हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३०१ ☆ ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे  (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय आलेख – ‘ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे  (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३०१ ☆

☆ आलेख ☆ ओ मेरे सोना रे, सोना रे, सोना रे  (वैचारिकी)

हल्ला मच गया कि एक महिला सांसद के गले से सोने की जंजीर की झपटमारी हो गयी, वह भी ऐसे क्षेत्र में जहां दूतावासों के भवन थे, यानी अति सुरक्षित क्षेत्र, जहां चौबीस घंटे पुलिस  चौकन्नी रहती है। चेन छीनकर झपटमार आराम से निकल गये और सांसद महोदया फरयाद ही करती रह गयीं।

हाल के समय में रास्ते में झपटमारी की वारदातों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सोना खोने के अतिरिक्त महिलाएं ज़ख्मी भी होती रहती हैं। झपटमारी में इस वृद्धि के कारण क्या हैं? देश में बढ़ती बेरोज़गारी, कानून के डर में कमी, या व्यवस्था की कमज़ोरी? शायद युवाओं को दिन भर ईंट-गारा ढो कर चार सौ रुपये कमाने के बजाय थोड़े से साहस के बूते एक मिनट में दो चार लाख की चेन पा लेना अधिक लुभाता है। सोने के दाम बढ़ने के साथ झपटमारी में वृद्धि की पूरी संभावना है।

सोना पांच हजारी से बढ़ते बढ़ते लखपति हो गया, लेकिन अभी भी वह समाज के मन से उतरा नहीं है। प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को ‘मेरे सोना’ कह कर बुलाते हैं, जो दिखाता है कि प्रेमियों की नज़र में सोने की क्या कीमत है। सोने के लिए फैले पागलपन को लेकर प्रसिद्ध कवि बिहारी ने लिखा, ‘कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय, वह खाये बौरात है यह खाये बौराय।’  यहां ‘कनक’ का अर्थ दोनों जगह अलग-अलग है। एक जगह धतूरा और दूसरी जगह सोना। यमक अलंकार है। कवि कहता है कि धतूरा खाकर आदमी जैसे बौराता है वैसे ही सोना पाकर। सोने की मादकता या नशा धतूरे से सौ गुना अधिक होता है।

सोने का उसके मूल्य के कारण संग्रह करना तो समझ में आता है, लेकिन यह समझना मुश्किल है कि शरीर पर पहन कर उसकी नुमाइश क्यों की जाती है? आज के युग में कृत्रिम सुन्दर आभूषण उपलब्ध हैं जो सोने की तुलना में बहुत सस्ते होते हैं, लेकिन बहुत सी स्त्रियों को उन्हें पहनने में हेठी का अनुभव होता है। समाज में एक दूसरे से बेहतर दिखने की होड़ में सोना उपकरण बन जाता है।

कुछ पुरुष भी सोना पहनने के शौकीन होते हैं। टीवी पर कुछ महापुरुष ऐसे भी दिखे जो एक-दो किलो सोना शरीर पर लाद कर चलते थे। इनमें एक महन्त जी भी दिखे। ज़ाहिर है कि ये महानुभाव सुरक्षाकर्मियों के बिना नहीं चलते होंगे, अन्यथा उनका हाल भी सांसद महोदया जैसा होता। एक संगीत-निदेशक भी सोना पहनने के शौकीन थे। अनेक पुरुष सोने कीअंगूठियां और जंजीर पहनने के शौकीन होते हैं। कुछ दसों उंगलियों में अंगूठी पहनते हैं, जिसे देखकर सिहरन होती है।

सोने की धमक पूरे विश्व में रही है। प्रथम विश्व युद्ध से पहले विश्व में स्वर्ण मान था जिसमें देश की मुद्रा स्वर्ण में परिवर्तनीय थी। भारत जैसे जो देश इस व्यवस्था को नहीं अपना सकते थे उन्होंने अपनी मुद्रा को स्वर्ण मान वाले बड़े देशों की  मुद्रा से जोड़ लिया था। प्रथम विश्व युद्ध में हुए युद्ध के भारी व्ययों के कारण यह व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। ब्रिटिश काल में भारत में गिन्नी और अशर्फी नाम के सोने के सिक्के चलन में थे, लेकिन ये सिर्फ हैसियतदारों के पास ही होते थे क्योंकि रियासतों के ज़माने में आम जनता फटेहाल ही हुआ करती थी।

स्वर्ण-मोह की क्लासिक कथा राजा मिडास की है जिसके रचयिता अमेरिकी कथाकार नैथेनियल हॉथॉर्न थे। मिडास ने देवता से वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह जो कुछ भी छुए वह सोना बन जाए। उसे पहला झटका तब लगा जब उसका भोजन छूते ही सोना हो गया। अपनी मूर्खता का पूरा अहसास उसे तब हुआ जब उसकी बेटी उसके छूने से सोने की मूर्ति बन गयी। तब उसने देवता का पुनः आह्वान कर उस वरदान से मुक्ति पायी।

सन्त नामदेव से संबंधित एक घटना याद आती है। नामदेव जी कहीं जा रहे थे। पीछे पत्नी। मार्ग में पड़ा सोने का टुकड़ा दिखा। नामदेव जी को भय लगा कि पत्नी कहीं सोने के लोभ में न पड़ जाए। वे उसे मिट्टी से ढकने लगे। पत्नी ने सोना देख लिया था, बोलीं, ‘मिट्टी से मिट्टी को क्यों ढक रहे हो?’ नामदेव समझ गये कि उनका भय निर्मूल था। पत्नी की दृष्टि में उस सोने का मूल्य मिट्टी से अधिक नहीं था।

सोने-चांदी के दीवानों को फ्रांसीसी कथाकार मोपासां की प्रसिद्ध कहानी ‘डायमंड नेकलेस’ ज़रूर पढ़ना चाहिए। कहानी में एक नौकरानी अपनी मालकिन से एक पार्टी में पहनने के लिए उसका हीरे का हार मांग लेती है। दुर्भाग्य से हार खो जाता है, लेकिन नौकरानी भयवश इस बात को मालकिन से छिपा लेती है। वह धन उधार लेकर वैसा ही हार खरीदकर मालकिन को दे देती है। हार की उधारी चुकाते  चुकाते नौकरानी  असमय ही बूढ़ी हो जाती है। फिर एक दिन वह मालकिन को हार खोने की बात बताती है। मालकिन उसकी हालत पर दुखी होकर उसे बताती है कि उसका हार नकली था। इस तरह एक नकली हार के कारण एक स्त्री की ज़िन्दगी होम हो गयी।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 302 – शिवोऽहम्….(5) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 302 शिवोऽहम्….(5)… ?

आत्मषटकम् पर मनन-चिंतन की प्रक्रिया में आज पाँचवें श्लोक पर विचार करेंगे। अपने परिचय के क्रम में अगला आयाम आदिगुरु शंकराचार्य कुछ यूँ रखते हैं,

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:

पिता नैव मे नैव माता न जन्म:

न बंधुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।

इसका शाब्दिक अर्थ है कि न मुझे मृत्यु का भय है, न मुझमें जाति का कोई भेद है। न मेरा कोई पिता है, न कोई माता है, न ही मेरा जन्म हुआ है। न मेरा कोई भाई है, न कोई मित्र, न कोई गुरु  है और न ही कोई शिष्य। मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ।

मृत्यु के संदर्भ में देखें तो शंकराचार्य जी महाराज के कथन से स्पष्ट है कि देह छूटना आशंका नहीं होना चाहिए। यों भी यात्रा में पड़ाव आशंका नहीं हो सकता। यात्रा तो परमात्मा के अंश की है, यात्रा आत्मा की है। यात्रा के सनातन और यात्री के शाश्वत होने का प्रसंग आए और योगेश्वर उवाच स्मृति में न आए, यह संभव ही नहीं। भगवान गीतोपदेश में कहते हैं,

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।

आत्मा का किसी भी काल में न जन्म होता है और न ही मृत्यु। यह पूर्व न होकर, पुनः न रहनेवाला भी नहीं है। आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।

मैं मृत्यु नहीं हूँ, अत: स्वाभाविक है कि जन्म भी नहीं हूँ। जो कभी जन्मा ही नहीं, वह मरेगा कैसे? जो कभी मरा ही नहीं, वह जन्मेगा कैसे?..ओशो की समाधि पर लिखा है, ‘नेवर बॉर्न, नेवर डाइड, ऑनली विज़िटेड दिस प्लानेट अर्थ बिटविन….’ उन्होंने न कभी जन्म लिया, न उनकी कभी मृत्यु हुई। वे केवल फलां तिथि से फलां तिथि तक सौरग्रह धरती पर रहे।’

विचार करें तो बस यही अवस्था न्यूनाधिक हर जीवात्मा की है। स्पष्ट है कि केवल जन्म और मृत्यु तक सीमित रखकर जीवन नहीं देखा जा सकता।

पिता न होना अर्थात किसीके जन्म का कारक न बनना और माता न होना अर्थात किसीको जन्म देने का कारण न होना। जन्म से मृत्यु तक जीवात्मा द्वारा देह धारण  करने का कारण और कारक परमात्मा ही हैं। प्राप्त देह, यात्रा की निमित्त मात्र है।

न मार्ग का दर्शन, न मार्ग का अनुसरण.., न गुरु होना, न शिष्य होना। बंधु, मित्र न होना, रक्त का या परिचय का सम्बंध न होना। जगत के सम्बंधों तक सीमित नहीं है अस्तित्व। माता, पिता, गुरु, शिष्य, बंधु, मित्र इहलोक के नश्वर सम्बंध हैं जबकि जीवात्मा ईश्वर का आंशिक अवतरण है।

जातिभेद का उल्लेख करते हुए आदिगुरु स्पष्ट करते हैं कि मैं न कुलविशेष तक सीमित हूँ, न ही वंशविशेष हूँ।  ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।’ …जाति का एक अर्थ उत्पत्ति भी है। जीवात्मा उत्पत्ति और विनाश से परे है।

जीवात्मा अपरिमेय संभावना है जिसे देह और मर्त्यलोक की आशंका तक सीमित कर हम अपने अस्तित्व को भूल रहे हैं। अपनी एक रचना स्मरण आ रही है,

संभावना क्षीण थी, आशंका घोर,

बायीं ओर से उठाकर, आशंका के सारे शून्य

धर दिये संभावना के दाहिनी ओर..,

गणना की संभावना खो गई,

संभावना अपरिमेय हो गई..!

मनुष्य अपने अस्तित्व की अपरिमेय संभावनाओं को पढ़ने लगे तो कह उठेगा,..’मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ, शिव हूँ,…शिवोऽहम्।’

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  गोविन्द साधना शुक्रवार 15 अगस्त से गुरुवार 21 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना मेंॐ गोविंदाय नमः का मालाजप होगा साथ ही वल्लभाचार्य जी द्वारा रचित मधुराष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५८ ⇒ एक लोटा जल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एक लोटा जल।)

?अभी अभी # ७५८  ⇒ आलेख – एक लोटा जल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ग्लास आधा खाली अथवा आधा भरा हो सकता है, लेकिन एक लोटा जल हमेशा पूरा भरा होता है।

पानी पिलाया जाता है, और जल अर्पित किया जाता है। एक समय था जब पानी भी लोटे से ही पिलाया जाता था, क्योंकि तब लोगों की प्यास आसानी से नहीं बुझती थी। अब तो लोग ग्लास से भी सिर्फ पानी चखकर ही तृप्त हो जाते हैं, क्योंकि उनकी प्यास आजकल पानी से कहां बुझ पाती है।

लाठी जितने ही गुण एक लोटे में भी होते हैं। लोटे का अपना विज्ञान है, जिसे धातु विज्ञान कहते हैं। सुबह सवेरे उठते ही तांबे के लोटे का जल खाली पेट पीया जाता था। उसके बाद सबसे पहले उगते सूरज को जल अर्पित किया जाता था। जिनका सूर्य कमजोर हो, उन्हें सूर्य नारायण को एक लोटा जल अवश्य अर्पित करना चाहिए। पूजा के भी अधिकांश पात्र तांबे के ही होते हैं। ।

तब ना तो आज की तरह स्टील और कॉच के बर्तन होते थे। आम घरों में तांबा, पीतल और कांसे के बर्तन ही होते थे। कुछ संपन्न परिवारों में जरूर चांदी के बर्तन भी होते थे।

चांदी के चम्मच से नवजात शिशु को पहली बार खीर चटाना शुभ माना जाता था। सब लोग वैसे भी कहां, मुंह में चांदी का चम्मच(सिल्वर स्पून) लेकर पैदा होते हैं।

आज से ग्यारह वर्ष पहले तक लौटे का उपयोग दिशा मैदान के लिए भी किया जाता था। बचपन में हम जब अपने गांव ननिहाल जाते थे, तो सुबह पौ फटने के पहले ही उठकर, लोटा लेकर, जंगल जाना पड़ता था। वैसे गांव के बाहर और नदी किनारे को भी जंगल ही कहा जाता था, जहां आबादी ना हो।

लौटते समय नदी अथवा कुंए पर ही कुल्ला दातून और स्नान करके आना पड़ता था। ।

शिव जी को एक लोटा जल चढ़ाने की प्रथा बहुत पुरानी है, जिसे आज के कथा वाचकों ने एक इवेंट बना दिया है। जो भोलेनाथ बिल्व पत्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं, उनके लिए भक्तों की श्रद्धा देखिए, श्रावण मास में भक्त जन सैकड़ों मिलों की कांवड़ यात्रा सम्पन्न कर अपने इष्ट को प्रसन्न करते हैं। एक लोटा जल अथवा कांवड़, सब भाव और श्रद्धा का मामला है।

अंग्रेजी के वॉटर, हमारे पानी और उर्दू के आब में वह भाव नहीं, जो हमारे एक लोटा जल में है। यूं तो सभी नदियों का जल शुद्ध होता है, करीब गंगा जल की बात कुछ और ही है।

हमारे घर का एक्वागार्ड और हेमा मालिनी का ब्रांड केंट प्यूरीफायर, सिर्फ पानी को साफ ही कर सकता है, उसे गंगा जल जैसा पवित्र नहीं बना सकता। आखिर गंगा शिव जी की जटाओं से जो निकली है। यही कारण है, जब भोलेनाथ का अभिषेक गंगा जल से किया जाता है, तो वह अधिक प्रसन्न होते हैं। शायद घी, दूध और शहद से अधिक प्रसन्न होते हों।।

ईश्वर की भक्ति बुरी नहीं, अगर वह बिना किसी स्वार्थ अथवा सांसारिक कामना के की जाए, लेकिन हम संसारी जीव ईश्वर से वही तो मांगेंगे, जिसका हमें अभाव होगा। धन, संपत्ति, सुख, औलाद और निरोग काया, बस यही हमारा पसारा है, और हमारी सांसारिक बुद्धि और कुछ मांग ही नहीं सकती। कहीं पितृ दोष तो कहीं साढ़े साती। इनसे बचे तो राहु केतु और चंद्रमा नीच का।

अगर किसी संत महात्मा अथवा बाबा के पास इन लाख दुखों की एक दवा हो तो कौन नहीं उल्टे पांव भागेगा उसके धाम। केवल एक चिथड़ा सुख नहीं, त्रय ताप यानी दैहिक, भौतिक और दैविक, तीनों तापों से छुटकारा अगर एक लोटा जल से हो जाए, तो समझो हमें भगवान मिल गए। और हमें क्या भगवान का अचार डालना है। हमें अपने मतलब से मतलब।।

जो हमारे दुख दूर करे, वही हमारा भगवान। चमत्कार को नमस्कार करते करते हम धर्म की शरण में चले जाते हैं, और बाबा नाम केवलम्। बस हमें साक्षात् भगवान जो मिल गए। भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही है। नेता भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। अगर ऐसे समागम में कुछ हादसे भी होते हैं, तो वह भी हरि इच्छा। वही कर्ता है, हमने तो अब कर्त्तापन पूरी तरह त्याग दिया है। सनातन हिंदू राष्ट्र में धर्म की विजय हो, अधर्म का नाश हो। विश्व का कल्याण हो। बोलो सब संतन की जय। आज के आनंद की जय..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५७ ⇒ खुदकुशी और जिजीविषा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खुदकुशी और जिजीविषा ।)

?अभी अभी # ७५७  ⇒ आलेख – खुदकुशी और जिजीविषा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जिंदगी के कई रंग रूप हैं ;

तेरी दुनिया में दिल लगता नहीं

वापस बुला ले, मैं सजदे में गिरा हूं

मुझको है मालिक उठा ले..

अब एक रंग यह भी देखिए ;

जिंदगी कितनी खूबसूरत है जिंदगी कितनी खूबसूरत है

आइए, आपकी जरूरत है। ।

आज फिर जीने की

तमन्ना है,

आज फिर मरने का

इरादा है ;

ऐसी तमन्ना और इरादा सिर्फ गीतकार शैलेन्द्र का ही हो सकता है। यूं तो एक आम आदमी, रोज जीता और मरता है, लेकिन वह कभी खुदकुशी करने की नहीं सोचता। मेरा नाम जोकर में यही बात शैलेन्द्र के साहबजादे शैली शैलेन्द्र ने भी दोहराई है ;

जीना यहां मरना यहां

इसके सिवा जाना कहां। ।

इंसान भी अजीब है। एक तरफ वह कहता है, गम उठाने के लिए मैं तो जिये जाऊंगा, और अगर उसे अधिक खुशी मिले तो भी वह कह उठता है, हाय मैं मर जावाँ।

प्यार में लोग साथ साथ जीने मरने की कसमें खा लेते हैं, अगर दिल टूट गया तो कह उठे, ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं, और अगर खोया प्यार मिल गया तो;

तुम जो मिल गए हो,

तो ऐसा लगता है

कि जहान मिल गया। ।

सुख दुःख और आशा निराशा के इस सागर में कोई डूब जाना चाहता है, तो कोई किनारा चाहता है। हाथ पांव सब मारते हैं, किसी की नैया पार लग जाती है, तो कोई मझधार में ही डूब जाता है। माझी नैया ढूंढे सहारा।

खुशी खुशी कौन खुदकुशी करता है, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार आत्महत्या पाप है, और कानून के अनुसार एक अपराध। एक ऐसा अपराध जिसका प्रयास तो दंडनीय है, लेकिन अगर प्रयास सफल हो गया, तो कानून के हाथ बंधे हैं। ।

एक फौजी जब सरहद पर हंसते हंसते अपने प्राण न्यौछावर करता है, तो यह वीरता कहलाती है और उसे शहीद का दर्ज़ा दिया जाता है तथा संसार उसे नमन करता है। जापान में हाराकिरी को एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अभ्यास के रूप में देखा जाता है, लेकिन आजकल यह भी वहां वैध नहीं है। जब जन्म पर आपका अधिकार नहीं है तो क्या मौत को इस तरह गले लगाना, ईश्वरीय विधान को चुनौती देने की अनधिकार चेष्टा नहीं। अगर आप खुद को इस तरह दंडित करते हो, ऊपरवाला इसको अमानत में ख़यानत का अपराध मान कठोर दंड देता है। वहां कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं, कोई राष्ट्रपति नहीं जो आपका अपराध माफ कर दे।

दुख दर्द, शारीरिक और मानसिक कष्ट एवं भावनात्मक आवेग के वशीभूत होकर कोई भी व्यक्ति खुदकुशी के लिए प्रेरित हो सकता है, लेकिन जीने की चाह, जिसे जिजीविषा कहते हैं, हमेशा उसे ऐसा करने से रोकती रहती है। कीड़े मकौड़ों और पशुओं से हमारा जीवन लाख गुना अच्छा है। पशु पक्षियों में जंगल राज होते हुए भी, कोई प्राणी स्वेच्छा से मौत के मुंह में जाना पसंद नहीं करता। मूक प्राणियों की तुलना में मनुष्य अधिक सभ्य और सुरक्षित है। जब एक गधे को भी अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं, तो वह इंसान गधा ही होगा जो खुदकुशी करने की सोचेगा। ।

आज के भौतिक युग में कुंठा, संत्रास, अवसाद अथवा मादक पदार्थों के सेवन के प्रभाव से भी व्यक्ति आत्मघाती प्रवृत्ति का हो जाता है। नास्तिकता और विकृति के कारण कई युवा अपनी जान गंवा बैठते हैं। ।

सकारात्मक सोच और विवेक के अभाव में फिर भी किसी व्यक्ति के जीवन में ऐसे नाजुक क्षण आ जाते हैं, कि क्षणिक आवेश में वह अपनी इहलीला समाप्त कर बैठता है। यह एक ऐसा गंभीर जानलेवा कदम है, जो कभी वापस नहीं लिया जा सकता। यहां कोई भूल चूक लेनी नहीं, किसी तरह का भूल सुधार संभव नहीं।

अगर जीवन में एकांत है तो नीले आकाश और उड़ते पंछियों को निहारें, फूल पौधों और तितलियों से प्यार करें।

कहीं कोई नन्हा सा बच्चा दिख जाए, तो उससे बातें करें। बच्चों से आप ढेर सारी बातें कर सकते हैं। बच्चे कभी नहीं थकते क्योंकि बच्चों में ही तो भगवान होते हैं। अपने से कमजोर, अधिक दुखी और त्रस्त इंसान से प्रेरणा लें।

आखिर वह भी तो जिंदा है ;

एक बंजारा गाए

जीवन के गीत सुनाए।

हम सब जीने वालों को जीने की राह बताए। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #२८८ ☆ सत्संगति प्रभावहीन नहीं… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख सत्संगति प्रभावहीन नहीं। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # २८८ ☆

☆ सत्संगति प्रभावहीन नहीं… ☆

‘झूठ कहते हैं, संगति का असर होता है… आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया और न फूलों को चुभना आया’ कितना विरोधाभास निहित है इस तथ्य में…यह सोचने पर विवश करता है, क्या वास्तव में संगति का प्रभाव नहीं होता? हम वर्षों से यही सुनते आए हैं कि अच्छी संगति का असर अच्छा होता है। सो! बुरी संगति से बचना ही श्रेयस्कर है। जैसी संगति में आप रहेंगे, लोग आपको वैसा ही समझेंगे। बुरी संगति मानव को अंधी गलियों में धकेल देती है, जहां से लौटना नामुमक़िन होता है तथा उसे ही दलदल अथवा कीचड़ की संज्ञा दी गयी है। यदि आप कीचड़ में कंकड़ फेंकेंगे, तो उसके छींटे अवश्य ही आपके दामन को मलिन कर देंगे। सो! इनसे सदैव दूर रहना चाहिए। इतना ही क्यों ‘Better alone than a bad company.’ अर्थात् ‘बुरी संगति से अकेला रहना कहीं अच्छा है।’ परंतु पुस्तकों को मानव का सबसे अच्छा मित्र स्वीकारा गया है, क्योंकि वे हमें सत्मार्ग पर ले जाती हैं।

परंतु इस दलील का क्या… ‘आज तक न कांटों को महकने का सलीका आया, न फूलों को चुभना रास आया’–हमारे मन में ऊहापोह की स्थिति उत्पन्न करता है। यह तथ्य मनोमस्तिष्क को उद्वेलित ही नहीं करता, झिंझोड़ कर रख भी रख देता है। इस स्थिति में हम सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आखिर सत्य क्या है? उसके बारे में जानकारी प्राप्त करना तथा शब्दबद्ध करना उसी प्रकार असम्भव है, जैसे परमात्मा की सत्ता व उसके गुणों का बखान करना। इसीलिए लोग ‘नेति-नेति’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, क्योंकि परमात्मा निर्गुण, निराकार, निर्विकार,अनश्वर व सर्वव्यापक है। उसकी महिमा अपरम्पार है तथा वह सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। उसकी महिमा का गुणगान करना मानव के वश की बात नहीं। यहां भी विरोधाभास स्पष्ट झलकता है कि जो निराकार है…जिसका रूप व आकार नहीं; जो निर्गुण है.. सत्, रज, तम तीनों गुणों से परे है; जो निर्विकार अर्थात् दोषों से रहित है; परंतु वह अनश्वर है…उसमें शील, शक्ति व सौंदर्य का  समन्वय है…वह विश्व में श्रद्धेय है, आराध्य है, पूजनीय है, वंदनीय है।

प्रश्न उठता है, कि जो शब्द ब्रह्म मानव के अंतर्मन में निवास करता है, उसे बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं… उसे मन की एकाग्रता द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। एकाग्रता ध्यान केंद्रित करने से आती है। सो! हमें  अंतरात्मा में झांकने की आवश्यकता है। यह ध्यान की वह स्थिति है, जिस में मानव क्षुद्र व तुच्छ वासनाओं से ऊपर उठ जाता है और उसे केवल सत्य-स्वरूप ब्रह्म ही नज़र आता है, क्योंकि ‘ब्रह्म सत्यम्, जगत् मिथ्या।’ परन्तु सांसारिक प्रलोभनों व मायाजाल में लिप्त बावरा मानव, मृग की भांति उस कस्तूरी को पाने के निमित्त इत-उत भटकता रहता है और वह भूखा-प्यासा रेगिस्तान में सूर्य की किरणों में जल का आभास पाकर निरंतर भागता रहता है…परंतु अंत में अपने प्राण त्याग देता है। सो! वही दशा मानव की है, जो नश्वर व भौतिक संसार में उसे मंदिर-मस्जिदों में तलाशता रहता है, जबकि वह तो उसकी अंतरात्मा में निवास करता है। परंतु मृग- तृष्णाएं उसे पग-पग पर उलझाती व भटकाती हैं और भ्रमित मानव उस मायाजाल से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता… लख चौरासी तक मोह-माया के बंधनों में उलझा रहता है। परिणामत: उसे कहीं भी सुक़ून, आनंद अथवा कैवल्य की स्थिति प्राप्त नहीं होती।

जहां तक  कांटों को महकने का सलीका न आने का प्रश्न है, वह प्रकाश डालता है–मानव की आदतों पर; जो लाख प्रयास करने पर भी नहीं बदलतीं, क्योंकि वे हमें पूर्व-जन्म  के संस्कारों के रूप में प्राप्त होती हैं। कुछ संस्कार पूर्वजों द्वारा प्रदत्त होते हैं और विभिन्न संबंधों के रूप में हमें प्राप्त होते हैं, जिन्हें पल्लवित-पोषित करने में हमारा कोई अहम् योगदान नहीं होता। परंतु उनका निर्वहन करने को हम विवश होते हैं और कुछ संस्कार हमें माता-पिता, गुरुजनों व हमारी संस्कृति द्वारा प्राप्त होते हैं, जो हमारे चारित्रिक गुणों को विकसित करते हैं। अच्छे संस्कार हमें आदर्शवादी बनाते हैं और बुरे संस्कार हमें पथ-विचलित करते हैं; हमें संसार में अपयश दिलाते हैं।  यह संबंध हम स्वयं बनाते हैं, अक्सर यह संबंध स्वार्थ के होते हैं, जिन पर विश्वास करना स्वयं को छलना होता है। परंतु कुसंस्कारों के कारण समाज में हमारी निंदा होती है और लोग हमसे घृणा करना प्रारंभ कर देते हैं। बुरे लोगों का साथ देने के कारण हम पर अंगुलियां उठना स्वाभाविक है… क्योंकि ‘यह मथुरा काजर की कोठरी, जे आवहिं ते कारे’ अर्थात् ‘जैसा संग, वैसा रंग’। कुसंगति का रंग अर्थात् काजल अपना प्रभाव अवश्य छोड़ता है। कबीरदास जी की यह पंक्ति’ कोयला होई ना ऊजरा, सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् कोयला सौ मन साबुन से धोने पर भी, कभी उजला नहीं हो सकता अर्थात् मानव की जैसी प्रकृति, प्रवृत्ति, सोच व आदतें होती हैं; उनके अनुरूप ही वह कार्य-व्यवहार करता है।

इंसान अपनी आदतों का ग़ुलाम होता है और सदैव उनके अंकुश में रहता है; उनसे मुक्ति पाने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकता। इसलिए कहा जाता है कि इंसान की सोच,आदतें व प्रवृत्तियां चिता की अग्नि में जलने के पश्चात् ही बदल सकती हैं। सो! प्रकृति के विभिन्न उपादान फूल, कांटे आदि अपना स्वभाव कैसे परिवर्तित कर सकते हैं? फूलों की प्रकृति है हंसना, मुस्कराना, बगिया के वातावरण को महकाना व आगंतुकों के हृदय को आह्लादित-उन्मादित करना। सो! वे कांटो के चुभने के दायित्व का वहन कैसे कर सकते हैं? इसी प्रकार मलय वायु, जो शीतल, मंद व सुगंधित होती है… याद दिलाती है अपने प्रिय की, जिसके ज़हन में आने से समस्त वातावरण आंदोलित हो उठता है और मानव अपनी सुधबुध खो बैठता है।

यह तो हुआ स्वभाव, प्रकृति व आदतों के न बदलने का चिंतन, जो सार्वभौमिक सत्य है। परंतु अच्छी आदतें सुसंस्कृत व अच्छे लोगों की संगति द्वारा बदली जा सकती है। हां! हमारे शास्त्र व अच्छी पुस्तकें इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं; बेहतर योगदान दे सकती हैं; उचित मार्गदर्शन कर जीवन की दशा व दिशा बदल सकती हैं। जो मनुष्य नियमित रूप से ध्यान-मग्न रहता है; सत्शास्त्रों का केवल अध्ययन ही नहीं; चिन्तन-मनन करता है; आत्मावलोकन करता है; चित्तवृत्तियों पर अंकुश लगाता है; इच्छाओं की चकाचौंध में फंसकर  असामान्य व्यवहार नहीं करता तथा उनकी दासता स्वीकार नहीं करता; वह दुष्प्रवृत्तियों के इस मायाजाल से स्वत: मुक्ति प्राप्त कर सकता है…कुसंस्कारों का त्याग कर सकता है और अपने स्वभाव को बदलने में समर्थ हो सकता है।

सो! हम उपरोक्त कथन को मिथ्या सिद्ध कर सकते हैं कि सत्संगति प्रभावहीन होती है, क्योंकि फूल और कांटे अपना सहज स्वभाव-प्रभाव हरगिज़ नहीं छोड़ते। कांटे अवरोधक होते हैं; सहज विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं; सदैव चुभते हैं; पीड़ा पहुंचाते हैं तथा दूसरों को कष्ट में देखकर आनंदित होते हैं। दूसरी ओर फूल इस तथ्य से अवगत होते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, फिर भी वे निराशा का दामन कभी नहीं थामते… अपना महकने व मुस्कुराने का स्वभाव कभी नहीं त्यागते। इसलिए मानव को उनसे संदेश लेना चाहिए तथा जीवन में सदैव हंसना-मुस्कुराना चाहिए, क्योंकि खुश रहना जीवन की अनमोल कुंजी है; जीवन जीने का उत्तम सलीका है। इसलिए हमें सदैव प्रसन्न रहना चाहिए ताकि दूसरे लोग भी हमें देखकर उल्लसित व आनंदित रह सकें और अपने कष्टों के भंवर से मुक्ति प्राप्त कर सकें।

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि परमात्मा ने सबको समान बनाया है। इंसान कभी अच्छा-बुरा नहीं हो सकता… उसके सत्कर्म व दुष्कर्म ही उसे अच्छा व बुरा बनाते हैं…उसकी सोच को सकारात्मक व नकारात्मक बनाते हैं। अपने सुकर्मों से ही प्राणी सब का प्रिय बन सकता है। जैसे प्रकृति अपना स्वभाव नहीं बदलती; धरा, सूर्य, चंद्र, नदियां, पर्वत, वृक्ष आदि निरंतर कर्मशील रहते हैं; नियत समय पर अपने कार्य को अंजाम देते हैं; अपने स्वभाव को विषम परिस्थितियों में भी नहीं त्यागते; स्थिर रखते हैं…सो! हमें इनसे प्रेरणा प्राप्त कर सत्य की राह का अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि इनमें परोपकार की भावना निहित रहती है…ये किसी को आघात नहीं पहुंचाते और किसी का बुरा भी नहीं चाहते। हमारा स्वभाव भी वृक्षों की भांति होना चाहिए। वे धूप, आतप, वर्षा, आंधी, तूफ़ान आदि के प्रहार सहन करने के पश्चात् भी तपस्वी की भांति अडिग खड़े रहते हैं, जबकि वे जानते हैं कि उन्हें अपने फलों का स्वाद नहीं चखना है। परंतु वे परोपकार हित सबको शीतल छाया व मीठे फल प्रदान करते हैं, भले ही कोई इन्हें कितनी भी हानि क्यों न पहुंचाए। इसी प्रकार सूर्य की स्वर्णिम रश्मियां सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं, चंद्रमा व तारे अपने निश्चित समय पर दस्तक देते हैं तथा निद्रा देवी थके-हारे मानव व समस्त प्राणी-जगत् को अपने आग़ोश में सुला लेती है ताकि वे भोर होते नव-चेतना व ताज़गी अनुभव कर, प्रफुल्लता से पुन: अपनी दिनचर्या में तल्लीन हो सकें। इसी प्रकार वर्षा के होने से धरा पर हरीतिमा छा जाती है और जीवनदायिनी फसलें लहलहा उठती हैं। इन सबसे बढ़कर ऋतु-परिवर्तन हमारे जीवन की एकरसता को मिटाता है।

मानव का स्वभाव चंचल है। वह एक-सी मन:स्थिति में लम्बे समय तक रहना पसंद नहीं करता। परंतु जब हम प्रकृति से छेड़छाड़ करते हैं, तो उसका संतुलन बिगड़ जाता है; जो भूकंप, सुनामी, भयंकर बाढ़, दुर्भिक्ष, महामारी, भू-स्खलन आदि के रूप में समय-समय पर प्रकट होता है। यह कोटिशः सत्य है कि जब प्रकृति के विभिन्न उपादान अपना स्वभाव नहीं बदलते, तो मानव अपना स्वभाव क्यों बदले … जीवन में बुरी राह का अनुसरण करे तथा दूसरों को व्यर्थ हानि पहुंचाए? इस तथ्य से तो आप अवगत हैं कि जैसा व्यवहार आप दूसरों से करते हैं; वही लौटकर आपके पास आता है। इसलिये ‘सदैव अच्छा सोचिए, अच्छा बोलिए, अच्छा कीजिए, अच्छा दीजिए व अच्छा लीजिए।’ यदि दूसरा व्यक्ति आपके प्रति दुर्भावना रखता है व दुष्कर्म करता है, तो कबीरदास जी के दोहे का स्मरण कीजिए ‘जो ताको कांटा  बुवै, तू बूवै ताको फूल’ अर्थात् आपको फूल के बदले फूल मिलेंगे और कांटे बोने वाले को शूल ही प्राप्त होंगे। इसलिए इस सिद्धांत को जीवन में धारण कर लीजिए कि शुभ का फल शुभ अथवा मंगलकारी होता है। इसलिए सदैव अच्छा ही अच्छा कीजिए। यह भी शाश्वत सत्य है कि कुटिल मनुष्य कभी भी अपनी कुटिलता का त्याग नहीं करता, जैसे सांप को जितना भी दूध पिलाओ; वह काटने का स्वभाव नहीं त्यागता। इसलिए ऐसे दुष्ट लोगों से सदैव सावधान रहना अपेक्षित है…उनकी फ़ितरत पर विश्वास करना स्वयं को धोखा देना व संकट में डालना है तथा उनका साथ देना अपने चरित्र पर लांछन लगाने व कालिख़ पोतने के समान है। सो! मानव के लिए दूसरों के व्यवहार के अनुरूप व प्रतिक्रिया-स्वरूप अपना स्वभाव न बदलने में ही उसका अपना व प्राणी-मात्र का हित है, मंगल है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५६ ⇒ गणमान्य बनाम सेलिब्रिटी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गणमान्य बनाम सेलिब्रिटी।)

?अभी अभी # ७५६  ⇒ आलेख – गणमान्य बनाम सेलिब्रिटी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अक्सर जो गणमान्य होते हैं, वे अतिथि ही होते हैं। जो दर्शकगण और श्रोतागण को मान्य हो, वह गणमान्य हो ही जाता है। अतिथि तो भगवान होता है, आप किसे भी अतिथि बनाकर बैठा दें, वह गणमान्य हो जाएगा।

आयोजन के पहले और पश्चात गणमान्य एकदम सामान्य हो जाता है। केवल मंच और सम्मान, उसे गणमान्य बनाता है। गणमान्य अतिथि का जो स्वागत करता है, कुछ समय के लिए वो भी असामान्य हो जाता है। कभी कभी तो ऐसी नौबत आ जाती है कि स्वागत करने वाला गणमान्य होता है, और स्वागत करवाने वाला अति-सामान्य। लेकिन क्या भरोसा, समय कब किसे गणमान्य बना दे और किसे सामान्य। ।

जब भी शहर में किसी विशिष्ट व्यक्ति का देहावसान होता है, विशेष शोकसभा आयोजित की जाती है, जिसमें नगर के गणमान्य नागरिक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, साहित्यकार, राजनेता, समाजसेवी और धार्मिक नेता शोक संवेदना प्रकट करते हैं। 

जिसे हम हिंदी में हस्ती कहते हैं, उसे अंग्रेज़ी में सेलिब्रिटी कहते हैं। हाल ही में हिंदी के एक सेलिब्रिटी को हिंदी से ही ग्लानि होने लगी। मुझे भी जब तक सेलिब्रिटी का हिंदी पर्याय नहीं सूझा, मुझे अपने आप से ग्लानि होने लगी। मैं धन्य हुआ, जब अवचेतन से स्वनामधन्य जैसा शब्द प्रकट हुआ। फिर तो मानो हिंदी में सेलिब्रिटीज की लाइन लग गई। हम पहले सेलिब्रिटी को तुर्रम खां कहते थे। वी आई पी तो हमारे शहर में पान की दुकान का नाम है।

जो गणमान्य होते हैं, वे भी एक तरह से सेलिब्रिटी ही होते हैं, लेकिन जब होटल रेडीसन पर ट्रैफिक जाम होता है, तब वे भी काँच का शीशा खोलकर ट्रैफिक हवलदार से पूछ ही लेते हैं, भई क्या बात है ? हवलदार लापरवाही से जवाब देता है, कोई सेलिब्रिटी ठहरा है होटल में, शायद विराट कोहली, उसी की भीड़ है। आगे बढिए !गणमान्य, सेलिब्रिटी के भाग्य को सराहता हुआ आगे बढ़ जाता है। ।

गणमान्य शहर का होता है, सेलिब्रिटी आन गाँव का सिद्ध ! सेलिब्रिटी के आगे पीछे टीवी कैमरे लगे रहते हैं, मानो कोई शूटिंग चल रही हो। सेलिब्रिटी फ़िल्म कलाकार भी हो सकता है और क्रिकेट खिलाड़ी भी। नेता भी सेलिब्रिटी होते हैं, लेकिन उनके लिए केवल कार्यकर्ताओं की भीड़ एकत्रित होती है, आम आदमी की नहीं।

सेलिब्रिटी का कोई व्यक्तिगत जीवन नहीं होता। उसका एक बयान, या एक ट्वीट दुनिया हिला सकता है। उसके एक ट्वीट पर टीवी पर बहस हो सकती है, धरना, प्रदर्शन हो सकते हैं, उसे गिरफ्तार करने की माँग भी हो सकती है। ।

किसे मालूम है जब राजीव गाँधी एक साधारण पायलट थे, सराफे में चुपचाप रबड़ी खाकर चले जाते थे, पीएम बनते ही, इस दुनिया से ही चले गए।

अखबार, सोशल मीडिया, टीवी चैनल सब सेलिब्रिटीज के लिए ही बने हैं। अगर सेलिब्रिटीज न हों, तो न तो लक्स साबुन बिके और न ही फेयर एंड लवली। क्या आप जानते हैं, पहला केंट, R O वाटर फ़िल्टर कौन लाया ? स्वप्न सुंदरी हेमा मालिनी ! अगर बिग बी ठंडा ठंडा कूल कूल नवरत्न तेल का विज्ञापन लेकर नहीं आते, तो क्या आपको पता चलता, यह कितना कूल है। ।

सेलिब्रिटी होना, अगर एक वरदान है तो एक अभिशाप भी। एक स्वतंत्र देश का नागरिक होते हुए भी न तो वह आज़ादी से जी सकता है, न मर सकता। उसके व्यक्तिगत जीवन पर निगाहें रखी जाती है। वह खुली सड़क पर, अपना सीना तानकर नहीं निकल सकता। उसकी मौत भी एक रहस्य बन जाती है। कॉफ़ी किंग वीजी सिद्धार्थ को ही ले लीजिए ! वे आज नहीं हैं, पर उनकी चर्चाएँ बहुत हैं।

ईश्वर हमें सब कुछ बनाए, कभी गणमान्य न बनाए, कोई सेलिब्रिटी न बनाए। एक आज़ाद पंछी की तरह अपनी ज़िंदगी जीयें, और समय आने पर फुर्र से उड़ जाएँ। न कोई शोकसभा न किसी किस्म का राष्ट्रीय शोक। शौक से जीयें, शौक से मरें। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 142 – देश-परदेश – बिल्ली मौसी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 142 ☆ देश-परदेश – बिल्ली मौसी ☆ श्री राकेश कुमार ☆

अभी पांच अगस्त को श्वान घसीटी दिवस था, अब ये बिल्ली दिवस भी आ गया है। पश्चिम ने क्या नए त्यौहार बना दिए हैं। हमारे यहां तो घर में बिल्ली प्रवेश कर ले, तो उसे डंडा दिखा कर भगा दिया जाता है, उसके बाद वहां हाइजीन के कारण सफाई की जाती है।

देखा जाय तो बिल्ली का प्रयोग मुहावरों में खूब किया गया है, बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना, खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे आदि। बचपन में बिल्ली छाप जूते की पॉलिश से जूते चमकाए जाते थे। बिल्ली के परिवार से ही जंगल का राजा आता है। ऐसा हमारी प्राचीन कहानियों में लिखा हुआ मिलता है।

पश्चिम ने तो स्त्रीयों की सुंदरता नापने के लिए ” बिल्ली चाल” को एक पैमाना तक बना दिया हैं। हमारे यहां चोर बिल्ली चाल से अपना काम करते हैं। हमारे यहां तो “हिरणी जैसी चाल” या “हिरणी जैसी आंखों” से ही खूबसूरती आंकी जाती है। क्रूर महिलाओं की तुलना बिल्ली से अवश्य की जाती है।

हमारा देश भी अब बदल गया है। बिल्ली पालना, कुत्ते पालना के बाद अमीरों का सबसे बड़ा शौक बन चुका है। पहले बिल्लियां पाली नहीं जाती थी, इधर उधर घूम कर अपना जीवन व्यतीत कर लेती थी। अब तो इनके पालनहार घर में पूरी व्यवस्था करते हैं। इनके लिए एक अलग कमरा और स्नानगृह भी होता है। उनको भी जीवन में निजता की आवश्यकता होती है।

बड़े स्टोर्स में बिल्लियों के सामान का अलग काउंटर होता है। इनके गर्मी, सर्दी के अलग अलग वस्त्र भी उपलब्ध होते हैं। विदेश में तो इनके लिए बेकरी भी अलग से होती हैं।

हम मानवों ने तो बिल्लियों में रंग भेद की भावना कर दी है। सुनहरे रंग की बिल्ली संपन्नता लाती है। काली बिल्ली को अशुभ माना जाता है। बिल्ली अगर रास्ता काट जाए, तो हम लोग रास्ता ही बदल लेते हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५५ ⇒ घुटने का दर्द ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “घुटने का दर्द।)

?अभी अभी # ७५५  ⇒ आलेख – घुटने का दर्द ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

इसे कहते हैं, दुखती रग पर हाथ रखना ! घुटने का दर्द भले ही आम लगता है, लेकिन अधिकतर यह महान लोगों को ही होता है।

बहुत वर्ष पहले एक परिचित मिले, बोले, मेरे भी घुटने में दर्द है ! मैंने पूछा, मेरे भी का क्या मतलब ? वे बोले, क्या आप नहीं जानते, अटल जी को भी है !

और तो और दयालु शंकर अर्थात पूर्व राष्ट्रपति डॉ शंकर दयाल शर्मा भी घुटनों के दर्द से परेशान रहते थे।

जिस तरह मनुष्य के शरीर में दो घुटने होते हैं, उसी तरह शब्द घुटने के भी दो अर्थ होते हैं।

घुटना शब्द घुटन से बना है। घुटने का दर्द तो चाल-ढाल से ही पकड़ में आ जाता है, लेकिन अंदर की घुटन को सिर्फ महसूस किया जा सकता है, बताया नहीं जा सकता। घुटने के दर्द के तो कई इलाज हैं, नारायणी तेल से मालिश अगर कारगर न हो तो, घुटने का प्रत्यारोपण भी करवाया जा सकता है, लेकिन घुटन का किसी वेद, हकीम, ओझा फ़क़ीर के पास कोई इलाज संभव नहीं। किसी प्यासे ने कहा भी है, इसको ही जीना कहते हैं तो, यूँ ही जी लेंगे। उफ़ न करेंगे, लब सी लेंगे, आँसू पी लेंगे।।

आज तक इस तथ्य पर ज़्यादा विचार नहीं हुआ, कि आदमी एड़ियाँ ज़्यादा घिसता है, या घुटने ! बचपन में घुटने-घुटने चलने वाले इंसान का बड़े होकर जब एड़ियाँ घिसने से भी काम नहीं चलता, तब घुटने टेकने ही पड़ते हैं। इससे यह भी सिद्ध होता है कि एड़ियाँ, घुटनों से अधिक मजबूत होती हैं। वे घुटनों की तरह आसानी से घुटने नहीं टेक देती। वैसे भी घुटनों की तुलना में एड़ियाँ कम ही ख़राब होती हैं।

अंधेरे बंद कमरे, और कम हवादार स्थान पर जब साँस लेने में दिक्कत होती है, तब घुटन का अहसास होता है। खुले में, बाग-बगीचों में, और प्राकृतिक स्थानों पर कभी घुटन का अहसास नहीं होता। जो एकांतप्रिय है, जिसकी किसी से घुटती नहीं, वह तो ज़न्नत में भी घुटन का माहौल बना सकता है। मंथरा महलों में भी रहती है।।

जब इंसान अकेला होता है, किसी ग़म को गले से लगाए बैठा होता है, या जब कोई पुराना ज़ख्म हरा हो जाता है, तो वह अंदर से घुटने लगता है। कुछ लोग इस घुटन का इलाज कड़वे घूँट में भी ढूंढना चाहते हैं, लेकिन इससे घुटन और भी बढ़ती ही है, कम नहीं होती।

न जाने क्यों एक ज़माने में घुटनों के दर्द को पहलवानों से जोड़ा जाता था। लेकिन जब से यह पति-पत्नी दोनों को एक साथ होने लगा है, तब से जोड़ों का दर्द कहलाने लगा है।

घुटनों और घुटन दोनों का अगर समय रहते इलाज नहीं किया गया तो इसका शरीर और मन पर विपरीत असर पड़ने लगता है।

शारीरिक वज़न का संतुलन, नियमित व्यायाम, सकारात्मक जीवन और स्वस्थ मानसिकता ही दोनों तरह के दर्द का एकमात्र उपचार है। न कभी अपने आप में घुटें, न कभी आपको घुटने के दर्द का अहसास हो, ईश्वर से आज सुबह की यही प्रार्थना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ७५४ ⇒ छतरी और साइकिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “छतरी और साइकिल।)

?अभी अभी # ७५४  ⇒ आलेख – छतरी और साइकिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज भी डूबते को तिनके के सहारे की तरह, किसी भीगते इंसान को छाते का ही सहारा होता है। गाड़ी में पेट्रोल खत्म होने पर, अथवा गाड़ी खराब होने पर, आज भी आपातकालीन विकल्प एक साइकिल ही है, लेकिन अफसोस, कल की जरूरत, आज यह द्वि चक्र वाहिनी महानगर में घोर उपेक्षा की शिकार है।

सन् ६० के दशक में हर मध्यमवर्गीय परिवार में एक अदद एटलस साइकिल और काली छतरी अवश्य होती थी।

तब शहर की दीवारें आज की तरह स्वच्छता का चौका जैसे नारों से नहीं, हम दो हमारे दो वाले विज्ञापनों से सजी होती थी। यह अलग बात है कि हर घर में कम से कम सात आठ सदस्य तो आसानी से नज़र आ ही जाते थे। हम दो, हमारे दो, के हिसाब से चार तो वैसे ही हो ही गए, थोड़ा बहुत कम ज्यादा तो इसमें भी चलता था। अगर शुरू में ही तीन बेटियां हो गईं तो इसमें किसका दोष ? एक बेटे की आस किसे नहीं होती।।

तब गजब का भाईचारा था भाई साहब ! मेहमां जो हमारा होता था, वो जान से प्यारा होता था। गांव से एक बार आता था, तो फिर जाने का नाम ही नहीं लेता था। पड़ोसी भी चाय शकर की तरह कभी छाता तो कभी साइकिल मांगकर ले जाते, अभी लाया, जरा बबली को स्कूल छोड़ आऊं। यह बारिश भी ना, एकदम बरस पड़ती है।

घर में स्त्री पुरुष की ही तरह छाते और साइकिल की भी लेडीज और जेंट्स की जोड़ी होती थी। लेडीज साइकिल, जेंट्स साइकिल, और जेंट्स काली छतरी और लेडीज रंग बिरंगी छोटी छतरी।

लेडीज साइकिल तो कोई भी चला लेता, लेकिन जेंट्स साइकिल जेंट्स ही चलाते थे।।

बाबूजी कुर्ता पायजामा पहनते थे, उनकी अपनी अलग साइकिल और छतरी थी। साइकिल चलाने के पहले वे पायजामे को नीचे से मोड़, दोनों पांवों पर एक लोहे की पतली चूड़ी नुमा रिंग चढ़ा लेते थे, जिससे पायजामा साइकिल की चेन में ना फंसे। वैसे साइकिल में भी चेन कवर होता था। जो लोग दिलीप कुमार टाइप बावीस इंच की मोहरी वाली पैंट पहनते थे, उनको भी इसी तरह, साइकिल चलाते वक्त, पैंट की सुरक्षा करनी पड़ती थी। छतरी को भी वापरने के बाद, पूरी तरह से सुखाकर और समेटकर, कायदे से एक बटन द्वारा बंद किया जाता था।

तब बरसात में बाजार में छाते ही छाते नजर आते थे। जितने सर उतने छाते। बेचारे काम करने वाले सब्जी बेचने वाले और मजदूर एक बोरेनुमा बरसाती से ही अपना तन सुरक्षित कर लेते थे। स्कूटर और मोटर साइकिल के साथ छतरी का कोई मेल नहीं था। तब तक रेनकोट मार्केट में जो आ गए थे। जेंट्स और लेडीज दोनों बरसातियों के बावजूद छाते फिर भी शान से सर पर तनते ही रहे, और आम आदमी की मेंटेनेंस फ्री साइकिल भी सड़क के बीचोबीच चलती ही रही।।

आज साइकिल भले ही घर में छोटे बच्चों को सवारी बनकर रह गई हो, एक अदद छाता हर कार वाले की जरूरत बन गया है। कार में बरसते पानी में चढ़ते उतरते वक्त, बेहतर है, छतरी की सेवाएं ले ही ली जाएं।

हम कितने भी डिजिटल हो जाएं, पेट्रोल के विकल्प में ई वाहन ले आएं, पॉवर क्राइसिस हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाला ! हमें घूम फिरकर वापस साइकिल पर आना ही होगा। अब मेट्रो आपके घर आने से तो रही। खैर, फिलहाल हम बारिश का सामना करें, और अपनी अपनी छतरी तान लें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 301 – शिवोऽहम् … (4) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 301 शिवोऽहम्*…(4) ?

आदिगुरु शंकराचार्य महाराज के आत्मषटकम् को निर्वाणषटकम् क्यों कहा गया, इसकी प्रतीति चौथे श्लोक में होती है। यह श्लोक कहता है,

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खं

न मंत्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञः।

अहम् भोजनं नैव भोज्यम् न भोक्ता

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम् ।।

मैं न पुण्य से बँधा हूँ और न ही पाप से। मैं सुख और दुख से भी विलग हूँ, इन सबसे मुक्त हूँ। अर्थ स्पष्ट है कि आत्मस्वरूप सद्कर्म या दुष्कर्म नहीं करता। इनसे उत्पन्न होनेवाले कर्मफल से भी कोई सम्बंध नहीं रखता।

मंत्रोच्चारण, तीर्थाटन, ज्ञानार्जन, यजन कर्म सभी को सामान्यतः आत्मस्वरूप का अधिष्ठान माना गया है। षटकम् की अगली पंक्ति  सीमाबद्ध को असीम करती है। यह असीम, सीमित शब्दों में कुछ यूँ अभिव्यक्त होता है, ‘मैं न मंत्र हूँ, न तीर्थ, न ही ज्ञान या यज्ञ।’ भावार्थ है कि आत्मस्वरूप का प्रवास कर्म और कर्मानुभूति से आगे हो चुका है।

मंत्र, तीर्थ, ज्ञान, यज्ञ, पाप, पुण्य, सुख, दुखादि कर्मों पर चिंतन करें तो पाएँगे कि वैदिक दर्शन हर कर्म के नाना प्रकारों का वर्णन करता है। तथापि तत्सम्बंधी विस्तार में जाना इस लघु आलेख में संभव नहीं।

आगे आदिगुरु का कथन विस्तार पाता है, ‘मैं न भोजन हूँ, न भोग का आनंद, न ही भोक्ता।’ अर्थात साधन, साध्य और सिद्धि से ऊँचे उठ जाना। विचार के पार, उर्ध्वाधार। कुछ न होना पर सब कुछ होना का साक्षात्कार है यह। एक अर्थ में देखें तो यही निर्वाण है, यही शून्य है।

वस्तुत: शून्य में गहन तृष्णा है, साथ ही गहरी तृप्ति है। शून्य परमानंद का आलाप है। इसे सुनने के लिए कानों को ट्यून करना होगा। अपने विराट शून्य को निहारने और उसकी विराटता में अंकुरित होती सृष्टि देख सकने की दृष्टि विकसित करनी होगी।  शून्य के परमानंद को अनुभव करने के लिए शून्य में जाना होगा।… अपने शून्य का रसपान करें। शून्य में शून्य उँड़ेलें, शून्य से शून्य उलीचें। तत्पश्चात आकलन करें कि शून्य पाया या शून्य खोया?

शून्य अवगाहित करती सृष्टि,

शून्य उकेरने की टिटिहरी कृति,

शून्य के सम्मुख हाँफती सीमाएँ

अगाध शून्य की  अशेष गाथाएँ,

साधो…!

अथाह की कुछ थाह मिली

या फिर शून्य ही हाथ लगा?

साधक एक बार शून्यावस्था में पहुँच जाए तो स्वत: कह उठता है, ‘मैं सदा शुद्ध आनंदमय चेतन हूँ, मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ, शिवोऽहम्..!

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से रक्षाबंधन तदनुसार शनिवार 9 अगस्त तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगासाथ ही गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ भी करेंगे। 💥 

💥 101 से अधिक मालाजप करने वाले महासाधक कहलाएंगे 💥

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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