हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

घुग़री से गरारू घाट 11 नवम्बर  2019

घुग़री से आगे बढ़ने के पहले लोगों से आगे के रास्ते के बारे में जानकारी लेने नीचे घाट पर उतरे तो पता चला कि नर्मदा किनारे का रास्ता ख़राब है। बहुत ऊबड़-खाबड़ या कीचड़ मिलेगी इसलिए नहर के किनारे चलने लगे। सुबह जब चलना शुरू करते हैं तब स्फूर्ति से लंबा रास्ता तय करने का प्रयास रहता है लेकिन एकाध किलोमीटर चलने पर माँस पेशियाँ तैयार होतीं हैं परंतु साँस को आराम देने के लिए थोड़ा आराम ज़रूरी रहता है। कोई दो किलोमीटर दूर एक गौड़ परिवार का खुला घर दिखा, नर्मदे हर उद्घोष के बाद रुके। उनका नाम मुन्ना ठाकुर राजगौड़ था, उनके तीन मुस्कुराते निश्छल चेहरे वाले बच्चों से बच्चा बनकर बतियाया, एक बच्चे ने सीताफल खाने को दिया और भैंस का ताजा दूध बासी रोटी के साथ पिया। उसकी बीबी चतुर थी उसने वहाँ 30 रुपए लीटर मिलने वाला दूध का भाव हमसे 40 रुपए लीटर तय करके ठग लिया। हमें कबीर की उलटवासी याद आ गई।

 कबीरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय

आप ठगाए सुख ऊपजे, और ठगे दुःख होय।

वैसे हम भी ठगाए नहीं थे क्योंकि शहरों में 50 रुपए मिलने वाले नक़ली दूध की जगह सामने भैंस से दुहता असली दूध 40 रुपए लिया था। अरुण भाई ने ख़ुश होकर उसे 100 रुपए दिए। इस मामले में अरुण भाई काइयाँ गुज़ारती  न होकर ठेठ बुंदेलखंडी हैं, दिल ख़ुश-तिजोरी फुक्क। मुन्ना ठाकुर राजगौड़ की पत्नी तीन बच्चों की माँ होने के बाद भी स्वाभाविक सुंदर, फ़ुर्तीली व चपल थी, वह मेहनतकश नारी देह की मालकिन थी। उसने शायद ही कभी ब्यूटी पार्लर का मुँह देखा हो जहाँ शहरी औरतें शरीर में क़ैद माँस पिंडों को क्रीम से थ्रेडिंग करवा कर सौंदर्य का आभास ख़रीदती रहती हैं। उनके भोजन में शाकाहार और मांसाहार दोनों हैं। उन्हें बटेर, खरगोश और मछली भोजन हेतु आसानी से मिल जाते हैं। उन्होंने खुलकर हमसे बातें कीं। असल में इंसान प्यार और बातचीत का भूखा होता है, लोगबाग अहंकारी चित्त होने के कारण खुलना नहीं चाहते।

रहीमन पैडा प्रेम को निपट सिलसिली गैल

बिलछत पैर पीपिलि को लोग लदावत बैल।

प्रेम व्यवहार की गली अत्यंत चिकनी फिसलन भरी है, लोग उस पर भी कंधों पर अहंकारी बैल को लादकर चलना चाहते हैं, यह कैसे सम्भव है।

हमारे एक साथी की बवासीर भड़क गई बहुत सारा ख़ून बह जाने से कमज़ोरी स्वाभाविक थी, अविनाश भाई ने उन्हे ग्लूकोज़ का घोल पिलाया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने यात्रा करना जारी रखा। रास्ते में एक स्थान पर चढ़ाई करते हुए उन्हें चक्कर आ गया। पुनः खजूर और गुड खिलाया, वे दस मिनट में दुरुस्त होकर चलने लगे। उन्हें समझाया कि ज़्यादा तेज़ चलना ठीक नहीं है। उन्होंने सामान्य गति से चलते हुए नियत यात्रा पूरी की लेकिन आख़िरी दिन सतधारा में नहाते हुए मुँह के बल गिरे, उनकी नाक पर गहरी चोट आई। उन्हें तैरना नहीं आता था। ग़नीमत है कि वे नर्मदा की गहराई में नहीं गिरे वरना बड़ा हादसा हो सकता था। 

नरसिंहपुर जिले का पूरा इलाक़ा लोधियों से आबाद है। लोधी एक बहुत मेहनतकश और जूझारू क़ौम है। खेतों में बेतहाशा मेहनत करते दिखते हैं। चारों तरफ़ गन्ने की दस-बारह फ़ुट ऊँची और पीले फूल से सजी तुअर दाल की फ़सल लहरा रही थी। एक खेत में एक लोधी किसान उसकी पत्नी और दो पुत्र सहित आलू की बौनी कर रहे थे। उन्होंने बताया छोटे अंकुरित आलुओं की ख़रीद नरसिंघपुर से करके लाए हैं। चार भैंसों का गोबर इकट्ठा करके खाद बनाकर क्यारियों में पहले खाद बिछाते हैं फिर अंकुरित आलू रखकर मिट्टी से पूर देते हैं। एक आलू से दस-बारह आलू उपजते हैं। आलुओं की बातों में हमने धीरे से बात ऊठाई कि यार आलू चिप्स के साथ चाय मिल जाती तो मज़ा आ जाता। कहने भर की देर थी, किसान की पत्नी चाय बना लाई। किसान ने बताया कि किसानी से घर का ख़र्च मुश्किल से निकलता है। किसान की क़िस्मत छलनी में दूध छानने जैसी है। अच्छी फ़सल आए तो दाम गिर जाते हैं और फ़सल ख़राब हो जाए तो लागत नहीं निकलती है। आदर्शवादियों ने “किसान को अन्नदाता बताकर” उसकी आशान्वित समृद्ध सम्भावनाओं को निरस्त कर दिया। व्यापारियों और कारोबारियों के हाथों किसान दोहरे शोषण के शिकार हैं, वे एक तरफ़ खाद, बीज, कीटनाशक और उपकरणों की क़ीमत बढ़ाकर भारी मुनाफ़ा कमाते हैं वहीं दूसरी तरफ़ किसान के उत्पाद अनाज मंडी, फल मंडी,  सब्ज़ी मंडी में औने-पौने में ख़रीद कर तिजोरी भरते हैं। इस शोषण तंत्र को किसान-नेता और कारोबारियों का नेतृत्व राजनैतिक दबंगई  से किसान हितैषी बनकर बड़ी कुशलता पूर्वक चलाते हैं, वे किसानों की ऋण माफ़ी का आंदोलन करके उन पर अहसान का बोझ डालकर वोट-बैंक पक्का कर सत्ता के भागीदार हो शोषण तंत्र अनवरत चलाते रहने में सफल हैं। किसान अब सिर्फ़ किसान नहीं बना रहना चाहता वह यूरोप और अमेरिकी किसानों की तर्ज़ पर यथार्थवादी कारोबारी बनना चाहता है, लेकिन कारोबारी शोषण तंत्र का शिकंजा उसे साँस नहीं लेने देता उसका दम घुटते रहता है किसानों की मानसिक प्रताड़ना की भयावहता आए दिन उनकी आत्महत्या  की घटनाओं से समझी जा सकती है। स्वार्थी और कलुषित मनुष्यों का षड़यंत्रकारी तंत्र देखिए किसान को अन्नदाता कहकर भिखारी और क़र्ज़ न चुकाने वाला बेईमान बना दिया और महिलाओं को देवी बताकर उनकी इज़्ज़त लूट साक्ष्य मिटाने हेतु जलाने लगे। 

गरारू घाट के एक आश्रम में पहुँचने पर एक अद्भुत स्वामी जी के दर्शन हुए। वे बंगाली स्वामी पहुँचते से ही बोले यहाँ जगह नहीं है, आप लोग चाय पीजिए और आगे मंदिर पर रुकने का इंतज़ाम कीजिए। हमने कहा “स्वामी जी यहाँ रुकते तो आपसे वेदांत ज्ञान लेते।” उन्होंने डाँटते हुए कहा वेदांत जानने के लिए एक-दो साल भी कम है फिर तुरंत पैंतरा बदल कर बोले “ब्रह्म क्या है, हम, तुम सबमे यहाँ तक कण-कण में ब्रह्म है, आपको जानकारी मिल गई न, अब आप स्वयं पढ़ो और जानो, आप आगे जाओ।” हमने कहा “स्वामी जी ज्ञान हेतु गुरु का माध्यम ज़रूरी है।” वे फुफकारते हुए बोले बाबा “लो चाय पीओ आगे बढ़ो।” बाद में अगले दिन उनके एक सेवक ने बताया कि बंगाली बाबा अपने व्यवहार के लिए दुखी हो रहे थे।

तक़रीबन एक किलोमीटर पहाड़ी चढ़कर ऊपर पहुँचे वहाँ एक कथा वाचक का पंडाल लगा था उनके सेवक नरेश लोधी ने स्वागत किया और खुले में टेंट में सोने की जगह दे दी। रात में एक भद्र महिला द्वारा भेजे दूध में अविनाश भाई का पोहा शक्कर मिलाकर खाकर सोने की कोशिश की तब नर्मदा के बहाव की ध्वनि सुनाई दी, पूरे खिले चाँद की चटक चाँदनी में दूर से आती कलकल मद्धिम ध्वनि लोरी सी लग रही थी। सोने के पूर्व प्रयास भाई ने कविताएँ सुनाईं। दो-चार जुगलबंदी हमने भी बांचीं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

साँकल  से घुग़री 10 नवम्बर 2019

जबलपुर जिले की सीमा तक सतपुड़ा नर्मदा का बायाँ हाथ पकड़े हुए चलता है धरतीकछार गाँव के नज़दीक सनेर नदी संगम पर सतपुड़ा नर्मदा का हाथ छोड़कर आज़ाद कर देता है। झाँसीघाट से साँकल घाट तक नर्मदा स्वतंत्र प्रवाहित होती है फिर दमोह जिले से विन्ध्याचल आकर नर्मदा का दाहिना हाथ हीरापुर रेंज के रूप में बढ़कर थाम लेता है। यदि विन्ध्याचल महाशय रास्ते में न आते तो नर्मदा रायसेन जिले से होती हुई भोपाल जिले निकल जाती या बेतवा से  मिलकर यमुना से भेंट करके गंगा से गले मिल गंगासागर में एकाकार हो जाती। साँकल से अविनाश बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अपना केमरा सभी के लिए भोजन, दवाई और विभिन्न खाद्य वस्तुएँ और हमारा चार्जर, चड्डी और बानियान लेकर जुड़ गए। 

अब हम लोग बरगी बाँध से आती नहर के किनारे-किनारे चलते हुए गुड़वारा पहुँचे। गाँव का नाम गुड़वारा बिलकुल सही है क्योंकि वहीं से करेली तहसील शुरू होती है चारों तरफ़ गन्ने के खेतों का सिलसिला पूरे इलाक़े में नज़र आता है। गुड़वारा के पहले एक किसान कैलाश दांगी किसानी का काम करते मिले उन्होंने हमें चाय पीने का निवेदन किया हम लोगों ने तत्काल उनके निवेदन को स्वीकार कर लिया उनके निवास स्थान पर उनके साथ चाय पीने के लिए चल दिए। उनका लड़का आईपीएस परीक्षा की तैयारी इंदौर में रहकर कर रहा है, वह गांव आया था उसके साथ उनका एक दोस्त भी आया हुआ था तीन-चार दिन पहले उनका दोस्त नर्मदा में स्नान के लिए उनके साथ गया और वह गहरे पानी में डूबने से उसकी मृत्यु हो गई इसलिए इस परिवार के सभी लोग दुःखी थे। उनके घर पहुँचकर चाय ग्रहण की, बरंडा में एक बड़ी गागर में इलेक्ट्रिक मथनी से मक्खन निकाला जा रहा था उसमें से निकला मही दो लीटर की बोतल में भरवा कर चल पड़े। जो दोपहर की बाटी-दाल के बाद गटक लिया। गुड़वारा से उतरकर नीचे नर्मदा घाट पर पहुँच स्नान करके साँकल से जुड़े नए साथी अविनाश दवे के द्वारा लाईं मैथीपूड़ी आँवला आचार के साथ खाईं और चल पड़े अगली मंज़िल की ओर, रास्ते में बुधघाट में एक किलोमीटर ऊँची पहाड़ी चढ़कर एक आश्रम पहुँचे वहाँ पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। एक सेवक ने पानी पिलाया। थोड़ी देर में साधु लिबास में शैतान नज़र आया, उसने आते ही घुड़कियाँ देनी शुरू कीं, और साफ़तौर से कह दिया कि न आप यहाँ नहा सकते हैं और ना भोजन परसादी की कोई व्यवस्था है। हम लोग नीचे उतर कर अगले पड़ाव की खोज में चल दिए। शाम को पाँच बजे घुग़री पहुँचे। जिस घाट रुकने की सोचते हैं वहीं घाट पर दो-तीन कुत्ते स्वागत करते हैं, फिर वे आपके साथ आश्रम तक आकर वहीं अड्डा जमा लेते हैं मानो हम उनके पाहूँने हों। दूसरे दिन सुबह थोड़ी दूर विदाई देने साथ आते हैं। साधु लिबास में शैतान से कुत्ते समझदार हैं, बेचारे स्वागत-विदाई में पूँछ हिलाते हैं।

घुग़री में एक परकम्मा कर चुके बम-बम बाबा के नाम से आश्रम चलाते हैं। वे गाँव से दान लेकर भोजन का सामान देते हैं। उन्हें मेहनताना पर भोजन बनाने की बात कही तो वे आटा-दाल एक गौंड़ के घर दे आए। आठ बजे भोजन बनकर आया तब ग्रहण किया। आश्रम के सामने चार विशाल बट वृक्ष आश्रम को एक छतरी की तरह ढँके हुए है, वृक्षों के पत्तों से छनकर आती चाँदनी की रोशनी एक अजीब सी रूमानियत पैदा कर रही थी, लिहाज़ा परकम्मा वासियों का प्रेमिल हृदय गीत-ग़ज़ल की लहरियों में गोते खाने लगे।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में भारत के गाँवों का जीवन तेज़ी से बदला है। खेतों को बैलों से बखरने  और बैलगाड़ी की जगह ट्रैक्टर और लोडिंग वाहन ने ली है, हरेक किसान के घर एक-दो मोटर साइकिल और समृद्ध किसानों के पास जीप-कार आ गईं हैं। पुरुषों के पहनावे से धोती-क़मीज़ या कुर्ता ग़ायब हो चुके हैं। उनकी जगह जींस टी-शर्ट स्पोर्ट बानियाँन ले चुके हैं। लड़कियाँ जींस टाप पर आ गईं हैं। लड़के-लड़कियाँ आपस में खुले हैं, अब वे आपस में बातचीत करने लगे हैं। सरकारी स्कूल में सह-शिक्षा और मध्याह्न भोजन से खुलापन आया है लेकिन विकृति नहीं आई है इसका कारण घरों का सांस्कृतिक वातावरण और धार्मिक आस्था में पिरोए नैतिक मूल्य है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४१ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

ब्रह्मकुण्ड से साँकल 09 नवम्बर 2019

पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के पहले देवताओं ने ब्रह्मकुंड पर तपस्या की थी दैवीय  शक्तियों से दुर्गा देवी का प्रकट आविर्भाव हुआ था। दस किलोमीटर आगे भैंसा नामक गाँव है उसी के पास मुआर घाट पर देवी-भैंसासुर संग्राम हुआ था जहाँ देवी ने भैंसासुर का वध में किया था। ब्रह्मकुण्ड में देवासुर संग्राम के दौरान ब्रह्मा का वास रहा था।

ब्रह्मकुण्ड से चले एक घंटा हुआ था कि विंध्य पर्वत की भांडेर पर्वत श्रेणी के कगार से उत्तरी तट पर हीरापुर के नज़दीक हिरन नदी खरखराती आकर नर्मदा में समा गई। हिरन नदी जबलपुर जिले के कुंडम के निकट से निकलती है, दमोह जिले के तेंदुखेड़ा और सागर जिले के नौरादेही से कई नाले और बेलकुंड, सोहर और कैंर को समेटते परिअत नदी उसमें आ मिलती है। हिरन नदी जबलपुर जिले और नरसिंहपुर जिले की सीमा निर्धारित करती है।

सुबह आठ बजे साँकल के लिए रवाना हुए एक दिन पहले की थकाऊ यात्रा के बाद थोड़ा आराम से चलने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे चलना शुरू किया पहले बरगी से आती नहर के किनारे चलने लगे लेकिन एक राहगीर के सुझाव पर नर्मदा के तट पर उतर गए। रास्ता ऊबड़-खाबड़ और कीचड़ सने खेतों से था, सामने से चमकते सूर्य की बढ़ती गर्मी मुश्किल बढ़ा रहीं थीं, शरीर पसीने से तरबतर माँसपेशियाँ लस्तपस्त हो चुकीं थीं, ऐसे में साँकल सराय जाने के लिए एक किलोमीटर की तंग पहाड़ी सामने आ गई। पाँच मिनट हाँफती साँस को थामा फिर चढ़ने लगे और आधा घंटे की चढ़ाई के बाद एक मकान पर धर्मशाला लिखा दिखा वहाँ पहुँचे तो पता चला कि रामप्रसाद साहू ने परकम्मा वासियों के लिए धर्मशाला बनाई है। एक कमरा खोला उसमें आमने सामने दो दरवाज़े थे और चारों कोनों में गेहूँ के बोरों की छल्ली लगी थी। अस्सी वर्षीय रामप्रसाद साहू से मुलाक़ात हुई उनके पोते-पोतियाँ आ गए। उन्होंने स्वागत करके भोजन इत्यादि के लिए आश्वस्त करके पोती को बुलाकर उनकी माँ को भोजन की व्यवस्था करने को कहा। थोड़ी देर बाद जनानख़ाना से ख़बर आई कि “मम्मी कल ग्यारस उपासी थीं, आज शनीचर उपासी हैं उनने कही है कि वे थकीं हैं न बना पाएँगी।” रामप्रसाद आँखों में पानी भरकर बोले बाबा हम परवश हैं आप सीधो लेकर बना लो। क़रीब दो घंटे बाद एक गोल लौंकी परांत में हँसिए के साथ डोलती आई, हमें हाथ आजमाते देख दादा की बहु पल्लू में मुस्कुराते हुए  बोली, रहन दो बाबा हम बनाए दे रहे। चार बजे तीस रोटियों के साथ सब्ज़ी बनकर आ गईं। हरेक ने चार-चार रोटियाँ लौकी साग के साथ साफ़ कीं और दो-दो रोटियाँ बचाकर रखीं जिन्हें रात को आठ बजे दूध-गुड़ से खाईं। इस प्रकार लंच-डिनर दोनों सध गए, एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाए।

रात में रामप्रसाद साहू बोले “लोधी घमंडी हैं धर्मशाला के सामने हैंडपम्प नहीं लगने दे रहे,  अपने खेतों के बीच में पड़ने वाली ज़मीन को किसी भी तरह धौंस धपट से ख़रीद कर एक चक बना लेते हैं। नरसिंहपुर जिले की अस्सी प्रतिशत ज़मीन उनके स्वामित्व में है।” लोधियों का थोड़ा परिचय लेते चलें। लोधी (लोधाया लोध) भारत में पायी जाने वाली एक किसान जाति है। ये मध्यप्रदेश में बहुतायत में पाये जाते हैं, मुस्लिम आक्रमण और प्रताड़ना से तंग आकर पहले विस्थापित होकर पश्चिमोत्तर सीमा से उत्तर भारत, फिर नर्मदा घाटी में आ बसे है। नरसिंहपुर जिले में लोधी हैं परंतु होशंगाबाद जिले में वे नदारत हैं, वहाँ रघुवंशी, गूज़र अधिक हैं। लोधी ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ की एक जाति है, परंतु इस जाति के लोग राजपूतो से संबधित होने का दावा करते हुए ‘लोधी-राजपूत’ कहलाना पसंद करते हैं। जबकि, इनके राजपूत मूल से उद्धृत होने का कोई साक्ष्य नहीं है और न ही इन लोगो में राजपूत परंपराए प्रचलित है। हमने आठ-दस किसानों से पूछा राजपूतों की उत्पत्ति सूर्य से, जैसे राम का इक्ष्वाकु वंश सूर्यकुल से उत्पन्न हुई या कृष्ण का यादव वंश चंद्रकुल से आया है,  उनकी सिलसिलेवार वंशावली मिलती है। लोधियों की उत्पत्ति सूर्य या चंद्र, किससे हुई है। उन्होंने बताया कि लोधी ठाकुर हैं, बस इतना जानते हैं। असल में, वे पिछड़ा वर्ग का लाभ लेते हैं इसलिए खुलकर नहीं बोलते। ब्रिटिश शासन के एक प्रशासक, रोबर्ट वेन रुसेल ने लोधी शब्द के कई संभव शाब्दिक अर्थों का जिक्र किया है, उदहरणार्थ लोध वृक्ष के पत्तों से रंगो का निर्माण करने का कार्य करने के कारण ये लोग लोधी कहलाए। रुसेल ने यह भी कहा है कि ‘लोधा’ मूल शब्द है जो कि बाद में मध्य प्रदेश में ‘लोधी’ में रूपांतरित हो गया। एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार, लोधी अपने निवास अफ़ग़ानिस्तान से पंजाब के लुधियाना में आकर बसे फिर मुस्लिम आक्रमणों से परेशान होकर गंगा-यमुना के दोआब गए वहाँ वे लुधियाना के नाम से लोधी कहलाए। ब्रिटिश स्रोतो में लोधियों को उत्तर भारत से विस्थापित होना बताया गया है,जहाँ से यह लोग मध्य भारत में आ बसे। ऐसा करने में उनके सामाजिक स्तर का उत्थान हुआ, और यह लोग ब्राह्मण, बनिया व राजपूत आदि से नीचे के स्थानीय शासक तथा जमीदार बने। इनमे से कुछ बड़े जमींदार ‘ठाकुर’ की पदवी पाने में सक्षम रहे, तथा दमोह व सागर जिलो में कुछ लोधी परिवारो को पन्ना के शासक द्वारा राजा, दीवान व लंबरदार करार दिया गया। इस तरह शक्तिशाली बने लोधियों ने बुंदेला उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1857 कि क्रांति मे, लोधी भारत के विभिन्न भागो में अंग्रेज़ो के खिलाफ लड़े। हिंडोरिया रिसायत के लोधी तालुकदार जिले के मुख्य कार्यालय की तरफ कूच करने व खजाने को लूटने में शामिल थे, जबकि शरपुरा के लोधियों ने स्थानीय पुलिस को खदेड़ दिया व उन्होने घुघरी गाँव को भी लूटा। मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर ज़िले में हीरापुर का प्राचीन राजघराना है। इसको पहले हीरागढ़ के नाम से जाना जाता था। इस वंश के पूर्वत राजा जगन्नाथ सिंह महदी माता के उपासक थे। इसीलियें ये महदेल लोधी कहलाये। हिन्डोरिया (दमोह) में लोधी वंशजों की एक प्राचीन गढ़ी है, जिसमें लोधी राजवंश के उत्तराधिकारी निवास करते हैं। इलाक़े में आज़ भी उनका मान सम्मान क़ायम है। नरसिंहपुर जिले में लोधी परिवार बहुतायत में हैं। कृषि से प्राप्त आय का बड़ाभाग कोर्ट-कचहरी वकीलों को हर साल देते आ रहे हैं।

शाम को कम्युनिस्ट विचारधारा पर प्रयास जोशी से बातचीत चल निकली, काल मार्क्स के साम्यवादी विचार से बोल्शेविक क्रांति में ज़ारशाही के अंत से बात ईसाइयत से होती हुई यहूदी और इस्लाम के मूल सिद्धांतों पर आ गई। प्रयास सहित सभी लोग बड़े तल्लीन होकर सुन रहे थे। उसी दिन बाबरी मस्जिद का निर्णय आया था अरुण भाई ने बातचीत सख़्ती से बात बंद करवा दी, उन्हें डर लगा कि कहीं कोई विडियो बनाकर दंगे  न भड़का दे। जबकि ऐसी किसी सम्भावना का दूर तक अतापता नहीं था, न तो कोई विडियो बना रहा था और न ही वहाँ मुस्लिम कम्यूनिटी थी। उसके विपरीत टेलीविजन पर और अख़बारों में निर्णय की चीरफाड़ में अधिक ख़तरनाक बहसें हो रहीं थीं, लेकिन डर का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। तभी चंगेज़ खान के पोते उलूग ख़ान की पच्चीस हज़ार फ़ौज ने डरे हुए बग़दाद के ख़लीफ़ा व उसकी दो लाख अजेय फ़ौज को हरा ख़लीफ़ा को बोरे में बाँधकर पटक-पटक कर मारा था क्योंकि ख़लीफ़ा का ख़ून ज़मीन पर गिरता तो क़यामत बरपा हो जाती, डर है ही ऐसी चीज़, जीतने और हारने वाले दोनों डरे रहते हैं। असल बिंदु पर बात आने वाली थी कि कम्युनिस्ट और मुस्लिम किसी देश को अपना नहीं मानते क्योंकि पूरी दुनिया में कम्यूनिज्म और इस्लाम फैलाना उनका धर्म है इसलिए उनकी ईमानदारी रूस-चीन  और मक्का से जुड़ी रहती है, कम्युनिस्ट धर्म को अफ़ीम मानते हैं लेकिन इस्लाम की कट्टर सोच  के विरुद्ध एक भी शब्द नहीं बोलते, दोनों लोकतंत्र पसंद नहीं करते एक सीरिया सी इस्लामिक स्टेट की तानाशाही तो दूसरा रुस सी सर्वहारा-वर्ग की तानाशाही की वकालत करते हैं, परंतु अरुण भाई ने बुरी तरह डाँट कर बात बंद करा दी। सब चुप हो गए, लम्बी चुप्पी के बाद बात के विषय को बदल दिया।   

रात को रामप्रसाद साहू के परिवार के साथ वाल्मीकि  रामायण, तुलसी कृत रामचरितमानस पर आधुनिक संदर्भ पर चर्चा हुई जिसमें बच्चों को शास्त्रों के शाश्वत मूल्य और सामयिक मूल्य का अंतर समझाया कि क़ुरान या बाइबिल के मानने वालों की तरह हिंदु 1500-2500 सालों पहले के सामाजिक मूल्यों से नहीं चिपके रहते, वे समाज की प्रगतिशीलता से तालमेल बिठाकर नई मानसिकता से नई सामाजिक व्यवस्था गढ़ना जानते हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

बेलखेड़ी से गंगई 07 नवम्बर.2019

सुबह एक-एक गिलास दूध पीकर आठ बजे बेलखेड़ी गाँव से नर्मदा की गोदी में उतर कर चल पड़े। रास्ता बड़ा कठिन था, किसानों ने खेतों को गोड़ दिया है या फ़सल बोकर स्प्रिंकलर चलने के कारण रास्ते पर कीचड़ हो जाने से जूतों में दो-दो किलो मिट्टी चिपकने से चलना दूभर था। बड़ी मुश्किल से रुक-रुक कर चलते रहे। नर्मदा के अति सुंदर नज़ारे आँखों और मोबाईल में क़ैद होने लगे। क़रीबन तीन बजे धुरन्धर बाबा के आश्रम में पहुँचे। धुरन्धर बाबा बिहार से आकर नर्मदा के किनारे एक पहाड़ी पर आश्रम बनाकर रहने लगे हैं। गाँजे की पत्ती और चाय उनका भोजन है। एक बार सरकारी आबकारी विभाग ने धुरन्धर बाबा को गाँजे के पौधे साक्ष्य स्वरुप लेकर नरसिंहपुर कलेक्टर के सामने पेश किया। धुरन्धर बाबा ने दलील दी कि गाँजे की पत्तियाँ मेरा भोजन है, नहीं खाऊँगा तो मर जाऊँगा और हत्या का आरोप आपके माथे पर आएगा। कलेक्टर साहब ने आबकारी अधिकारी को धुरन्धर बाबा की पेशकारी पर डाँट पिलाई। उस दिन के बाद धुरन्धर बाबा निर्विघ्न गाँजे की खेती करके पत्तियों के भोजन और चाय सेवन से ज़िंदा हैं। उनके बाल दस फ़ुट लम्बे हैं, बाबा का कहना है कि जिन लड़कियों या औरतों को केश की लम्बाई बढ़ानी है वे गाँजे की पत्तियों का नियमित सेवन करें। बाबा मज़बूत पाए के काऊच पर आसन जमाए गाँजा रगड़ते और बाँटते हैं उनके पास आठ-दस कुत्ते पले हैं जिनको भी गाँजे के धुएँ और पत्तियों के सेवन की आदत पड़ गई है। पहले हमारा साबका उनके एक धूर्त सेवक से हुआ, जो खींसे निपोरकर किसी भी बात का मुंडी हिलाकर जबाव देता था। पहले बोला आश्रम में दाल-चावल भर हैं। रात में केवल दाल-चावल खाने से रात में बार-बार पेशाब  से नींद टूटती है और अच्छी नींद  नहीं होने से शरीर टूटने लगता है जबकि हमें रोज़ दस किलोमीटर चलना होता है। हम अरुण भाई के साथ गाँव से आलू, भटे और टमाटर ख़रीद लाए तो वह बोला आपही बना लो, जब धुरन्धर बाबा को पता चला तो उन्होंने स्वयं सब्ज़ी और आठ चपाती के बराबर एक 10-12 मिलीमीटर मोटाई का एक-एक टिक्क बनाकर परसा जिसे मुश्किल से खपा पाए।  

परिक्रमा के दौरान एक बात पता चली कि संगीन अपराधी बाबा का चोला रखकर परिक्रमा करते रहते हैं। कोई भी परिक्रमा वासी सात दिन एक आश्रम में खाने, पीने और रहने की सहूलियत पा सकता है। वह हर सात दिन में जगह बदलकर पुलिस को चकमा देते रह सकता है, वैसे भी एक थाना क्षेत्र की पुलिस दूसरे क्षेत्र में दख़लंदाज़ी नहीं करती है। एक अनुमान के अनुसार तीन-चार हज़ार से अधिक आश्रम नर्मदा किनारे हैं, जहाँ अपराधी शरण पाते रह सकते हैं। साधु सन्यास लेते समय नाम बदल लेते हैं, तो वे लोग भी नाम बदल लेते हैं। उनसे नाम पता पूछो तो घुमा फिराकर इधर उधर की बात से भरमा देते हैं जैसे :-

नाम न पूछो साधु का पूछ लीजिए ज्ञान

मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।

सुबह-शाम धुरन्धर बाबा के शिष्य नियम से गाँजे की चिलम खींचने आते हैं। दरबार में काऊच पर बाबा के आसन के सामने लम्बी चौड़ी दरी पर शिष्यों का चिलम का दौर रामचरितमानस के किष्किन्धा कांड और सुंदर काण्ड के प्रवचन की सी डी  पर चलता रहता है।

जबलपुर-इटारसी रेल खंड स्टेशनों की दूरी नर्मदा किनारों से दस से बीस किलोमीटर है। मुख्य सड़क भी कमोवेश उतनी ही दूरी पर है इसलिए वायु, जल प्रदूषण नहीं है, पेड़ों और गन्ने के खेतों की सघन हरियाली से सूर्य की किरणें ज़मीन में जज़्ब होने से वातावरण गर्म नहीं होता है। जबकि शहरों के कांकरीट जंगल भट्टी की तरह झुलसते हैं। अनाज सागभाजी और भरपूर दूध दही मक्खन सेवन से लोग मेहनतकश और स्वस्थ रहते हैं जबकि शहरों में विलासिता पूर्ण जीवन के आदी लोग दवाइयों के भरोसे ज़िंदा रहने के अभ्यासी हो गए हैं। गांधी जी का ग्रामीण परिवेश को स्वावलम्बी बनाने का उद्देश्य था कि स्थानीय कुशल कारीगर ज़रूरत की चीज़ें स्थानीय स्तर पर पैदा करें लेकिन निज़ाम ने उन्हे शहरी कारख़ानों का उपभोक्ता बना छोड़ा है। गांधी जी के सिद्धांत पर भूटान आर्थिक नीतियों को अमल में लाकर ख़ुशहाली इण्डेक्स में पहली पाँच श्रेणी में स्थान पाता है। भारत में शहर प्रदूषण के अड्डे बन गए हैं। गाँव के मेहनतकश लोग सुबह और शाम दो बार भोजन करते हैं जबकि उन्हें दिन भर ऊर्जा हेतु ग्लूकोज़ की दरकार होती है। नरसिंहपुर जिले में सर्वाधिक फ़सल गन्ने की होती है इसलिए चाय-दूध में बहुत अधिक शक्कर डालने का रिवाज बन गया है ताकि उनकी ग्लूकोज़ की भरपाई होती रहे। खेती में मशीनीकरण के कारण समृद्ध किसान डायबिटीज़ और हृदय रोग के शिकार होना शुरू हो गए हैं। धुरन्धर बाबा के आश्रम में तार पर सूखने डाले, चड्डी और बानियान छूट गए और बेलखेड़ी में चार्जर जल गया, जबलपुर से अविनाश दवे आगे साँकल घाट पर यात्रा में जुड़ने वाले थे अतः दोनों चीजें लाने हेतु उन्हें फ़ोन कर दिया।

गंगई से ब्रह्म कुण्ड  08 नवम्बर 2019

हमारी परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की लालसा से नहीं की जा रही है अपितु हिंदू जिज्ञासुओं की एक सांस्कृतिक परिक्रमा है जिसका उद्देश्य परिक्रमा की भावना, क्षेत्र, विस्तार और लक्ष्य की सीधी जानकारी लेना है ताकि उन्हें भावी पीढ़ी के लिए संजो कर रखा जा सके।

शाहपुरा-भिटौनी के मनकेडी गाँव से दो व्यक्तियों ने आज ब्रह्मकुण्ड घाट से विधिवत अखंड परिक्रमा ऊठाई है। उनका कहना था कि बेटी का हाथ बंदर ने चबा लिया था उसे डाक्टर ठीक न कर सके नर्मदा मैया ने दर्शन देकर उसे आशीर्वाद दिया और बेटी का हाथ ठीक हो गया। दूसरे ने घरेलू वाद-विवाद से मुक्ति हेतु परिक्रमा व्रत लिया है। वे भिक्षा में सीधा लेकर भोजन बनाते हैं और अतिरिक्त सामग्री दान कर देते हैं। प्रतिदिन पाँच घर भिक्षा माँगते हैं। समान्यत: लोग पाप मुक्ति, मान्यता या स्वर्ग कामना से परिक्रमा करते है। उन्हें आस्था का संबल खींचता है। हमारे जैसे बिना किसी कामना के अमृत लाल बेगड़ जैसे बहुत कम लोग इस अत्यंत दुरुह यात्रा पर निकलते है।

कुछ साम्यवादी हिंदू पौराणिक शास्त्रों को बकवास और धर्म को जनता की अफ़ीम बताते हैं लेकिन उनके रूसी आका येरूसलम, कन्नांन, हारान को पवित्र भूमि और पुराना नियम को इतिहास बताकर ख़ुश होते हैं। यहूदियों ने अपनी किताबों और सिद्धांतों व विचारधारा से 2500 सालों बाद इज़राइल पाकर उसे सशक्त आधुनिक राष्ट्र बनाया। हिंदुओं के पुराणों में नर्मदा के जिन घाटों, ऋषि-मुनियों और आध्यात्मिक सिद्धांतों का उल्लेख है, जिनको करोड़ों लोग मानते हैं उन जगहों की जानकारी लिपिबद्ध करना हमारा पुनीत कर्तव्य है। ज़रा सोचिए, लोगों से तथाकथित अफ़ीम छुड़ा ली जाए तो उनके पास जीवन की विद्रुपता से निपटने हेतु सिवाय शराब और सेक्स के क्या बचेगा। 

सभी धर्मों के प्राचीन ग्रंथ बड़े बेतरतीबी से लिखे या संग्रहित किए गए हैं। जिस समय वे लिखे जा रहे थे उस समय पुस्तकें लिखने की कला विकसित नहीं हुई थी। सौ या दो सौ सालों तक उनका संकलन होता रहता था फिर एक, दो, तीन या चार संगिति में सम्बंधित धर्म के विद्वान उसे अंतिम स्वरुप देते थे। बाइबिल, क़ुरान, बुध्यचर्या और गुरुग्रंथ सहित समस्त पुराण इसी तरह संकलित हुए हैं। समय-समय पर उन्हें अद्यतन किया जाता रहा है, जैसे विकीपीडिया में जो जब चाहे कुछ भी जोड़ सकता है, अतः उनमें बुद्धिगम्य तार्किकता पूर्ण संदेश ढूंढ़ना मृग मरिचिका के सिवाय कुछ नहीं है लेकिन एक बात ज़रूर सही है कि सम्बंधित धर्मों के मूलभूत सिद्धांत उन बेतरतीब शास्त्रों में आस्था पूर्वक पिरोए गए हैं इसीलिए वे ग्रंथ उनके अनुयायियों के लिए पूजनीय हैं। उनमें से काम की चीज़ लेकर बाक़ी छोड़ दीजिए।

जड़ चेतन गुण दोष मय विश्व कीन्ह करतार

संत हंस गुण पय लहहीं छोड़ वारी विकार।

हिंदुओं के 4 वेद, 18 पुराण और 108 उपनिषद 1194 में मुहम्मद गौरी से लेकर 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने तक 600 साल इस्लामिक अत्याचार से बचते-बचाते उपेक्षित रहे हालाँकि वे शास्त्र  आदि शंकराचार्य द्वारा आठवीं सदी में देश के चार धामों, बारह ज्योतिर्लिंगों, बावन स्थापित शक्तिपीठों और नर्मदा किनारे भेड़ाघाट से भंडोंच तक अनेकों ऋषि आश्रमों में सुरक्षित रखे रहे। सोमनाथ, उज्जैन, मथुरा और काशी में मंदिर-मूर्तियाँ तोड़कर ग्रंथ जलाए गए लेकिन सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच वनाच्छादित घने बियाबांन जंगलों में 1300 से अधिक किलोमीटर लम्बी नर्मदा के घाटों में सुरक्षित रहे। ऋषि-मुनि उन्हें ढोकर परिक्रमा करते श्रुति और स्मृति में ज़िंदा रखे रहे। 1774 में वारेंन हेस्टिंग के आने के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट में एक व्यक्ति विलियम जोंस न्यायाधीश बनकर आए, उन्होंने देखा कि हिंदुओं का न्याय भी मुस्लिम शरीयत से होता है, जिसके कारण उनके साथ अन्याय बरता जाता है। उन्होंने संस्कृत पढ़कर हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन से हिंदू न्याय सिद्धांतों को जानना चाहा तो कोई उन्हें संस्कृत पढ़ाने वाला न मिला। अंत में काशी का एक ब्राह्मण माँस-मदिरा त्याग कर हिंदू पद्धति से रहने की शर्त पर उन्हें हिंदू दर्शन व धार्मिक शास्त्रों के अध्ययन कराने को तैयार हुआ। उन्होंने शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन करके अंग्रेज़ी में अनुवाद किया। तब पश्चिमी दुनिया उन्हें पढ़कर चौंक गई। विवेकानंद ने प्रेसीडेंसी कालेज में वेदान्त का अंग्रेज़ी भाष्य उनके अनुवाद से पढ़कर शिकागो का प्रसिद्ध वक्तव्य दिया था। तथाकथित खंडित बुद्धिजीवी इन्हें बकवास मानते हैं लेकिन घरों में उन्ही पौराणिक पात्रों को घंटी बजाकर पूजते हैं।  

सनातन पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अमरकण्टक से नेमावर के बहाव को देवी नर्मदा की देह का ऊपर का हिस्सा माना जाता है, तदानुसार नेमावर नाभिकुंड है। नेमावर को विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्मस्थान माना जाता है। इसका मतलब हुआ कि ऋषि जमदग्नि और रेणुका का आश्रम नेमावर में रहा होगा। भृगु, मार्कंडे, वशिष्ठ, कौंडिल्य, पिप्पल, कर्दम, सनत्कुमार अत्रि नचिकेता, कश्यप, कपिल जैसे अनेकों सनातन ऋषियों के आश्रम भेड़ाघाट से नेमावर के बीच रहे हैं जहाँ वेदों का पठन-पाठन, उपनिषद, अरण्यकों, ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों के साथ स्मृतियों का लेखन कार्य उन ऋषि आश्रमों में हुआ है।

आर्य-अनार्य सिद्धांत को ठीक माने तो आर्यों के आगमन के बाद से अनार्य याने असुर विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के बीच सघन जंगलों में प्रवाहित सदानीरा नर्मदा के दोनों किनारों बस गए थे। उत्तर भारत का इलाक़ा उन्होंने आर्यों के लिए छोड़ दिया था। नरसिंहपुर के नृसिंह मंदिर में भगवान नरसिंह की  मूर्ति प्रह्लाद ने स्थापित की होगी। इसी क्षेत्र में हिरण्यकश्यप का राज्य था, शोणितपुर अर्थात वर्तमान सोहागपुर में प्रह्लाद के पोते  बाणासुर की राजधानी थी। प्रह्लाद की एक बहन के पुत्र असुरों के गुरु शुक्राचार्य का आश्रम विन्ध्याचल और सतपुडा पर्वतों के घने वन क्षेत्र में था यहाँ की जड़ीबूटियों के रसायन से उन्होंने अमृत संजीवनी तैयार की थी जिसे अर्जित करने हेतु देवताओं के राजा इंद्र ने गुरु पुत्र कछ को भेजा था। इसी क्षेत्र में उसका प्रेम प्रसंग शुक्राचार्य पुत्री देवयानी से हुआ था। देवासुर संग्राम के पूर्व देवताओं ने ब्रह्मकुण्ड में शिव आराधना की थी। गराडू घाट पर गरूँड़ ने युद्ध काल में तपस्या की थी। नर्मदा की परिक्रमा में इन सभी देवी-देवताओं की परिक्रमा हो जाती है। जयचंद विद्यालंकार के कालबद्ध पौराणिक इतिहास लेखन के बाद से पौराणिक साहित्य को हिंदुओं का ऐतिहासिक साहित्य माना जाने लगा है। नर्मदा घाटी का भेड़ाघाट से नेमावर का क्षेत्र देव-असुर संग्राम का साक्षी रहा है। स्कन्द पुराण के रचयिता वेद व्यास ने कार्तिकेय अर्थात शिवपुत्र स्कन्द के नाम पर यह यह ग्रंथ संकलित किया था।  स्कन्द  द्वारा तारकासुर असुर का वध का साक्षी भी यही स्थल रहा है। भगवान शिव संहार के देवता हैं। उनका पुत्र कार्तिकेय संहारक शस्त्र अथवा शक्ति के रूप में जाना जाता है। तारकासुर का वध करने के लिए ही स्कन्द का जन्म हुआ था। कार्तिक माह की ग्यारस   के चमकते चाँद की गवाही में इस पौराणिक स्थान का आनंद लिया। स्कंद का एक नाम कार्तिकेय है, कार्तिक मास की पूर्णिमा को नर्मदा के दोनों तटों के हज़ारों घाटों पर भरने वाले मेलों में करोड़ों लोग डुबकी लगाकर पुण्य सहेजते हैं। 

हमारी पग-पग यात्रा नर्मदा की कल-कल संगीतमयी सरगम की धुनों पर परवान चढ़ रही थी, धुरन्धर बाबा के आश्रम से उसमें एक नया राग “फूफा-राग” जुड़ गया। यह जनमासा ठाट का दिन के चौथे-पाँचवें पहर में बजाया जाने वाला राग है, इसका आरोह-अवरोह अरुण भाई ने उस समय ईजाद किया था जब जगमोहन भाई ने धुरन्धर बाबा के एक अकड़ूँ चेले की ऐसी तेसी कर दी थी जैसा कि बारातों में दुल्हा के फूफा करते हैं। यह गंगई घराने का राग है जो शाम की उदासी या रात के पहले प्रहर के सन्नाटे और लस्तपस्त शरीरों में जान फूँकने के लिए अरुण भाई द्वारा छेड़ा जाता था, हम तबले पर तीन ताल मे संगत करते थे। फूफा पहले हल्के से गुर्रा कर ता.. थई… ताता… थई पर कत्थक के घुँघरू दार क़दम ताल चलते हुए हल्का चक्कर लेते-लेते तांडव पर उतर आते तब फूफा के रौद्र रूप से समूह को साँप सूंघ जाता। इस प्रकार नीरसता में रस तलाशती यात्रा हमारी यादों की तिजौरी में जमा होती मूल्यवान सम्पत्ति है। 

गंगई से ब्रह्मकुंड तक की यात्रा अबतक की सबसे दुरुह पदयात्रा थी। रास्ता बहुत ख़राब कही कीचड़, कहीं नुकीले पत्थर, कहीं रेतीले और कहीं कटे किनारे जानलेवा हो सकते थे। सुबह आठ बजे आश्रम के स्वामी धुरंधर बाबा से विदा लेकर नर्मदा किनारे-किनारे चल पड़े। क़रीबन तीन किलोमीटर चलकर मुआर घाट पहुँचे, मान्यता है कि दुर्गा देवी ने भैंसासुर का वध इसी घाट पर किया था। इसकी प्रबल सम्भावना है कि आर्य-अनार्य संघर्ष सतपुड़ा-विंध्याचल के बीच प्रवाहमान नर्मदा के दस से बीस किलोमीटर मैदान में हुआ हो वही घटना पुराणों में देवासुर संग्राम के रूप में वर्णित है क्योंकि आर्यों से अलग माने जाने वाली गौंड, भील, कोरकू प्रजातियां अभी भी वहाँ निवास करती हैं। उस दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारस थी। घाट पर स्नान चल रहा था, हम सभी ने भी स्नान किए और कुछ चना-चबैना ग्रहण किया। घाट पर चार व्यक्ति अखंड परिक्रमा उठा रहे थे उनके परिजन उन्हें विदाई देने आए थे। आज कई लोग दोनों किनारे के घाटों से परिक्रमा उठा रहे थे। कुछ पंचकोशी परिक्रमा उठा रहे थे। शाम के चार बजे तक सफ़ेद कपड़ों में क़तारबद्ध होकर परिक्रमा वासी चल पड़े, नर्मदा के सौंदर्य में चार चाँद लग गए।

ब्रह्म कुण्ड में सीधी चढ़ाई चढ़कर धर्मशाला पहुँचे वहाँ एक 93 वर्षीय बुज़ुर्ग अपनी लक्वाग्रस्त पत्नी सहित मिले, वे बड़ी आत्मीयता से पत्नी सेवा में रत हैं। पहले हमने जहाँ ठिकाना बनाया वहाँ रोशनी की व्यवस्था नहीं होने से उनके दालान में ठिकाना जमाया, वे भोजन सामग्री देने को तत्पर थे बनाना हमें था परंतु थकान से शरीर टूट रहे थे। एक पंडित जी के घर से तीस रोटी और आलू की सब्ज़ी का ठेका तीन सौ रुपयों में तय हुआ और सुबह से पड़े ख़ाली पेट भर गए। एक असहाय बूढ़ी माँ विक्षिप्त अवस्था में आकाश के नीचे खुले में सो रही थी, आश्रम सेवक से पूछा तो पता चला वह बिस्तर में शरीर की सारी गंदगी फैलाकर बदबू फैलाती है इसलिए आग जलाकर बाहर सोती है। सुबह मुंशीलाल जी ने अपना शाल, इनर, चादर, दरी और मोज़े उस असहाय को दान कर दिए। मुंशीलाल एक-एक करके कपड़े देते जा रहे थे वह ख़ुश होकर आशीर्वाद बरसा रही थी, बड़ा मार्मिक दृश्य था।

 क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

झाँसी घाट से बेलखेड़ी 06 नवम्बर 2019

हम सोमनाथ एक्सप्रेस से बैकपेक में एक पैंट, दो शर्ट, अण्डरवेयर तौलिया, स्लीपिंग बेग, वॉर्मर इनर, अतिरिक्त मोज़े व रुमाल, स्लीपर, तेल साबुन, कुछ नक़द राशि और सूखे मेवे खजूर रखकर भोपाल से श्रीधाम पहुँचने हेतु चल पड़े। अगले 08-09 दिन बस यही हमारी सम्पत्ति है। जीवन यात्रा में बहुत सारा सामान घर में, रक़म बैंक में, मकान शहर में रिश्ते दिलों में इकट्ठे किए है वह सब छोड़कर  इतना थोड़ा सामान और नर्मदा से रिश्ता जीवन जीने के लिए काफ़ी है। रिश्तों को निभाने में बहुत सारे अच्छे-बुरे भाव मन में गाँठ बाँधकर रखे, आज  न सिर्फ़ सारा सामान, आराम छोड़कर निकले अपितु अगले 08-09 दिन जब थके माँदे शरीरों को खुले आकाश के नीचे ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर फेंकेंगे तो मन की गाँठे भी ख़ूब खुलेंगी। भिक्षा से भोजन प्राप्ति में अहंकार की गाँठे भी अवचेतन से ढीली होकर चेतन पटल पर आएँगी, जिन्हें ध्यान लगाकर खोला जा सकेगा। आज सुबह ध्यान के बाद कवित्व जागा।

इसके पहले कि

लोग तुम्हें छोड़ दें

रिश्ते तुम्हें तोड़ दें

तुम सीख लो उन्हें छोड़ना।

🍀🍀🍀🍀🍀

सुबह का सूरज सीखता

रोज़ पृथ्वी को घुमाकर

दिन-रात सजाकर

अपनी राह छोड़ना।

🔥🔥🔥🔥🔥

पेड़  सिखाता नियम से

ख़ूब खिले

फूलों-फलों को

शाख़ से छोड़ना।

💐💐💐💐💐

रिश्ते-नाते,माया-मोह,

धन सम्मोहन, यश-यौवन

सीख लो दिल से

सब यहीं छोड़ना।

🌸🌸🌸🌸🌸

पहले भी

करोड़ों-अरबों-खरबों को

निश्चित पड़ा था

ये जहाँ छोड़ना।

🦶🦶🦶🦶🦶🦶

छूटते सभी एक न एक दिन

आत्मा से देह, अपनो से नेह

भला-बुरा सब कुछ

यहीं है छोड़ना।

🧏🏽‍♂️🧏🏽‍♂️🧏🏽‍♂️🧏🏽‍♂️🧏🏽‍♂️

नियति के सर्कस

का अटल नियम

समय पर झूला पकड़ना

समय पर छोड़ना।

🍁🍁🍁🍁🍁

समय की दीवार में टंगे

कैलेण्डर हो तुम

खील को तुम्हें भी

पड़ेगा छोड़ना।

🍂🍂🍂🍂🍂

मन में विचार आया कि आज से नौ दिन नर्मदा मैया के दामन में जीवन नैया खैबेंगे, वही पार लगाएगी-वही डुबाएगी, वही पलनहार, वही रुलाएगी-वही हँसाएगी। एक नारा मन में जागा, जय हो नर्मदा मैया, पार लगा दे नैया। यह सुबह से शाम तक ज़ुबान पर सज़ा रहा और यात्रा का नारा बन गया।

अरुण दनायक, जगमोहन अग्रवाल, मुंशीलाल और प्रयास जोशी के साथ सोमनाथ एक्सप्रेस में सुबह आठ बजे बैठकर दिन के दो बजे श्रीधाम पहुँचे। मुंशीलाल भाई को ख़बर मिली कि उनकी बेटी की सासु जी का निधन आमला में हो गया है जिनकी रसोई गंगाजली पूजन ग्यारह तारीख़ को रखी गई है उन्होंने निर्णय किया कि वे यात्रा जारी रखेंगे। वे दस तारीख़ को करेली पहुँच कर रेलगाड़ी से आमला जाएँगे। रसोई में सम्मिलित होकर वे आगे की यात्रा हेतु बारह तारीख़ को वापस आ जाएँगे। बाक़ी यात्री तब तक रुके रहेंगे लेकिन वे नर्मदा मैया की लगन में ऐसे डूबे कि ट्रेन में आरक्षण होने के बावजूद उन्होंने आमला जाना स्थगित कर यात्रा जारी रखी। 

श्रीधाम उतरकर एक ऑटो से झाँसी घाट पहुँचे। वहाँ चाय-पानी करके नर्मदा मैया को नारियल चढ़ाया। एक व्यक्ति से घाट पर मोबाईल से फ़ोटो उतारने को कहा तो उसने कहा उसे फ़ोटो निकालना नहीं आता, हमने उसका नाम पूछा, उसने भैरव बताया। हमने कहा भैरव बाबा को दारू चढ़ती है तो उसकी आँखों में चमक आ गई। फिर वो फ़ोटो निकालने को झट तैयार हो गया, उसके बाद वह दारू के वास्ते सौ रुपए माँगने लगा तो हमने उसे दारू आचमन हेतु दस रुपए दिए। बेलखेडी की तरफ़ नर्मदा को दाहिनी किनारे रखकर पाँच किलोमीटर की यात्रा पर चल पड़े। किसान कछारी खेतों में मैथी, मिर्ची, गाजर और बेंगन उगा रहे थे जिसकी नक़द रक़म लेकर बाद में उन्ही खेतों में गेहूँ बो देंगे। तीन घंटों में 5.5 किलोमीटर की यात्रा करके बेलखेडी पहुँचे। बेलखेड़ी 250 घरों का गाँव है, 60 घर बर्मन यानि ढीमर के, चार-छः घरों के दीगर समाज और बाक़ी सब लोधियों के घर हैं। पूरा नरसिंहपुर का ग्रामीण इलाक़ा लोधियों से भरा है। जिनकी बसावट की अपनी कहानी है। नर्मदा यहाँ से सतपुड़ा का साथ छोड़कर विंध्य की हीरापुर रेंज से मिलने आगे बढ़ती है, हिरन नदी कुंडम से भागती आकर कुंड्डी खोलकर दरवाजे पर खड़ी मिलती है लेकिन नर्मदा का उसकी साँकल खटखटाना अभी थोड़ी दूर है।

बेलखेड़ी गाँव में घुसते ही गोविंद झारिया से मुलाक़ात हुई जो कि मंदिर के आश्रम में संतों की सेवा करते हैं। नर्मदा के किनारे बहुत ऊँची टेकरी पर एक शिव मंदिर है जिसके महा मंडलेश्वर गिरधारी लाल बर्मन हैं। परकम्मा वासियों के पहुँचने पर कई सेवक चाय, पानी भोजन की व्यवस्था में लग जाते है। आश्रम में जगह पाते ही हम लोगों में मोबाईल बैट्री चार्ज करने की होड़ सी लग जाती है लेकिन खो जाने का डर भी बना रहता है। हमने देखा कि बिजली के खम्भे से एक मोटा तार आँकड़ा बनाकर सीधी बिजली लाईन के नंगे तार से अटकाया गया है। उसी तार का दूसरा छोर एक दूसरे दो मुँहे तार से जुड़ा है, उसके एक छोर पर लट्टू सुलगा है दूसरा सीधा एक बोर्ड से जुड़ा है। डरते-डरते आई-फ़ोन का चार्जर बोर्ड में लगाया तो चार्जर ख़राब हो गया।

हम जैसे ही बेलखेडी आश्रम पहुँचे, वहाँ उपस्थित सेवक ने प्रश्न किया आप कितनी मूर्ति हैं? हमने चौंककर उसे देखा, उसकी आँखों में श्रद्धा भाव देखकर समझ गए कि हम मूर्ति हो गए, पूजनीय हो गए। सामने नर्मदा का लम्बा पाट देखते हुए सोचते रहे कि इस यात्रा में धार्मिकता और आध्यात्मिकता के भेद को समझ कर संस्मरण लिखेंगे। यात्रा के अंत तक हमारी बुद्धि इसी नज़रिए से लोक-व्यवहार और आस्था को परखती रही। सेवक ने एक कहावत कही “रमता जोगी बहता पानी जे रुकें तो गाद हो जाएँ” हमने कहा महाराज पूरी कहो, वे बोले इत्ति आत है। हमने पूरी कहावत इस तरह बताई :-

रमता-जोगी बहता-पानी

इनका कोई ठिकाना नाँय

ये जो रुकें तो गाद हो जाँय।

पानी रुका तो जीवाणु पैदा हो जाते हैं और जोगी रुका तो स्थान और व्यक्ति का मोह रूपी जीवाणु उसे ग्रास में लेकर साधु नहीं रहने देता, इसलिए साधक का मंत्र चरैवेती-चरैवेती होता है। नर्मदा वैराग्य की देवी मानी जातीं हैं इसका पानी कहीं रुकते नहीं देखा, निरंतर प्रवाहमान प्रकृति है। मनुष्य का जीवन भी निरंतर प्रवाहित है, समय का पानी अच्छा हो या बुरा गुज़र ही जाता है। वह अच्छे समय को पकड़ कर रोकना और बुरे को परे धकेलना चाहता है, यही मोह है-यही आसक्ति है। नर्मदा न कहीं रुकती न रुकने देती, चरैवेती-चरैवेती मंत्र जाप से चले-चलो पग-पग नर्मदा तीरे-तीरे, धीरे-धीरे।

 नर्मदा परिक्रमा के आध्यात्मिक पहलू को समझने के लिए हमें धार्मिकता (Religiosity) और आध्यात्मिकता (Spirituality) के मूलभूत अंतर को समझना होगा। धार्मिकता का अर्थ ईश्वर में आस्था+कर्मकांड है जिसमें तर्कबुद्धि का कोई काम नहीं है, अर्थात ब्राह्मण ग्रंथों में वर्णित कर्मकांड सम्पादित करना धार्मिकता है। आध्यात्मिकता का अर्थ आस्था+तर्कबुद्धि से तत्वज्ञान के प्रश्नों का अध्ययन, चिंतन, मनन और विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालना, जैसे नर्मदा परिक्रमा के पौराणिक व ऐतिहासिक संदर्भ क्या हैं, उसकी परिपाटी कब से शुरू हुई। वेदों में नर्मदा का उल्लेख नहीं मिलता क्योंकि उस समय तक आर्य आज के पंजाब हरियाणा तक सीमित थे। बौद्ध काल के चरमोत्कर्ष के दौरान कुछ ऋषि-मुनि वेद उपनिषद लेकर गंगा-यमुना दोआब से विंध्याचल पार करके नर्मदा घाटी में आए तब उन्होंने नर्मदा की उद्गम से भड़ौच तक यात्रा की, जिसके प्रणेता कपिल मुनि थे जिनका सांख्य दर्शन गीता में जस का तस रख दिया है कि आत्मा अनादि-अनंत है। अमरकण्टक में अभी भी कपिल धारा है जहाँ कभी उनका आश्रम रहा होगा।

बेलखेडी के मंदिर के सामने से खुले प्रांगण में रात गुज़ारी जहाँ से चाँद की झिलमिल चाँदनी में नर्मदा का सौंदर्य लुभावना और मोहक था। वहाँ चार-पाँच सेवक चाय भोजन की व्यवस्था करते रहे। दाल चावल रोटी का सेवन किया। उसके बाद आठ-दस लोग प्रांगण में आकर बैठे, उनसे सनातन धर्म में दीपक की महत्ता पर चर्चा हुई कि हम रोज़ दीपक क्यों जलाते हैं। वे लोग बोले “सब जलात हैं सुई हम जलात हैं।” उन्हें दीपक का तात्त्विक अर्थ बताया।  “हमारी देह पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के पंचभूत से अस्तित्व में आती है और आत्मा की ज्योति जीव रूप में प्रतिष्ठित होती है। दीपक पृथ्वी की मिट्टी से बनता है, उसमें तेल रूप में जल, और वायु व आकाश के खुलेपन में अग्नि प्रज्वलित करके ज्योत जलाई जाती है। इस प्रकार दीपक जीवंत देह का प्रतीक है। पंचभूत और आत्मा के सम्मान स्वरुप दीपक जलाया जाता है। यह हिंदुओं का पंचभूत+आत्मा का मौलिक सिद्धांत है, जिस पर कर्म-अकर्म, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म और मुक्ति की अवधारणा विकसित हुई।”  

उसके बाद गांधी जी के जीवन पर बातचीत हुई स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी महत्वपूर्ण घटनाओं और गांधी जी की भूमिका पर संवाद हुआ। मौजूद लोगों को महात्मा गांधी के जीवन की कहानी पसंद आई, कुछ वार्तालाप महाभारत पर भी हुआ तब तक सामने आकाश में चन्दामामा पीला मुँह लिए आ गए, रात में एक चाँद है जिसे देखते हुए दूरस्त प्रेमी विरह की उदास रात में सपनों के रंग भरते हुए गीत, कविता ग़ज़ल रचते हैं। जैसे-जैसे वे आकाश में चढ़ते गए हम वैसे-वैसे उन्हें निहारते आँखें मूँदते गहन नींद के आग़ोश में चले गए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

झाँसी घाट से सतधारा घाट

नर्मदा अमरकण्टक से निकलकर डिंडोरी-मंडला से आगे बढ़कर पहाड़ों को छोड़ दो पर्वत ऋंखलाओं दक्षिण में सतपुड़ा और उत्तर में कैमोर से आते विंध्य के पहाड़ों के समानांतर दस से बीस किलोमीटर की औसत दूरी बनाकर अरब सागर की तरफ़ कहीं उछलती-कूदती, कहीं गांभीर्यता लिए हुए, कहीं पसर के और कहीं-कहीं सिकुड़ कर बहती है। उसके अलौकिक सौंदर्य और आँचल में स्निग्ध जीवन के स्पंदन की अनुभूति के लिए पैदल यात्रा पर निकलना भाग्यशाली को नसीब होता है। यह यात्रा कुछ समय के वानप्रस्थ प्रवास द्वारा सभ्रांत मोह से मुक्ति का अभ्यास भी है। जिस नश्वर संसार को एक दिन अचानक या रोगग्रस्त होकर छोड़ना है क्यों न उस मोह को धीरे-धीरे प्रकृति के बीच नर्मदा के तटों पर बिखरे अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य का अवलोकन करते हुए छोड़ना सीख लें।

पीछे टाँगने वाले हल्के बैग में एक जींस या पैंट के साथ फ़ुल बाहों की तीन शर्ट, एक शाल, तोलिया और अंडरवेयर, साबुन तेल रखकर, वैसे तो आश्रम और धर्मशालाओं में भोजन की व्यवस्था हो जाती है फिर भी रास्ते में ज़रूरत के लिए समुचित मात्रा में खजूर, भूनी मूँगफली, भुना चना और ड्राई फ़्रूट, पानी की बोतल और एक स्टील लोटा-गिलास के साथ एक छोटा चाक़ू भी रख समर में उतर पड़े। कहीं कुछ न मिले तो परिक्रमा वासियों का मूलमंत्र “करतल भिक्षु-तरुतल वास” आज़माना जीवन का एक विलक्षण अनुभव है।

हमारा नर्मदा परिक्रमा समूह एक अनौपचारिक समूह है जो नर्मदा परिक्रमा शुरू करने के आसपास मिलता है और बिखर जाता है। हम लोग समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) के आधारभूत सिद्धांत पर अमल करते हुए स्वाभाविक रूप से एक दूसरे का ध्यान रखते हैं। समूह में सदस्यों की भूमिका सहज ही विकसित हो गई है कि कौन क्या करेगा जैसे निधि कोष बनाकर ख़र्च करने की ज़िम्मेदारी अरुण भाई की निर्धारित हो गई है, अविनाश भाई फ़ोटो खान-पींन, मुंशीलाल भाई जुगाड़ु कार्य अच्छी तरह कर लेते हैं। प्रयास भाई और मुंशीलाल भाई वरिष्ठ यात्री जगमोहन अग्रवाल का ध्यान रखते चलते हैं। जगमोहन भाई पूजा-पाठ करते हैं।

समूह-गतिशीलता (Group Dynamic) की मनोवैज्ञानिक अवधारणा आपसी व्यवहार और व्यवहार पैटर्न से संबंधित है। समूह की गतिशीलता चिंता करती है कि समूह कैसे बनते हैं, उनकी संरचना क्या है और उनके कामकाज में किन प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। इस प्रकार, यह समूहों के बीच संचालित होने वाली बातचीत और भूमिका से संबंधित है। एक समूह दो या दो से अधिक लोगों से मिलकर बनता है। जो सामान्य उद्देश्य अर्थात हमारे मामले में नर्मदा परिक्रमा साझा करते हैं और स्वयं का मूल्यांकन करते हैं और सामान्य लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक साथ आते हैं। दूसरे शब्दों में, एक समूह उन लोगों का इकट्ठा होना है जो एक दूसरे के साथ बातचीत करते हैं; अधिकारों और दायित्वों को सदस्यों के रूप में स्वीकार करके एक समान पहचान साझा करते हैं। समूह विकास चार चरणों की एक गतिशील प्रक्रिया है। समूह कैसे विकसित होते हैं? यह एक प्रक्रिया है जिसके माध्यम से समूह गुजरते हैं। प्रक्रिया में चार चरण शामिल हैं: गठन, तूफान, सामान्यीकरण, प्रदर्शन।

समूह के जीवन में पहला चरण एक समूह बनाने से संबंधित है। इस चरण में सदस्यों को या तो कार्य आवंटन या अन्य लाभ, जैसे स्थिति, संबद्धता, शक्ति, भूमिका आदि की तलाश होती है। इस स्तर पर सदस्य या तो किसी प्रकार की गतिविधि में संलग्न होते हैं या उदासीनता दिखाते हैं। कुछ सक्रिय, कुछ बहुत सक्रिय और कुछ उदासीन रहते हैं।

समूह में अगला चरण विगठन के लक्षण प्रदर्शित करना है। सदस्य आपस में परिचित या समान व्यक्तियों की तलाश करते हैं और स्वयं की गहन साझेदारी शुरू करके समूह के अंदर उपसमूह का निर्माण करते हैं। उपसमूह, समूह में एक भेदभाव पैदा करता है और तनाव दिखाई दे सकता है। पेयरिंग एक सामान्य घटना है। समूह को नियंत्रित करने के बारे में संघर्ष होगा।

हर समूह को परिपक्वता प्राप्त करने के लिए तूफ़ान से गुज़रना होता है। तूफ़ान के दौर में अक्सर सदस्य समूह से अलग होने की सोचने लगते हैं। समूह बिखराव का अंदेशा इसी समय अधिक होता है। हमारे समूह में भी तूफ़ान पैदा हुआ जब अरुण-अविनाश का उपसमूह अविनाश का उनके रिश्तेदार होने से बन गया, दूसरा उपसमूह जगमोहन-प्रयास का इसलिए बना कि प्रयास जगमोहन को बैग टाँगने और पैदल चलने में सहयोग कर उनके साथ चल रहे थे। समूह में हम और मुंशीलाल अकेले बचे लेकिन जब समूह में उपसमूह बनते हैं तब अकेले रह गए लोगों का स्वभाविक समूह बन जाता है। थकान और भूख की झुँझलाहट कई रूप में निकलती है। ऐसे में दो उपसमूह द्वारा मुंशीलाल पर आक्रामक होने लगे, अविनाश, प्रयास और जगमोहन कई बार उनसे तेज़ स्वर में पेश आने लगे। अविनाश भाई ने उन्हें चाय बनाने के लिए सामान निकालने में पोलीथीन की आवाज़ करने पर दो-तीन बार टोंका जबकि वे सबके लिए चाय बनाने की तैयारी कर रहे थे। प्रयास भाई ने फ़ोटो निकालते समय दो बार झिड़का। जगमोहन भाई ने समनापुर में भोजन के लिए बैठने को लेकर मुंशीलाल भाई को बुरी तरह डाँटा। तब हमने मुंशीलाल जी को शांत रहने का मशवरा दिया क्योंकि समूह बिखरने का अंदेशा उसी समय सबसे अधिक था। उपसमूह बनने पर सदस्य अपनी कुंठा अकेले पड़ गए सदस्य पर उतारने लगते हैं।

समूह के विकास का तीसरा चरण कार्य प्रदर्शन के बारे में अधिक गंभीर चिंता से चिह्नित होता है। अनौपचारिक समूह में नेतृत्व उभर कर समूह में अन्य सदस्यों को खोलना शुरू कर देते हैं। कार्य प्रदर्शन के लिए विभिन्न मानदंडों को स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। सदस्य अपने स्वयं के समूह और संबंधों के लिए अधिक जिम्मेदारी लेना शुरू करते हैं, एक बार यह चरण पूरा हो जाने के बाद, नेतृत्व पदानुक्रम के बारे में एक स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी। समूह संरचना के ठोसकरण और समूह की पहचान और दूरदर्शिता की भावना के साथ होती है।

प्रदर्शन पूरी तरह कार्यात्मक समूह का एक चरण है जहां सदस्य खुद को एक समूह के रूप में देखते हैं और कार्य में शामिल होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति योगदान देता है, समूह की प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए समूह के मानदंडों का पालन किया जाता है और सामूहिक दबाव डाला जाता है। अब समूह में एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जैसा आप अपने लिए पसंद नहीं करते, सिद्धांत का पालन होने लगता है। समूह अपने लक्ष्यों को पुनर्परिभाषित कर सकता है बाहरी वातावरण से जानकारी के प्रकाश में और उन लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए एक स्वायत्त इच्छाशक्ति दिखाएगा तब ही समूह की दीर्घकालिक व्यवहार्यता स्थापित और पोषित हो सकती है। समूह के सदस्यों की जानकारी बहुत काम की होती है।

अनौपचारिक समूह हमेशा विजातीय (heterogeneous) ही होते हैं। अमेरिका में  Deniel Goleman के Emotional Intelligence सिद्धांत प्रतिपादन उपरांत “व्यवहार-विज्ञान” से समूह गतिशीलता पर अनेकों खोज, सर्वे और अनुसंधान हुए तदानुसार मुख्यतः चार प्रकार के व्यवहार पहचाने गए।

मौलिक व्यवहार (Natural Behaviour)

अंगिकृत व्यवहार (Adopted Behaviour)

पारदर्शी व्यवहार (Transparent Behaviour)

नकारात्मक व्यवहार (Negative Behaviour)

दिल में अंदर कुछ है लेकिन कुछ और प्रदर्शित किया जा रहा है। एक ग़ज़ल के मुखड़े से इसे समझ सकते हैं।

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो

क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो।

*

ओंठों पे हँसी आँखों में नमी

क्या हाल है क्या दिखा रहे हो।

यह अंगिकृत व्यवहार है, जिसे हम से हर कोई बैंक या आफिस पहुँचते ही ओढ़ लेते हैं। अकसर लोग अंगिकृत व्यवहार के आदी हो जाते हैं, सेवनिवृत्ति के बाद भी अपने स्वभाविक व्यवहार में नहीं आते। स्वभाविक व्यवहार में आने के लिए दोस्तों की खुली महफ़िल दरकार होती है और जब उसमें गांधी-सावरकर जैसे विवाद बीच में आ जाते हैं तब दोनों तरफ़ से नकारात्मक व्यवहार शुरू होता है, एक चुप नकारात्मकता के साथ बातचीत स्थगित हो जाती है। जगमोहन भाई और अरुण भाई के व्यवहार  पारदर्शी स्वभाव के उदाहरण हैं, जो दिमाग़ में होता है वह सहजता से प्रदर्शित करते हैं। इससे बचना समूह के अच्छे परिचालन के पक्ष में होशियारी होगी। दो यात्राओं में सदस्यों के आधारभूत व्यक्तित्व ज्ञात हो गए हैं अब समूह मज़बूती ग्रहण करेगा। इसकी क्या गारंटी है कि किसी सदस्य की जगह कोई नया आएगा वह इनसे अच्छा होगा। समूह में अच्छा या बुरा होता भी नहीं है। हर व्यक्ति कुछ विलक्षणता और कुछ ख़ामियाँ जन्मजात लिए होता है, पाँच साल की उम्र तक इदम (Id) में और 18 साल की उम्र तक अहम (Ego) में विकसित होते हैं, जिन्हें बाद में बदला नहीं जा सकता है। अतः मनुष्य जैसा है वैसा ही स्वीकार्य करने से समूह गतिशीलता (Group Dynamic) ठीक तरह काम करती है।

हम सभी परिक्रमा वासियों में जगमोहन अग्रवाल सबसे वरिष्ठ हैं, लेकिन वे सबसे ज़्यादा मज़बूती और जूझारूपन से यात्रा में भाग लेते हैं। उनके पैरों में तकलीफ़ है इसलिए घुटने ज़मीन पर टेककर पंद्रह किलो का भार सहित खड़े हो पाते हैं। अन्य शारीरिक दिक़्क़तों के बावजूद वे निरंतर यात्रा करते रहे। उन्होंने कभी भी नहीं कहा कि वे परेशानी में हैं, नर्मदा जी में उनकी आस्था प्रबल है। नरसिंहपुर जिले की गाड़रवाडा तहसील के कौंडिया ग्राम के मूल निवासी हैं। जहाँ कभी कौंड़िल्य ऋषि का आश्रम हुआ करता था। जीवंतता, जीवटता और जूझारूपन उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। जगनमोहन जी ट्रेकिंग के बहुत ही शौकीन रहे हैं। बैंक नौकरी में भी यूथ क्लब की ओर से अकसर जाते रहते थे।

अरुण दनायक के पिताजी का नाम रेवाशंकर है, वे पुत्री रेवा और पिता शंकर दोनों का आशीर्वाद  लेकर चलते हैं। उनके पिताजी रेल्वे में अधिकारी थे। उनकी माताजी 1930-40 के दशक की सुशिक्षित महिला थीं, वे गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टेगोर और महात्मा गांधी  के विचारों से प्रभावित होकर स्त्री शिक्षा और कलात्मक अभिरुचि की गतिविधियों से जीवन भर जुड़ी रहीं। वे रोज़ मोतीदाना अक्षरों में डायरी लिखती थीं। इन्होंने वे डायरियाँ संभाल कर रखीं हैं जिनमे तीस से साठ के दशक का इतिहास और मुख्य-मुख्य घटनाओं का विवरण मिलता है। अरुण दनायक को लेखन के संस्कार माताजी से मिले हैं। वे गांधी जी  से भावनात्मक स्तर पर गहराई से प्रभावित है। किसी काम को सौम्यता से पूरा करने की ज़िद उन्हें अच्छा परिक्रमा वासी बनाती है।

अविनाश दवे सेंट्रल बैंक  से सेवानिवृत्त हैं, जबलपुर सेवानिवृत्त संघ की गतिविधियों से जुड़े हैं। अविनाश स्वादिष्ट भोजन प्रेमी हैं। यह गुण उन्हें उनके माता व पिता से विरासत में मिला है। अविनाश के बैग का एक खंड खाद्य सामग्री से भरा है। उसके पास चाय काफी से लेकर पोहा, नमकीन, अचार, मैगी मसाला लड्डू सब मिल जायेगा। अविनाश शौक़ीन फ़ोटोग्राफ़र हैं उनके केमरा से उतारीं गईं फ़ोटो की गुणवत्ता कलात्मक होती है। 

मुंशीलाल पाटकर पेशे से वक़ील हैं लेकिन मिज़ाज  से यायावर प्रकृति के हैं, हर दो-तीन महीनों में पर्यटन पर निकल जाते हैं। वे बहुमुखी जुगाड़ प्रतिभा के धनी हैं, बीच जंगल में चाय की जुगाड़ जैसी कई जुगाड़  से वाक़िफ़ हैं। समूह के ये त्यागी पुरुष पूरी यात्रा में गरम कपड़े दरी टोपा मोज़े सब दान करते आए। ख़ाली बैग में करेली से एक-एक किलो गुड़ और तुअर दाल भर लाए।

प्रयास जोशी एक संवेदनशील कवि और कला जगत से जुड़ाव रखने वाले दार्शनिक क़िस्म के शांत इंसान हैं। कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में गराऊ घाट पर उनकी रचनाओं का रसपान किया। वे ट्रैकर हैं, यूथ होस्टल की गतिविधियों से जुड़े हैं।       

नर्मदा परिक्रमा दुनिया की सबसे कठिन यात्राओं में से दुरुह यात्रा है। हिंदू हज़ारों सालों से इस यात्रा को करते आ रहे हैं। इस यात्रा के सामने डिस्कवरी चैनल की नक़ली साहसिक यात्राएँ कहीं नहीं लगतीं क्योंकि उनमें ड्रोन केमरा, सैटलायट इमेज, फ़ोटो ग्राफ़र दल और सपोर्ट के रूप में मेडिकल टीम साथ चलते हैं, उनके पास बेहतरीन जीवन रक्षक दवाएँ और आकस्मिक जोखिम से निपटने के अस्त्र होते हैं। नर्मदा यात्रा का कोई तैयार रास्ता नहीं होता क्योंकि प्रत्येक वर्ष नर्मदा के भीषण प्रवाह में सारे किनारे कट कर रास्तों को धो डालते हैं। नर्मदा तेज़ बहाव से कहीं किनारों को तोड़ डालती है, कहीं कँपा छोड़ जाती है, कहीं किसान कछारी खेतों को बखर कर पैदल चलना दूभर कर देते हैं, कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई के कारण कीचड़ से सने खेतों में क़दम रखने से ऐडी तक पैर गंपते हैं, कहीं नुकीली धारदार पहाड़ी पर चलना ठीक वैसा ही है जैसे खड़ी दीवार पर छिपकली जैसे पैर जमाकर खिसकना, कहीं पहाड़ी नालों की गहराई को फिसल कर पार करना। परिक्रमा पथ पर पड़ने वाले स्थानों की दूरी का किताबों में लिखी दूरियों से कोई मेल नहीं हैं। इसका कारण यह है कि इनको नाप कर नहीं अपितु अन्दाज़ से कोस, मील या किलोमीटर में बताया गया है जो कि भ्रामक है। वे किलोमीटर मील भी हो सकते हैं या कोस भी हो सकते हैं। हम आई-फ़ोन से नाप कर सही दूरियाँ लिखते गए हैं। भोजन और ठहरने की व्यवस्था का कोई ठिकाना नहीं, ऐसी विषम परिस्थितियों में नौ दिनों में 104 किलोमीटर की पदयात्रा शरीर को मरोड़ कर और मन के सारे अहंकार तोड़ कर रख देती है। इसके सामने यूथ होस्टल की ट्रैकिंग बच्चों का मन बहलाव है। इस 9 दिवसीय कमरतोड़ 163571 क़दम की यात्रा के दौरान जिन आश्रमों और उनके स्वामियों संचालकों ने आश्रय और भोजन दिया वे साधुवाद के पात्र हैं।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

भड़पुरा से झाँसीघाट: 17 अक्टूबर 2018

रात्रि विश्राम हमने भडपुरा स्थित कुटी में किया। कुटी की देखभाल एक बूढ़ी माँ माँग-ताँग कर करती है। वह आश्रम किसी बड़े किसान ने इस शर्त पर बनवा दिया था कि परिक्रमा करने वालों को भोजन मिलना चाहिए। बूढ़ी माँ वैरागी हैं, उसका बेटा नवरात्रि में दुर्गा जी की मूर्ति का पंडा बना था। झाँकी के पंडाल में रहता था। सुबह नहाने धोने भर को घर आता था। उसे ख़बर लगी तो वह देखने आया। बातचीत करके संतुष्ट हो कर चला गया। उसकी बीबी को छः लोगों के लिए रोटी सब्ज़ी बनाना था तो उसका मूड ख़राब होने से वातावरण ठीक नहीं रहा। हमने खाना बनाने में मदद की पेशकश की, जिसे निष्ठुरता से ठुकरा दिया गया। उसका 12 साल का लड़का बहुत बातूनी था। उसी के मार्फ़त बातचीत चलती रही। अंत में अपनी घरेलू चार रोटियों के बराबर एक टिक्कड नमक मिर्च में बनी आलू की सब्ज़ी के साथ एक गोल थाली में आए जैसे भीम अपनी गदा के साथ रथ में डोलता चला आ रहा हो। किसी ने दो किसी ने तीन और किसी ने चार खाए। सच हैं स्वाद भोजन में नहीं भूख में होता है। नींद न जाने टूटी खाट, भूख न जाने बासी भात। यहाँ तो न खाट थी और न भात परंतु नर्मदा  किनारा था। बाहर निकल कर नर्मदा की ओर देखा वह शांत होकर हँसिया आकार चाँद की रोशनी में निंद्रामग्न थी। लहरों की झिलमिल जो दिन में नज़र आती है वह नदारत थी।

वर्षो बाद जमीन पर और कुछ लोगों ने शायद जीवन में पहली बार गद्दे के बिना सोने का प्रयास शुरू हुआ। बिस्तर तीन तरफ़ से खुली दलहान में लगाए गए। सबसे पहले तो मच्छरों का हमला हुआ लड़के ने कचरा जलाकर धुआँ करके उनसे छुटकारा दिलाया। उसके बाद मुंशीलाल जी के पास एक कुतिया आकर सो गई। उसे डंडे से भगाया। सोने की कोशिश की तो बरगद के पेड़ पर तेज़ हलचल होने लगी। जैसे भूतों का डेरा हो। उठकर देखा तो निशाचार चमगादड़ का एक झुंड बरगद के फलों को खा रहा था। फलों के टुकड़े पट-पट नीचे गिर रहे थे। एकाध घंटा चमगादड़ देखते रहे। फिर सोने की कोशिश की तो सिर के पास कुछ आवाज़ आई। हाथ फेरा तो एक मेंढक पकड़ में आया उसे दूर फेंक दिया। सब डर गए कि मेंढक की खोज में साँप वहाँ आ सकता है। हमने सोचा छोड़ो यार शंकर भगवान गले में डाले रहते हैं। अब आएगा सो आएगा। 90% सांप ज़हरीले नहीं होते हैं और फिर जैसे हम सांप से डरते हैं उसी प्रकार वे भी आदमी से डरते हैं। अरुण दनायक जी अपनी डायरी लिखने बैठ गए। लोग पहले पानी पीते फिर पेशाब जाते रात गुज़रने की राह देखते रहे। देर रात एक झपकी लगी और सवेरा हो गया। कहीं कोई पाखाना नहीं था। खुले में हल्के हुए। कुटी की गाय का एक-एक गिलास कच्चा दूध पिया। उनको तीन सौ रुपए दान स्वरूप दिए और चल पड़े।

हम गाँव वालों से बैलों के बारे में पूछते रहे कि एक ज़माने में खेतों में, सड़कों पर और गौधुलि बेला में चर कर लौटते हुई रेहड में गायों के साथ मस्ती करते बैल और उछलते बछड़े दिखते थे, वे अब नदारत हैं। जो जानकारी मिली वह भयावह है। जब से ट्रैक्टर ट्रॉली, कल्टिवेटर, रोटावेटा, आए हैं तब से हल-बखर और बैलगाड़ी के साथ बैलों की भी विदाई हो गई लगती है। यहाँ तक तो ठीक था कि यंत्रीकरण ने मानवीय श्रम की जगह मशीनीकरण से कृषि काम आसान और उसकी गति तेज़ हो गई।

ग्रामीण लोगों से जब पूछा कि बैलों की ग़ैर-मौजूदगी में गायों के ग्यावन की क्या व्यवस्था है। ख़ुलासे चौंकाने वाले थे। गाय बैल का नैसर्गिक संसर्ग समाप्त हो गया है। भिटौनी में पशु चिकित्सालय में ख़बर देने पर वहाँ से कृत्रिम गर्भधारण करने कर्मचारी आते हैं। कृत्रिम गर्भाधान से गाय की देशी नस्ल ख़त्म हो रही है क्योंकि नर्मदा किनारे के गाँवों में बैल बूचडखानों की भेंट चढ़ चुके हैं। सरकार हरियाणा से विदेशी नस्ल का बीज लाकर गर्भाधान करवाती है। इस व्यवस्था से गाय के दूध की प्राकृतिक गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। उनके और भैंस के दूध में कोई अंतर नहीं रहा है। गाय का दूध अब हल्का पीला नहीं होता। हमने जब भडपुरा में गाय का ताज़ा दूध पिया था वह पूरी तरह सफ़ेद था। सबसे पहले तो गाय से प्राकृतिक चारा छीनकर  उन्हें खली-भूसा खिलाने लगे। उनसे खुली हवा में विचरण के साथ अब बैलों से प्राकृतिक मिलन भी छुड़ा लिया। एक मशीनी क्रिया से अनुत्तेजित अवस्था में लम्बी सीरिंज से गर्भाधान ने पशुओं से उत्साह उमंग उछलना कूदना भी छुड़ा लिया है। ऊपर से इंजेक्शन लगाकर दूध दुहने लगे। इस पूरी यात्रा में नर्मदा किनारे सिर्फ़ एक जगह गायों को बैल दिखा उनके चेहरे चमक उठे वे चारा चरना छोड़कर एकटक बैल को देखे जा रहीं थीं। भूख, नींद, आराम और प्रजनन पशुओं और मनुष्य की एकसी अनिवार्यता हैं इसीलिए मनुष्य को सामाजिक पशु माना जाता है। वह अद्भुत दृश्य तुरंत मोबाइल में क़ैद कर लिया।

हम पाँचों फिर चले और बीहड डांगर, नाले पार करते भीकमपुर पहुँचे। ऊँची घास से रास्ता नहीं सूझता था। एक भी गलत कदम कम से कम बीस फुट नींचे गिरा सकता था। और हुआ भी यही एक जगह रास्ते की खोज में दनायक जी गिरते गिरते बचे वापिस मुड उपर से मुंशीलाल पाटकार ने आवाज लगाई इधर आईये रास्ता यहाँ से है। अरुण दनायक ने सुरेश पटवा को मन ही मन कुढ़ते हुए ख़ूब गालियों से नवाज़ा कि यार इनके कहने में कहाँ फँस गए। अब कभी नहीं आएँगे। थोड़ा आराम करने के बाद बोले यार अगली यात्रा फ़रवरी में ही करेंगे।

भडपुरा के हनुमान आश्रम का तोता हमारे पहुँचते ही अपने सिर पर आकर बैठ गया। उतरने से साफ़ इंकार करता रहा। चिकनी चाँद उसे भा गई। तोता महाराज वीडियो के शौक़ीन थे। जिस देश में गंगा बहती है का “है आग हमारे सीने मे हम आग से खेला करते हैं “ गीत पर ख़ूब नाचा ससुरा। विडियो बंद करो तो चोंच मारता था। फिर लगाया “चल उड़ जा रे पंछी ये देश हुआ बेगाना” सुनकर मस्त हो गए तोता राम। काफ़ी मान-मनुअ्अल के बाद अरूण दनायक भाई के सिर को भी उपकृत किया। एक और साथी जगमोहन भाई की ज़िद पर महाराज वहाँ पहुँचे लेकिन टैक्स के रूप में चोंच मारकर ख़ून निकाल दिया। उसे काजू दिए तो उसने कुतर कर छोड़ दिए। तोता खुले में रहता था उड़ता नहीं था। पता चला कि उसे गाँजा पीसकर खिलाया गया है इसलिए उसे तलफ की आदत हो है इसलिए वह बाबाओं के पास रहता है।

धरती कछार गाँव पड़ा, वहाँ के स्कूल में दनायक जी ने बच्चों से मुलाकात में गांधी चर्चा की जिसने हमें आन्नदित किया कि गांधी जी की पहुँच समय और भौगोलिक स्थितियों की ग़ुलाम नहीं है। आंगनवाडी केन्द्र की ममता चढार की कर्तव्य परायणता से प्रफुल्लित हुए। धरती कछार से गोपाल बर्मन को कोलिता दादा का बैग रखने को साथ ले लिया। उसने बातों-बातों में बताया कि लोग भाजपा से नाराज़ हैं। ग्रामीण समाज में भी लड़कियाँ खुल कर बिना झिझक सामने आने लगीं हैं और शादियों के लिए लड़कों को निरस्त भी करने लगीं हैं। वहीं दूसरी ओर उनका यौन व्यवहार भी तेज़ी से बदल रहा है। बाय फ़्रेंड-गर्ल फ़्रेंड का कल्चर खेतों में या मेड पर विडीओ, वट्सएप, फ़ेस्बुक के माध्यम से फैल रहा है। ये मोबाइल क्रांति का असर है। अब लड़कियाँ को सेनेटरी पैड और विटामिन की गोलियाँ आंगनवाड़ी से प्रदान की जाती हैं।

आश्रम से चले तो आधा घण्टे में एक बड़े नाले से साबका पड़ा। सौ फ़ुट चढ़ाई चढ़ कर फिर नीचे उतर नाला पार किया, फिर चढ़ाई चढ़कर ऊपर पहुँचे तो पहाड़ी के सामने एक और नाला दिखा। भूगोल का दिमाग़ लगाया तो देखा कि एक ही नाला सांप की कुंडली की तरह चारों तरफ़ घुमा हुआ है। चार-पाँच बार पहाड़ियाँ चढ़-उतर कर नाला पार करना होगा लोगों का दम निकल जाएगा। निर्णय लिया कि दाहिनी तरफ़ नर्मदा में उतर जाएँ वहाँ से किनारे-किनारे झाँसीघाट की तरफ़ बढ़ेंगे। आगे बढ़े तो एक सौ फ़ुट ऊँची खाई का मुँह नाले में खुल रहा था। वह नाला नर्मदा में मिल रहा था। उतरने को कहीं कोई रास्ता नहीं था। हम (सुरेश पटवा) और कोलिता दादा आगे थे बाक़ी तीन पीछे भटक गए। कोलिता दादा को पीछे करके हम बैठ कर सौ फ़ुट खाई में स्कीइंग करके नाले के किनारे से नर्मदा की गोद में पहुँच गए। उन्होंने कोलिता दादा को भी इसी तरह स्कीइंग करके उतारा। तब तक बाक़ी लोग ऊपर आ गए थे वे चिल्ला रहे थे कि रास्ता कहाँ है। उनको तरीक़ा बताया तो वे आगे बढ़ने को तैयार न थे। लेकिन कोई रास्ता था भी नहीं। आधे घंटे की मशक़्क़त के बाद सब लोग नीचे आ गए। वहाँ से विक्रमपुर का रेल पुल अब स्पस्ट दिख रहा था और झाँसीघाट का सड़क पुल धुंधला सा नज़र आ रहा था।

ग्वारीघाट से लगभग पचास किमी दूर जबलपुर और नरसिंघपुर की सीमा पर स्थित भीकमपुर गाँव है। नर्मदा दाहिनी तट की ओर शान्त सी बहती है उधर बाँए तट से सनेर नदी अथाह जलराशि लिये आगे बढती है। ऐसा लगता है नर्मदा बडी विनम्रता से सनेर की भेंट की हुई जलराशि वैसे ही स्वीकारती है जैसे भिषुणी भिक्षा ग्रहण करती है और फिर अगले घाट की ओर चली जाती है। सनेर सदानीरा है,इसका जल स्वच्छ है और इसे लोग सनीर भी कहते हैं। सनेर नदी का उदगम सतपुडा के पहाड से होता है। इसका उदगम स्थल लखनादौन जिला सिवनी स्थित नागटोरिया रय्यत है। यह बारहमासी नदी धनककडी, नागन देवरी, दरगडा, सूखाभारत आदि गावों से गुजरते हुये संगम स्थल भीकमपुर पहुँचती है। कोलूघाट तट पर सिवनी जिले के आदिवासियों का मेला भरता है तो संगम तट भीकमपुर में जबलपुर व नरसिंहपुर जिले के लोग शिवरात्रि आदि पर्वो पर एकत्रित होते हैं।

नर्मदा परिक्रमा का पहला खंड योजना अनुसार पूरा होने को आ रहा था। सुबह से खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के भरोसे चले आ रहे थे। मंज़िल सामने देखकर भूखी देहों में अजीब सा शक्ति संचार होने लगा। नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लिया फिर दो घंटे में विक्रमपुर के रेल्वे पुलों के नीचे से निकल झाँसीघाट पहुँच गए। नहाया धोया नर्मदा जी को प्रणाम करके झोतेश्वर धर्मशाला पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ३६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

बिजना घाट से भड़पुरा: 16 अक्टूबर 2018

सुबह जल्दी ही अगली यात्रा पर निकल लिए। पहले नदी के कछार में से ही चलते रहे। मुरकटिया घाट से नर्मदा का पहले बाई फिर दाई ओर मुडना देखा, उन दीर्घ चट्टानों को देखा जिन्हे नर्मदा मानो अपने साथ बहा कर लाई हो और फिर किनारे लगा दिया।हमें यहाँ नर्मदा का एक स्वरूप और दिखा बीच नदी पर स्थित गुफाओं का निर्माण मानो नर्मदा ने चट्टानो पर अपनी लहरिया छैनी हथौडी चलाकर गुफायें बना डाली हैं। आगे चले दुर्गम तो नहीं पर कठिन मार्ग कहीं नर्मदा के तीरे-तीरे तो कहीं बीहड डांगर पार करते हम बढते रहे।

अचानक रास्ते में एक नाला आ गया। किसानों से पूछा तो उन्होंने ऊपर से नाला पार करने को बताया। हम सीधी चढ़ाई चढ़ने लगे। रास्ता बिलकुल भी नहीं था खेतों में कँटीली झड़ियाँ थीं। एक कोने से हरी घास में से रास्ता टटोला तो मिल गया। नाला पार करके डाँगर के उतार-चढ़ाव से लोग भारी थकने लगे। नाले की ठंडाई में थोड़े समय आराम किया। आगे जाकर एक महाराज मिल गए।

उनसे चार पुरुषार्थ की चर्चा चल पड़ी। हिंदू धर्म में चार पुरुषार्थ की बड़ी महिमा गाई जाती है, धर्म अर्थ काम मोक्ष। कोई भी मनुष्य जब कोई काम करता है तो इनमे से किसी एक या एकाधिक पुरुषार्थ की प्रेरणा से कर्म करता है। एक साधु से जब हमने इस बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि वे तो सब छोड़ चुके हैं। हरि ओम्।

हमने पूछा कि आदमी प्रकृतिजन्य चीज़ों जैसे भोजन करना, साँस लेना और निस्तार करना छोड़ सकता है क्या?

वे बोले प्रकृतिजन्य चीज़ें कभी छूटती हैं क्या? ये तो ज़िंदगी के साथ ही छूटेंगीं, बच्चा।

हमने कहा कि चार पुरुषार्थ में अर्थ, धर्म और मोक्ष मानव निर्मित अवधारणा या सिद्धांत हैं जबकि काम प्रकृतिजन्य है, उसकी माया जीव-जंतु पेड़-पौधों सब में दिखती है। उसे अनंग याने  बिना अंग का भी कहा गया है। वह पकड़ में ही नहीं आता तो कैसे छूट सकता है। वे बग़लें झाँकने लगे, कुछ सोचते रहे। फिर बोले सब भगवान की माया है। माया ही तो नहीं छूटती, बड़ी हठीली होती है।

हम अर्थ पर आ गए। पूछा अर्थ छूटता है क्या? वे सचेत हो चुके थे, वे मौन सोचते रहे। फिर पूछा हमारा अर्थ से क्या आशय है।

हमने कहा धन जिससे हम ख़रीदारी करते हैं। धन कमाया जाय या दान में मिले उसकी प्रकृति खरदीने की होती है। जहाँ ख़रीद-बेंच आई तो व्यापार शुरू और व्यापार आया तो लालच तो आना ही है। लालच आया तो चैन गया। धन सारा सुख और आराम दिला सकता है। जैसे आपके आश्रम को चलायमान रखने के लिए धन की ज़रूरत होती है।

वे बोले बिना अर्थ के तो कुछ सम्भव ही नहीं है। काम और अर्थ का निपटारा करके हम धर्म और मोक्ष पर आए कि धर्म और मोक्ष कहीं परिभाषित नहीं हैं। धर्म वह है जिसे जीव धारण करता है अतः सबके धर्म अलग-अलग हुए फिर वे अलग धर्म सामूहिक रूप से सब लोगों पर एक से कैसे लागू हो सकते हैं, वे चुप रहे।

मोक्ष गूँगे का गुड बताया जाता है जिसे जीते जी मिला वह बता नहीं सकता कि मोक्ष की क्या प्रकृति है। जैसे महावीर या बुद्ध ने अपने मोक्ष को कभी नहीं बताया। मोक्ष कैसे मिलेगा, यह बताया है। उनके शिष्यों ने बताया कि उन्हें मोक्ष प्राप्त हो गया। जिसे मरने पर मोक्ष मिला वह मोक्ष की प्रकृति बताने हेतु मरने के बाद वापस आ नहीं सकता।

हम अपरिभाषित मूल्यों के दिखावे में जीने वाले समाज हैं। कहते कुछ हैं, मानते कुछ हैं, करते कुछ हैं। इसी को आडंबर या पाखण्ड कहते हैं। पश्चिमी सभ्यता के लोग काम और अर्थ को खुलकर जीते हैं। धर्म और मोक्ष से उन्हें कुछ मतलब नहीं है। इसलिए उन्हें कुछ छुपाना नहीं पड़ता है। हमारा समाज भी अब काम और अर्थ को जी भरकर जी रहा है। उपभोग से अर्थ व्यवस्था का विकास होता है, रोज़गार पैदा होते हैं।

साधु जी मुस्कराए और गले लगाकर पीछा छुड़ाया। चिलम को ब्रह्मान्ध्र तक खींच काम की प्राकृतिक महिमा और मानव जनित धर्म, अर्थ और मोक्ष की अंतरधारा में विलीन हो गए। हम आगे की यात्रा पर निकल गए।

फिर नशा धर्म का या नशे का धर्म निभाते साधु मिले। आँखों के लाल डोरे उनके अफ़ीमची और गाँजे की चिलम खींचने की कहानी कह रहे थे। उन्होंने तुलसी जी की चौपाई सुनाई।

जड़-चेतन गुण-दोष मय विश्व कीन्ह करतार

संत हंस गुण पय लहहिं छोड़ वारि विकार।

साधुओं से रुद्र शिव शंकर चर्चा और तत्व ज्ञान की मीमांसा पश्चात औघड़ बाबा के साथ गाँजा चिलम सुट्टा खींचा और आशीर्वाद का आदान प्रदान हुआ। शाम को पाँच बजे भड़पुरा पहुँच गए।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ३५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

भेड़ाघाट से बिजना घाट: 15 अक्टूबर 2018

एक दिन पहले, जैसे ही हम तिलवारा घाट के पुल पर जाकर खड़े हुए, वहाँ पान की दुकान वाले ने बताया कि नर्मदा के किनारे से रास्ता बहुत दलदली है। आप लोगों को घूँसोर होते हुए सिवनी गाँव से होकर लम्हेंटा पहुँचना होगा। हमने उससे आगे की जानकारी ली। जबलपुर और आसपास में दूधिया कत्था और मलाईदार चूना का जैसा ज़ायक़ेदार बीड़ा मिलता है वैसा कहीं नहीं मिलता सिवाय बनारस के अतः हमने एक मीठा पत्ता पान चटनी, चमन-बहार, लोंग, इलायची, पिपरमिंट का बनवा कर मुँह में दबाया और निकल पड़े। हम घूँसोर गाँव पहुँचे वहाँ पहले घर में पीने को पानी माँगा तो वे पानी देने में हिचकिचा रहे थे। हमने कहा हम छुआछूत नहीं मानते। आप साफ़-सफ़ाई से रहते हो बस यही हमारे लिए काफ़ी है। वे सतनामी समाज के थे। यह सतनामी समाज नर्मदा घाटी में कब, कैसे और कहाँ से आया। नर्मदा के उस पार दक्षिण के गाँवो में सतनामी समाज की सघन वसाहट है। जबलपुर जिले में नर्मदा के दक्षिण तट की तरफ़ बसे गाँवों में सतनामी बसे हैं।

 जब भारत में ग्यारहवीं सदी से मुस्लिम तेग़ की ख़ूनी ख़ूँख़ार आँधी चली तब हिमालय की तराई, दक्षिण के पथरीले पहाड़ और सतपुड़ा-विंध्याचल में नर्मदा के दोनों तरफ़ दो सौ किलोमीटर चौड़ी और एक हज़ार किलोमीटर लम्बी घाटी हिंदुओं के लिए सुरक्षित अभयारण्य बन गई। जहाँ भी इस्लामी सुल्तान या बादशाह का अत्याचारी दबाव पड़ता था वहाँ के रघुवंशी, गूज़र, लोधी, कुर्सी, कलार, काछी, सतनामी और उनके साथ लगे-लगे ब्राह्मण, चमार, बँसोड, भंगी नर्मदा घाटी की गोद में आकर बस जाते थे। सघन जंगलों से पूरी तरह ढँकी रहने वाली घाटी आबाद होने लगी थी। अंग्रेज़ों द्वारा रेल लाइन बिछाने के पहले तक नर्मदा घाटी में पहुँच दुरूह हुआ करती थी।

1672 में वर्तमान हरियाणा के नारनौल नामक स्थान पर साध बीरभान और जोगीदास नामक दो भाइयों ने सतनामी साध मत का प्रचार किया था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार चोपड़ा, पुरी और श्रीदास ने मैकमिलन कम्पनी द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘ए सोसल कल्चरल एंड इकोनामिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ के भाग तीन में लिखा है। “18वीं शताब्दी में अवध के बाबा जगजीवनदास ने एक अलग धार्मिक पंथ बनाया जो कि सत्य और ज्ञान पर विश्वास करने वाला सतनाम पंथ कहलाया।”

इस पंथ के लोग उत्तरी भारत में विस्तृत रूप से फैले थे।  औरंगज़ेब के शासनकाल में कट्टर नीतियों के चलते सिक्ख, जाट, मराठों के साथ-साथ सतनामी लोगों ने भी विद्रोह का परचम लहराया था। इस सम्प्रदाय के गुरू घासीदास माने जाते हैं। जो मध्य युगीन सतनामी समाज में विश्वास और उपासना विधि को जीवित रखना चाहते थे तथा उनमें अभिनव चेतना लाने की आकांक्षा रखते थे। उन्होंने प्रचारित किया कि वास्तविक भगवान कर्मकांड में निहित नहीं है सतनाम ध्यान में प्रकट होते हैं। उन्होंने अक्षर ब्रह्म का शब्द देकर ध्यान लगाने और निर्गुण ईश्वर के भजन गाने की प्रणाली सतनामी समाज में विकसित की थी। ईश्वर की नजर में सभी समान हैं। इसलिये मानव समाज में कोई भेद नहीं होना चाहिये जैसा कि जाति प्रथा से भेदभाव परिलक्षित होता है। छतीसगढ में सतनाम आंदोलन पिछड़े, निम्न और अछूत समझे जाने वाले वर्गो में धार्मिक और सामाजिक चेतना लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। यह कबीर, नानक, दादू पंथ की कड़ी को मानने वाले हैं।

सतनामी मत के अनुयायी किसी भी मनुष्य के सामने नहीं झुकने के सिद्धांत का पालन करते हैं। एक सतनामी किसान ने तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगजेब के कारिंदे को झुक कर सलाम नहीं किया तो उसने इसको अपना अपमान मानते हुए उस पर लाठी से प्रहार किया जिसके प्रत्युत्तर में उस सतनामी ने मुग़ल कारिन्दे को लाठी से पीट दिया। यह विवाद यहीं खत्म न होकर तूल पकड गया और एक बड़े संघर्ष में बदल गया। धीरे धीरे मुगल बादशाह औरंगजेब तक पहुँच गया कि सतनामियों ने बगावत कर दी है। यहीं से औरंगजेव और सतनामियों का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। जिसका नेतृत्व सतनामी साध बीरभान और साध जोगीदास ने किया था। यूद्ध कई दिनों तक चला जिसमें सशक्त शाही फौज निहत्थे सतनामी समूह से मात खाती चली जा रही थी। शाही फौज में ये बात फैल गई कि सतनामी कोई जादू टोना करके शाही फौज को हरा रहे हैं। इसके लिये औरंगजेब ने अपने फौजियों को कुरान की आयतें लिखे तावीज भी बंधवाए थे लेकिन इसके बावजूद कोई फ़र्क़ नहीं पडा था। उन्हें ये पता नहीं था कि सतनामी साधों के पास आत्मदान करने वाले भक्तों की शक्ति के कारण यह स्थिति थी।

सतनामी संघर्ष को मुग़लों द्वारा बेरहमी से  कुचलने की प्रक्रिया में बचे-खुचे सतनामी अपनी जान बचा कर अलग अलग दिशाओं में भाग निकले थे। जिनमें घासीदास के पूर्वजों का भी एक परिवार रहा जो कि महानदी के किनारे-किनारे वर्तमान छत्तीसगढ तक जा पहुचा था। जहाँ पर संत घासीदास जी का जन्म हुआ औऱ वहाँ पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रचार-प्रसार किया। वे गिरौदपुरी तहसील बलौदाबाजार जिला रायपुर में पिता महंगुदास जी एवं माता अमरौतिन के यहाँ पैदा  हुये थे। गुरूजी को सतनाम पंथ सतनाम धर्म जिसे आम बोल चाल में सतनामी पंथ के प्रवर्तक कहा जाता है। उन्होंने अपने समय की सामाजिक आर्थिक विषमता, शोषण तथा जातिभेद को समाप्त करके मानव-मानव एक समान का संदेश दिया। गुरू घासीदास का जन्म 1756 में रायपुर जिले के गिरौदपुरी में एक गरीब और साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने हिन्दु धर्म की कुरीतियों पर कुठाराघात किया था। ब्राम्हणों और मन्दिर के पुजारियों द्वारा हिन्दुओं के धार्मिक शोषण का विरोध करने का यही मार्ग उनको सूझा था। जिसका असर आज तक दिखाई पड रहा है। उनकी जयंती हर साल पूरे छत्तीसगढ़ में 18 दिसम्बर को मनाई जाती है। बिलासपुर के विश्वविद्यालय का नाम गुरु घासीदास विश्वविद्यालय है। सतनामियों के घरों से चाय-पानी प्रसाद पाकर आगे बढ़ते जा रहे थे।

भेड़ाघाट से बिजना घाट की यात्रा सबसे लम्बी थकाऊ और उबाऊ थी। पहले हमने तय किया था कि रामघाट में रुककर रात गुज़ारेंगे। मंगल सिंघ परिहार जी वहाँ से चार किलोमीटर आगे रास्ता देख रहे थे। सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। खजूर, मूँगफली दाने और चने व पानी के दम पर सभी को खींचे जा रहे थे। चार घण्टे पैदल चल चुके थे। दोपहर में तेज़ धूप में चलने से शरीर का ग्लूकोस जल जाता है और हवा में ऑक्सिजन भी कम हो जाती है। मांसपेशियाँ जल्दी थकने लगतीं हैं और साँस फूलने लगती है। दो बजे के बाद सूर्य की किरणे सामने से परेशान करने लगती है। ऐसे माहौल में नदी किनारे रास्ता भी नहीं था। बर्मन लोगों ने नदी के कछार को हल चलाकर मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले में बदल दिया था। खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं था। साथियों को बाटी-भर्ता का लालच देकर खींचे जा रहे थे, जबकि भोजन का कहीं कोई ठिकाना नहीं था। उधर दनायक जी को परिहार जी मोबाइल से जल्दी पहुँचने को कह रहे थे। सब थक कर चूर थे। ऐसे में दल को खींच कर आगे ले जाना ज़रूरी था।

मंगल सिंग परिहार बहुत पुराने परिचित सहकर्मी रहे हैं। उन्होंने दिन के ग्यारह बसे से, जब हम भेड़ाघाट से चले ही थे, तब से बिजना गाँव से नर्मदा पार करके मुरकटिया घाट आकर मोबाईल से सम्पर्क साध कर हमारी स्थिति लेना शुरू कर दिया। वे हर आधा घंटे में दनायक जी को मोबाईल से सम्पर्क साध कर स्थिति पूछते जा रहे थे। कभी मोबाईल लगता था और कभी नहीं लगता था। हम लोग रामघाट से सड़क छोड़ नर्मदा किनारे आ गए, वहाँ से अत्यंत दुरुह यात्रा शुरू हुई। छोटी नदी, नाले, झरने, सघन हरियाली और ताज़े गोंड़े गए खेतों की मिट्टी के बड़े-बड़े ढेलों के बीच से घुटनों और ऐडियों की परीक्षा का समय था क्योंकि कहीं भी समतल ज़मीन नहीं थी। आगे छोटी पहाड़ियों का जमघट एक के बाद एक घाटियाँ का सिलसिला जिनको स्थानीय बोली में ड़ांगर कहते हैं। चम्बल में जैसे बीहड़ होते हैं जिनमे कँटीले पेड़-पौधे होते हैं वैसे नर्मदा के आजु-बाजु ड़ांगर का साम्राज्य है उनके बीच से पानी झिर कर जंगली नालों को आकार देते हैं। उनको पार करने के लिए ऊपर चढ़ाई चढ़ना फिर उतरना फिर चढ़ना। यात्रियों का दम निकलने लगता है। पसीने से तरबतर शरीर में पूरी साँस धौंकनी के साथ भरकर पहाड़ियों को पार करने के बीच में नर्मदा दर्शन से हिम्मत बनती टूटती रहती है। चार बजे हाल-बेहाल और निढ़ाल-पस्त हालत में बिजना घाट के सामने वाले मुरकटिया घाट पर मंगल सिंघ परमार बिस्कुट और केले फल के साथ स्वागत आतुर मिले। वहाँ उनकी सिकमी ज़मीन थी। उसी पर खड़े थे। बैठने को कोई छायादार जगह नहीं थी। यात्री बिस्कुट और केलों को क्षणभर में चट कर गए। नाव से नर्मदा पार करके दूसरी पार उतरे वहाँ एक बर्मन दादा पूड़ी और खीर का भंडारा करा रहे थे। यात्रियों ने भंडारा खाया। ख़ूब पानी पिया तो कुम्लाए चेहरों की रंगत और ढीले शरीरों में जान लौटने लगी।

15 अक्टूबर को मंगल सिंग परिहार के आश्रम नुमा फ़ार्म हाऊस में विश्राम का अवसर मिला। मंगल सिंघ परिहार ने प्राकृतिक छटाओं में बसा अपना आश्रम दिखाया। जिसमें पारिजात और रुद्राक्ष के वृक्ष लगे हैं। सूर्यास्त का दृश्य अत्यंत सुंदर नज़र आता है। उन्होंने बताया कि उनके पूर्वज नागौद रियासत के राजा रहे हैं। परमार, परिहार, बुंदेले और बघेल सब गहडवाल राजपूत हैं। परमारों ने महोबा, परिहारों ने नागौद, बुन्देलों ने छतरपुर और बघेलों ने रीवा रियासत स्थापित की थी। ये सब पहले अजमेर के पृथ्वीराज़ चौहान या कन्नौज के जयचंद राज्यों के सरदार थे। 1091-92 में मुहम्मद गोरी के हाथों अजमेर, दिल्ली और कन्नौज हारने के बाद इन्होंने इन राज्यों को स्थापित किया था। नागौद कभी स्वतंत्र राज्य और कभी रीवा के बघेलों का करद राज्य हुआ करता था। उसके उत्तर-पश्चिम में केन नदी का अत्यंत ऊपजाऊ कछारी भाग था लेकिन दक्षिण-पूर्व में पथरीली ज़मीन थी। अतः राजपूतों ने नर्मदा के कछारी मे बसने का निर्णय लिया था।

अंग्रेज़ों ने 1861 में जबलपुर को राजधानी बनाकर सेंट्रल प्रोविंस राज्य बनाया तो रीवा, ग्वालियर, इंदौर, भोपाल रियासत छोड़कर मध्य प्रांत के नागौद  सहित बाक़ी सब इलाक़े उसमें रख दिए। तब ही नर्मदा घाटी का सर्वे करके जबलपुर की सीमा नर्मदा के दक्षिण में चरगवाँ-बरगी तक निर्धारित कर दी। परिहारों को ज़मींदारी में मगरमुहां का इलाक़ा दिया गया। कई परिहार सौ-सौ एकड़ के ज़मींदार बनकर आज के पाटन और शाहपुरा इलाक़े में आ बसे। उनमें मंगल सिंघ परिहार के पूर्वज भी थे। मंगल सिंघ के पिताजी मुल्लुसिंघ परमार निरक्षर थे परंतु उन्होंने अपने आठ बेटों को पोस्ट-ग्रेजुएट कराया।

मंगल सिंघ जी से देर रात तक बातें होतीं रहीं। वे हमें एक वेदान्ती साधु के दरबार में ले गए। हमसे कहा कि साधु जी वेदों के प्रकांड विद्वान हैं। आप उनसे गूढ़ प्रश्न कीजिए तब उनकी ज्ञान गंगा बहने लगेगी। हम लोग उनके दरबार मे पहुँचे पाँव-ज़ुहार होने के बाद बातचीत चली तो मौक़ा देखकर हमने एक सवाल का तीर चलाया कि हमारी जानने कि इच्छा है कि महाराज रुद्र और शिव का अंतर बताएँ, तो बड़ी कृपा होगी। स्वामी जी ने थोड़ा इधर-उधर घुमाया। फिर विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया कि प्रश्न गूढ़ है और उनका ज्ञान वेदों तक ही सीमित है उन्होंने पुराण नहीं पढ़े हैं। वे नेपाल से नर्मदा की गोद में आकर बस गए हैं। नर्मदा परिक्रमा कर चुके हैं। वापस आकर परिहार जी ने शिमला मिर्च की साग-रोटी और दाल-चावल का बढ़िया भोजन कराया। उसके बाद बातों का सिलसिला चल पड़ा। परिहार जी की बातें सुनते रहे। उनकी बातों के क्रम को बीच में बोलकर तोड़ना उनके रुतबे को कम करने जैसा होता है यह बात हम जानते थे परंतु अन्य लोगों को नहीं पता था। एक सहयात्री ने टोकने की कोशिश कि तो हमने उसे चुपके से समझा दिया कि भैया:-

बंभना जाय खाय पीय से

   क्षत्री जाय बतियाय

       लाला जाय लेय-देय से

           शूद्र जाय लतियाय।

इस बुंदेलखंड की कहावत को गाँठ बाँध लो और क्षत्री की बातें चुपचाप सुनो। सुबह दो-दो रोटियाँ तोड़कर आश्रम से फिर नर्मदा की गोद मे पहुँच गए। इस प्रकार 13, 14 और 15 अक्टूबर की यात्रा पूरी हुई। यहाँ से हमारे एक और साथी प्रयास जोशी ने हमसे विदा ली।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासी ☆ उत्तराखंडमधील एक निसर्गरम्य प्रवास… भाग- ५ ☆ श्री विश्वास विष्णु देशपांडे ☆

श्री विश्वास विष्णु देशपांडे

✈️ मी प्रवासी ✈️

☆ उत्तराखंडमधील एक निसर्गरम्य प्रवास… भाग- ५ ☆ श्री विश्वास विष्णु देशपांडे

आजचा आमच्या सहलीचा सहावा आणि अखेरचा दिवस. आज सकाळीच जिम कॉर्बेटच्या सफारीसाठी निघायचे होते. सकाळी साडेचारलाच उठलो. तयार होऊन बसमध्ये बसलो. जिम कॉर्बेट अभयारण्यापासून आमचे हॉटेल साधारण दहा किमी लांब होते. बरोबर पाच साडेपाचच्या सुमाराला जिम कॉर्बेटच्या धनगरी गेटजवळ पोहोचलो. तिथे सफारी जीप्स तयारच होत्या. तेथील अधिकाऱ्यांनी आमची आधार कार्ड्स ओळखीसाठी मागितली. जिम कॉर्बेट पार्कमध्ये मोबाईल नेण्यास बंदी घातली आहे. त्यामुळे मोबाईल गेटजवळ असलेल्या लॉकर्समध्ये जमा करावा लागतो. सफारी संपल्यावर आपल्याला तो परत मिळतो. वनाधिकाऱ्यांच्या परवानगीने कॅमेरा नेता येतो.

जिम कॉर्बेट हा भारतातील सर्वात जुना आणि पहिला व्याघ्रप्रकल्प आहे. इंग्रज वंशीय भारतीय शिकारी जिम कॉर्बेट यांचे नाव या अभयारण्याला देण्यात आले आहे. नामशेष होत चाललेल्या बंगाली वाघांचे संरक्षण करणे हा या पार्कचा प्रमुख उद्देश होता. त्यामुळे या प्रकल्पात वाघ हे पर्यटकांचे प्रमुख आकर्षण असतेच. आजमितीला जवळपास दोनशे पन्नास वाघ या अभयारण्यात आहेत अशी माहिती आमच्या गाईडने दिली. त्याशिवाय हत्ती, अस्वले, विविध वन्य प्राणी, पक्षी आणि वनस्पतींच्या विविध प्रजातींनी हे जंगल समृद्ध आहे.

जिम कॉर्बेटमध्ये जाण्यासाठी अनेक प्रवेशद्वारे आहेत. धनगरी किंवा धनगडी या प्रमुख गेटवरून आम्ही जीप सफारी घेतली. एका जीप सफारीसाठी साधारणपणे ७५०० रू एवढे शुल्क आकारले जाते. एका जीपमध्ये सहा व्यक्तींना परवानगी आहे. या जीप्स उघड्या असतात. त्यामुळे जंगलाचे सौंदर्य मनसोक्त पाहता येते. उन्हाळ्याच्या दिवसात सकाळी साडेपाच ते साडेआठ किंवा सहा ते नऊ वाजेपर्यंत या जंगल सफारी चालतात. संध्याकाळी तीन ते सहा अशी साधारण वेळ असते. उन्हाळा किंवा हिवाळा या ऋतूंप्रमाणे वेळा थोड्या बदलतात.

गेटवरील सर्व सोपस्कार आटोपून आमची जीप सफारी ढिकला क्षेत्रात जाण्यासाठी निघाली. सकाळची वेळ होती. प्रसन्न वातावरण होते. वातावरणात सुखद गारवा होता. गाडी लवकरच घनदाट जंगलात शिरली. रस्ते कच्चे आणि खडकाळ होते. पण सकाळच्या वेळी जंगलातील वातावरण पाहून मन अगदी हरखून गेले. इतके सुंदर जंगल एवढया सकाळी कधी पाहिले नव्हते. सकाळबरोबरच जंगलातील वातावरणही जणू उमलतं. एक नवी कोरी सकाळ तुम्हाला बघायला मिळते. जंगलातील झाडांचा गंध काही वेगळाच असतो. आपल्या रोजच्या शहरी वातावरणात हा गंध आपल्याला कधी अनुभवायला मिळत नाही. हवा अतिशय शुद्ध होती. ही हवा मी मनसोक्त फुफ्फुसात भरून घेत होतो. थोडेसे अंतर पुढे गेल्यानंतर आम्हाला हरणांचे कळप दृष्टीस पडले. आता या जंगलातील प्राण्यांना बहुधा माणसांची सवय झाली असावी. त्यामुळे जीप पाहूनही त्यांना काही फरक पडला नाही. ते आपले मजेत चरत होते. माकडांच्या टोळ्याही ठिकठिकाणी होत्या. विविध रंगीबेरंगी पक्षी आपल्या मधुर आवाजाने सकाळची भूपाळी गात होते. आणखी काही अंतर पुढे गेल्यानंतर पूर्ण पिसारा फुललेले मोर दृष्टीस पडले. जंगलात मधून मधून मुंग्यांच्या वारुळासारखी घरे दृष्टीस पडत होती. परंतु ती वाळवीची घरे आहेत असे आमच्या गाईडने सांगितले. ही घरे फारच सफाईदार पद्धतीने बांधलेली असते. त्यात अगदी शेवटपर्यंत हवा खेळती राहते. त्यामुळे या छोट्या जीवाचे कौतुक वाटल्याशिवाय राहत नाही. वाळवीचे आणखी एक वैशिष्ट्य गाईडने सांगितले की ती हिरव्या किंवा जिवंत झाडाला कधीच लागत नाही. वाळलेले लाकूड हे तिचे खाद्य! त्यामुळे लाकडाचे लवकर विघटन होऊन पर्यावरणात ते मिसळून जाते. अशा रीतीने वाळवी पर्यावरणासाठी सहायक ठरते.

या अभयारण्यात प्राण्यांसाठी ठिकठिकाणी पाण्याचे नैसर्गिक स्रोत आहेत. अशाच एका नाल्यात आम्हाला एक झाड पडलेले दिसले. त्या झाडाच्या एका फांदीलगत एक घोरपड दृष्टीस पडली. मध्येच रानडुकरांच्या काही टोळ्या आमच्यासमोरून गेल्या. भव्य अशा गरुड पक्ष्याचे दोन तीन वेळा दर्शन घडले. हा सरपन्ट ईगल आहे अशी माहिती आम्हाला मिळाली. जंगल नैसर्गिक आणि स्वच्छ राहण्यात इथले वनाधिकारी, गाईड आदी लोक महत्वाची भूमिका बजावतात. आपल्याजवळील खाद्यपदार्थांचे वेष्टन, कागद, प्लॅस्टिकच्या पिशव्या आदी गोष्टी ते जंगलात टाकू देत नाहीत. प्राण्यांना माणसांपासून कमीत कमी त्रास किंवा उपद्रव व्हावा याची काळजी ते घेतात.

जंगल सफारीचा वेळ आता संपत आला होता. बरेच फिरल्यावर देखील आम्हाला वाघ किंवा हत्ती वगैरे दिसले नाहीत. आमचा गाईड म्हणाला की वाघ दिसणे हा नशिबाचा भाग आहे. आमच्यातील काही मंडळी वाघ दिसला नाही म्हणून जरा नाराज झाली होती. पण मी त्याबद्दल फार काही वाटून घेतले नाही. याची दोन कारणे होती. एक म्हणजे वाघाचे दिसणे जरा दुर्मिळ आणि नशिबाचा भाग आहे हे मी जाणून होतो. आणि चंद्रपूरजवळील ताडोबाच्या अभयारण्यात मी वाघांना गाडीजवळून जाताना पाहिले होते. दुसरी गोष्ट म्हणजे मी केवळ वाघ पाहण्याच्या उद्देशाने गेलो नव्हतो. पहाटेच्या वेळी जंगल पाहणे आणि अनुभवणे हा माझा उद्देश होता. तो सफल झाला होता. जंगल पाहून मी ताजातवाना झालो होतो.

सफारीनंतर आम्ही हॉटेलवर परतलो. फ्रेश होऊन नाश्ता घेतला. थोडा आराम केला. परत धनगरी कॉर्बेट म्युझियम पाहण्यासाठी निघालो. जिम कॉर्बेट अभयारण्यातील वन्यजीवांची माहिती, मगर, वाघ, सांबर, हत्ती आदींचे जतन केलेले अवशेष इथे बघायला मिळतात. वन्य जीवांची माहिती आणि जिम कॉर्बेट अभयारण्याचा इतिहास या ठिकाणी आपल्याला जाणून घेता येतो. याच ठिकाणी एक सुवेनिर शॉप आहे. तिथे जिम कॉर्बेटबद्दल आणि वन्य जीवांबद्दल माहिती देणारी पुस्तके, हस्तकलेच्या माध्यमातून तयार केलेल्या विविध वस्तू आपण खरेदी करू शकतो.

दुपारी जेवणासाठी आम्ही पुन्हा हॉटेलवर परतलो. सुग्रास भोजनाचा आस्वाद घ्यायला मिळाला. विविध खाद्यपदार्थांची रेलचेल होती. जेवणानंतर थोड्या वेळाने आम्ही पुन्हा जिम कॉर्बेट यांचे निवासस्थान असलेल्या काळाढुंगी येथे गेलो. आपल्याला कल्पना असेल की जिम कॉर्बेट हे इंग्रज वंशाचे पण भारतीय शिकारी होते. ते केवळ शिकारी नव्हते तर वन्यजीवांचे अभ्यासक, एक उत्तम लेखकही आणि संशोधकही होते. त्यांनी ज्या शिकारी केल्या त्या केवळ नरभक्षक वाघांच्या केल्या. त्यांच्या या निवासस्थानाचे रूपांतर आता संग्रहालयात करण्यात आले आहे. इथे जिम कॉर्बेट यांच्या दैनंदिन वापरातील वस्तू, चित्रे, पेंटिंग्ज, त्यांची हस्तलिखिते आदी गोष्टी पाहता येतात. १९२२ मध्ये बांधलेला त्यांचा हा बंगला सुस्थितीत जतन करण्यात आला आहे. बंगल्याचा परिसर विशाल आणि निसर्गरम्य आहे.

आजचा आमच्या सहलीचा हा अखेरचा दिवस होता. रात्री आम्ही याच द बनियन रिट्रीट या हॉटेलमध्ये विश्रांती घेतली. सकाळी नाश्ता करून आमचा परतीचा प्रवास सुरु झाला. बसने दिवसभर प्रवास करून आम्ही संध्याकाळी दिल्लीला पोहोचलो आणि पहाटेच्या सुमारास पुण्यात विमानाने परत आलो. आमच्यासोबत आमच्या सामानासोबतच होत्या या सहलीच्या साऱ्या रम्य आठवणी.

 – समाप्त –  

©️ श्री विश्वास विष्णु देशपांडे 

चाळीसगाव.

 प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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