हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (६) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (६) ? ?

‘चुप रहो’

क्रोध का पारावार

ज्यों-ज्यों बढ़ता है

अपने सिवा

हरेक से

चुप्पी की आशा करता है,

आवेग की

इकाई होती है चुप्पी!

 

?

© संजय भारद्वाज  

( 2.9.2018, प्रातः 6:51 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२१ – जीवन की बस यही अदा है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन की बस यही अदा है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२१ ☆

☆  जीवन की बस यही अदा है…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

जीवन की बस यही अदा है।

कब तक किसका साथ बदा है।।

 *

जियो जिंदगी जी भर यारो।

मन पर भारी बोझ लदा है।।

सत्य सनातन की यह बेला।

हनुमत जी की बड़ी गदा है।।

 *

कितना भी वह सत्य छुपा लें।

होना उसकी जीत सदा है।।

 *

नेक राह पर चलना सीखो।

मिले सफलता यदा-कदा है।।

 *

बंग भूमि की दुखद कहानी।

अधिक गरीबी यदा-तदा है।।

 

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

22/5/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मुक्तक – अमराई की छाँव  ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ मुक्तकअमराई की छाँव ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

अमराई की छाँव सुहाती, मृदु अहसास कराती।

शीतलता देकर के हमको, भावों में ले जाती।

तपन भले ही पीड़ादायक, पर अमराई भाये,

मोहक छाँव मनुज के तन को, राहत से सहलाती।।

अमराई की छाँव स्वर्ग-सी, सपनों में ले जाती।

मधुर हवा तो गीत सुनाकर, सबको है दुलराती।

मौसम को खुशहाल बनाती, मस्ती को है देती,

बहुत सुहानी होती छैयाँ, मंगल भाव सजाती।।

 *

अमराई की छाँव खोजकर, सीखो समय बिताना ।

खुशियों से दामन को भरकर, उत्फुल्लित हो जाना।

अमराई की बात निराली, आकर्षण यौवन पर,

हरियाली से नेह लगाकर, उसके ही हो जाना।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – चिन्ताकुल…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८५ – चिन्ताकुल…१ ✍ 

खेत,

खलिहान

नदी,

पर्वत

नगर, गाँव और आदमी

सब बेहाल हैं

सबके एक से हाल हैं

सबकी मुट्ठियों में

जलते हुए सवाल हैं।

सवालों का न तन होता है

न मन होता है

सवालों की उम्र नहीं

केवल वजन होता है।

और/ ये वजन

घन की तरह घिरता है

गिरता है

सपना बिखरता है

मैं/

तुम/ये/ वे

सब बैठे हैं- सूखी नदियों के किनारे

हमारे

प्यारे घर

बाढ़ में बह गये हैं

हमारे पाससिर्फ जहरीली रेत के घरौंदे रह गये है।

बाढ़/नदी की होती

तो सब सह लेते

किसी तरह रह लेते

लेकिन

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८४ “बाप कवितायें लिखता है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बाप कवितायें लिखता है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बाप कवितायें लिखता है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

बेटे को अफसोस

“बाप कवितायें लिखता है।”

है अधेड़ पर अधिक आयु का

बेशक दिखता है ॥

 

चुँधियाये चश्में से सबको

ताका करता है ।

तम्बाकू को मसल हथेली

फाँका करता है ।

 

अपभ्रंश है बचा आदमी

की प्रजाति का –

डारवीन के परिकल्पन को

जाँचा करता है ॥

 

जमा हुआ रहता

चबूतरे पर हो स्थायी ।

उसको कोई सीख किसीकी

अब तक ना भायी ।

 

कोई बात सहन करने की

मगर नहीं क्षमता –

माँ के कुछ भी कहने पर

वह  भड़का करता है ॥

 

कोई महिला दरवाजे से

अगर निकल जाये ।

पता नहीं कब उनकी

भीषण त्योरी चढ़  जाये ।

 

फिर तो बस अध्याय

सजग आलोचन का लेकर ।

अपने भाषण में वह उसका

पालन करता है ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

16 – 5 – 2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (६) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (६) ? ?

मेरे भीतर

जम रही हैं

चुप्पी की परतें,

मेरे भीतर

तन रही है

मोटी-सी चादर,

मैं मुटा रहा हूँ…,

आलोचक

इसे खाल का मोटा होना

कह सकते हैं,

कुछ अवसरसाधु

इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं,

प्रत्यक्ष मित्र,

परोक्ष शत्रु,

सभी तीर चला रहे हैं,

मैं चुप हूँ , डरता हूँ

कहीं पिघल न जाए मेरी चुप्पी

और इसके लावे की जद में

आ न जाएँ

आलोचक, अवसरसाधु,

आत्मकेंद्रित मित्र

और शत्रुओं के व्यवहार,

विनाश की कीमत पर

सृजन नहीं चाहता मैं!

 

?

© संजय भारद्वाज  

1.9.2018, रात 9:56 बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता जिंदगी का आखिरी प्रहर है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६५ ☆

☆ # “जिंदगी का आखिरी प्रहर है…” # ☆

यह माना कि जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है

 

कभी अंधेरों ने धमकाया

कभी उजालों ने भरमाया

कभी हवाओं ने जुल्म ढाया

कभी मौसम ने है रुलाया

कभी हार नहीं मानी

यह खुद्दारी का असर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

यह चिलचिलाती धूप

झुलसाती हुई रूप

लू चल रही है खूब

सांस हो रही है चुप

धरा पर भीषण गर्मी का

मचा हुआ कहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

जुल्म सहते सहते

सदियां बीत गई है

हक अधिकारों के लिए

लड़ने की क्या रीत नई है?

तोड़कर रूढ़ियों को आती

यह नई सहर है

बहुत जी लिए अब

 किस बात का डर है

 

उनकी आवाज बने

जो बेबस बेघर हैं

उनके आंसू पोंछे

जिनका जीवन बदतर है

दिलों में ज्योत जलाएं 

अंधेरा बहुत पथ पर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

लाचार निर्धन शोषितों के लिए

चलो कुछ करते हैं

इनके लिए जीते हैं

इनके लिए ही मरते है

नेक इरादा हो तो

 आसान हर सफर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

हमारे पथ पर चलकर

आगे कई लोग आएंगे

आजादी के जश्न में

नए तराने गुनगुनाएंगे

इन दीवानों के कदमों में

अर्पित हमारा सर है

बहुत जी लिए अब

किस बात का डर है

 

यह माना जिंदगी का आखिरी प्रहर है

बहुत जी लिए अब किस बात का डर है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०८ – नारी तुम खुद की पहचान हो… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता नारी तुम खुद की पहचान हो।)

☆ अभिव्यक्ति # १०८ ☆

☆ नारी तुम खुद की पहचान हो☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

☆ 

नारी, तुम खुद की पहचान हो,

छाया नहीं किसी की तुम हो,

तुम ही घर की शान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

संस्कार को देने वाली,

प्रेम सभी से करने वाली,

सृजन की पहचान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम्ही अंगनी, तुम्हीं वंदनी,

तुम्हीं संगनी, तुम्हीं नंदनी,

तुम ही लय और तान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम ही शिव की शक्ति हो,

तुम ही पावन भक्ति हो,

तुम धरा का मान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

*

तुम धरा की श्रेष्ठ कृति हो,

ममता, प्रेम की अनुभूति हो,

ईश्वर का प्रतिदान हो,

नारी तुम खुद की पहचान हो.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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English Literature – Poetry ☆ The Priceless Silence…/ अनमोल ख़ामोशी ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ The Priceless Silence ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ The Priceless Silence… ??

(ई-अभिव्यक्ति में 23 मई को प्रकाशित संजय जी की रचना – चुप्पियाँ से प्रेरित कविता (इंग्लिश और हिंदी वर्जन))

 Your silence

is exquisitely rare

 

The more you

keep your lips sealed,

the more

its worth keeps rising

 

I often wonder

what price

your silence commands now…

 

Will it

rise even further…?

 

And once again,

I wrapped myself

in a long silence…!

 ============

 

? ~ अनमोल ख़ामोशी… ??

तुम्हारी ख़ामोशी

बहुत नायाब है

 

जितना तुम

लब सिले रहते हो

उतना ही

उसका मोल बढ़ता जाता है

 

हैरत होती है

कि तुम्हारी ख़ामोशी की क़ीमत अब

कितनी होगी

 

क्या ये अभी

और बढ़ेगी…?

 

मैंने एक बार फिर

लंबी ख़ामोशी

ओढ़ ली…!

(Inspired by Shri Sanjay Bhardwaj Ji’s poem चुप्पियाँ

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८० – ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – मत रोको)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८० ☆

☆ ग़ज़लिका – मत रोको ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

मत रोको, जो होता है, हो जाने दो।

सोना खोना मत, सोना खो जाने दो।।

.

सत्ता जिनका लक्ष्य उन्हें वह पाने दो।

उनको अपने मुख, अपना गुण गाने दो।।

.

हम-तुम निर्धन, कम हो तो भी जी लेंगे।

चैन बिकी, बेचैन न हो बिक जाने दो।।

.

क्रूर बेरहम हैं सारे सत्ताधारी।

पत्रकार चारण बनते बन जाने दो।।

.

चलो पसीना सींच रोप लें आशाएँ।

कुछ कुम्हलाएँ-सूखेँ तो कुम्हलाने दो।।

.

देव मूर्तियाँ दानव जैसी बना रहें।

नादां, मत रोको उनको बनवाने दो।।

.

मन मंदिर में तन की पूजा मत करना।

चाह रहा जो तन, उसको तन पाने दो।।

.

वनवासी के भक्त, भागते पद-पीछे।

सच को झूठ बताते तो बतलाने दो।।

.

जो जा चुके, कोसकर उनको खुश होते

यदि कृतघ्न पामर कुछ तो हो जाने दो।।

.

जन-गण मौन भले हो, गूँगा मत मानो।

पलटेगा यह तंत्र समय तो आने दो।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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