हिंदी साहित्य – आलेख ☆ काशी की रामलीला ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी ☆

डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी

(डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी जी एक संवेदनशील एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार के अतिरिक्त वरिष्ठ चिकित्सक  के रूप में समाज को अपनी सेवाओं दे रहे हैं। अब तक आपकी चार पुस्तकें (दो  हिंदी  तथा एक अंग्रेजी और एक बांग्ला भाषा में ) प्रकाशित हो चुकी हैं।  आपकी रचनाओं का अंग्रेजी, उड़िया, मराठी और गुजराती  भाषाओं में अनुवाद हो  चुकाहै। आप कथाबिंब ‘ द्वारा ‘कमलेश्वर स्मृति कथा पुरस्कार (2013, 2017 और 2019) से पुरस्कृत हैं एवं महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा “हिंदी सेवी सम्मान “ से सम्मानित हैं।)

☆ आलेख ☆ काशी की रामलीला ☆ डॉ अमिताभ शंकर राय चौधरी 

(‘सबसे बुरा होता है हमारे सपनों का मर जाना !’- कथाकार संजीव (गिरेबान में झाँकने की जरूरत:ः बहुवचन: अक्टूबर-दिसंबर. 2016) 

ईश्वरगंगी – हाँ, यही नाम है इस पोखरे का। वामन शिवराम आप्टे ने ‘ईश’ के अर्थ में लिखा है – राज्य करना, स्वामी होना, शासन करना आदि, और ‘ईश्वर’ का अर्थ है – 1.शक्तिसम्पन्न 2.दौलतमंद 3.पति ४. परमेश्वर  5.कामदेव और 6.शिव (संस्कृत हिन्दी कोश)। राणाप्रसाद शर्मा ने पौराणिक कोश में ईश्वर के ये अर्थ दिये हैं -महेश्वर या शिव। वैसे काशी तो शिव की नगरी है ही। और शिव ने ही स्वर्ग से धरा पर तेज रफ्तार से उतरती गंगा को अपनी जटा में सँभाल लिया था। यह कथा तो सभी को मालूम है। यहाँ बनारस में गंगा उत्तरवाहिनी हंै, यानी दक्षिण की ओर न जाकर उत्तर की ओर बहती हैं। तो लोकमन में यही आस्था रही होगी कि ईश्वरगंगी के पोखरे में स्नान करने से गंगा नहाने का पुण्य मिलता है, मगर अब तो…….। खैर….

आज शाम यहीं होगा राम केवट संवाद। सरोवर के चारों ओर पुराने मुहल्लों के मकान एक दूसरे के कंधे से कंधे भिड़ाकर खड़े हैं। उत्तर और  पश्चिम तट डाँगरों के कब्जे में। पोखरे के घाट कहीं पक्के हैं, तो कहीं सिर्फ मिट्टी से बने हैं। देखते देखते तालाब के इर्द गिर्द सँकरे रास्तों पर लोक लहरें आकर मचलने लगती हैं। कहीं गोलगप्पे के ठेले लगेे हैं, तो कहीं रास्ते के किनारे कपड़ों पर चिउड़ा और रेवड़ी की दुकाने सजी हैं। गुब्बारेवाले हाथ में फिरकी घुमाते हुए घूम रहे हैं। किसी बालक की आँखें उड़ते गुब्बारों के संग हवाबाजी करने लगती हैं, तो कोई आधुनिक बच्चा अपनी माता का हाथ खींचते हुए अपना माडर्न डिमांड पेश कर रहा है,‘ए मम्मी, हम्मे उ मोबाइल दिला दे !’ एकाध जगह शिव, काली, बंदर, हनुमान और राक्षसों के मुखौटे बिक रहे हैं। एक जमाने में तो कागज की लुगदी से बने मुखौटे ही बिकते थे। आज तो सत्यानाशी प्लास्टिक सर्वव्यापी है। किस तरह यहाँ की एक लोक कला और एक घरेलू उद्योग अपनी आखिरी साँस ले रहे हैं आप इसका भी एहसास कर सकते हैं।

घाट पर एक नाव आकर लगती है। नौका में रंग रोेगन हुआ है, उसे खूब सजाया गया है। हाथों में धनुष वाण लिये वनवासी के भेस में घाट पर खड़े हैं दो छोटे बालक – राम और लक्ष्मण। उनके सिर पर है जटा, माथे पर तिलक और गले में माला। उनकी बगल में उसी तरह खड़ी है नन्ही जानकी। कबहुँ नहिं यहि भाँति देख्यो, आज को सो रंग (-सूर)! अब तीनों को गंगापार जाना है। राम निशादराज गुह यानी केवट को बुलाते हैं।

ज्यों तीनों नाव पर बैठने जाते हैं, केवट ने हाथ जोड़ लिये,‘प्रभु, एक विनती है।’

राम पूछते हैं कि भाई क्या बात है ?

इतने में लीला का ‘व्यास’जी यानी कथावाचक रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड से लीला सम्बन्धित चैपाइयों को पढ़ने लगते हैं,‘ चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुश करनि मूरि कछु अहई।।’ प्रभु, सभी कहते हैं कि तुम्हारे चरणकमलों की धूल में कोई ऐसी जड़ी है जिससे कोई बेजान वस्तु भी इन्सान बन जाती है। क्योंकि …….

‘छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।

’आपके चरणस्पर्श से तो एक पत्थर भी सुंदरी बन गया था। मेरी नाव तो बस काठ की है, वह तो पत्थर जितनी सख्त भी नहीं है। कहीं वो भी किसी मुनि की घरवाली बन कर फुर्र हो जाये तो मैं तो लुट जाऊँगा!’

यानी केवट पहले राम लक्ष्मण और सीता के चरण धोना चाहते हैं फिर उन्हें अपनी नाव पर बैठायेंगे।

इसी तरह से काशी के भिन्न भिन्न मुहल्लों में मानस के एक एक अंश की लीला ‘अभिनीत’ होती रहती है। किसी दिन दिन अगर ईश्वरगंगी में राम केवट संवाद की लीला चल रही होती है, तो उसी दिन हो सकता है रामनगर में सूर्पनखा की नाक काटने वाली घटना को दर्शाया जा रहा है और भोजूबीर में चित्रकूट में भरद्वाज मुनि के साथ उन तीनों की भेंट की लीला सम्पन्न हो रही हो।

काशी की लोक-कलाओं एवं लोक-संस्कृति में रामलीला का अपना अनूठा स्थान रहा है। पर इसे अभिनय मात्र न समझे। इस संदर्भ में काशी के विशिश्ट संस्कृति कर्मी डा0 भानुशंकर  मेहता का वक्तव्य भी काबिले गौर है,‘….‘लीला’ में नाटक मत ढूँढ़ो। यह तो ‘वृत्तांत दर्शन’ है, लोक वृत्तानुकरण है, धार्मिक अनुष्ठान है, जीवन का अनुदर्शक है और सर्वोपरि, ‘भावानुकीर्तन’ है। ….लीला में पात्र अभिनय नहीं करते – भूमिकाएं जीते हैं।’ ( आजकल:ःफरवरी 2006)

ध्यान देनेवाली बात यह भी है कि आज के इस राम केवट संवाद में स्वयम् ईश्वरगंगी पोखरे को भी एक रोल मिला हुआ है। वह गंगा के चरित्र में यहाँ उपस्थित है। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। समस्त आनन्द और मंगलों के मूल गंगा है। वे सबको सुखी करती हैं और हर पीड़ा हर लेती हैं।

रामलीला आरम्भ होने के बाद आज यह पंद्रहवी संध्या है। प्रतिवर्ष अनन्त चतुर्दशी से यह लीला शुरू हो जाती है। और हाँ, परंपरा के अनुसार बालकांड के 175 दोहे चैपाई जिनका लीलारूप में मंचन नहीं किया जाता, उन्हें अनन्त चतुर्दशी के पहले गायन कर रस्म पूरी की जाती है। इसके लिए रामायणियों के उत्साह में कभी कोई कमी नहीं रहती। भादो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर गणेश पूजन के बाद से वे रामनगर के चैक स्थित रामलीला पक्की पर बैठे उन दोहे चैपाइयों का गायन करते हैं।

काशी में गंगा के उस पार स्थित है रामनगर का दुर्ग। वहाँ रहते हैं काशी नरेश। वे हर साल रामलीला के समय गोधूली वेला में हाथी पर बैठ कर जनता के सामने आते हैं। इसके बाद षुरू होती है रामलीला – गंगा के इस पार एवं उस पार। 2013 में वहीं एक विशेष घटना घटी थी। राजा जिस हाथी पर सवार होकर आनेवाले थे, उसका कोई लाइसेन्स नहीं था। चूँकि इसतरह किसी बेजबान प्राणी को तकलीफ देना अनुचित है, इस आधार पर आदि विश्वेश्वर मंदिर का महन्त शिवशंकर  मिश्र ने वन विभाग में शिकायत की थी। नतीजा यह हुआ कि हाथी पर राजा की सवारी दो दिन के लिए टल गयी थी (प्रमोद यादव – दैनिक जागरण 20.9.13)।

कहते हैं काशी में रामलीला का शुभारंभ करनेवाले थे एक वैष्णव, नारायण दास ‘मेघाभगत’। वाल्मीकि रामायण पर आधारित यह लीला संभवतः सन् 1543 में शुरू हुई होगी। मानस की रचना तो उसके बाद यानी 1574 में हुई थी। रामनगर की रामलीला का शुभारंभ 1830 में हुआ था, और काशी की रामलीला 472 साल पुरानी है। चित्रकूट, असीघाट और रामनगर की लीलाओं को ही काशी में प्रमुख माना जाता है। 

पर एक प्रचलित कथा यह भी है कि गोस्वामीजी ने ही नारायण का नामकरण किया था – मेघा भगत। कवि के महाप्रयाण के समय वे इतना व्याकुल हो उठे थे कि आत्महत्या की बात सोचने लगे थे। तुलसीदास ने उनको समझाया और सान्त्वना दी। उनसे कहा कि अपनी जीवन नैया को भक्ति एवं निष्ठां के डाँड़ से खेने का प्रयास करो! संत के महाप्रयाण के बाद अन्न जल त्याग कर विलाप करते हुए वे जा पहुँचे अयोध्या। वहाँ स्वप्न में दो बालकों के रूप मंे उनको देव दर्शन हुआ, और वहाँ से लौटकर उन्होंने चित्रकूट की रामलीला का शुभारम्भ किया। (प्रो. राममोहन पाठक:ः आजकल. फरवरी 2006)

इन मेलों में कभी लाखों की भीड़ इकठ्ठी होती थी। इसीलिए इनको ‘लक्खी मेले’ नाम से अभिहित किया गया है। लोक जीवन में स्वाभाविक रूप से इन मेलों का अलग महत्व होता था। बड़े बूढ़ों से लेकर महिलायें एवं बच्चे – इनमें सभी की हिस्सेदारी होती थी। वे दर्शक तो थे ही, भक्त भी थे और कभी राम बारात का अंश या कभी जनक सभा में सभासद भी होते थे। इन्हीं मेलों में छोटे छोटे दुकानदार अपनी जिन्स लेकर पहुँचते थे। उनका भी कारोबार चलता था। लोग आपस में मिलते जुलते थे। वैसे अब बहुत कुछ बदल चुका है। फिर भी चेतगंज के नक्कटैया के मेले में घर आये मेहमानों की खातिरदारी के लिए घरवालों को पहले से बंदोबस्त करना पड़ता है। चूँकि मेला भले शाम तक षुरू हो जाए, पर लक्ष्मण के द्वारा सूर्पणखा की नाक कटते कटते आधी रात बीत ही जाती है, तो मेहमान उतनी रात अपने घर कैसे वापस जायेंगे? सो उनके खाने एवं ठहरने का प्रबन्ध तो अनिवार्य ही हो जाता है।

नक्कटैया के मेले के जलूस में तरह तरह से सजावट भी होती है। जैसे चित्रकूट की कुटिया के सामने राम, लक्ष्मण और सीता बैठे हैं – ऐसे दृष्यों का स्वांग या झाँकी बनाकर दूर दूर से लोेग आते हैं। फिर लाग और विमान। इनमंे पवनपुत्र द्वारा उड़कर मेघनाद के शक्तिवाण लगने से मूर्छित लक्ष्मण के लिए विषल्या या विषल्यकरणी यानी संजीवन बूटी लेने जाने का दृश्य या ऐसा ही कुछ रहता है। इसमें जो लड़का पवनपुत्र बना होता है, उसे तार के सहारे एक लोहे के स्टैंड से लटका कर रखा जाता है। उसी हालत में उसे घंटों लटके रहना पड़ता है। उधर कहीं अगर राम की वानर सेना की झाँकी प्रस्तुत की गयी है, तो अंगदादि के मुखौटे लगाकर पूरे मेकअप के साथ कई पात्र राम लक्ष्मण के पास खड़े रहते हैं।

अब जरा इस पर भी गौर फरमाइये। लोक संस्कृति की एक अनुपम ताकत होती है इसकी सम्प्रेषणीयता। कथ्य, भाश्य एवं वाचन की दृश्टि से यह जनता जनार्दन के बिलकुल नजदीक होती है। यद्यपि घटनाओं को दर्शाते समय इनमंे कोई अनपेक्षित क्राइसिस, कैथार्सिस या कथानक की सीढ़ी चढ़ने के उपरान्त कोई अनजाना क्लाइमैक्स नहीं होता, फिर भी दर्शक मंडली उसकी जानी पहचानी कहानी में ही भाव विभोर हो उठती है। उदाहरण के लिए जरा सोचिए – वन गमन के समय दर्शक यह जानता है कि आगे क्या होने वाला है, दशरथ का कौन सा हष्र होने जा रहा है, फिर भी वह हर साल जानकी की पीड़ा से, बेटे से बिछुड़ने के कारण राजा दशरथ के हाहाकार से द्रवित हो जाता है। आखिर क्यों ? यहीं पर जनता की बोली, उसकी भाशा, परंपरा, भावनायें, धार्मिक विश्वास, उसका समाज, उसकी परवरिश आदि हर एक का प्रभाव उस पर परिलक्षित होने लगता है।  

इसी बात को जरा और आगे बढ़ायें तो आप पाइयेगा कि भिन्न भिन्न समय में हमारी आजादी की लड़ाई में भी लोक संस्कृति या इन मेलों ने एक महत्वपूर्ण रोल अदा किया था। बंगाल के चारण कवि मुकुंद दास ऐसे मेलों में जाकर ही गाया करते थे,‘ हे बंगबालायें, अपनी कलाइयों से इन रेशमी चूड़ियों को फेंक दो! हे जननी, हे भगिनी, अब जागो!’ उसी तरह आदिवासी लड़ाकू नेता बिरसा मुंडा ने घोषणा की थी कि अब रावण का लंकाराज (यानी अंग्रेजी राज) खतम करने का वक्त आ गया है। मंदोदरी (इंग्लैंड की रानी) की मूर्ति को अब जला देना है! (बिरसा मुंडा:ः के.एस.सिंह. पृ.45)

और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद इन झाँकियों में ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी’ या फाँसी के तख्ते पर चढ़ते तात्या टोपे या अन्य विद्रोहियों की झाँकी भी शामिल की गयी। केवल सीधी व्यंजना नहीं, वरन व्यंग या वक्रोक्ति के जरिए भी अपनी बात कह दी जाती थी। जेम्स् प्रिन्सेप ने ‘बनारस इलस्ट्रेटेड’ में लिखा है सन् 1825 में जो रावण सेना बनायी गयी थी, उनमें बदन पर जैकेट पहने एवं सफेद मुखौटा लगाये ढेर सारे ‘राक्षस’ थे। तो इशारा किस तरफ था? हाँ, प्रिन्सेप्स साहब ने इस बारे में ‘कौनो काॅमेंट’ नहीं किया है। अक्लमंद के लिए इशारा काफी होता है। (फेस्टिवल आॅफ रामलीला)

फिर 1920 के लवण सत्याग्रह या विदेशी कपड़ों की होली को लेकर भी इन मेलों में झाँकी या स्वाॅग की रचना की गयी। आगे चलकर भगत सिंह, सुखदेव एवं राजगुरू भी इनमें किरदार के रूप में उपस्थित हो गये। फिर दूसरी सामाजिक समस्यायों पर भी इसी तरह टिप्पणी की गयी। मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश हो, दहेज के लिए बहुओं की प्रताड़णा, उन पर जुल्म बंद हो – इन विषयों पर भी लाग या झाँकी की रचना हुई। यानी धार्मिक तत्व के अलावा अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी इन मेलांे ने भरसक निर्वाह किया।  

‘‘लीला का अनूठा पक्ष है उसका उद्देष्य, उसका प्रयोजन!’ डा0 भानुशंकर  अपनी बात को इस तरह आगे बढ़ाते हैं, ‘श्रीमद्भागवत के अनुसार:- जीवस्य यः संसरतो विमोक्षणं/ न जानतोऽनर्थ वहच्छरीरतः/ लीलावतारैः स्वयश प्रदीपकं/ प्राज्वालयत्वा तमहं प्रपद्ये।

लीला का उद्देश्य है समाज-कल्याण, मानव मात्र का कल्याण, सबके लिए सुख-समृद्धि, सुख-शांति के लिए आयोजित अनुष्ठान। आधुनिक नाटक में अवसाद है, त्रासदी है, कैथार्सिस है, नहीं है तो सर्वमंगल, सर्वेभवन्तु सुखिनः की कामना।’ (आजकल – वही)

हाँ, तो साहबजान मेहरबान, रामलीला की झाँकी महिमा प्रस्तुत करते हुए मेरी कलम-लीला भी अब समापन की ओर अग्रसर है। मगर रात का ध्रुव तारा भी जब निष्प्रभ होने लगे तो लोक-संस्कृति एवं लोक-विरासत के बारे में कोशी मिथिला अंचल के रमेश कुमार का बयान भी जरा सुन लीजिए, ‘किसी भी लोक-कला, लोक-शिल्प, लोक-तकनीक के पतन की पहली शर्त है कि वह अपने लोगों के बीच में ही अपना कलात्मक महत्व को खो दे।’ (ककसाड़ – दिसंबर. 2016)

और हाँ, पर्दा गिरने से पहले यह भी तो सोचें कि आखिर एक ‘मेला’ मर क्यों जाता है? आप अगर बट-बाबा को ही काट डालिएगा, तो मेला होगा किस मैदान में ? आप अगर खनिज सम्पदा के खनन के नाम पर या तथा कथित विकास के लिए मेले वाली जमीन ही हथिया लीजिएगा, तो मेेला होगा कौने ठाँई? भले ही आप उन अभागे अशिक्षितों को उनकी जमीन की ‘कीमत’(?) अदा कर दें, मगर उनकी आगे की पीढ़ी कहाँ जायेगी? कहाँ बसेगी? क्या खायेगी? अपने बीवी बच्चों को क्या खिलायेगी? क्या आपको मालूम भी है कि इतनी बड़ी एवं निर्मम ‘नर्मदा-रामायण’ के बाद किसको कितना मुआवजा मिला? नर्मदा बचाओ आंदोलन के बारे मेें तो आपने सुना ही है। वहीं धोलेरा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट से प्रभावित 22 गांवों के लोगों ने अहमदाबाद के लिए प्रस्तावित नहरों के लिए सरदार सरोवर प्रोजेक्ट के डिनोटिफिकेशन का विरोध किया था। आखिर नर्मदा का वह पानी गुजरात के किसानों के खेतों की प्यास नहीं बुझा रहा है, वो तो किसी नयी नगरी के निर्माण में ‘कामगार’ बन गया है (प्रीती सम्पत: दि हिन्दू 1.2.2017.)। तो ? जन ही रह नहीं जायेगा तो जन-संस्कृति के दीये जलायेगा कौन ?

रवीन्द्रनाथ ने अपने आलेखों में कई जगह (कालान्तर मंे ‘छोटो ओ बड़ो’, ‘वातायनिकेर पत्र’, फिर राजा प्रजाः समूह में ‘विरोधमूलक आदर्श’ आदि) एक ऋशि वाक्य को दोहराया है:-

अधर्मेनैधते तावत् ततो भद्राणि पश्यति,/ ततः सपत्नान् जयति समूलस्तु विनश्यति।

इसको अगर यूँ कहें:- अधर्म के जरिए कुछ लोग तो ‘बड़े आदमी’ बन जाते हैं, अधर्म में ही वे अपना कल्याण देखने लगते हैं, अधर्म से वे अपने शत्रुओं पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं, परंतु आखिर जड़ से ही उनका विनाश होता है।

लोक-चेतना, लोक-दृश्टि और लोक-संस्कृति के रक्षकों को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि ‘अपनी सीता’ को पाने के लिए स्वयम् राम को जंग-ए-लंका लड़नी पड़ी थी। ‘सिंहासन’ ने पांडवांे को बिना युद्ध के सूच्यग्र मेदिनी देने से भी इनकार कर दिया था। अपने ‘हक’ के लिए उनको लड़ना पड़ा कुरुक्षेत्र का समर।

♦♦♦♦

© डॉ. अमिताभ शंकर राय चौधरी

पताः फ्लैट नं. 301, चौथी मंजिल, टावर नं 1, मंगलम आनन्दा ग्रैंड रामपुरा रोड, सांगानेर, जयपुर, 302029

मो. 9455168359, 9140214489. ईमेल: asrc.vns@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
1

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५५ ☆ शहर कहाँ है? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “शहर कहाँ है?” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५५ ☆

☆ शहर कहाँ है? ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

तुम्हीं बताओ

शहर कहाँ है?

अभी यहीं था

गया कहाँ है ।

 

घर सारे बन गए दुकानें

विज्ञापन से ढके मोहल्ले

शहद घुली खो गईं बोलियाँ

पसर गए कर्कश हो-हल्ले

कुछ तो बोलो

आम आदमी

आख़िर क्यों

लाचार यहाँ है ।

 

तीरथ गुंडे घट-घट व्यापे

चौराहों पर रोज़ प्रदर्शन

मठाधीश के आदेशों पर

ठग मंडल के भजन कीर्तन

चौपट सारी

हुई व्यवस्था

मूक बधिर

कानून जहाँ है ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (२) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (२) ? ?

शिवोऽहम् के संदर्भ में आज  निर्वाण षटकम् के दूसरे श्लोक पर विचार करेंगे।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः

न वा सप्तधातुः न वा पंचकोशः।

न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

न मैं मुख्य प्राण हूँ और न ही मैं पंचप्राणों में से कोई हूँ। न मैं सप्त धातुओं में से कोई हूँ, न ही पंचकोशों में से कोई । न मैं वाणी, हाथ, अथवा पैर हूँ, न मैं जननेंद्रिय या मलद्वार हूँ।  मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ , मैं शिव हूँ। 

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के इस अद्भुत आत्मपरिचय को यथासंभव समझने का प्रयास जारी रखेंगे।

वैदिक दर्शन में प्राण को ही प्रज्ञा भी कहा गया। शाखायन आरण्यक का उद्घोष है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्राण, वायु के माध्यम से शरीर में संचरित होता है। संचरण करने वाली वायु पाँच स्थानों पर मुख्यत: स्थित होती है। इन्हें पंचवायु कहा गया है। पंचवायु में प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान समाविष्ट हैं।

स्थूल रूप से समझें तो प्राणवायु का स्थान नासिका का अग्रभाग माना गया है। यह सामने की ओर गति करने वाली है। प्राणवायु देह तथा प्राण की अधिष्ठात्री है। अपान का अर्थ है नीचे जाने वाली। अपान वायु गुदा भाग में होती है। मूत्र, मल, शुक्र आदि को शरीर के निचले भाग की ओर ले जाना इसका कार्य होता है। समान वायु संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसका स्थान आमाशय बताया गया है। भोजन का समुचित पाचन इसका दायित्व है। व्यान वायु शरीर में सर्वत्र विचरण करती है। इसका स्थान हृदय माना गया है। रक्त के संचार में इसकी विशेष भूमिका होती है। उदान का अर्थ ऊपर ले जाने वाली वायु है। अपने उर्ध्वगामी स्वभाव के कारण यह कंठ, उर, और नाभि में स्थित होती है। वाकशक्ति मूलरूप से इस पर निर्भर है। 

इसी तरह त्वचा, मांस, मेद, रक्त, पेशी, अस्थि एवं मज्जा, शरीर की सप्तधातुएँ हैं। इनमें से किसी एक के अभाव में मानवशरीर की रचना  दुष्कर है। शरीर में इनका संतुलन बिगड़ने पर अनेक प्रकार के विकार जन्म लेते हैं।

अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय, शरीर के पंचकोश हैं। हर कोश का नामकरण ही उसे परिभाषित करने में सक्षम है। विभिन्न कोशों द्वारा चेतन, अवचेतन एवं अचेतन की अनुभूति होती है।

जगद्गुरु उपरोक्त श्लोक के माध्यम से अस्तित्व का विस्तार प्राण, पंचवायु, सप्तधातु, पंचकोश से आगे ले जाते हैं। तीसरी पंक्ति में वर्णित वाणी, हाथ, पैर, जननेंद्रिय अथवा गुदा तक, स्थूल या सूक्ष्म तक आत्मस्वरूप को सीमित रखना भी हाथी के जितने भाग को स्पर्श किया, उतना भर मानना है।

विवेचन करें तो मनुष्य को ज्ञात सारे आयामों से आगे हैं शिव। शिव का एक अर्थ कल्याण होता है। चिदानंदरूप शिव होना मनुष्यता की पराकाष्ठा है। इस पराकाष्ठा को प्राप्त करना, हर जीवात्मा का लक्ष्य होना चाहिए।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 100 – The Bureaucracy of Customer Support… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Bureaucracy of Customer Support 

☆ Witful Warmth# 100 ☆

☆ Satire ☆ The Bureaucracy of Customer Support… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Modern customer service is designed to test human endurance until you give up on your refund out of sheer exhaustion. When you call, you are greeted by an overly cheerful automated voice that assures you your call is very important to them, right before putting you on hold for forty-five minutes. The hold music is a distorted, lo-fi loop that induces mild psychosis. When you finally speak to a human, they inform you that you have reached the wrong department and transfer you back into the digital abyss. Chatbots are even worse, offering pre-programmed platitudes and asking if they solved your problem before you even finish typing it. The entire system is a brilliant, impenetrable fortress of politeness designed to protect the company’s money from its own customers.

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६२ ☆ उसका ईमान मर गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “उसका ईमान मर गया“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६२ ☆

✍ उसका ईमान मर गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

मन के भ्रम से उबर गया कब का

सच था मुझमें निखर गया कब का

 *

हार की फ़िक़्र,डर गया कब का

जीत का ज़ोम भर गया कब का

 *

राह की रौनकें जो रास आई

छोड़ वो हम सफ़र गया कब का

 *

सच का परचम उठा लिया जबसे

सबका ख़ौफ़ो-ख़तर गया कब का

 *

बात पर जिसकी हो फ़िदा इतने

उसका ईमान मर गया कब का

 *

छाँव हटते पिता की सिर से मेरे

दर्प सारा उतर गया कब का

 *

तोड़कर रब्त हाल वो पूछे

ख़्वाब हर इक बिखर गया कब का

 *

दौरे हाजिर का ये सितम है अरुण

आदमी मुझमें मर गया कब का

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६६ – मिल जाए गर कोई नाख़ुश… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – मिल जाए गर कोई नाख़ुश।)

☆ हेमंत साहित्य # ६६ ☆

✍ मिल जाए गर कोई नाख़ुश… ☆ श्री हेमंत तारे  

राहों की तीरगी को मिटाते रहना

चराग़ रखा है साथ जलाते रहना

कोई रूठे अपना तो ग़ज़ब क्या है

उसे मनाना,मनाना,मनाते रहना

 *

फ़िर बरपा है कहर तपिश का यारों

तुम परिंदों को  पानी पिलाते रहना

 *

तनकीद के पहले गिरेबां में झांक लेना

आसां नही इतना सही राह बताते रहना

 *

अपनी दौलत,शोहरत पे गुरूर न करना

रब से डरना, फकीरों को खिलाते रहना

 *

मिल जाए गर कोई नाख़ुश,नाउम्मीद तुम्हें

हमदर्द हो जाना और होंसला दिलाते रहना

सीखने को बहुत कुछ है ‘हेमंत’ जमाने में

बदकिस्मत हैं वो जो सीखे हैं रुलाते रहना

 

तीरगी =  अंधकार, तनकीद = उपदेश देना

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७४ ☆ कविता – साथी आज मेरे साथ चल… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण – “साथी आज मेरे साथ चल“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७४ ☆

✍ कविता ☆ साथी आज मेरे साथ चल☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

साथी आज मेरे साथ चल, 

कल क्या था कल क्या होगा, 

इसको मत याद कर।

*

बीता हुआ पल काँटा था, 

आने वाला ख्वाब है, 

दोनों के बीच ये लम्हा 

सबसे हसीन जवाब है।

*

साथी आज मेरे साथ चल,

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

*

दर्द को अलमारी में बंद कर दे, 

फिक्र को खिड़की से फेंक दे, 

आज धूप भी हमारी है, 

आज हवा भी हमारी है।

*

साथी आज मेरे साथ चल,

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

*

चल उस पीपल के नीचे बैठें, 

चाय की चुस्की में किस्से बुनें, 

न कल का हिसाब माँगें, 

न कल का वादा ढूंढें।

*

साथी आज मेरे साथ चल

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

*

ज़िंदगी ठहरी नहीं है साथी, 

वो तो बहती नदी का नाम है, 

तू मेरा हाथ थाम ले बस, 

यही इस पल का पैग़ाम है।

*

साथी आज मेरे साथ चल

कल क्या था कल क्या होगा

इसको मत याद कर।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ आलेख ☆ वही गलती, दो फैसले ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“तुम्हें मेरी बात की कभी परवाह ही नहीं रही…” साक्षी की आँखें भर आईं।

अभिषेक ने थके स्वर में कहा, “ऑफिस की परेशानियाँ थीं… इसलिए चुप था।”

कुछ दिनों बाद साक्षी पूरे दिन खामोश रही।

अभिषेक झल्लाया, “हर बात पर चुप्पी क्यों? रिश्ते ऐसे नहीं चलते!”

साक्षी ने उसकी ओर देखा और धीमे से बोली—

“जब तुम चुप रहते हो, उसे तनाव कहते हो…जब मैं चुप रहती हूँ, उसे अहंकार क्यों कहते हो?”

अभिषेक के पास कोई उत्तर नहीं था।

साक्षी की आवाज़ काँप गई-

“तुम्हारी बेचैनी में तुम्हारी झुंझलाहट और तुम्हारा दर्द मैं पढ़ लेती हूँ। मेरी आँखें भीग जाएँ, तो तुम मेरा व्यवहार पढ़ते हो… मेरा दर्द नहीं।”

कमरे में सन्नाटा था।

अभिषेक ने उसका हाथ थाम लिया।

“मुझे माफ़ कर दो,” उसने कहा, “मैं तुम्हारी गलतियाँ देखता रहा, तुम्हारी थकान नहीं।”

साक्षी मुस्कराई, “पति-पत्नी तब एक नहीं होते जब दोनों सही हों… बल्कि तब होते हैं, जब दोनों एक-दूसरे की गलतियों को भी एक ही दिल और एक ही तराजू से तौलें।”

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६४ ⇒ पर्स ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पर्स।)

?अभी अभी # १०६४ ⇒ आलेख – पर्स ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पर्स का जन्म प्रिवीपर्स से हुआ है ! इसे आप प्रीवियस पर्स भी कह सकते हैं। यह तो हुई राजा महाराजाओं वाली बात। आम आदमी की कमीज़ में एक खीसा होता था, जिसमें पइसा रखा जाता था। मुद्रा के प्रचलन के इतिहास में शासकों के सिक्के ही चलते थे, जिन्हें थैलियों में रखा जाता था। मोहर, दीनार का ज़माना था वह।

चीन से हम मोबाइल ही नहीं, paytm भी लाए ! यह तो हुई आज की बात। पेपर करेंसी का जन्मदाता भी सुना है, चीन ही है। प्रोनोट और नोट, दोनों अंग्रेजों की देन है। हम लोग हुंडी वाले हैं। याद कीजिये, नरसिंह भगत की हुंडी और नानी बाई को मायरो। ।

पर्स नाम से ही लेडीज़ लगता है ! इसलिए पुराने समय में मर्द लोग बटुआ रखते थे। आज भी दुकानदार पर्स को लेडीज पर्स ही बोलता है। पुरुष वॉलेट जो रखने लग गए हैं। जब किसी का पर्स खोता है, तो वह कॉमन जेंडर हो जाता है। लेडीज पर्स छीना जाता है, जेंट्स पर्स या तो कोई हिप पॉकेट से निकाल लेता है, या कहीं गिर जाता है।

पर्स लेडीज हो या जेंट्स, एक ऐसी बहुउद्देशीय युक्ति है, जिसमें पैसे के अलावा बहुत कुछ रखा जाता है। कुछ पुरुषों का वॉलेट तो इतना भारी और मोटा हो जाता है, मानो वह उनके शरीर का ही एक अंग हो। बहुत सारे विज़िटिंग कार्ड, आधार, क्रेडिट, डेबिट कार्ड, घर के सामान की सूची के बाद अगर कुछ जगह बचे तो कुछ नकद रुपए।

महिलाओं के पर्स की तो पूछिये ही मत। पूरी गृहस्थी साथ लेकर चलनी पड़ती है। एक समय था, जब हर कामकाजी महिला के पर्स में एक ऊन का गट्टा और सलाइयाँ अवश्य होती थी। जहाँ भी समय मिला, ज़ुबाँ से तेज उंगलियाँ चलती थी। अनाधिकारिक तौर से इसे भी ऑफिस वर्क का ही हिस्सा माना जाता था। आखिर होता तो यह भी एक ज़रूरी काम ही था न। स्कूल और सरकारी दफ्तरों के कार्यालयीन समय में स्वेटर और गर्म कपडों का आँकड़ा अगर न भी उपलब्ध हो, तो भी यह राष्ट्रीय उत्पाद का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, वह भी बिना हींग और फिटकरी के। ।

जब से मुआ मोबाइल और कंप्यूटर आया है, न तो पर्स में ऊन के लिए इतनी जगह बची है, और न ही दफ़्तर में इतना टाइम ! हर समय कंप्यूटर पर आँखें, और की बोर्ड पर उंगलियाँ चलानी पड़ती हैं।

जब से इंडिया डिजिटल हुआ है, और कैशलेस इकॉनमी हुई है, पर्स और बटुए का औचित्य खत्म ही हो गया है। लेकिन पर्स हल्के होने के बजाय अब और भारी होने लग गए हैं।

पर्स की ज़िम्मेदारी बढ़ने के साथ ही इनकी कीमतों में भी इज़ाफ़ा हुआ है। पर्स में जितनी जेब हों, उतना अच्छा। जितने घर की अलमारी में खाने होते हैं, उतनी जगह तो पर्स में होनी ही चाहिए। अलमारी में अगर ताला है, तो पर्स में चेन। इधर चेन खराब, तो उधर जीया बैचेन। आखिर एक चलती फिरती अलमारी ही तो है पर्स। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२४ – देशभक्ति का आईना… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – देशभक्ति का आईना।)

☆ लघुकथा # १२४ – देशभक्ति का आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यालय में देशभक्ति पर भाषण प्रतियोगिता होने वाली थी। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा, “बच्चो, बताओ, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में तुम क्या जानते हो?”

एक बच्चा सहजता से बोला, “मैडम, आप चिंता मत कीजिए। हम गूगल से भाषण खोजकर याद कर लेंगे। इस बार प्रतियोगिता हम ही जीतेंगे।”

शिक्षिका ने गंभीर होकर पूछा, “बेटा, बात केवल प्रतियोगिता जीतने की नहीं है। क्या तुम जानते हो कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई ने देश के लिए क्या किया था?”

बच्चा बोला, “मैडम, इंटरनेट पर सब मिल जाएगा।”

शिक्षिका ने कहा, “इंटरनेट जानकारी दे सकता है, उनके त्याग का एहसास नहीं। राष्ट्रभक्ति केवल भाषण देने का नाम नहीं, उसे जीवन में उतारना भी जरूरी है।”

बच्चा कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मैडम, जब आज भी शिक्षा व्यवस्था में इतनी समस्याएँ हैं, परीक्षाओं में धांधली होती है और पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, तब हम राष्ट्रभक्ति की बातें क्यों करें?”

शिक्षिका ने कहा, “इसीलिए तो पढ़ो बेटा! राष्ट्रभक्ति केवल ‘भारत माता की जय’ बोलना नहीं है। ईमानदारी से पढ़ना, नकल न करना, गलत के विरुद्ध आवाज उठाना और अपने कर्तव्य को निष्ठा से निभाना भी राष्ट्रभक्ति है।”

बच्चा मुस्कुराया, “तो मैडम, इस बार मैं गूगल से भाषण याद नहीं करूँगा। पहले अपने देश को समझूँगा, फिर देश के लिए कुछ करने की कोशिश करूँगा।”

शिक्षिका की आँखों में संतोष उतर आया।

तभी बच्चा फिर बोला, “लेकिन मैडम, एक बात पूछूँ? अगर मैं सच बोलूँगा, नकल नहीं करूँगा और गलत के खिलाफ आवाज उठाऊँगा… तो क्या अगली बार भी मुझे भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने के लिए गूगल से ही कोई ‘सफलता का मंत्र’ ढूँढ़ना पड़ेगा?”

शिक्षिका निरुत्तर थीं।

कक्षा में सन्नाटा छा गया।

बाहर विद्यालय की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ अच्छा लिखा था।

बच्चे ने उस वाक्य को देखा और धीमे से मुस्कुराया।

शायद उस दिन पहली बार उसने ‘सत्यमेव जयते’ पढ़ा नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े होकर देशभक्ति का असली आईना देख लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares