हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २८१ – संकल्पित रहो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – संकल्पित रहो…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २८१ – संकल्पित रहो – १ ✍

दोस्तो!

मैं महापुरुष नहीं साधारण व्यक्ति हूँ।

मेरे मन में भी उपजते हैं। हर्ष और विषाद

मुझे भी घेरती है निराशा

मैं भी बोलता हूँ/ दिग्भ्रमित अर्जुन की भाषा

पीड़ित होता हूँ अन्याय और अत्याचार से

विह्वल हो उठता हूँ। द्रौपदी जैसी पुकार से।

फिर होता है एहसास

कि मुझे जकड़े है- विवशता का पाश!

सोचता हूँ

जाने अनजाने इसी नागपाश में बँधे हैं

सब लोग

सब में व्याप गया है

निर्बलता का राजरोग,

शायद

निर्बलता शब्द न हो बिल्कुल ठीक

निर्बलता की जगह शायद

निर्वीयता होगा सही सटीक,

यह निर्वीयता नहीं तो क्या है

कि फटी आँखें देखती हैं

जलती बस्तियाँ।

देखती हैं- सद्भाव की डूबती कश्तियाँ।

प्रेम को मूर्खता

और करुणा को समझा जाता है

लिजलिजा विचार

अखबारों में रोज छपते हैं समाचार

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८० “बाहर हाँफ रही गौरैया…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बाहर हाँफ रही गौरैया...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८० ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

चित्र – श्री राघवेंद्र तिवारी (2004)

☆ “बाहर हाँफ रही गौरैया...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

एक सकोरा पानी-दाना

रक्खा करती माँ ।

औरों की खातिर चिड़ियों सी

 उड़ती रहती माँ ॥

 

छाती में दुनिया-जहान की

लेकर पीड़ायें ।

आँचल भर उसको सारी

जैसे हों क्रीड़ायें ।

 

आगे खिडकी में आँखों के

चित्र कई टाँगे ।

पीड़ा को कितनी आँखों से

देखा करती माँ ॥

 

बाहर हाँफ रही गौरैया

उस मुँडेर तोती ।

जहाँ उभरती   दिखे

सभी को आशा की जोती ।

 

गर्मी गले-गले तक आकर

जैसे सूख गई ।

इंतजार में हरी-भरी सी

दिखती रहती माँ ॥

 

लम्बे-चौड़े टीम-टाम है

बस अनुशासन के ।

जहाँ टैंकर खाली दिखते

नगर प्रशासन के ।

 

वहीं दिखाई देती सबकी

सजल खुली आँखें ।

इन्हीं सभी में भरे कलश

सी छलका करती माँ ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

17-04-2022

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समानांतर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समानांतर ? ?

…….???

…..???

…???

पढ़ सके?

फिर पढ़ो..!

नहीं…?

सुनो मित्र,

साथ न सही

मेरे समानांतर चलो,

फिर मेरा लिखो पढ़ो..!

?

© संजय भारद्वाज  

(दोपहर 3:10 बजे, 15.6.2016)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ क्या फर्क पड़ता है? ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

☆  क्या फर्क पड़ता है? ☆ हेमन्त बावनकर ☆ 

श्श्श्श…श्श्श

शान्त… शान्त

यहाँ सोती हैं

सौ से ज्यादा छोटी छोटी लड़कियाँ

जो पढ़ने के लिए निकली थीं.

पढ़ने तो गईं…

लेकिन, वापिस लौट न सकीं

और

सुला दी गई

उन छोटी छोटी कब्रों में

एक भयावह कब्रगाह में…

इससे,

दुनिया की बाकी छोटी छोटी लड़कियों को

उनके रिश्तेदारों को

और

जो इंसान कहलाने लायक ही नहीं हैं, उनको 

क्या फर्क पड़ता है?

 

वे मासूम लड़कियाँ

तो जानती भी नहीं थी कि…

देश क्या होता है?

सरहद क्या होती है?

मजहब क्या होता है?

नस्ल क्या होती है?

दोस्त देश क्या होता है?

और

दुश्मन देश क्या होता है?

वे तो समझती थी कि

सूरज एक होता है

चाँद एक होता है

और

यह जमीं सभी की होती है.

उनकी सारी दुनिया तो

घर से शुरू होकर

स्कूल तक ख़त्म हो जाती थी.

खा पीकर, पढ़ लिख कर

माँ-बाप की आगोश में खो जाती थी.

फिर,

जिस किसी ने निशाना बनाकर

उनके स्कूल पर मिसाइल दागी थी, उसे

क्या फर्क पड़ता है?

 

हम आदी हो चुके हैं

लड़ाइयों को टी वी पर देखने के

विडियो गेम्स की मानिंद…

तबाही के इस खेल में

अब हमें दिखाई नहीं देते

खँडहर बनते स्कूल और अस्पताल

शहर और इमारतें

शहरों-खंडहरों में दब रही

ऐशो आराम पुरसुकून आलीशान जिंदगी.

तबाह होते

खूबसूरत बाग़ बगीचे. 

अब… बच्चे, मर्द-औरतें और बुजुर्ग

कैसे भी जियें या मरें,

क्या फर्क पड़ता है?

 

हमें सीखने के लिए तो बहुत कुछ था

फिर क्या सीखा हमने ?

हुक्मरानों के तानाशाह होने से…

नागासाकी के परमाणु विस्फोट से…

यातना शिविरों से…

गैस चेम्बरों से…

गैस त्रासदी से…

आतंक के साए से…

धर्मान्धता के जहर से…

कोविड की महामारी से…

लड़ाइयों और नरसंहारों से…

अब, अमन के नाउम्मीद उन्मादियों को

क्या फर्क पड़ता है?

 

मुस्तक़बिल का आलमी अमन इनाम याफ़्ता

शायद कहीं सो रहा है…    

ज्यादातर अवाम बे-रुख़ हो गई है

और हुक्मरान पगला गए हैं…

उन्हें बकौल शायर हबीब जालिब*

याद दिलाना लाजमी है कि-

“तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था”

समझाना नामुमकिन है, उनको

क्या फर्क पड़ता है?

 

उम्मीद की लौ  

बुझी नहीं है…

अथर्ववेद** में ऐसे ही नहीं कहा गया है.

वसुधैव कुटुम्बकम

पूरी दुनिया एक परिवार है

इसलिए

मेरे अल्फाज

सरहदों के बगैर अल्फाज हैं

जो जहाँ कहीं तक पहुंचे

इंसानियत का पैग़ाम लेकर पहुंचे  

अमन का पैग़ाम लेकर पहुंचे

अब ये मत कहना कि- इससे

क्या फर्क पड़ता है?

फर्क तो पड़ता है,

अमन और इंसानियत के पैगाम से…

फर्क तो पड़ता है…

फर्क तो जरुर पड़ता है ! 

* पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब

** अथर्ववेद हिन्दू धर्म के चार वेदों (ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद ) में से चौथा वेद है.

©  हेमन्त बावनकर

पुणे (महाराष्ट्र)  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “तिनके…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६१ ☆

☆ # “तिनके…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

तिनके अब पैरों के तले

रौंदे नहीं जाएंगे

अगर जोर जबरदस्ती की

तो पैर जख्मी हो जाएंगे

 

तिनकों का जख्म

आसानी से नहीं भरता है

जख्म नासूर बन जाए

तो कभी-कभी इंसान

दर्द से मरता है

 

बड़े-बड़े आंधी और तूफान

बरगद को उखाड़ देते हैं

लेकिन वह भी

तुच्छ समझे जाने वाले

तिनके के आगे

सर झुका देते

 

तिनके की जड़ें

अंदर तक जाती है

ना वह मरती है

ना कुंभलाती है

इसकी गहराई किसी को

समझ नहीं आती है

 

तिनके दुर्बल सही

पर कमजोर नहीं है

किसी और का

उन पर जोर नहीं है

जंगल ही उनका अपना घर है

कहीं और ठौर नहीं है

 

तिनके को प्रकृति की पनाह

में रहने दो

उन्मुक्त  हवा ओं के साथ बहने दो

परिंदों की बोली कहने दो

निसर्ग  की धूप-छांव

सहने दो

 

क्यों की,

जब तिनके प्रचंड गर्मी में

झुलसते है

अंदर ही अंदर

सुलगते है

जंगल की भीषण आग बनते हैं

दावानल में ढलते है

तो वन के वन

जलकर राख हो जाते है

अहंकार में डूबे हुए

सब ख़ाक हो जाते है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१०४ – युद्ध और धुआं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता युद्ध और धुआं।)

☆ अभिव्यक्ति # १०४ ☆  

☆ युद्ध और धुआं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

क्यों की हमने, प्रकृति से होड़,

क्यों लगाई हमने, प्रगति से दौड़,

क्या मिला हमें, आ गए हम कहां,

क्या मिला हमें, बस धुआं ही धुआं,

युद्ध में, कौन, जीता है आज तक,

जो भी लड़ा है, हारा ही है, आज तक,

अपनो को खो कर, कौन खुश हुआ,

जो भी जीता, वही  हारा ही तो है,

शांति, कभी युद्ध का प्रति फल नहीं,

विध्वंस ही तो युद्ध का परिणाम है,

चारों तरफ बस गुबार ही गुबार,

शांति है कहां, बस धुआं ही धुआं,

ईर्ष्या, क्रोध, अहंकार, का, द्योतक है, युद्ध,

विनाशकारी, प्रलयंकारी होता, है युद्ध,

युद्ध में, युद्ध से कौन जीत सका है

सबका अहितकारी, ही तो  है युद्ध,

क्या मिला, कब किसे, क्या कहां,

बस धुआं ही धुआं, बस धुआं ही धुआं.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – शृंगार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – शृंगार ? ?

वह करती है शृंगार

परतें ढाँपे रखती हैं

काया और मन की

असंगति-विसंगति,

शृंगार स्त्रीत्व का

सच्चा पहरेदार है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ४९ – कविता – राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ४९ ☆

☆ कविता ☆ ~ राम : मानवीय आदर्श के मानदंड ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

सीता  का  संताप  बड़ा  था,  बीता  जीवन  संघर्षो  में ।

राघव  का  दुःख  भी कम न था,  आया सुख के वर्षो में।।

*

पर अग्नि में तप कर कैसे से, सोना निज चमक दिखाता है।

सीता  का  तप  तपकर मानो, राघव को विजय दिलाता है।।

*

सीता  शब्द  राम  दोनों  मिल,  महामन्त्र  बन   जाते  है।

ध्वजा शिखर की आज  कह  रही,  राम अवध में  आतें  हैं।।

*

सीताराम  शब्द  दोनों  मिल  मानवता  का  मान  बढ़ते हैं।

जीवन   जीने   के   कौशल   को  कौशलेंद्र  बतलाते  हैं।।

*

कैसे   रिश्ते   जिए   जाते   किससे   कैसा   नाता  हो।

वह  भी  जीवन  जी  सकता है, जिसको कुछ न आता हो ।।

*

आदर्शो  को   मानदंड   पर   कैसे    नापा   जाता   है।

राम  तुला  हैं  मानवता  के,  रिश्तों  को तौला  जाता  है।।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २८ – कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “परिन्दे“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २८ ?

? कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

ऋतु विशेष में दूर देश से, ख़ास परिंदे आते हैं

बच्चे यूँ त्यौहारों में, मेहमान सरीखे आते हैं

 =2=

हेलमेल के मिसरी जैसे, जाने कहाँ गये वो दिन

अब रिश्तों की नीरसता ज्यों, फल भी फीके आते हैं

=3=

पीढ़ी नई, मृदंग नगड़िया रसिया फगुआ क्या जाने

इनको तो बस डी.जे.वाले, तौर-तरीक़े आते हैं

=4=

हँसी-ठिठोली न पहले-सी, हुई दिल्लगी भी ग़ायब

रंग लगाने के वो दिलकश, किसे सलीक़े आते हैं

=5=

देख दूसरों को संकट में, जश्न मनाती है दुनिया

लम्हे आगे-पीछे अच्छे-बुरे सभी के आते हैं

=6=

हमसे मिलने उमड़-घुमड़कर, देखो काले बादल भी

प्यार जताने समय-समय पर, पास ज़मीं के आते हैं

=7=

हमको भी ताउम्र फर्ज़ की, रीत निभानी होती है

तब जीवन के हिस्से में कुछ, ख़ास वज़ीफ़े आते हैं

=8=

इम्तिहान से सीख सबक़, अंज़ाम की कर न फ़िक्र ज़रा

पल जीवन में खट्टे-मीठे, कड़वे-तीखे आते हैं

=9=

‘ठाकुर’ ठसक दिखाने से यूँ, काम नहीं चलने वाला

कथनी-करनी के दम, ख़ुशियों के दिन नीके आते हैं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆ मुक्तक – ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # २०१ ☆

☆ मुक्तक ।। समाज राष्ट्र का सजग सतर्क प्रहरी पत्रकार ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

कभी बोल मीठे तो कभी चीत्कार लिखता है।

कभी विपक्ष  तो  कभी सरकार लिखता है।।

यह कलम  का  सिपाही रुकता नहीं  कभी।

सही बात हो   तो  वह बार – बार लिखता है।।

=2=

कभी आर -पार तो कभी कारोबार लिखता है।

कभी विसंगति और कभी  प्रचार लिखता है।।

समाज राष्ट्र के  हर एक बिंदु को छूती कलम।

हर विषय को  छूता  वह सरोकार लिखता है।।

=3=

कभी ओज तो कभी  रस श्रृंगार   लिखता है।

कभी खिजा तो कभी खूब बहार   लिखता है।।

खुशी गम के   हर   एक पहलू को छूता वह।

कभी जीत तो कभी  कोई हार  लिखता   है।।

=4=

कभी व्यंग तो कभी बन के हास्यकार लिखता है।

कभी शांति  तो कभी वह अंगार  लिखता  है।।

छू जाती है कलम उसकी दिल  को    कभी।

जब भावनाओं का  पूरा ही संसार लिखता है।।

=5=

सब पढ़ते हैं   कि  बहुत जोरदार  लिखता है।

कभी दब के या  बन कर असरदार लिखता है।।

हर हालात को   लिखता वह खूब समझ कर।

सब कोई   और नहीं बस पत्रकार लिखता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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