(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित लघुकथा “आद्या कीआराधना ”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६१ ☆
🌻लघुकथा🌻 🛕आद्या कीआराधना 🚩
बड़े भक्ति भाव से जिन कन्याओं को सिध्दी दात्री नवदुर्गा पूजन के बाद मंदिर में तामझाम के साथ कन्या भोज कराया गया था। समाज सेवक और कुछ शुभ चिंतकों की तस्वीरें दिखाई दे रही थी। लग रहा था, श्रद्धा की भावना उमड़ रही है।
आज भोर होते ही आसपास की सभी बिटिया मंदिरों पर सफाई करते नजर आई।
पान चबाते वही सब कहते जा रहे थे – – – देख वहाँ से सब साफ होना चाहिए। एक भी कचरा नही होना चाहिए।
माथे पर जय माता दी की पट्टी लगाये सभी बालिकाएं मंदिर की साफ सफाई करते भगवती को सुना रही थी–झुन झुन झननन बाजे मैय्या पाँव पैजनियांँ।
(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रति – निदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – अंतरात्मा.)
🌱 लघुकथा – अंतरात्मा🌷
“बिटिया ख़ूब मन लगाकर पढ़ना. मेडिकल का आखरी वष॔ है. अरे हाँ! हमारे सारे परिवार में तुम पहली लड़की होंगी,जो हमारे किसान परिवार में डॉक्टर बनेंगी. “अपने बाबा की यह बातें सुनकर सुमति गवि॔त हो उठती थी.
आज सुबह से ही वह कुछ बेचैन सी थी. उसका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था. रह रहकर उसे रमेश की बातें याद आ रही थी. कुछ दिन पहले वह मोबाईल पर कह रहा था कि हम दोनों का परिवार हमारे विवाह के सख्त खिलाफ है. हम दोनों ही वयस्क है. मौका मिला तो भागकर कोट॔ मॅरेज कर लेंगे. आज सुबह भी उसने उसी बात को दोहराते हुए कहा कि “आज संध्या सात बजे मैं पुराने बस स्टैंड के पास, तुम्हारा इंतेजार करूंगा”. और आगे समझाते हुए यह भी कहा कि “आते समय जितना भी रूपया व ज़ेवरात समेट सकती हो. समेट लेना. सफर में काम आएंगे. सुमति रमेश के बारे में सोचने लगी कि उसे रमेश से बचपन से लगाव रहा है. वह सुंदर व्यक्तित्व का होते हुए, एक संपन्न परिवार का इकलौता बेटा है उनमें केवल जाति का अंतर था. वह अच्छी नौकरी की तलाश में लगा हुआ है. देखते देखते निर्णय की घड़ी पास आ गयी थी शाम के पांच बजने को आ गये थे. उतने में पिताजी ने आवाज लगायी और कहने लगे- “बेटा ,मैं तुम्हारी माँ के साथ दोस्त के घर काय॔क्रम में जा रहा हूँ. जल्दी ही लौटेंगे. छोटी सो रही है. ध्यान रखना” कहकर वे दोनों बाहर चले गये. सुमति ने मौके फ़ायदा उठाते हुए. अलमारी से नगदी व ज़ेवरात समेटकर कर अपने कपडों के सूटकेस में रख लिया. निकलने से पहले मंदिर वाले कमरे में जाकर अपने कुल देवता बाप्पा मोरया के सामने प्राथ॔ना करते हुए आंखें बंद कर के बैठ़ गयी. तभी उसे ऐसे लगा कि बंद आँखों में कुछ अदृश्य सा प्रतित हो रहा है. जैसे उसे उसकी अंतरात्मा कह रही हो ,” तुम क्या करने जा रही हो?अपने माता पिता से विश्वासघात कर रही हो. जिन्होंने तुम्हे पढ़ा लिखा कर समाज मे जीना सिखाया है. सिफ॔ क्षणिक सुख के लिए अपने परिवार के माथे पर कलंक लगा रही हो”. इतना सुनते ही उसका मन उद्वेलित हो उठा. जैसे ही उसने आंखें खोली ,तो ऐसा लगा कि कोई उसके आसपास था. वह वहां से तुरंत उठी और अपना सूटकेस खोल कर नगदी व ज़ेवरात निकालकर उन्हें अलमारी में जैसे थे वैसे रख दिये. तभी मोबाईल की आवाज़ सुनाई दी. उठाकर देखा तो रमेश के दस मिस काॅल दिखे.
इतने में बाहर के दरवाजे पर थप थप की आवाज सुनाई थी. सुमति ने घड़ी की ओर देखा. आठ बज रहे थे. उसने मोबाईल बंद कर दिया और दौड़ते हुए गयी और दरवाजा खोला. दरवाज़े पर माता पिता को देखा तो अपने बाबा से लिपटकर फूट फूट कर रोने लगी.
“अरे बेटा क्या हुआ. क्यों रो रही हो?”
“कुछ नहीं , बाबा, मैं ख़ूब मन लगाकर पढूंगी. हमारे परिवार की पहली डॉक्टर बनूंगी. आपका नाम रोशन करूंगी”. कहते हुए कुलदेवता की मूर्ति के सामने जाकर बैठ़ गयी और मन ही मन कहने लगी “बाप्पा मोरया आपने आज हमारे परिवार की लाज बचा ली. “
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा “– खून का रिश्ता…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०० — खून का रिश्ता —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
(विशेष — कुछ शब्दों में एक महत्वपूर्ण कहानी)
विश्व प्रसिद्ध भूगोल वेत्ता अपने काम से अमरीका गया। एक अमरीकी ने उससे कहा, आपके हस्ताक्षर से एक जिज्ञासा हो रही है। आपके देश में इसी हस्ताक्षर के एक लेखक हैं। क्या वे आप के रिश्तेदार हैं? यह सुनने पर वह चौंक गया। वह लेखक तो उसका पिता था। पर उसने कहा, उन्हें जानता तो हूँ, लेकिन वे मेरे रिश्तेदार नहीं हैं। इस पलायन का उसका अपना कारण था। उससे उसके पिता की कृतियों के बारे में पूछ लिया जाता तो उसकी कोई कृति न पढ़ने के कारण वह उत्तर न कर पाता। पर उसका यह पलायन अंतिम नहीं था। वह घर लौटने पर अपने पिता के गले लग कर कहता, “मेरे पिता, मैंने विदेश में तुम्हारी चर्चा तो खूब सुनी।”
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – पवित्र रिश्ता।)
बेटा आज शाम को तुम्हें देखने लड़के वाले आ रहे हैं थोड़ा बेसन का उबटन लगा लो रागिनी ने अपनी बेटी सुमन से कहा।
सुमन चिल्ला कर बोली – “क्यों पकौड़े बनाकर मुझे ही उन्हें खिलाने वाली हो क्या?”
सुमन ने कहा- “माँ मैं जैसी हूं वैसे ही उनके सामने आऊॅंगी बनावट का श्रृंगार मुझे नहीं करना है।”
“ठीक है अच्छा अच्छा आराम कर ले” सुमन ने गहरी सांस भरते हुए कहा।
वह रसोई में चली गई नाश्ता बनाने के लिए।
उनके मन में बड़ी उलझन थी कि क्या आज इसका रिश्ता तय होगा या नहीं पता नहीं लड़का कैसा मिलेगा?
शाम को जब लड़के वाले घर पहुंचे तब सुमन एक हल्के गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहनकर हल्के मेकअप के साथ उनके सामने उपस्थित हुई।
लड़के की माँ ने पूछा- ‘बेटा तुम्हें खाना बनाना आता है? ‘
“आंटी हाँ मैं थोड़ा बहुत बना लेती हूँ चाय नाश्ता अच्छे से बना लेती हूँ” सुमन ने कहा।
सुमन की माँ ने कहा- “बहन जी आजकल लड़कियाँ खाना कहाँ बनाती हैं नौकरी और काम से फुर्सत कहाँ मिलती है।”
रागिनी ने कहा – “बहन जी मेरी इकलौती बेटी है इसके पिताजी बिजनेस के सिलसिले में बाहर गए हैं हमारी खिलौने की बड़ी दुकान है।”
रागिनी ने पूछा- “बहन जी आपका बेटा क्या करता है?”
लड़के की माँ ने कहा – “मेरे पति का 2 साल पहले स्वर्गवास हो गया है पर पुलिस में बड़े अधिकारी थे उनकी जगह मेरे बेटे को नौकरी मिल गई है।“
रागिनी ने कहा- “बेटा अजय तुम हम लोगों से बात नहीं करोगे क्या?”
“नहीं आंटी एक बात मैं आपको बता दूँ, मुझे भी काम के सिलसिले में दिनभर किसी भी समय इधर-उधर जाना पड़ता है।”
‘हाँ बेटा मैं समझ सकती हूँ” रागिनी ने कहा।
“आंटी सुमन शादी के बाद क्या नौकरी छोड़ देगी?”
तभी सुमन बोल पड़ी “मैं कोई रामायण की सीता नहीं हूँ यह बात आप अच्छे से समझ लीजिए?”
“मैं आधुनिक नारी हूँ, यदि आप राम बनके रहेंगे तो मैं सीता रहूंगी नहीं तो मैं काली बनना जानती हूँ, आगे आप स्वयं समझदार है” इतना कहकर अंदर चली जाती है।
रागिनी और लड़के की माँ एक दूसरे को देखती रहती हैं। इंस्पेक्टर अजय ने कहा – “रामराज्य नहीं है आज के जमाने में कहीं लेकिन आंटी मैं भी रावण तो नहीं हूँ।”
“आपकी बेटी का जब गुस्सा शांत हो जाएगा तब मैं उससे मिलने आऊॅगा। शादी एक पवित्र रिश्ता है जब हमारे मन मिलेंगे तभी शादी होगी” इतना कहकर माँ बेटे दोनों चले जाते हैं।
ताजा ताजा पिघले कोलतार से सड़क बनी है। सड़क यानी सुविधा।सड़क यानी विकास। जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक गवाही दे रहा है। पर नन्हा चुरुंगुन( चिड़िया का बच्चा) कुछ नहीं जानता ।मनुष्य की बनाई दुनिया के नियमों से अनजान।हर सड़क, हर तरह के लोगों के लिए नहीं होती।चुरुंगुन- पगडंडी, सड़क और राजपथ के बीच फर्क नहीं समझता।
वह जैसे ही सड़क पर आकर बैठा, पिघले हुए कोलतार में उसका पाँव फंस गया।उसने निकालने की खूब चेष्टा की, पंख फड़फड़ाए , शरीर झटका पर पाँव न निकला। वह नन्ही सी चोंच खोले जोर -जोर से च्यूंक-च्यूंक करने लगा ।उसकी दशा देखकर एक युवक का मन करुणा से भर गया।
वह झुका और उसने धीरे-धीरे कोलतार में फँसा हुआ उसका पांव निकाला ।चुरुंगुन पलक झपकते ही उड़ गया। वह जाने कहाँ चला गया।
युवक ने राहत की साँस ली ।काली सड़क थी, भूरा चुरुंगुन इसलिए झट से नज़र आ गया वर्ना किसी गाड़ी के नीचे या किसी के पाँव तले कुचला जाता ।
युवक सड़क को देखते हुये मन ही मन सोच रहा था– लाक्षापथ की जानकारी सभी को नहीं होती न ।
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – लघुकथा – सार्थकता।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७२ ☆
☆ लघुकथा – सार्थकता☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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खेत में खड़े बिजूकों को देखकर हैलमेटों ने तंज कसा- “हम तो अपने मालिकों की जान बचाते हैं, तुम्हारा जीवन व्यर्थ है।”
एक बिजूका बोला- ‘तुम जरखरीद गुलाम सिर्फ अपने मालिक के काम आते हो। हम अपने और तुम्हारे मालिकों के साथ सबका पेट भरने के लिए दिन में धूप और रात में अँधेरे से जूझते हैं।’
निरुत्तर हैलमेट अगली सुबह खेतों में खड़े थे बिजूका बनकर।
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “अनकहा सा कुछ…”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
– सुनो!
– कहो !
– मैं तुम्हें कुछ कहना चाहता हूँ ।
– कहो न फिर !
– समझ नहीं आता कैसे कहूं, किन शब्दों में कहूं?
– अरे! तुम्हें भी सोचना पड़ेगा?
– हां ! कभी कभी हो जाता है ऐसा !
– कैसा ?
– दिल की बात कहना चाहता हूँ पर शब्द साथ नहीं देते !
(ई-अभिव्यक्ति में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं साहित्यकार मोहम्मद जिलानी जी का हार्दिक स्वागत.शिक्षण – बी.ए., बी एड, एम ए (अंग्रेजी, हिंदी, समाजशास्त्र), एम एड विशेष – यू के में एक सप्ताह का शैक्षणिक दौरा. सेवाएं – व्याख्याता (अंग्रेजी और हिंदी) के पद पर सेवाएं प्रदत्त, इसके पश्चात् प्रधानाध्यापक और प्राचार्य पद पर सेवाएं प्रदत्त, तत्पश्चात उप शिक्षा अधिकारी, जिला परिषद् चंद्रपुर के पद से सेवानिवृत्त. अभिरुचि – हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, उर्दू, और तेलुगु भाषा में पठन, लेखन. गीत, संगीत और सिनेमा में भी विशेष अभिरुचि. संप्रति – निदेशक जिलानी ग्रुप ऑफ़ स्कूल्स। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आशियाना.)
🌱 लघुकथा – आशियाना 🌷
“चल भाग यहां से कब्रिस्तान के चौकीदार ने सोते हुए भिखारी को फटकार लगायी. भिखारी शमशू को उठाते हुए कहा – “भय्ये सिर्फ रात भर ही तो सोता हूँ. किसी को क्या तकलीफ हो रही है?”
“अरे भाई समझता क्यों नही. यह कब्रिस्तान है. रिश्तेदार एतराज करते हैं.”
“भला इसमे एतराज की क्या बात है?”
“इन्हे भी तो सुकून चाहिए. फिर आये दिन जादूटोना के लिए मांत्रिक कब्र खोदकर मुर्दे गायब करते हैं. मैंने तुझे कई बार समझाया, पर तू बाज़ नही आता” यह कहते हुए साथ आई पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस स्टेशन के दरोगा ने कडक आवाज मे पूछा. “क्यों बे मुर्दे चुराता है?”
शमशू डरते हुए बोले “हूजूर मजबूरी मे सोता हूँ.”
“अब यह सब नहीं चलेगा. कहीं और ठिकाना ढूंढो”
“हुजूर कहां ढूंढू. मस्जिद या मंदिर के पास सोता हूं तो हकाल देते हैं. धार्मिक या सरकारी संस्थान के आसपास आने नही देते. फुटपाथ पर सोते हैं तो कब कोई पियक्कड़ गाड़ी में कुचल दे, कोई भरोसा नहीं. बच गए तो लंगड़ा-लूला बनकर ज़िन्दगी गुजारो.”
“इसमे पुलिस क्या कर सकती है?”
“कम से कम हमें कब्रिस्तान मे सोने दीजिए. जहाँ डर की बजाए शांति तो है.”
यह सुनकर स्तब्ध होकर दरोगा महात्मा गांधी जी की तस्वीर की ओर देखने लगा.
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख – “चुस्कियाँ… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५७ ☆
लघुकथा – चुस्कियाँ… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
सतीश और भीम लंबे अरसे के बाद मिले। दोनों ठेकेदार थे। पानी की लाइन डालना, सड़क बनाना और भी सरकार के निर्माण कार्य दोनों ही करते थे। संबंध मधुर थे पर व्यवसाय में कड़ा मुकाबला और गोपनीयता थी। कई बार सुरेश के ऊंची दर वाले टेंडर को अनुभव या किसी अन्य तकनीकी कारणों से स्वीकार नहीं किया जाता और कम दर होने पर भीम का टेंडर स्वीकार हो जाता।
लेकिन दोनों में से किसी ने कभी यह जिक्र नहीं किया कि ऐसा कैसे हो जाता है। सतीश को अखरता तो टेंडर पास होते समय भीम की आंखें झुक जाती थी। हृदय में जो कुछ हो उसे आंखों से कोई समझले तो समझले पर शब्दों में नहीं आ पाता।
अब दोनों ही वृद्ध हो गए हैं और ठेकेदारी भी छोड़ चुके हैं। दोनों चाय की चुस्कियाँ ले रहे हैं। न सतीश के चेहरे पर अखराव के भाव हैं और न ही भीम की आंखें झुकी हुई हैं।
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – कर्तव्य।)
आशा जी अपने एक बैग में किताबें भरकर जल्दी-जल्दी अपने कदम बढ़ाते हुए ऑटो रिक्शा में बैठकर सिटी के बीच स्थित हिंदी लाइब्रेरी में पहुंच जाती हैं। जैसे ही वे गेट के अंदर जाती है, पक्षियों की चहचहाहट का मनोरम संगीत माहौल को खुशनुमा बना रहा था।
बाहर एक टेबल पर अखबार और तरह-तरह की मैगजीन रखी थी।
नगर के सभी वरिष्ठ नागरिक यहाँ पर आकर अखबार पढ़ते हैं और वे अपने बच्चों के अच्छे कपड़े, किताब, कॉपी, जैकेट एवं जूते सब यहाँ एक कोने में अलमारी में रख देते हैं जरूरतमंद अपने घर ले जाते हैं।
यह देखकर आशा जी को बहुत अच्छा लगा मन में एक प्रसन्नता हुई उन्होंने बाहर बैठे व्यक्ति से पूछा कि – “मैं भी कुछ दान करना चाहती हूँ, कहाँ रख सकती हूँ? पास बैठे व्यक्ति ने कहा कि “आप अंदर जाइए वहां पर एक बुजुर्ग दंपति बैठे हैं वह आपको सब बता देंगे।”
उसे सामने रिसेप्शन में बैठे सीनियर सिटीजन नजर आए ।
देखकर आशा ने कहा- “मैं कुछ किताबें यहाँ पर दान करने के लिए लाई हूँ लेकिन मैं क्या कुछ सामान भी लाकर यहाँ रख सकती हूँ?”
बुजुर्ग दंपति ने कहा- “बिल्कुल बहन आप यहाँ पर आकर पढ़ सकती हैं और सामान को दान दे सकते हैं।”
आशा जी ने कहा- “यहाँ पर मैं बैठकर अपने लेखन कार्य को अच्छे से कर सकती हूँ।”
आज मैंने एक बात समझी -“आप रचनाकारों को लिखने के लिए प्रेरित करने का नेक कार्य भी कर सकती हैं।”
वृद्ध महिला ने कहा- “महिलाऍं बहुत संघर्ष से लेखन कार्य करती है इसलिए हम उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। हमारे लाइब्रेरी में कोई भी आ सकता है।”
आशा जी ने कहा – “अधिकार की बात सब करते हैं किन्तु, आपने एक मिसाल कायम की है। अपने कर्तव्य का समाज के प्रति निर्वाह किया है।”
बुजुर्ग दंपति और आशा जी दोनों मुस्कुराने लगते हैं आशा जी की ऑंखों में एक नई ऊर्जा और चमक आ जाती है।