशी राहणार्या मुलांची संख्या दिवसेंदिवस वाढतेय, तेही एक मोठ कारण आहेच.

आज single/ एकटे राहणार्यांची संख्या वाढतेय. त्याला कारण अनेक आहेत.

नोकरीमुळे दुसर्या शहरात जाणे, डायव्होर्स झाल्यावर, लग्न करायचे नाही, अशा विचारांचे पण बरेच आहेत. ऑफिस मधून घरी आल्यावर ही conference calls. Work culture अस झालय की आई-वडीलां बरोबरही बोलायला वेळ मिळत नाही. त्यामुळे

एकटेपणा ही समस्या फक्त जेष्ठांचीच आहे अस राहिलेल नाहिये.

 एका समृद्ध घरात एकटी राहणार्या वृद्ध स्री चे प्राण गेले, हे कळल केंव्हा? तर आठवड्याभरानंतर. या दरम्यान कधी कोणी फोन केला, रिंग गेली, फोन उचलला नाही… अस कदाचित झाल असेल. तर बाहेर गेल्या असतील अशी आपली समजूत करून, या बाबतीत कदाचित लक्ष दिल गेल नसेल.. काय नक्की झाल असाव? माहित नाही. पण कळल मात्र आठ दिवसांनी. हे बरोबर आहे का?

Are you dead?

 या app ला CHINA मध्ये छान response मिळाला/ मिळतोय.

एकटे राहणार्यांनी फक्त रोज तेथे एक बटन दाबायचे असते. आणि 

मी आहे

 I am there , I am in

 ही सूचना द्यायची. जर लगातार दोन दिवस हे बटन operate झाल नाही, तर काही problem असावा.

अस लक्षात येईल. त्या app वर registration करताना, काही महत्वाचे, तुमच्या नातेवाईकांचे फोन. नंबर नक्की घेतले असतीलच. त्यानुसार पूढचे काम करण सोप होईल.

मधून मधून वर्तमान पत्रात, TV वर या संदर्भात काही भयानक बातम्या ऐकायला वाचायला मिळतात.

भारतात या app ची गरज आहे का?

आज भारतात 5% लोक एकटे राहतात.

ही संख्या वाढतच चाललीय.

आज तरी या प्रकारचा App भारतात नाही.

या प्रश्नावर काही उपाय आहे का?

मला वाटत

 जर आपला एक गृप असला, मग तो मित्र/मैत्रीणींचा, आपल्या आजूबाजूला राहणार्या लोकांचा, ऑफिस मधला, समवयस्क मैत्रीणींचा, कोणताही असू शकतो.

त्या गृपवर फक्त

Good Morning msg रोज टाकायचाच असा नियम ठरवला तरी हा प्रश्न सुटू शकतो. नाही का?

आज खासकरून जेष्ठांसाठी अनेक संस्था काम करतायेत.

UP मध्ये 112 वर फोन केला तर लगेच मदद मिळते. तर केरळमध्ये एकटेपणा घालवायला Listener parlours.. Manglore मध्ये sathi Shifts आहेत.

एकटे राहणाऱ्यांच्या मनात… मला काही झाल तर लोकांना कळेल का? केंव्हा कळेल? हा प्रश्न भेडसावतोच.

काळजी कमी करण्याच एक रहस्य समजून घ्याव. उगीच कल्पनेत काळजी करत बसण्यापेक्षा काही तरी निर्णय घ्यावा. व्यक्त व्हाव.

जस शरीरात वेदना झाल्या की आपण डोॅक्टरकडे जातो, तसेच मनात काळजी / शंका / भीती असेल तर ती वेळेवर समजून व्यक्त होण आवश्यक आहे.

वेळेवर घेतलेल्या correct decision मुळे तुमचा आत्मविश्वास वाढतो.

No need to worries.

म्हणून रोज good morning चा मेसेज गृपमध्ये पाठवणे हा सरळ साधा सोपा उपाय चांगला आहे. सहज करण्यासारखाही आहे.

आयुष्यातील चुका जरी खोडता येत नसल्या तरी दुरुस्त नक्कीच करता येतात.

मी माझी चूक सुधारणार…

आजपासून मी good morning लिहिणार आणि अशा मेसेजला उत्तरही नक्की देणार.

 

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ जीवनाचे सार… – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – प्रफुल्ला शेणॉय ☆

प्रफुल्ला शेणॉय

📖 वाचताना वेचलेले 📖

☆ जीवनाचे सार… – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – प्रफुल्ला शेणॉय ☆

आयुष्य फार सुंदर आहे!

खिशातून ५०रुपयांची एक नोट जरी पडली तरी कावराबावरा अन् बेचैन होणारा माणूस आयुष्याची ५० वर्षे उलटली तरी, त्याच्यात परिवर्तन येत नाही, बिनधास्तच वागतो! काय दुर्दैव आहे!

स्मशानभूमीची सुरक्षा तपासणी किती कडक आणि मजबूत असते, हे तर विचारूच नका साहेब! अहो, पैसा तर फार दूरची गोष्ट आहे, इथे श्वासही सोबत घेऊन जाऊ देत नाहीत! तुम्ही कितीही मोठे किंवा तुमची थेट वरपर्यंत ओळख असली तरीही!

काळाचा कावळा आयुष्याच्या माठावर बसतो अन् रात्रंदिवस वय पितो!

माणूस समजतो: मी जगतोय!

माणूस खाली बसून पैसे आणि संपत्ती मोजतो: काल किती होते आणि आज ते किती‌ वाढले आहेत आणि वरती तो हसणारा माणसाचे श्वास मोजतो : काल किती होते आणि आज किती उरले आहेत!

तर चला, उरलेले आयुष्य अवशेष बनण्यापूर्वी त्याला विशेष बनवूया!

पासबुक आणि श्वास बुक. दोन्ही रिकामे असल्यास भरावे लागतात. पासबुकात ‘रक्कम’ आणि श्वासबुकात ‘सत्कर्म’.

म्हणून

`एकमेकांचा आदर करा. चुका विसरा. अहंकार टाळा.

आयुष्य आहे तोपर्यंत हसत हसत घालवा. रडून वा भांडून तरी काय साध्य होणार?

जीवनाचे सार:

जीवन जगताना खरं तर कंडक्टरसारखं राहता आलं पाहिजे.

रोज वेगवेगळे प्रवासी सोबत आहेत, पण प्रत्यक्षात कोणीही आपलं नाही.

रोजचा प्रवास आहे, पण प्रत्यक्षात आपल्याला कुठही जायचं नाही.

ज्यातून प्रवास करायचा ती बसही आपली नाही.

बॅगेत असलेले पैसेही आपले नाहीत.

ड्यूटी संपल्यावर सारं काही सुपूर्त केलं की झालं.

मित्रांनो, जीवन सुंदर आहेच, फक्त आहे त्याचा मनमुराद आनंद घ्या. काही घेऊन गेला नाहीत, तरी सगळ्यांच्या मनात राहून जा. हेच जीवन आहे.

लेखक: अज्ञात

प्रस्तुती :  प्रफुल्ला शेणॉय

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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