हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भोपाल से गोवा यात्रा- १ – भाग- ५२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – भोपाल से गोवा यात्रा- १ – भाग- ५२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

  1. भोपाल से गोवा यात्रा

मचलती लहरों का लास्य

एक नज़दीकी मित्र विगत कुछ दिनों से गोवा में प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत रहे हैं। वे बहुत दिनों से गोवा घूमने के लिए बुला रहे हैं। हम भोपाल में व्यस्तताओं के कारण नहीं जा पा रहे थे। बीस से छब्बीस जनवरी 2022 तक फ़ुरसत का समय था। श्रीमती को बैंक से छुट्टियाँ नहीं मिलीं इसलिए सौम्या बिटिया के साथ गोवा की पाँच दिवसीय यात्रा पर 19 जनवरी 2022 को मंगला एक्सप्रेस से गोवा के लिए निकल लिए।

पर्यटन को मौजमस्ती समझने वालों की इस दुनिया में कमी नहीं है। अकसर गोवा का नाम आते ही शराब याने नशा, सर्फ़ याने समुद्री लहर, सैंड याने रेतीला किनारा और सेक्स याने रंगीन रातों का मज़ा सैलानियों के दिलोदिमाग़ में घूमने लगता है। लेकिन पर्यटन केवल मौजमस्ती नहीं है। हाँ, मौजमस्ती पर्यटन का एक हिस्सा हो सकती है। गोवा का भूगोल, इतिहास, संस्कृति और मिलीजुली जीवन शैली जाँचना-परखना भी वहाँ के पर्यटन का हिस्सा है।

रेल्वे एप पर ट्रेन बीस मिनट देरी से बता रहा था। भोपाल स्टेशन पर ट्रेन रवानगी के नियत समय पर पहुँच गए। ट्रेन डेढ़ घंटा लेट हो गई। अक्सर जब ट्रेन लेट होती है तो लोग परेशान होने लगते हैं। जबकि प्लेटफ़ार्म पर बच्चे जवान बूढ़ों की रेलमपेल अपने आप में मनोरंजक होती है। कुलियों और बैंडरों की हरकतों एवं चुहलबाज़ी का मज़ा भी लिया जा सकता है। प्लेटफ़ार्म पर बैठे-बैठे गोवा के इतिहास को याद करने लगे। ट्रेन हज़रत निज़ामुद्दीन से चलकर एर्नाकुलम याने पुराने समय के कोचीन बंदरगाह तक जाती है। एर्नाकुलम से याद आया कि प्रसिद्ध पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा की तीन भारतीय यात्राओं (1497–99, 1502–03, 1524) ने पश्चिमी यूरोप से बरास्ते केप ऑफ गुड होप भारत की ओर समुद्री मार्ग खोल दिया था। उसकी मृत्यु 24 दिसंबर, 1524 को एर्नाकुलम में ही हुई थी।

दुनिया में लम्बी दूरी की समुद्री यात्राओं की शुरुआत आठवीं सदी से होती है, जब यूरोप और अमेरिका महाद्वीपों के मध्य समुद्री जहाज़ों से आवागमन आरम्भ हुआ था। समुद्री यात्राओं की तकनीक और हवा की दिशाओं की सबसे पहली जानकारी “वाइकिंग” समुद्री डाकुओं को हुई थी। उन समुद्री डाकुओं से निपटने की प्रक्रिया में अंग्रेज, पुर्तगाली, डच, फ़्रेंच, नीदरलैंड निवासी जहाज़ बनाने और समुद्री यात्राओं में पारंगत होते चले गए। उनके राजाओं ने उन्हें धन और आश्रय देकर प्रोत्साहित किया। दुनिया में साम्राज्यवाद की शुरुआत उसी समय से हुई। यूरोप में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हो रही थी। सभ्रांत वर्ग पनप रहा था। जिन्हें माँस पकाने हेतु भारतीय मसालों की ज़रूरत होती थी। उस समय दक्षिण भारतीय मसालों के कारोबार पर अरबी मुसलमानों का क़ब्ज़ा था। 

यूरोपीय लोगों ने लंबे समय तक सिल्क रोड से  दक्षिण पूर्व एशिया और चीन के लिए एक सुरक्षित भूमि मार्ग का आनंद लिया था। मुसलमानों द्वारा 1453 में कॉन्स्टेंटिनोपल में रोमन साम्राज्य के पतन के साथ सिल्क रोड ईसाई व्यापारियों के लिए बंद कर दिया गया। उन्होंने मसाला व्यापार से लाभ की उम्मीद में इंडीज (भारत) के लिए एक पश्चिमी समुद्री मार्ग की तलाश करने की योजना तैयार की। कई राज्यों में लगातार पैरवी के बाद स्पैन कैथोलिक साम्राज्ञी इसाबेला और किंग फर्डिनेंड-II  कोलंबस की समुद्री यात्रा को प्रायोजित करने के लिए सहमत हुए।

कोलंबस 1492 ई. में स्पेन से सुदूर पूर्वी एशिया यानी भारत, चीन, जापान तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता खोजने के लिए जलमार्ग से रवाना हुआ था। कोलंबस 1492 में भारत की खोज में निकला। उसने उत्तरी अमेरिका के पूर्वी किनारे को ही इंडिया समझ कर लंगर डाल दिया। अटलांटिक महासागर में लंबे समय तक नौकायन करने के बाद उसने एक नई दुनिया अमेरिका खोज निकाली। उस समय तक दुनिया में अमेरिका की कोई खास पहचान नहीं थी। जब वास्को डी गामा 1499 में कालीकट से वापस पहुँचा तब पता चला कि कोलंबस का खोजा इंडिया असली नहीं था। पश्चिमी द्वीप समूहों को वेस्ट इंडीज़ और कोलंबस की खोजी तथाकथित इंडिया को अमेरिका नाम दिया गया।

यह सब पढ़ते-सोचते ट्रेन की बर्थ पर नींद में समा गए। 20 जनवरी 2022  की सुबह ट्रेन कल्याण पहुँच गई। कल्याण एक बहुत पुरानी बसावट है। यह भारत के पश्चिम तट पर प्राचीन काल के प्रमुख प्रायद्वीपीय व्यापारिक नगरों में से एक रहा है। इस नगर का उल्लेख ‘पेरिप्लस ऑव द एरिथ्रियन सी’ नामक ग्रंथ में कैलियाना के नाम से मिलता है। 124 ईसवी के जुन्नार अभिलेख के अनुसार कल्याण विदेशी व्यापार का महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह एवं नगर था। छठी शताब्दी ईस्वी के एक ग्रीक लेखक के अनुसार कल्याण उस समय के छ: प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्रों में से एक था। कल्याण से काँसा, लकड़ी एवं वस्त्र का व्यापार होता था। 1536 ई में इस पर पुर्तगालियों ने अधिकार कर लिया।

माना जाता है कि ‘कल्याण’ नाम सद्गुरु समर्थ रामदास स्वामी के एक महान शिष्य कल्याण स्वामी से पड़ा, जो श्री दुर्गाडी किले पर दुर्गा देवी मंदिर पहुंचे थे, जिसे श्री छत्रपति शिवाजी महाराज ने जीता था और किले को नौसेना स्टेशनों के रूप में अच्छी तरह से इस्तेमाल किया गया था। मंदिर को हिंदुओं द्वारा कई बार पुनर्निर्मित किया गया है। ब्रिटिश भारत में कल्याण वर्तनी Kallian , Cullian , Callian और कभी-कभी Callianee  नाम से जाना जाता रहा है।  इसने पुर्तगाली और ब्रिटिश सहित विभिन्न विदेशी सेनाओं के हमले देखे हैं।

कल्याण के पूर्व में आज की बम्बई के वे सात द्वीप थे। जिन्हें मिट्टी और कचरा से पाट कर आधुनिक मुंबई महानगर बना है। जिसे पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन की शादी इंग्लैंड के राजशाही पुत्र  फ़िलिप्स-॥ से करने के अवसर पर इंग्लैंड को दहेज में मिला था। इंग्लैंड ने उसे दस पोंड़ प्रतिवर्ष के भुगतान पर ईस्ट इंडिया कम्पनी को किराए पर दे दिया था। 1674 ई. में छत्रपती शिवाजी महाराज ने अंग्रेज़ों को यहाँ एक फैक्ट्री स्थापित करने की इजाजत दी थी। 1780 ई. में कल्याण पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया। 1947 में सिंध से आए सिंधियों के एक बड़े हुजूम ने कल्याण के नज़दीक डेरा डाला और बस गया “उल्हासनगर नगर” जहां के बने माल पर “Made in USA (Ulhasnagar Sindhi association)” का ठप्पा बड़ा क़ीमती होता है। सामान की क़ीमत कई गुना बढ़ जाती है। ख़ैर हम तो वास्को डी गामा की रोचक कहानी बता रहे थे।  

वास्को डी गामा ने 20 मई 1498 को मालाबार तट पर कालीकट पहुंच स्थानीय मछुआरों को जहाज पर आमंत्रित कर तुरंत कुछ भारतीय सामान खरीद लिया। उस समय वह इलाक़ा ज़मोरिन राजा के अधीन था। मछुआरों के साथ एक पुर्तगाली को बंदरगाह भेजा गया। वह एक ट्यूनीशियाई मुसलमान से मिला। जिसकी सलाह पर गामा ने अपने कुछ आदमियों को कालीकट के शासक ज़मोरिन से मिलकर कारोबारी अनुमति प्राप्त करने के लिए पोन्नानी भेजा। अरब व्यापारियों की आपत्तियों के बावजूद गामा कालीकट के शासक ज़मोरिन से व्यापारिक रियायत पत्र प्राप्त करने में कामयाब रहा। उस समय भुगतान का एकमात्र साधन सोना होता था। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का अविष्कार नहीं हुआ था। भारतीय माल की दुनिया में खपत के कारण दुनिया भर का सोना भारतीय कारोबारियों के पास पहुँच जाता था। भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। पुर्तगाली निर्धारित सीमा शुल्क और उसके माल की कीमत का भुगतान सोने में करने में असमर्थ थे। इसलिए कालीकट के अधिकारियों ने भुगतान के लिए सुरक्षा के तौर पर गामा के पुर्तगाली एजेंटों को अस्थायी रूप से हिरासत में ले लिया। बदले में गामा कालीकट के कुछ मूल निवासियों और सोलह मछुआरों को बलपूर्वक अपने साथ पुर्तगाल ले गया। गामा का अभियान सभी उचित अपेक्षाओं पर सफल रहा, उनकी कमाई का लाभ अभियान की लागत का साठ गुना अधिक था।

उसके बाद दूसरे अभियान के तहत पेड्रो अल्वारेस कैब्राल 13 सितंबर 1500 को कालीकट पहुंचे। तभी थोड़े दिन पहले कोझीकोड में पुर्तगाली कारखाने पर स्थानीय लोगों द्वारा हमला किया गया था। जिसके परिणामस्वरूप पचास से अधिक पुर्तगालियों की मृत्यु से माहौल बिगड़ा हुआ था। कैब्राल कारखाने पर हमले से नाराज हो गया और उसने बंदरगाह में लंगर डाले दस अरब व्यापारी जहाजों को जब्त कर लिया, छह सौ अरब चालक दल के सदस्य मारे गए और जहाजों को जलाने से पहले उनके माल को जब्त कर लिया। कैब्राल ने जहाजों को कालीकट पर पूरे दिन बमबारी करने का आदेश दिया। कोचीन और कन्नानूर में कैब्राल स्थानीय शासकों के साथ लाभकारी संधियाँ करने में सफल रहा। कैब्राल ने 16 जनवरी 1501 को वापसी यात्रा शुरू की और 23 जून 1501 को 13 में से केवल 4 जहाजों के साथ पुर्तगाल पहुंचे।

तीसरे अभियान पर वास्को डी गामा 15 जहाजों और 800 पुरुषों के साथ दूसरी बार भारत के लिए रवाना हुए, 30 अक्टूबर 1502 को कालीकट पहुंचे, जहां के शासक एक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार थे। गामा ने इस बार कालीकट से सभी मुसलमानों (अरबों) को भारत से निकालने का आह्वान किया, जिसे ठुकरा दिया गया। उसने शहर पर बमबारी की और कई चावल के जहाजों पर कब्जा कर लिया। वह सितंबर 1503 में पुर्तगाल लौट आया।  हम रात को ग्यारह बजे सोते समय तक गोवा में मची मारकाट के इतिहास पर विचार करते रहे कि किस तरह मसालों के व्यापार को लालायित अरबी और यूरोपीय कारोबारी भारत के तटों पर आफ़त बनकर आते रहे।

सुबह सात बजे ट्रेन पनवेल पहुँची। पनवेल को रायगढ़ (महाराष्ट्र) का द्वार भी कहा जाता है क्योंकि पूर्व दिशा से रायगढ़ ज़िले में प्रवेश करने पर पहला शहर पनवेल है। पनवेल बस्ती गढ़ी नदी के तट पर स्थित है जो अरब सागर में जाकर मिलती है। गढ़ी नदी दो पहाड़ियों के बीच से एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ निकल जाती है। पनवेल लगभग 300 साल पुराना शहर है, जो मराठा शासन के दौरान भूमि और समुद्र दोनों व्यापारिक मार्गों के केंद्र के रूप में विकसित हुआ था। शिवाजी ने रायगढ़ को राजधानी बनाकर पनवेल को सुरक्षा चौकी के रूप में उपयोग किया था। मराठों ने यहीं से मुग़लों के आधिपत्य में कल्याण क़िले पर हमला कर किलेदार को भागने को मजबूर किया। मुग़लों का ख़ज़ाना और किलेदार की अति सुंदर बीबी मराठा सेनापति के हाथ लगी। शिवाजी ने ख़ज़ाना रखकर किलेदार की बीबी को सम्मानपूर्वक उसके पति के पास पहुँचा दिया। मराठा, मुगल, ब्रिटिश और पुर्तगालियों सबने पनवेल का सैनिक उपयोग किया था।

हम मंगला एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी वातानुकूलित डिब्बे में सवार हैं जो कोंकड रेल्वे ट्रैक पर पनवेल से चिपलुन के बीच वेस्टर्न घाट की घुमावदार घाटियों और झरनों से होकर गुजर रही है। यह वही इलाक़ा है जहां शिवाजी ने सेना संगठित कर प्रतापगढ़, सिंहगढ़, रायगढ़ अधिग्रहित करके हिंद स्वराज की स्थापना का स्वप्न साकार किया था।

ट्रेन उत्तर से दक्षिण दिशा में जा रही है। जिसके दाहिनी तरफ़ घाटियाँ अरब सागर तक उतरते चली गई हैं और बाईं तरफ़ कि पहाड़ियाँ खंडाला महाबलेश्वर होकर पूना तक चली गई हैं। औरंगज़ेब के हुनरमंद सेनापति राजा जयसिंह ने इन्ही पहाड़ियों में शिवाजी को घेरकर समर्पण हेतु मजबूर किया था। राजा जयसिंह की समझाईश  और उनके पुत्र रामसिंह के सुरक्षा वचन पर शिवाजी आगरा दरबार गए थे। लेकिन औरंगज़ेब के दुर्व्यवहार से पीड़ित हो पुत्र संभाजी सहित आगरा क़िले से भाग निकले थे। 

सह्याद्रि पहाड़ों से लेकर अरब सागर के विस्तार में सघन हरियाली है। नदी-नाले पोखर अभी भी बारिश के पानी से भरे हैं। कई स्थानों पर बने बाँधों ने पूरे क्षेत्र को सुरम्य हरित की मखमली रंगोली से रच दिया है। ट्रेन घाटियों से निकलकर अब सह्याद्रि के पठार पर पहुँच रही है। तापमान बढ़कर तीस सेंटीग्रेड हो गया है। बारिश के मौसम में पेड़ों पर चढ़ी बेलें अब कुछ सूखती सी दिखने लगी हैं।

भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पर्वत श्रृंखला को पश्चिमी घाट या सह्याद्रि कहते हैं। दक्खिनी  पठार के पश्चिमी किनारे के साथ-साथ यह पर्वतीय श्रृंखला उत्‍तर से दक्षिण की तरफ 1600 किलोमीटर लम्‍बी है। विश्‍व में जैविकीय विविधताओं के लिए यह बहुत महत्‍वपूर्ण है। यह गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा से शुरू होती है और महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल से होते हुए कन्याकुमारी में समाप्‍त हो जाती है। वर्ष 2012 में यूनेस्को ने पश्चिमी घाट क्षेत्र के 39 स्‍थानों को विश्व धरोहर घोषित किया है।

पश्चिमी घाट का संस्कृत नाम सह्याद्रि पर्वत है। यह पर्वतश्रेणी महाराष्ट्र में कुंदाइबारी दर्रे से आरंभ होकर तट के समांतर, सागरतट से 30 किमी से लेकर 100 किमी के अंतराल से लगभग 4,000 फुट तक ऊँची चोटियों को दामन में संजोए दक्षिण की ओर पसरी है। यह श्रेणी कोंकण के निचले प्रदेश को लगभग 2,000 फुट ऊँचे दक्खिन के पठार से अलग करती है। इसपर कई इतिहास प्रसिद्ध किले बने हैं। कुंदाईबारी दर्रा भरुच तथा दक्खिन पठार के बीच व्यापार का मुख्य मार्ग है। कुंदाईबारी दर्रा से कई बड़ी नदियाँ निकलकर पूर्व की ओर बहती हैं। इसमें थाल घाट, भोर घाट, पाल घाट तीन प्रसिद्ध दर्रे हैं। इन्ही दर्रों से गुज़रकर शिवाजी ने सूरत पहुँच अंग्रेजों को लूटा था। थाल घाट से होकर बंबई-आगरा-मार्ग जाता है। कलसूबाई सबसे ऊँची चोटी (5,527 फुट) है। भोर घाट से बंबई-पूना मार्ग गुजरता है। इन दर्रो के अलावा जरसोपा, कोल्लुर, होसंगादी, आगुंबी, बूँध, मंजराबाद एवं विसाली आदि दर्रे हैं, जिनसे मुंबई से गोवा जाने वाली रेल गुजरती है। उन्ही का आनंद लेते पनवेल से पणजी की तरफ़ बढ़ रहे हैं। अंत में दक्षिण में जाकर यह श्रेणी पूर्वी घाट पहाड़ से नीलगिरि के पठार के रूप में मिल जाती है। इसी पठार पर पहाड़ी सैरगाह ओत्तकमंदु अर्थात् ऊँटी स्थित है, जो सागरतल से 7,000 फुट की ऊँचाई पर बसा है।

नीलगिरि पठार के दक्षिण में प्रसिद्ध दर्रा पालघाट है। यह दर्रा 25 किमी चौड़ा तथा सागरतल से 1,000 फुट ऊँचा है। केरल-मद्रास का संबंध इसी दर्रे से है। इस दर्रे के दक्षिण में यह श्रेणी पुन: ऊँची होकर अन्नामलाई पहाड़ी के रूप में चलती है। पाल घाट के दक्षिण में श्रेणी की पूर्वी पश्चिमी दोनों ढालें खड़ी हैं। पश्चिमी घाट में अति सुंदर दृश्य देखने को मिलते हैं। जंगलों में शिकार भी खेला जाता है। प्राचीन समय से यातायात की बाधा के कारण इस श्रेणी के पूर्व एवं पश्चिम के भागों के लोगों की बोली, रहन सहन आदि में बड़ा अंतर है। यहाँ कई जंगली जातियाँ भी रहती हैं। पश्चिमी घाट की सबसे ऊंची चोटी अनैमुड़ी (2695 मी.) है।

पनवेल निकलने के बाद मन खूबसूरत चिपलून के ख़्वाब देखने लगा। चितपावन ब्राह्मण याने बाज़ीराब के पिता बालाजी विश्वनाथ का जन्म स्थान वाला इलाक़ा- चिपलून। आर.एस.एस.को चलाने वालों के दिमाग़ की उपज वाला स्थान जो भौंसले के साथ नागपुर आ बसे थे। भौंसले याने शिवाजी का कुल जिसे शिंदे भी कहा जाता है।

चिपलून कोंकणस्थ या चितपावन ब्राह्मणों का आरम्भिक निवास था। स्थानीय लोककथाओं के अनुसार विष्णु के छठे अवतार परशुराम द्वारा साठ तालाब और साठ उद्यान आक्रामक उछलते समुद्र से लेकर कोंकण क्षेत्र के लोगों को प्रदान किए गए थे। परशुराम को चितपावन ब्राह्मण समुदाय का पितृपुरूष माना जाता है।

हालिया इतिहास में, जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने कोंकण पर अधिकार किया और अपना शासन स्थापित किया, तो उन्होंने 1660 में गोवालकोट किले को जीत लिया और इसका नाम बदलकर गोविंदगढ़ कर दिया। शिवाजी महाराज रायगढ़ में अपने राज्याभिषेक के लिए जाने से पहले चिपलून के गोवालकोट किले में सशस्त्र बलों का निरीक्षण करने आए थे। बाद में छत्रपति संभाजी महाराज, तुलाजी आंग्रे, चिमाजी अप्पा और सिद्दीयों द्वारा किले चिपलून पर कब्जा कर लिया गया था। अंत में जिसे 1818 में रामोशी ने ब्रिटिश सेना के लिए छोड़ दिया था।

बाजीराव पेशवा, जो कुछ वर्षों (1812-1815) के लिए दाभोल के पास गुहागर में अपने महल का दौरा करने के लिए कुम्भरली दर्रे से नीचे आए, तब उन्होंने अपने लिए एक विश्राम गृह का निर्माण किया जो अब एक सरकारी कार्यालय के रूप में उपयोग किया जाता है। मराठा साम्राज्य अंग्रेजों द्वारा हथियाने के बाद चिपलून उनका आरामगाह हो गया था।

ट्रेन के चिपलून पहुँचने के पहले से ही सह्याद्रि पर्वतों के पेटों को खोदकर बनाए गए दर्रों की शुरुआत होती है, अनगिनत दर्रों की ख़ामोश धुप्प अंधेरी सुरंगे रत्नागिरी तक चली गई हैं। नदी, नाले, दर्रे, जंगल के बीच छोटे-मोटे स्टेशन बड़ा-पाव आवाज़ें सुनते निकलते जा रहे हैं। चिपलून में स्टेशन पर गर्मा गरम बड़ा-पाव और चटनी ने जीभ में कोंकड स्वाद घोल दिया।

वड़ा पाव उत्पत्ति की सबसे आम धारणा यह है कि इसका आविष्कार मध्य मुंबई के तत्कालीन मिल-मज़दूरों के बीच हुआ था। इसकी शुरुआत 1960 के दशक के अंत में वाज़े परिवार द्वारा की गई थी, जो सड़क के सामने अपने घर की एक खिड़की (खिड़की) से वड़ा पाव देते थे। वड़ा पाव बेचने वाले सबसे पुराने कियोस्क में से एक कल्याण में स्थित खिडकी वड़ा पाव कहा जाता है। दादर के अशोक वैद्य को अक्सर 1966 में दादर रेलवे स्टेशन के बाहर पहला वड़ा पाव स्टाल शुरू करने का श्रेय दिया जाता है।

कार्बोहाइड्रेट से भरपूर यह नाश्ता उस समय के गिरगांव के मिल मजदूरों को परोसा जाता था। एक पाव के अंदर रखा आलू वड़ा (बटाटा वड़ा) जल्दी बन जाता था। 1971 में लगभग 10-15 पैसे में बटाटा भाजी और चपाती की तुलना में बहुत सुविधाजनक था, जिसे भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में भी खाया जा सकता था। वड़ा पाव का शिवसेना से गहरा नाता है। मध्य मुंबई में कपड़ा मिलों के बंद होने से 1970 के दशक में उथल-पुथल मच गई। इस परिवर्तनकारी समय के दौरान गठित शिवसेना ने खुद को मिल श्रमिकों के हितों वाली पार्टी के रूप में आधारित किया। पार्टी प्रमुख, बालासाहेब ठाकरे ने 1960 के दशक में मराठी लोगों को उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित किया, यानी उडुपी रेस्तरां स्थापित करने वाले दक्षिण भारतीयों के समान तरीके से फूड स्टॉल शुरू करें। शिवसेना ने वड़ा पाव सम्मेलन (वड़ा पाव जंबोरी) जैसे आंदोलनों के साथ-साथ पड़ोस के कार्यक्रमों के माध्यम से सड़कों पर शारीरिक और वैचारिक रूप से दावा करने का प्रयास किया। यह विषय हाल के वर्षों में भी जारी रहा। वड़ा-पाव खाते-खाते रत्नागिरि आ गया।

बाल गंगाधर तिलक की यह जन्‍मस्‍थली रत्नागिरि महाराष्ट् के दक्षिण-पश्चिम भाग में अरब सागर के तट पर स्थित है। यहां पर एक किला भी है जिसे बीजापुर के राजपरिवार ने बनवाया था। बाद में 1670 ई. में इस किले की शिवाजी ने मरम्‍मत करवाई थी। यह कोंकण क्षेत्र का ही एक भाग है। यहां बहुत लंबा समुद्र तट हैं। यह क्षेत्र पश्चिम में सहयाद्रि पर्वतमाला से घिरा हुआ है। रत्नागिरि अल्‍फांसो आम के लिए भी प्रसिद्ध है। रत्नागिरि का मराठा इतिहास में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। यह 1731 ई. में सतारा के राजा के अधिकार में आ गया और यह 1818 ई. तक सतारा के कब्‍जे में रहा। 1818 ई. में इस पर अंग्रेजों ने कब्‍जा कर लिया।

रत्नागिरी में रत्नदुर्ग या भगवती दुर्ग के रूप में जाना जाने वाला एक क़िला है। रत्नागिरी मुंबई से 220 किलोमिटर दक्षिण में स्थित है। सोलहवीं सदी में बीजापुर के सुल्तानों ने इसका निर्माण करवाया था। शिवाजी ने 1670 ई. में इसका पुननिर्माण कराकर इसे मराठा नौसेना का प्रमुख केन्द्र बनाया। इस दुर्ग में तीन सुदृढ़ चोटियाँ हैं। दक्षिण की ओर स्थित सबसे बड़ी चोटी पारकोट के नाम से जानी जाती है। मध्य चोटी पर बाले नामक क़िला है, जिसमें प्रसिद्ध भगवती मंदिर आज भी सुरक्षित है। तीसरी चोटी मंदिर के पीछे ढलान पर है, जहाँ से कहा जाता है कि दंडित बंदियों को नीचे फेंककर मार दिया जाता था। चोटी के पश्चिम में कुछ पुरानी गुफाएँ भी हैं। बर्मा (म्यांमार) के अंतिम राजा थिबॉ को अंग्रेजों ने 1885 ई. में यहीं नज़रबंद करके रखा गया था। विनायक दामोदर सावरकर को भी यहीं कैद रखा गया था।

रत्नावली के बाद भी दर्रों का दौर नहीं थमा। शायद इसीलिए कोंकड रेल्वे का यह ट्रैक अभी भी सिंगल है। जिसे आज़ादी के बाद हम भारतियों ने ही बनाया है। कोंकण रेलवे भारतीय रेलवे की एक आनुषांगिक कंपनी है जो कोंकण के तटीय क्षेत्रों के लिए रेलों का परिचालन करती है। इसकी स्थापना 26 जनवरी 1998 में हुई थी। इसका मुख्यालय नवी मुंबई में स्थित है। कोंकण रेलवे भारत की वाणिज्य राजधानी मुंबई और मंगलोर को 736 कि॰मी॰ लंबी लाइन द्वारा महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक राज्यों को जोड़ती है जो एक ऐसा क्षेत्र है जहां आर-पार बहती नदियां, गहरी घाटियां और आसमान छूते पहाड़ हैं।

ट्रेन सतारा ज़िले के कुछ स्थानों से गुजरती है। सातारा कृष्णा नदी और वेन्ना नदी के संगम के समीप स्थित है। इसकी स्थापना 16वीं शताब्दी में हुई थी और यह मराठा साम्राज्य के छत्रपति शाहुजी की राजधानी थी। सातारा का नाम “सात तारा” के संक्षिप्तिकरण से हुआ है, जिसमें सात तारों से अभिप्राय सतारा को घेरने वाले सात पहाड़ी दुर्ग हैं।

सतारा, अंग्रेजों की बम्बई प्रेसीडेन्सी का राज्य (रियासत) था। सतारा शाहूजी के वंशजों की राजधानी रहा। यद्यपि मराठा राज्य की सत्ता पेशवाओं के हाथों में जाने के फलस्वरूप यह उनके अधीन था। 1818 ई. में पेशवा बाजीराव द्वितीय की पराजय के उपरान्त अंग्रेज़ों ने इसे पुन:आश्रित राज्य बना दिया। 1848 ई. में गोद प्रथा की समाप्ति का सिद्धान्त लागू किये जाने के फलस्वरूप इसे अंग्रेज़ों के भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। भारत में डीज़ल इंजन बनाने का पहला कारखाना सतारा में 1932 में खोला गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – समुंदर की बीच क़िला – सिद्दी जज़ीरा मुरूद – भाग- ५१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

  1. समुंदर की बीच क़िला – सिद्दी जज़ीरा मुरूद

ये तो आप मानते ही होंगे की भारत में प्राचीन रहस्यमयी जगहों की कोई कमी नहीं है क्योंकि हमारा इतिहास ही इतना वैविध्यपूर्ण और रहस्यमयी रहा है की जितना जानों उतना कम है। समुंद्र के बीचोबीच रहस्मयी मुरुद-जंजीरा किला 400 सालों से अजेय इतिहास का गवाह है। हम आपको ऐसे ही एक रहस्यमयी जगह ले चलते हैं। एक ऐसा क़िला जिसने कई लड़ाईयां देखी पर फिर भी ये अजेय रहा है।

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुद गांव में स्थित मुरुद-जंजीरा फोर्ट है जो अपनी बनावट के लिए जाना जाता है। चारों तरफ से पानी से घिरे होने की वजह से इसे आईलैंड फोर्ट भी कह सकते है। ये आइलैंड फोर्ट भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया में अपनी बनावट के लिए मशहूर है। यह भारत के पश्चिमी तट का एक मात्र किला हैं, जो कभी भी जीता नहीं जा सका था। स्‍थानीय लोग इसे फ़तह किला कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ अजेय होता है। माना जाता है कि यह किला पंच पीर पंजातन शाह बाबा की रूह के संरक्षण में है। शाह बाबा का मकबरा इसी किले में है। यह किला समुद्र तल से 90 फीट ऊंचा है। इसकी नींव समुद्र में 20 फीट गहरी है। इस किले का निर्माण 22 वर्षों में हुआ था। यह किला 22 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें 22 सुरक्षा चौकियां है। ब्रिटिश, पुर्तगाली, शिवाजी, कान्‍होजी आंग्रे, चिम्‍माजी अप्‍पा तथा शंभाजी ने इस किले को जीतने का काफी प्रयास किया, लेकिन कोई सफल नहीं हो सका। इस किले में सिद्दि शासकों की कई तोपें अभी भी रखी हुई हैं। जंजीरा किला समुद्र के बीच बना चारों ओर से खारे पानी से घिरा है।

हमें क़िला देखने जाना था परंतु कोई बताने वाला नहीं मिलता था कि ज़ंजीरा कैसे जाएँ। जितने लोग उतनी बातें। कुछ उड़ती-उड़ती बात पता चली। यदि आप जाना चाहते हैं तो गेट वे आफ इंडिया पहुँचें, वहाँ से मंडवा के लिए फ़ेरी टिकट 75 रुपयों में ख़रीदें। फ़ेरी आपको मंडवा उतार देगी। वहाँ से फ़ेरी वालों की बस आपको उसी किराए में अलीबाग़ तक ले जाएगी। अलीबाग़ से 65 किलोमीटर की दूरी पर मरुद गाँव है। अलीबाग़ से मुरुद सरकारी बस से जाया जा सकता है या आप टैक्सी या ऑटो से भी 2000-2500 में जाना-आना कर सकते हैं। आपको यदि रुकना है तो रास्ते में काशिद समुद्री बीच पर होटेल गेस्ट हाउस मिल जाते हैं। अलीबाग़ से स्कूटर या बाइक भी 600 रुपए प्रतिदिन किराए पर मिल जाती हैं। आपके पास ड्राइविंग लाइसेंस होना चाहिए। काशिद के आगे ख़ोराबंदर गाँव हैं वहाँ से ज़ंजीरा क़िला तक जाने-आने का फेरि शुल्क 40 रुपयों का है। ख़ोराबंदर गाँव पहुँचना होगा।

पता चला कि 40 फीट ऊंची दीवारों से घिरा ये किला अरब सागर में एक आइलैंड पर है। इसका निर्माण अहमदनगर सल्तनत के मलिक अंबर की देखरेख में 15 वीं सदी में हुआ था। 15 वीं सदी में राजापुरी (मुरुद-जंजीरा किले से 4 किमी दूर) के मछुआरों ने खुद को समुद्री लुटेरों से बचाने के लिए एक बड़ी चट्टान पर मेधेकोट नाम का लकड़ी का किला बनाया। इस किले को बनाने के लिए मछुआरों के मुखिया राम पाटिल ने अहमदनगर सल्तनत के निज़ाम शाह से इजाज़त मांगी थी।

बाद में अहमदनगर सल्तनत के थानेदार ने इस किले को खाली करने कहा तो मछुआरों ने विरोध किया। फिर अहमदनगर के सेनापति पीरम खान एक व्यापारी बनकर सैनिकों से भरे तीन जहाज लेकर पहुंचे और किले पर कब्ज़ा कर लिया। पीरम खान के बाद अहमदनगर सल्तनत के नए सेनापति बुरहान खान ने लकड़ी से बने मेधेकोट किले को तुड़वाकर उसकी जगह पत्थरों से किला बनवाया।

इसके नाम में ही इसकी खासियत छिपी है दरअसल जंजीरा अरबी भाषा के ‘जजीरा’ शब्द से बना जिसका अर्थ होता है टापू। यमन और इथियोपिया से अफ़्रीकन हब्सी लोगों ने समुद्री लुटेरों से व्यापारिक जहाज़ों को सुरक्षा देने के लिए एक समुद्री सेना तैयार की थी वे हिंदुस्तान से अरब तुर्की होते हुए यूरोप की समुद्री यात्राओं को शुल्क लेकर सुरक्षा देते थे। उन्होंने मछुआरों से इसे हथिया लिया।  

यह रहस्मयी किला जंजीरा के सिद्धियों की राजधानी हुआ करता था, अंग्रजों और मराठा शासकों ने इस किले को जीतने का काफी प्रयास किया, लेकिन वह अपने इस मकसद में कामयाब नहीं हो पाए। इसकी अजेयता का कारण ये भी है की पुराने समय में पानी के रास्ते इस किले तक पहुंचना बेहद मुश्किल काम था और जब कोई सेना इसकी तरफ बढती थी तब किले में मौजूद सेना आराम से दुश्मनों को हरा देती थी। इस किले पर 20 सिद्दीकी शासकों ने राज किया। अंतिम शासक सिद्दीकी मुहम्मद खान था, जिसका शासन खत्म होने के 330 वर्ष बाद 3 अप्रैल 1948 को यह किला भारतीय सीमा में शामिल कर लिया गया।

जब से मराठों का इतिहास पढ़ा था तबसे मुरूड़ का सिद्दी ज़ंजीरा क़िला देखने की बड़ी इच्छा थी। जिसे शिवाजी, बाज़ीराव और अंग्रेज़ नहीं जीत सके थे उसमें कोई ख़ासियत तो होगी। यह क़िला मुंबई से लगभग 200 किलोमीटर की दूरी पर अरब सागर के तट पर स्थित है। दादर से या बांद्रा से पनवेल जाएँ फिर पनवेल से 110 किलोमीटर बस से अलीबाग़ पहुँचें। अलीबाग़ से बाद, टैक्सी या ऑटो द्वारा मुरुड़ और आख़िर में ख़ोराबंदर से कश्ती द्वारा ज़ंजीरा क़िला पहुँचा जा सकता है। यह रास्ता लम्बा और समय खपाउ है अतः हमने गेट वे आफ इंडिया से फ़ेरी द्वारा मंडवा होते हुए मुरुड़ जाने का रास्ता चुना। 

बताया जाता है कि मुरुद-जंजीरा किले का दरवाजा दीवारों की आड़ में बनाया गया है। जो किले से कुछ मीटर नज़दीक पहुँचने पर दीवारों के कारण दिखाई देना बंद हो जाता है। यही वजह रही है कि दुश्मन किले के पास आने के बावजूद चकमा खा जाते हैं और किले में घुस नहीं पाते हैं। अनेक वर्ष बीत जाने के बाद भी तथा चारों ओर खारा अरब सागर होने के बाद भी यह मजबूती से खड़ा है।

जंजीरा किले का परकोटा बहुत ही मजबूत है, जिसमें कुल तीन दरवाजे हैं। दो मुख्य दरवाजे और एक चोर दरवाजा। मुख्य दरवाजों में एक पूर्व में राजापुरी गांव की दिशा में खुलता है, तो दूसरा ठीक विपरीत समुद्र की ओर खुलता है। चारों ओर कुल 19 बुर्ज हैं। प्रत्येक बुर्ज के बीच 90 फुट से अधिक का अंतर है। किले के चारों ओर 500 तोपें रखे जाने का उल्लेख भी कहीं-कहीं मिलता है। इन तोपों में कलाल बांगड़ी, लांडाकासम और चावरी तोपें आज भी देखने को मिलती हैं।

हम मलाड में रुके थे। वहाँ से लोकल ट्रेन द्वारा चर्चगेट पहुँचना है। टिकट ख़रीद कर चर्चगेट तरफ़ जाने वाली ट्रेन के प्लेटफ़ॉर्म पर इंतज़ार करने लगे। दो-तीन लोकल दनदनाते निकल गईं। तब एक लोकल आकर रुकी। भीड़ में चढ़ने की कोशिश की लेकिन जहां खड़े थे, वहीं खड़े रह गए। अगली ट्रेन के इंतज़ार में वहीं खड़े रहे कि अब तो सबसे पहले चढ़ लेंगे। जब अगली ट्रेन आई तो उतरने वाली भीड़ के रेले में हम पीछे खिसक गए और ट्रेन रवाना हो गई। इसके बाद टेकनिक समझ आई कि गेट के सामने न खड़े होकर कोने में रहो और ट्रेन आते ही हैंडल पकड़ कर घुस जाओ। यह तरीक़ा कामयाब रहा। ट्रेन में घुस गए परंतु चारों तरफ़ से लोग आलिंगन बद्ध खड़े हुए थे। बड़ा अजीब लगा। नज़र घुमा कर चारों तरफ़ देखा तो दूर कोने में एक सीट ख़ाली दिखी, जिसे एक सवारी ने अभी-अभी छोड़ा था। जब तक वहाँ पहुँचते, वह भर गई। वहाँ खड़े होकर सवारियों के उनींदा और थके चेहरे देखते रहे। अगली स्टेशन आने पर दो सीट ख़ाली हुईं। तब बैठने का सुख नसीब हुआ। हमारे बाजू की सीट पर एक महिला थी। कौतूहल वश उनसे पूछा- कहाँ तक जाएँगी?

उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

हमने पूछा- चर्चगेट जाएँगी। वे बोलीं- हओ.. तो।

वहाँ काम करती हैं, क्या?

न बाबा, पानी पीने को जाती।

हमें मारे गर्मी के पसीना निकल रहा थे। हमने पानी की बोतल निकाल गटागट पी लिया और अन्य सवारियों की तरह ऊँघने लगे। चर्चगेट का इतिहास याद आने लगा।

पुर्तगाल ने 1661 में ब्रागांजा की रानी कैथरीन के दहेज के हिस्से के रूप में बॉम्बे को ब्रिटिश क्राउन को उपहार में दिया था। 1818 तक बॉम्बे से लगा थाने मराठों के क़ब्ज़े में था। जिसे तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों ने जीत लिया। तब उन्होंने बॉम्बे में एक क़िला बनाया। अंग्रेजों द्वारा निर्मित किले के क्षेत्र में तीन मुख्य द्वार थे। इनमें से एक द्वार सीधे सेंट थॉमस कैथेड्रल चर्च की ओर जाता था, इसलिए इसका नाम “चर्च गेट” रखा गया। इस गेट को 1860 में ध्वस्त कर दिया गया था। बाद में चर्चगेट रेलवे स्टेशन को 1870 में ध्वस्त गेट की स्थिति के करीब बनाया गया था। चर्चगेट स्टेशन मुंबई उपनगरीय रेलवे की पश्चिमी रेलवे लाइन का एक टर्मिनस है। यह शहर का सबसे दक्षिणी स्टेशन है, पहले कोलाबा सबसे दक्षिणी स्टेशन था, रेल लाइन को चर्चगेट तक  बढ़ा  दिया गया था, जिससे चर्चगेट सबसे दक्षिणी स्टेशन बन गया।

बंबई, बड़ौदा और मध्य भारत रेलवे (वर्तमान पश्चिम रेलवे) का उद्घाटन 1855 में अंकलेश्वर और उतरन (29 मील की दूरी) के बीच रेल लाइन (बीजी) के निर्माण के साथ हुआ था। 1859 में इस लाइन को पश्चिमी तट पर बम्बई तक बढ़ा दिया गया था। 1867 तक, मरीन लाइन्स के पास “बॉम्बे बैकबे” नामक स्टेशन तक, ग्रांट रोड स्टेशन से आगे, फोरशोर के साथ एक ट्रैक का निर्माण किया गया था। 12 अप्रैल 1867 को पहली उपनगरीय ट्रेन विरार से बॉम्बे बैक बे तक एक-एक ट्रेन के साथ शुरू की गई थी। स्टेशनों का नाम तब रखा गया था, “विरौर, नीला, बेसिन, पंजे, बोरेवाला, पहाड़ी, अंडारू, सांताक्रूज, बंडोरा, माहिम, दादूर, ग्रांट रोड और बॉम्बे बैकबे”।

वर्ष 1870 में, चर्चगेट का पहली बार स्टेशन के रूप में उल्लेख किया गया था। लाइन आगे 1872 में कोलाबा की ओर बढ़ी और वहां माल शेड बनाया गया। वर्ष 1896 में, यात्री और उपनगरीय दोनों लाइनों के लिए टर्मिनस के रूप में काम करने के लिए कोलाबा में एक नया स्टेशन स्थापित किया गया था। बॉम्बे सरकार ने रेलवे को चर्चगेट और कोलाबा के बीच रेल लाइन के सेक्शन को सौंपने का आदेश जारी किया। इसलिए, बॉम्बे सेंट्रल (मुंबई सेंट्रल), बेलासिस ब्रिज के पास एक नया स्टेशन बनाया गया था, जिसे 18 दिसंबर 1930 को खोला गया था। 31 दिसंबर की मध्यरात्रि से, कोलाबा एक टर्मिनस नहीं रहा। सोचते-सोचते चर्चगेट स्टेशन आ गया। पूरी ट्रेन ख़ाली हो गई। हम भी उतर कर बाहर आए। एक टैक्सी से गेट वे आफ इंडिया पहुँचे। एक नाव तुरंत छूट रही थी। टिकट लेकर सवार हो गये।

मई का महीना मुंबई में बेचैनी पैदा करने वाली ऊमस का होता है। सूर्य पूरी तैयारी के साथ सुबह आठ बजे से मानसूनी बादल बनाने के लिए अरब सागर के अथाह जल पर अपनी सीधी किरणें बिखेर कर भाप बनाने में व्यस्त था। जितना पानी आप पीते हैं उससे अधिक पसीने के रूप में निकलता जाता है। हम अस्सी रुपयों की फ़ेरी टिकट के साथ चार-चार बोतल पानी के ख़रीद कर पिट्ठु बेग में लेकर आठ बजे के आसपास नाव पर सवार हो गए। नाव पूरी भर चुकी थी, बिलकुल आगे की कुर्सी ख़ाली दिखीं जिन पर धूप पड़ रही थी शायद इसीलिए ख़ाली रह गईं थीं। उन पर जाकर बैठ गये।  

गले में पानी गटकने और पसीना बहाने का दौर शुरू हुआ जो रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पसीने से गमछा निथर गया तो उसे निचोड़ कर फिर काम पर लगा दिया। फ़ेरी की शीटी बजी और नाव चल पड़ी, हमने भी पराँठे सब्ज़ी निकाली, हमारे मुँह चल पड़े। नाव उत्तर-पूर्व की दिशा में जा रही थी, सूर्य सीधा सामने था। पानी ख़त्म होने लगा तो हमने संतरे की गोलियाँ चूसना शुरू कर दिया। चारों तरफ़ पानी में सामान ढोने वाले जहाज़ों के बीच से हिचकोले खाती हमारी कश्ती मंज़िल की ओर बढ़ी जा रही थी। साढ़े नौ बजे मंडवा पहुँचे। अग्निसाक्षी फ़िल्म  इसी मंडवा की पृष्ठभूमि पर फ़िल्माई गई थी। घनी हरियाली में नारियल, केले, आम और दीगर पेड़ पेड़ों से ठंडी हवा और ख़ुश्बू से नाव की गर्मी और पसीना रफ़ूचक्कर हो गए।

मंडवा में कश्ती वालों की बस खड़ी थी, उसमें सवार हुए। बस के चलने से ठंडी हवा में सुहाना सफ़र शुरू हुआ। दाहिनी तरफ़ अरब सागर की लहरें और बाईं तरफ़ फल फूल से लदे बग़ीचे। पानी की कोई कमी ना होने से भरपूर फ़सल खड़ी थी, बाज़ारों में हर चीज़ किफ़ायती दामों पर मिल रही थी। साढ़े दस बजे के आसपास रायगढ़ जिले की तहसील अलीबाग़ पहुँचे। अलीबाग़ तहसील में समुद्री किनारों पर अनेकों बीच हैं। हर घर में गेस्ट हाउस के बोर्ड लगे हुए हैं।

अलीबाग़ से ज़ंजीरा क़िला जाने-आने के बारे में पूछा तो पता चला कि सरकारी बस सुबह, दोपहर, शाम को जाती है। स्कूटर 600 प्रतिदिन की दर से किराए पर मिलते हैं। अलीबाग़ से ज़ंजीरा साठ किलोमीटर है, याने एक सौ बीस किलोमीटर की यात्रा, वो भी चिलचिलाती धूप में, मुश्किल थी। विचार त्याग दिया। एक टैक्सी ड्राइवर से किराया पूछा वह बोला ज़ंजीरा जाने-आने के 2500/- रुपए  लगेंगे। आख़िर में एक टेम्पो वाले से बात की तो वह 1700/- में तैयार हो गया।

टेम्पो में सवार हुए, चिकनी सड़क पर सरसराते चल पड़ा। कठल, आम, केले और नारियल के घने पेड़ों के बीच छोटे-छोटे मकान, कुछ नए और कुछ सदियों पुराने स्वागत हेतु फलों से लदे होने से झुककर अभिवादन करते लग रहे थे। सड़क किनारे ताज़ी मछली, सूखी मछली और समुद्री झींगों का अम्बर लगा था। चिकनी चिपटी ट्रम्पेट मछली तीस से पचास रुपए किलो। यह रास्ता समुद्री मरीन प्रोडक्ट का स्वर्ग है। रास्ते में कहीं न रुके, सीधे मुरुड़ के अरब सागर किनारे स्थित खाराबंदर पहुँचे, वहाँ से स्याह ज़ंजीरा क़िला सामने दिख रहा था।

सुमिता बिटिया को कहा कि तुम टिकट काउंटर से टिकट लो हम नाव में जगह बनाते हैं। उसके लाइन में लगते ही बाक़ी तीन लोग झटके से नाव में जगह लेकर जम गए, नाव चलने को तैयार हो गई और चल भी दी लेकिन सुमिता टिकट लेकर नहीं आई तो हमने नाव चालक को रोका। वह बोला कि आपके पास टिकट है या नहीं, हमने सिर हिलाकर ना का इशारा किया तो उसने तुरंत वापिस नाव पलटा कर हमें किनारे उतार कर बताया कि पहले टिकट लीजिए और जिस नाव में जाएँगे उसी में वापस आएँगे। क़िला घूमने के किए चालीस मिनट मिलेंगे। आप अगली नाव का इंतज़ार करिए।

हम सब वापस फ़ेरीवालों की भीड़ में पहुँचे। शिकंजी, गन्ना रस के बाद बर्फ़ का गोला वग़ैरह चखते रहे। आपके लिए आज जो बाज़ार में सबसे सस्ता स्थानीय मौसमी फल बिक रहा है, वही सबसे स्वास्थ्यपरक है।  क्या ज़रूरत है कि आप ढाई सौ रूपये के किसी विदेशी एनर्जी ड्रिंक के प्रति लालायित हों ? दूर देश से ला कर बेचा जा रहा फल केवल फल नहीं है, वह ट्रांसपोर्ट का भाड़ा और पैकेजिंग का सामान भी बन चुका है। यक़ीनन महँगा बिकेगा, निश्चित ही व्यापारी एग्ज़ॉटिक के नाम पर उसकी मुँहमाँगी क़ीमत वसूलेंगे।

स्थानीयता और ऋतु-अनुकूलन भोजन में जितना रख सकें, रखिए। चिन्तन से बौद्धिक बनिए, जागरूकता से भी, फ़्रांसीसी क्रान्ति को समझना एक बात है, फ़्रांस का मेकअप रोज़ लगाकर पर्यावरण को हानि पहुँचाना दूसरी। अमेरिका के आज़ादी आंदोलन से लेने को जो कुछ है, उसे विचारात्मक रखिए। भोगात्मक चीज़ें यथासम्भव देशी ही स्वास्थ्यसम्मत हैं। हम उनसे कह सकते हैं कि हम तुमसे आइंस्टाइन ले लेंगे, पर तुम्हारा मैकडॉनल्ड तुम्हें मुबारक़।

तक़रीबन एक बजे नाव में सवार हुए, पंद्रह मिनट में क़िले के नज़दीक पहुँच कर नाव थम गई। बड़ी नाव क़िले से थोड़ी दूर छोड़नी पड़ी। क्योंकि क़िले के गेट पर दूसरी नाव एक डोंगी में सवारियों को बिठा रही थी। नाव के नाविकों ने इस समय का उपयोग गाइड सेवा के बहाने चार लोगों पर चार सौ रुपए वसूलना शुरू किया जबकि क़िले पर गाइड जैसी सेवा की कोई ज़रूरत नहीं थी, बहुत थोड़ा सा इतिहास था जो कि हमें पता था। जब पहले वाली नाव चली गई तब हमारी नाव के पास एक डोंगी आई जिसमें बीस-बीस लोग बैठकर क़िले की दीवारों से टकरा कर मचलती लहरों के बीच क़िले की सीढ़ी पर उत्तर कर अंदर घुसे। हुसैन शाह का मक़बरा देखा, तोपें, महल, मीठे पानी की झील, मस्जिद और तहख़ाने के साथ मकानों के खंडहर देखकर वापस गेट पर पहुँचे। पहले डोंगी फिर नाव में बैठकर किनारे आ लगे।

आठ सौ सालों से यह क़िला अरब सागर की लहरों तूफ़ानी सैलाबों को सहता हुआ अपराजेय अचल खड़ा है क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में वहाँ पहुँचना कठिन है तो फिर तोपों के गोलों और बंदूक़ों की गोलियों की बौछारों के बीच कोई वहाँ कैसे पहुँच सकता है। इसके अपराजेय रहने का एक और कारण है कि इसके तटीय इलाक़े में अच्छी जलवायु से भरपूर खेती होती है, उस इलाक़े पर क़ब्ज़ा करने के बाद क़िले के सैनिकों को किनारे पर न आने देने की नीति से क़िले को जीतने की ज़रूरत नहीं रह जाती थी। लेकिन मुख्य भूमि से अलग थलग होने के कारण थोड़े दिनों के बाद विजेता इलाक़े को छोड़कर चले जाते थे।

वापसी में यातायात का क्रम पलट गया। टेम्पो से अलीबाग़, बस से मंडवा, नाव से गेट वे आफ इंडिया और लोकल से मालाड। नाव से गेट वे आफ इंडिया जाते समय समुंदर में ज्वार उठना शुरू हो चुका था। बड़े पल्लर नाव को बूटी तरह हिला रहे थे। कुछ लोग सी सिकनेस के शिकार होकर उल्टियाँ करने लगे। यात्रियों का सामान एक जगह से दूसरी जगह तेज़ी से खिसकने लगा। सीट को कसकर पकड़ बैठे रहे। किनारे पहुँचते-पहुँचते आठ बज चुके थे। बम्बई रोशनी में नहा रही थी। चर्चगेट स्टेशन पर ख़ाली खड़ी लोकल में सवार होकर नींद आने लगी। एक झपकी में दादर पहुँच गए और दूसरी में मलाड पहुँच गए।

 क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पाताल कोट – भाग – ५० ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पाताल कोट – भाग- ५० ☆ श्री सुरेश पटवा ?

गढ़चिरोली की वापसी यात्रा गोंदिया, बालाघाट, सिवनी और छिन्दवाड़ा के रास्ते से सम्पन्न की। यह इलाक़ा सतपुड़ा की दक्षिणी तलहटी और ऊपरी पठार पर आबाद गोंड देवगढ़ साम्राज्य द्वारा शासित रहा है जिसके प्रमाण स्वरुप गढ़ी प्राचीरों के खंडहर अकसर दिखते हैं। पातालकोट पिपरिया से पंचमढ़ी जाते हुए मटकुली से छिन्दवाड़ा जाने वाले मार्ग पर जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से 78 किमी पहले सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र  तल से जमीन के 1700 फीट नीचे बसा है। यह सतपुड़ा की पहाडि़यों के बीच समुद्र तल से 2750-3250 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह स्थान 79 वर्ग किमी में फैला हुआ है। पातालकोट आदिवासियों की एक अलग दुनिया वाले 12 गांवों का समूह।

अपनी संस्कृति, इतिहास और भौगोलिक स्थिति से इसकी वैश्विक नक्शे में अलग पहचान है तो वहीं दिन में भी रात का एहसास कराने वाला यह क्षेत्र जग प्रसिद्ध है। पिपरिया और परासिया के बीच स्थित तामिया से पतालकोट जाया जाता है। तामिया तुलतुला पर्वत श्रेणियों के बीच आकर्षक प्राकृतिक छटा के साथ स्थित है। इसके चारों तरफ ऊंची पर्वत श्रेणियां तथा घने जंगल अद्भुत शान्ति का आभास कराते हैं। यहां डाक बंगले पर पहुंच कर चारों तरफ विहंगम दृश्य नज़र आता है, तो इसका आकार एक घोड़े की नाल जैसा नजर आता है। ऐसी जनश्रुति है कि यह पाताल लोक जाने का दरवाजा है। एक समय यहां के आदिवासी बाहरी दुनिया से दूर थे, लेकिन अब सरकारी प्रयासों से वे समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं।

प्राकृतिक दृश्यावली के कारण यह बहुत मनमोहक है। पाताल से अर्थ इसका एक गहराई में बसा होना है। इसके मुहाने पर ब्रिटिश युग का बना हुआ सर्किट हाउस है, उससे जुड़ी अनेकों भूत-प्रेत कहानियाँ क्षेत्र में प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस जनजाति के लोग इस स्थान पर पिछले 5000 वर्षों से निवास कर रहे है। यह स्थान प्राकृतिक रूप से एक गहरी गर्त का किला-सा बन गया है। इसकी तलहटी से आसपास की पर्वत श्रेणियां करीब 1200 फीट ऊंची हैं। इसके पाास से ही दूधी नदी नर्मदा में मिलने निकलती है। वर्तमान में नीचे जाने के मार्ग बना दिए गए हैं। इसके पूर्व यहां लोग लताओं, बेलाओं तथा पेड़ पौधों को पकड़ कर नीचे और ऊपर आया जाया करते थे। यह स्थान अपनी अमूल्य जड़ी-बूटियों के लिए विख्यात है। यहां रहने वाले आदिवासी इन्ही जड़ी बूटियों से अपने कष्टों का निवारण करते हैं। वर्तमान में शासन द्वारा भी इन्हे चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। पातालकोट की सबसे खास बात यह है कि जमीन से नीचे होने और सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरा होने से इसके काफी हिस्से में सूरज की रोशनी देर से पहुंचती है, वह भी इतनी कम कि दिन में भी रात नजर आती है। बारिश के समय बादल इस घाटी में ऐसे दिखाई देते हैं जैसे तैर रहे हो। यदि कोई व्यक्ति यहां पहुंच जाए तो उसे लगेगा कि वह धरती के भीतर बसी अलग दुनिया में आ गया है।

पातालकोट की आदिवासी जीवन शैली से पुरातन युग का एहसास होता है। भारिया और गोंड परिवार रहन-सहन, खान-पान, दवा-दारू के लिए काफी हद तक जंगल के प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। समाज की मुख्य धारा में शामिल होने के बावजूद उनका भोजन मक्का, बाजरा, कोदो-कुटकी है। जड़ी-बूटियां होने से ये तुरंत अपनी बीमारी का इलाज कर लेते हैं। अब इन जड़ी-बूटियों को देश-विदेश में भी पहचान मिलने लगी है। पहनावा भी पहले की अपेक्षा आधुनिक युग जैसा हो गया है। पातालकोट के गांव कुछ दशक पहले तक रहस्य समेटे हुए थे। वर्ष 2007 में यहां पहला आंगनबाड़ी केंद्र खोला गया। प्रदेश सरकार द्वारा स्थापित पातालकोट विकास प्राधिकरण के माध्यम से यहां स्कूली शिक्षा, आईसीडीएस, प्राथमिक स्वास्थ्य जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई गई है। पातालकोट के ऊपरी गांव रातेड़ में वर्ष 2009 में तत्कालीन कलेक्टर निकुंज श्रीवास्तव ने रोमांचकारी आदिवासी खेल उत्सव की शुरुआत की थी और पर्यटकों को यहां पर्यटन के लिए आकर्षित किया था। तब से ये उत्सव हर साल नवम्बर से जनवरी के बीच हो रहे हैं। इससे पर्यटन नक्शे में पातालकोट को महत्व मिलने लगा है।

पौराणिक मान्यता हैं कि इस स्थान से रावण का पुत्र मेघनाथ, भगवान शिव की आराधना करने पाताललोक गया था। यह इलाका जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। पातालकोट के 12 गांव गैलडुब्बा, कारेआम, रातेड़, घटलिंगा-गुढ़ीछत्री, घाना कोडिय़ा, चिमटीपुर, जड़-मांदल, घर्राकछार, खमारपुर, शेरपंचगेल, सुखाभंड-हरमुहुभंजलाम और मालती-डोमिनी है, जहां एक समय जाना मुश्किल था। अब इसे पक्की सड़क से जोड़ दिया गया है। यहां की आबादी भारिया और गौंड आदिवासी समुदाय की हैं, जो अभी भी काफी हद तक प्राकृतिक व्यवस्थाओं पर आश्रित हैं। दृष्टि डालने से प्राकृतिक सौन्दर्य आपको अभिभूत कर देता है। इसके उत्तर दिशा में कुछ दूरी पर एक संकरे मार्ग से नीचे उतरने पर पर्वतीय गुफा में एक शिवलिंग स्थित है। इसके पास झरने के रूप में नीचे गिरने वाला पानी एक जल प्रपात सा प्रतीत होता है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग – ४९ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४९ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

8.गढ़चिरौली यात्रा

गढ़चिरौली

सुबह उठकर गढ़चिरौली ज़िले की अहेरी तहसील में स्थित सघन सागौन वन की सैर को निकल गए। गढ़चिरौली जिले का गठन 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर से गढ़चिरौली और सिरोंचा तहसीलों को अलग करके किया गया था। गढ़चिरौली जिला महाराष्ट्र के उत्तरी-पूर्वी कोने में स्थित है। यह पश्चिम में चंद्रपुर, उत्तर में  गोंदिया, पूर्व में  छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग, राजनांदगाँव, बस्तर और जगदलपुर ज़िले और दक्षिण पश्चिम में  तेलंगाना  राज्य के करीमनगर और आदिलाबाद जिलों से  घिरा है। गढ़चिरौली  आदिवासी  ज़िला है। मुख्य निवासी गोंड और माडिया समुदाय के लोग है। एक खास बात यहाँ 1972 से बंगाली समुदाय के शरणार्थी विस्थापित किए गए हैं।

मध्य भारत के गोंडवाना साम्राज्य का इतिहास बहुत प्राचीन एवं समृद्ध रहा है। यहां अनेक गोंड राजाओं ने शासन किया है। सर्वाधिक समय तक राजा यादवराय के 62 वंशजों (यादवराय से लेकर सुमेदशाह तक) ने शासन किया। इस वंश में महान प्रतापी राजा संग्राम शाह (48वें) हुए। इन्होने युद्ध करके अनेक राजाओं को हराया और 52 गढ़ स्थापित किये। गोंडों के 36 राज्य उत्तर में रायगढ़ से दक्षिण में गढ़चिरोली तक और 16 राज्य गढ़ मंडला से मकड़ाई रियासत तक, इस प्रकार कुल 52 राज्यों का समूह गोंडवाना साम्राज्य कहलाता था।    महाराजा संग्राम शाह का विशाल साम्राज्य जिन 52 गढ़ों तक फैला था, जिनकी सीमा  पश्चिम में गिन्नौर गढ़ भोपाल, पूरब में लाफागढ़ बिलासपुर, उत्तर में सिंगोरगढ़, दमोह और दक्षिण में टीपागढ़ (गढ़चिरोली) महाराष्ट्र तक फैला था। इस तरह राजा संग्राम सिंह ने 52 गढ स्थापित करके दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी से 1480 ई० में महाराजा और शाह की उपाधि धारण की थी।

प्राचीन काल में इस क्षेत्र पर राष्ट्रकूट, चालुक्य, देवगिरि के यादव और बाद में गढ़चिरौली के गोंडों का शासन था। 13 वीं शताब्दी में खांडक बल्लाल शाह ने चंद्रपुर की स्थापना की और इसे अपनी राजधानी बनाया। चंद्रपुर बाद में मराठा शासन में आया। 1853 में, बरार जिसमें चंद्रपुर (जिसे चंदा कहा जाता था) का हिस्सा भी था, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। 1854 में चंद्रपुर सेंट्रल प्रांत एंड बेरार का एक स्वतंत्र जिला बन गया।

लॉर्ड कर्ज़न की राज्य पुनर्गठन योजना के अंतर्गत 1905 में अंग्रेजों ने चंद्रपुर और ब्रम्हपुरी से एक-एक जमींदारी संपत्ति का हस्तांतरण करके गढ़चिरौली तहसील बनाई। यह 1956 तक सेंट्रल प्रांत का हिस्सा था, जब राज्यों के पुनर्गठन के साथ, चंद्रपुर को बॉम्बे राज्य में स्थानांतरित कर दिया गया था। 1960 में, जब महाराष्ट्र बनाया गया, चंद्रपुर नए राज्य का एक जिला बन गया। 26 अगस्त 1982 को चंद्रपुर का विभाजन हुआ, जिसमें गढ़चिरौली तहसील एक स्वतंत्र जिला बन गया। गढ़चिरौली में नक्सलवाद की जड़ें जमी हैं। छापामार लड़ाके पहाड़ियों और घने जंगलों में रहते हैं और इसे रेड कॉरिडोर के हिस्से के रूप में नामित किया गया है।

गढ़चिरौली से तेलंगाना राज्य की सीमा पर दक्षिण दिशा में अल्लापल्ली नाम का वन आच्छादित गाँव है। अल्लापल्ली आमतौर पर गोंडवाना गांव है, लेकिन अब, कई लोग शिक्षा, व्यवसाय और जीविका कमाने के उद्देश्य से वहां आ बसे  हैं। अल्लापल्ली के जंगल विश्व प्रसिद्ध सागौन की लकड़ी के ख़ज़ाने हैं। अल्लापल्ली से परमिली- भामरागढ़ रोड पर 07 किलोमीटर दूर 100 साल पहले वैज्ञानिक प्रबंधन के तहत मूल जंगल के रूप में संरक्षित ‘ग्लोरी ऑफ अल्लापल्ली’ वन पारिस्थितिकी के एक जीवित संग्रहालय के रूप में प्रसिद्ध है। जहाँ पर 500  वर्ष पुराने सागौन के 120 फ़ुट ऊँचे पेड़ मौजूद हैं। जिसे सागौन कहा जाता है वह साग का पेड़ है, एक जगह पर बहुत अधिक संख्या में साग के पेड़ होने से उसे सागवन पुकारा जाने लगा, वही सागवन कालांतर में सागौन हो गया।

पहले अल्लापल्ली हैदराबाद के निज़ाम के नियंत्रण में था। बाज़ीराव ने मराठवाड़ा को जीतकर नियंत्रण में लिया तब इस इलाक़े को नागपुर के राघोजी भोसले के अधीन रख दिया। इसलिए अल्लापल्ली तहसील की जनसंख्या मुख्यतः तेलुगु भाषी है लेकिन गावों में गोड़ों की बसावट है। वर्तमान में अल्लापल्ली महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले की तहसील ऐटापल्ली का एक ब्लॉक है। 

रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे ने बताया कि जिस गेस्ट हाऊस में हम रुके हैं वह अंग्रेजों द्वारा 1910 में बनाया गया था। अल्लापल्ली से 130 किलोमीटर दक्षिण दिशा में हत्थी केम्प बनाया गया है। लकड़ी उठाने और ढ़ोने के लिए कुछ हाथी आसाम के काज़ीरंगा पार्क से लाए गए थे। मशीनीकरण से बेरोज़गार हाथियों को सेवानिवृत्त करके एक पहाड़ी इलाक़े में रखा गया है। जहाँ उन्हें सप्ताह में दो बार चावल गुड घी और केलों का भोजन कराने हेतु एक तालाब के बीच बने हत्थी केम्प में लाया जाता है। उनके पैरों में लोहे की मोटी ज़ंजीर बांधी है जिनके घिसटने से भूमि पर बनने वाले निशानों से वनरक्षक उनकी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं और भोजन  के दिन उन्हें हाँका लगाकर हत्थी केम्प लाते हैं।

सबसे वयोवृद्ध हथिनी का नाम रूपा है, उसकी उम्र अस्सी साल बतायी जाती है। अल्लापल्ली की पुरानी हथिनी बसंती वहाँ के सबसे पुराने हाथी महालिंगा के संसर्ग से बच्चा नहीं दे रही थी इसलिए एक अन्य जवान हथिनी रूपा को हाथियों की संख्या बढ़ाने हेतु नागझिरा से अल्लापल्ली लाया गया। रूपा के पहुँचने से बसंती के कान खड़े हो गए। उसने महालिंगा पर कड़ी नज़र रखना शुरू कर दिया। दूसरी तरफ़ बसंती रूपा को चिंघाड़ कर चुनौतीपूर्ण धमकी देने लगी। एक दिन महलिंगा नज़र बचाकर रूपा के नज़दीक पहुँच सूँड़ से प्रेम का इज़हार करने लगा तो बसंती क्रोध से उफनते हुए रूपा पर टूट पड़ी और उसे धमकाकर घने जंगल में पहुँचा कर दम लिया। इस घटना के बाद वन अधिकारियों ने रूपा को तालाब की दूसरी तरफ़ आधे किलोमीटर लम्बी ज़ंजीरों से बांधकर वहीं उसके भोजन का इंतज़ाम कर दिया ताकि बसंती के दाम्पत्य जीवन में व्यवधान उत्पन्न न हो।

रूपा को अल्लापल्ली जंगल में बच्चे पैदा करके हाथियों की वंशवृद्धि का उद्देश्य पूरा न होते देख वन अधिकारियों ने केरल और आसाम से पशु विशेषज्ञ बुलाकर बसंती को एक साल तक कुछ इंजेक्शन दिए तो वह गर्भवती हुई और उसने बीस महीनों के बाद एक बच्चा जना, जिसका नाम प्रसिद्ध फ़िल्मी खलनायक अजीत के नाम पर रखा गया। बदली हुई परिस्थितियों में यह विचार करके कि शायद माँ बनने के बाद बसंती अब महालिंगा से रूपा को गर्भवती होने देगी। रूपा को उसके नज़दीक लाने की कोशिश की लेकिन बसंती ने अपनी मातृ सत्तात्मक पकड़ ज़रा सी भी ढ़ीली नहीं की। रूपा फिर एक बार मायूस हुई।  

कुछ सालों बाद अजीत जवान हो गया। रूपा की निगाह अजीत पर पड़ी। उसे भरोसा था कि बसंती अपने बच्चे अजीत के समागम से प्रजनन नहीं करेगी तो अजीत अंततोगत्वा उससे संसर्ग करेगा क्योंकि इलाक़े में उसके अलावा कोई और मादा नहीं है। बसंती को रूपा के इरादे भाँपते देर न लगी। अजीत भी अकसर भागकर रूपा के आसपास मँडराने लगा। जब अजीत उठाव पर आया तो बसंती ने उसके संसर्ग से एक और बच्चा दिया जिसका नाम एक अन्य फ़िल्मी विलेन रंजीत के नाम पर रखा गया। रूपा फिर एकबार मायूस हुई। बसंती का पुराना साथी महालिंगा उम्रदराज़ होकर मरा तब रूपा बसंती के परिवार को शान्तवना जताने आई परंतु बसंती ने उसे आते देख मुँह फेर लिया। अब रूपा ने हालात से समझौता करके जीना शुरू कर दिया है वह अकेली रहती है। हत्थी केम्प पहले आकर और भोजन करके चली जाती है। उसके जाने के बाद बसंती अपने परिवार को लेकर भोजन कराने आती है। मनुष्यों की तरह पशुओं में भी सौंतिया डाह के संघर्ष होते हैं।

हत्थी केम्प से लौटते समय मस्तिष्क में विचार आया कि पुरानी बाइबिल में लिखी, अब्राहम, साराह और हागार की कहानी के पात्र महालिंगा, बसंती और रूपा के रूप में साक्षात देखकर वापस लौट रहे हैं। अब्राहम पत्नी साराह और सेविका हागार के साथ दजला-फ़रात के मैदान में बसे कन्नान में रहते थे। साराह को बच्चे नहीं हो रहे थे इसलिए उसने अब्राहम से परिवार बढ़ाने के लिए सेविका हागार से बच्चा पैदा करने को कहा। अब्राहम और हागार से इस्माइल का जन्म हुआ। उसके बाद अब्राहम और साराह का भी  एक बच्चा इशाक नाम का हुआ। सुंदर सेविका हागार का बच्चा बड़ा होने से  साराह में सौंतिया डाह विकसित हुआ तो वह हागार और इस्माइल पर अत्याचार करने लगी। हागार पीड़ित होकर इस्माइल को लेकर अरब देश में मक्का पहुँची जहाँ इस्माइल के वंश में मुहम्मद का जन्म हुआ था जिन्होंने इस्लाम धर्म चलाया।

हत्थी केम्प से वापस अल्लापल्ली जंगल विभाग के गेस्ट हाऊस में रेंज आफ़िसर दोपहर का भोजन बनवाकर इंतज़ार कर रहे थे। भोजन करने के दौरान पता चला की टेक्सी ड्राईवर दारू से टुन्न होकर बकवास कर रहा है। फ़ारेस्ट गार्ड ने हमारे कहने पर उससे गाड़ी की चाबी छुड़ाकर हमें दे दी। रेंज फ़ारेस्ट आफ़िसर गणेश लाँड़गे से एक ड्राईवर का इंतज़ाम करवा कर हम भामरागढ़ की अगली यात्रा पर निकले।

अल्लापल्ली से 60 किलोमीटर की दूरी पर सिरोंजा डिविज़न का भामरागढ़ ब्लाक स्थित है। अल्लापल्ली से सात किलोमीटर पर वन विभाग का एक सौ वर्ष से प्राकृतिक अवस्था में आरक्षित वन है जिसमें किसी भी प्रकार की छेड़खानी नहीं की गई है। उसे “अल्लापल्ली का गौरव” वन नाम दिया है। उसमें पाँच सौ से अधिक वर्ष के पेड़ पाँच मीटर घेरे के हैं। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वह असंख्य जड़ीबूटियों का ख़ज़ाना है। भामरागढ़ के अंतर्गत कमलापुर रेंज है जो कि नक्सलवादियों का मायका माना जाता है। वहाँ महाराष्ट्र से पलकोटा और वेडिया नदियाँ छत्तीसगढ़ से आकर इंद्रावती नदी में मिलती हैं। त्रिवेणी संगम पवित्र स्थान माना जाता है। उन तीनों नदियों का जल इकट्ठा होकर इंद्रावती नदी के रूप में सिवनी ज़िले से निकली पेंच नदी वैनगंगा में मिलकर आगे वर्धा नदी से मिलकर प्राणहिता नदी कहलाने लगती है जो आगे तेलंगाना  के कालेश्वरम में गोदावरी से मिलती है। इस स्थान को “दक्षिण त्रिवेणी संगम” भी माना जाता है, क्योंकि यहाँ गोदावरी अपनी सहायक नदी प्रणाहिता से मिलती है, तीसरी नदी, हमेशा की तरह अदृश्य नदी सरस्वती है। हालाँकि सरस्वती हजारों साल पहले सूख गई थी, लेकिन यह यहाँ और कभी-कभी अदृश्य नदी के रूप में, कभी इलाहाबाद में, कभी श्रीशैलम, कालेश्वरम में, पॉप-अप होती रहती है, यह पता लगाना दिलचस्प होगा कि ये आस्था मान्यता कैसे विकसित हुई। जैसे ही आप गोदावरी के तट पर खड़े होते हैं, नदी आपके सामने जहाँ तक आप देख सकते हैं वहाँ तक फैल जाती है और दूसरे किनारे पर महाराष्ट्र का सिरोंचा जिला स्थित है! गोदावरी आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच प्राकृतिक सीमा बनाती है।

नक्सलियों के मायके अर्थात कमलापुर पहुँचते-पहुँचते शाम के छः बज चुके थे। फ़ारेस्ट गार्ड तुषार गौंड़ और वाहन चालक हमारे साथ थे। सबसे पहले बाबा आमटे के आश्रम हेमलकसा गए। उसके बाद त्रिवेणी संगम दर्शन किए। वहाँ तीन-चार युवक आ गए। संभवतः वे नक्सलियों के ख़बरी होंगे। उन्हें हमारे सुबह से उस इलाक़े में घूमने की जानकारी हो गई थी इसलिए वे टोह लेने आए थे। बातों-बातों में एक युवा जिसके चेहरे से बौद्धिकता झलक रही थी, उसने अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ा था। अतः उससे घनिष्ठ बातें होने लगीं। उसने बताया कि 1984 में इस कमालपुर रेंज से सैंकड़ों की संख्या में युवा लड़के-लड़कियाँ नक्सली बने थे इसलिए इसे नक्सलियों का मायका कहा जाता है और वे इस इलाक़े में वारदात नहीं करते अपितु इंद्रावती नदी के उस पार छत्तीसगढ़ का भोपालपत्तनम रेंज लगता है वहाँ कोंटा से बचेली तक के इलाक़े में क्रियाशील होते हैं। उसने बताया कि आंदोलन के बड़े नेताओं ने हैदराबाद, नागपुर और मुंबई में बड़े कारोबार स्थापित कर लिए हैं  और छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र व तेलंगाना की सरकारों ने प्रतिभावान आदिवासियों को वन विभाग, पुलिस व अन्य सरकारी विभागों में ऊँचे पदों पर नियुक्त करके नक्सलियों के बीच नेतृत्व का संकट पैदा कर दिया है।

गढ़चिरोली में पता चला कि ब्रह्मपुरी, भंडारा, गोंदिया, बालाघाट होते हुए दो रास्ते,  एक लालबर्रा-बरघाट और दूसरा वारासिवनी-कटंगी से सिवनी पहुँचते हैं जहाँ से पेंच अभयारण्य पहुँचा जा सकता है।          

हम हेमलकसा आश्रम पहुँचे। वहाँ एक प्रेरक कहानी हाथ लगी। एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में 26 दिसंबर 1914 को हिंगनघाट, वर्धा में देवीदास के घर एक बच्चे का जन्म हुआ था। उसका नाम मुरलीधर रखा गया। देवीदास ब्रिटिश भारत के जिला प्रशासन और राजस्व विभाग में अधिकारी थे। मुरलीधर को अंग्रेज़ी तौर तरीक़ों की तर्ज़ पर बचपन में बाबा करके पुकारा जाता था। वह आठ बच्चों में सबसे बड़ा था। उसका बचपन एक अच्छी हैसियत के ब्रिटिश नौकरशाह के सबसे बड़े बेटे के रूप में शिकार खेलों से भरा रोमांचक  घटनाओं के बीच बीता था। वह चौदह वर्ष की उम्र में बंदूक लेकर भालू और हिरण का शिकार करता था। जब वह गाड़ी चलाने योग्य हुआ तो पिता ने उसे पैंथर की खाल से बनी कुशन की गद्दियों वाली स्पोर्ट्स कार भेंट की थी। यद्यपि वह एक धनी परिवार में पैदा हुआ था, लेकिन हमेशा भारतीय समाज में व्याप्त  असमानता के बारे में सोचता रहता था। वह अपने पिता की नाराज़गी के बावजूद नौकरों के बच्चों के साथ नियमित रूप से खेलता था। दीवाली के दिन जब पूर शहर जगमगा रहा था दोस्तों के साथ बाज़ार में मटरगश्ती करते हुए उसका एक अंधे भिखारी से सामना हुआ। उसने मौज में आकर अपनी सिक्कों से भरी जेब को भीख के कटोरे में खाली कर दी। भिखारी को कटोरे का भार और बहुत सारे सिक्कों की खनक से महसूस हुआ  कि उसे मूर्ख बनाया जा रहा है, वह बोला “मै एक मजबूर भिखारी  हूं, मेरे कटोरे में पत्थर मत डालो, बाबा”, लड़के ने जवाब दिया “ये चोखे सिक्के हैं, पत्थर नहीं। आप चाहें तो कुछ ख़रीद कर इन्हें परख लें।”

इस घटना ने लड़के के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ा कि इस तरह के दुःखी इंसान  उसकी ज़िंदगी के बिलकुल करीब मौजूद हैं, जिनकी जिंदगियों में आशा और विश्वास सिरे से नदारत हो चुके हैं। उसे अपने पिता की विलासिता से भरी दुनिया में ग़रीबों के प्रति मौजूद उपेक्षापूर्ण निर्दयता से चिड़ होती थी, कि लोग इतने बेरहम कैसे हो सकते हैं कि आसपास बजबजाती ग़रीबी और भुखमरी से अनजान बने रहकर गुलछर्रे उड़ाते रहें।

मुरलीधर एक डॉक्टर बनने की इच्छा रखता था, लेकिन उसके पिता ने उसे वकील बनने के लिए मजबूर किया। वह चाहते थे कि उनका बेटा बड़ा वकील बनकर परिवार की मिल्कियत को संभाले। लड़के ने धनाढ्य वातावरण के जीवन को बहुत अच्छी तरह से अपना लिया। अपने दिन घुड़सवारी, शिकार, क्लब में तास के पत्तों और टेनिस खेलने में बिताता था। वह अमीरों का एक समृद्ध जीवन जी रहा था जो मानते हैं कि पैतृक विशेषाधिकार केवल भाग्यशाली को जीने का मौका देते हैं और उनका ग़रीबों के भाग्य के प्रति कोई दायित्व नहीं है। इस विलासिता पूर्ण जीवन के बीच वह बेचैन रहता था। एक दिन उसे लगा जैसे उसे दुनिया में एक बड़ा उद्देश्य पूरा करना है।

मुरलीधर कानून में प्रशिक्षित होकर वर्धा में वकालत शुरू करके एक सफल वकील बन गया। वह महात्मा गांधी और बिनोवा भावे से प्रभावित होकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के कारण अंग्रेजों द्वारा कैद किया गया। उन्होंने भारतीय नेताओं के लिए एक बचाव वकील के रूप में काम करना शुरू किया। महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए सेवाग्राम आश्रम में कुछ समय बिताया और गांधीवाद के अनुयायी बन गए। उन्होंने चरखे से बनाई खादी पहनकर गांधीवाद का अभ्यास व प्रचार किया। जब गांधी को पता चला कि उस लड़के ने एक एक ब्रिटिश अफ़सर के अत्याचार व उत्पीड़न से एक भारतीय लड़की को बचाया है, तब गांधी जी ने उसे “सत्य का निडर साधक” नाम दिया था।

उन दिनों कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों को एक सामाजिक कलंक माना जाता था और ऐसे रोगी समाज की मुख्य धारा से कटकर उपेक्षित जीवन जीने को अभिशप्त होते थे। मुरलीधर ने कोढ़ जैसे संक्रामक छुआछूत रोग को दूर करने का प्रयास किया। यहां तक ​​कि उन्होंने एक कोढ़ी को साथ रहने की अनुमति दी, यह साबित करने के उद्देश्य से एक प्रयोग के हिस्से के रूप में उन्हें इंजेक्शन लेने पड़े थे। तुलसीराम नाम के कुष्ठ पीड़ित व्यक्ति के साथ मुलाक़ात ने उनकी आत्म-छवि को चकनाचूर कर दिया। कुष्ठ रोग के अंतिम चरण में वह एक मांस के टुकड़ों के साथ उंगलियों या पैर की उंगलियों के बिना कीड़े और घावों के साथ वास्तव में एक जीवित लाश है। वह संक्रमण से घबरा गया। उसने खुद को निडर बनाने के बारे में सोचा। अगले 6 महीनों के लिए वह इस संकट की बेदर्द पीड़ा में रहा। उसने सोचा “जहाँ भय है वहाँ प्रेम नहीं है, और जहाँ प्रेम नहीं वहाँ कोई भगवान नहीं है।” भय और घृणा से घिरे कोढ़ियों की इस समस्या पर काबू पाने का केवल एक ही तरीका लग रहा था। उसे कुष्ठ पीड़ित लोगों के साथ रहना और काम करना होगा। उसने निश्चय किया।

“मुझे किसी भी चीज़ से कभी डर नहीं लगा जब मैंने एक भारतीय महिला का सम्मान बचाने के लिए ब्रिटिश ठोकरों से लड़ाई लड़ी, गांधी जी ने मुझे ‘अभय साधक’ कहा, जो सत्य का निर्भीक साधक था। जब वरोरा के सफाईकर्मियों ने मुझे नाले की सफाई के लिए चुनौती दी, तो मैंने ऐसा किया, लेकिन जब मैंने तुलसीराम की जीवित लाश देखी मैं डर गया। मुझे इस डर पर क़ाबू पाकर इसे कुष्ठ पीड़ितों के प्रति प्रेम में बदलना होगा।”

मुरलीधर ने कुष्ठ रोगियों की सेवा करने का निर्णय इस कारण लिया कि उन्हें एक ऐसे समाज का हिस्सा बनने में घृणा महसूस होती थी जो ऐसे दलित मनुष्यों की दुर्दशा के प्रति बहुत ही उदासीन था। उन्होंने इस उदासीनता को ‘मानसिक कुष्ठ’ के रूप में माना, जो कि सबसे भयावह बीमारी है जो किसी के अंगों को नहीं खो रही है, लेकिन अन्य मनुष्यों के लिए दया और करुणा महसूस करने के लिए प्रेम की ताकत खो रही है। उन्होंने लिखा:-

मैंने भगवान से अपनी आत्मा मांगी,

लेकिन मेरी आत्मा नदारत थी।

मैंने अपने में भगवान की तलाश की,

लेकिन मेरे भीतर भगवान भी नदारत था।

तब मैंने सेवा हेतु भाई-बहनों की मांग की।

मुझे उनमें आत्मा, भगवान और जीवन लक्ष्य मिल गया।

उन्होंने 1949 में 4 रुपये, 6 कुष्ठ रोगियों और एक लंगड़ी गाय के साथ वरोरा में महाराष्ट्र में अपना काम फैलाया है। कई संगठनों ने बाबा के कार्यों से प्रेरणा ली है और देश भर में और यहां तक ​​कि पूरी दुनिया में काम कर रहे हैं। दुनिया भर में मुरलीधर ने जो प्रभाव डाला, वह अचूक है और उनकी आत्मा एक दुर्लभ रत्न है जिसे दुनिया भाग्यशाली मानती थी।

मुरलीधर जानते थे कि बीमारी का इलाज करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि लोगों को इन सामाजिक प्रकोपों ​​से निजात दिलाकर आत्मनिर्भर, उत्पादक समाज का निर्माण करना महत्वपूर्ण है। कृषि से शुरू होकर वस्त्र उद्योग से लेकर लकड़ी के काम तक विभिन्न लघु और मध्यम स्तर के उद्योगों तक विस्तार एवं महारोगी सेवा समिति, वरोरा उत्पादक क्षेत्र में उनके सपनों का साकार स्वरुप था।

मुरलीधर ने महाराष्ट्र में कुष्ठ रोगियों, विकलांगों और समाज के हाशिये पर पड़े  लोगों के इलाज और पुनर्वास के लिए तीन आश्रमों की स्थापना की। महारोगी सेवा समिति, वरोरा (कुष्ठ सेवा समाज) कुष्ठ रोगियों के इलाज और मानसिक कुष्ठ रोग से पीड़ित समाज के उद्धार के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, जिसे  बाबा ने ‘आनंदवन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘फ़ारेस्ट ऑफ ब्लिस’। उन्होंने और उनकी पत्नी साधना ने 15 अगस्त 1949 को एक पेड़ के नीचे आनंदवन में एक कुष्ठ अस्पताल शुरू किया। 1973 में गढ़चिरौली जिले के माडिया गोंड आदिवासी लोगों के लिए काम करने के लिए लोक बिरादरी प्रचारक की स्थापना की। उन्होंने अपने जीवन को कई अन्य सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित किया, विशेष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन, वन्यजीव संरक्षण और नर्मदा बचाओ आंदोलन के महत्व पर सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए अनथक प्रयास किए। भारत सरकार ने 1971 में उनको पद्मश्री से सम्मानित किया।

उनके दो बेटे, विकास आमटे और प्रकाश आमटे, और पुत्रवधू, मंदाकिनी और भारती, डॉक्टर हैं। इन चारों ने अपना जीवन सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया है। प्रकाश और उनकी पत्नी मंदाकिनी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के माड़िया गोंड जनजाति के हेमलकसा गाँव में स्कूल और अस्पताल चलाते हैं, साथ ही एक शेर और कुछ तेंदुओं सहित घायल जंगली जानवरों के लिए एक अनाथालय है। उनके दो बेटों, डॉ. दिगंत और अनिकेत ने भी उन्हीं कार्यों को अपना जीवन समर्पित किया। प्रकाश और मंदाकिनी को 2008 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए मैगसेसे पुरस्कार मिला।

बाबा आमटे के बड़े बेटे विकास और उनकी पत्नी भारती आनंदवन में अस्पताल चलाते हैं और कई कल्याणकारी परियोजनाओं के साथ समन्वय करते हैं। आनंदवन में एक विश्वविद्यालय है, एक अनाथालय है, और अंधे और बधिरों के लिए स्कूल हैं। आनंदवन आश्रम आत्मनिर्भर है और इसके 5,000 से अधिक निवासी हैं। कुष्ठ रोग से पीड़ित लोगों के लिए “सोमनाथ” और “अशोकवन” आश्रमों की स्थापना की है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग – ४८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

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8.गढ़चिरौली यात्रा

नागपुर

नागपुर का नामकरण नाग नदी के नाम पर हुआ  है जो कभी इस शहर से होकर बहती थी, अब एक नाला की शक्ल अख़्तियार कर चुकी है। पुरानी  नागपुर बस्ती ‘महाल’ नाग नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित है। प्रत्यय पुर का अर्थ कई भारतीय भाषाओं में “शहर” है। इस प्रकार नाग नदी पर बसी बस्ती नागपुर कहलाई। नागपुर के पुराने नामों में से एक नाम “फणींद्रपुरा” था। इसकी उत्पत्ति संस्कृत शब्द फण (कोबरा का फन) से हुई है। नागपुर के पहले समाचार पत्र का नाम फणइन्द्रमणि था, जिसका अर्थ है एक गहना जिसे कोबरा के हुड पर स्थित माना जाता है। यह अज्ञानता के अंधेरे को रोशनी देने वाला अखबार हुआ करता था। बी.आर.अम्बेडकर के अनुसार शहर और नदी दोनों का नाम “नाग लोगों” के नाम पर रखा गया है। ब्रिटिश शासन के दौरान, शहर का नाम “नागपोर” (Nagpore) के रूप में लिखा जाता था।

पुरातात्विक स्रोतों के अनुसार वर्तमान नागपुर के आसपास मानव अस्तित्व का प्रमाण 3000 ईसा पूर्व से पाया गया है। द्रंगधाम (महाढ़  कॉलोनी के पास) में दफन स्थलों से संकेत मिलता है कि मेगालिथिक संस्कृति नागपुर के आसपास मौजूद थी। महाभारत काल में यह इलाक़ा विदर्भ नाम से जाना जाता था। जिसकी राजधानी अमरावती से कृष्ण ने रुक्मणी का अपहरण उसकी सहमति से करके विवाह किया था जबकि रुक्मणी का भाई रुक्मण उसका विवाह दुर्योधन से करने जा रहा था। “नागपुर” नाम का पहला संदर्भ वर्धा जिले के देवली में मिला है। दसवीं शताब्दी की तांबे की प्लेट के शिलालेख में शिलालेख नागपुरा-नंदिवर्धन द्वारा विजया (जिला) में स्थित एक गाँव के अनुदान का एक अभिलेख है, जो 940 ईस्वी में राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय के समय में था। तीसरी शताब्दी के अंत में, राजा विंध्यशक्ति को नागपुर क्षेत्र पर शासन करने के लिए जाना जाता है। चौथी शताब्दी में वाकाटक राजवंश ने नागपुर क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया जिसके गुप्त साम्राज्य के साथ अच्छे संबंध थे। वाकाटक राजा पृथ्वीविना प्रथम ने अपनी राजधानी को नागपुर से 38 किलोमीटर दूर नागदर्शन (प्राचीन नाम नंदिवर्धन) में स्थानांतरित कर दिया। वाकाटक के बाद यह क्षेत्र बादामी चालुक्यों, राष्ट्रकूटों के हिंदू राज्यों के शासन में आया। मालवा के परमारों ने ग्यारहवीं शताब्दी में नागपुर क्षेत्र को नियंत्रित किया था। नागपुर में परमारा राजा लक्ष्मीदेवा (1086-1094) का एक प्रशस्ति शिलालेख मिला है। इसके बाद, यह क्षेत्र देवगिरी के यादवों के अधीन आ गया। अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 में देवगिरि पर कब्जा करने के बाद यादव साम्राज्य पर आक्रमण किया, जिसके बाद 1317 में तुगलक राजवंश सत्ता में आया। 17 वीं शताब्दी में, मुगल साम्राज्य ने इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की, हालांकि मुगल काल में क्षेत्रीय प्रशासन गोंड साम्राज्य द्वारा चलाया गया था। आधुनिक शहर को गोंड राजवंश के बख्त बुलंद शाह द्वारा  अट्ठारहवीं शताब्दी में बसाया गया था।

छिंदवाड़ा अर्थात देवगढ़-नागपुर मिलीजुली गौंड़ रियासत में बख्त बुलंद शाह के बाद, देवगढ़ के अगले राजा चांद सुल्तान थे, जिन्होंने पहाड़ियों के निचले क्षेत्र में निवास किया, जिसे नागपुर कहा जाता था, उन्होंने इसे एक शहर में बदल दिया। चांद सुल्तान ने चंद्रपुर बसाया था। 1739 में चांद सुल्तान की मृत्यु पर बख्त बुलंद के एक नाजायज बेटे वली शाह ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया और चांद सुल्तान की विधवा ने अपने बेटों अकबर शाह और बुरहान शाह के हित में बरार के मराठा नेता राघोजी भोसले की सहायता ली। वली शाह को मौत के घाट उतार दिया गया और सही उत्तराधिकारियों को गद्दी पर बिठा दिया गया। 1743 में मराठा शासकों ने रियासत को मराठा साम्राज्य में मिला लिया। जिसकी शुरुआत राघोजी भोसले ने की, उन्होंने 1751 तक देवगढ़, चंदा और छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों पर विजय करके नागपुर रियासत स्थापित कर ली।

1765 में नागपुर को काफी हद तक जला दिया गया और 1811 में आंशिक रूप से पिंडारियों आतंक छाया जिन्हें मार दिया गया। 1803 के द्वितीय एंग्लो-मराठा युद्ध में राघोजी भोसले द्वितीय अंग्रेजों के खिलाफ पेशवा से मिलकर लड़े। 1816 में राघोजी द्वितीय की मृत्यु के बाद, उनके पुत्र परसाजी को मुधोजी द्वितीय भोसले ने अपदस्थ कर दिया था और उनकी हत्या कर दी गई थी। इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने उसी वर्ष अंग्रेजों के साथ एक संधि कर ली, मुधोजी 1817 में तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध में पेशवा के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़े, लेकिन वर्तमान नागपुर में सीताबर्डी के युद्ध में हार का सामना करना पड़ा। भीषण युद्ध एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि इसने भोसले के पतन की नींव रखी और नागपुर शहर के ब्रिटिश अधिग्रहण का मार्ग प्रशस्त किया। मुधोजी को सिंहासन पर एक अस्थायी बहाली के बाद हटा दिया गया था, जिसके बाद अंग्रेजों ने राघोजी II के पोते राघोजी तृतीय भोसले को सिंहासन पर बिठाया। राघोजी III (जो 1840 तक चली) के शासन के दौरान, इस क्षेत्र का प्रशासन एक ब्रिटिश निवासी द्वारा किया जाता था। 1853 में, बिना वारिस को छोड़कर राघोजी तृतीय की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने नागपुर पर अधिकार कर लिया।

1853 से 1861 तक, नागपुर प्रांत (जिसमें वर्तमान नागपुर क्षेत्र, छिंदवाड़ा और छत्तीसगढ़ शामिल थे) मध्य प्रांत और बरार का हिस्सा बन गए और ब्रिटिश राजधानी के रूप में नागपुर के साथ ब्रिटिश केंद्र सरकार के अधीन एक आयुक्त के प्रशासन में आ गए। बरार को 1903 में जोड़ा गया था 1867 में ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे (GIP) के आगमन ने एक व्यापार केंद्र के रूप में इसके विकास को प्रेरित किया।  टाटा समूह ने नागपुर में अपनी पहली कपड़ा मिल शुरू की, जिसे औपचारिक रूप से सेंट्रल इंडिया स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी लिमिटेड के रूप में जाना जाता था। कंपनी को लोकप्रिय रूप से “एम्प्रेस मिल्स” के रूप में जाना जाता था, क्योंकि इसका उद्घाटन 1 जनवरी 1877 को हुआ था, जिस दिन रानी विक्टोरिया को भारत की महारानी घोषित किया गया था।

असहयोग आंदोलन का आह्वान 1920 के नागपुर अधिवेशन से शुरू किया गया था। शहर ने 1923 में एक हिंदू-मुस्लिम दंगा देखा, जिसका के.बी. हेडगेवार, पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिन्होंने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की, जो नागपुर के मोहितेवाड़ा महल में एक हिंदू राष्ट्रवादी संगठन था, जिसने हिंदू राष्ट्र बनाने का विचार रखा।  1927 के नागपुर दंगों के बाद आरएसएस को नागपुर में और काफ़ी लोकप्रियता मिली और संगठन का राष्ट्रव्यापी विकास शुरू हुआ।

इतिहास की इन अठखेलियों से विचरते हुए नागपुर से चंद्रपुर 160 किलोमीटर और चंद्रपुर  से गढ़चिरौली 80 किलोमीटर यानि कुल 240 किलोमीटर अच्छी-बुरी सड़क से यात्रा तय करके रात्रि नौ बजे गढ़चिरोली गेस्ट हाऊस में जाकर गरम पानी से नहाकर खाना खाया और ग्यारह बजे पलंग पर लिहाफ़ में घुसते ही नींद ने आ दबोचा।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग – ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – गढ़चिरौली यात्रा – भाग- ४७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

8.गढ़चिरौली यात्रा

नक्सलियों के मायके में

कैलाश मेश्राम की स्टेट बैंक के भोपाल स्थित स्थानीय कार्यालय में पदस्थी के दौरान मेरी उनसे हुई मुलाक़ात मित्रता में बदल गई। कुछ समय बाद कैलाश की पदोन्नति सहायक महाप्रबंधक की श्रेणी में होने के साथ उनका तबादला अंकेक्षण (Audit) विभाग में हो गया। दोनों घूमने-फिरने के शौक़ीन थे इसलिए कैलाश जहाँ भी आडिट करने जाते वहाँ मुझे घूमने-फिरने बुलाते। अनेकों बार कार्यक्रम बनता परंतु किन्ही कारणों से बिगड़ जाता। नवम्बर 2020 के पहले हफ़्ते में कैलाश को आडिट हेतु पंद्रह दिन गढ़चिरौली में रहना था। उन्होंने मुझे गढ़चिरौली भ्रमण हेतु आमंत्रित किया।

मैंने गढ़चिरौली के वनीय वैभव, गोंडी-तेलुगु-मराठी लोगों की मिलीजुली जीवंत संस्कृति, बाबा आमटे के पुत्र प्रकाश आमटे एवं उनकी पत्नी मंदाकिनी आमटे द्वारा पलकोटा, वेडिया और इंद्रावती नदियों के त्रिवेणी संगम पर स्थापित लोक बिरादरी सेवा आश्रम, अल्लापल्ली के प्रसिद्ध सागौन वन क्षेत्र और मार्क्सवादी नक्सल आतंकवाद के मायके के नाम से मशहूर कमलापुर वनक्षेत्र के बारे में सुन रखा था। गढ़चिरौली भ्रमण की बड़ी पुरानी इच्छा कुलबुला उठी। नौ नवम्बर 2020 को कार के टैंक में सिरे तक पेट्रोल भराकर सुबह छः बजे भोपाल से गढ़चिरौली के लिए निकल लिए।  

ठंडी हवा के झोंकों से बतियाते जैसे ही अब्दुल्लागंज पार किया विंध्याचल पर्वत के सुहाने दृश्य और ताज़ी हवा के झोंकों ने मन प्रसन्न कर दिया परंतु वह प्रसन्नता अधिक देर नहीं टिकी रही क्योंकि आगे आठ-दस किलोमीटर लम्बा धूल भरा ट्रैफ़िक जाम उसका स्वागत करने को तैयार था। फ़र्स्ट ग़ैर में घिसटते-घिसटते एक घंटे का रास्ता तीन घंटों में पूरा कर इटारसी पार करके केसला और पथरौटा से गुज़र कर शाहपुर पहुँचने ही वाले थे कि सतपुड़ा की लुभावनी हरीतिमा को छूकर आए हवा के झोंकों ने उसकी तबियत खुश कर दी। पता चला कि बैतूल ज़िला लग चुका है। हरे भरे पहाड़ों से घिरे एक ढ़ाबे पर मुँह-हाथ धोकर घर से लाया टिफ़िन ख़ाली करके पेट में भरा और वहाँ पड़ी खटिया पर पटिया को सिरहाना बनाकर लेट गए। लेटते ही दिमाग़ में बैतूल ज़िले की भौगोलिक संरचना और बसावट के विचार तरंगित होने लगे।

बैतूल

बैतूल समुद्र तल से 2,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित वनों और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र  है, जो पूरे वर्ष यहाँ जलवायु को सुखद व मनमोहक बनाता है। यह सतपुड़ा रेंज के मैदानी इलाकों में स्थित होने से धूल भरे शहर के जीवन से एक सुखद, शांतिपूर्ण भ्रमण हेतु उपयुक्त है। बैतूल ज़िला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 180 किलोमीटर दूर छिंदवाड़ा, नागपुर, खंडवा, होशंगाबाद, हरदा जिलों की गोद में सतपुड़ा पर्वत के दक्षिणी पठार से नागपुर की तरफ़ फैले मैदान तक फैला हुआ है।

इतिहास की किताबों में यह क्षेत्र वाकाटक वंश, राष्ट्रकूट, सतवाहन, मुगल, गोंड, भोंसले, ब्रिटिश के अधीन रहा बताया जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, बैतूल क्षेत्र बदनूर का इलाक़ा के नाम से जाना जाता था। इस स्थान और ज़िले का वर्तमान नाम इसके दक्षिण में लगभग 5 किमी की दूरी पर बसे एक छोटे से शहर बैतूल-बाजार के कारण पड़ा है। लेकिन बैतूल शब्द कहाँ से आया? बैतूल का शाब्दिक अर्थ “बिना बाढ़” का है। इस क्षेत्र के चारों तरफ़ कपास की खेती बहुतायत से होती थी। किसानों ने यहाँ भी कपास लगाना शुरू किया लेकिन यहाँ की ज़मीन पथरीली और जलवायु नम से होने से यहाँ कपास का पौधा बढ़ता (तूल) नहीं था। जैसे “बातों को तूल  न देना” याने  न बढ़ाना एक मुहावरा है। वैसे ही कपास के पौधों का न बढ़ना बैतूल हो गया।

वहाँ आदिवासियों की छोटी हाट लगती थी जिसे बैतूल बाज़ार पुकारा जाने लगा। उन्नीसवी सदी में उड़ीसा और छत्तीसगढ़ फ़तह करके लौटते वक्त चौथ-सरदेशमुखी वसूली हेतु बिरार का इलाक़ा शिवाजी के वंशज राघोजी भोसले को सौंपा गया था। मराठा साम्राज्य विखंडन होने पर अंग्रेजों ने बैतूल को राजस्व तालुक़ा बना दिया। 1822 में जिला मुख्यालय को वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया, तभी से स्थानीय बोली में बदनूर इलाक़ा बैतूल के नाम से जाना जाने लगा।

बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में मराठों ने मंदिरों और पूजा स्थलों के रूप में अपने अमिट निशान छोड़ हैं। कई हिंदू और जैन मंदिर इस क्षेत्र के आसपास उसी समय के बने हैं। एक पहाड़ी की चोटी पर बना, मुक्तागिरी जैन मंदिर जैनियों के लिए यह एक पवित्र स्थान है। सबसे प्रसिद्ध मंदिर शहर के केंद्र से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बालाजीपुरम मंदिर है। 15 एकड़ में फैला, मंदिर 2001 में बनाया गया एक लंबा ढांचा और वास्तुकला में आधुनिक है। बसंत पंचमी के त्योहार पर हर साल मेला भरता है। कुकरुखमाला, सोना घाटी, मुलताई और शापना जलाशय आसपास के अन्य पर्यटन स्थल हैं।

अमरावती जिले में हाटीघाट और चिकलदा पहाड़ियों के किनारे ताप्ती की सहायक नदियाँ मोरंड और गंजल दक्षिणी-पश्चिमी सीमा निर्धारित करती  हैं। मोरंड नदी और ढोढरा मोहर रेलवे स्टेशन के आगे से तवा नदी ज़िले की उत्तरी सीमा बनाती हैं।  पूर्वी सीमा छोटी नदियों और पहाड़ियों से गुलज़ार हैं। जिनमें से खुरपुरा और रोटिया नाला बरसात के दिनों में बादलों से ढँके अनेकों प्रपातों का निर्माण करते  हैं। गोंड, कोरकु, भरिया, कुर्मी, कुनबी, मेहरा और चमार इस ज़िले के मुख्य निवासी हैं। क़रीब आधा घंटा आराम के बाद पुनः यात्रा शुरू करके शाम को पाँच बजे के आसपास नागपुर शहर के मकान दिखने लगे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२७ ☆ यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२७ ☆

?  यात्रा संस्मरण – लंदन डायरी – लंदन के घरों की छत पर उल्लू और दरवाजे पर सिंह ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लंदन में चलते हुए मेरी एक आदत बन गई है। सड़क पर चलते हुए अब मैं केवल सामने नहीं देखता, कभी ऊपर भी देखने लगता हूं। यह आदत इस शहर ने ही डाली है।

किसी पुराने भवन की खिड़की के ऊपर अचानक कोई पत्थर का चेहरा दिखाई दे जाता है। किसी दरवाजे के दोनों ओर दो छोटे सिंह बैठे मिल जाते हैं। कहीं छत के किनारे कोई पक्षी पंख समेटे बैठा है और कहीं भवन की दीवार पर कोई विचित्र सा जीव मानो सदियों से आने जाने वालों को देख रहा हो।

पहले मुझे लगता था कि यह सब वास्तुशिल्प की सजावट भर है। लेकिन थोड़ा खोजने पर पता चला कि लंदन के इन पत्थर और धातु के जीवों की भी अपनी एक भाषा है।

मिसाल के लिए सिंह।

लंदन में सिंह केवल चिड़ियाघर में नहीं मिलते। वे भवनों की रखवाली भी करते हैं। Bank of England की वास्तुकला में सिंहों की उपस्थिति को शक्ति का प्रतीक माना गया है और उन्हें बुरे इरादों से रक्षा करने वाली छवि से भी जोड़ा गया है। वहां सिंह दरवाजों, दीवारों और भवन के भीतर तक दिखाई देते हैं। उसी भवन में उल्लू भी हैं, जिन्हें ज्ञान और विवेक का प्रतीक माना गया है।

यहां एक तथ्य खास तौर पर ध्यान खींचता है। सिंह लंदन या ब्रिटेन के जंगलों का स्वाभाविक प्राणी नहीं है। ब्रिटेन में सिंह कभी जंगली पशु के रूप में नहीं रहे। फिर भी ब्रिटिश प्रतीक संसार में सिंह की उपस्थिति इतनी गहरी है कि वह राजसत्ता, शक्ति, साहस और संरक्षण का मानो स्वाभाविक प्रतीक बन गया है। शायद इसी कारण लंदन की इमारतों पर पत्थर के सिंह इतने सहज दिखाई देते हैं, जैसे वे इस शहर के पुराने निवासी हों। Bank of England स्वयं सिंह को शक्ति का प्रतीक और बुरे इरादों से रक्षा करने वाली स्थापत्य छवि के रूप में बताता है।

अर्थात भवन भी शायद कह रहा होता है, बाहर से मजबूत दिखो पर भीतर से समझदार रहो।

लंदन में सिंहों की कहानी इससे भी पुरानी और रोचक है। Trafalgar Square में Nelson’s Column के नीचे बैठे चार विशाल कांस्य सिंहों को Sir Edwin Landseer ने बनाया था और 1867 में उन्हें वहां स्थापित किया गया। उनकी भूमिका केवल सौंदर्य बढ़ाने की नहीं, बल्कि Nelson की स्मृति की रक्षा करने वाले प्रहरी जैसी कल्पित की गई।

Oxford Street के पास Stratford Place के प्रवेश द्वार पर सिंह की मूर्ति लगी है। अठारहवीं शताब्दी में बने इस परिसर के प्रवेश पर सिंहों की मौजूदगी मानो आने वाले को बता रही थी कि भीतर कोई साधारण जगह नहीं, एक विशिष्ट आवासीय संसार है।

और फिर है South Bank Lion,

कभी यह सिंह Lambeth की Lion Brewery की छत के ऊपर बैठकर Thames की ओर देखता था। 1837 में William Frederick Woodington ने इसे Coade Stone में बनाया था। Brewery खत्म हुई, भवन भी चला गया, लेकिन सिंह बचा रहा। वह लंदन में इधर से उधर घूमता हुआ अंततः Westminster Bridge के पास पहुंच गया। आज वह Grade II* listed ऐतिहासिक मूर्ति है।

एक सिंह ने मानो नौकरी बदल ली, लेकिन शहर नहीं छोड़ा।

उल्लुओं की कहानी कुछ और दिलचस्प है।

Southwark में एक पुराने मकान की ऊपरी मंजिल की दीवार पर एक उल्लू और एक बिल्ली की छोटी मूर्तियां लगी हैं। स्थानीय तौर पर यह जगह “Owl and the Pussy-Cat” house के नाम से जानी जाती है। इन मूर्तियों का वास्तविक कारण आज भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है। अनुमान लगाया जाता है कि शायद इनका संबंध Edward Lear की प्रसिद्ध कविता से हो, लेकिन यह भी केवल संभावना है।

मुझे लंदन की यही बात अच्छी लगती है। यहां हर चीज का अर्थ जरूरी नहीं कि एक ही हो।

कभी मूर्ति वास्तुशिल्प है, कभी प्रतीक, कभी इतिहास की बची हुई निशानी और कभी किसी व्यक्ति की निजी शरारत।

सबसे बड़ी बात आम लोग भी अपने घरों में ये प्रतीक मूर्तियाँ लगवाये हुए हैं।

हमारे यहां भी घरों के बाहर हाथी, सिंह, घोड़े, हंस और देवी देवताओं की प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। उनके पीछे अक्सर धार्मिक विश्वास, वास्तु संबंधी धारणाएं या शुभता की कामना होती है। लंदन में भी प्रतीक हैं, लेकिन उनका अर्थ अधिक बार इतिहास, शक्ति, पेशे, कला, स्मृति या निजी रुचि से जुड़ता दिखाई देता है।

और शायद इसीलिए यहां चलते हुए ऊपर देखना भी एक तरह का इतिहास पढ़ना है।

नीचे फुटपाथ पर आज का लंदन चल रहा है। लोग मोबाइल पर बातें कर रहे हैं, बसें आ जा रही हैं, साइकिलें निकल रही हैं, कोई टु गो कप कॉफी लेकर जल्दी में है।

और ठीक उनके ऊपर, किसी पुराने भवन की छत पर बैठा एक पत्थर का उल्लू चुपचाप सब देख रहा है।

वह न मोबाइल देखता है, न घड़ी।

सिंह भी वहीं है, अपनी जगह अडिग।

सदियों से शायद उसका काम ही यही है, शहर को मूक रहकर देखते रहना।

मैं सोचता हूं, लंदन के भवन केवल ईंट, पत्थर और शीशे से नहीं बने हैं। उनके चेहरे भी हैं, कान भी हैं, आंखें भी हैं और कभी कभी छत पर बैठे हुए उल्लू भी।

बस फर्क इतना है कि लंदन की इन मूर्तियों से दोस्ती करने के लिए आपको ऊपर देखना पड़ता है।इस शहर में इतिहास अक्सर संग्रहालय में बंद नहीं मिलता।कभी वह आपके सिर के ऊपर छत पर बैठा होता है।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

पिपरहा से सतधारा 14 नवम्बर 2019

पिपरहा में नर्मदा का एक रेतीला किनारा है। आश्रम व्यवस्था बहुत अच्छी है रात को स्वामी जी के सेवक ने स्वादिष्ट खिचड़ी खिलाई। रास्ते में गन्ने और तुअर की खड़ी फ़सल के अलावा कुछ न दिखता था। गुड़ की चरखी सक्रिय होने लगीं। तीन बड़े कड़ाह लाइन से बनाए, उनके नीचे आग जलाने हेतु ख़ाली जगह आगे तक चली गई है, आख़िर में धुँआ निकलने की चिमनी है जिनसे धुँआ निकल रहा था। पूरे भारत में करेली मंडी का गुड़ मशहूर है। गुड़ की दो और मंडी श्रीधाम और नरसिंहपुर में चालु हो गईं हैं। मंडी में किसान का गुड़ तीस-पेंतीस रुपए किलो बिकता है वह लोगों तक पहुँचते-पहुँचते सौ रुपए किलो हो जाता है। एक सहयात्री मुंशीलाल भाई  ने एक किलो गुड़ और एक किलो तुअर दाल ख़रीदी, दूसरे जगमोहन भाई ने बीज रहित हल्के हरे रंग के भटे लेकर पिट्ठु बेग में रख लिए।

रास्ते में बहुत से परिक्रमा वासी मिले वे सब के सब कहार, ढीमर, नाई, विश्वकर्मा या पिछड़े वर्ग के थे। कोई भी ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रि, ठाकुर यहाँ तक कि कोई लोधी परिक्रमा शुरू करता या यात्रा करता नहीं मिला। परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की कामना से की जाती है इसलिए नर्मदा के प्रति अगाध आस्था उनका अवलंबन होता है, उनकी  प्रेरणा होती है। वे लट्ठा कपड़े की दो आधी लुंग्गी, दो आधी बाँह के कुर्ते के साथ उसी कपड़े से सिला दो तरफ़ा लटकन झोला काँधे पर लटकाते हैं, जिसमें दो शीशियों में नर्मदा जल और पूजा का सामान रखा रहता है। एक लोटा और गिलास होना ज़रूरी होता है। हाथ में एक छड़ी जिसे वे सुखनाथ कहते हैं उनका आभूषण है। कई नंगे पैर, कुछ चप्पल और कुछ प्लास्टिक जूते पहने मिले।

नर्मदा की छाती को छलनी करते रेत माफ़िया के कारिंदे दिखे उनसे बातें करने पर रेत माफ़िया कारोबार समझ आया। बीच नदी से रेत निकालने वाले को 250 रुपए, नाव से डंपर में भरने वाले को 200 रुपए मिलते हैं।  एक डंपर के माफ़िया किंग को बाज़ार से 5000 रुपए मिलते हैं। 450 की लागत में 350 का डीज़ल जोड़ लें तो 4200 रुपयों का लाभ एक डंपर पर होता है। ऐसे पाँच फेरों पर 21000 रोज़ाना का धंधा है। पकड़े जाने का कोई डर नहीं क्योंकि पूरा काम दूसरों से कराया जाता है। यदि कारिंदे पकड़े भी गए तो पुलिस, प्रशासन, नेता विधायक किसी को गवाह नहीं बनने देते, कोई अड़ा तो उसकी लाश नर्मदा जी की भेंट चढ़ जाती है, अब प्रेस के लोग भी सक्रिय भागीदार हैं। इस महान देशभक्ति पूर्ण राष्ट्रवाद में दोनों राजनैतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में आपसी समझ से मिलीभगत विकसित होकर एक तंत्र का रूप ले चुकी है। नेता, पुलिस, अधिकारी, मिडिया इन सभी के परिजन, चंगु-मंगू सरकारी ठेकेदार या बिल्डर-कालोनाइजर्स, इन सभी को मुफ्त के भाव की रेत-गिट्टी-पत्थर-लकड़ी-जमीन मिलती है। इन दबंगों पर हाथ डालने की हिम्मत कौन करे, जो करे वो पिटे, मंत्री का दर्जा प्राप्त कम्प्यूटर बाबा भी नाकाम हैं। छोटी नदियों की बर्बादी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। चम्बल इलाके में ठाकुर मूंछ पर ताव देकर चम्बल में उत्खनन कर रहे हैं, सालों से रोकने की घोषणाएं हो रही हैं लेकिन होता कुछ नहीं, जो रोकने की हिमाकत करता है उस पर ट्राली चढ़ा दी जाती है। कई पुलिस, सरकारी अधिकारी जान गँवा चुके हैं। सभी नदियों की यही दुर्दशा है। स्वार्थ में अंधे लोग धरती माँ की छाती का सारा दूध निचोड़ कर उसे मरने के लिए छोड़ देंगे। स्थिति वाकई भयावह हैl गर्मियों में जगह जगह नर्मदा जी का प्रवाह रुक जाता है।  बरगी डेम से अमावस्या/पूर्णिमा पर स्नान के लिए पानी छोड़ा जाता हैl अत्यधिक उत्खनन के कारण नर्मदा जी की जल धारण क्षमता कम हो गई है। सहायक नदियों का बारिश के बाद सूख जाना, जंगल की अत्यधिक कटाई जैसे कारक इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।

शेर नदी अब तक नरसिंघपुर करकबेल के बीच ट्रेन से घरघराते हुए देखी थी जो लखनादौन के दक्षिणी पूर्वी जंगल में बटका से निकलती है हर्रई जागीर का घेर लगाकर नर्मदा से मिलने नीचे भागती है। रातीकटार गाँव के निकट नर्मदा में मिलती है। उसे नज़दीक से देखा, शेर नदी को नाव से पार किया। जहाँ मिलन होता है वहाँ ऐसा लगा मानो नर्मदा भी उत्तरी तट से दौड़कर शेर को गले लगाने भागती आई है, प्रेम की गहराई का नाप नहीं होता। नर्मदा-शेर मिलन स्थल का संगम बहुत गहरा था। वहाँ से बरमान राजमार्ग पुल दिखने लगा तो यात्रियों में ऊर्जा का संचार होकर क़दम तेज़ हो गए और बारह किलोमीटर की रुकरूक कर यात्रा पाँच घंटों में पूरी करके तीन बजे सतधारा पहुँच गए। जब सारे साथी नहाकर पूजा कर रहे थे, मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसे  विचार उभर आए।

हमारा धर्म हमें समग्रता में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना सिखाता है। वैदिक सभ्यता हमें प्रकृति के चर यथा पृथ्वी, अग्नि, अरुण, वरुण, आकाश और इंद्रियों के रूप में हमारे शरीर में मौजूद इन तत्वों के स्वामी मन स्वरुप इंद्र के प्रति यज्ञों से “तेरा तुझको अर्पण” करना सिखाता है। उपनिषद हमें आत्मा-परमात्मा से मिलाकर आध्यात्मिकता की रहस्यमयी दुनिया की दार्शनिक सैर कराते हैं। षठ दर्शन के निचोड़ स्वरुप वेदान्त दर्शन के आधार पर रचे पुराण जन साधारण को यज्ञों की कठिन दुरुह प्रक्रिया से हटाकर और आध्यात्मिकता की तर्क-वितर्क सघनता से बचाकर आश्चर्य जनक क़िस्से कहानियों के माध्यम से कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, जन्म-पुनर्जन्म और निष्काम कर्म का अभ्यास कराते हुए वेदों के अरुण, वरुण, अग्नि, पृथ्वी, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और नदियों की पूजा का पाठ पढ़ाते हैं। इसीलिए नर्मदा को देवी मानकर पूजना प्रकृति के प्रसाद जल तत्व जो 70% परिमाण में हमारे शरीर में जीवन की नैया खेता है, के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है। वेदों में वर्णित प्रकृति याने प्रथम-कृति के स्वामी रुद्र पुराणों में शिव हो गए हैं। नर्मदा का हरेक कंकड़ शंकर की तरह पूजनीय हो गया। लोकआस्था के पक्ष में इससे बड़ा कौन सा तर्क हो सकता है। नर्मदा के प्रति पूज्य भावना जीवन के प्रति आस्था की प्रतीक है। हिंदू धर्म कृतज्ञता पर टिका है, कृतघ्नता पर नहीं।  सेमेटिक धर्म के अहमन्य कृतघ्न लोगों ने प्रकृति चरों की उपेक्षा से अपने देशों को सुलगते रेगिस्तान बना लिए हैं, भारत अभी भी सुजलाम-सुफलाम है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

समनापुर से पिपरहा 13 नवम्बर 2019

समनापुर पहुँचते-पहुँचते अरुण भाई की पीठ में दाहिनी तरफ़ दर्द होने लगा, समनापूर में जगमोहन भाई ने उनकी पीठ दबाई, अविनाश भाई ने दर्द-नाशक क्रीम लगाकर कंबिफ़्लेम गोली खिलाई। उन्हें आराम लगा, लेकिन दर्द हुआ क्यों?

पहली बात है कि हम केवल पैरों से नहीं चलते बल्कि पूरे शरीर से चलते हैं, दाहिना पैर आगे बढ़ाकर रखते समय पीठ के बाँए तरफ़ की मांसपेशियाँ सक्रिय होतीं हैं, बाँए पैर बढ़ाते समय दाहिना हिस्सा ज़ोर लगाता है। इस प्रकार पीठ भी चलने में थकती है।

दूसरी बात सुबह ख़ाली पेट दस किलोमीटर चलने से शरीर में मांसपेशियाँ में ऊर्जा ख़त्म होती है तो हड्डियों को ज़ोर लगाना पड़ता है, वे दर्द करने लगती हैं।

तीसरा ख़ाली पेट रहने से गैस बनने से भी दर्द होता है।

चौथा नींद पूरी न होने से माँसपेशियों को आराम न मिलने से शरीर में जान नहीं रहती, चलने में थकावट से दर्द हो सकता है।

आपस में चर्चा करके निश्चय किया कि आगे इन बातों का ध्यान रखना होगा। कुछ साथियों ने छोटा धुँआधार नहीं देखा था, वे सुबह छः बजे वहाँ चले गए इसलिए सात बजे निकलने के बजाय आठ बजे पिपरहा के लिए यात्रा शुरू की। खेत में बखर चल जाने से रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ था उस पर मुसीबत यह कि तीन चौड़े नाले किनारदार पगडंडियों से पार करने पड़े। पहले बम्होरी गाँव पड़ा वहाँ किसान के खेत से गन्ना काट कर खाया। उसके बाद हथिया, झामर, घूरपुर और घाट-पिपरिया होते हुए पिपरहा पहुँचना था।

सुबह आठ बजे पंद्रह किलो वज़न लाद कर चल पड़े दो किलोमीटर चलकर नर्मदा का बहुत सुंदर घाट हथिया घाट आया वहाँ नर्मदा संगमरमर की शिलाओं का निर्माण करते हुए भारी खरखराहट से बह रहीं हैं नहाने योग्य किनारा नहीं है। थोड़ा नाश्ता खाया फिर आगे बढ़े तो चिंकी घाट आश्रम में सेवक ने चाय पिलाई। इसे च्यवन ऋषि का आश्रम स्थान बताया, वे औषधि विज्ञान के प्रणेता माने जाते हैं। च्यवन ऋषि का आश्रम इन भूमध्य सागरीय पर्वतीय वनस्पतियों के बीच होना सही प्रतीत होता है, क्योंकि औषधीय पौधे कर्क और मकर रेखा के बीच ऐसी ही जलवायु में पनपते हैं। उसके बाद झामर गाँव से होते हुए घूरपुर आश्रम पहुँचे। वहाँ एक महाराष्ट्रियन युवक चार महीने से चौमासा बिता रहा रहे हैं। वे निरंतर चिल्ला कर बोलते रहते, शायद अंदरूनी ख़ालीपन को भरने की कोशिश में पूरे ख़ाली होकर समाधि के चरम बिंदु की तलाश में भटक रहे हों। उनसे मिलने लातूर से गाड़ी भरकर एक परिवार आया हुआ था। उनका भोजन तैयार हो रहा था यहां महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले से एक साधु चौमासा कर रहे थे। उनके भक्तों ने भंडारा आयोजित किया था सो पूरन पोली, हलुआ, लड्डू, पूरी, सब्जी, दाल, चावल सब कुछ भरपेट खाया। एक घंटे आराम करके निकल पड़े। रास्ता अत्यंत दूभर था दो साथी तो आसानी से पार कर गए लेकिन तीन साथी भय से थरथराते नाला पार न कर सके। वे ऊपर चढ़कर दो किलोमीटर घूम कर पिपरहा के किनारे पहुँचे। दो साथी छोटा धुँआधार पहुँचे उन्होंने एक घंटे धुँआधार निहारा फिर एक किलोमीटर ऊपर चढ़ कर बिछड़े साथियों से जा मिले। एक निजी धर्मशाला में विश्राम करने रुक गए। थोड़ी देर बाद शरण पाने पाँच परिक्रमा यात्री वहाँ पहुँचे लेकिन जगह की कमी महसूस कर वे गाँव के स्कूल में जाकर रुके। करण सिंह ढीमर ने हमारे भोजन की व्यवस्था कर दी।

कुछ आश्रमों में अहमन्य, अहंकारी और धनलिप्सा में डूबे मठाधीशों के क्रोधी, वैमनस्य और लोभी चरित्र पर एक महाराज जी से चर्चा हुई तो हमने उनसे जानना चाहा कि :- “महाराज! काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह और मत्सर इन छः दोषों को हिंदू धर्मशास्त्रों में षठरिपु कहा गया है इनमें से एक भी दोष का लेशमात्र साधु के समस्त ज्ञान वैराग्य को नष्ट करने हेतु पर्याप्त है।”

महाराज बोले “ये सब शास्त्रों में लिखी बातें हैं, ये लोग यम, नियम, संयम और समाधि द्वारा सन्यास की स्थिति तक पहुँचने की विभिन्न दशाओं में भटक रहे हैं, जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हो जाएगा तब उनके षठरिपु शांत हो जाएँगे।”

हमने कहा “महाराज गीता तो प्रपंचियों को भी ईश्वर को समर्पण द्वारा मुक्ति का मार्ग बताती है, सांख्ययोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, सन्यासयोग और पतंजलि योग भगवान तक पहुँचने के मार्ग हैं। अंत में भगवान कहते हैं कि मनुष्य कितना भी बड़ा पापी हो लेकिन अंत में सच्ची समर्पित भक्तियोग द्वारा मुझे प्राप्त कर सकता है, अतः मेरी शरण में आओ, मम शरणम ब्रज! क्या ये बाबा बनावटी भक्ति के अज्ञान योग से सम्पत्ति लोभ में डूबे हुए नहीं हैं।”

महाराज ने यह कहकर वार्ता समाप्त की, “शायद आप ठीक कह रहे हैं। संसार में सब प्रकार के लोग होते हैं।”

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)

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7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

गरारू घाट से समनापुर 12 नवम्बर 2019

आज कार्तिक मास  की चौदहवीं के चाँद की रात है, आज तक चौदहवीं के चाँद के रूप में रूपहले परदे पर वहिदा रहमान का चेहरा शकील बदायुनी के गीत

और रवि के संगीत की धुन पर मुहम्मद रफ़ी  के दिलकश गायन के साथ गुरुदत्त की अदायगी को जानते थे। सोचा आज नर्मदा के लावण्यमय सलिल प्रवाहित धुन पर चाँदनी को लहरों पर लास्य करते देखेंगे। रात दो बजे कार्तिक पूर्णिमा की खिली चाँदनी में सुवासित वसुन्धरा का अवलोकन किया तो मैथिलीशरण गुप्त लिखित पंचवटी काव्य सहज ही फूट पड़ा।

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि अम्बर तल में।

पुलक प्रकट करती धरती, हरित तृणों की नोकों से,

मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

सोचा यहाँ टेंट में लेटे हुए इतना सुंदर दृश्य है तो नर्मदा के कल-कल जल में चाँदनी का नृत्य लास्य कैसा होगा, हमसे रहा नहीं गया। नर्मदा किनारे पहुँचे तो अलौकिक सौदर्य से स्तब्ध रह गए, ऐसा लगा जीवन को सम्पूर्णता प्राप्त हुई, यदि अभी यमराज आकर चलने को कहें तो चाँदनी के डोले में बैठकर ख़ुशी-ख़ुशी यमलोक चल देंगे। फिर तंद्रा टूटी तो क्या देखा…!

क्या ही स्वच्छ चाँदनी यह, क्या ही निस्तब्ध निशा;

है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?

बंद नहीं अब भी चलते हैं, नियति के कार्य-कलाप,

कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप।।

क़रीब एक घंटा शांत और चुपचाप चार चीजें हमसे बतियाती रहीं, नर्मदा, चाँदनी, कलकल ध्वनि और शीतल पवन, ब्रह्म मुहूर्त होने को था,  एक झपकी लेने इन शब्दों को गुनगुनाते वापस लौट पड़े…!

है बिखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर,

रवि बटोर लेता है उनको सदा सवेरा होने पर।

और विरामदायिनी अपनी संध्या को दे जाता है,

शून्य श्याम-तनु जिससे नया रूप झलकाता है।

सौंदर्य रसपान के बाद की निद्रा चार बजे नर्मदा उसपार से आती मुर्ग़े की बाँग से टूटी और हम पंचवटी के किरदारों की तर्ज़ पर लोटा भरकर प्रकृतिजन्य निस्तार को निकल गए।

गरारू घाट पर नर्मदा के अद्भुत सौंदर्य के दर्शन होते हैं। पौराणिक मान्यता है कि देवासुर संग्राम के समय गरूड़ देव ने तपस्या की थी, दो आमने-सामने पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर हैं जिन्हें गौड़ राजा बलवंत सिंह ने सत्रहवीं सदी में इंडो-पर्शियन शैली में बनवाया था। गुंबद व आर्च पर्शियन शैली और तोरण व गर्भगृह भारतीय शैली में बने हैं। असल में जिसे पर्शियन कला कहा जाता है वह पूरी तरह पर्शियन नहीं है, सिकंदर द्वारा पर्शिया याने ईरान को जीतने के बाद ग्रीक मूर्तिकला और भवन निर्माण ईरानी तरीक़ों में घुल मिल गए हैं। गुंबद और आर्च में वही मिलाजुला रूप दिखता है।

सोलहवीं सदी में मुग़ल सेनापति आसफ़ख़ान द्वारा रानी दुर्गावती के पराभव के बाद अकबर ने गोंडवाना को अधीनस्थ करके कराधीन राज्य के रूप में मुग़ल साम्राज्य में मिला लिया जिसकी राजधानी मदनमहल रही आई लेकिन राज्य व्यवस्था गोंडवाना राजाओं के हाथ में रही। मुग़लों को सालाना एकमुश्त रक़म बतौर नज़राना मिल जाती थी। गोंडवाना राजा छोटी रियासतों और जागीरों के माध्यम से राज्य का प्रबंधन और लगान वसूली करता था। फ़तहपुर, मकड़ाई, शोभापुर, देवगढ़, छिन्दवाड़ा और छत्तीसगढ़ी  रियासतें तथा जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद और छिन्दवाड़ा जिलों में हर्रई जागीर जैसी सैकड़ों जागीरें थीं। राजा बलवंत सिंह मुग़ल दरबार में जाते रहते थे। वे शाहजहाँ के समकालीन थे जो कि मुग़ल स्थापत्य कला का स्वर्णकाल माना जाता है। राजा बलवंत सिंह ने मुग़ल स्थापत्य कला से प्रभावित होकर इन मंदिरों का निर्माण और मरम्मत कार्य करवाया था। इन मंदिरों का रख रखाव अच्छा नहीं है। पहाड़ियों पर शिव और गरूड़ मंदिर से नर्मदा का पूर्व की तरफ़ दस किलोमीटर से पश्चिम में दस किलोमीटर तक प्रवाह का विहंगम दृश्य दिखता है। संभवतः नर्मदा के पूरे प्रवाह में ऐसा नज़ारा सिर्फ़ वहीं से नज़र आता होगा। उत्तरी तट पर बिखरी हरियाली और पेड़ों के प्रतिबिम्ब नर्मदा में झिलमिल करते लुभावने लग रहे थे। पहाड़ियों के दक्षिण में दलहन के पीले खेतों के साथ गन्ने के खेतों के हरियाली बिखेरते नज़ारे थे।

जब हम गरारू घाट से सात बजे चले तब केरपानी घाट पर बना नर्मदा पुल और उसके बारह पाए स्पष्ट दिख रहे थे लेकिन वह पाँच किलोमीटर दूर था। नर्मदा किनारे बखेरे खेतों से पगडंडी पकड़ी कहीं-कहीं स्प्रिंकलर की सिंचाई से मिट्टी गीली होने से रेतीले रास्ते पर चलना पड़ा। तीन नालों की गहराई बड़ी मुश्किल से पार कर पाए। बारह बजे के आसपास केरपानी पुल के नीचे डेरा जमाया वहाँ से दो किसान विधिविधान से अखंड परिक्रमा उठा रहे थे। उन्होंने भंडारा का आयोजन किया था, उसी में भरपेट प्रसादी ग्रहण की। उन दोनों ने कर्मकांड पूरा करके भोजन किया फिर विदाई देने आए साथियों के साथ गाँजे की संगत जमाई।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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