English Literature – Poetry ☆ My tribute to INS Hamla… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ My tribute to INS Hamla ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ My tribute to INS Hamla… ??

(Here is my tribute to INS Hamla and Commodore HS Chopra, NM, which he commanded with such deep affection, elan and unwavering commitment.

The imprint of his leadership was unmistakably evident during my recent visit—an establishment that has truly grown from strength to strength under his stewardship.

The retaining wall he envisioned and created stands as a silent sentinel, effectively arresting the relentless march of erosion, safeguarding both land and legacy.

The state-of-the-art facilities that have since come up are nothing short of remarkable—reflecting foresight, precision, and a pursuit of excellence that defines naval ethos.

I still recall our first visit here in 1979, when we came to play cricket… and then again in 1980 for training—memories etched in time, now layered with a sense of pride at what this place has become.

Today, INS Hamla stands as a rare gem in the illustrious repertoire of the Indian Navy—an enduring testament to vision, dedication, and purposeful leadership.)

?

Here it is nestled in the nature’s serene lap,

Silvery waves dance in an endless rhythmic clap

*

Whispering breeze through swaying palms roam,

And every tide adorns the heart of dear home

*

Resplendent shore where tranquil splendour lies,

Here sea meets the earth beneath vast open skies

*

Each grain of sand, each breeze that softly moves,

Still holds the nostalgia of our youthful grooves

*

Years may have passed and journeys far may roam,

Yet memory’s tide returns us to this beloved home

*

For here were shaped the dreams we came to be-

In Hamla’s boundless grace beside the timeless sea

☆ 

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – तार-तार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – तार-तार ? ?

तार-तार चिथड़ों में लिपटी थी

काली कोठरियों में जा छिपती थी,

अकस्मात अंधेरे की

रंगीनियों ने दबोच लिया,

अब दिन तो दिन

उसकी रातें भी उजली थी

पर एक तस्वीर

अब भी नहीं बदली थी,

तार-तार गुरबत

तब उसकी म़ज़बूरी थी

तार-तार अस्मत

खुशहाली के लिये

अब ज़रूरी थी!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४१० ☆ आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता?☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४१० ☆

?  आलेख – लघुकथा का ‘एक ही समय काल’ नियम: अभिव्यक्ति की बेड़ियाँ या आवश्यक संक्षिप्तता? ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लघुकथा हिंदी साहित्य की एक संक्षिप्त विधा है, जो क्षणिक घटना पर आधारित प्रभावशाली कथन प्रस्तुत करती है। इसके मूल नियमों में ‘एक ही समय काल की घटना’ प्रमुख है, यानी कथा पूर्णतः एक ही क्षण या संकीर्ण समयावधि में समाहित हो। यह नियम प्रेमचंद काल के बाद के लघुकथाकारों शिवप्रसाद सिंह आदि के द्वारा प्रतिपादित हुआ, जो लघुकथा को उपकथा या लघु कहानी से अलग करने का प्रयास था।

लेकिन क्या यह नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति क्षमता को अनावश्यक रूप से सीमित नहीं करता? यह प्रश्न आज प्रासंगिक है, क्योंकि यह विधा की गतिशीलता को बाँध देता है।

नियम की जड़ें और औचित्य ..

लघुकथा को ‘क्षण-कथा’ कहा जाता है, जहाँ उद्देश्य पाठक पर तत्काल प्रभाव छोड़ना है। एक ही समय काल का नियम अनावश्यक विस्तार रोकता है, पात्रों की संख्या सीमित रखता है और अंत को तीक्ष्ण बनाता है।

संक्षिप्तता ही लघुकथा को शक्तिशाली बनाती है। तात्कालिकता के नियम का औचित्य यही है, लघुकथा लंबी कहानी का संक्षिप्त संस्करण न हो, बल्कि स्वतंत्र विधा बने।

अभिव्यक्ति क्षमता पर समय सीमाबद्धता का नियम लघुकथा की अभिव्यक्ति को कृत्रिम रूप से बाँधता है। वास्तविक जीवन में कोई घटना शून्य काल में नहीं घटती । कारण-परिणाम की श्रृंखला घटना के समय को  फैलाती है। एक ही समय काल थोपने से जटिल सामाजिक मनोवैज्ञानिक मुद्दे इस विधा में व्यक्त नहीं हो पाते। अंतिम रूप से व्यंग्य, जो लघुकथा का मूल ट्विस्ट है, अक्सर ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ माँगता है, जो एक क्षण में समेटना संभव नहीं होता है।

एक काल्पनिक लघुकथा  की चर्चा करें।

मान लीजिए, एक आल्हा गायक गांव में आता है। यदि नियम पालन करें, तो “गायक ने तार छेड़ा। श्रोता चुप। एक सांड, भीड़ में घुस आया, अचानक भगदड़ मच गई। गायक भागा।”

लेकिन यदि हल्का समय विस्तार अनुमत हो, गायक का आगमन, गायन और सांड वाली घटना का संदर्भ, थोड़ी चर्चा परिदृश्य पर, तो प्रभाव गहरा हो सकता है।

एक और उदाहरण लें,

समकालीन मुद्दा, जैसे भोपाल गैस त्रासदी पर लिखें  तो, एक ही समय में ‘पीड़ित का दर्द’ दिखाना संभव नहीं, वह लंबी श्रृंखला रही है।

है से थी का सफर ।

कुछ आधुनिक लघुकथाकार इस समय सीमा का उल्लंघन करते हुए लघुकथा लिख भी  रहे हैं।

यह नियम तोड़ने से विधा ‘फ्लैश फिक्शन’ की वैश्विक धारा से जुड़ सकती है, जहाँ समय काल का लचीलापन स्वीकार्य है।

संतुलन की आवश्यकता..

निश्चित ही यह नियम लघुकथा को ‘चुटकुला’ बनने से बचाता है, लेकिन मेरी समझ में यह रचनात्मकता को कुंठित करता है। आलोचक विष्णु प्रभाकर ने कहा था कि लघुकथा ‘संक्षिप्तता’ है, न कि ‘काल-सीमा’। यदि नियम कठोर रहे, तो विधा अप्रासंगिक हो जाएगी, जैसे ताजा समाचारों पर आधारित कथाएँ जो शीघ्र पुरानी पड़ जाती हैं।

समाधान यह है कि ‘प्रमुख घटना एक काल में’ का लचीलापन स्वीकार किया जाए । इससे अभिव्यक्ति विस्तृत होगी, व्यंग्य गहरा होगा, और यह बिना कथा विस्तार के जाल में फँसे, संभव है।

लघुकथा को मुक्त करने का समय आ चुका है, आखिर यह कोई अंतिम कानूनी नियम नहीं, केवल साहित्यिक मान्यता ही है। लघुकथाकारो का दायित्व है कि विधा को व्यापक बनाया जाए ताकि यह साहित्य को समृद्ध और जीवंत करे। अन्यथा, यह नियम बाध्यता लघुकथा को हमारी ही बनाई बेड़ियों में सीमित बना कर व्यर्थ ही बांध रहा है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ फैंटसीः अथः वनराज-गजराज संवाद ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य – फैंटसीः अथः वनराज-गजराज संवाद…

☆ ॥ व्यंग्य॥ फैंटसीः अथः वनराज-गजराज संवाद ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

वनराज- ‘गजराज! सुना है कि मार्जारी के राज्य में चुनाव हो रहे हैं।’

गजराज- ‘महाराज! आपने बिल्कुल सही सुना है। आजकल दुनिया के अधिकांश देशों में प्रजातंत्र का बोलबाला है। हमारे समुदाय के वन्य प्राणियों में भी जो नगरीय क्षेत्रों में रहते हैं वहाँ पर भी हर पाँच साल में चुनाव होने लगे हैं। जिसे विरोधी जंगलराज की संज्ञा से अभिहित करते हैं।’

वनराज- ‘ये तो बहुत अच्छी बात है। इस प्रणाली में कम से कम उनको भी अपने मन के मुताबिक़ अपने मुखिया का चयन करने और सरकार बनाने का मौक़ा मिलता है। अब जरा यह भी बतलाओ कि मार्जारी के पक्ष में कौन हैं और उसके विरोध में कौन हैं…?’

गजराज- ‘महाराज! मार्जारी बड़ी चतुरी और चालाक है। वह बहुत पहले से ही मूषकों, छिपकलियों, सरि-सृपों आदि को दूध-रोटी का प्रलोभन देकर अपने पक्ष में करने का जुगाड़ कर चुकी है।’

वनराज- ‘और उसके विरोध में कौन हैं…?और उनकी तैयारी के बारे में जरा विस्तारपूर्वक प्रकाश डालें। मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही है।’

गजराज- ‘राजन्! मार्जारी के विरोध में मुख्य रूप से श्वान दल दावेदार है। बाक़ी सियारों और कौओं के दल को तो वह बहुत पहले ही वाट लगा चुकी है।’

वनराज- ‘गजराज! तुम हम सभी प्राणियों में सबसे अधिक बुद्धिमान हो। जरा सोच-विचारकर बतलाओ कि इस बार के चुनाव में मार्जारी के राज्य में किसकी जीत होने जा रही है।’

गजराज- ‘स्वामी! वैसे, तो पिछली बार श्वानों के दल ने अपनी सीटों में अच्छा-ख़ासा इज़ाफ़ा कर लिया था। अगर वह पिछली बार की तुलना में अपनी सीटों को दोगुना कर लेता है, तो निश्चित रूप से जीत का सेहरा उसके सिर पर बँध सकता है और अपनी सरकार बना सकता है, पर राजन्! मार्जारी खेला करने में बड़ी माहिर है। ऊँट को किस करवट बैठाना है वह इस कला की मास्टर माइंड है।’

अतः महाराज! फ़िलहाल किसी भी निर्णय पर पहुँचना ज़रा जल्दबाज़ी होगी। दोनों खेमों की ओर से ब्लास्स्टिक मिसाइलें दागी जा रही हैं। किसका सर कलम होगा, किसके लहू से धरती रक्तरंजित होगी, आज की तारीख़ में कहना बड़े से बड़े ज्योतिषी द्वारा भविष्यवाणी मुश्किल है। हाँ! बुद्धिजीवियों द्वारा जरूर हवा में तीर-तुक्के छोड़े जा रहे हैं। मेरे देखे, तो जैसे-जैसे मतदान की तारीख़ नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे दिन-प्रतिदिन चुनावी जंग बड़ी रोचक और काँटे की हुई जा रही है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८९ – व्यंग्य – पुनर्जन्म का आधार कार्ड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – डाक्टरेट ऑन डिस्काउंट)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८९ – व्यंग्य  – पुनर्जन्म का आधार कार्ड ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

बेलतारा गांव के राजनीति विशारद ‘लल्लन बाबू’ ने जब इस बार प्रधानी का बिगुल फूँका, तो उन्होंने ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘मुफ्त बिजली’ के घिसे-पिटे वादों को ठेंगा दिखा दिया। उनका नया चुनावी शगूफा था—’पितृ-पेंशन और पुरखा-कनेक्ट योजना’। लल्लन बाबू का तर्क था कि नेता जीवितों की सेवा तो सब करते हैं, लेकिन जो पूर्वज स्वर्ग में बैठकर अपनी संतानों की दुर्दशा देख रहे हैं, उनके लिए कोई कुछ नहीं करता। उन्होंने घोषणा की कि यदि वे चुनाव जीते, तो गांव के श्मशान में ‘वाई-फाई युक्त प्रेत-कॉलिंग सेंटर’ बनवाएंगे, जहाँ से ग्रामीण सीधे अपने परलोकवासी दादा-परदादाओं से सलाह ले सकेंगे कि इस बार कौन सी भैंस खरीदनी है या किस लड़के की शादी कहाँ करनी है। गांव के भोले-भाले लोग, जो पितृ पक्ष में कौवों को रोटी खिलाकर थक चुके थे, अचानक ‘टेक्नो-अध्यात्म’ के इस जादुई जाल में ऐसे फंसे कि उन्हें अपनी वर्तमान गरीबी से ज्यादा पूर्वजों की ‘नेटवर्क कनेक्टिविटी’ की चिंता होने लगी।

प्रचार के अंतिम पड़ाव पर लल्लन बाबू ने गांव के पुराने कुएं के पास एक ‘आत्मा-स्कैनर’ मशीन स्थापित की, जो असल में एक कबाड़ हो चुका एक्सरे मशीन का ढांचा था जिस पर ढेर सारी चमकीली झिलमिलियां चिपकी थीं। उन्होंने दावा किया कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने की कसम खाकर इस मशीन के नीचे खड़ा होगा, उसे अपने अगले सात जन्मों का ‘आधार कार्ड’ और ‘प्रोफेशनल बायोडाटा’ तुरंत मिल जाएगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘घसीटा राम’ बदहवास थे; वे स्कूल की मरम्मत और खाद की बात कर रहे थे, जबकि जनता को यह जानने की उत्सुकता थी कि अगले जन्म में वे राजा बनेंगे या पड़ोसी के घर के पालतू कुत्ते। लल्लन बाबू ने एक लाउडस्पीकर पर डरावनी और रहस्यमयी आवाज़ें रिकॉर्ड करके चला दीं, जिसे सुनकर ग्रामीणों को साक्षात ‘गरुड़ पुराण’ का लाइव टेलीकास्ट महसूस होने लगा। लोग अपनी मेहनत की कमाई चंदे के रूप में लल्लन बाबू के चरणों में अर्पित करने लगे ताकि उनका ‘अगला जन्म’ कम से कम सुरक्षित हो सके।

मतदान के अगले दिन जब लल्लन बाबू की प्रचंड जीत हुई, तो पूरा गांव अपना ‘पुनर्जन्म का आधार कार्ड’ लेने उनके दरवाजे पर कतारबद्ध हो गया। लल्लन बाबू ने एक बड़ा सा बक्सा खोला और उसमें से छोटे-छोटे खाली शीशे के टुकड़े (आईने) सबको बांटना शुरू कर दिया। जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, इसमें तो कुछ लिखा ही नहीं है, बस हमारा अपना चेहरा दिख रहा है!” लल्लन बाबू ने एक लंबी डकार ली और गंभीर स्वर में बोले— “मूर्खों! पुनर्जन्म का आधार कार्ड यही आईना है। इसमें गौर से अपना चेहरा देखो; जिस इंसान ने एक कोरे वादे और कबाड़ की मशीन के चक्कर में अपना भविष्य और वर्तमान मुझे बेच दिया, वह अगले जन्म में ‘गदहा’ बनने की पूरी योग्यता अभी से हासिल कर चुका है! पूर्वज तो स्वर्ग में आराम कर रहे हैं, पर तुम लोगों ने मेरा अगला जन्म जरूर सुधार दिया।” जनता स्तब्ध खड़ी अपनी ही परछाईं को देख रही थी और लल्लन बाबू अपनी नई पजेरो में बैठकर ‘परलोक कल्याण विभाग’ का बजट डकारने शहर की ओर कूच कर गए।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६७ ⇒ चिंतन शिविर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चिंतन शिविर।)

?अभी अभी # ९६७ ⇒ आलेख – चिंतन शिविर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

शिविर के वैसे तो कई अर्थ होते हैं, अस्थायी कैंप, डेरा, पड़ाव टैंट, छावनी, और अड्डा। कालांतर में छावनी, डेरा और अड्डा स्थायी हो जाते हैं। दिल्ली में डेरा काले खां भी स्थायी है और सराय रोहिल्ला भी। हमारे शहर में भी बहुत पुराना जूनी इंदौर गाड़ी अड्डा है। और छावनी की तो बस पूछिए ही मत ! अंग्रेज़ चले गए, छावनी छोड़ गए।

जिस स्थान पर चिंतन किया जा सके, उसे चिंतन शिविर कहा जा सकता है। चिंतन हमारे नियमित जीवन का प्रमुख अंग है। सुबह उठते ही सबसे पहले जो कर्म होता है, उसे नित्य कर्म कहते हैं। जो मुक्त चिंतन के आदी होते हैं, वे सदियों से खुले में शौच करते आ रहे हैं। युग बदलेगा, सोच बदलेगा।

युग भी बदला, शौच का तरीका भी बदला। शांतता, घर घर चिंतन शिविर, नई सोच, खुलकर शौच। बद्ध मल से कोई बुद्ध नहीं बनता।।

जो संबंध चिंतन का चिंतन शिविर से है, वही संबंध सोच का शौच से है। जिनका संकीर्ण सोच होता है, उन्हें कब्जियत होती है। उनके लिए दुनिया गोल नहीं, ईसबगोल है। जिन्हें अधिक फिक्र होती है, वे पहले फिक्र को धुएं में उड़ाते हैं, लेकिन फिर भी बात नहीं बनती। गुटका, चाय और डाबर का लाल मंजन, सब बेकार, महज मनोरंजन।

शौच, सोच का नहीं, कर्म का विषय है। सकारात्मक सोच का परिणाम भी सकारात्मक ही निकलता है। एक अच्छी शुरुआत से आधा काम हो जाता है।

A good start is half done. शेक्सपियर ने भी तो यही कहा है ; All is well that ends well.

अंत भला सो सब भला।।

कुछ लोगों के लिए यह चिंतन शिविर युद्ध शिविर से कम नहीं होता। हम तो जब भी शिविर में जाते थे, यही कहकर जाते थे, पाकिस्तान जा रहे हैं।

इधर सर्जिकल स्ट्राइक, उधर हमारी फतह। बड़ी कोफ़्त होती थी, जिस दिन युद्ध विराम की घोषणा हो जाती थी। सब करे कराए पर पानी फिर जाता था।

वाचनालय तो खैर वह पहले से ही था, जब अखबार घर में कहीं नज़र नहीं आता था, तो घर के सदस्य समझ जाते थे, जब तक कोई हल नहीं निकलेगा, अखबार बाहर नहीं आएगा। हमारा चिंतन शिविर तो एक तरह का अध्ययन कक्ष ही बन गया था। घर पोच वाचनालय की तरह, जासूसी उपन्यास वहां आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। बस सस्पेंस के बाद क्लाइमैक्स का इंतजार रहता था।।

आजकल चिंतन शिविर अत्यधिक आधुनिक हो गए हैं। सृजन और विसर्जन दोनों का कार्य यहां बड़ी कुशलतापूर्वक संपन्न होता है। लेकिन जितना शौच को सुलभ बनाने की कोशिश की जा रही है, उतनी ही लोगों की सोच बिगड़ती जा रही है।

चिंतन शिविर का मुख्य उद्देश्य निरोगी काया और निर्मल मन ही तो है। केवल शौचालय ही नहीं, अपनी सोच भी बदलें। आपके विचारों से आपके चिंतन शिविर की बू नहीं, खुशबू आना चाहिए।

चिंतक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २९३ ☆ गीत – वेदमय जीवन बनाओ… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २९३ ☆ 

☆ गीत – वेदमय जीवन बनाओ ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

वेद का हो गान हर-दिशि,

प्रभु हमें वरदान  दे  दो।

हर  बुराई  दूर   करके,

चेतनामय प्राण दे  दो।

 **

सत्य-पथ से मैं न भटकूँ,

वेदमय जीवन बनाओ।

छल, कपट से दूर रख कर,

प्रेम की  गंगा  बहाओ।

 *

धैर्य  का  अवलंब  देकर,

शांति का तुम दान दे दो।

 **

आज मानव है भटकता ,

खो रहा अब चैन है।

भागता-फिरता निरंतर,

जागता दिन-रैन है।

 *

बन सके इंसान प्रभु ये,

माधुरी मुस्कान दे दो।

 **

पंचतत्वों को बचा दो,

आज दूषित हो रहे हैं।

शिष्टता का ओढ़ चोला,

लोग भूषित हो रहे हैं।

 *

देश की गरिमा बढ़ाकर,

तुम नई पहचान दे दो।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४५ – बाल कहानी — जादूई पेन – ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक बालकहानी  बाल कहानी — जादूई पेन ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # २४५ 

☆ बाल कहानी — जादूई पेन ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

दादीजी सुबह जल्दी उठीं। देखा, श्रेया को बुखार था। 

‘‘क्या हुआ बेटी?’’ दादीजी ने पूछा, ‘‘आज तुम्हारी परीक्षा है, तुम सो रही हो?’’ कहते हुए दादीजी ने उसे छुआ। उसका शरीर गरम हो रहा था। 

‘‘दादीजी! बुखार आ गया है,’’ श्रेया ने कहा। तभी उसकी मम्मी आ गईं, ‘‘मांजी! जब भी परीक्षा आती है, इसे बुखार आ जाता है।’’ 

‘‘अच्छा!’’ दादीजी ने कहा। 

मम्मी ने फोन लगाकर डॉक्टर को बुला लिया। डॉक्टर ने श्रेया को देखा और बुखार उतरने की गोली दे दी। 

कुछ ही देर में श्रेया का बुखार उतर गया। तभी दादीजी पास आकर बोलीं, ‘‘श्रेया! अब कैसी हो?’’ 

‘‘ठीक हूं दादीजी,’’ श्रेया ने बैठते हुए कहा। 

तब दादीजी ने उससे पूछा, ‘‘अच्छा! यह बताओ कि तुम्हें सबसे ज़्यादा डर किससे लगता है?’’ 

‘‘परीक्षा से,’’ श्रेया ने तुरंत कह दिया, ‘‘पेपर में क्या आता है, पता नहीं चलता। उसमें याद किया हुआ लिख पाऊंगी या नहीं — इससे ज़्यादा डर लगता है,’’ श्रेया ने जवाब दिया। 

‘‘परीक्षा से डर कैसा?’’ दादीजी ने कहा, ‘‘मेरे पास ऐसा पेन है जो परीक्षा में डर को दूर करता है। वह पेन जादू का काम करता है।’’ 

‘‘जादूई पेन!’’ 

‘‘हां, जादूई पेन,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘इससे परीक्षा में डर भाग जाता है। बस आप एक अक्षर इस पेन से लिख दीजिए, फिर किसी भी पेन से लिखिए — आप अपना याद किया हुआ भूलते नहीं हैं। जो याद किया है, वह तुरंत लिखते चले जाते हैं।’’ 

‘‘तब तो यह जादूई पेन मुझे दे दीजिए,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मुझे परीक्षा में लिखते हुए डर लगता है। यह पेन मेरी सहायता करेगा?’’ 

‘‘बिलकुल करेगा,’’ दादीजी बोलीं, ‘‘मगर यह पेन तभी काम करता है, जब वह परीक्षा में छात्र के पास हो, और छात्र परीक्षा देने से पहले लिख-लिखकर याद करता हो, उसे दो बार दोहराता हो — तभी यह पेन काम करता है।’’ 

‘‘तब तो यह पेन मुझे दे दीजिए,’’ कहते हुए श्रेया ने दादीजी से जादूई पेन लिया। अपनी कॉपी-किताब खोलकर बैठ गई। फिर अपना अभ्यास दोहराने लगी। जब यह कार्य कर लिया, तब तैयार होकर परीक्षा देने गई। 

आज उसमें आत्मविश्वास था। वह बेफिक्र होकर परीक्षा देने गई। उसका पेपर अच्छा हुआ था। परीक्षा का डर चला गया था। आखिर उसे जादूई पेन मिल गया था। 

श्रेया ने हर दिन अच्छी मेहनत की। अपना पेन संभालकर रखा। इससे सभी पेपर अच्छे से हल हुए। मगर, आखिरी पेपर के दिन उसका पेन गुम हो गया। वह चिंतित हो गई — अब क्या होगा? मगर उसके सभी पेपर हो गए थे, इसलिए उसे ज़्यादा चिंता नहीं थी। 

वह घर आते ही दादीजी से बोली, ‘‘दादीजी! मेरा जादूई पेन गुम गया।’’ 

‘‘कोई बात नहीं, जब स्कूल खुलेंगे तो हम दूसरा ला देंगे,’’ दादीजी ने कहा और वे श्रेया से बातें करने लगीं। 

श्रेया की दादीजी गांव में रहती थीं। वे कुछ समय के लिए शहर आई थीं। श्रेया दादीजी के साथ गांव चली गई। वहां उसने खूब मस्ती की। गांव में घूमी, खेत पर गई, वहां की ताज़ी सब्ज़ियां खाईं। इस तरह खेलते-कूदते उसकी गर्मी की छुट्टियां बहुत जल्दी बीत गईं। 

जब उसका परीक्षाफल आया तो वह इस बार ज़्यादा अंकों से पास हुई थी। वह खुश होकर चिल्लाई, ‘‘वाकई! जादूई पेन ने अपना कमाल कर दिया।’’ 

उस वक्त दादीजी मुस्कराकर रह गईं। मगर जब श्रेया वापस शहर आने लगी तो उसने दादीजी से कहा, ‘‘दादीजी! मुझे वह जादूई पेन दिलवा दीजिए, वह मेरे काम आएगा।’’ 

‘‘चलो! अभी दिलवा देती हूं,’’ कहते हुए दादीजी उसे एक दुकानदार के पास ले गईं, ‘‘लाला! वह पेन देना,’’ दादीजी ने कहा। 

लाला ने एक पेन निकालकर दादीजी को दे दिया। दादीजी ने उस पेन के ऊपर लगा नाम का स्टीकर हटा दिया। फिर बोलीं, ‘‘लो श्रेया! यह जादूई पेन।’’ 

यह देखकर श्रेया चकित रह गई, ‘‘मगर दादीजी! यह तो साधारण पेन है।’’ 

इस पर दादीजी ने कहा, ‘‘किसने कहा कि यह साधारण पेन है? इसने हमारी श्रेया में आत्मविश्वास का जादू भरा था। वह अपने अभ्यास को पूरे विश्वास के साथ और मन लगाकर दोहराने लगी थी। फिर यह सोचकर परीक्षा देने गई कि उसे सब याद है — तब यह पेन साधारण कैसे हो सकता है?’’ 

‘‘मगर दादीजी! यह पेन तो आपने इस साधारण दुकान से खरीदा है।’’ 

‘‘हां, मगर इसके सहारे परीक्षा का डर निकल गया था। इसलिए यह जादूई पेन हुआ कि नहीं?’’ 

‘‘हां दादीजी,’’ श्रेया ने कहा, ‘‘मैं बेकार ही परीक्षा से डरती थी। अब नहीं डरूंगी। मुझे सब याद है, तो परीक्षा में आराम से लिख सकती हूं। यही मेरा विश्वास है। यह सोचकर परीक्षा दूंगी।’’ 

‘‘शाबाश श्रेया,’’ दादीजी ने कहा और श्रेया पूरे आत्मविश्वास के साथ शहर आ गई। तब से उसका परीक्षा का डर सदा के लिए खत्म हो गया।     

 

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

दिनांक- 10.01.2019

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सांज… ☆ श्री राजकुमार कवठेकर ☆

श्री राजकुमार दत्तात्रय कवठेकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ सांज… ☆ श्री राजकुमार कवठेकर ☆

दूर क्षितिज रेघेशी

मेघ व्याकूळ उदास

रंगबिरंगी जगाची

लागे काजळू आरास

*

आणि इथेही अंतरी

लागे थरथरू दीप

होऊ पाहे चैतन्याचे

एक जडशीळ शिल्प

© श्री राजकुमार दत्तात्रय कवठेकर

कवी / गझलकार

संपर्क : ओंकार अपार्टमेंट, डी बिल्डिंग, शनिवार पेठ, आशा  टाकिज जवळ, मिरज मो ९४२११०५८१३

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ तो आणि मी…! – भाग ९९ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

श्री अरविंद लिमये

? विविधा ?

☆ तो आणि मी…! – भाग ९९ ☆ श्री अरविंद लिमये ☆

(पूर्वसूत्र- “सोs टुमारो विल बी द लास्ट डे ऑफ युवर सर्विस लाइफ. विश यू ऑल द बेस्ट… “

“थँक्यू व्हेरी मच सर. थँक्स फॉर एव्हरीथिंग” माझा आवाज भरून आला होता.

माझा अनोखा भविष्यकाळ खऱ्या अर्थाने कृतार्थ करण्यासाठी माझ्या संपूर्ण आयुष्याला अतिशय रेखीव अशी सकारात्मक कलाटणी देणारी ती संध्याकाळ माझ्या उर्वरित आयुष्यासाठी एक नवी पहाटच ठरली होती!

आज पंचवीस वर्षे उलटून गेल्यानंतरही त्या संध्याकाळ पर्यंतचे हे असे सगळेच क्षण माझ्या मनात आपसूकच अलगद जपले गेलेयत! )

वखरेसाहेबांच्या केबिनमधून बाहेर येताना अनेक संमिश्र भावनांनी माझ्या मनात गर्दी केलेली होती. स्वतःच्याच केबिनमधे प्रवेश करतानाही या वास्तूच्या निरोपाचे क्षण हाकेच्या अंतरावर उभे असल्याच्या जाणिवेने माझं मन हळवं होऊन गेलं. अहमदनगर आणि अकोला इथल्या माझ्या अनपेक्षित बदल्या, तिथला माझा कसोटी पहाणारा कार्यकाळ आणि आजचा हा माझ्या उर्वरित आयुष्याची पुढची वाटचाल अतिशय सुकर करणारा अगदी आत्ता आत्तापर्यंत अनिश्चिततेच्या भोवऱ्यात भिरभिरत राहिलेला अनपेक्षित क्षण… सगळं स्वप्नवतच वाटत राहिलं!

आता उद्या आपला इथला अखेरचा दिवस. उद्याची मस्टरवरची आपली सही आणि दिवसभराची उपस्थिती हा केवळ एक उपचार होता. कारण या नोकरीच्या संदर्भातल्या सर्वच जबाबदाऱ्यांतून मी मनाने त्या क्षणीच मोकळा झालो होतो!!

अगदी कांही दिवसांपूर्वी या अशा क्षणाची मी कल्पनाही नव्हती केली. रोज बँकेतून बाहेर पडताना मनात दुसऱ्या दिवशी करण्याच्या अनेक कामांची व्यवधानं असायची. शरीर थकून गेलेलं असायचं. अतिशय वेगानं सातत्याने सुरू असलेलं तीस वर्षांपासूनचं हे चक्र अचानक दहा वर्षं आधीच असं थांबणार होतं आणि सोबत माझी जगण्याची उमेद वाढवणारं, मला मनापासून आनंद वाटेल असं कांहीही करण्याचं स्वातंत्र मला देणारं, दहा वर्षांचं आयुष्य बोनस म्हणून मिळणार होतं! हे असं सगळं उदार हस्ते माझ्या हवाली करताना जणू ‘तो’ मला ‘देता घेशील किती दोन करांने? ‘ असं विचारतोय असंच मला वाटत राहिलं. आज पंचवीस वर्षांनंतर त्या क्षणाकडे मागे वळून बघताना मला जाणवतं ते हेच कीं अट्टाहासाने, जीवाच्या कराराने कांही न करताही मला प्रत्येकवेळी जे हवं असायचं ते मी न मागता ‘तो’च देत आलाय. ‘तो’ सतत होताच माझ्याबरोबर. आणि मी मनापासून अगदी असोशीने समोर आलेल्या क्षणांना प्रेमाने हात लावताच त्या क्षणांचं सोनं झाल्याचा अलौकिक आनंद मला मिळत गेलाय.

या निवृत्तीनंतरच्या वाटचालीत ‘त्या’ने मला अतिशय मोलाचं असं बरंच कांही दिलंय. माझ्या लेखनाच्या बाबतीत बोलायचं तर त्या संदर्भात मनाच्या तळाशी सुप्तावस्थेत पडून राहिलेल्या माझ्या एका अव्यक्त इच्छेबद्दल मी आवर्जून सांगेन.

तोवरच्या पन्नाशीपर्यंतच्या माझ्या वाटचालीत मी माझ्या अगदी बालपणापासूनची लेखनाची आवड कथालेखनाच्या रुपाने प्रयत्नपूर्वक जपली असली तरी मला मनापासून आवडायचं ते नाटकच. तरीही कां कुणास ठाऊक पण नाट्यलेखन हे कथालेखनापेक्षा एक वेगळंच तंत्र आहे असंच मला वाटायचं आणि या धकाधकीच्या आयुष्यांत आपल्याला ते जमणं शक्यच नाही हे स्वीकारून मी आवडीने आणि सातत्याने आवर्जून नाटके पहात माझ्या मनातली दुधाची तहान ताकावर भागवत राहिलो होतो. हे ओळखून असल्यासारखं माझ्या मनात अव्यक्तपणे पडून राहिलेली नाट्यलेखनाची ती अतृप्त इच्छा पूर्ण व्हायचा योग माझ्या ध्यानीमनी नसताना अचानक एक दिवस ‘त्या’नेच जुळवून आणला. प्रसिद्ध नाटककार श्री. सुरेश खरे सरांनी २००५साली सांगलीत घेतलेल्या तीन दिवसीय नाट्यलेखन शिबीराचं निमित्त झालं. मी अंत:प्रेरणेने ते अॅटेण्ट केलं. खरेसरांशी ओळख झाली. त्या शिबिरातून सातारा, सांगली आणि कोल्हापूर या विभागातून सरांनी माझी ‘उदयोन्मुख नाटककार’ म्हणून निवड केली. आणि त्यांनी जाहीर केल्याप्रमाणे मला वेळोवेळी योग्य मार्गदर्शन करतानाच संपूर्ण दोन अंकी नाटक लिहिण्यासाठी आवश्यक असा आत्मविश्वासही दिला. त्यांच्याच मार्गदर्शनानुसार मी वृद्धांच्या प्रश्नावरचे माझे ‘शेवटचे घरटे माझे’ हे पहिले नाटक लिहून पूर्ण केले, ‘नाट्यमंदार’ या व्यावसायिक नाट्यसंस्थेतर्फे त्याचे व्यावसायिक रंगभूमीवर शतकमहोत्सवी प्रयोगही झाले आणि नाट्यक्षेत्रात मला नवीन ओळख मिळाली! हे सगळं इतक्या सहज आणि झटपट घडत गेलं कीं आजही मला ते एखाद्या सुखद स्वप्नासारखंच वाटतं आणि म्हणूनच वास्तवातलं हे स्वप्न मला ‘त्या’नेच घडवलेला एक चमत्कारच वाटू लागतो! ‘त्या’नेच दिलेल्या सद्बुद्धीनुसार प्रसिद्धीच्या मागे लागून पैसे कमावण्याचा हव्यास न धरता, मी सांगलीत राहूनच हौशी रंगमंचासाठी सातत्याने नाट्यलेखन करू लागलो. यातून मिळत गेलेलं यश, नावलौकिक, जोडली गेलेली माणसे, नवनिर्मितीचं निखळ समाधान आणि बरंच कांही…! पैशात ज्याचं मोल होऊच शकणार नाही असं हे सगळं स्वप्नपूर्तीच्या आनंदासोबतच मला मिळत आलंय, जे ‘त्या’च्याकडूनच प्राप्त झालेल्या स्वेच्छानिवृत्तीच्या वरदानाअभावी कधीच शक्य नसतं झालं.

‌आयुष्य म्हणजे सुखांबरोबर दु:खंही आलीच. मीही त्याला अपवाद कसा असेन? म्हणूनच कदाचित स्वेच्छानिवृत्तीनंतर मोकळा श्वास घेण्यापूर्वीच मला अल्पकाळातच एका मागोमाग एक सामोरं जावं लागलेल्या अनेक दुःखद प्रसंगांच्या आठवणी माझ्या मनाच्या एका हळव्या कोपऱ्यात साठून राहिल्या आहेत!

या आठवणींमधले माझ्या स्वेच्छानिवृत्ती नंतर लगेचच्या पहिल्या एकदोन वर्षातच माझ्या आईला अनपेक्षितपणे आलेला पॅरॅलिसीसचा अॅटॅक आणि आरतीच्या भावाचं झालेलं लंग्ज कॅन्सरचं निदान हे प्रसंग त्या दोघांच्याही सहनशीलतेचा अंत पहाणारेच जसे तसेच दोन्हीकडच्या कुटुंबीयांचीही कसोटी पहाणारे होते. प्रदीर्घ संघर्षानंतर झालेल्या त्यांच्या मृत्यूने तर आम्हा सर्वांनाच मुळापासून हादरवून टाकलं होते हे खरंच, पण या दरम्यानच्या प्रत्येक क्षणी त्या दोघांच्याही स्वास्थ, उपचार आणि शुश्रुषा यासाठी दोन्ही घरच्या सर्वांकरता मी व्यक्तीश: पूर्णवेळ उपलब्ध राहू शकत होतो ते केवळ न् केवळ नोकरीतल्या पूर्णवेळच्या व्यवधानातून मी मुक्त झालो होतो म्हणूनच. त्यानंतरच्या सासूसासऱ्यांच्या वृध्दापकाळात त्यांच्या यातनामय परस्वाधीनतेतही मी प्रत्यक्ष आणि मनानेही त्यांना भावनिक आधार आणि सोबत देऊ शकलो याचं समाधान स्वेच्छानिवृत्तीमळेच मला मिळू शकलं होतं. आपल्या आयुष्यांत घडणाऱ्या अशा सर्वच घटना-प्रसंगांमागचं अचूक नियोजन ‘त्या’च्याशिवाय दुसरं कुणाचं असू शकतं? आपण कुणाच्याच नैसर्गिक सुखदु:खाचं निवारण प्रत्येकवेळी करू शकतोच असं नाही आणि दरवेळी इच्छा असूनही मदतीचा हात आणि सोबतही देऊ शकू असंही नाही हे खरंच. आणि तरीही ‘रुग्णावस्थेतल्या या माझ्या माणसांना आपुलकीची सोबत आणि मदतीचा हात देण्यासाठी ‘त्या’ने माझी निवड केली होती’ या विचाराच्या स्पर्शाने माझ्या माणसांचा क्लेशकारक वियोगही समतोल मनाने स्वीकारण्याचं बळ मला मिळालं होतं ही ‘त्या’चीच तर देन होती!!

स्वेच्छानिवृत्ती नंतर नवनवीन गोष्टी नियोजनपूर्वक मनापासून शिकण्याचा आनंदही मला घेता आला. काॅलेज जाॅईन करून पूर्ण केलेला गार्डनिंगचा कोर्स, ‘टॅक्स कन्सल्टन्सी’ चा सर्टिफिकेट कोर्स, नाट्यलेखन सुरू झाल्यानंतर त्या संदर्भातील अभ्यासासाठी पूर्ण केलेले नाट्यशास्त्राचे सर्टीफिकेट आणि डिप्लोमा हे अभ्यासक्रम आणि असं बरंच कांही. या सगळ्याच परीक्षांमधे मिळालेल्या विशेष प्राविण्यापेक्षाही मला मिळालेली योग्य दिशा आणि अनुभव मला महत्त्वाचे वाटतात. जाणीवपूर्वक आनंदाने जगणं यापेक्षा वेगळं काय असतं? हे सगळ्याचा ‘दाता’ तोच तर आहे.

‌तरीही ‘त्या’चं अस्तित्व मानणं किंवा नाकारणं हा वैयक्तिक दृष्टीकोनाचा किंवा स्वातंत्र्याचा भाग आहे हेही मान्य करायलाच हवं.

माझ्यापुरतं सांगायचं तर ‘त्या’च्या अस्तित्वाबद्दलचा विश्वास माझ्या नकळत्या वयापासूनच अशा अनेक घटना-प्रसंगांमुळेच माझ्या मनात माझ्याही नकळत आपसूक रूजत असतानाच पुढेही प्रत्येक पावलावर तो अधिकाधिक दृढच होत गेलेला आहे. माझ्या निवृत्तीनंतरच्या आयुष्यातही पुढे असंख्य प्रसंगांमधे मला तीव्रतेने अनुभवास आलेला ‘त्या’चा अलौकिक स्पर्श माझं जगणं अर्थपूर्ण करतो आहे. त्या प्रत्येक प्रसंगाबद्दल सविस्तर लिहिणं विस्तारभयास्तव मी टाळायचं ठरवलं तरी त्यातले दोन अलौकिक अनुभव मात्र प्रातिनिधिक म्हणून मला आवर्जून सांगावासे वाटतायत!

 —–

क्रमश:…  (प्रत्येक गुरूवारी)

©️ अरविंद लिमये

सांगली (९८२३७३८२८८)

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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