हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७५ ☆ कविता – सुभाष चंद्र बोस… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – सुभाष चंद्र बोस…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७५

☆ सुभाष चंद्र बोस…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

तेइस जनवरी जन्म दिवस है उस भारत के लाल का

जिसका प्रेरक जीवन मन में पावन याद उभारता ।।

*

इस दिन ने ही भारत मां को दिया सपूत सुभाष था

जिस पर भारत जनमानस का अडिग अमर विश्वास था।।

*

जिन के गौरव से गौरान्वित भारत का इतिहास है

उन महानपुरुषों में से एक अनुपम वीर सुभाष है।।

*

एक चरित्र अनोखा ऐसा जिसके प्रखर प्रकाश में

सभी दूसरे तारे धूमिल दिखते हैं आकाश में।।

*

जिसे गृहस्थी, सुख-सपना सब दिखता था जंजाल सा।।

पा ऊंची शिक्षा भी जिसने रखी न वैभव लालसा ।।

*

उपन्यास सी जिसकी जीवन गाथा कई आयाम की

जिसने कभी न की आकांक्षा कहीं किसी आराम की।।

*

दृष्टि रही पाने स्वदेश की आजादी का रास्ता

लक्ष्य एक ही रहा, रखा न अधिक और से वास्ता।।

*

दल के भीतर भी विरोध का गरल पान कर शांति से

होकर दूर भ्रांति से, जिसने जोड़ा नाता क्रांति से।।

*

अपना दर्शन और दिशा ले आगे बढ़ते शान से

अमर आज भी है जो जग में, जन मन में सम्मान से।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०३ – गीत – सब रूपों में पूजित नारी… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतसब रूपों में पूजित नारी..

? रचना संसार # १०३ ?

☆ गीत – सब रूपों में पूजित नारी…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ?

कुलवंती दयमंती है वह

घर की लक्ष्मी हर नारी।

तीनों लोकों में यश उसका

सारा जग है बलिहारी।।

*

उर विशाल माँ दुर्गा जैसा,

जगजननी कहलाती है।

जन्मे गर्भ से देवता हैं,

धरती स्वर्ग बनाती है।।

साहस करुणा की हे देवी,

अभिनंदन है अवतारी।

*

आशा है विश्वास वही है,

दिव्य शक्ति है कल्याणी।

जगत् को संजीवनी देती,

मधुरस पूरित है वाणी।।

सब रूपों में पूजित नारी,

देखो सब पर है भारी।

*

अपना धर्म निभाती हँसकर,

पीर जगत् की हरती है।

कर्म करे श्रद्धा से अपना,

धरा उर्वरा करती है।।

चहुँदिशि जय-जयकार उसी की,

संकल्पों की फुलवारी।

*

कीर्तिमान नित नूतन रचती,

ध्वजा प्रगति की फहराती।

करती है उत्थान देश का,

अंतरिक्ष तक वह जाती।।

त्यागी लक्ष्मी स्वाभिमानिनी,

दुर्गावती कहाँ हारी।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३२) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३२) ? ?

कितने दिनों से

धधक रही थीं

चुप्पियाँ,

सारी की सारी

उँड़ेल दी एक साथ

खौलते पानी की तरह?

सुनो मित्र,

विनम्रता से कहता हूँ

मेरी चुप्पियाँ

महज खौलता पानी नहीं

बद्री विशाल में

माँ अलकनंदा की

हिमलहरियों के बीच

गर्म पानी का

छोटा- सा सोता है,

मेरे साथ

बद्रीधाम की यात्रा

पर चलो

फिर इसे

अनुभव करो..!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 11:58 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३० ☆ भावना के दोहे – माता पिता ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – माता पिता )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३० – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – माता पिता ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

दिखने में शालीन हो, मगर नहीं सद्भाव।

कंठ फूटता आपका, कितने देता घाव।।

मीठे माँ के बोल हैं, मीठा है विश्वास।

सदा याद माँ की छुअन, अंतर्मन में खास।।

 *

अंतस में माता-पिता, सदा यही अहसास।

हम तो उनके अंश हैं, करते हैं अरदास।।

 *

जीवन के इस मोड़ पर, पिता नहीं है पास।

खले सदा उनकी कमी, मिलने का अहसास।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१२ ☆ संतोष के मुक्तक – सीढ़ी अहम् की… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय  – संतोष के मुक्तक – सीढ़ी अहम् की आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१२ ☆

संतोष के मुक्तक – सीढ़ी अहम् की☆ श्री संतोष नेमा ☆

स्याही    से      सूरज   उगाते

कविता  में  तुम  चांद  सजाते

पढ़ने    वाले    रो   पड़ते    हैं

पर तुम खुद को कब पिघलाते

*

कागजों पर इबारत  गढ़ते  हो

दर्द मुहब्बत सच सब  पढ़ते हो

शब्दों  से जहाँ  बदलने  वालो

सीढ़ी  अहम की क्यों चढ़ते हो

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३१ – कविता – क्या हुआ…? ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता क्या हुआ…? ।)

☆ शशि साहित्य # ३१ ☆

? कविता – क्या हुआ…? ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

क्या हुआ…?

क्यों सूख गई तेरी स्याही?

जब मेरी किस्मत में “कुछ” लिखने की बारी आई…

खुद तो ना रह सका प्रीत बिना,

फिर तेरी रचना क्यों अधूरी,

जब रच रहा था तू मुझे,

क्या तुझको मुझ पर दया ना आई…?

 

इधर समुंदर, उधर मरु-थल,

तेरी लीला समझ ना आई…

मुझको तो दिया भर भर के,

क्यों दूसरों की भावनाएं सूख गई…

खुद को गढ़ने की दी नेमत तूने मुझको,

दूसरों को जिम्मेदारी समझ ना आई…?

 

खूब रोई, खूब बिलखी,

तब “तूने” यह राज बताया…

नहीं चाहता, सखी ..

तेरी सच्ची भावना और प्रेम प्रीत,

किसी और के हिस्से में जाएं

दुख दिया, बना स्वार्थी,

सिर्फ मुझे तुम अपना मानो,

इसलिए यह रास रचाई…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३१) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (३१) ? ?

तुम्हारा चुप

मेरे चुप से

अलग है,

अभेद में

भेद दिखा रहा है,

वह रक्त की लालिमा

और जल की प्रवहनीयता पर

प्रश्न उठा रहा है।

?

© संजय भारद्वाज   

2.9.2018, प्रात: 10:03 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “चुभती स्मृतियों का रोमांच” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – चुभती स्मृतियों का रोमांच… ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

किताब में “उसकी” तस्वीर

यक़ीनन कोई बुक मार्कर नहीं थी

महफूज़ थी गर्द ओ ग़ुबार से

यादों में पैवस्ता एक दस्तावेज की तरह

उसे देखने की लालसा में

वह किताब जिसमें तस्वीर रखी थी

कभी बुक शेल्फ के पुस्तक संग्रह में

नहीं सजती थी

अक्सर रीडिंग टेबल पर या

बिछौने के सिरहाने रखी रहती थी

जानबूझकर, न चाहते हुए भी

मैं उस किताब को पढ़ने का उपक्रम करता था

और अतीत के घावों को खुद कुरेद कर

हरे और ताज़े कर लेता था

कई बार मन में आया कि,फाड़कर फेंक दूं

लेकिन सचमुच लगा कि

यह आसां तो नहीं था और सहेजा था ऐसा कुछ

तो यह उतना व्यर्थ का प्रयोजन नहीं था

सुना था कि…

चुभती चीज़ें भी, जिस्म ओ जां को राहत देकर

ज़िंदगी में बहुत से मर्ज़ ठीक करने की विधा हैं

सो वह यादगार आज भी वैसी ही रखी है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ गुरुवर का शुक्रिया ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ गुरुवर का शुक्रिया ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

तुमने दिया विवेक तो, हुआ सत्य  का भान।

करूँ शुक्रिया आपका, गुरुवर ऐ भगवान।।

खिलता है जीवन तभी, जब गुरुवर हैं संग। 

करूँ शुक्रिया ज़िन्दगी, गुरु से जो नवरंग।।

 *

 यदि गुरुवर हैं संग तो, मैं नित ही बलवान।

करूँ शुक्रिया तात हे!, है जीना आसान।।

 *

नहीं ज्ञान बिन चेतना, जीवन जाता हार।

प्रभुवर करता शुक्रिया, पाया मैं उजियार।।

 *

गुरु देते संस्कार नित, कर देते निर्माण।

सदा शुक्रिया ज्ञान का, जिससे रक्षित प्राण।।

 *

हर दुर्गुण को दूर कर, गुरुवर लाते शान।

करूँ शुक्रिया सूर्य का, मिलती जिससे आन।।

 *

गुरुवर का नित शुक्रिया, जिनका पावन काम।

जिनको समझो शिष्य तुम, पूरे चारों धाम।।

 *

गुरुजी की महिमा बहुत, करो शुक्रिया खूब।

जो देते हैं ज्ञान को, गहराई में डूब।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०३ ☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०३ ☆ 

☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

चूहे राजा चले बाजार।

साइकिल पर वह हुए सवार।

थैला लिया साथ में अपना।

बाएँ ओर सड़क के चलना।

थैले में सामान को लाएँ।

पॉलीथिन को नहीं अपनाएँ।

कभी प्रदूषण नहीं बढ़ाएं।

 धरती माँ को स्वर्ग बनाएँ।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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