हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एक मुट्ठी आसमाँ ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ एक मुट्ठी आसमाँ ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

करो जागरण अंतर्मन का,मन संकल्प सजाओ।

करना है जो कर ही डालो,रोग दूर कर जाओ।।

बंधु ज़रा ! निज मन की बात मानकर तो देखो।

एक मुट्ठी आसमाँ ज़रा हासिल कर तो देखो।।

  *

साहस का भाव निभाकर,संयम ह्दय जगाओ।

करना है जो,कर ही डालो,मंज़िल को पा जाओ।।

ख़ुद की कमियों को ज़रा ईमानदारी से लेखो।

ज़रा,एक मुट्ठी आसमाँ  हासिल कर तो देखो।।

 *

जीवटता से तो मार्ग स्वास्थ्य का मिल जाता है।

सब कुछ होना,इक दिन हम में बल लाता है।।

करना है जो,कर ही डालो,मंज़िल को पा जाओ।। 

ज़रा,एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।।

 *

रीति-नीति के पथ पर चल,मंगल को तो पाओ।

अंधकार को परे हटाओ,हथेली पर नूर उगाओ।।

इंसानी जज़्बातों को संग ले जीवन को लेखो।

ज़रा,एक मुट्ठी आसमाँ हासिल कर तो देखो।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७४ – ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७४ ☆

☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जल प्रवाह में नर्तित रवि-किरणों में झलक तुम्हारी है।

चंद्र-रश्मियों में बिंबित छवि हमने हुलस निहारी है।।

.

अवधविहारी सदा अवध तज वन सीता के साथ गया।

पंचवटी की कुटिया में महकी जीवन फुलवारी है।

.

जहाँ बाँसुरी बजी, राधिका की पैंजनिया थिरक उठी।

जहाँ रँभाई गाय वहीं हँस रमता विपिन विहारी है।।

.

नित्य नवल नर्मदा धार की लहर-लहर चक्रित पल-पल।

श्याम-श्वेत चट्टानों ने की चुप रह भागीदारी है।।

.

बीज अंकुरित हुआ पल्लवित पुष्पित फल कर झरता है।

जर्जर तरु हर शाख अपर्णा, जाने की तैयारी है।।

.

कौन कहीं का सगा यहाँ है?, किस बिन किसका काम रुका?

चार दिनों का सफर, लदी क्यों सिर पर गठरी भारी है?

.

सलिलनगद सौदा करता जो, साहूकार सुखी रहता।

दुखी वहीं जिसने फैलाई जहँ-तहँ बहुत उधारी है।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१६.३.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “कायनात के कायदे” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

चाहे समंदर में कितने ही दूर चले जाओ,

साहिल पर लौटना ही पड़ता है ।

परिंदे भी कितनी ऊंची परवाज़ कर ले,

ज़मीन नशेमन पर वापस बुलाती है,

सृष्टि का शाश्वत नियम जो है।

 

कुदरत के निज़ाम की ख़िलाफ़त से,

हासिल का नतीजा ” सिफ़र ” होता है।

 

ज़मीन हक़ीक़तें ज़िंदगी जीना सिखाती हैं ,

और अंत में ज़मीन ही समूचे वजूद को ,

आगोश में ले लेती हैं।

 

आस्मां ऊंचा बहुत है

तब तक, जब तक, पांव, ज़मीन  न छोड़ें

और छूटे तो या बुलंदी मिलती है,

या बहुत कुछ खो जाता है, और..

कुछ भी मयस्सर नहीं होता…!!!!!

*

(कायनात=सृष्टि। कायदे= नियम। साहिल= किनारा/तट, नशेमन = घोंसला, घर, आश्रय। सिफ़र= शून्य। वजूद = अस्तित्व। परवाज़=उड़ान। निज़ाम=व्यवस्था।  ख़िलाफ़त=विरोध ।)

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म ?” ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

श्री मनजीत सिंह

(प्रख्यात कवि, नाटककर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता श्री मंजीत सिंह जी, ख़ान मंजीत भावड़िया “मजीद”’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। वर्तमान में वे पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला से भाषा विज्ञान में पी एच डी कर रहे हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं और उर्दू भाषा के संरक्षण व प्रचार प्रसार के प्रति समर्पित हैं। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में “हरियाणवी झलक” (काव्य संग्रह) और “बिराणमाट्टी” (नाटक), रम्ज़ ए उर्दू, हकीकत, सच चुभै सै शामिल हैं, जो हरियाणा की संस्कृति और सामाजिक जीवन की झलक प्रस्तुत करती हैं। उनके साहित्यिक कार्यों को हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा उर्दू अकादमी, वैदिक प्रकाशन और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित किया गया है। साहित्य और शिक्षा के साथ-साथ, ख़ान मनजीत अपने पारिवारिक परंपरा से जुड़े हुए एक कुशल कुम्हार (पॉटर) भी हैं।)

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता “क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म ?पर चर्चा।

☆ कविता  ☆ क्या तुम जानते हो मेरा जुर्म ? ☆ श्री मनजीत सिंह ☆

जानते हो

मेरा जुर्म क्या था…?

 

मेरी खामोशियों में,

मेरी मुस्कुराहटों में, मेरी तन्हाइयों में,

मेरी जागी हुई रातों में,

मेरी अधूरी बातों में

वह हर बार तुम्हें ढूँढ़ लिया करता था…

 

मेरी हर दुआ में तुम्हारा नाम था,

मेरी हर खामोश नज़र में तुम्हारी ही तस्वीर बसती थी।

मैं भीड़ में खड़ा होकर भी

तुम्हारी यादों के साथ अकेला हो जाया करता था…

 

तुम्हारी मोहब्बत ने

मुझे गुनहगार बना दिया था…

 

गुनाह बस इतना था

कि मैंने तुम्हें दिल से चाहा,

तुम्हें अपनी दुनिया समझ लिया,

और तुम्हारी यादों को

अपनी साँसों में बसा लिया…

 

पर अब सोचता हूँ

पुरानी बातों को कुरेदने से

क्या हासिल होगा…?

 

राख को जितना भी कुरेदो,

हाथ बस काले ही होते हैं,

और दब चुकी चिंगारियाँ

फिर से हवा पाकर जलने लगती हैं…

 

इसलिए अब उन राख बने लम्हों को

वैसे ही पड़ा रहने देना बेहतर है।

 

जो कभी आग था,

जो कभी धड़कनों की आवाज़ था,

जो कभी मेरी दुनिया हुआ करता था—

वह अब सिर्फ एक कहानी बन चुका है…

 

एक ऐसी कहानी

जिसे अब दोबारा जीना नहीं,

बस चुपचाप यादों की किताब में

बंद करके रख देना है…

 

अब उसे सांसों में नहीं,

खामोशी में रहने दो।

अब उसे पुकारना नहीं,

बस दूर से महसूस होने दो…

 

क्योंकि कुछ रिश्ते

नफ़रत से नहीं टूटते,

वे बस वक्त की थकान से

खामोशी में बदल जाते हैं…

 

और सच कहूँ

तो कभी-कभी छोड़ देना ही

सबसे सच्ची, सबसे गहरी

और सबसे मुश्किल मोहब्बत होती है… 

© श्री मनजीत सिंह

सहायक प्राध्यापक (उर्दू), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र 

manjeetbhawaria@gmail.com 

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मुझे मालूम ही ना था… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

? कविता ?

☆ मुझे मालूम ही ना था… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

तमाशा देखकर मैं तो तमाशा कर नहीं सकता

नशे का हैं वहाँ आलम बना मंदिर नहीं सकता

 *

दिलो में फ़ासले कितने वहाँ काफ़ी दरारे हैं

अकेला सिर्फ़ में सारी दरारें भर नही सकता

 *

भरे बाज़ार में मेरी तुने इज्जत उछा ली हैं

छुरा ये जानता है की कटा में सर नही सकता

 *

ख़ुदा को मानता हूँ मैं मुझे उस पे भरोसा हैं

कहीं भी वार कर पगले यहाँ मैं मर नहीं सकता

 *

मुझे ओ धर्म बतला ओ जहाँ बिकती नहीं औरत

नई तकदीर लिखने को क़लम अब डर नहीं सकता

 *

तडप हैं सिर्फ़ पानी की कुआँ भी हैं यहाँ प्यासा

गले के जाम ए साक़ी उतर अंदर नहीं सकता

 *

मुझे मालूम ही ना था कसम का दायरा क्या हैं

कसम से जान देने को अभी मूकर नहीं सकता

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हुक्मरान पगला गए हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – हुक्मरान पगला गए हैं…!

☆ ॥ कविता॥ हुक्मरान पगला गए हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

खतरे का बिगुल बज चुका है

दुनिया तबाही के मुहाने पर खड़ी है

दोनों तरफ के ख़ेमे मुक़ाबिल

साँड़ों की तरह सिंग उठाए बिफरे हुए हैं।

*

बस! बटन दबने भर की देरी है

आसमान से आग के गोले बरसेंगे

देखते ही देखते पल भर में

धरती निर्दोषों की लाशों से पट जाएगी।

*

ज़िंदगी रक्त में नहा रही होगी

हरे-भरे बाग-बगीचे, खेत-खलिहान               

चनों की तरह भट्टी में जल-भून रहे होंगे।

*

आज तक के अर्जित ज्ञान की

बुलंद हिमालय-सी नसीहतें

विज्ञान द्वारा मुहैया कराए गए

सारे सुख-सुविधाएँ दफ्न हो जाएँगी।

*

लगता, हुक्मरान पगला गए हैं

खुद के द्वारा निर्मित चक्रव्यूह में

बुरी तरह से घिर चुके हैं

दुनिया में क़यामत बरपाकर दम लेंगे।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – मनोरोग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – मनोरोग ? ?

वह मिला था,

वह मिली थी..,

वह आया था,

वह आई थी..,

वह हँसा था,

वह हँसी थी..,

वह सोया था,

वह सोई थी..,

कर्ता का लिंग बदलने से

नहीं बदलता क्रिया का अर्थ,

व्याकरण तटस्थ होता है..,

कर्ता का लिंग बदलते ही

कर देता है सारे अर्थ वीभत्स,

आदमी मनोरोग से ग्रस्त होता है..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 2 अप्रैल से  एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी। 🕉️

💥 इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २६ – कविता – धर्म-कर्म… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “धर्म-कर्म“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २६ ?

? कविता – धर्म-कर्म… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

अब न कैन्सिल हो पायेगी

रिटर्न टिकट कन्फर्म है प्यारे

यात्रा का आनन्द उठा लो,

लाइफ का ये मर्म है प्यारे

=2=

दौड़-धूप ऋण गुणा-भाग में

सपने जोड़ – घटाना है

उठा-पटक अप-डाउन तब भी

फ़र्ज़ तेरा सत्कर्म है प्यारे

=3=

इक दिन मिट्टी हो जाना,जीवन का यही तराना है

कभी हवा का शीतल झोंका,कभी जेठ-सा गर्म है प्यारे

=4=

लेखा-जोखा ले सबको,भवसागर पार उतरना है

परहित की पतवार से नैया,खेने में क्या शर्म है प्यारे

=5=

है ज़मीर मूलधन तेरा और क़िरदार तेरी पूँजी

‘राजेश’ मानवता से बढ़कर,नहीं कोई भी धर्म है प्यारे

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९९ ☆ गीत – ।। संकटमोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९९ ☆

☆ गीत ।। संकटमोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

संकटमोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है

संकट मोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है।

प्रभु श्री राम जी के सेवक का नाम हर कारज करता है।।

**

आज हनुमान जयंती पर सब कर रहे हैं पूजा – अर्चन।

सुंदर कांड हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा जन-जन।।

हर मंगल शनिवार को उनका प्रसाद हर झोली भरता है।

संकट मोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है।।

**

अतुल बलशाली हनुमान जी ने लंका में आग लगाई।

कोई भी उन जैसा राम भक्त नहीं हो सकता है भाई।।

अंजनीपुत्र मारुतिनंदन संजीवनीबूटी पर्वत ला धरता है।

संकट मोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६२ ☆ कविता – गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६२

☆ गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

सादी संस्कृति गाँव की एक सरल संसार

बिना दिखावे के जहाँ दिखता हर परिवार ।

लोगों में सच्चाई है आपस में है प्यार

परम्पराओं से पगा संबंध हर व्यवहार।

*

छोटी अटपट बात में हो चाहे तकरार

पर घर का हर व्यक्ति हर घर का रिश्तेदार ।

सबको है सबकी फिकर सब हैं एक समान

परख-पूँछ है, नेह है, भले न हो पहचान।

 *

बड़े सबेरे जागते, सोते होते रात

शाम समय चौपाल में मिलते करते बात ।

 *

हर एक के है झोपड़ी, आँगन, बाड़ी, खेत

जिनमें कटती जिंदगी, पशु-हल – फसल समेत ।

 *

शहर गाँव से भिन्न हैं. रीति-नीति विपरीत

यहाँ कोई अपना नहीं, नहीं किसी से प्रीति ।

 *

शहरों में फुरसत किसे ? हरेक हर समय व्यस्त

घर के द्वारे बन्द नित, सब अपने में मस्त ।

 *

लोगों की आजीविका सर्विस या व्यापार

पड़ोसियों की खबर हित पढ़ते हैं अखबार ।

 *

बिन आँगन के घर बने, चढ़े एक पै एक

मंजिल छूते गगन को पातें खड़ी अनेक ।

 *

भीड़-भाड़ भारी सदा बड़े बड़े बाजार

आने जाने के लिये, हों गाड़ी या कार ।

 *

औपचारिक व्यवहार सब शब्दों का संसार

मन में धन की चाह है केवल धन से प्यार ।

 *

गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव

चमक दमक तो बहुत है, शांति न सुख की छाँव ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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