मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ यांची वेगळीच भाषा.. ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

सुश्री नीलांबरी शिर्के

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? यांची वेगळीच भाषा.. ?  सुश्री नीलांबरी शिर्के 

या पिवळ्या रंगाची

बाई वेगळीच भाषा

सोनियाच्या रंगीरंगे

रोज उगवती दिशा!!

*

चाफा पिवळ्या रंगात

मंद गंधाळ बोलतो

रंग घेऊनी पिवळा

शेवंतीत विसावतो!!

*

पित गुलाबाची तऱ्हा 

आता कशी वर्णू बाई

करी मोकळी पाकळी

गंघ वारीयाला देई!!

*

मंद गंध या फुलांचा

चित्तवृत्तीला तजेला

या पिवळ्याचे कौतुक

पुरे करते आजला!!

© सुश्री नीलांबरी शिर्के

मो 8149144177

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ अवकाशाचे अंतटोक… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

☆ अवकाशाचे अंतटोक ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

२) “  “कवी : श्रीशैल चौगुले 

चित्रकाव्य : “ अवकाशाचे अंतटोक “ 

कवेत पर्वत घेण्या

मी पर्वत होऊन जावे

त्या स्वर्गधुक्यात न्हाता

आयुष्य हे निसर्ग व्हावे.

या शिव निलनभास

स्पर्शून निळकंठ व्हावे

विसरुन या विश्वाला

पंख घेऊन विहारावे.

हे हात रिकामे साथी

भासे कुठेतरी हा त्याग

हा जन्मसुखी सोहळा

या धरतीवर पुण्य राग.

हिमशिखराशी भाव

मन भक्तीमोही अतुल्य

एक शिवाची निर्मीती

मानवा पवित्र नि अमुल्य.

अमोद किरणे कोटी

देहास छेडती ही प्रभात

उभा असा साधू जैसा

ओंकार नादाचा प्रपात.

संपून हे माया कोष

अवकाशाचे अंत टोक

श्वासात अखंड वेद

सहा ऋतूंचे देव लोक.

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – संस्मरण ☆ “बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ संस्मरण – “बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

प्रसिद्ध कथाकारपहल पत्रिका के यशस्वी संपादक ज्ञानरंजन का जाना, हिंदी साहित्य के लिए बड़ी क्षति है। संयोग देखिये कि व्यावसायिक पत्रिकाओं को पहल ने कड़ी टक्कर दी और जनपक्षीय रचनाओं को प्रमुख तौर पर स्थान दिया। मात्र पैंतीस कहानियां लिखकर कथा का नया स्वरूप सामने ला दिया।

नैनीताल के जिस अशोका होटल नयी नवेली शादी पर भाग कर पहुंचे, वह होटल मालिक राजीव लोचन साह थे और नैनीताल में उनसे मिलने पर इंटरव्यू की उसी होटल में, तब यह बात सामने आई थी। अंतिम दिनों में एक इंटरव्यू में लेकर बहुत चर्चा में भी रहे।

बहुत कठिन है ज्ञानरंजन हो पाना और पहल जैसी आंदोलित करने वाली पत्रिका निकाल पाना। एक बार तो ज्ञानरंजन को पूरा पढ़ने की कोशिश की, इलाहाबाद के अमरूदों की मिठास जैसी, बहुत कुछ नयी दुनिया खोल तीस कहानियां पढ़कर बहुत कुछ सीखा। ज्ञानरंजन नहीं रहे पर कहानियों में, पहल के अंकों में मिलते रहेंगे।

ज्ञानरंजन को सुनने का मौका शिमला में मिला था जब उन्होंने दूर की बात कही कि जल्दी ही कलम का स्थान कम्प्यूटर का माउस लेने वाला है। यह थी दूरदर्शिता ज्ञानरंजन की। आज सबसे ज्यादा उनकी कहानी पिता के साथ साथ उनकी प्रेमकथा को याद करते नमन् करता हूं।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है! ☆ श्री परम शिवम ☆

श्री परम शिवम

(श्री परम शिवम (डी आई जी – सी आर पी एफ) पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक तथा वाणिज्य में स्नातकोत्तर। अनुशासित जीवन के साथ एक संवेदनशील हृदय. हम श्री परम शिवम जी का साहित्य आपसे समय समय पर साझा करते रहेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक हृदयस्पर्शी संस्मरणात्मक कथा – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है!.)

 

कथा कहानी – मेरे पास ‘भूख’ की कहानी है! ☆ श्री परम शिवम

(‘सतरंगी दस्तरख्वान’ (संपादन- सुमना रॉय, कुणाल रे अनुवाद- वंदना राग, गीत चतुर्वेदी) में खाने की कहानियाँ हैं, अन्न की कहानियाँ- फार्मचे पाव, साउरडॉ, रसम, सारस्वत तमड़ी, भाकरी, पचडी-हुग्गी, किकोड़े, बैंगुनभाजा….. भोजन के विविध रूपों, व्यंजनों, पाक-कला की कहानियाँ, पर दुनिया का ऐसा कौन सा स्वाद जो मेरी ‘भूख’ की कहानी के बिना पूरा हो जाए-  श्री परम शिवम् )

बेसिक ट्रेनिंग संपन्न हो गयी थी और चालीस किलोमीटर की रेस सफलतापूर्वक करने के बाद कमांडो-ट्रेनिंग की भी इति हो आयी थी. अब प्रयाण था- बटालियन की पहली तैनाती पे सुदूर उत्तर पूर्व में मणिपुर जाना था, यही जीवन मे ‘दूर’ का आरम्भ था इसके बाद जीवन में अनगिन ‘दूर’ आए, करीबी शायद एकाध !

अकादमी से निकलते बरास्ता तीन दिन की छुट्टी ली गयी थी उसके बाद कमज़ोर मन ने पाँच दिन एक्स्ट्रा भी निकाल लिए थे, फिर भी तैयार ना था. अप्रेल-मई की गर्मियों की साँय-साँय करती दोपहर में ‘घर’ सोचते तो घर का कोना-कोना रस्सी होकर पाँव से लिपटने लगता, पाँव खुद-ब-ख़ुद स्तम्भित हो जाते, अडिग…अचल…अहिल.

यात्रा लम्बी थी-पहले जबलपुर से गुवाहाटी फिर आगे दीमापुर और फिर उसके बाद कॉन्वॉय से इम्फाल, लगे कित्ता दूर है, मन नहीं सोचता था पाँव ही सोचने लग पड़े थे और सोच-सोच जमते जाते थे, सून-सपाटा ऐसा कि कोई बोलने वाला भी न था-

सूखी रोटी तोड़ लें, कोई कहीं न जाए

आ पिया घर रहें मैं कमाउँ तू खाए

मन को मारा गया, कोनों की रस्सियों को खोला गया, पाँव उठाए गए और घर को छोड़ा गया, अजानी दिशाओं का प्रयाण और विलम्बित नहीं किया जा सकता था पर रत्ती भर भी मन नही, जबलपुर में हिले-डुले का धर्म भूलने वाले पाँव दादर-गुवाहाटी के स्लीपर कोच में चढ़े हैं, रात के दो बजे. जबलपुर से टिकट कन्फर्म नही हुई थी, टी टी ने मरी सी आश्वस्ति कर रखी थी-देखते हैं !

सिहोरा, स्लीमनाबाद, कटनी, मैहर, सतना… सब निकल रहे खड़े-खड़े, आस-पास ‘खड़ों’ की भीड़ है, सब खड़े-खड़े ही जा रहे, किसी के पास आश्वस्ति है, बाकियों के पास वो भी नहीं. सामान- एक सूटकेस, एक ट्रंक, एक बैग और एक होल्डाल-बेडिंग भी इधर-उधर हो रखी, मन के क्षेत्रफल मे किसी अन्य बात का अवसर ही न हो रहा, बस टुकुर-टुकुर टी टी को ताके जाएं, वो भी दृष्टि बचाते दूसरे कोच निकल गए. बाहर पौ फट रही, उषा की चमकीली रेख उभर रही किन्तु बर्थ-रहित अंतस में प्रत्यूषा का कोई आकर्षण नहीं, आंतरिकता निश्चिंत हो तो कोई सौंदर्य जगे इस अनिश्चय में क्या तो तुम्हें निरखें जगती ! मन, चेतना, ह्रदय, मस्तिष्क सब का केंद्र एक- बर्थ मिले तो प्रकृतिस्थ हों,तब बताते तुम्हें ओ दृश्यावलियों !

घर से निकले आठ घण्टे हो चुके, अंधकार का चँदोवा तो सतना में ही उठ गया था अब सूरज पूरा का पूरा चढ़ आया है, दिन का चमकीला थान खुल-बिछ गया. गाड़ी मुगलसराय पहुँची है, टी टी ने बर्थ भी कन्फर्म कर दी – साइड अपर ! सामान व्यवस्थित कर लिया गया है, बर्थ मिलते ही खंड-खंड व्यवस्थित हो आया है, अणु-परमाणु अपने घेरे में घूमने लगे हैं- आत्मस्थ, प्रकृतिस्थ, चेतनस्थ सब हो आया. सारी अनाश्वस्तियाँ पलक झपकते लुप्त हुई हैं, नासिका में वास आने लगी, कानों को सुनाई दे रहा, दृष्टि को दिखाई देने लगा-सामने जूस सेंटर है, कोई तृष्णा नहीं, बस नई-नई आश्वस्ति को सेलिब्रेट करना है, उतरता हूँ.

सद्य हासिल अचिंता को एन्जॉय करते एप्पल-जूस पिया गया है, हर घूँट में बर्थ प्राप्ति की स्वास्ति उतरी है, मन्यस्कता स्थिर हो रही, भुगतान के लिए पैसे बाहर निकाले फिर वापिस रखे है, कोई दो हज़ार रु कत्थई, ढीली जीन्स की पिछली पॉकेट में और आकर आश्वस्ति की पुष्टि के लिए बर्थ पर लेटता हूँ, जाने किस कौंध में पीछे पॉकेट पे हाथ मारता हूँ-‘अरे दूसरे पॉकेट में होंगे’ हाथ तत्क्षण दूसरे पॉकेट पर जाता है, हड़बड़ाहट सी हो जाती है, एक धड़के में वाशरूम की तरफ भागता हूँ, क्या उतार दूँ, क्या निकाल फेंकू कि दो हज़ार वापिस मिल जाएं, कहीं से झटक आएं, माँ ने बोला भी था सारे पैसे एक जगह मत रखना पर मलंग को किसका सुनना ठहरा, नहीं सुनी अब भुगतो ! वाशरूम की सीमित जगह में क्या-क्या न झटका गया, बस ट्रेन को झटकना रह गया था, दो हज़ार रुपए जा चुके थे, जेब कट गई थी. मन कैसा-कैसा हो आया था और कैसी तो नाउम्मीदी उतर आई थी ट्रेन के उस गंधाते प्रसाधन में. इधर-उधर खंगालने में सिर्फ छह रुपए और गुवाहाटी तक का टिकट ही निकल पाया. निढाल और विरक्त कदमों से बर्थ तक पहुँचता हूँ, ट्रेन कहाँ जा रही, क्यों जा रही, क्या जा रही, कोई लेना-देना नही, बोध-दर्पण हठात ही चटक-तिड़क उठा है, जगत बहा जा रहा पर कोई बिम्ब, कोई छवि नही उभर रही और तो और माँ के गर्भ से साथ हो लिया ‘आत्मालाप’ भी गूँगा पड़ गया है, सन्न पड़ा है, एक सपाटता सी पसर गयी है हर ओर हर छोर !

पिछली रात खाना खाया था, मुगलसराय में जूस पिया अब पेट पकड़ के साइड अपर पे लेटा हूँ, आँतों में हलचल है, भूख लग रही…

दोपहर भूखे पेट ही निकाल दी, पानी की बोतल साथ है, वही पी लेते हैं. मन रो रहा, घर वापिस लौट जाएं ! माँ ने सूजी के लड्डू साथ दिए थे, एकाध जैसे-तैसे गटका गया है, गला सूख रहा. कैसी तो बेकसी पसर रही अस्ति के सारे संभव में, जीवन का प्रवाह, आत्मा का प्रवाह, देह का प्रवाह, सारे प्रवाह रुद्ध हो आए हैं. बक्सर-दानापुर के आस-पास का इलाका है कुछ विद्यार्थी कोच में चढ़ें हैं, भीड़ बढ़ गयी है, मैने मुद्रा बदल ली है और उठ बैठा हूँ, एक छात्र बची जगह में ऊपर चढ़ आया है, साथ बैठ गया है. मन होता है उससे कुछ अनुरोध करूँ, आँतें बात-बात में ख़ुद को उमेठने सी लगती हैं. बातों का सिलसिला शुरू करता हूँ, अपना दुखड़ा रोता हूँ, बताता हूँ कि जेब कट गयी है अब पास कुछ नहीं किन्तु इसके आगे स्पष्ट रूप से माँग नहीं पाता, माँगने की सामर्थ्य नहीं, दीनता नहीं जुटा पा रहा, भूख के आगे अभी समर्पण नहीं, किसी के आगे समर्पण नहीं !

छात्र से कोई खाद्य न जुटता वो बस इतना ही बोलता है -“अरे ! मुगलसराय बहुत खराब है वहाँ तो यही होता है”

चौबीस घण्टे बीत गए कुछ खाए हुए, अन्न को देखे उसकी गंध लिए हुए…अन्न, अनाज, गंदुम, दालें, बासमती कितने नाम-रूप सब भीतर बन-बिगड़ रहे. रात के तिमिर को चीरती ट्रेन भागी जा रही.

गर्मियों के दिन, कोच में भी गर्मी पसरी है  पर प्यास नहीं लग रही, भूख लग रही है,

नींद नहीं आ रही, भूख लग रही है,

आँख नहीं लग रही, भूख लग रही है,

घर की याद आ रही, भूख लग रही है,

लौट जाऊँ, लौट जाऊँ भूख लग रही है.

आस-पास सबने खाना खाया है, किसी ने शिष्टतावश भी नहीं पूछा, भूख लग रही है.

कैसी कातरता है ! घर से लेकर चले ग्लूकोज़ पैकेट से बीच-बीच में ग्लूकोज़ मिला पानी पीता हूँ तो घड़ी दो घड़ी राहत होती है जैसे आँतें सो गई हों किन्तु थोड़ी देर में ही फिर मरोड़ उठने लगते हैं जैसे कोई शक्तिशाली पँजों से गीले कपड़ों के समान आँतों को मरोड़ रहा हो, यही क्रम हो रखा. थोड़ा ग्लुकोज-पानी पीता हूँ आँतें भ्रमित हुई हैं, आँख लग जाती है, करवट नहीं लेटता, पीठ के बल भी नहीं, पेट के बल लेटता हूँ आँतों पर दबाव डाल उनके उमेठ, उनके दर्द को काबू करता.

एक बस व्यवधान हो रखा शेष सब क्रम से हो रहा- दूसरी सुबह भी समय पर खुल रही, भगवान भुवन भास्कर, अनंत रश्मियों के चमकीले रथ पर सवार धरा तक आए तो, किंतु निपट खाली हाथ – ऐसे सूरज का मैं क्या करूँ, अन्नहीन…. खाद्यहीन….नाश्ता हीन ! तुम्हारा प्रकाश लेकर क्या करूँ अंशुमाली ! गेहूँ चाहिए चावल चाहिए मुझे ! क्षुधा की अरश्मियों ने तिमिर फैला रखा है उदर में, एक दाने का प्रकाश ही इस तिमिराच्छन्न को भेद पाएगा, इस जठराग्नि का शमन कर पाएगा जिसमें तिल-तिल मै स्वाहा हो रहा.

खाने को कुछ नहीं तो क्या ब्रश का स्वांग किया जाए. जिनके पास अन्न है, अन्न की सामर्थ्य है, ब्रश कर रहे, मुँह धो रहे, हँस-हँस कर अन्न की बातें कर रहे. मैं एक निरान्न आँतों को भरमाए रखने की जुगत में लगा हूँ- बोतल में पानी भर लिया जाए, ग्लूकोज़ मिलाकर घूँट-घूँट उतारते रहेंगे, बरगलाएँगे उन आँतों को जिनमें सहस्त्रों कांटे से उग आए हैं, जिनकी नोक हरपल आँतों की भीतरी दीवार को छेद रही. ट्रेन किसी छोटे निर्जन स्टेशन पर खड़ी है, नल से पानी भर लिया जाए !

आह ! अब यही बचा था, विपदा ! ऐसी परीक्षा करोगी भूख-आपदा में फँसे और होम-सिकनेस से जूझते मन की बोतल का ढक्कन गिरकर ट्रेन के नीचे पटरियों में चला गया है.

हे मालिक ! यही बोतल तो जीवन-रेखा हो रखी, इसके बिना तो आँतों को भ्रमित करना भी मुश्किल हो जाएगा.

जान की परवाह नहीं करता, भूख की परवाह करता हूँ, उतरता हूँ, ट्रेन के नीचे जाता हूँ, कोई भय नही, ट्रेन चल पड़ने की कोई आशंका नहीं, बस आँतों को शांत रखने का ध्येय ही आत्मा पर फहरा रहा, आत्मा भी रिक्त, क्षीण और कृश हो चली, अन्नहीन देहता में आत्मा का वो स्वरूप नहीं होता जो खाते-पीते इतराते बदनों में होता है.

तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है

बाग के बाग़ को बीमार बना देती है

भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालों

पेट की भूख इन्सान को ग़द्दार बना देती है

‘नीरज’ याद आते हैं और तिरोहित भी हो जाते हैं

नीचे वाली बर्थ पर सफेद कुर्ते पाजामे में तुंदियल से सज्जन जमे हैं. आते-जाते हर फेरीवाले से कुछ न कुछ लेकर खाने और लगातार चना-मूँगफली से अपना मुँह चलाते रहने के कारण सिंधी लगते हैं, मन में आता इनसे याचना करता हूँ , टूटने लगा हूँ, अब टूटने लगा है सब-कुछ, घर वाले कहते रहे हैं घुन्ना है,संकोची है, जिसे अब तक किसी संपदा सा सम्हाला वो संकोच भी टूटा जा रहा, माँग लेता हूँ, भयँकर भूख लग रही, माँग की अनुनय भीतरों में भाषा हो आयी है, बस ध्वनि होने को है, लेकिन जो भी चेष्टा सी पनपी थी गले में फंसकर रह जाती है फड़फड़ाती सी, नहीं माँग पाता ! उन्हें खाते देखता हूँ, बर्थ पे लेटा सामने पीली सी छत देखता हूँ, घरघराते पँखे को देखता हूँ, छत पे आड़ी-तिरछी लकीरों से उभर आई भिन्न-भिन्न आकृतियाँ देखता हूँ, आँते फिर दुखने लगी हैं सहन नहीं हो रहा.

सिंधी सज्जन उठकर वाशरूम की तरफ गए हैं, कोई स्टेशन आया है हबड़-तबड़ मची है. सज्जन की बर्थ पर सिक्का नज़र आता है, और दिन होते तो सोने के सिक्कों के ढेर को भी हेय-दृष्टि देखता किन्तु आज यही सिक्का समूची दृष्टि में भर आया है, उतरकर सिक्का उठा लेता हूँ. अपने पास से एक रुपए मिलाकर दो रुपए का खीरा खरीदा है. समय को खींचकर, तानकर एक-एक टुकड़ा खाया जा रहा ताकि अधिक लगते समय से अधिक परिमाप का भ्रम-बोध हो, ख़ुद को नहीं आँतों को छलने का उपक्रम है किन्तु एकाध घण्टे बाद आंतें फिर दुखने लगी हैं इस बार दुगुनी प्रबलता से, असहनीय मरोड़ उठती है, अब ग्लूकोज़ पानी भी आँतों को तुष्ट नहीं कर पा रहा, गला इतना सूख गया है कि सूजी के लड्डू निगलने के क्रम में लगता जैसे गले के भीतर खरोंचे पड़ रहीं, गला छिल जाएगा. कमांडो ट्रेनिंग के सर्वाइवल कोर्स में भी ‘बर्दाश्त का माद्दा’ बढ़ाने भूखा रखा गया था पर ऐसा भूखा नहीं कि दाने को तरस जाए आदमी, मोहताजी हो जाए.

ट्रेन पता नहीं किस भू-भाग से गुज़र रही, लेट हो आयी है- शाम तक गुवाहाटी पहुँचना था पर रात ग्यारह बजे पहुंची है. अगली ट्रेन कल सुबह दस बजे वो भी एक नम्बर प्लेटफार्म से. चार नम्बर प्लेटफार्म पर माँदा सा खड़ा, सामान एक नम्बर प्लेटफार्म तक ले जाने की योजना बनाता हूँ, खाली पेट योजना नहीं बनती. पीछे बाकी सामान छोड़ ट्रंक उठाता हूँ, प्लेटफार्म से सीधे पटरियों पे उतरता, पार करता, अगले प्लेटफार्म पे चढ़ता, फिर उतरता, पार करता अन्ततः एक नम्बर पर पहुँच ट्रंक रखता हूँ, लौट पड़ता हूँ. यही क्रम बाकी सामान के लिए भी दोहराता हूँ. लोगों का आना-जाना लगा है, सब खाए-पिये लग रहे, क्या-क्या खाया होगा इन लोगों ने, दुनिया भर के स्टॉल लगे हैं,हर स्टॉल पे भीड़ लगी है सबको कुछ न कुछ मिल रहा, कोई मेरा पेट क्यों नहीं पढ़ता, कोई मेरी निरीहता क्यों नहीं पढ़ता. चारों सामान एक नम्बर प्लेटफार्म पर पहुँचा ट्रंक पर ही दुहरा हो जाता हूँ. 48 घण्टे से अधिक हो रहे पेट में अन्न का दाना नहीं, आँखों के नीचे हल्की कालिमा उभर रही.

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक एक पर तीसरी सुबह खुल रही पर जीवन का क्रम वही आँतों पे टिका हुआ, मन में आया कि जी आर पी थाने में जाकर बात करता हूँ, पर सामान का क्या करूँ, कहाँ ढोउँ, जेब तो कटवा ही ली अब यदि सामान भी हाथ से जाए ? तिस पर संकोच अलग, कहीं नहीं जाता नियति के समक्ष अड़ा रहता हूँ.

आगे दीमापुर की तरफ जाने वाली गाड़ी को दस बजे इसी एक नम्बर पे लगना था किन्तु ऐन वक्त पे घोषणा हुई कि ट्रेन एक नम्बर पर नहीं सात नम्बर पर लगेगी एक भूखे-टूटे मनुष्य की असहायता की ऐसी पराकाष्ठा, ऐसी परीक्षा !

भारतीय रेल व्यवस्था ! तुम नहीं जानतीं क्या पाप कर रही हो, क्या अघट कर दिया है तुमने ! तुम्हारे लिए प्लेटफार्म बदलना एक प्रशासनिक आदेश है किन्तु एक मनुज टूटन की कगार पे है, नियति के षड्यंत्र में भारतीय-रेल तुम भी शामिल हो रही ! रोज़े-महशर ये हिसाब भी रखा जाएगा दावरे-हश्र के हुज़ूर में ताकता हूँ इधर-उधर, कैसी विदीर्णता है, कैसी लाचारी ने जकड़ लिया है कि कोई कँधे पे हाथ भी धर दे तो फूट-फूट कर रो पडूँ, सोचता हूँ चारों सामान उठा लूँ किन्तु उठाऊँ तो उठाऊँ कैसे

ट्रेन की तरफ भाग रहे लोगों पर दृष्टि बिछलती है. ‘सामान उठाए साहेब !’ बाजू से ध्वनि आयी है, चन्द्रभान कुली,-” बटालियन जॉइन करने जा रहे…जेब कट गई…पाँच रुपए बचे हैं, दे देंगे, उठाना है तो उठाओ !” बहुत करके भी इतना ही माँग पाता हूँ.

-“आइये ! एकाध आप उठाइये बाकी हम ले चलते हैं”.

चन्द्रभान ने लाकर लामडिंग जाने वाली पैसेंजर ट्रेन की काष्ठ-कुर्सी पर बिठा दिया है. सामने साधु बाबा हैं. पाँच रुपए चन्द्रभान को दे दिए गए हैं अब दमड़ी नहीं, हाय ! क्या तो घट रहा.

कुछ समय बीतता है

चन्द्रभान वापिस आया है

-” यदि आपके पास पैसे नहीं तो ये दस रुपए रख लीजिए”

-“नहीं, हो जाएगा”

‘हाय रे संकोची ! तेरे संकोच को आग लगे’ आँतें बिफर पड़ी हैं. पेट की भूख के आगे चन्द्रभान के लिए कृतज्ञता भी आकार नहीं ले पाती, हल्की नमी है आँख के कोरों में. चेहरे का हाल-मुहाल देख सामने वाले साधु बाबा भी पूछ बैठते हैं-“परेशान दिखता है बच्चा !”

घर-घर जाते हैं, हर घर से न मिले फिर भी विविध तो मिलता ही होगा सो एकाध रोटी तो होगी बाबा के झोले में इसी आस में झोले को ताकते साधु को पूरा दुखड़ा सुना डालते हैं वो पूरा सुनते हैं पर मिलता कुछ नहीं तो क्या खुलकर ही माँगना पड़ेगा ‘कोई रोटी वोटी है तो दो”

अजब समय है जब तक हाथ पसारकर नहीं मांगेंगे तो क्या कोई देगा नहीं, क्यों ये जगत ऐसा संवेदनहीन हो रखा, क्यों कोई इस असहनीय भूख को नही पढ़ पा रहा

न ! नहीं माँगूगा !

साधु दो लड्डू ले लेते हैं, देते कुछ नहीं.

गुवाहाटी स्टेशन से ट्रेन चल पड़ी है. असम की भू-दृश्यावली खिड़की के पार एक चक्कर में गुज़र रही पर भीतर कोई भाव नहीं उपजता, सारी शक्तता जैसे लुट गयी हो, पेट में दाना होता तो इन दृश्यों को पी रहा होता- दृश्यों को तरल बनाकर पीने की कला आती है मुझे !

प्रथमतया गुज़र रहा अहोम भूमि से, ओ ब्रह्मपुत्र ! ओ सुपारी के पेड़ों की श्रृंखला तुम ही साक्षी रहना मेरी इस भूख की जिसने तुम्हें न निरखने दिया.

शाम तक ट्रेन लामडिंग पहुँचाती है, प्लेटफार्म पर सामान रख ट्रंक के ऊपर ही ढेर हो जाता हूं. यहां से दीमापुर के लिए ट्रेन पकड़नी जो देर रात आएगी. समीप ही जवानों का एक ग्रुप पटरी पार बाज़ार में मिल रही स्वादिष्ट मछली और दाल का चटखारे लेकर ज़िक्र कर रहा, सी आर पी एफ के ही जवान लग रहे.

“इनसे माँग लेता हूँ”

किन्तु कैसे स्वयं को दयनीय प्रस्तुत करूँ, देह अशक्त हुई है पर अभी भी दैन्य नहीं, नहीं माँगता !

यहाँ-वहाँ दृष्टि दौड़ाता हूँ, प्लेटफार्म में कही रोटी का टुकड़ा दिख जाए तो उठाकर खा लूँ, खड़े नहीं हुआ जा रहा आँतें तो लगता मर चुकीं, अब दर्द नहीं बल्कि अब दर्द महसूसने की क्षमता ही नहीं.

ट्रंक पर ही पड़ा रह जाता हूँ.

रात दो बजे दीमापुर की ट्रेन आयी है सुबह सात बजे दीमापुर पहुँचा हूँ.

हवलदार नायर आया है लेने, “क्या हुआ साब !” आंखों के नीचे गाढ़े काले घेरे और चेहरे पे उतर आई दीनता को देख पूछता है

कुछ नहीं बोलता

मेस पहुँचा हूँ

तीन पूरे दिन और एक रात के बाद अन्न सामने है

रोटी और भिंडी की सूखी सब्ज़ी

पहला कौर लेता हूँ…

अन्न पधारो आँत में भूखन को सुख दो

सबकी विधी में जा बसो कोई को न दुख दो

© श्री परम शिवम्  

डी आई जी, सी आर पी एफ, गुरुग्राम  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – नि:शब्द ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – नि:शब्द ? ?

एक तुम हो

जो अपने प्रति

नि:शब्द रही जीवन भर,

एक मैं हूँ

जो तुम्हारे प्रति

नि:शब्द रहा जीवन भर..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४८ – कविता – घृणित कृत्य ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४८ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ घृणित कृत्य ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

प्रकृति का खेल बिगाड़ोगे तो, प्रकृति भी खेल बिगड़ेगी ।

पशु पंक्षी को यदि मारोगे तो, प्रकृति भी तुमको मारेगी।।

*

धरती पर तेरा शासन है,    यह भ्रम क्यों तेरे अन्दर है।

जंगल तेरा पर्वत तेरा,            तेरा ही नदी -समुन्दर  है ।।

*

वह झील किनारे बैठी थी,   लखती थी राह विहंगों की।

वह उनसे बातें करती थी,       मैत्री परदेशी परिंदों की ।।

*

वे परदेशी परिंदे थे,          सुंदरता गजब निराली थी।

वे पक्के शिखर विजेता थे,   चालें उनकी मतवाली थीं।।

*

वे इक दूजे को तकते थे,       नर -पक्षी प्रेम निराला था।

आयी टोली शिकार वाली, मन में भीतर कुछ काला था।।

*

गोली बंदूक की निकल गई, एक पक्षी तड़पा लुढ़क गया।

बच्ची ने आह भरी कसकर, रुध गया कंठ और जकड गया।।

*

रे दुष्ट हृदय तूँ बैरी है,     क्यों भूला अपना आतिथ्य धर्म।

तूने जघन्य अपराध किया,      रे पापी कर डाला अधर्म।।

*

परिणाम भयंकर झेलेगा,            तूने कर डाला महा पाप।

अति निम्म कोटि का कर्म किया, देती हूं तुमको कठिन श्राप।।

*

एक वर्ष अभी बीता भी न था,   छाया घन क्रूर करोना का।

साथी संग स्वर्ग सिधारा वह,      हो गया वही जो होना था।।

*

दुनिया ने देखा कठिन क्रोध,     कैसे प्रकृति धारण करती ।

समय चक्र सबने देखा,      मानवता बिनु मारे कैसे मरती।।

*

काव्य कथा के पृष्ठ कथा,         सचमुच सहेज कर रखेंगे ।

ये घृणित पंथ के अनुगामी, इस कविता से कुछ तो सीखेंगे।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग-२९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग- २९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

6.सतपुड़ा वन भ्रमण- जल जंगल ज़मीन का स्वर्ग

जब हमने घर वालों को जनवरी के ठंडे महीने में वन विभाग द्वारा बाघों की गिनती करने वाली मुहिम से जुड़ने की बात बताई तो घर में हंगामा बरपा हो गया। सब बोले सत्तर साल की उम्र में घने जंगलों में बाघों के बीच जाने की क्या ज़रूरत है। सामने बाघ आ गया तो क्या करोगे?

हमने कहा- हमें क्या करना है, जो करना है वह बाघ ही करेगा।

घर वाले बोले- आपको कुछ हो गया तो? 

हमने कहा, पहले तो कुछ होगा नहीं और यदि हो भी गया तो ठीक है। आज से कुछ सालों बाद तुम लोग हमारे मुँह में एक-एक बूँद गंगाजल  डाल कर मौत को एक-एक इंच हमारे नज़दीक आता देखोगे। उससे तो यह ठीक ही है कि एक बाघ से लड़ते हुए उसकी भूख मिटाएँ। हालाँकि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है।

आज वर्ष 2022 के जनवरी महीने की चार तारीख़ है। हम मित्र श्रीकृष्ण श्रीवास्तव के साथ सतपुड़ा बाघ अभयारण्य के कोर-ज़ोन चूरना के वन्य भ्रमण पर जाने को सुबह सात बजे रानी कमलापति रेल स्टेशन से कामायनी एक्सप्रेस में सवार होकर इटारसी के लिए रवाना हुए। रेल में आड़िट विभाग के एक तिवारी जी मिले, जिनसे सरकारी आड़िट और वन भ्रमण के दो बिल्कुल अलग विषयों पर बात करते-करते पता ही नहीं चला कि कब होशंगाबाद आ गया। उन्होंने आड़िट विभाग की अंदरूनी बातें बताईं और हमने जंगल की जंगली रिवायत से उन्हें परिचित कराया। वे उतर कर चले गये। हमने घर से लाई लौंकी की सब्ज़ी और रोटियों का नाश्ता किया। इतने में इटारसी  स्टेशन आ गया। हम श्रीकृष्ण के साथ बचपन से जानी पहचानी नीलम होटल में चाय पीने घुसे। वहाँ एक घंटा इटारसी में लड़ी कुश्तियों और खेले गए हाँकी मेचों के साथ बनखेड़ी, पिपरिया, इटारसी और सिवनी मालवा में कुश्ती दंगल परम्परा पर बातें होती रहीं।

बातचीत के दौरान हरदा के एक खालिक पहलवान का ज़िक्र निकल आया। हम जब 1972 सागर विश्वविद्यालय की कुश्ती प्रतियोगिता में कुश्ती लड़ने गए थे, तब खालिक भी हरदा कालेज से आया था। वह ऊँचा सुंदर कसरती देह का मालिक और मज़बूत इरादों वाला पहलवान था। श्री कृष्ण ने बताया कि वह बम्बई चला गया था। वहाँ से दाऊद की गैंग में भर्ती होकर बम्बई बम कांड के बाद दुबई-शारजाह चला गया। वहीं बस गया।

पिपरिया से गोपाल गांगुड़ा का फ़ोन आया कि वे पिपरिया से अपनी कार में निकल गए हैं। आधा घंटे में इटारसी पहुँच जाएँगे और हिदायत दी कि तब तक सिग्नेचर की तीन बोतल ख़रीद लें। दुकान थोड़ी ही दूर थी। दुकानदार ने एक बोतल की क़ीमत 1500.00 रुपए बताई। भाव-ताव के बाद 1000.00 की दर से तीन हज़ार की तीन बोतलें ख़रीद लीं। गोपाल गांगुड़ा के पहुँचते ही हम वन विभाग के भौंरा कार्यालय के लिए निकले। जिनकी चार पहिया गाड़ी से हम वन विभाग भौंरा पहुँचे। वहाँ हमारा प्रशिक्षण होना था।

आशंका के अनुकूल सरकारी महकमा सुस्त चाल से चलता रहा। तवा और चूरना के वालंटियर्स बीच में उठकर इधर-उधर चल दिए। उन्हें जंगली महकमा के दस्तूर के अनुसार हाँका लगाकर समेटा गया। फिर एप को संचालित करने की विधि बताई गई। ख़ुशक़िस्मती से आई-फ़ोन के लिए एप नहीं बना था इसलिए हम बेकार की बेगारी से बच गए। औपचारिक परिचय के बाद प्रशिक्षण में कोर और बफ़र एरिया का अंतर बताया। फिर यह चेतावनी दी गई कि किसी भी हालत में जंगल में अकेले न जाएँ। हमेशा जूते पहन कर ही निकलें। यहाँ कोबरा साँप निकलते हैं। बहुत सावधानी से नीचे देखकर बाहर निकलें। बाघों की गणना का एक एप डाउनलोड करके बाघों की गणना की प्रक्रिया समझाई गई। सभी लोग एप समझने की प्रक्रिया में उलझ गए और हम यात्रा के संस्मरण लिखने में व्यस्त हो गये। “सुरम्य-सतपुड़ा” पुस्तक लिखने हेतु रिज़र्व फ़ॉरेस्ट के बारे में जानकारी जुटाने में एक कर्मचारी को पटा कर अंदरूनी जानकारियाँ निकलवाने में समय का सदुपयोग किया। आख़िर में बताया गया कि हमें, श्रीकृष्ण और गोपाल को मनचाहा चूरना रेंज आबँटन हुआ। लंच के समय तक कुछ सुगमुगाहट होने लगी। वन विभाग के एक अदना कर्मचारी से पता चला कि वन विभाग की तरफ़ से लंच का इंतज़ाम किया गया है। थोड़ी देर में एक पत्तल में पूड़ी-आलू मटर की सब्ज़ी, दाल, चावल का भोजन किया। चूरना के जंगल कहाँ है। पहले इसकी जानकारी लेना आवश्यक है।

भारत का प्रथम संरक्षित वनक्षेत्र क्रांतिकारी भभूत सिंह की मालगुजारी के अंतर्गत आने वाले बोरी के जंगलों को जब्त कर बनाया गया था। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व का ज्यादातर हिस्सा भभूत सिंह की मालगुजारी में आता था। राष्ट्रीय पुर्नजागरण की बेला में अपनी जड़ों को पहचानने का समय है। भभूत सिंह के स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान से लोग अनभिज्ञ हैं। आइए, थोड़ा इतिहास की गलियों में तफ़री कर आयें।

पचमढ़ी का पठारी-पहाड़ी क्षेत्र, जो होशंगाबाद, पिपरिया, छिन्दवाड़ा और बैतूल शहरों के बीच स्थित है, गोंडों-कोरकुओं का रहवास हुआ करता था। भूमि के इस टुकड़े का भूवैज्ञानिक इतिहास मेसोलिथिक युग (9,000-4,000 ईसा पूर्व) तक पीछे जाता है। इतिहासकारों द्वारा इसका नाम गोंडवाना रखा गया। इस घने वन क्षेत्र में रहने वालों को आदिवासियों के रूप में नामित किया गया था। 12वीं-18वीं सदी के बीच इस क्षेत्र पर गोंडों का शासन था। उन्होंने इस क्षेत्र में कई महलों, तालाबों और किलों का निर्माण भी किया। देवगढ़ के शाह ने 1702 में नागपुर शहर बसाया, लेकिन 1710 के दशक के मध्य तक मराठों ने गोंड राज्य पर अधिकार कर लिया, और फिर 1818 में, अंग्रेजों ने मराठों को हरा कर इस क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर लिया।

गोंड धीरे-धीरे जंगलों और पहाड़ियों में चले गए। एक जनजातीय के रूप में गुरिल्ला युद्ध में सिद्धहस्थ गोंड और कोरकू पहाड़ों पर विरल आबादी वाले साधारण लोग थे। 1819 में पचमढ़ी ने अंग्रेजों का ध्यान आकर्षित किया जब नर्मदा घाटी में मराठा प्रमुख अप्पा साहिब भोंसले को अंग्रेजों ने उनके क्षेत्र विस्तार की होड़ में बर्डी के युद्ध में हराया था। अप्पा साहिब शरण लेने के लिए महादेव हिल्स भाग गए। अपने आधुनिक हथियारों से लैस अंग्रेज इस क्षेत्र के सभी छोटे नेताओं, लुटेरों और छोटे मालगुज़ारों को बाहर निकालने में सक्षम थे। अप्पा साहिब नागपुर ले जाए गए। अंग्रेजों के अधीन नाम मात्र के शासक रहे। उनकी मृत्यु पर विधिक उत्तराधिकारी न होने के कारण अंग्रेजों ने उनके राज्य कर क़ब्ज़ा कर लिया।

कैप्टन जेम्स फोर्सिथ के आगमन से 25 साल पहले, होशंगाबाद में सहायक एजेंट कैप्टन ओसेली ने 1832 में पहली बार पचमढ़ी का दौरा किया। उन्होंने इस क्षेत्र से भूवैज्ञानिक और वनस्पति के नमूने एकत्र किए। पचमढ़ी में किसी विदेशी की यह पहली यात्रा थी। बाद में 1852 में, डॉ जेर्डन नामक एक सर्जन ने स्वदेशी जड़ी-बूटियों पर शोध करने के लिए पठार का दौरा किया। 1857 में अंग्रेजों ने पचमढ़ी पर अधिकारिक रूप से कब्जा कर लिया। 1857 के विद्रोह के दौरान तांत्या टोपे कोरकू प्रमुख भभूत सिंह से मदद लेने के लिए पचमढ़ी भाग गए। हालांकि विद्रोह जल्दी दबा दिया गया और तांत्या टोपे को शिवपुरी के नज़दीक पकड़ कर 18 अप्रेल 1959 को शिवपुरी कलेक्टर चौराहे पर फाँसी चढ़ा दिया गया। भभूत सिंह के लोग नीचे के मैदानों में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह और छापे करते रहे। इसी कारण विद्रोहियों को खदेड़ने के नाम पर अंग्रेजों को जंगलों पर आक्रमण करने का अवसर दिया। अंग्रेजों ने एक वर्ष में उनके विद्रोह को दबाकर भभूत सिंह के क्षेत्र को जब्त कर लिया। 1860-61 से इस क्षेत्र को फ़ौजी छावनी बनाने का काम शुरू हुआ। यह क्षेत्र एक तरफ तो सैनिक अड्डे हेतु सुरक्षित था और दूसरा यहाँ से बुंदेलखंड, मालवा, महाकौशल, निमाण, खानदेश और ब्रार के इलाक़ों को फ़ौजी मदद जल्दी भेजी जा सकती थी।

कुछ ही महीनों में कैप्टन जेम्स फोर्सिथ को पचमढ़ी भेजा गया, जहाँ उस समय 30 विषम कोरकू झोपड़ियाँ थीं। 1862 में वनवासियों को वैज्ञानिक संरक्षण के नाम पर हटा कर बोरी के पास के एक तिहाई क्षेत्र को जैव विविधता अभयारण्य के रूप में स्थापित कर दिया गया था। 1864 में, अंग्रेजों ने पचमढ़ी की जमीन स्थानीय सरदार ठाकुर घरब सिंह से 1.70 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से खरीदी। 14,580 एकड़ जमीन के लिए 23,916 रुपये का पूरा मुआवजा दिया गया। अंग्रेजों के पास अब एक रणनीतिक ऊंचाई पर भूमि का एक बड़ा टुकड़ा था जिसका उपयोग छावनी बनाने के लिए किया। आज भी पचमढ़ी का नागरिक प्रशासन छावनी बोर्ड के अधीन है। पचमढ़ी का शाब्दिक अर्थ पांच गुफाएँ है। एक लोकोक्ति के अनुसार पांडवों ने वन में अपने वनवास के वर्षों के दौरान इन गुफाओं में आश्रय लिया था। हालांकि, पुरातत्वविद इस सिद्धांत को खारिज करते हैं। उनके अनुसार गुफाओं का निर्माण बौद्ध भिक्षुओं ने गुप्त काल के दौरान किया था। इतिहास के बाद थोड़ी जानकारी भूगोल की भी लेते चलें।

बायोस्फीयर रिजर्व के कुल क्षेत्रफल 4,926.28 वर्ग किलोमीटर में हज़ारों झरनों से दो बड़ी नदियाँ आकार लेती हैं- देनवा और तवा। उनके बहाव का वर्णन यात्रा संस्मरण का जायज़ा बढ़ाएगा। श्री गोपाल और श्री कृष्ण ने इन सभी इलाक़ों का पैदल भ्रमण किया है।

श्री गोपाल बोले- भौगोलिक रूप से होशंगाबाद जिला दो भागों में बंटा है। एक देनवा घाटी की जंगल पट्टी, और दूसरा मिश्रित आबादी वाला मैदानी भाग सतपुड़ा पर्वत के ऊँचे-नीचे पहाड़ों की तलहटी से नर्मदा कछार तक बीस किलोमीटर फैला है। यहां तवा नहर से सिंचित खेती गुलज़ार है। पहाड़ी जंगल पट्टी में आदिवासी गावों में गोंड-कोरकू आदिवासी निवास करते हैं। खेती-बाड़ी अधिकांशतः मानसूनी बारिश पर निर्भर है। सतपुडा की सबसे ऊंची चोटी धूपगढ़ (पचमढ़ी) से देनवा उद्गमित हुई है। वहीं से एक बड़ी नदी सोनभद्रा का उद्गम स्थल भी है।

देनवा नदी पचमढ़ी के चौरागढ़ क्षेत्र से शुरू होकर झिरपा, मटकुली, मढ़ई के रास्ते तवा में जाकर मिल जाती है। तवा बाँध से निकली नहरों के पानी से सिंचाई के कारण होशंगाबाद और हरदा ज़िलों के खेतों में गेहूँ, चना, धान, तुअर, की भरपूर फसल होती है। यह देनवा नदी का ही जल है जो तवा बाँध को समृद्ध करता है। स्थानीय गोंडों के एक देवता का नाम देवा है। देवा से ही इस नदी का नाम देनवा पड़ा है। देनवा याने देने वाली। देनवा नदी सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र से होकर गुजरती है। यह पेयजल का बड़ा स्रोत है। काफी गर्मी के बाद भी देनवा नदी सूखती नहीं और हर हाल में वन्य प्राणियों के लिए पानी उपलब्ध कराती है। हालांकि जंगल में और भी नदी नाले हैं जो जानवरों को पानी देते हैं, लेकिन देनवा की उपयोगिता बिलकुल अलग है। 

वन विभाग के एक अन्य अधिकारी बताते हैं, कि देनवा पचमढ़ी के चौरागढ़ पहाड़ के पीछे से निकलकर दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर अठखेलियां करते हुए झिरपा, मटकुली के पास जवान हो मढ़ई होते हुए तवा बाँध में समा जाती है। यह जितनी खूबसूरत है उतनी ही खतरनाक भी है। देनवा जब शांत रहती है तब इसकी गोद में आकर बच्चे भी खेलते हैं पर पहाड़ों पर बारिश होते ही इसका मिजाज बदल जाता है। इन दिनों देनवा से जरा सा भी खिलवाड़ जानलेवा साबित हो सकता है। वह हहराती, उफनती और भंवर बनाती रौद्र रूप में रहती है। इसकी खूबसूरती बेमिसाल है। ऊंची पहाड़ी चट्टानों के बीच बनी गहरी खाई में यह तेजी से बहती है। इसे किसी भी जगह से देखिए, हमेशा खूबसूरत नजर आती है।

प्रकृति प्रेमी पिपरिया के श्री गोपाल गांगुड़ा ने आगे बताया- मैं अक्सर इन जंगलों में जाता हूँ और जब भी जाता हूं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि देनवा को ना देखा हो। इसे गर्मी, सर्दी और बारिश किसी भी मौसम में देखा जाए, इसकी ख़ूबसूरती कभी भी कम नहीं होती।

हमने जानना चाहा- तीन लोग अलग-अलग बातें बताते हैं कि देनवा नदी धूपगढ़, चौरागढ़ और महादेव पर्वत से निकलती है। तीनों पर्वतों से एकसाथ कैसे निकल सकती है। तीनों पहाड़ तीन दिशाओं में ऊँचे खड़े हैं।

श्री गोपाल ने खुलासा किया- लेकिन वास्तविकता यही है। इन तीन गगनचुंबी पर्वत शिखरों की शिराओं से बारिश का जल असंख्य पहाड़ी झरनो से बह एकसार हो मटकुली के पहले सहस्त्रधार पर एक बड़ी नदी बन जाता है। देनवा नदी चाँवरपाठा से पूर्वी दिशा पकड़ कर सहस्त्रधार पहुँचती है वहाँ से दक्षिण मुड़ जाती है। सहस्त्रधार से मटकुली और परसापानी होती हुई मढ़ई से गुजर कर तवा बांध में समा जाती है।

श्रीकृष्ण- सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला की प्रसिद्ध धूपगढ़, चौरागढ़ और महादेव की पहाड़ियों से उद्गमित देनवा से कई बार साक्षात्कार होता है। कभी मटकुली के पुल पर, कभी देनवा दर्शन में, कभी थोड़ा नीचे जंगल के रास्तों पर और कभी मढ़ई में उसकी छाती पर सरपट दौड़ती मोटर बोटों की शक्ल में। लेकिन सतधारा में देनवा का सौंदर्य देखते ही बनता है। एक छोर से दूसरे छोर तक हल्के काले रंग की चट्टानों पर अलग-अलग सात धाराओं में उछलती-कूदती गेंद की तरह टप्पा खाती और नाचती-गाती देनवा को घंटों निहारते रहो, तब भी मन नहीं भरता। यहां देनवा के किनारे दोंनों ओर हरा-भरा जंगल है। सरसराती हवा और चिड़ियों के सुंदर गान से आनंद दायक वातावरण रहता है। सतधारा में जब हम पहुंचे तब हमें ज्यादा अंदाजा नहीं था कि यहां देनवा दर्शन और प्राकृतिक सानिध्य पाने के लिए इतने लोग आते हैं। कुछ ही घंटों में दर्जन भर गाड़ियां आ गईं और उसमें बैठे लोग ऊंचाई से उतर कर नदी में स्नान करने चले गए। कुछ लोग अपने साथ भोजन वगैरह लाए थे, वे भोजन करने लगे। बच्चे नदी की रेत में खेलने-कूदने लगे। इन सबसे बेख़बर पशु-पक्षी कीट-पतंगे, पेड़-पौधे निर्विकार रमण कर रहे थे।

हमने कहा- नर्मदा की तरह देनवा का भी धार्मिक महत्व है जो हमें भी देखने को मिला। जिस दिन हम वहां पर गए थे, कुछ ग्रामीण स्त्री पुरूष देनवा की पूजा करने आए थे। भूरा-भगत पर तो मेला भी लगता है। पचमढ़ी आते-जाते समय मटकुली पुल पर रुककर लोग इसकी पूजा करते हैं। पचमढ़ी के रास्ते में देनवा दर्शन एक पर्यटन स्थल बन गया है। जहां खड़े होकर लोग देनवा का अनोखा रूप आँख से देखते और कान से सुनते रहते हैं।

नदियों से जीवन है यह किताबी परिभाषा नहीं, हकीकत है। देनवा के किनारे फैली रेत में बरौआ समुदाय के लोग तरबूज-खरबूज की खेती करते है। गर्मियों में यहां की ककड़ी और खरबूजों की मांग बढ़ जाती है। स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिलता है। गर्मियों के मौसम में मटकुली में यहां की ककड़ी बिकती हैं। महिलाएँ छोटी टोकनियों में ककड़ियां बेचती हैं। लेकिन कई बार बारिश तरबूज-खरबूज बहाकर ले जाती है। यदि बरौआ बिना खेती के रह गए, मगर रोहू, कतला, बाम, सामन मछलियों की फसल उनसे कौन छीन सकता है। मछुआरे जाल लेकर देनवा में डेरा डाले रहते हैं क्योंकि जैसे ही देनवा में थोड़ा ज्यादा पानी हुआ, तवा बांध की मछलियां हवाई जहाज की तरह ऊपर चढ़ आती हैं। लेकिन पिछले सालों से मछलियां कम मिलती हैं, नदी में मगर मच्छ खूब हो गए हैं। देनवा का पानी स्वच्छ, निर्मल और जड़ी-बूटी व खनिजों से युक्त यानी सही मायने में मिनरल वॉटर है। जो पानी बोतलों में मिनरल के नाम से बिकता है, उनमें मिलावट के किस्से आते रहे हैं। लेकिन देनवा का पानी निर्मल मीठा और पीने योग्य है। जब गर्मियों में मटकुली जैसे कस्बों में पानी की कमी होती है, तब इससे ही पूर्ति होती है।

श्री गोपाल बोले- देनवा पहाड़ी नदी होने के कारण खतरनाक  मिजाज रखती है, थोड़ी देर की बारिश से इसमें उफान आ जाता है। और जल्दी ही नीचे भी उतर जाती है। मटकुली निवासी भूरा पाल ने बताया पहले नदी का जो पुराना पुल था उस पर बारिश में नदी के आ जाने से रास्ता बंद हो जाता था। एक बार 6 लोग उफनती नदी को पार करने में डूब कर मर गए थे। वे सभी टूरिस्ट थे। इनके अलावा और भी कई दुर्घटनाएं हुई हैं जिनकी याद दिल को दहला देती है। मटकुली निवासी पप्पू खान ने बताया देनवा की पहाड़ी खाईयां प्रकृति प्रमियों को ही नहीं अपराधियों को भी आकर्षित करती हैं। लगभग 10 साल पहले एक दौर चला था जब देनवा दर्शन प्वाइंट के आसपास शव बरामद होना शुरू हुए थे। खान ने बताया इन शवों का पता कभी नहीं चलता अगर हत्यारे खुद ना बताते कि उन्होंने शव देनवा की घाटी में फेंक दिए हैं। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश की कई आपराधिक घटनाओं में देनवा का जिक्र आता है।

कुल मिलाकर, देनवा जैसी छोटी नदियों का बहुत महत्व है। सतपुड़ा से निकलने वाली ज्यादातर नदियां धीरे-धीरे दम तोड़ रही हैं। दुधी, पलकमती, मछवासा, शक्कर आदि कई नदियां जो पहले सदानीरा थीं, अब बरसाती नाला बन कर रह गई हैं। देनवा में अभी पानी है, अपूर्व सौंदर्य भी है, जंगल भी है। लेकिन यह कब तक बचा रहेगा, यह कहा नहीं जा सकता। इसका पानी भी धीरे-धीरे कम होने लगा है। ऐसी छोटी नदियों को बचाने की जरूरत है। जंगल बचाने की जरूरत है। छोटे स्टापडेम बनाकर बारिश की बूंद-बूंद सहेजने की जरूरत है।

बारिश में मटकुली के पुल पर बाढ़ आ जाती है और जब तक बाढ़ नहीं उतर जाती पिपरिया-पचमढ़ी का रास्ता बंद हो जाता है। इस पुल को बनाने की मांग लंबे अरसे से की जा रही है। जब यातायात बंद रहता है, पचमढ़ी जाने वाले सैलानियों को बहुत परेशानी होती है। मटकुली में ही भभूतसिंह कुंड है, जो आदिवासियों की अंग्रेजों से लड़ाई की याद दिलाता है। यह नदी उस लड़ाई की गवाह है जो हर्राकोट के कोरकू भभूतसिंह ने अपने अधिकार व इज्जत के लिए अंग्रेजों से लड़ी थी। इसी देनवा नदी के किनारे पानी पी पीकर उन्होंने एक दूसरे को पानी पिलाया था, जबरदस्त लड़ाई हुई थी। इस क्षेत्र की दूसरी बड़ी नदी तवा नदी है।

हमने कहा- तवा नदी का बड़ा प्रताप है। यह सारणी के ऊपर पहाड़ों से निकल बांध के रूप में बंधी तवा सी पसरी है। नादिया नामक स्थान पर तवा नदी का पाठ सात किलोमीटर चौड़ा है। धूपगढ़ के नीचे से निकली सुपला और मालिनी नदी, केसला नदी और कई झरनों का पानी लेकर कई पहाड़ों के बीच पाँच से आठ किलोमीटर का चौड़ा पाठ बनाती हुई तवा बांध में स्थिर हो जाती है, जैसे कोई तपस्वी ध्यानमग्न धूनी रमाए हो। पूर्व से सुपला में मालिनी, पश्चिम से तवा में सुखतवा और दक्षिण से केसला नदियाँ आकर साकोट में मिलती हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६९ ⇒ रिश्ते और फरिश्ते ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ते और फरिश्ते ।)

?अभी अभी # ९६९ ⇒ आलेख – रिश्ते और फरिश्ते ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

रिश्ता क्या है तेरा मेरा !

मैं हूं शब, तू है सवेरा।।

कुछ रिश्ते हमें बांधते हैं और कुछ मुक्त करते हैं।

जो स्वयं मुक्त होते हैं, जब हम उनसे जुड़ते हैं, तो हमें भी मुक्ति का अहसास होता है लेकिन जिसे संसार ने जकड़ लिया है, और अगर हमने उसे पकड़ लिया है, तो वह हमारा भी बंधन का ही कारण सिद्ध होता है।

रिश्तों को बंधन का कारण माना गया है। बंधन में सुख है, थोड़ा प्रेम भी है, थोड़ी आसक्ति भी। कुछ बंधन इतने अटूट होते हैं जो टूटे नहीं टूटते, और कुछ बंधन इतने शिथिल और कमजोर होते हैं, कि संभाले नहीं संभलते। कहीं रिश्तों में गांठ आ जाती है तो कहीं तनाव

और कहीं सिर्फ एक प्रेम का धागा ही रिश्तों की बुनियाद बन जाता है।।

रिश्ता दर्द भी है और दवा भी। रिश्ते में कहीं फूल सी खुशबू है तो कहीं कांटों सी चुभन भी है। किसी की फुलवारी महक रही है तो कहीं घरों के बीच दीवार खड़ी हो रही है ;

रिश्तों में दरार आई

बेटा न रहा बेटा,

भाई न रहा भाई …

ऐसी मनोदशा में जब रिश्ते साथ नहीं देते, कहीं से एक फरिश्ता चला आता है। कहते हैं, फरिश्ते का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता। वह तो बस फरिश्ता होता है। यह फरिश्ता हमारे आसपास ही होता है, लेकिन हमें कभी नजर नहीं आता।

आप सड़क के बीच, कुछ अनमने से, कुछ खाए खोए से चले जा रहे हैं, पीछे से एक वाहन हॉर्न दे रहा है, कहीं से अचानक एक अनजान व्यक्ति फुर्ती से आता है और आपको पकड़कर सड़क के किनारे ले जाता है। आप कुछ समझ नहीं पाते। वह आपकी जान बचाकर वहां से चला जाता है। कोई जान ना पहचान। आप सोचते हैं, जरूर कोई फरिश्ता ही आया होगा आपकी जान बचाने।

जीवन में ऐसे काई अवसर आते हैं, जब संकट की घड़ी में कहीं से अनायास ही ऐसा कुछ घटित हो जाता है, जिससे हम राहत की सांस लेने लगते हैं।।

रिश्ता अच्छा बुरा हो सकता है, फरिश्ता कभी बुरा नहीं होता। कभी कभी हमें रिश्तों में भी फरिश्ते नजर आते हैं तो कुछ रिश्ते असहनीय दर्द और मानसिक पीड़ा के कारण रिसते नजर आते हैं। ऐसी परिस्थिति में भी कोई फरिश्ता हमारा रहबर बनकर कहीं से प्रकट होता है और हमें उस पीड़ा से उबार लेता है।

फरिश्ते का भी क्या कभी नाम होता है, कोई पहचान होती है ! जी हां, कभी कभी हो भी सकती है।

हर नन्हा बच्चा एक नन्हा फरिश्ता होता है। कभी हमें अपनी मां ही फरिश्ता नजर आती है तो कभी बहन अथवा भाई। कृष्ण सुदामा तो दोनों ही फरिश्ते होंगे। राम लक्ष्मण जैसे भाई जहां हों, वहां तो फरिश्ते भी शरमा जाएं।।

हमें जहां भी भलाई और अच्छाई नजर आ रही है, वह सब उन फरिश्तों की बदौलत ही है। वे फरिश्ते हम आप भी हो सकते हैं। अच्छे रिश्तों को ही हमने फरिश्तों का नाम दिया हुआ है। किसी गिरते को थाम लेना, किसी मुसीबतजदा इंसान की मदद करना, यही तो एक फरिश्ते का काम होता है।

फरिश्ता स्वयं ईश्वर नहीं होता, लेकिन वह ईश्वर का दूत अवश्य होता है। फरिश्ते की ना तो आरती होती है और ना ही फरिश्ते का कोई मंदिर होता है। न आरती न अगरबत्ती, फिर भी कहीं से संकटमोचक की तरह प्रकट हो जाए, आपकी बिगड़ी बना दे, और गायब हो जाए।।

कितने फरिश्ते हमारे आसपास हैं, हमें मालूम ही नहीं। अच्छाई को महसूस करना ही फरिश्ते को पहचानना है।

जब रिश्तों में स्वार्थ और खुदगर्जी का स्थान प्रेम और त्याग ले लेगा। बुराई अच्छाई की चकाचौंध में कहीं नज़र नहीं आएगी, दूसरों का दुख हमें अपना लगने लगेगा, हर प्यासे तक कोई फरिश्ता कुआं बनकर आएगा, तब हम सब मिलकर यह तराना गाएंगे ;

फरिश्तों की नगरी में

आ गया हूं मैं,

आ गया हूं मैं …!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २७ – कविता – प्रबोधन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “प्रबोधन“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २७ ?

? कविता – प्रबोधन… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

—-1—

कोई तो जन-नायक आए, जिसका यह उद्बोधन हो

शास्त्रों में भी संविधान-सा, अब समुचित संशोधन हो

—-2—-

अपने बँगले में जो कुत्ते-बिल्ली पाले बैठे हैं

वो हमसे कहते हैं ‘बिरझू’ तेरे घर में गोधन हो

—-3—–

अर्जुन-भीम-युधिष्ठिर पर भी, वैसा ही अभियोग लगे

चीर-हरण प्रकरण में दोषी, केवल क्यों दुर्योधन हो

—-4—–

बने तथागत मेरा अपना कोई यदि तुम सोच रहे

ख़ुद का तो अवलोकन कर लो, तुम कितने शुद्धोधन हो

        —5—

अग्नि परीक्षा दंश दहेज़ी, शोषण हर युग में सहती

तोड़ो अंध-मूक परिपाटी, नारी हित अनुशोधन हो

—6—–

अनपढ़-अपराधी न पहुँचें, संसद के गलियारों में

चयन के मानक मापदण्ड का, बहुमत से अनुमोदन हो

—-7—-

वादे उनके सच बनकर यदि, उतरें नहीं धरातल पर

फिर मुखिया का लाल किले से, क्यों झूठा सम्बोधन हो

—8—-

बेक़ारी महँगाई ग़रीबी, जात-पाँत के मुद्दों को

सुलझाने यह चले कारवाँ, ना कोई अवरोधन हो

—9—

चलो उड़ा दें ज्ञान के बल पे, पाखण्डों के परखच्चे

जन-जन में ‘राजेश’ मनन हो, चिंतन-तर्क प्रबोधन हो

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०० ☆ गीत – ।। मैं एक कलम का सिपाही हूँ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०० ☆

☆ गीत ।। मैं एक कलम का सिपाही हूँ ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

।।विधा।।पद्य(छंद मुक्त)तुकांत।।

=1=

मैं राजनीति का मंच हूँ।

मैं लिये व्यंग का तंज हूँ।

मैं विरोधी  पर  पंच हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=2=

मैं भूख का निवाला  हूँ।

मैं मंदिर और शिवाला हूँ।

मैं देश का  रखवाला हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=3=

मैं सबकी सुनता कहता हूँ।

नहीं अपने में ही  रहता हूँ।

शीतल जल  सा बहता हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=4=

मैं  एक शिकारी  भी हूँ।

मैं खुद   शिकार भी हूँ।

पर रहता खबरदार भी हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=5=

मैं रखता  हर  खबर हूँ।

मैं करता खबरदार भी हूँ।

मानो तो मैं अखबार ही हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=6=

मुझ से तेज़  धीमा नहीं है।

मेरे सा कोई नगीना नही है।

मेरी तो कोई सीमा नहीं है।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=7=

मैं बच्चों  का  उत्पात हूँ।

मैं बड़ों का वादविवाद हूँ।

मैं बुजर्गों का आशीर्वाद हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=8=

मैं ऊपर ऊंचा   नभ  सा हूँ।

मैं कठोर  जैसे  थल सा हूँ।

मैं कलकल बहता जल सा हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=9=

में जीवन का मर्म हूँ।

मैं सख्त और नर्म हूँ।

मैं धर्म और  कर्म हूँ ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=10=

मैं गरीब की हाय हूँ।

नहीं मैं  असहाय हूँ।

मैं सर्वपंथ सुखाय हूँ।।

=11=

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

मैं समाज का    दर्पण हूँ।

मैं ईश चरणों में  अर्पण हूँ।

मैं सूचनाओं को समर्पण हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=12=

मैं मन का   स्पंदन हूँ।

मैं राष्ट्र का    वंदन हूँ।

मैं सच का अभिनंदन हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=13=

मैं लिए हर शब्द भी हूँ।

मैं  निःशब्द   भी हूँ।

मैं सदैव उपलब्ध भी हूँ।।

=14=

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

भूत,भविष्य,वर्तमान बात बतलाता हूँ।

लोगो को सचेत कर के भी जागता हूँ।

कलमआईने से हकीकत दिखलाता हूँ।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

=15=

मेरी दुर्गम  सी  डगर है।

मुझमे भी अगर  मगर है।

मेरी वाणी अजर अमर है।।

मैं एक कलम का सिपाही हूँ।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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