हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # ११५ – आधुनिक डाइट और उपवास – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – आधुनिक डाइट और उपवास)  

☆  चुभते तीर # ११५ – व्यंग्य  – आधुनिक डाइट और उपवास ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

आजकल लोग वजन घटाने के लिए ‘इंटरमिटेंट फास्टिंग’ करते हैं, जिसे हमारे पूर्वज साधारण शब्दों में ‘भूखा रहना’ कहते थे। पुराने ज़माने में उपवास में भगवान याद आते थे, आज के उपवास में केवल कैलोरी काउंटिंग ऐप याद आता है। इंसान चौबीस घंटे में से सोलह घंटे घड़ी देखता है कि कब खाने का समय होगा। जैसे ही खाने की खिड़की खुलती है, वह इस तरह टूट पड़ता है मानो अकाल पीड़ित हो। सलाद के नाम पर घास-फूस को इस तरह खाया जाता है जैसे वह कोई दिव्य जड़ी-बूटी हो। एवोकाडो और चिया सीड्स जैसी विदेशी चीज़ों ने हमारी रसोई पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी है। जो इंसान कल तक दो पराठे घी लगाकर खाता था, वह आज ग्रीन-टी पीकर खुद को संन्यासी घोषित कर रहा है। विडंबना देखिए, इस पूरी प्रक्रिया में वजन भले ही न घटे, लेकिन इंसान का मानसिक संतुलन और जेब का वजन ज़रूर घट जाता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०५० ⇒ उसकी रोटी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उसकी रोटी।)

?अभी अभी # १०५० ⇒ आलेख – उसकी रोटी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

दीवाना आदमी को बनाती है रोटियाँ ! रोटी तो रोटी होती है। तेरी, मेरी, उसकी रोटी। गर्मागर्म, गोल-मटोल रोटियां। दुनिया के किस कोने में रोटी नहीं खाई जाती। नाम अलग होगा, शक्ल अलग होगी, लेकिन जहां भूख होगी, मेहनत होगी, वहाँ रोटी अवश्य होगी।

रोटी गेहूं की होती है, ज्वार, मक्के, बाजरे, जौ की होती है, रोटी तवे की होती है, तंदूर की होती है, चूल्हे, गैस और स्टोव्ह की रोटी होती है, मोटी पतली, रूखी सूखी, चिकनी चुपड़ी रोटी होती है। कहीं इसे फुलका कहते हैं तो कहीं चपाती। किसी के लिए यह टिक्कड़ है तो किसी के लिए पोळी। कहीं उत्सव है, पूजा त्योहार श्राद्ध है, तो वहां यह पूड़ी है, कहीं पंजाबी परांठा तो कहीं मिस्सी रोटी है। न जाने क्यूं, मुझे अपनी रोटी से उसकी रोटी ज्यादा पसंद है।।

भूख है जहाँ, रोटी है वहां ! जहाँ भूख नहीं, वहाँ रोटी का क्या काम। गुलामी के घी से आज़ादी की घास अच्छी। महाराणा प्रताप जंगलों में घास फूस की रोटियाँ खाते थे। जहाँ पेट भरा हो, अपच हो, कब्जियत हो, अथवा हराम की कमाई हो, वहाँ दाल रोटी को घास फूस ही कहते हैं।

जहाँ पापड़, सलाद, एपिटाइजर और स्टार्टर के बिना भूख ही नहीं लगती हो, वे रोटी का स्वाद ही नहीं जानते। उनकी रोटी रूमाली रोटी होती है, नान होती है, कभी पिज्जा तो कभी बर्गर होती है।

उसकी रोटी मेरी रोटी से स्वादिष्ट कैसे ! जिसके पास मुझसे ज्यादा अभाव है, गरीबी है, मुफलिसी है, मज़बूरी है, भूख है, चैन है, नींद है, प्यास है, मुझे उसकी रोटी अपनी रोटी से ज्यादा प्यारी है। गांव हो या कस्बा, झुग्गी हो या झोपड़ी, आश्रम हो या मठ, बस चूल्हे से उठता हुआ धुआं हो, और तवे पर गर्मागर्म सिकती रोटियां हों, उसकी खुशबू मेरे लिए किसी फूल की महक से कम नहीं। एक फूल जब खिलता है, बस वही उसकी इबादत हो जाती है। साँसों के साथ वह सात्विक भाव मेरी आत्मा के लिए छप्पन भोग का काम करता है। बिन खाए मुझ पे नशा छाया है, तेरी रोटी ने गजब ढाया है।।

हेल्थ हाइजीन एक तरफ, कड़कती भूख एक तरफ। आज भी जब भरी दोपहर को अचानक भूख लग आती है, तो कटोरदान से चुपके से दो ठंडी रोटी निकालता हूं, थोड़ा आम के अचार का मसाला लपेटता हूं, और उसकी पुंगी बना, प्रेम से खाता हूं। उसके बाद जब पानी पीता हूं, तो लगता है, महीनों की भूख प्यास शांत हो गई।

मैं कितना भाग्यशाली हूं, मुझे रोटी के साथ अचार भी नसीब है। मेरी भूख प्यास कायम है, भूख प्यास मिटने के बाद ही चैन की नींद नसीब होती है। ज्यादा की नहीं लालच मुझको, बस हर इंसान को इसी तरह भूख लगने पर मेहनत और ईमानदारी की दो रोटी नसीब हो। कोई मेहनती और ईमानदार इंसान का परिवार भूखा ना सोए, रोटी के कारण उसका ईमान न डोले। ईमान रोटी से नहीं, पैसे की हवस के कारण डोलता है। पैसे वालों के लिए तो बड़े बड़े होटल, रेस्तरां, अस्पताल और डॉक्टर मौजूद हैं ही ;

तुम्हें होटलों के पिज्जा बर्गर मुबारक

हमें उसके चूल्हे की गर्मागर्म रोटी, रास आ गई है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ – सिलाई मशीन ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “सिलाई मशीन”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७१ ☆

🌻लघु कथा🌻 सिलाई मशीन 🌻

पैरदान सिलाई मशीन पर बैठी सिलाई करते – करते अचानक अंजू रुक गई। तारिख— ओहहहहहहहहहहह आज तो उसका जन्मदिवस है। पूरे साठ बरस की हो गई। कितने सैकड़ों डिजाईनर कपड़े बनाकर देती रही। परन्तु आज भी उसने भाभी- बहु के उतरे साड़ी ब्लाउज पहन रखे हैं। क्योंकि उसने अपने वैवाहिक जीवन को चरक प्रेस करके मजबूत तो बनाया परन्तु समय के अनुसार चलन पर लटकन- झटकन, डोरी फुदरा सलमा सितारें नही टाँक सकी।

नतीजा आज वह मायके में भैया – भाभी के साथ पूरी जिंदगी बीता रही है। अचानक सुई ऊँगली पर चूभ गई, परन्तु आज यह चूभन  उसे रुला नही रही थी बल्कि पुरानी बातों को याद दिला रही थी।

सिलाई मशीन बनना और सिलाई करने का मतलब वह आज समझ चुकी थीं पर समय बीत चुका था।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८५ – देश-परदेश – World Day for International Justice: 17th July ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८५ ☆ देश-परदेश – World Day for International Justice: 17th July ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज प्रातः ज्ञात हुआ कि आज विश्व न्याय दिवस है। मन को बड़ी शांति मिली कि पूरा विश्व न्याय व्यवस्था को मानता है।

न्यायालय में कार्यरत कर्मचारी, अधिकारी और न्यायधीश के बारे में हम मुंह ना ही खोलें तो अच्छा है। इस विषय पर मित्र मंडली में चर्चा होती रहती है, वैसे हमारे व्हाट्स ऐप ने इनकी व्यवस्था के चिथड़े उखाड़ने में कोई कमी नहीं रखी है।

एक मित्र बोले अब तो न्याय की देवी की आँखों से पट्टी उतार दी गई है, अब न्याय सब देख सकता है। कुछ जानकारों का कहना है, पट्टी हटाने के बाद से न्याय व्यवस्था में कार्य करवाने का नगद में होने वाला खर्च भी अब पहले से एक चौथाई बढ़ गया है।

अब कोई सम्राट विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठ कर न्याय तो नहीं कर रहा है, या बत्तीस पुतलियां हैं, जो न्याय पर सवाल उठाए जाएंगे। इतिहास में तो बादशाह जहांगीर की न्याय जंजीर की चर्चा भी है। हमारा इतिहास लिखने वाले कौन से राजा हरीश चंद्र के वंशज थे ? जो सब सच लिखा होगा।

देश के दक्षिण भाग में एक “संगोल राजदंड” प्रतीकात्मक रूप में संसद स्पीकर के पास रखा हुआ। उसके आने के बाद भी सांसद अपने घटिया व्यवहार में कोई बदलाव नहीं ला पाए हैं।

“Justice Delayed is Justice Denied” या कानून अंधा होता है, वाली कहावते अमर हो चुकी हैं। न्याय व्यवस्था की पैरवी करने वाले भी न्याय व्यवस्था को नीचा दिखाने में भरपूर सहयोग करते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३४ ☆ भिडले लोचन… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३४ ?

☆ भिडले लोचन… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

कसे अचानक जलधारांनी घिरले लोचन

आनंदाची वर्षा होता झरले लोचन

*

जे दिसले ते ह्या डोळ्यांना मृगजळ होते

फसवे पाणी फसवत होते फसले लोचन

*

चंद्र सूर्य अन् कुणीच साक्षी नव्हते तेव्हा

या प्रेमाचे केवळ साक्षी ठरले लोचन

*

मूक युद्ध हे दोघांमध्ये चालू होते

तेव्हा तेव्हा प्राणपणाने भिडले लोचन

*

दोघांचेही दुःख सारखे होते तरिही

तुझेच केवळ सहजपणाने रडले लोचन

*

डोळ्यांमधले सुख पाहू मी नाही शकलो

ओठांवरती ओठ ठेवता मिटले लोचन

*

शृंगाराची ती श्रीमंती उधळत गेली

असा अचानक धनाढ्य झालो हसले लोचन

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मनाची मनमानी ☆ श्री नागेश शेवाळकर ☆

श्री नागेश शेवाळकर

? विविधा ?

☆ मनाची मनमानी श्री नागेश शेवाळकर

‘मन’ या एका शब्दात सामावलेली ही दोन अक्षरे! एवढीच का यांची ओळख आहे? बाराखडीतील इतर अक्षरांप्रमाणे का ह्या दोन अक्षरांचा समूह आहे? अक्षरे जरी दोन असली तरी सारे ब्रम्हांड यामध्ये सामावलेले आहे. मन म्हटले की, कोणताही आकार आपल्या समोर येत नाही. मोहून टाकणारा गंध जाणवत नाही. कोणताही रंग लेवून एखादी आकृती समोर येत नाही. तरीही त्याची आपल्या शरीरातील उपस्थिती सातत्याने जाणवते. आपल्या सोबत सक्रिय राहून प्रत्येक कार्यात सहभागी होत असते. हवा आपणास दिसत नसली तरीही तिचे अस्तित्व विविध प्रकारातून जाणवते. आत्मा हाही तसा अदृश्य असला तरी त्यामुळे शरीर जिवंत असते असे आपण मानतो. ईश्वरालाही भक्तांनी भावेल, आवडेल तसे रूप दिलेले आहे. त्यामुळे कदाचित ईश्वराला आकार प्राप्त झाला असेल. तो दृश्य झाला असेल. आत्म्याचे तसे नाही. त्याचे अस्तित्व फक्त जाणिवेच्या रूपाने सोबत असते. आकारहीन, गंधहीन असा आत्मा असला तरी त्यामुळे शरीर सचेतन आहे, सजीव आहे. मनाचेही तसेच आहे. आजीवन शरीरात असूनही आपणापासून दूर असल्याप्रमाणे आहे. आपण मनाला पाहू शकत नाही, परंतु त्याच्याशी संवाद मात्र साधू शकतो. ‘मनातल्या मनात’ बोलणे हा संवाद साधण्याचाच एक प्रकार! मनाशी संवाद साधत असूनही आपण आपल्या मनाला पूर्णपणे ओळखू शकत नाही, ओळखू शकणार नाही.

अदृश्य असले तरी कसे आहे मन? हा प्रश्न आपल्यापैकी अनेकांना नेहमीच पडतो. कधी वाटते मन अथांग सागराप्रमाणे आहे. दुसऱ्याच क्षणी वाटते, मन विस्तीर्ण आकाशाप्रमाणे आहे. कधीकधी मन एवढे चंचल भासते की, जणू पत्नीप्रमाणे, प्रेयसीसम! दुसऱ्याच क्षणी मनाची अस्वस्थता जाणवते, अस्थिरता समोर येते. त्याचवेळी त्याची तत्परता आपल्या लक्षात येते. कधी ते हसतं, डोलतं, गातं, नाचतं तर कधी त्याची घाई-गडबड, धांदल, धांदरटपणाही आपल्या समोर येतो. मध्येच मन हे एखाद्या अणुप्रमाणे भासते तर कधी ते पर्वतासम जाणवते. मन मायाळू, प्रेमळ, लाजरे-बुजरे आहे तसेच ते कोपिष्ट, रागीट, संतापी, आडमुठही आहे. मन जसे कीर्तनात रमते तसेच ते तमाशातही रममाण होते. कधी मन क्रियाशील जाणवते तर बऱ्याचवेळा ते प्रचंड आळशी असल्याचे दिसून येते. मन म्हणजे जणू जवळचा मित्र, बरेवाईट याची जाणीव करुन देणारा पण मधूनच त्याला काय होते ते कळत नाही. एखाद्या वैऱ्यासारखे वागते. समोर जो कुणी असेल त्याच्याशी शत्रुगत् वागते. त्याच्या बद्दल नको नको असे विचार करते. म्हणूनच म्हणतात, ‘मन चिंती ते वैरी न चिंती’!

मन आणि स्वप्न यांचा फार जवळचा संबंध जाणवतो. जागेपणी आपण जे विचार मनातल्या मनात करतो, ते प्राप्त करण्याचा, साध्य करण्यासाठी बरेच काही करतो तसे विचार मनात घोळत असताना अनेकदा ती गोष्ट आपण स्वप्नात मिळवतो, पाहतो, अनुभवतो. ‘मनी वसे ते स्वप्नी दिसे’ ती हिच अवस्था! प्रयत्नांती जागेपणी जे मिळत नाही किंवा एखादी गोष्ट भरपूर प्रयत्न करूनही उपलब्ध होत नाही अशी गोष्ट मिळविण्यासाठी स्वप्न मदतीला धावून येते. म्हणूनच मनाला ‘कल्पवृक्ष’ ही उपमा दिली तर ती अनाठायी ठरू नये. असे म्हणतात की, एकेकाळी या कल्पवृक्षाकडे एखादी वस्तू मागितली तर ती तत्काळ मिळत असे. तसे पाहिले तर आजच्या मानवासाठी कल्पवृक्ष म्हणजे तरी काय तर एक स्वप्नील अवस्था! सध्याच्या परिस्थितीत प्रत्येकाजवळ असलेला कल्पवृक्ष म्हणजे मन! तुम्हाला काय पाहिजे ते मागा, प्रत्यक्षात जरी मिळाले नाही तरी कल्पनाविश्वात म्हणजेच स्वप्नात ती बाब निश्चितपणे मिळणार. आजकाल स्मार्टफोन आणि गुगलचा जमाना आहे. स्मार्टफोन हे एक शरीर मानले तर गुगल म्हणजे त्याचे मन… कलियुगातील कल्पवृक्ष! गुगलकडे तुम्ही जी माहिती मागाल ती तुम्हाला दुसऱ्याच क्षणी घरबसल्या मिळू शकते.

‘मन करा रे प्रसन्न, सर्व सिद्धीचे कारण’ असे म्हटले जाते. मन प्रसन्न, आनंदी, समाधानी असेल तर तुम्ही जे कोणते काम हाती घ्याल त्यात तुम्हाला यश मिळेल, कार्यसिद्धीचा आनंद प्राप्त होईल. असा या वचनाचा अर्थ होऊ शकतो. व्यवहारात तरी दुसरे काय आहे? आपले मन प्रसन्न असेल तर आपण करीत असलेल्या कामात चुका होत नाहीत, एकच कृती वारंवार करण्याची गरज पडत नाही. मन आनंदी असेल तर शरीर लवचिक बनून जोमाने, आगळ्यावेगळ्या स्फूर्तीने काम करू लागते. मात्र हेच मन काही कारणास्तव आळसावलेले, दुखावलेले, कष्टी असेल तर दररोजच्या कामालाही वेग मिळत नाही, वारंवार चुका होतात, काहीही करावेसे वाटत नाही. मनाची अवस्था सैरभैर झालेली असते. प्रसंगानुरूप मन नेहमीच जगण्याची दुर्दम्य शक्ती शरीरात चेतवते. परंतु हेच मन कधीकधी मानवाला नको ते पाऊल उचलायला, अनिष्ट अशी कामे करायला भाग पाडते. का होत असावी मनाची ही अशी अवस्था? का मधूनच मन नको त्या गोष्टींंची पेरणी करते आणि ‘जनी निंद्य’ ते करायला भाग पाडते? मन जसे भावनाशील आहे तसेच ते भावनाशून्य आहे. मन दोलायमान असले की मनाची एक वेगळीच अवस्था समोर येते. मनाच्या या रुपाला दुसरे मन असे म्हणतो. शेजारी राहणाऱ्या या दोन मनांचे द्वंद्व आपण नेहमीच अनुभवतो. मुख्य किंंवा पहिले मन कणखर, निर्भय, निर्भीड असले की, दुसऱ्या मनाचे काहीही चालत नाही. परंतु पहिले मन थोडेेसेही कमजोर झालेे की मग दुुसऱ्या मनाचे साम्राज्य पसरते आणि मग बऱ्याचवेेळा नको ते घडून जाते. ही दोन मने म्हणजे नेमके काय? भिन्न, परस्परविरोधी विचारधारेचा समन्वय. सकारात्मक आणि नकारात्मक विचारधारा असेही आपण म्हणू शकतो. चांगले गुण, तशी विचारसरणी असलेले मन म्हणजे सकारात्मक किंवा पहिले मन! त्याउलट वाईट विचार आणि अवगुणांचा समुच्चय असलेले ते दुसरे मन…. नकारात्मक मन! या दुसऱ्या मनानेे केेलेेेलेे कार्य ही ‘मनमानी’ ही असू शकते.

तसे पाहिले तर मन एक गुंता आहे. तो कुणालाही तसा सुटलेला नाही. अगदी समर्थ रामदास महाराजांनी ‘मनाचे श्लोक’ या सर्वोत्तम विचारधारेची निर्मिती केली असली तरी मन हे शेवटी मनच आहे. कधी ते देवाप्रमाणे वागते, कधी त्याची वागणूक मानवाप्रमाणे सरळ-साधी असते तर मधूनच हेच मन राक्षसीवृत्ती धारण करते. म्हणूनच… 

मनाचिये मनमानीतून

सांगा सुटका कुणाची

मनाचिया गुंता सोडविण्या

सांगा सरशी कुणाची?

 ००००

© श्री नागेश शेवाळकर

पुणे

मोबा. ९४२३१३९०७१

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ ☆ ईश्वरी ऋण… ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? कवितेचा उत्सव ?

☆ ईश्वरी ऋण... ☆ श्रीशैल चौगुले ☆

आम्ही ईश्वराचे ऋणी

जन्मा व्हावे सद्गुणी

सत्संगी भाव ध्यानी

नित्य जप मनो-मनी.

भिन्न नाम रुपे एक

कर्म सत्वे भुत प्राणी

ऐसे पुण्य ना त्रैलोकी

भुलोकी भक्त सृजनी.

  

© श्रीशैल चौगुले

मो. ९६७३०१२०९०.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ ”वक्त वक्त की बात है! ..” ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

? जीवनरंग ?

☆ “वक्त वक्त की बात है!” ☆ संध्या बेडेकर ☆

“व्यक्तिमत्त्व एवढे सरळ व तिखट ठेवा की चांगल्या माणसांना त्याची चव व वाईट लोकांना त्याचा ठसका लागलाच पाहिजे “.

आज दादा वहिनीला श्री. श्रीधर कुलकर्णी यांचेकडे लग्नाचे आमंत्रण आहे. कुलकर्णी काका म्हणजे आमचे चुलत घराणे. खूप श्रीमंत. पैशाचा धबधबा पडतो की काय त्यांच्या घरी?? असं वाटतं. त्यातच मुलांचीही बिझनेसमधे मदत झाली.   म्हणतात ना,   “पैसा पैशाला ओढतो. ”  

ते काकांकडे बघून पटत.   

म्हंटल तर मुलं खूप शिकलेली नाही. पण पिढी दर पिढी चालत आलेला बिझनेस मात्र उत्तम सांभाळतात. सोन्याचा चमचा तोंडांत घेऊन जन्माला आलेली ही मुलं, आपल्या बिझनेस मधे चोख आहेत. सरस्वती खूप प्रसन्न नसली तरी लक्ष्मीने मात्र आपला वरदहस्त त्यांच्यावर छान ठेवलेला आहे.   

श्रीमंतीची सर्व लक्षणे दिसतात. मोठा बंगला, दारासमोर चार गाड्या, घरात नोकर माणसे, म्हणजे घरच्या बायकांना साधारण बायकांसारखे काम करायची गरज पडत नाही. उठणे बसणे पण अशाच लोकांबरोबर.    

पैशाचा माज चढला आहे, असं म्हणता येणार नाही. कदाचित ते सहज बोलत असावेत, वागत असावेत. पण ते आपल्या सारख्या सामान्य माणसांना कुठे तरी खटकत. , मनाला लागत. असे आमच्या दादाचे नेहमी म्हणणे असते. वहिनीला काही ते पटत नाही व आवडत तर त्याहुनही नाही.   

मागे दादाच्या मुलाच्या लग्नाचे आमंत्रण द्यायला दादा वहिनी त्यांच्या घरी गेले असताना, त्यांना मिळालेली वागणूक वहिनी अजूनही विसरलेली नाही. प्रत्त्येक भेटीची वहीनीची काही तरी खास आठवण आहेच. नातं असलं तरी सांपत्तिक परिस्थिती मधे तफावत आहे. तरीही काही महत्वाच्या कार्यक्रमात दादा वहिनी जातातच. आपलं नातं टिकवण्यासाठी, कसलाही विचार न करता हजेरी लावतात.   

तेंव्हा अनघा लहान होती, ती पण आई बाबांबरोबर जायची. काही प्रसंग तिच्या बालमनावर चांगले कोरले गेले होते. घरी अलमारी भरून क्रोकरी असताना, आम्हा तिघांना वेगवेगळ्या आकाराच्या स्टील प्लेट, वाटी मधे चिवडा दिल्याचा प्रसंग तिला आठवतो. दुर्लक्ष केलेले ही आठवते. त्यानंतरची आईची कुरकुर, वाईट वाटणे, कधी कधी आईचे रडणे, तिच्या चांगले लक्षात होते. एकदा पूजेला गेले असताना, पूजेचे महत्व कमी व श्रीमंत लोकांचा कौतुक समारंभच जास्त वाटत होता. वहीनी खूप खुशीने तेथे कधीच गेली नाही.   

दादा ची परिस्थिती सामान्य होती. येथे लक्ष्मी नाही, पण सरस्वती मात्र खूप प्रसन्न होती. दादाची मुल शिक्षणात हुशार होती, म्हणून त्यांच्या शिक्षणाकरिता दादा वहिनीने कधी काही कमी पडू दिले नाही.  

अनघा ने ग्रॅज्युएशन नंतर स्टेट लेवल, नॅशनल लेवल च्या परीक्षा दिल्या. ‘ UPSC ‘ पास केली. आज ती पोलीस खात्यात उच्च अधिकारी आहे.   

आज कुलकर्णी काकांकडे लग्नाला जायचे आहे. अनघा म्हणाली मी पण येईन. ती अशा एका दिवसाची वाट बघतच होती.   

अचानक तिच्या समोर फ्लॅश बॅक सुरू झाला. आईच्या डोळ्यातील अश्रु आठवले.

“आपण नेहमी चांगले वागायचे”. असा बाबांचा नियम आहे. त्यामुळे नाइलाजाने आई, बाबांबरोबर जात असे.  

अनघा रंगाने सावळी व जेमतेम उंची, म्हणून तिच्या वर तेथे कटाक्ष व्हायचे. कसं होईल हिचे??? ही काळजी तिच्या आई बाबांपेक्षा त्यांनाच जास्त होती. त्यांच्या घरी आई बाबांकडे दुर्लक्ष करतात. ही गोष्ट तिच्या मनात घर करून बसली होती. काही दुःख सारख आपलं डोकं वर काढतात. व तुम्हाला त्याची सतत आठवण करून देत राहतात. व प्रत्त्येक आठवणीबरोबर ती सल वाढतच जाते.   

आई बाबा लग्नाला जायला निघाले. अनघा आॅफिस मधून सरळ हॉलवर येणार होती.  

तसं अनघाला सहज सुट्टी घेता आली असती, व छान तयार होऊन लग्नाला जाता आले असते. पण तिला काळया सावळ्या अनघाचा ‘रूबाब ‘ दाखवायचा होता. खरं तर हे असे वागणे तिच्या स्वभावात बसत नव्हते. पण जून्या प्रसंगाची आठवण व आई बाबांना मिळालेली वागणूकही ती विसरली नव्हती. आज आई बाबांना खासकरून आईला तिची प्रतिष्ठा मिळवून द्यायची होती. त्यांच्या अपमानाचा बदला घ्यायचा होता.   

पोलिस अधिकारी च्या युनिफॉर्म मधे अनघा हॉलवर पोचली. मस्त कडक युनिफॉर्म त्यावर ACP rank चे लागलेले स्टार्स, डोक्यावर लावलेली cap, हातात स्टीक, चकचकीत बूट, कमरेवर बेल्ट. डोळयांवर काळा चष्मा. तिला आॅफिसकडून मिळालेल्या गाडीतून अनघा आली. लगेच ड्रायव्हर ने कारचा दरवाजा उघडला. अदबीने बाजूला उभे राहून, एक कडक सॅलूट मारला.   

” व्वा!!! काय शान होती अनघाची. “

तेथील सर्व लोक बघतच राहिले. लहान मुले तर जवळ येऊन बघू लागली. अनघाचा मोबाईल कारमधेच राहिला होता, तेंव्हा ड्रायव्हर ने तो तिला आणून दिला व पुन्हा एकदा तसाच कडक सॅलूट मारला.  

हाॅलमधील सुंदर महागड्या पैठणी निसून, दागिन्यांनी लदलेल्या, ब्युटी पार्लर मधून सरळ हॉलवर आलेल्या so called smart, श्रीमंत बायका बघतच राहिल्या. आता आकर्षणाचा केंद्रबिंदू पोलिस अधिकारी ‘अनघा ‘ होती.   

श्रीधर काकां काकू, व त्यांच्या घरचे इतरही सर्व, अनघाच्या स्वागतासाठी लगेच आले.   

अनघाने वेळ कमी असल्यामुळे मी सरळ आॅफिसमधूनच आले व लगेच मला जावे लागेल. असे सांगितले.   आज सर्वांशी भेट होईल, म्हणून मी आले.   पुर्वी लहान असताना मी आई बाबांबरोबर येत असे.  पण या मधल्या काळात मला येणे जमलेच नाही.  तिने सर्वांची विचारपूस केली.   सर्वांना आनंदाने भेटली. वर वधू ला भेटली. फोटोग्राफर ने तिचे आवर्जून बरेच फोटो काढले. आपल्यामुळे वर वधू कडे दुर्लक्ष व्हायला नको, म्हणून तिने लगेच निघायचे ठरविले   

लगेच अनघाच्या जेवणाची सोय झाली. तिच्या ड्रायव्हरला ही आदराने जेवण दिल्या गेले.. आई बाबा हे सर्व डोळे भरून बघत होते. आजही आईच्या डोळ्यात अश्रू आलेच. पण ते मुलीचे कौतुक बघून, तिचा होणारा मानसन्मान बघून.   

अनघाच्या आई-बाबांना लग्न घरात सर्वांसमोर मान मिळाला. आईच्या मनातील सल दूर झाली होती. अनघाचा उद्देश्य पूर्ण झाला होता, तो ही बाबांचा नियम सांभाळून, “आपण नेहमी चांगले वागावे”.   

निघताना अनघा आई बाबांना म्हणाली,   आई-बाबा जास्त उशीर करू नका. अंधाराच्या आत घरी पोहचा.   

श्रीधर काकांची पंधरा वर्षांची नात ‘ राधा’ अनघा जवळ येऊन म्हणाली, ताई मला पण तुझ्या सारखे पोलिस अधिकारी बनायचे आहे. बाबा, माझा ताई बरोबर फोटो काढा ना. तो मी माझ्या स्टडी टेबल वर ठेवेन.   

अनघा म्हणाली,   हो का??

मग छान अभ्यास कर. मी तुला वेळोवेळी guidance देईन.   

एकंदरीत अनघाचा प्रभाव जबरदस्त होता.  

“वक्त वक्त की बात हैं। 

वो भी एक वक्त था ।

आज भी एक वक्त हैं।”  

आज कुलकर्णी काकांच्या ड्रायव्हर ने आई-बाबांना घरी पोहचविले.   

म्हणतात ना,  

“Your greatest test is how you handle people who have mishandled you.”   

 

© संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “माझी वारी ! माझा अनुभव !”- लेख क्र. ४ ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

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माझी वारी ! माझा अनुभव ! – लेख क्र. ४ ☆ श्री संभाजी बबन गायके 

पालखी सोहळ्यातील ‘अभंग’ व्यक्तिमत्त्वे!

भक्तिगीते आणि अभंग यांच्यात नेमका फरक सांगायचाच झाल्यास तो अनुभूतीचा असतो. शब्दांवर हुकुमत प्राप्त केलेले कवी अतिशय उत्तम भक्तीरचना करू शकतात, यात काहीच वाद नाही. परंतू संतांनी लिहून ठेवलेले अभंग हा त्यांचा प्रत्यक्ष जीवनानुभव असतो आणि म्हणूनच तो कधी भंग पावत नाही!

भारतातील जवळपास सर्वच संतांनी त्यांचे विचार काव्यरुपात लिहून ठेवलेले आढळतात. महाराष्ट्रभू तर संतकवींची खाणच म्हणावी. आणि हे काव्य म्हणजे कुणा व्यावसायिक वा हौशी कवीने प्रसिद्धी, धन, मान यांसाठी योजलेली शब्दयोजना नव्हेत! म्हणूनच कित्येक शतके उलटून गेली तरीही ते शब्द जनमानसावर आपले गारुड कायम ठेवून आहे!

जगदगुरू संत श्री तुकोबारायांसोबत वाट चालत होतो. हे माझे त्यांच्यासमवेतचे पहिलेच वर्ष होतं. दिंडीत खूप ज्येष्ठ वारकरी होते. दिवसभराच्या वाटचालीत एका वयोवृद्ध वारकरी आजोबांनी ‘म्हणा माऊली! ” म्हणत माझ्याकडे वाटचालीत अभंग म्हणायची सूचना केली! मला बोलू ऐसे बोले…. हा अभंग तोंडपाठ होताच… मात्र चाल? चाल रेकॉर्डवरची म्हणजे ध्वनीमुद्रीकेवरची…. छोटा गंधर्व यांनी गायलेला हा अभंग. मी माझ्या आवाजात बोलू ऐसे बोले…. अशी सुरुवात करतात….. मृदुंगावर थाप टाकण्याच्या तयारीत असलेले पखवाजे आणि सोबतचे टाळकरी एकदम थांबले आणि त्यांनी सर्वांनी माझ्याकडे नाराजीनेच कटाक्ष टाकले… मी गोंधळून गेलो!

विणेक-याच्या सोबतीने चालणा-या त्या आजोबांच्या चेह-यावर तर नाराजी अगदी उठून दिसली. “वारकरी चालीत म्हणा, महाराज! ” त्यांनी कडक शब्दांत आदेश दिला. आणि मी थबकलेलो पाहताच त्यांनी स्वत:च सुरुवात केली… बोलू ऐसे बोले… हां… बोलू ऐसे बोले… जेणे बोले विठ्ठल डोले… जेणे बोले विठ्ठल डोले!

चालता चालता टाळाच्या तालावर सहज गाता येणारी चाल. उच्चार स्पष्ट आणि नेमके. त्यामुळे अर्थही मनापर्यंत पोहोचतो…. आजोबांनीच चरणापर्यंत अभंग म्हटला… आणि म्हणाले… आता लावा तुमची शास्त्रीय चाल…… मी मला येते ती साधी चाल लावली…. सर्व सत्ता आली हाता… नामयाचा खेचर दाता! आणि आजोबांच्या मुखावर आनंद परतून आला! तेंव्हा समजलं… वारीत वाट चाल करताना वारकरी, नियमित चालीत अभंग गायचे असतात… येथे शास्त्रीय किंवा प्रथितयश गायकांनी गायलेल्या रचना गाऊन उपयोग नाही! कारण हे चालता चालता गायचे शब्द असतात.

असाच एक नवखा वारकरी कुणाचे तरी भक्तीगीत गाऊ लागला तेंव्हाही आजोबांनी त्याला रोखले. म्हणाले…. संतांचे अभंग म्हणा…. महाराज. हजारो आहेत. आपल्या तुकोबारायांचे तर चार हजार आहेत… कोणताही म्हणा! तेंव्हा समजले की वारीत केवळ संतांचेच शब्द गायचे असतात.

संत त्यांच्या रचनांच्या अखेरीस त्यांची नाममुद्रा गुंफीत असत… जसे एखाद्या महत्त्वाच्या कागदपत्रावर आपण स्वाक्षरी करतो, शिक्का उठवतो, तसे. उदाहरणार्थ….. तुका म्हणे, नामा म्हणे, ज्ञानदेव म्हणे, जनी म्हणे… इत्यादी. संतांना त्यांच्या काव्य रचनेत स्वत:चे नाव हवे असायचे, प्रसिद्धी हवी असायची म्हणून ते असा नामोल्लेख करीत असत, हा काही सुशिक्षित लोकांचा (गैर)समज आहे! त्याकाळी copy right विषय नव्हता. तरीही काही नतद्र्ष्ट माणसं स्वत:च्या रचना प्रसिद्ध संतांच्या नावाने खपवीत…. त्या रचनांना क्षेपक अभंग अशी संज्ञा आहे. अभ्यासू वारकरी, भजनकरी संतांचा मूळचा आणि इतरांनी घुसवलेला क्षेपक अभंग अचूक ओळखतात! त्यामुळे वारीत तरी केवळ अधिकृत संत अभंगच गावेत, असा दंडक असतो.

आमच्या दिंडीत चालणा-या त्या आजोबांना संपूर्ण भजनी मालिका, हरिपाठ, गाथा, नाथ महाराजांचा गाथा यांतील जवळजवळ सर्वच अभंग तोंडपाठ होते. विशेषत: तुकोबारायांचा गाथा त्यांना मुखोद्गत होता. दिंडीत कुणी गाताना एखादा शब्द चुकला की ते लगेच दुरुस्ती सांगत. विशेषत: शेवटच्या चरणात, म्हणजे हा अभंग कुणी लिहिला आहे त्या नावाचा उल्लेख करताना अनेकवेळा गफलती होत असतात! पण हे आजोबा म्हणजे आमचे चालते बोलते encyclopaedia होते!

हे आजोबा अत्यंत काटेकोर दिनचर्या पाळीत. दिंडीत सर्वांच्या आधी म्हणजे चार-सव्वाचार वाजता उठून आन्हिके आटोपित आणि तंबूमध्येच एका कोप-यात त्यांची पूजेची पेटी उघडून बसत. पत्र्याच्या त्या छोट्याशा पेटीत त्यांचे सर्व पूजासाहित्य असे. गंध, गंधगुळी, उद्बत्ती, काडेपेटी, छोटा हरिपाठ, विठोबा रखुमाईची कागदी तसबीर इत्यादी. मुखाने हरी हरी म्हणत त्यांची पूजा चाले…. सर्वांगावर गंध लेपन करीत. अंगावर गणवेश तर नेमून दिलेलाच असे…. पांढरे धोतर, पैरण, पटका… कपाळी गंध! बाकीची दिंडी उठून तयारीला लागेपर्यंत आजोबा महाराजांच्या रथासमोर जाऊन उभेही रहात. आणि पालखी रथ विसाव्याला थांबल्याशिवाय खाली बसत नसत. दिवसभर अभंग गाताना कधी थकलेले त्यांना पाहिले नाही. रात्री दिंडी मुक्कामावर पोहोचल्यावर रात्रीचा भजन जागर सुरु होई… त्यात आजोबा उशीरपर्यंत भजने गात. इथं कळलं… त्यांना उत्तम पेटी वाजवता येते. आवाजात माधुर्य नसलं, रागदारीचं फारसं ज्ञान नसलं तरी मनातले भाव आणि पाठांतर अप्रतिम होतं…. कित्येक वर्षांचा परिपाठ असावा!

आजोबा जातिवंत शेतकरी. त्याच्या खुणा त्यांच्या अंगभर दिसून येत. रापलेला रंग, भेगा पडलेले तळपाय, कपाळावर पसरलेलं आठ्यांचं जाळं… आणि विझत चाललेलं डोळे. कुणीतरी केंव्हातरी नंबरचा चष्मा दिलेला असावा… तुटलेला चष्मा… त्याच्या काड्यांना दोरा बांधून काम चालवलेलं. भजनी मालिकेच्या पुस्तकात कधी वाचायचा प्रसंग येत नसे… कारण बहुतेक सर्वच पाठ होतं… पण आपला असावा म्हणून डोळ्यांवर चष्मा असे. पूर्वी कारभारीण आणि ते असे दोघे वारी करीत. काही वर्षांपूर्वी त्या निवर्तल्या. मग आजोबांनी महिन्याची वारी धरली. म्हणजे दर महिन्याला देहू-आळंदी ते पंढरपूर अशी वारी. जमली तशी पायी केली आणि थकले तेंव्हा मिळेल त्या वाहनाने. विशेषत: बार्शी लाईट रेल्वे आवडीची आणि सोयीची!

आजोबांनी आपल्या दिंडीत यावे, असा सर्वच दिंडीचालकांचा प्रयत्न असे. पण आजोबांनी आपली एकच दिंडी धरून ठेवली होती. त्यांच्याकडून कोणी भिशी अर्थात दिंडीचा खर्च म्हणून पैसे घेत नसत… कारण दिंडीमध्ये वाटचालीचे अभंग म्हणायची जबाबदारी, शिस्त पाळायची जबाबदारी त्यांच्यावरच असे. ते सुद्धा एखाद्या सैन्याधिका-याने आपले सैन्यदल दिमाखात, शिस्तीत चालवावे, तशी दिंडी चालवीत!

द्वादशीचा उपवास सोडून दिंडीकरी लगबगीने, घराच्या ओढीने परतत… आजोब मात्र पुढील चातुर्मास पंढरीतच मुक्कामी राहण्यासाठी मागे रहात….. नेमाचे, निष्ठावंत वारकरी. जोडोनिया धन.. उत्तम व्यवहारे वेच करून संसारिक जबाबदा-या पार पाडून आयुष्याच्या संध्याकाळी हरी हरी करीत काळ व्यतीत करणारे संतांचे लाडके सेवक!

एका वर्षी ते दिंडीत दिसले नाहीत….. त्यांच्या नातवाने एका मुक्कामावर त्यांच्या स्मरणार्थ दिंडीला पंगत दिली तेंव्हा समजले…. ते मागील महिन्यात वैकुंठवासी झाले! असे वारकरी हे वारीचे वैभव असतात… त्यांचे दर्शन घडले, सहवास लाभला हे भाग्यच म्हणायचं…. रामकृष्णहरी!

– लेख क्र. ४ 

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ‘‘दर्पणी पहाता रूप…’’ ☆ पद्मश्री पद्मजा फेणाणी जोगळेकर ☆

पद्मश्री पद्मजा फेणाणी जोगळेकर

? मनमंजुषेतून ?

☆ ‘‘दर्पणी पहाता रूप…’ ☆ पद्मश्री पद्मजा फेणाणी जोगळेकर

विजया मेहता 

बालपणापासून मी, अमक्यासारखी दिसते, तमक्यासारखी दिसते, असं अनेकांनी माझ्या दिसण्यावरून मला सांगितलं होतं. लांब केस असताना कुणी अभिनेत्री ‘नूतन’सारखी दिसते म्हणायचे, तर लांब चेहर्‍यामुळे अगदी ‘नर्गिस’ म्हणायचे. एखाद्या कार्यक्रमात सुनील दत्त साहेबांची भेट व्हायची, तेव्हा माझं गाणं ऐकताना ते बराच वेळ टक लावून पहायचे आणि ‘छोट्या पद्मजाचे’ लाड, कौतुकही करायचे!

माझे गुरु पं. हृदयनाथजी मंगेशकर तर मला पारशी म्हणतात. साक्षात् ‘भारतरत्न’ लतादीदी तर हृदयनाथजींना, माझ्या नावापेक्षाही, “बाळ, तुझी पारशी पोरगी काय म्हणते रे? ” असं गंमतीनं विचारत. आमच्या घरची मंडळी माझ्या बालपणी, मुद्दाम मला चिडवण्यासाठी, “ए, ही पारशाच्या जव्हेरी हॉस्पिटलमध्ये बदलून आली बरं का! चुकून पारशाचं पोर आई घरी घेऊन आली! ” असं सारे जेव्हा म्हणत, तेव्हा मला खरंच वाटे आणि मी रडून थयथयाट करीत असे. (वास्तविक माझे वडील शंकरराव गोरेपान, तजेलदार चेहऱ्याचे आणि धारदार नाकाचे…. ते खरे पारसी दिसत!) 

नूतन आणि नर्गिसचा तर मला उगीचच राग येत असे. लेखक श्री. अशोक चिटणीस काका तर मला “तू एखादं ग्रीक स्कल्पचर असावं, अशी वाटतेस, ” असं म्हणत.

मात्र अलीकडेच, एका नाटकाच्या निमित्ताने माझी आणि एका महान कलावंत स्त्रीची माटुंग्याच्या यशवंतराव चव्हाण सेंटर या सभागृहात भेट झाली. मला त्यावेळी आठवण झाली, ती म्हणजे आमचे शेजारी थोर गायक आणि एचएमव्हीचे त्यावेळचे सर्वेसर्वा श्री. जी. एन. जोशी यांची! ते माझ्या बाबांचे परममित्र! ज्यांनी मला बालपणापासून खूप प्रोत्साहन दिलं, कोडकौतुक केलं. ते नेहमी म्हणत, “तू – अगदी या बाईंसारखी दिसतेस बरं का! ” खरंतर या बाईंविषयी मी, चित्रपट आणि नाट्यसृष्टीतील अनेक कलावंत घडवणाऱ्या कडक दरारा असणार्‍या गुरू, असं त्यांचं वर्णन ऐकून होते. त्यांना टीव्हीवर आणि फोटोतही पाहिलं होतं. मात्र भेट प्रथमच त्यादिवशी ग्रीन रूममध्ये झाली. कुणीतरी आमची ओळख करून दिली. आरशात आम्ही एकमेकींना पाहिलं आणि त्यांना मी म्हंटलं, “अनेकजण म्हणतात…. आपल्यात खूप साम्य आहे म्हणून. ” त्यावर त्या गोड हसल्या आणि अगदी सहजपणे, जणू काही रोजच भेटत असल्यासारखे, माझा हात हाती घेऊन त्या म्हणाल्या, “बरोबर आहे पद्मजा…. Our soul is the same!!! ”

त्यांचे हे आशीर्वादरूपी बोल ऐकून, माझ्या अंगातून आनंदाने वीज चमकून गेली. आनंदाला पारावार उरला नाही. कारण त्या होत्या, अनेक सुप्रसिद्ध कलावंतांच्या गुरू, अभिनेत्री, बुद्धिमान, प्रतिभावंत व कलेची उपासक स्त्री, तसंच बर्‍याच नाटकांना चैतन्य देणार्‍या महान दिग्दर्शिका – आदरणीय ‘विजयाबाई मेहता’!

“त्यांच्या मते, कला म्हणजे चैतन्याची शोधप्रक्रिया… कोणताही कलाकार आपली कला सादर करताना, स्वतःच्या वास्तवापलीकडे जाऊन मूळ सत्याचा, चैतन्याचा, स्रोताचा शोध घेण्याचा अविरत प्रयत्न करत असतो. संगीत, नाट्य, नृत्य यांसारख्या कला सादर करताना कलाकार व्यासपीठाच्या रिकाम्या पोकळीत एकटा असतो, मात्र आपल्या आविष्काराने तो सभागृहाला भारून टाकण्याचा प्रयत्न करत असतो. अभिजात कलेतील साधकाला आपल्या कलेत प्रभुत्त्व मिळवण्याची ओढ म्हणजे एखाद्या श्रेष्ठ कलाकाराला लागलेले एक व्यसनच असते.. ”

त्यांचे हे विचार, तो तेजस्वी चेहरा आणि हाताचा मृदु मुलायम स्पर्श, ‘तो आशीर्वाद’…… ‘दर्पणी पहाता रूप’ म्हणत माझ्या मनात आजही दरवळत आहे!

©  पद्मश्री पद्मजा फेणाणी जोगळेकर

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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