हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६५ ☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता…” ।)

☆ शेष कुशल # ६५ ☆.☆ व्यंग्य – “बक यहाँ कहीं नहीं ठहरता – शांतिलाल जैन 

उधर सात समंदर पार निज़ाम-ए-अमेरिका अपनी कामकाज की मेज़ पर लिखवा कर रखते हैं – ‘बक स्टॉप्स हियर’.  इधर आर्यावर्त में ‘बक स्टॉप्स नो व्हेयर’. अंग्रेजी का बक श्रीमान्, आला हाकिम से लेकर अदने से मुलाज़िम तक कोई उसे अपनी डेस्क पर ठहरने नहीं देता. पास देने में सब प्रवीण. हॉकी फुटबाल में होते तो खूबसूरत पास दे रहे होते. बहरहाल, मैंने बक को जबरन रोककर पूछा – यार ये परीक्षाओं के पेपर बार बार लीक हो रहे हैं –  तुम किसी की डेस्क पर जाकर तो रुकोगे?

उसने कहा – ठहरेंगे तो मारे जाएँगे शांतिबाबू. हमें जहाँ ठहरना चाहिए वहाँ शिकारी बैठे होते हैं. समय आने पर जो आदमखोर हो जाने का भी दम रखते हैं. मुझ निरीह गरीब प्राणी को क्या ही छोड़ेंगे?  आदम जो कभी किसान के रूप में मरता है कभी छात्र के तौर पर,  कभी महिला पहलवानों के तौर पर तो कभी रिटायर्ड सैनिक के तौर पर. हमें ठहरना तो वहीं चाहिए जिनके कारण वे मरते हैं. मगर, क्या मजाल है कि हाकिम की नाक पर मक्खी और कामकाज की डेस्क पर कोई बक ठहर जाए. ठहरने का तो इन दिनों हमने सोचना ही बंद कर दिया है.

‘कभी, कहीं तो ठहरे होगे तुम?’  –  मैंने पूछा.

‘लाल बहादुर शास्त्री के समय ठहरे थे हम. ट्रेन अरियालुर में दुर्घटनाग्रस्त हुई और हम  दिल्ली में रेलमंत्री की डेस्क पर जा कर ठहर गए. अब हम कहीं नहीं ठहरते. आर्यावर्त के  ओहदेदार ‘पास द बक’ में निपुण जो हो गए हैं. जो जितना बड़ा ओहदेदार पास देने की कला में वो उतना ही माहिर.’

आर्यावर्त का मामला श्रीमान्,  मैं भी क्या ही कहता उसे. उसी ने कहना जारी रखा – ‘यहाँ हर संकट के साथ तीन चीज़ें तत्काल पहुँचती हैं — कैमरा,  बयान और उच्च स्तरीय जांच समिति. समिति जवाबदेही तय करेगी. रियाया उम्मीदें पाल लेती है,  समिति के निष्कर्ष आएँगे,  जिम्मेदार लोग दोषी ठहराए जाएँगे, समिति कहेगी मुझसे बक, यू स्टॉप हियर.  मगर ऐसा होता नहीं. वो क्या है कि समिति उच्च स्तरीय होती है. रियाया निच्च. उच्च भी इतनी कि सीढ़ी आप चढ़ नहीं पाएँगे और लिफ्ट आपको कोई देगा नहीं.  गर्दन दुखने लगती है तो जनता उच्च स्तर पर देखना ही बंद कर देती है. समिति उच्च स्तर पर जाँच करती है, निष्कर्ष हैं कि नीचे तक आ नहीं पाते.’

पिछले दिनों एक पुल टूट गया, सैकड़ों की संख्या में लोग मर गए. मैंने बक से कहा – ‘सेतु निगम के अधकारियों से लेकर लोक निर्माण विभाग के वज़ीर तक किसी की डेस्क पर तो तुम्हें रुकना ही पड़ेगा?’

उसने कहा – ‘बहुत भोले हैं आप शांतिबाबू,  बल्कि बेवकूफ़ हैं. गिरनेवाला यह पहला पुल नहीं है. न ओहदेदार नए हैं, न मेरे जैसा बक ही नया है. कुछ क्लासिक पास देखिएगा – निर्माण एजेंसी दोषी है. एजेंसी कहेगी तकनीकी स्वीकृति प्रशासन ने दी थी. प्रशासन कहेगा बजट सीमित था. वित्त विभाग कहेगा वैश्विक परिस्थितियाँ प्रतिकूल थीं. पुल कमज़ोर था, चेतावनी लिखी थी फिर भी बड़ी संख्या में लोग पुल पर आ गए.’  कुछ हुआ कि मरहूम मासूमों को याद करते करते गला भर आया बक का. बोला – ‘कभी किसी रसूखदार को टूटते पुल पर मरते हुए देखा है ? वे पुलों को न पैदल पार करते हैं, न टूटने से मरते हैं.’

बोला – ‘इस तरह पास दिए जाने से बेहतर है हाराकिरी कर ली जाए. यूँ भी सफलता के सौ बाप होते हैं,  विफलता अनाथ. सड़क समय पर बन जाए तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. सड़क बरसात में बह जाए तो यह अप्रत्याशित वर्षा का परिणाम है. महँगाई घटे तो नीति सफल है,  बढ़े तो अंतरराष्ट्रीय कारण हैं. परीक्षा अच्छे से हो जाए तो प्रशासन दक्ष है,  प्रश्नपत्र लीक हो जाए तो कुछ शरारती तत्व सक्रिय थे. निज़ाम का फण्डा क्लियर है,  काम अच्छा हुआ तो यह दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम है. खराब हुआ तो यह मौसम के कारण हुआ. ईरान युद्ध के कारण हुआ. तकनीकी खामी के चलते हुआ. स्थानीय प्रशासन दोषी है. विपक्ष के समय भी हुआ. आला हाकिम का कोई कसूर नहीं.’

‘आपके आर्यावर्त की रियाया शांतिबाबू, एकदम उदारमना!! हर बार भरोसा कर लेती है बक कभी तो किसी विभाग में किसी की डेस्क पर जा कर ठहरेगा. उधर निज़ाम भी उतने ही मुतमइन हैं – अगली घटना घटने तक रियाया पिछली घटना भूल जाएगी. जब कोई नहीं मिलेगा तो नेहरू है ना! बक स्टॉप्स देयर.’ – उसने धीमे से कान में कहा –  ‘बौने कद के ओहदेदार और कामकाज की ऊँची मेज़ें,  तो कैसे लिखवाईएगा – ‘बक स्टॉप्स हियर’. फिर वह चला गया.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (४) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

श्रावण मास निमित्त पुनर्पाठ में पढ़िए ‘निर्वाणषटकम्‘ पर  छह अंकों की यह शृंखला-

? संजय दृष्टि – शिवोऽहम्… (४) ? ?

।। चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

आदिगुरु शंकराचार्य महाराज के आत्मषटकम् को निर्वाणषटकम् क्यों कहा गया, इसकी प्रतीति चौथे श्लोक में होती है। यह श्लोक कहता है,

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं

न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञः।

अहम् भोजनं नैव भोज्यम् न भोक्ता

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।

मैं न पुण्य से बँधा हूँ और न ही पाप से। मैं सुख और दुख से भी विलग हूँ, इन सबसे मुक्त हूँ। अर्थ स्पष्ट है कि आत्मस्वरूप सद्कर्म या दुष्कर्म नहीं करता। इनसे उत्पन्न होनेवाले कर्मफल से भी कोई सम्बंध नहीं रखता।

मंत्रोच्चारण, तीर्थाटन, ज्ञानार्जन, यजन कर्म सभी को सामान्यतः आत्मस्वरूप का अधिष्ठान माना गया है। षटकम् की अगली पंक्ति  सीमाबद्ध को असीम करती है। यह असीम, सीमित शब्दों में कुछ यूँ अभिव्यक्त होता है, ‘मैं न मंत्र हूँ, न तीर्थ, न ही ज्ञान या यज्ञ।’ भावार्थ है कि आत्मस्वरूप का प्रवास कर्म और कर्मानुभूति से आगे हो चुका है।

मंत्र, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ, पाप, पुण्य, सुख, दुखादि कर्मों पर चिंतन करें तो पाएँगे कि वैदिक दर्शन हर कर्म के नाना प्रकारों का वर्णन करता है। तथापि तत्सम्बंधी विस्तार में जाना इस लघु आलेख में संभव नहीं।

आगे आदिगुरु का कथन विस्तार पाता है, ‘मैं न भोजन हूँ, न भोग का आनंद, न ही भोक्ता।’ अर्थात साधन, साध्य और सिद्धि से ऊँचे उठ जाना। विचार के पार, उर्ध्वाधार। कुछ न होना पर सब कुछ होना का साक्षात्कार है यह। एक अर्थ में देखें तो यही निर्वाण है, यही शून्य है।

वस्तुत: शून्य में गहन तृष्णा है, साथ ही गहरी तृप्ति है। शून्य परमानंद का आलाप है। इसे सुनने के लिए कानों को ट्यून करना होगा। अपने विराट शून्य को निहारने और उसकी विराटता में अंकुरित होती सृष्टि देख सकने की दृष्टि विकसित करनी होगी।  शून्य के परमानंद को अनुभव करने के लिए शून्य में जाना होगा।… अपने शून्य का रसपान करें। शून्य में शून्य उँड़ेलें, शून्य से शून्य उलीचें। तत्पश्चात आकलन करें कि शून्य पाया या शून्य खोया?

शून्य अवगाहित करती सृष्टि,

शून्य उकेरने की टिटिहरी कृति,

शून्य के सम्मुख हाँफती सीमाएँ

अगाध शून्य की  अशेष गाथाएँ,

साधो…!

अथाह की कुछ थाह मिली

या फिर शून्य ही हाथ लगा?

साधक एक बार शून्यावस्था में पहुँच जाए तो स्वत: कह उठता है, ‘मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ, शिवोऽहम्..!’

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०६ – गीत – जहरीली हवाएँ… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतजहरीली हवाएँ

? रचना संसार # १०६ ?

☆ गीत – जहरीली हवाएँ…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ?

पथ सभी अवरुद्ध होते,

नेत्र भी देते छलावे।

दोष अब किसका कहें हम,

झूठ निकले आज दावे।।

 

रक्त भी पानी हुआ है,

अस्थि- पंजर आज तन भी।

पाश यम का बाँधता है,

रूह काँपे और मन भी।।

 

हो रही चर्चा गली में,

कर चुके देखो दिखावे।

 

मौसमी बदलाव लाया,

साथ जहरीली हवाएँ।

नित नए चलचित्र चलते,

आसुरी ये आपदाएँ।।

 

सिर शनीचर है चढ़ा भी,

लोग देते हैं भुलावे।

 

मौत से परिणय हुआ है,

नृत्य तांडव हो रहा है।

ढेर लाशों के लगे हैं,

श्वान बैठा रो रहा है।।

 

सिर झुका झिंगुर चले अब,

दादुरों के हैं बुलावे।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३३ ☆ शब्द तुम मीत मेरे ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं आपकी एक भावप्रवण कविता  – शब्द तुम मीत मेरे)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के मुक्तक – शब्द तुम मीत मेरे ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

शब्द तुम मीत मेरे

शब्द में  

छुपे अर्थ सारे

मैं कहती जाऊं

तुम सुनते जाना

शब्द मेरे तुम सो न जाना

नहीं कहूंगी कुछ भी व्यर्थ

तुम खोना न शब्द अपने अर्थ

शब्द बढ़ते ही जाएंगे

सागर नदिया पार लगाएंगे

आएंगे शब्द

इतिहास ग्रंथों से

वे आएंगे तरह तरह के रूप में

बदलेंगे अपना वेश

जाना चाहेंगे देश-देश

पहनेंगे अपनत्व का जामा

बढ़ाएंगे दोस्ती का हाथ

जब उन्हें मिल जाएंगे

अपने शब्दों के अर्थ

तब वे तुम्हें पहचानेंगे नहीं

रख देंगे कुचलकर

तुम्हें बता दिया जाएगा

देश और समाज का दुश्मन

होशियार हो जाओ

शब्द तुम …..

चारों ओर घेरा है गिद्ध का

उपदेश सही है बुद्ध का

शब्दों को सही चुनों

बोलने से पहले गुनों

शब्द तुम…

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१४ ☆ कविता – एक बुंदेली पूर्णिका –  सच्चाई… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक बुंदेली पूर्णिका –  सच्चाई आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१४ ☆

कविता – एक बुंदेली पूर्णिका –  सच्चाई☆ श्री संतोष नेमा ☆

बात जरा सी समझ ने पा रये का हुई है

सच्चाई  को  तुम  झुठला  रये का हुई है

*

आपहिं आप  खूब फेंक  रये  झूठी  सच्ची

झूठ  बोल  खें आँख  दिखा  रये का हुई है

*

कभू   कोउ   की  मदद  करी  ने तुमने भैया

बेमतलब   एहसान   जता   रये  का हुई है

*

कर्जा   बनिया  को   मूढ़े   धरत  फ़िरत  हो

कै  कै  थक  गए  कहां  पटा  रए  का  हुई है

*

सीधी गैल कभू  ने चल ख़ें तुम हो आए

अब  काहे  खो  तुम  चिल्ला  रए का हुई है

*

पी  लओ  खूब   घाट- घाट  को  तुमने पानी

खुद  को  घाट  खुदई  बिसरा  रए का हुई है

*

खुद  पै   कभू   लगाम  धरी   ने  तुमने बबुआ

देख  सूरतिया  जी  ललचा  रए  का हुई है

*

बात  सयानों  की  “संतोष” कभू ने तुमने मानी

हाथ  धर   खे  अब   पछता   रए  का हुई है

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२२ – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे)  

☆  चुभते तीर # १२२ – व्यंग्य  – नेताओं के चुनाव पूर्व वादे ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

चुनाव आते ही देश के नेता इतने विनम्र हो जाते हैं कि सड़क पर चलते कुत्ते को भी नमस्ते कर लें। उनके वादों की लिस्ट इतनी लंबी होती है कि अगर आधी भी पूरी हो जाए तो देश मंगल ग्रह पर अपनी कॉलोनी बना ले। वे हर गरीब के खाते में पैसे, हर हाथ को काम और हर घर को मुफ्त बिजली देने का दावा करते हैं। मंच पर खड़े होकर वे इस तरह दहाड़ते हैं मानो देश की सारी समस्याएं बस अगले रविवार तक खत्म होने वाली हैं। जनता भी इस तमाशे को ताली बजाकर स्वीकार करती है, क्योंकि उसे पता है कि जीतने के बाद यही नेता पाँच साल तक केवल वीआईपी सुरक्षा के घेरे में दिखाई देंगे। वादे तो वैसे भी टूटने के लिए ही बनते हैं, और नेताओं के वादे तो बिना गारंटी वाले चीनी सामान जैसे होते हैं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६४ ⇒ छाता और बरसात ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छाता और बरसात।)

?अभी अभी # १०६४ ⇒ आलेख – छाता और बरसात ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उधर आसमान को पता ही नहीं कि सावन आ गया है, लोग बेसब्री से बारिश का इंतजार कर रहे हैं और इधर एक हम हैं जो पंखे के नीचे बैठकर छाते की बात कर रहे हैं। याद आते हैं वे बरसात के दिन, जब उधर आसमान से रहमत बरसती थी और इधर हम बंदूक की जगह छाता तानकर उसका सामना करते थे। आज हमने सीख लिया, जब रहमत बरसे, तो कभी छाता मत तानो, बस रहमत की बारिशों में भीग जाओ।

जब हमारा सीना भी छप्पन सेंटीमीटर था, तब हम भी बरसती बारिश में सीना तानकर सड़क पर निकल जाते थे, क्योंकि तब घर में कोई नहीं था, जो हमारे लिए बिनती करता, नदी नारे ना जाओ श्याम पैंया पड़ूं। तबीयत से भीगकर आते थे, मां अथवा बहन टॉवेल लेकर हमारा इंतजार करती थी, कपड़े बदलो, और गर्मागर्म दूध पी लो।।

तब कहां आज की तरह सड़कों पर इतनी कारें और दुपहिया वाहन थे। इंसान बड़ी दूरी के लिए साइकिल और कम दूरी के लिए ग्यारह नंबर की बस से ही काम चला लेता था। शायद ही कोई ऐसा घर हो, जिसमें तब छाता ना हो। खूंटी पर टोपी, कुर्ते के साथ आम तौर पर एक छाता भी नजर आता था, काले रंग का। जी हां हमने तो पहले पहल काले रंग का ही छाता देखा था।

एक छाते में दो आसानी से समा जाते थे, और साथ में आगे छोटा बच्चा भी। उधर बच्चा बड़ा हुआ, उसके लिए भी एक बेबी अंब्रेला, यानी छोटा छाता।

अपने छाते से बारिश का सामना करना, तब हमारे लिए बच्चों का ही तो खेल था।

छाता भी क्या चीज है, खुलते ही छा जाता है, हमारे और बरसात के बीच, और छाते से छतरी बन जाता है। एक थे गिरधारी, जिन्होंने अपनी उंगली पर इंद्रदेव को नचा दिया था, छाते की जगह पर्वत ही उठा लिया था।

कलयुग में गलियन में गिरधारी ना सही, छाताधारी ही सही।।

समय के साथ, साइकिल की तरह छाते भी लेडीज और जेंट्स होने लग गए।

रंगबिरंगे फैशनेबल छाते, जापानी गुड़िया और मैं हूं पेरिस की हसीना ब्रांड छाते। हमें अच्छी तरह याद है, छातों में ताड़ी होती थी, जिससे बटन दबाते ही छाता तन जाता था और काले मोट कपड़े पर शायद धन्टास्क लिखा रहता था।

छाता कभी आम आदमी का उपयोग साधन था। कामकाजी संभ्रांत पुरुष डकबैक की बरसाती, हेट और गमबूट पहना करते थे, जेम्स बॉन्ड टाइप। कामकाजी महिलाओं के लिए भी लेडीज रेनकोट उपलब्ध होते थे। हर स्कूल जाने वाले बच्चे के पास बारिश के दिनों में बरसाती भी होती थी।।

समाज में एक तबका ऐसा भी है, जो पन्नी(पॉलिथीन) ओढ़कर ही बारिश का सामना कर लेता है। हमने कई बूढ़ी औरतों को गेहूं की खाली बोरी ओढ़कर जाते देखा है।

आज भी छाते की उपयोगिता कम नहीं हुई है। जो पैदल चलते हैं, उनकी यह जरूरत है। जो कार में चलते हैं, उन्हें भी बरसते पानी में, कार में बैठते वक्त और उतरते वक्त छाते का सहारा लेना ही पड़ता है।।

क्या विडंबना है, नीली छतरी वाले और हमारे बीच भी एक छतरी। रहमत बरसा, लेकिन छप्पर तो मत फाड़। कुंए, नदी, तालाब, पोखर, लबालब भरे रहें, लेकिन हमारे सब्र के बांध की परीक्षा तो मत ले। अब तो हमें तेरी तारीफ के लिए बांधे पुलों पर भी भरोसा नहीं रहा, बहुत झूठी तारीफ की हमने तेरी अपने स्वार्थ और खुदगर्जी की खातिर। हमें माफ कर।।

छाते का एक मनोविज्ञान है, एक छाते में दो प्रेमी बड़ी आसानी से समा जाते हैं।

प्रेम भाई बहन का भी हो सकता है और पति पत्नी का भी। साथ में भीगना भी, और भीगने से बचना भी, तब ही तो प्रेम छाता है। किसी अनजान व्यक्ति को भीगते देख उसे अपनी छतरी में जगह भी वही देगा, जिसके दिल में जगह होगी। हर इंसान तो नेमप्लेट लगाकर नहीं घूम सकता न ;

तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह,

भीग तो पूरा गए, पर हौंसला बना रहा।

(अनूप शुक्ल से साभार)

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३४ – कविता – राधा कृष्ण प्रीत… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मधुमास।)

☆ शशि साहित्य # ३४ ☆

? कविता – मधुमास…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

रूप सजा वसुधा का दुल्हन सा,

बलिहारी हो रहे ऋतुराज…

बदरा भी रिमझिम हुए,

हरियाली का है राज…

*

टिप टिप करती बूंदनियां,

ज्यों बजे कहीं पर साज…

भावुक मन में उठे हिलोरें,

बतलाओ क्या है राज…

*

प्रकृति खिलखिला उठी,

पहन लिया  सौंदर्य का ताज…

ना बोलो कुछ कठोर बोल,

दिल पर गिरे है गाज…

*

बूंदों संग खुशियां बरसें,

छाया मधुमास है आज…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ संसाराच्या रंगपटावर… ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? कवितेचा उत्सव ? 

☆ संसाराच्या रंगपटावर… ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

ब्रह्मांडी लपला विश्वेश

संसाराच्या रंग पटावर

घेउनी येई नाना वेश ||ध्रु||

 *

मंचावर येतांना पसरे

हृदयांतरी सकलांच्या मोद

हंसवुनी रडवूनीया जगता

अंतर्यामी नाही खंत

कनात खाली उतरता परी

देउनी जाई सर्वा क्लेश

संसाराच्या रंग पटावर

घेवुनी येई नाना वेश ||१||

 *

जगण्याला भूमिका घेवूनी

सवे आणतो काही कर्म

कधी भरजरी अंगी शेला

कधी नागवा सांगे वर्म

वसुंधरा ना भास्करमाला

कुठे उराशी धरिशी देश

संसाराच्या रंग पटावर

घेउनी येई नाना वेश ||२||

 *

पडदा पडला खेळ संपला

देह सोडूनी उडून गेला

कर्म परंतु शेष राहिले

शोधत राही नवकायेला

देहा मागुनिया देहाच्या

शोधासाठी नव आवेश

संसाराच्या रंग पटावर

घेउनी येई नाना वेश  ||३||

 *

नवा खेळ अन् भूमिका नवी

कथा कुणाला ठाऊक नाही

कशास आलो काय कराया

देहामध्ये विसरून जाई

संवादाची ओळख नाही

किती काळचा नवा प्रवेश

संसाराच्या रंग पटावर

घेउनी येई नाना वेश  ||४||

कवी : © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम. डी. , डी. जी. ओ.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ “आई-बाबांचं घर…” – लेखक : अज्ञात ☆ बिल्वा शुभम् अकोलकर ☆ 

बिल्वा शुभम् अकोलकर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ “आई-बाबांचं घर…” – लेखक : अज्ञात ☆ बिल्वा शुभम् अकोलकर 

तिथे जाण्यासाठी तुम्हाला कधीही निमंत्रणाची गरज नसते.

आधी फोन करण्याचीही आवश्यकता नसते. तुम्ही कोणते कपडे घातले आहेत, तुम्ही किती यशस्वी झाला आहात किंवा तुमचा दिवस कसा गेला आहे, याने काहीही फरक पडत नाही.

ते घर नेहमीच तुमची वाट पाहत असतं.

उघडण्यासाठी तत्पर असलेलं एक दार. बालपणाच्या आठवणींमध्ये क्षणार्धात घेऊन जाणारा परिचित सुगंध. आणि तुमच्या येण्याची चाहूल लागताच आनंदाने उजळून निघणारी दोन प्रेमळ हृदये.

हे जगातील एकमेव ठिकाण आहे, जिथे तुम्ही असे प्रवेश करू शकता जणू तुम्ही कधीच तिथून दूर गेले नव्हता.

न विचारताच तुमच्यासमोर जेवणाचं ताट येऊन ठेवले जाते. आणि तुम्ही खाण्यास नकार दिलात, तर प्रेमाने थोडं रागावलंही जातं.

हे ते ठिकाण आहे जिथे तुमची शांतता ओळखली जाते, तुमच्या गोष्टी जपल्या जातात, आणि तुमची केवळ उपस्थितीच पुरेशी असते.

तिथे वेळ जणू थांबून जातो.

आई अजूनही तुमच्याकडे तितक्याच ममतेने पाहते, जशी ती नेहमी पाहत आली आहे. बाबा अजूनही तुम्हाला पाहून आपल्या भावना लपवण्याचा प्रयत्न करतात, पण त्यांच्या डोळ्यांतून सत्य स्पष्ट दिसतं.

आणि मग एक दिवस, कोणतीही पूर्वसूचना न देता, ते घर हरवून जातं.

भिंती नाहीशा झाल्या म्हणून नाही. घर विकलं गेलं म्हणूनही नाही.

तर त्या घराला “घरपण” देणारी माणसं दार उघडण्यासाठी तिथे नसतात म्हणून.

म्हणून, जर अजूनही तुमच्याकडे ती संधी असेल तर…

जा.

त्यांना भेटा. त्यांच्यासोबत काही वेळ बसा. त्यांच्या गोष्टी ऐका. एकत्र जेवा. एकत्र हसा. आणखी एक छायाचित्र काढा. आणखी एक मिठी मारा.

कारण आई-बाबांचं घर कायमचं नसतं.

एक दिवस असा येईल, जेव्हा त्या दारातून पुन्हा एकदा आत जाऊन ते नेहमीप्रमाणे तुमची वाट पाहत उभे आहेत, हे पाहण्याची एक संधी मिळावी अशी तुमची मनापासून इच्छा असेल.

जर अजूनही तुमच्याकडे हे भाग्य असेल, तर ते उद्यावर ढकलू नका.

घरी जा.

आजच. ❤️

© बिल्वा शुभम् अकोलकर

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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