हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा।)

? मंजिरी  की कुंडलिया – बसेरा ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

-1-

करे बसेरा देख लो, सारा विहग समाज।

काटो कानन तुम नहीं, भटके सारे आज ll

भटके सारे आज, करे मानव मनमानी l

आओ हम सब साथ, शपथ हैं लेते बानी ll

कहे मंजिरी आज, वृक्ष है साथी मेरा l

सबको देता लाभ, कीश भी करे बसेरा ll

-2-

रैन बसेरा है जगत, नहीं ठिकाना आज l

जीवन जीते हम सभी, अलग अलग अंदाज ll

अलग अलग अंदाज,  चलें हैं सूनी राहें l

अश्कों से है आज, देख ये भरी निगाहें ll

कहे मंजिरी आज, बढ़े घनघोर अँधेरा l

अंजानी है राह, मिले कब रैन बसेरा ll

-3-

करें बसेरा बाँस पर, बगुलों का परिवार l

करते हैं कलरव मधुर, नीड़ करें तैयार ll

नीड़ करें तैयार, रोज खोजे वे खाना l

योगी का रच ढोंग, लक्ष्य मछली को पाना।।

कहे मंजिरी आज, आस से भरा सवेरा l

बगुला गाता गान, नीड़ में करें बसेरा ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९६ ☆ मानवता अब हार रही है… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी  भावप्रवण कविता मानवता अब हार रही है आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९६ ☆

कविता – मानवता अब हार रही है☆ श्री संतोष नेमा ☆

मानवता अब  हार  रही  है  |

होकर द्रवित  पुकार रही है  ||

बेटा करता कत्ल  बाप  का |

जाने   कैसी   रार   रही   है ||

कैसे  बदला वक्त आज का |

रिश्ते सभी  बिसार रही  है ||

*

खूब बँटे हम  जाति धर्म  पर |

रखा न बिल्कुल ध्यान कर्म पर ||

रखा ताक  पर मानवता  को |

दिखें  न कितने दाग मर्म पर ||

भेद-भाव   दीवार  रही   है |

मानवता  अब  हार   रही  है

*

हथियारों  की   जंग  देख  लो |

बारूदों   के    रंग   देख   लो ||

रखें  अहम  को   सबसे  आगे |

अब   देशों  के  ढंग   देख  लो ||

झूठी शान अकड़ वालों को|

अब दुनिया धिक्कार  रही है  ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

चौराहों   पर   खड़े    दुशासन |

भूखे   दानव   नोच   रहे   तन ||

बदली चाल समय  की देखो |

अब   नारी  के  टूट   रहे   मन ||

कब   आयेंगे   कृष्ण   कन्हैया |

अबला   क्यों  लाचार  रही  है ||

मानवता   अब  हार   रही   है  |

*

भय परमाणु  सामरिकता   का |

बढ़ती नित्य पाशविकता  का ||

मची   होड़   है   हथियारों  की |

काम  नहीं अब नैतिकता   का ||

अब  ‘संतोष’  शांति की  खातिर |

सबकी   यही   पुकार   रही   है |

मानवता   अब   हार   रही    है  |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १६ – कविता – नदिया की धार… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘नदिया की धार।)

☆ शशि साहित्य # १६ ☆

? कविता – नदिया की धार…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

मस्त मगन वो बहती धार,

फूलों ने थमने, प्यार से लिया पुकार…

मदमाती वो हंसती रही,

मंद गति वो चलती रही…

खेत खलिहानों को,

वन और उपवनों को…

जीवनदान, जो लिया है ठान,

यही तो है उसके अस्तित्व का सार…

पूजनीय वह वंदिता,

महिमा उसकी अपरंपार…

रुकना उसके वश में नहीं,

मोह में पड़ना ,ठीक नहीं,

रुकी जलधार, होगा प्रकृति प्रहार…

थमना राह का रोड़ा है,

फिर समुद्र मिलन भी होना है…

तन्मय हो वो बह चली…

बन रसवंती धार….

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४८ ⇒ दलित के घर भोजन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दलित के घर भोजन।)

?अभी अभी # ९४८ ⇒ आलेख – दलित के घर भोजन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या आपने किसी दलित के घर जाकर भोजन किया है, क्या कृष्ण की तरह कभी आपने भी किसी दुर्योधन का मेवा त्याग विदुर के घर का साग खाया है। सुदामा तो खैर, कृष्ण के सखा थे, ब्राह्मण देवता होते हैं दलित नहीं, कृष्ण यह जानते थे, इसलिए उनके चरण भी अपने अंसुओं से धोए। सबसे ऊंची, प्रेम सगाई।

हमने अपने जीवन में ऐसा कोई सत्कार्य नहीं किया जिसका छाती ठोंककर आज गुणगान किया जा सके। बस बचपन में जाने अनजाने हमने भी एक दलित के घर भोजन करने का महत कार्य संपन्न कर ही लिया। हम जानते हैं, हम कोई सेलिब्रिटी अथवा नामी गिरामी जनता के तुच्छ सेवक भी नहीं, हमारे पास इस सत्कार्य का कोई वीडियो अथवा प्रमाण भी नहीं, फिर भी हमारे लिखे को ही दस्तावेज़ समझा जावे, व वक्त जरूरत काम आवे।।

यह तब की बात है, जब हम किसी सांदीपनी आश्रम में नहीं, हिंदी मिडिल स्कूल में पढ़ते थे। सरकारी स्कूल था, जिसे आज की भाषा में शासकीय कहा जाता है।

पास में ही मराठी मिडिल स्कूल भी था, जहां कभी अभ्यास मंडल की ग्रीष्मकालीन व्याख्यानमाला गर्मी की छुट्टियों में आयोजित हुआ करती थी। आज वहां भले ही मराठी मिडिल स्कूल का अस्तित्व नहीं हो, अभ्यास मंडल जरूर जाल ऑडिटोरियम में सिमटकर रह गया है।

तब सिर्फ हिंदी और मराठी मिडिल स्कूल ही नहीं, उर्दू और सिंधी मिडिल स्कूल भी होते थे। जैसा पढ़ाई का माध्यम, वैसा स्कूल!

कक्षा में हर छात्र का एक नाम होता था, और बस वही उसकी पहचान होती थी। अमीर गरीब की थोड़ी पहचान तो थी, लेकिन जाति पांति की नहीं। दलित जैसा शब्द हमारे शब्दकोश में तब नहीं था।

बस यहीं से हमारी दोस्ती की दास्तान भी शुरू होती है।।

जो कक्षा में, आपकी डेस्क पर आपके साथ बैठता है, वह आपका दोस्त बन जाता है। आज इच्छा होती है यह जानने की, हमारे वे दोस्त आज कहां हैं, कैसे हैं। दो दिन साथ रहकर जाने किधर गए। किसी का नाम याद है तो किसी का चेहरा। धुंधली, लेकिन सुनहरी यादें।

उस दोस्त का चेहरा आज तक याद है नाम शायद कहीं गुम गया। वहीं रिव्हर साइड रोड पर वह रहता था। स्कूल, घर और दोस्तों को आपस में जोड़ने वाली हमारे शहर की नदी पहले खान नदी कहलाती थी। आजकल इसके सौंदर्यीकरण के साथ ही इसका नामकरण भी कान्ह नदी कर दिया गया है। गरीब दलित हो गया और खान कान्ह।।

खातीपुरा और रानीपुरा जहां मिलते हैं, वही रिव्हर साइड रोड है, जहां आज की इस कान्ह नदी पर एक कच्चा पुल था, जिसके आसपास की बस्ती तोड़ा कहलाती थी। नार्थ तोड़ा और साउथ तोड़ा। ठीक उसी तरह, जैसे अमीरों की बस्ती में नॉर्थ और साउथ ब्लॉक होते हैं। इसी तोड़े में मेरा यह दोस्त रहता था और जिसके आग्रह पर मैं आज से साठ वर्ष पूर्व उसकी झोपड़ी में प्रवेश कर चुका था।

कच्चा घर था, घर में सिर्फ उसकी मां और एक जलता हुआ चूल्हा था, जिस पर मोटी मोटी गर्म रोटी सेंकी जा रही थी। एक डेगची में गुड़ और आटे की बनी लाप्सी रखी थी। मैं संकोचवश उसके आग्रह को ठुकरा ना सका और एक पीतल की थाली में मैंने भी भोग लगा ही दिया।।

हम इंसान हैं, कोई भगवान नहीं। हर व्यक्ति बुद्ध नहीं बन सकता। गरीबी अमीरी और जात पांत, ऊंच नीच की दीवार नहीं तोड़ सकता और ना ही संसार से पलायन कर सकता। जो हमें आज ईश्वर ने दिया है, वह सबको नहीं दिया। आज भी वह दोस्त मेरी आंखों के सामने नजर आता है। उसकी मां और उसके हाथ की लाप्सी रोटी का सात्विक स्वाद।

कुंती ने कृष्ण से यही तो मांगा था। अगर कष्ट में आपकी याद आती है, आप हमारे करीब होते हो, तो थोड़ा कष्ट ही सही, थोड़ा अभाव ही सही। जीवन में कुछ दोस्त ऐसे बने रहें, जिनके बीच हम सिर्फ इंसान बने रहें। कितनी दीवारें, कितने क्लब और सर्कल हमें मानवीय मूल्यों से जोड़ रहे हैं, अथवा तोड़ रहे हैं, हमसे बेहतर कौन जान सकता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ संपादकीय निवेदन – सुश्री सुरेखा चिखलकर – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सुश्री सुरेखा चिखलकर

💐 अ भि नं द न ! अ भि नं द न !! त्रिवार अभिनंदन!!!💐

आपल्या समूहातील लेखिका / कवयित्री सुश्री सुरेखा चिखलकर यांना नाशिक येथील ‘दर्पणकार बाळशास्त्री जांभेकर पत्रकार संघा’च्या वतीने जागतिक महिला दिनानिमित्त ‘दामिनी राष्ट्रीय पुरस्कार‘ प्रदान करण्यात आलेला आहे. विविध क्षेत्रात उल्लेखनीय कार्य करणाऱ्या कर्तृत्ववान महिलांचा या पुरस्काराने सन्मान केला जातो. सुरेखाताईंना त्यांच्या साहित्यिक आणि सामाजिक क्षेत्रातील उत्कृष्ट कार्याबद्दल हा पुरस्कार देण्यात आलेला आहे. दोन्ही पायांनी 80% दिव्यांग असलेल्या सुरेखाताई सातत्याने करत असलेल्या या कार्याबद्दल त्यांचे विशेष कौतुक वाटते. 

तसेच – – 

१) सामाजिक कार्यासाठी महाराष्ट्र शासनाचा पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर पुरस्कार, आणि

२) प्रतिष्ठा फाउंडेशन कडून त्यांच्या अंकुरित आभाळ या काव्यसंग्रहास ‘ग्रंथरत्न पुरस्कार‘– – असे आणखी दोन पुरस्कार त्यांना प्राप्त झालेले आहेत.

आपल्या समूहातर्फे सुरेखाताईंचे अतिशय मनःपूर्वक अभिनंदन आणि त्यांच्या यापुढील अशाच यशस्वी वाटचालीसाठी असंख्य हार्दिक शुभेच्छा.

शनिवार दि. ७/३/२६ रोजी ‘ पुस्तकावर बोलू काही ‘ या सदरात त्यांच्या “अंकुरित आभाळ“ या पुरस्कारप्राप्त काव्यसंग्रहाचा परिचय आपण करून घेतलेलाच आहे.

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८६ – गंध‌ पिसारा…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८६ – विजय साहित्य ?

☆ गंध‌ पिसारा…!

चला‌ वेचूया, अंगणातल्या

शुभ्र केशरी, गंध चांदण्या.

*

नाजूक पुष्पें, जरा वेचना

ओंजळीतले, शब्द ऐकना

*

साथ क्षणांची, फुले‌ सुगंधी 

स्पर्श तयाचा, करी आनंदी.

*

उमलताना , ठेऊन जाते

आठवणींच्या, कुपीत नाते.

*

आजी‌ वाहते, लक्ष फुलांचा

जाई‌ वेचण्या, थवा फुलांचा.

*

फूल प्राजक्ती,‌मनात राही

गंध मनी या, मावत नाही.

*

वहात येता, पहाट वारा

फुले अंगणी, गंध पिसारा.

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेच्या उत्सव ☆ जीवन कोडे… ☆ सौ. जयश्री पाटील ☆

सौ. जयश्री पाटील

 

? कवितेच्या उत्सव ?

☆ जीवन कोडे… ☆ सौ. जयश्री पाटील ☆

(वृत्त-पादाकुलक, बालानंद,  ८-८, ८-६ अर्ध समजाती)

थकली गात्रे उरला आता

आठवणींचा पाचोळा

त्याच्यासोबत हसणे रडणे

कातरवेळी विरंगुळा

अवघड होता प्रवास सारा

मुळीच नाही डगमगलो

यशकीर्तीचे इमले चढलो

आपदेतही ना खचलो

 *

कर्तव्यात ना कसूर केला

दिसही केला रात्रीचा

कष्टाला कुठे पर्याय होता

हिशेब नव्हता वेळेचा

 *

आपुलकीने जपली सारी

वीण मनोहर नात्यांची

सोबत आली काही तुटली

रक्ताची आणि प्रेमाची

 *

पक्षी उडाले घरट्या मधून

पंख घेऊन क्षमतेचे

अधीर होते मन व्याकुळते

कोडे जीवन मार्गाचे

 

© सौ. जयश्री पाटील

विजयनगर.सांगली.

मो.नं.:-8275592044

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ पाव मण लाकडे + संपादकीय निवेदन – श्री नंदकुमार पंडित वडेर – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

📚📖 अ भि नं द न 📖 📚

जिल्हा ग्रंथालय अधिकारी कार्यालय, सांगली यांनी आयोजित केलेल्या २०२५ च्या सांगली जिल्हा ग्रंथोत्सवात आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिक श्री नंदकुमार पंडित वडेर यांना सुजाण वाचक सन्मानपत्र बहाल करण्यात आले आहे.

श्री. वडेर यांचे ई-अभिव्यक्ती (मराठी) परिवारातर्फे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि शुभेच्छा 💐

– संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

आजच्या अंकात वाचूया त्यांचे एक आलेख – “पाव मण लाकडे…”

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # पाव मण लाकडे… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

“आता चुल पेटावयाला एक लाकूड शिल्लक नाही घरात.. स्वयंपाक, चहापाणी, आंघोळीचं गरम पाणी इतकी कामं कधीची खोळंबली आहेत.. चूलच पेटली नाही तर झाला की बट्ट्याबोळ… आणि मोळीवाल्याकडून जर जळणासाठी सरपणच मिळाले नाही तर काय मी आता या चुलीत माझी हाडं टाकावीत कि काय? तुम्ही त्या गॅस एजन्सी च्या दुकानात कामाला जाता आणि रोज शंभर घरा घरातून तो गॅसचा सिलेंडर पोहचता करता… त्यांच्या चुलीची एवढी काळजी घेता पण स्वत:च्या घरची काही काळजी असते का तुम्हाला? … त्या तुमच्या एजन्सी मालकाला सांगून एक गॅस कनेक्शन तरी आपल्य घरी आणायचं होतं तेव्हा… बाई गं सांगून सांगून थकले पण तुम्ही कसले जुन्या परंपरावादीला चिकटून बसलेले… श्रीमंतीचे चोचले गरीबांना परवडणारे नसतात आणि आधुनिक सोयी सुविधांच्या विरोधात कायम तुम्ही उभे… बाकीचे तुमचे सहकारी बघा. टू व्हिलर वरून सगळीकडे गॅस पोहचवतात आणि तुम्ही अजूनही त्या बाबा आदम च्या जमान्यातील जुन्या एटलास सायकल वरून पायाचे तुकडे पर्यंत पॅडल मार मारून एकेक गॅस सिलेंडर पोहचवत राहता.. अश्या दगदगीने किती थकून जायला होतयं तुम्हाला… आम्ही घरातली माणसं तुम्हाला दाताच्या कण्या करून सांगून थकलो पण तुम्ही काही बदलायला तयार नाही… तुमचं आपलं संत तुकारामांच्या सारखं एकच पालुपद.. सगळ्यांच्या भुका भागविण्यासाठी आपण कष्ट घेतले तर त्याचं मोठं पुण्य मिळतं.. भुकेलेल्याला अन्नदान केल्यासारखे… पण त्याची त्यांना त्यावेळी काही होती का कदर… सिंलेडरची डिलिव्हरी करणारा दारात दिसला रे दिसला तर त्याच्यावरच तोंडसुख घ्यायला तयार… काय तर गॅस नोंदवून महिना उलटून गेला आणि आता आणताय होय… काहीतरी मध्ये बरेच काळाबाजार करून वरकड कमाई झाल्यावर तुम्ही नंबराचा द्यायला आलात… आणि आता वर ‘चायपानीची’ अपेक्षा ही असणारच… इकडे आमच्या घरात पोरंबाळं, म्हातारे कोतारे भूकबळीचं तेव्हढे होयाचे राहिले होते… दिवसभर सारखी अशी पळापळ करून सगळ्यांना जर गॅस डिलीवरी वेळ द्यायला काय होतं तुमचं… पण तुमचे नखरे फार वाढलेत… जो वरती ज्यादा ची चिरीमिरी देतो त्याच्या दारी पहिला गॅस जातो… हो का नाही.. अशी शिव्याशापाची बिना कारणाची बोलणी खाऊन मन तुमचं खट्टू होतं. तरीही तुम्ही तुमचं कर्तव्य करायचं सोडत नाही…

आणि आता तर ते आखाती युद्धाचा भडका उडाला. त्यात तेल गॅसचा पुरवठ्यावर बंधन आल्यावर दिस ताच इकडे नफेखोरी करणारी सगळी सावजं मंडळीनीं परिस्थितीचा फायदा उचलला नाही तरच नवल… पांढरे बगळे नि खाकी ससाणे बेरक्या जातीची. स्वार्थ नि संधीसाधू गिधाडे सामान्य जनतेला ओरबाडून खायला बसली नाही तरच नवल.. याने त्याच्या नावाने बोंब मारायची आणि त्याने याच्या. तेही फक्त मिडीयासमोर… आणि गरीब बिचारा तो गॅस डिलिव्हरी करणारा मात्र सगळ्यांच्या रोषाला सामोरा गेल्याने उद्रेकाचा बळी होतो… त्याला वेठीस धरून काय साधणार म्हणा.. तो पोटार्थी प्रापंचिक माणूस… लोकांच्या झुंबडी त्या गॅस च्या दुकानी बसते.. मला पाहिजे गॅस आधी अश्या हमरीतुमरी होतात.. डिलिव्हरी मॅनला मध्यला मध्ये चढ्या बक्षिसाची लालूच दाखवून तो गॅस आपल्या घराकडे पळवतात… तेव्हा इतर नाराज आपली निराशेची आरोळी ठोकत राहतात.. पण त्या डिलिव्हरी मॅनचा एक माणूस म्हणून कोणीच कसला विचार करत नाहीत… तहानभूक विसरून तो एकटाच मात्र आपलं प्रामाणिकपणे देशसेवेचे कर्तव्य करतो…

आणि रात्री उशिरा ने जेव्हा तो आपल्या घराकडे निघतो तेव्हा त्याला आपलं घरदारं बायका पोरं सकाळ पासून उपाशी तपाशी राहून आपण वखारीतून पाव मण लाकडाची मोळी कधी घरी घेऊन येतोय याच्याकडे डोळे लावून वाट पाहत असलेले कोमेजलेले चेहरे दिसत असतात.. चारदोन रूपयाची वरकड कमाईतूंन त्यानं शेव फरसाणाचा पुडा सोबत घेतलेला असतो… त्यामुळे जरा तरी घरदार हसतं खेळतं राहील आणि ते बघून आजचा आपला थकवा दूर पळून जाईन… आजचा दिवस तर पार पडला… उद्याचं उद्या काय ते बघता येईल… ज्यानं चोच दिलीय त्यानं त्याच्या चाऱ्याची पण काही ना काही सोय केलेली असती.. तो काळजी घेणारा बसला असताना आपण का म्हणून काळजी करत बसायचं नाही का? हे वचन रोज रात्री झोपताना आपल्या कुटुंबाला ऐकवून दाखवलं कि त्याला शांत झोप लागते…

*

© नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा…भाग – १२ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १२ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

गाथेतून उमजणारी गीता (२)

सध्या आपण गाथेतून उमजणाऱ्या गीता तत्वाचे चिंतन करीत आहोत.

भगवंतांनी अर्जुनाला सांगितले की “करणारा तू कोण? नियतकर्माचे पालन करून तू ते कर्म कृष्णार्पण कर. कर्ता करविता हा एक भगवंतच आहे. हेच गीतेतले तत्त्व तुकाराम महाराज त्यांच्या अभंगातून भक्त जनांना सांगत आहेत. ते म्हणतात, “माझ्या वाणीतून अभंगांच्या रूपात जे बाहेर येते, ते सर्व बोल पांडुरंगाचेच आहेत. बोलविता धनी तोची आहे.”

ते म्हणतात,

झाली माझी वैखरी/ विश्वंभरी व्यापक/

मोकलीने जावे बाणे/ भाता जेने वाहिला/

आता येथे कैचा तुका/ बोले सिक्का स्वामींचा/

हे जे काही शब्द माझ्या मुखावाटे बाहेर पडत आहेत, ते माझे नसून मी तर स्वामींचा शिक्का आहे. ते माझ्याकडून वदवून घेत आहेत. भात्यातून बाण जसे बाहेर पडतात, त्याचप्रमाणे माझ्या मुखावाटे शब्द बाहेर पडतात इतकेच!

पिडलेती भ्रमे/ वाटा नकळती वर्मी/

 तुका म्हणे भार/ माथा टाका अहंकार//

हरीच्या भेटीची आस लागलेल्या भक्तांना

तुकाराम महाराज सांगतात की तुमच्या मनातील देहाच्या अहंकाराचा भार जेव्हा तुम्ही टाकाल, तेव्हाच तुम्हाला हरी भेटेल.

संत तुकारामांनी खालील अभंगात गीतेतून होणारा बोध भक्तांच्या निदर्शनास आणून दिला आहे.

काय दरा करील वन/ समाधान नाही जव/

(जोपर्यंत अंतःकरणात समाधान नाही, ते वासना शून्य झालेले नाही, तोपर्यंत रानात, गिरीकंदरात जाऊन तपश्चर्या करण्याचा काहीही उपयोग नाही.)

रीधता धावा पेवा मधी/ जोडे सिद्धी ते ठायी/

(धान्य काढण्याकरता पेवामध्ये घाईघाईने शिरले, तरी लगेच अन्न मिळेल का? )

काय भस्म करील राख/ अंतर पाख नाही तो/

(मुळात अंतकरण जर शुद्ध नसेल, तर अंगाला नुसती राख फासून काय उपयोग? )

वर्ण आश्रमाचे धर्म / जाती श्रम झालिया/

(वर्णाश्रम-धर्मानुसार विहित कर्म करण्याचा कंटाळा केला, तर ते कर्म वाया जाईल)

सर्व संतांना हेच सांगायचे आहे की कोणतेही कर्म उच्च किंवा नीच नसते. समाजाची घडी व्यवस्थित राहण्यासाठी खरंतर वर्णाश्रम धर्म रचना केली गेली. परंतु पुढे मात्र ब्राह्मण म्हणजे उच्च आणि शूद्र म्हणजे नीच अशी भावना लोकांच्या मनात विनाकारण निर्माण केली गेली.

गीतेत भगवंतांनी अर्जुनाला सांगितलेला कर्म संबंध विच्छेद या ठिकाणी तुकाराम महाराज साधकांना सांगत आहेत.

तेही नव्हे जे करिता काही/ ध्याता धाई तेही नव्हे/

तेही नव्हे जे जानवी जना/ वाटे मना तेही नव्हे/

त्रास मानिजे कांटाळा/ अशुभ वाचाळा तेही नव्हे/

तेही नव्हे जे भोवती भोववे/ नागवे धावे तेही नव्हे/

तुका म्हणे एकची आहे/ सहजी पाहे सहज/

 याचा अर्थ असा की, हे साधका तू जे काही करशील ती भक्ती नाही, कारण त्याचा कर्तेपणा तू तुझ्याकडे घेशील. ध्यान करणाऱ्याने मूर्ती समोर ठेवून जरी ध्यान केले, तरी ती भक्ती नाही, कारण त्यात तुझा अहंकार असेल. लोकांना परमार्थ समजावणे, मनाला जे वाटेल तीही भक्ती नव्हे. एकच तत्व महत्त्वाचे आहे, मुद्दाम ठरवून काहीही कर्म करण्याचा अभिमान स्वतःकडे न ठेवता तू जर सहजपणे पाहशील तर तीच खरी भक्ती होईल.

 हेच तत्व अधिक स्पष्ट करण्यासाठी तुकाराम महाराज दुसऱ्या अभंगात काय सांगतात ते आपण पाहू.

 जे जे जेथे पावे/ तेथे समर्पावे सेवे/

 सहज पूजा याची नावे/ गणित अभिमान/

 अवघे भोगिता गोसावी/ आधी अवसानि जीवी/

 तुका म्हणे सीण /न धरिता नवे भिन्न//

 जीवाने जर मी करणारा आणि मी भोगणारा

 असा अभिमान बाळगला नाही तर भगवंताशी द्वैत राहत नाही.

 

 विचारा वाचून/ न पाविजे समाधान/

 देह त्रिगुणांचा बांधा/ माजी नाही गुण सुधा

 देवाचिये चाडे/ देवा द्यावे जेजे घडे/

 तुका म्हणे होते/ बहु गोमटे उचिते//

 या ठिकाणी विवेकाविषयी महाराज जनसामान्यांना सांगत आहेत. ज्या ठिकाणी विचार नसेल, विवेक नसेल, त्या ठिकाणी समाधान प्राप्त होणार नाही. प्रपंच असार आहे आणि आत्माच सार तत्व आहे, असा विवेक झाल्याशिवाय संतोष तेथे नाही. त्रिगुणात्मक अशा या शरीरात कोणताच गुण परिपूर्ण नाही. म्हणून आपण केलेले कर्म हे कोणत्याही गुणांनी(सत्व, रज, तम) युक्त असले तरी ते देवालाच अर्पण करणे आवश्यक आहे. गीतेत भगवान हेच सांगतात की पार्थ, सर्व कर्म तू मला अर्पण कर.

क्रमशः… १ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ मैत्र जिवांचे… – भाग – २ ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी

☆ जीवनरंग ☆

☆ मैत्र जिवांचे… – भाग – २ – ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

(दहावीचा रिझल्ट लागण्यापूर्वीच सुरेखा विवाह बंधनात अडकली. तिच्या स्वप्नांची पूर्ती करण्यासाठी आपण काही मदत करू शकलो नाही याचं दुःख त्यावेळी आपल्या डोळ्यातून वाहत होतं.)

इथून पुढे – – 

बारावीच्या परीक्षेनंतर आपण ब्युटी पार्लरच्या कोर्स करीत होता तेव्हा सुरेखाच्या सासरी जाऊन तिची मॉ॑ तिला घेऊन आली. सुरेखाचा रसरशीत आनंदी चेहरा हरवून गेला होता. डोळ्यात कसलीही ओळख नव्हती. मागच्या दोन वर्षात तिची दोन ऍबॉर्शन्स झाली (की केली) होती. आता तिला तिसऱ्यांदा दिवस गेले होते. लाडक्या लेकीची अशी अवस्था पाहून खंतावून वडील देवाघरी गेले. सुरेखाची मॉ॑ मात्र मोठ्या धीराची. अनेक औषधोपचार करून तिने सुरेखाला सावरलं. जीवाचं बरं वाईट करायला निघाली सुरेखा हळूहळू लहानग्या सुरजमध्ये रमायला लागली. मुंबईत कामासाठी आलेला सुरेखा चा नवरा गावी गेला तो परत आलाच नाही. आता सुरेखा एका नर्सिंग ब्युरोतर्फे वृद्ध आजारी स्त्रियांची सेवा करण्याचं काम करते. लग्न होऊनसुद्धा सुख मिळेलच असं नाही. काय लिहिलं असेल आपल्या नशिबात? या विचाराने सोनल जागीच होती.

नाक्यावर चकाट्या पिटून, सिगारेटी फुंकून उशिराने घरात आलेला सुनील पाणी पिऊन झोपायला गेला तरी सोनल जागीच होती.

सुरेखाची नाईट ड्युटी होती म्हणून एक दिवस त्यांचं टिटवाळ्याला जायचं ठरवलं. गाडीच्या वेगाबरोबर त्यांच्या गप्पांचा वेगही वाढला. गणपती बाप्पाचं दर्शन घेऊन झाल्यावर मी टिटवाळ्यायला एक छोटी जागा बुक केलीये त्या बिल्डिंगचं काम कुठपर्यंत आलाय ते बघून येऊया. तुला माहितीये माझी मॉ॑ मोठ्या जिद्दीची आहे. तिने आम्हाला कष्ट करायला शिकवले. मॉ॑चा आधार आहे म्हणून जमतय सारं. पण स्वतःच्या आणि सुरजच्या भविष्याचा विचार करायलाच पाहिजे…

गणपतीचे दर्शन घेऊन दोघी साईटच्या ठिकाणी गेल्या.

टिटवाळ्याच्या बिल्डरचा मॅनेजर मॉ॑चा गाववाला आहे. त्यांच्यामुळे थोडं लोन मिळालं. थोडे पैसे मॉ॑ने लोन म्हणून दिलेत. लोनचे हप्ते भरताना दमछाक होते. पण स्वतःसाठी, सुरजसाठी सारं सोसलंच पाहिजे.

किती लांब जागा आहे ग. इथून कशी तू तुझी ड्युटी करणार. ?॔

॓आपल्या बजेटमध्ये बसणारी जागा लांबच असणार.

॓ माझ्या व्यवसायाला आता वाढती मागणी आहे. तूसुद्धा लोन काढून इथे जागा घेतेस का? आपण दोघी मिळून इथे ब्युटी पार्लर आणि नर्सिंग ब्युरो काढू.॔

सोनलच्या मनात विचार गरगरू लागले. खरंच काय हरकत आहे जागेसाठी प्रयत्न करायला!

चाळीच्या दाराशी सुरज आईची वाट पाहत उभाच होता. त्याला प्रेमाने जवळ घेऊन सुरेखाने सोनलला अच्छा केलं.

विचारांच्या भोवऱ्यात गरगरताना आपण देखील जागा घेऊ शकतो का? प्रयत्न करायला काय हरकत आहे?

जिना चढून सोनल खोलीत शिरली. घरात काय झालंय हे कळल्यावर सोनलच्या पायाखालची जमीनच सरकली. आई ज्यांच्याकडे अनेक वर्ष काम करत होती त्याच घरात चोरी करण्याचा तिने प्रयत्न केला ते देखील बाबांच्या हट्टाला धमकावणीला बळी पडून. गदगदून रडणाऱ्याआईकडून ही हकीगत तुटक- तुटक ऐकताना त्यादिवशी आपण सुरेखाला भेटून घरी आलो होतो त्यावेळच्या आई पप्पांच्या बोलण्याचा अर्थ लक्षात आला. उमाताईंच्या घरी प्रामाणिकपणे आई अनेक वर्षे काम करते. उमाताई त्यांच्या प्रशस्त फ्लॅटमध्ये एकट्याच राहतात. त्यांच्या फ्लॅटची किल्ली साने वाहिनींकडे असायची. त्या आईला चांगल्या ओळखत असल्यामुळे शिवाय आई विश्वासू असल्यामुळे, त्यांनी आईला पुन्हा उमाताईंच्या फ्लॅटची चावी दिली. डुप्लिकेट किल्लीचा वापर करून आई त्यांच्या घरात शिरली. पण बाहेर गेलेल्या उमाताई बँकेची कागदपत्र विसरल्या म्हणून स्वतःजवळच्या किल्लीने दार उघडून अचानक आत आल्या आणि हा सगळा प्रकार उघडकीला आला. आई सर्वांच्या हाता पाया पडू लागली. नवऱ्याच्या दमदाटीमुळे मी हे केलं माझी चूक मला कबूल आहे. तुमच्या कशालाही हात लावायचा धीर मला झाला नाहीये. मला माफ करा. कामावरून काढा पण पोलिसात जाऊ नका. अशा गयावया केल्या. पण उमाताईंचा मुलगा आणि मुलगी पोलीस कम्प्लेंट करण्याच्या निर्णयावर ठाम होती.

॓फसले ग तुझ्या पप्पांच्या नादाने. मलाही मोह आवरता आला नाही. इतकी वर्ष कष्ट करून अब्रूने राहिले साऱ्याची माती झाली.॔ स्वतःच्या थोबाडीत मारून घेत वत्सलाबाई असहायपणे रडत बडबडत होत्या. सोनलचं काळीज गोठून गेलं होतं. उद्या सकाळी पोलीस दारात येणार या कल्पनेने घाबरून पप्पांनी दारूचा आधार घेतला व उशिरा घरी परतले. पण आता सुटका नाही या भावनेने सोनलला रडूसुद्धा फुटत नव्हतं. सकाळी कसंबसं आवरून खाल मानेने सोनल बाहेर पडली पण झालेला सगळा प्रकार डोळ्यापुढे नाचत होता. विचाराच्या तंद्रीत व लोकांच्या अविश्वासाच्या नजरांना सामोरे जात सोनल जिना उतरून रेल्वे प्लॅटफॉर्मवर आली. पण तितक्यात मागून आलेल्या सुरेखाने तिला घट्ट पकडून तिथल्या एका बाकावर बसवलं. तिला शांत करीत सुरेखा म्हणाली ॓आई वडिलांच्या चुकीचं फळ आपण कशाला भोगायचं? आपण आपली लढाई लढायची. एकदाच मिळणाऱ्या या आयुष्याला पाठ दाखवायची नाही.

सोनल तुला आत्तापर्यंत न सांगितलेली एक गोष्ट सांगते. माझ्या नवऱ्याने त्याच्या गावी एका मुलीशी केंव्हाच दुसरी शादी केली. त्यांना दोन मुलेही आहेत हे समजल्यावर देखील मी हिम्मत सोडली नाही. भाईच्या मदतीने मी इथे स्वतंत्र जागा घेतली. आशेचे धागे तुटून गेले असले तरी मी हिम्मत सोडली नाही. माझं आयुष्य मी सन्मानाने जगणार आहे. तुलाही तुझं आयुष्य संपविण्याचा अधिकार नाही. तू माझ्याबरोबर तिथे राहायला ये. आपण तिथे पार्लर आणि नर्सिंग ब्युरो चालू करू. माझी टिटवाळ्याची जागा सहा महिन्यात पूर्ण होईल. आता थोडी कळ काढ. चल्, आपण स्नेहा मॅडमकडे जाऊ. त्या नक्की तुझी बाजू समजून घेतील याची मला खात्री आहे.

नशिबावर मात करायला निघालेली त्या दोघींची पावलं एकमेकींच्या साथीने निश्चयाने पुढे पडत होती.

समाप्त –

© सौ. पुष्पा चिंतामन जोशी

कोथरूड, पुणे

मो ९९८७१५१८९०

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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