(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – आज नहीं तो कल होगा…। आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
🌼 वरिष्ठ पुरुषों में प्रोस्टेट स्वास्थ्य – एक सरल मार्गदर्शिका 🌼
प्रिय मित्रों, जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती है, शरीर की देखभाल और भी आवश्यक हो जाती है। 50 वर्ष के बाद पुरुषों में एक सामान्य समस्या प्रोस्टेट ग्रंथि से जुड़ी होती है। आइए इसे शान्त और सरल भाषा में समझें।
🔍 प्रोस्टेट क्या है?
प्रोस्टेट पुरुषों में पाई जाने वाली एक छोटी ग्रंथि है, जो मूत्राशय (ब्लैडर) के नीचे स्थित होती है। यह प्रजनन प्रणाली का हिस्सा है। उम्र बढ़ने के साथ यह अक्सर बड़ी हो जाती है।
⚠️ प्रोस्टेट की समस्या क्यों होती है?
सबसे बड़ा कारण है बढ़ती उम्र। उम्र के साथ:
* हार्मोन में परिवर्तन होते हैं
* प्रोस्टेट धीरे-धीरे बढ़ने लगता है (इसे साधारण वृद्धि या BPH कहते हैं)
अन्य कारण:
* पारिवारिक इतिहास
* शारीरिक सक्रियता की कमी
* मोटापा
* असंतुलित आहार
👉 महत्वपूर्ण: सभी बुज़ुर्ग पुरुषों को यह समस्या नहीं होती। कई लोग पूरी ज़िंदगी बिना किसी विशेष परेशानी के रहते हैं।
📊 यह कितनी सामान्य है?
* 60 वर्ष के बाद लगभग 50% पुरुषों में प्रोस्टेट बढ़ने की समस्या होती है
* 80 वर्ष तक यह 80–90% पुरुषों में देखी जा सकती है
* लेकिन प्रोस्टेट कैंसर बहुत कम होता है
* जीवन में लगभग 10–15% पुरुषों को ही कैंसर हो सकता है
* और इनमें से भी कई मामलों में यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला और कम खतरनाक होता है
🚫 मिथक या सत्य: क्या यौन सक्रियता से प्रोस्टेट की समस्या नहीं होती?
👉 सच्चाई (स्पष्ट रूप से):
कुछ शोध बताते हैं कि नियमित स्खलन (ejaculation) से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा थोड़ा कम हो सकता है।
👉 लेकिन वास्तविकता यह है:
❌ यह पूरी तरह सुरक्षा नहीं देता
❌ यह कोई उपचार या निश्चित बचाव का उपाय नहीं है
❌ सामान्य यौन जीवन वाले लोगों में भी प्रोस्टेट की समस्या हो सकती है
✔️ इसलिए इस धारणा को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर नहीं मानना चाहिए।
⚕️ प्रोस्टेट कैंसर क्यों होता है?
कुछ पुरुषों में कोशिकाएँ असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, इसके कारण:
* उम्र के साथ जीन में परिवर्तन
* हार्मोन (विशेषकर टेस्टोस्टेरोन) का प्रभाव
* पारिवारिक इतिहास
👉 अधिकांश मामलों में यह कैंसर धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए समय पर जाँच और निगरानी बहुत लाभदायक होती है।
🛡️ बचाव और देखभाल – आप क्या कर सकते हैं?
🌿 स्वस्थ जीवनशैली
* रोज़ टहलना 🚶♂️ (30–40 मिनट)
* वजन संतुलित रखना
* अधिक फल और सब्ज़ियाँ खाना 🥦🍎
* लाल मांस और तले भोजन कम करना
* पर्याप्त पानी पीना 💧
* धूम्रपान और अधिक शराब से बचना
🧘♂️ सरल आदतें
* पेशाब को ज़्यादा देर तक न रोकें
* मूत्राशय को पूरी तरह खाली करें
* हल्का योग और प्राणायाम करें
💊 चिकित्सकीय देखभाल
* 50 वर्ष के बाद नियमित जाँच कराएँ (यदि परिवार में इतिहास हो तो पहले)
* डॉक्टर की सलाह से PSA जाँच
* दवाओं से वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है
* कुछ मामलों में ही सर्जरी की आवश्यकता होती है
👉 समय पर जाँच = बेहतर स्वास्थ्य
😊 इन लक्षणों पर ध्यान दें (घबराएँ नहीं)
* बार-बार पेशाब आना, खासकर रात में
* पेशाब का धीमा प्रवाह
* शुरू करने में कठिनाई
* पूरा खाली न होने का अहसास
👉 ये लक्षण अक्सर साधारण वृद्धि (BPH) के होते हैं, कैंसर के नहीं।
🌸 संदेश
अधिकांश प्रोस्टेट समस्याएँ धीमी, नियंत्रित और उपचार योग्य होती हैं। सही जीवनशैली और समय पर डॉक्टर की सलाह से हम स्वस्थ और सुखद जीवन जी सकते हैं।
📢 यह जानकारी चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है। कृपया इसे अपने मित्रों और परिजनों के साथ अवश्य साझा करें, ताकि सभी को सही जानकारी का लाभ मिल सके।
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≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परीक्षा और अग्नि परीक्षा…“।)
अभी अभी # ९५५ ⇒ आलेख – परीक्षा और अग्नि परीक्षा श्री प्रदीप शर्मा
परीक्षा तो हम बचपन से देते आ रहे हैं। परीक्षा फल या तो पास होता है अथवा फेल। हर व्यक्ति पास नहीं होता और हर व्यक्ति फेल भी नहीं होता। सफलता और असफलता जीवन के दो आयाम हैं, जो सफल होता है, वह आगे बढ़ जाता है, और जो असफल होता है, वह थोड़ा पीछे रह जाता है। लेकिन संसार में अस्तित्व दोनों प्रकार के लोगों का हमेशा कायम रहता है, कोई जीवन में सफल है, तो कोई असफल। कोई अगर आगे बढ़ रहा है तो कोई पीछे भी छूट रहा है।
जीवन की परीक्षा में सफल होना अपने आपमें एक पुरस्कार है और असफल होना एक सबक। जो आज फेल हुआ हैं, वह कल पास भी हो सकता है।
गारंटीड सक्सेस गाइड से भी लोग जीवन में आगे बढ़े हैं और कोचिंग क्लासेस से भी। कुछ लोग परीक्षाएं पास करके भी जीवन में सफल नहीं हो पाए और कुछ बिना पढ़े ही बाजी मार ले गए। संभावनाओं और विसंगतियों, सफलता और असफलता का नाम ही तो जिंदगी है।।
कभी कभी हमें जीवन में अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ती है। सीता ने भी अग्नि परीक्षा दी थी। भक्त प्रह्लाद की भी एक तरह से अग्नि परीक्षा ही तो थी। अग्नि परीक्षा में सब उत्तीर्ण नहीं होते। सुकरात और मीरा दोनों ने जहर का प्याला पीया। इतिहास में दोनों अमर हैं।
जब जब भी हम अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हैं, वह हमारी अग्नि परीक्षा ही तो होती है। युद्ध में एक सिपाही की अग्नि परीक्षा ही तो होती है, युद्ध में जीत अगर अग्नि परीक्षा है तो युद्ध में शहीद होना भी अग्नि परीक्षा ही है। अग्नि परीक्षा में परिणाम नहीं देखा जाता, त्याग और समर्पण देखा जाता है।।
जो सच्चाई, ईमानदारी और धर्म के मार्ग पर चलते हैं, संसार उनकी अग्नि परीक्षा लेता ही रहता है।
सत्यवादी हरिश्चंद्र एक ही पैदा हुआ है, क्योंकि वह अग्नि परीक्षा में सफल हुआ। आज के युग में सत्य के मार्ग पर चलना कांटों से खेलना है। अगर आप सच के मार्ग पर निःसंकोच निडर होकर चल रहे हैं, तो मान लीजिए आप अग्नि परीक्षा ही दे रहे हैं।
झूठ फरेब, अन्याय, अत्याचार और शोषण की इस दुनिया में एक आम आदमी पल पल में अग्नि परीक्षा दे रहा है, फिर भी वह जिंदा है, क्या यह ईश्वर का चमत्कार नहीं!
आज दुनिया किताबी ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और एक नई बीमारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बलबूते पर ही चल रही है। आप परीक्षाएं देते रहिए, गला काट स्पर्धा में आगे बढ़ते रहिए, सफलता के परचम गाड़ते रहिए। निश्चिंत रहिए, आपको जीवन में कोई अग्नि परीक्षा नहीं देनी। वैसे भी होती क्या है अग्नि परीक्षा, गूगल सर्च तो इसे महज एसिड टेस्ट बता रहा है। यह कलयुग है, यहां परीक्षा और अग्नि परीक्षा नहीं, डिजिटल शिक्षा होती है। वैसे डिजिटल क्राइम से बचना भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं।।
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता ‘श्री राम ‘।)
(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘गोपी संग रास रंग…‘।)
☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १३ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆
गाथेतून उमजणारी गीता(३)
अर्जुनाला रणभूमीवर माझ्याच नातेवाईकांना मी कसे मारू असा जेव्हा भ्रम झाला त्यावेळी, माता, पिता, बहीण, बंधू, भार्या, अपत्ये ही सर्व नाती कशी असत् आहेत, आणि मी- कृष्ण हेच कसे परब्रह्म आहे याचा उपदेश श्रीकृष्णाने गीतेत केला. त्याच परमतत्वानुसार
तुकाराम महाराज सर्व मोह पाशातून मुक्त झाले आहेत. म्हणून ते म्हणतात,
बाप मेला न कळता/ नव्हती संसाराची चिंता/
विठू तुझे माझे राज्य/ नाही दुसऱ्याचे काज/
बाईल मेली मुक्त झाली/ देवे माया सोडविली/
पोर मेले बरे झाले/ देवे माय विरहित केली/
माता मेली मज देखता/ तुका म्हणे हरली चिंता/
ज्या ज्या गोष्टी असत् आहेत, त्याचा विनाश अटळ आहे हे सत्य स्वीकारण्याची शक्ती जेव्हा अंगी येते, तेव्हाच सत् ची, परमतत्वाची, परब्रम्हाची ओळख पटते. त्याचवेळी जिवा शिवाचे ऐक्य होऊ शकते.
जोपर्यंत माणूस संसार बंधनात अडकून पडलेला आहे, तोपर्यंत त्याला संसाराचे भय असते. एकदा का त्याला संसार हा भासच आहे याची खात्री पटली की तो भव भयापासून मुक्त होतो. महाराज आता संसारातून पूर्णपणे निवृत्त झाले आहेत. त्यांना कसल्याही भोगाची आसक्ती राहिली नाही. म्हणून ते देवाजवळ बोलतात,
भोगावरी आम्ही घातला पाषाण/ मरणा मरण आणियेले/
विश्व तू व्यापक काय मी निराळा/ कशासाठी बळा येऊ आता/
काम सारुनिया काढावे बाहेरी/ आणूनी भितरी काय ठेवू/
तुका म्हणे काही नेणे लाभ हानी/ असेल तो धनी राखो वाडा/
मी गुणातीत आत्मा आहे. मला देह दुःख नाही अशा भूमिकेचा दगड भोगांच्या डोक्यावर ठेवून मी मरणाचा अंत केला आहे. देवा तू जर विश्वव्यापक असशील, तर मी त्यापेक्षा निराळा नाही. अशा परिस्थितीत मला वेगळेपणाचा खटाटोप करण्याची काय जरूर आहे? तू आणि मी एकच आहोत. लाभ किंवा हानीची परवा तू असताना मी का करावी? मी काही लाभ हानी जाणत नाही, जो या देहाचा धनी असेल तोच त्याचे रक्षण करेल.
याचसाठी तुकाराम महाराज त्यांच्या गाथेतून साधकांना विठ्ठलाच्या चिंतनाचे महत्त्व सांगतात.
काय नोहे केले/ एका चिंतीता विठ्ठले/
सर्व साधनांचे सार/ भवसिंधू उतरी पार/
योगयागतपे/ केला त्याने अमुपे/*
तुका म्हणे जपा/ मंत्र त्रीअक्षरी सोपा/
एका विठ्ठलाच्या चिंतनाने काय मिळत नाही? हा भव सिंधू पार करण्यासाठी विठ्ठल हा त्रि अक्षरी मंत्र पुरेसा आहे. योग, याग, साधना वगैरे गोष्टींची काहीही आवश्यकता नाही.
सर्वतोपरी देहाभिमान शून्य होणे म्हणजेच योग आणि तप आहे. तोच परमार्थ आहे. ज्यावेळी देहाभिमान नाहीसा होईल त्याचवेळी जन्ममृत्युरूपी येरझार थांबेल.
योग तप याची नावे/ गणित व्हावे अभिमाने/७
करणे ते हेचि कर/ सत्य बरा व्यापार/
तरी खंडे येरझार/ निधे भार देहाचा/
जेव्हा विषयसुख गोड वाटते, तेव्हा जन्ममृत्यूच्या फेऱ्यात सापडून किती यातना भोगाव्या लागतात याचे वर्णन महाराज त्यांच्या या अभंगात करतात.
विषयाचे सुख /येथे वाटे गोड/
पुढे अवघड/ यमदंड/
मारिती तोडिती/ जोडीतील निष्ठुर/
यमाचे किंकर/ बहु साल/
असिपत्र तरुवर/ खैराचे इंगळ/
निघतील ज्वाल/तैल पाकी/
तप्तभूमीवरी/ चालविती पायी/
अग्निस्तंभ बाही/ कवटाळविती/
म्हणूनी तुका येतो काकुळती/ पुरे यातायाती गर्भवास/
क्षणिक विषयसुखाचे भोगावे लागणारे परिणाम किती भयंकर आहेत याची कल्पना तुकारामांच्या या अभंगातून आपल्याला येते.
एका नामात हरी वसलेला आहे, परंतु आपल्यासारखी सामान्य माणसे देहातच सर्व सुख आहे असे मानतात व त्यामुळे परब्रम्हप्राप्ती आपल्यापासून दूर पळते.
देह हा सादर पहावा निश्चित/ सर्व सुख येथे नाम आहे.
आपल्याला मिळालेल्या देहाकडे आदराने जरूर पहावे, परंतु एक परब्रह्म, एक नामच सर्व सुखाचे साधन आहे.
लटक्या संसारात माणूस अडकतो. लोभ, मोह इत्यादी षड्रिपूंच्या जाळ्यात सापडतो. त्याला हरिनामाचा विसर पडतो. खूप पैसा जमवण्याची धडपड करतो. शेवटी या क्षणभंगुर देहाचा नाश होतो आणि बापाने ठेवलेल्या पैशांवरून दोन भावांचे आपसात भांडण लागते.
लटीकियाच्या आशा/ होतो पडिलो वळसा/
होऊनिया दोषा/ पात्र मिथ्या अभिमाने/
बारावी उघडली दृष्टी/ नाहीतरी होतो कष्टी/
आक्रंदते सृष्टी/ मात्र या चेष्टांनी/
मरणाची नाही शुद्धी/ लोभी प्रवर्तली बुद्धी/
परती तो कधी/ घोड्याची ना माघारी/
साचवुनी मरे धन/ लावी पोरांची भांडण/
नाही नारायण / तुका म्हणे स्मरला.
संसारी माणसाची अशी ही शोककथाच आहे.
आता हा पुढील अभंग पहा.
येथे नाही उरी आले अवतार/ येरे ते पामर जीव किती/
विषयाचे झणी व्हाल लोलिंगत/ जेवलीया अंत नलगे भंग/
वाहून या भार कुंथसील ओझे/ नवे तेचि माझे थीता त्याग/
तुका म्हणे कैसी नव्हे त्याची लाज/ संती केशी-राज साधियाला/
या अभंगात तुकाराम महाराज प्रापंचिकाला उपदेश करीत आहेत. या ठिकाणी अवतार हा शब्द नारायणाच्या मत्स्य, कुर्म आदी दशावतारांना उद्देशून आला आहे. त्यांचे म्हणणे असे आहे की जिथे हे अवतार सुद्धा राहिले नाहीत तिथे सामान्यांची काय कथा? विषयाची आसक्ती माणसाला कुठे नेईल त्याचा काही नेम नाही. जे खरोखर आपले नाही, त्याचे ओझे खांद्यावरून विनाकारण वाहून हे माणसा तू स्वतःला कष्ट देऊ नकोस. त्यामुळे स्वहिताचा त्याग होईल. केशव हाच परमात्मा आहे, त्याला साध्य करण्यातच स्वहित आहे.
स्वतः तुकाराम महाराज निःसंग होऊन अहोरात्र गोविंदाचे पोवाडे गात होतेच आणि लोकांनाही भवभयापासून मुक्त व्हावे यासाठी ते सावध करीत होते. विठ्ठलाचे नाव वाचेत असल्यामुळे विषयात अडकलेल्या तुकारामांना योग्य मार्ग सापडला. कृष्णाने अर्जुनाला गीतेत हेच सांगितले होते की तू कृष्ण भावना भावित होणे जरुरीचे आहे.
☆ # अरे विकास विकास… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर☆
“आवं दादा या पुलावरून हे काय धावतया म्हनायचं.. आनि तेबी जमिनीवर पाय न लावता असं अधांतरीचं कसं काय पळतया! … “
“अरे बाबानू असं का येड्यावानी इचारतायं? … ती धावती ना तिला या शहराची मेट्रो म्हनत्यात… ती अशीच तुमच्या आमच्या इतकचं काय मोठ्या इमारतीच्या डोक्यावरूनच पळत असती! … तिचा अन जमिनीचा काहीच संबंध येत नाही.. कायमच ती अशी अधांतरी पळत असती.. आताच्या दिवसात या शहराची हु दुसरी जीवनदायीनी हायं बाबानू.. समजलं! … “
… ” असं हायं का? पर अवं दादा पर सहा महिन्याच्या मागं या जागेवर जी झोपडपट्टी व्हती त्यात आम्ही चाळीस पन्नास वर्षं राहत व्हतो.. ते मराठवाड्यात दुष्काळी कामं सुरू झाली म्हणून आम्हाला संमद्याना तकडं काम मिळालं. तवा इकडं घराला कुलूप घालून आम्ही संमदी तकडं गेलो.. सहा महिनं म्हणता म्हणता एक वरीस ततच ठेवून कामं पूरं झाल्यावरच आम्हाला सोडलं… अन इथं येऊन बघतो तर ह्यो मोठा पूल बांधलेला दिसला.. ती पळणारी चकाचक रेल्वे दिसली पन आमच्या झोपड्या काय कुठं नदरलाच दिसनात… अन आमच्या आजुबाजूला राहणारे ते शेजारपाजारचे लोक बी दिसनात… पाक भुईसपाट करून खालनं दोन चार मोठ्ठं रस्तंच बांधलेलं दिसलं… किती मोटारींचा येजा चा गर्दा माप वाढलेलला दिसतूया.. “
“अरे बाबानू आता शहराचा मोठा विकास होऊन राहिलाय… ते सरकारनं स्मार्ट सिटी योजना अमंलात आणायचं ठरवलंय.. तेव्हा सगळ्यात पहिल्यांझुट गदा ही गलिच्छ झोपडपट्टीच्या जागेवर घालण्यात आलीयं… आता शहराचा विकास करताना काही गोष्टींचा त्याग करावा लागतो.. सरकारी वटहुकूम निघाला की सगळ्यांना त्याप्रमाणे वागावचं लागतं… त्येला काय इलाज नाही… आता तुमच्या झोपड्या गेल्या आहेत तर तुम्हाला दुसरीकडे जागा शोधायला हवी.. या भागातला समाजसेवका कडं जाऊन भेटा म्हणजे तो तुम्हाला मदत करील… “
“.. नगं नगं आता आम्ही कोणाला भेटाबिट्याच्या भानगडीत पडनार नाही बघा… तो काय शहराचा विकास हुनार आहे म्हनता तो तर हा असा आभाळालाच भिडायला गेल्या सारखाच डोक्याच्यावरनचं जाणारा हाय नव्हं… मगं आम्ही आमच्या झोपड्या पहिल्या होत्या तश्याच या पुलाच्या खाली प्रत्येक खांबाच्या भवतीनं बांधून राहतो.. नाही तरी त्या खांबाच्या बाजुची जमिनीचा काही आता विकास काय होणार नाही… मगं आम्हाला कोणी तिथून उठवणार पण नाही… ते म्युन्सिपालटीवालं साहेब आम्हाला चांगले वळखतात.. आन ते लै दयाळू बी हायती.. झोपडं बांधल्यावर एक डाव त्यांची गाठ घेऊन पानसुपारी केली कि लाईट पानी अन सुलभ शौचालयाची पन सोय लगेच करतात बघा… सरकारला म्हनावं काय तुझा विकासाचा ऊजेड पाडायचा तो वर आकाशापतूर नेऊन पाडनास.. आम्ही इथं भुईवर चटई पसरुन बघत राहतू… “
“अरं बाबानू या विकास करताना तुमच्या सारख्या गोरगरिबांचीच फारच अडचण होत होती… म्हणून तर तुम्हाला सरकारी कामं देतो, चांगला पैका देतो या आमिषावर ओढून च तिकडं मराठवाड्यात लांब नेलं आणि इकडं हा पूल पूर्ण होईपर्यंत तुम्हाला सोडलचं नाही… काय येतयं का लक्षात काही तुमच्या.. साप पण मेला आणि काठी पण वाचली अशी सरकारनं खेळी केली होती… हं आता तुम्हाला राहायला जागा नाही घर नाही तर तुम्ही तरी काय करणार म्हणा… या पुलाच्या खालच्या जागे शिवाय पर्याय आहे कुठे… शिवाय तुमचा तो म्युनिसिपालिटी चा साहेब आहेच कि तुमच्या मदतीला… नाहीतर त्याने त्याच्या नोकरीत न दिसणारा विकास आता नाही तर कधी करून घ्यायचा… “
“बरयं मी निघतो.. ती मेट्रो जशी धडधड करीत वरनं जाताना दिसली कि मलाही माझ्या छातीत धडधड वाढायला लागते… वयाचा परिणाम आहे बाबा… आकाशाला गवसणी घालणारा विकास बघूनच माझे डोळे दिपून गेले… आता या पुढे अधिक पाहण्याआधी ते लवकरच मिटलेले बरे… “
आणि त्या गावाहून आलेल्या गोरगरीबांनी मेट्रो पुलाच्या खाली खांबाच्या आधारे आपल्या झोपड्या उभा केल्या.. आकाशातून खाली पाहताना चकाचक श्रीमंतीचा थाट दिसत होता आणि त्याच्या सावलीत विसावलेली गरीबी मात्र घाबरून पुलाच्या खांबाला पाली सारखी चिकटून बसली होती…
(अपर्णाची जुळी मुलं मनूला फार फार आवडत आणि लाघवी अपर्णा अति माया करी मनूवर.
दिवस कसे पळत होते नुसते. अपर्णाचे मोहित रोहित आता आठ वर्षांचे झाले. अपर्णा संसारात बुडून गेली.)
– इथून पुढे – –
एक दिवस ती मनूला म्हणाली”मनू, माझ्याबरोबर तुझ्या कोणी चांगल्या डॉक्टर असल्या तर येशील का त्यांच्याकडे? ”
मनू म्हणाली “का ग अपर्णा? काही होतंय का तुला? ”अपर्णा म्हणाली मनू, मला छातीत गाठ वाटतेय. पण उगीच शंका नको म्हणून चांगल्या डॉक्टरला दाखवूया. मी अजून यांना पण बोलले नाहीये काही. ”
अपर्णा संकोचून म्हणाली.
मनूने त्याच आठवड्यात डॉ मोने यांची अपॉइंटमेंट घेतली. डॉ मंजिरी मोने मनूची खूप चांगली मैत्रीण होती. अपर्णा आणि मनू डॉ मोनेच्या क्लिनिकवर गेल्या. डॉक्टरांनी अपर्णाला नीट तपासलं.
त्यांनी मनूला सांगितलं आपण यांची बायॉप्सी करूया.
लगेचच त्यांनी छोटासा तुकडा घेतला आणि म्हणाल्या“ मी हा पॅथॉलॉजी ला पाठवते. घाबरू नको अपर्णा. ही गाठ साधी असण्याची शक्यता जास्त आहे. चार दिवसांनी रिपोर्ट मिळेल तुला”.
चार दिवसांनी पॅथॉलॉजी चा रिपोर्ट आला. , दुर्दैवाने ती गाठ malignant होती. मनूला अतिशय वाईट वाटलं.
अपर्णा शांत होती. तिची आई गावाकडून आली. अपर्णाचं mastectomy म्हणजे पूर्ण ब्रेस्ट काढून टाकायचं ऑपरेशन झालं. भास्कर आणि मनू चोवीस तास तिच्याजवळ होते.
अपर्णा दहा दिवसांनी घरी आली. नंतर केमो थेरपीचे चक्र सुरू झालं. सगळ्या केमो पार पडल्या
मनू ऑफिस मधून रोज अपर्णाकडे जाई. तिला छान खायला करून देई. गप्पा मारून तिचे मनोरंजन करी. अपर्णा बरी झाली. तिचे सगळे रिपोर्ट्स निगेटिव्ह आले. मनूला खूप आनंद झाला. अपर्णाची आई पुन्हा गावाला गेली.
मुलं आता बारा वर्षांची झाली.
अचानक अपर्णाला पुन्हा बरं नाहीसं व्हायला लागलं. अचानक वजन कमी व्हायला लागलं.
तिला पुन्हा डॉक्टरांकडे नेलं.
अपर्णाच्या कॅन्सरच्या सेकंडरीज आता सगळीकडे पसरल्या होत्या. मध्यंतरीची वर्षे इतकी चांगली गेली आणि अचानक या कॅन्सरने पुन्हा डोकं वर काढलं.
एम आर आय स्कॅन सगळं सगळं झालं. दुर्दैवाने हा कॅन्सर सगळीकडे पसरलेला दिसला. आता ओपन करण्यात काही अर्थ नव्हता.
बिचारी अपर्णा हळूहळू अंथरुणाला खिळली. फक्त वेदना शामक गोळ्या हेच औषध उरले तिच्यासाठी.
अपर्णा शांतपणे सहन करत निमूट पडलेली असे. मनूला तिचे हाल बघवत नसत. भास्कर सतत तिच्या जवळ बसलेला असायचा. मुलं कावरीबावरी होत. अपर्णा आता तर अंथरुणात न दिसण्याइतकी बारीक झाली होती.
कधी ती छान उत्साही असे तर कधी निराशेच्या आवर्तनात गुदमरून जाई.
मनूला विचारी”, मीच का ग मनू, मीच का? मला नाही ग मरायचं इतक्या तरुणपणी. जेमतेम चाळीशी ओलांडलीय मी. यांच्या कितीतरी अपेक्षा स्वप्नं आहेत ना. ती अर्धवट सोडून मी कशी जाऊ मनू? ”
मनूच्या डोळ्यांना धारा लागत.
“अपर्णा, होशील ग तू बरी. आता नवीन गोळ्यांनी तुला बघ छान वाटेल. ”मनू सांगायची. कधी बरे कधी खूप वाईट असे दिवस चालले होते.
आता घरी चोवीस तास ऑक्सिजन सिलिंडर आणून ठेवावा लागला. भास्करने ऑफिस मधून रजाच घेतली. अपर्णाच्या सासूबाई सतत सुनेजवळ बसत होत्या. मनू तर फक्त ऑफिसला जाण्यापुरतीच बाहेर असे. शेवट काय होणार हे सगळ्याना कळून चुकलं होतं.
त्या दिवशी अपर्णा खूप घाबरी झाली. तिला सतत ऑक्सिजन द्यावा लागला. ग्लानीत पडून राहिली अपर्णा.
दुसऱ्या दिवशी मनूने रजा घेतली आणि दिवसभर अपर्णा शेजारी बसून राहिली. अपर्णाने डोळे उघडले.
“मनू मला एक वचन देशील?
मी तर आता चालले. माझा हा संसार मी मधेच सोडून चाललेय. माझी मुलं अडनिड्या वयाची आहेत. नवरा तर फक्त पंचेचाळीस वर्षाचा. माझ्या भास्करशी लग्न करशील?
मला सगळं माहीत आहे ग, तुझं त्याच्यावर खूप प्रेम होतं. त्याने सांगितलं होतं मला. आम्ही एकमेकांपासून कधीही काही लपवलं नाही ग. मलाच वाईट वाटायचं की तुझ्यासारख्या गुणी मुलीला भास्करने का नकार दिला असेल? आणि मग माझ्यात होकार देताना त्याने काय पाहिलं असेल?
केवढं मोठं मन तुझं ग, हे सगळं विसरून तू माझ्यासारख्या सामान्य मुलीशी मैत्री केलीस. ”
अपर्णा दमून गेली. तिला धाप लागली. मनूने तिचा हात हातात घेतला. अपर्णाला झोप लागली हे बघून तिने हळूच तिला पांघरूण घातले आणि ती घरी आली.
आई ही मनूची सगळ्यात जवळची मैत्रीण.
“मनू, बरी आहे का ग अपर्णा? काय ग देव तरी. दृष्ट लागावी असा संसार करत होती पोर आणि हे काय ग अरिष्ट? ”मनूच्या आईच्या डोळ्यात पाणी आलं.
मनू, नक्की काय झालंय? तू अस्वस्थ का?
मनूच्या डोळ्यात पाणी आलं. तिने आईला अपर्णा म्हणाली ते सगळं सांगितलं.
आई म्हणाली, तू काय म्हणालीस मग तिला? ”
आई, तुला काय वाटतं, मी काय करावं? ”आई गप्प बसली.
“मनू, मला काही सुचत नाहीये ग. एकीकडे वाटतं तुझा संसार उभा रहावा, इतक्या उशिरा का होईना..
मनू शांत होती. ”आई मी अपर्णाला हो म्हणणार नाही. त्या जात्या जिवाला मी खोटे वचन नाही ग देणार.
आई, तुला सगळं माहीत आहे. मी भास्करवर मनापासून प्रेम केलं. पण तो मला कधीच आपलं म्हणाला नाही. त्याचं माझ्यावर कधीच प्रेम नव्हतं आणि नाही. ,
त्याच्या अपर्णाबरोबरच्या संसारात तो पूर्ण सुखी होता. मीसुद्धा मनोमन आनंदच मानला त्यांच्या सुखात. अपर्णा माझी खरोखर जिवलग मैत्रीण झाली.
ती म्हणाली मला, भास्कर पण तुझ्याशी लग्न करायला तयार आहे.
आई, पण मलाच आता त्याच्याशी लग्न नाही करावंसं वाटत.
माझं कोवळ्या वयातलं प्रेम त्याला नको होतं.
तो कधीही माझा नव्हता. मग आता हा निष्क्रीय संसार मी का करू? मला त्याच्यावर काही सूड नाही ग उगवायचा.
पण तूच सांग, वठलेल्या झाडाला पुन्हा तो कोवळा बहर येईल का?
मी खरोखर त्याला माझं मानलं पण असं जबरदस्तीनं थोडंच कोणी आपल्यावर प्रेम करतं का?
बरं मी तयार झालेही लग्न करायला जयशी.. तर त्या जयची आई मध्ये आली आणि लग्न मोडलं माझं. माझ्या नशीबातच लग्न नाहीये कदाचित.
आता जर मी भास्करशी लग्न केलं तर मला त्या संसारात जागोजागी अपर्णा दिसेल.
भास्कर तिला कसा विसरेल आई?
माझ्याशी लग्न ही एक तडजोड करणार आहे तो.
त्याचा अवेळी विस्कटलेला संसार सावरायला मी हवीय त्याला.
त्याचे गोड मुलगे मला मनू मावशी म्हणतात. एकदम मी त्यांच्या आईची जागा कशी घेऊ? पण मलाच हे काहीच नकोय.
मला सगळे नक्की स्वीकारतील.
ओळखीची मुलगी बरी हाही विचार तेही करतील.
भास्करसुद्धा ही तडजोड म्हणूनच करणार.
त्याच्या आयुष्यत फक्त अपर्णाच होती आणि रहाणार.
मी आता एक स्वतंत्र बाई झालेय.
मला आता ही तडजोड जमणार नाही आई.
खर बोलायचं तर मला त्याच्या संसारात तो देऊ करत असलेलं हे दुय्यम स्थान नकोय.
हे सेकंड बेस्ट म्हणतात तसं आहे. पहिलं नाही म्हणून दुसरं स्वीकारणं.
मी भास्करची कधीही प्रायॉरिटी नव्हते आणि नाही. अजूनही नाहीये.
मला नाही आता या दुय्यम स्थानावर जायचं. मला आता अपर्णाने सजवलेला तिचा संसार नको. मला तिची सतत आठवण येत राहील तिथे.
आई, मी अपर्णाला असं वचन देणार नाही.
ती गेल्यानंतर काय करायचं हा सर्वस्वी भास्कर आणि त्याच्या कुटुंबीयांचा प्रश्न आहे. तूच सांग. मी बरोबर करतेय ना? ”
मनू आईला मिठी मारून हुंदके देऊन रडायला लागली. आईने तिला जवळ घेतलं. आपल्या या अतिशय सद्गुणी मुलीसाठी आईला अत्यंत वाईट वाटलं. काय विचित्र योग असावेत या मुलीचे असं मनात आलं आईच्या.
बाळा, तुझं बरोबर आहे. तू मनाविरुद्ध नको लग्न करू भास्करशी.
एवढ्या मोठ्या पोस्टवर नोकरी करतेस तू मनू. पुन्हा या संसारात पडणं जर तुला मनापासून नको असलं तर नको पडू. तू जो निर्णय घेशील तो मला, बाबांना मान्यच असेल.
त्याच रात्री अपर्णा गेलीच.
मनूने तिला वचन देण्याचा किंवा न देण्याचा अवघड प्रश्न उभाच राहिला नाही.