English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 7 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 7/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 7 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

कोई रिश्ता नहीं

रहा  फिर  भी,

एक तस्लीम तो

लाज़मी सी  है…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

Agreed there remains

no relation now; 

At least, an admittance

Is inevitably desirable…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

गर शतरंज का शौक़ होता

तो तमाम धोखे नहीं खाता

वो मोहरे पर मोहरे चलते रहे 

और मैं रिश्तेदारी निभाता रहा…

 

If only I was fond of chess

Won’t have got cheated at all

They kept on moving pieces

While I kept maintaining kinship!

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

एक उम्र  वो  थी  कि 

जादू पर भी यक़ीन था,

एक  उम्र ये  है  कि 

हक़ीक़त पर भी शक़ है…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

There once was an age when

I used to believe even in magic,

And now, there’s an age when I

Look at reality with suspicion!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

कोई आदत, कोई शरारत, 

मेरी बातें या मेरी ख़ामोशी

कुछ न कुछ तो उसे जरूर

ही  याद  आता  ही  होगा…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

My habits, or the mischiefs, 

My words or the silence

For sure,  he  must  be 

missing something of mine!

 

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 8 ☆ सन्नाटा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी एक सामयिक लघुकथा  “सन्नाटा”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 8 ☆ 

☆ लघुकथा –  सन्नाटा ☆ 

घन् घन्, टन् टन्, ठक् ठक्, पों पों… सुबह से शाम तक आवाजें ही आवाजें।

चौराहे के केंद्र में खड़ी वह पूरी ताकत के साथ सीटी बजाती पर शोरगुल में सीटी की आवाज दबकर रह जाती।

बचपन से बाँसुरी की धुन उसे बहुत पसंद थी। श्रीकृष्ण जी के बाँसुरीवादन के प्रभाव के बारे में पढ़ा था। हरिप्रसाद चौरसिया जी का बाँसुरी वादन सुनती तो मन शांति अनुभव करता।

यातायात पुलिस में शहर के व्यस्ततम चौराहे पर घंटों रुकने-बढ़ने का संकेत देने से हुई थकान वह सहज ही सह लेती पर असहनीय हो जाता था सैंकड़ों वाहनों के रुकने-चलने, हॉर्न देने का शोर सहन कर पाना। बहुधा कानों में रुई लगा लेती पर वह भी बेमानी हो जाती।

अकस्मात कोरोना महामारी का प्रकोप हुआ। माननीय प्रधानमंत्री जी के चाहे अनुसार शहरवासी घरों में बंद हो गए। वह चौराहे के आसपास के इलाके में कानून-व्यवस्था का पालन करा रही है कि कोई अकारण बाहर न घूमे। अब तक शोर से परेशान उसे याद आ रहे हैं पिछले दिन और असहनीय प्रतीत हो रहा है सन्नाटा।

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – वो नटखट बचपन… ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज प्रस्तुत है श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद” जी द्वारा रचित  एक भावप्रवण रचना  – वो नटखट बचपन…। इस सन्दर्भ में हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी के हार्दिक आभारी हैं जिन्होंने अपना बहुमूल्य समय देकर  इस कविता को इतने सुन्दर तरीके से सम्पादित किया। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – वो नटखट बचपन… ☆

जब बेटा-बेटी बन,

घर आंगन में आया

मेरे घर खुशियों का

अंनत सागर लहराया

 

तेरा सुंदर सलोना मुख चूम,

दिल खुशियों से भर‌ जाता

संग तेरे हँसी  ठिठोली में ,

दुख दर्द कहीं खो जाता…

 

अपनी गोद तुझे  बैठा मैं,

बीती यादों में खो जाता हूँ

जब-जब तेरी आंखों  में झाँका

तो अपना ही बचपन पाता‌ हूँ…

 

कभी तेरा यूँ छुपकर आना

गुदगुदा, पैरों में लिपटना,

कभी गोद में खिलखिलाना

कभी जोर से निश्छल हंसना

 

कभी तेरा हाथ हिला

यूँ मदमस्त  हो चलना,

कभी दौड़ना, कभी छोड़ना

यूँ खिलौनों के लिए मचलना…

 

ये तेरा नटखटपन,

ये तेरी चंचल शरारतें,

ना जाने क्यूं मुझको

लुभाती तेरी ये हरकतें

 

एक टॉफ़ी  की खातिर

कभी मुझसे लड़ बैठता,

टिकटिक घोड़ा बना मुझे

खुद घुड़सवार बन, मुझे दौड़ाता

 

कभी सताता, कभी मनाता

कभी मार मुझे, भाग जाता,

कभी रिझाता, कभी खिझाता

मेरे सीने पे चढ़, खूब मचलता…

 

कभी बेटा, कभी पोता बन

खूब कहानी सुनता रहता,

तो कभी बाप बन वो  मुझे

ढेरों  डाँट पिलाता  रहता…

 

कभी सर रख सीने पर

कभी गोद में आ छुप कर

बाल क्रीड़ाएँ करता रहता

मनोहारी कन्हैया बन कर…

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 11 ☆ ती पुर्णाकृती ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

( ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है । आज प्रस्तुत है उनकी एक  श्रृंगारिक कविता “ती पुर्णाकृती“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 11 ☆

☆ ती पुर्णाकृती ☆

 

एऽऽ बघ इकडे, एऽऽऽ बघ न गडे

पुर्णाकृती सुंदरशी, बैसली पुढे,बैसली पुढे!!

 

ओष्ठ जसे संत्र्यांच्या फाकी, डाळिंबाच्या दाण्यावरती

मुग्ध हास्य तव वदनी फुलता, कोमल कलिकांची फुले होती

त्या फुलांची बाग इथे, बैसली पुढे,बैसली पुढे!!

 

चक्षू तुझे चंचल मज गमती, शिंपल्यात ठेवियले मोती

पापण्यांची उघडझाप भासे, दोन फुलपाखरे फडफडती

फुलपाखरांची राणी,बैसली पुढे, बैसली पुढे!!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 37 ☆ नीलमोहर ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  प्रकृति के आँचल में लिखी हुई एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  “ नीलमोहर ”। सुश्री सुजाता जी के आगामी साप्ताहिक  स्तम्भ में अमलतास पर अतिसुन्दर रचना साझा करेंगे।  )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 37 ☆

  ☆ नीलमोहर ☆

नील गगन से

यह नीलमोहर

जाने क्या क्या

बात करें ।

आसमान को

अपना रंग देकर

फिर आकर

धरती से मिले।

शाखाओं पर

आसमान ही

लेकर अपने

साथ चले।

फिर क्यों धूल में

नीलाभ बनकर

धरती पर आँचल

ओढ़ चले।

 

© सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 43 – स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड”। )

Amazon Link – Purn Vinashak

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 43 ☆

☆ स्थूल और सूक्ष्म ब्रह्माण्ड ☆

मैंने आपको शरीर की तीन मुख्य नाड़ियों के विषय में बताया था। इन तीनों नाड़ियों की तुलना भारत की तीन मुख्य नदियों के साथ कर सकते हैं गंगा इड़ा है, यमुना पिंगला और सरस्वती सुषुम्ना नाड़ी है । कलियुग में इन नाड़ियों के कर्म इनके नामों के अनुसार ही समझ सकते हैं । इन दिनों कोई भी नहीं या बहुत कम लोग आध्यात्मिक रूप से दिनचर्या जीते हैं, जिसका अर्थ है सुषुम्ना नाड़ी या सरस्वती नदी में कोई प्रवाह नहीं है क्योंकि सुषुम्ना नाड़ी किसी भी व्यक्ति के जीवन के अध्यात्म को दर्शाती है । सरस्वती नदी की वास्तविक उपस्थिति की स्थिति के विषय में भी यह सत्य है । कलियुग में सरस्वती नदी लगभग लुप्त हो गयी है ।

अब इड़ा नाड़ी या गंगा नदी को ले लो जो मानसिक गतिविधियों को दर्शाती है । आजकल हमारे विचार शुद्ध नहीं हैं, और वास्तविक गंगा नदी भी बहुत ज्यादा प्रदूषित हो गयी है । पिंगला नाड़ी या यमुना नदी के साथ भी सामान परिस्थिति है, आजकल लोग शारीरिक रूप से तंदरुस्त नहीं हैं । उन्हें हर दिन पैदा होने वाली कई नई बीमारियां होती रहती हैं । पिंगला नाड़ी शारीरिक शक्ति या सूर्य ऊर्जा होती है । तो फिर इन दिनों पिंगला नाड़ी और यमुना नदी शुद्ध नहीं रह गयी है । इसी तरह मानव शरीर में उपस्थित सभी नाड़ियाँ वास्तव में भारत की प्राचीन नदियाँ ही हैं । मैं वेदों, पुराणों आदि में उल्लिखित नदियों के विषय में बात कर रहा हूँ ।

पर क्या कारण है कि ये नदियाँ केवल भारत में है दुनिया में अन्य कहीं नहीं? क्योंकि उस समय सभ्यता केवल भारत में ही उपस्थित थी । जिसकी सीमाएं भारत के इन दिनों की भौगोलिक सीमाओं से बहुत अलग थी, और इसमें एशिया, यूरोप, अफ्रीका आदि के भौगोलिक क्षेत्र भी शामिल थे । और उस समय लगभग पूरी मानव आबादी उस समय के भौगोलिक भारत में ही बसी थी । कृष्णा, कावेरी, सरयू इत्यादि जैसी सभी भारतीय नदियाँ वास्तव में मानव शरीर की नाड़ियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । यहाँ तक कि नदी ‘वैतरनी’ जो यमलोक (मृत्यु के भगवान के निवास स्थान) की ओर जाती है भी मानव शरीर में सूक्ष्म रूप में भी उपस्थित है । और यमलोक की ओर जाने वाली आत्मा मृत्यु के समय इस नदी से ही निकलती है कुछ लोगों ने इस नदी को अन्य नाम दिए हैं ।

मैंने कलियुग का उदाहरण लिया है । क्या आप जानते हैं कि विभिन्न युगों के बीच बुनियादी अंतर क्या है और हमारे दैनिक जीवन को अच्छे गुण और बुरे गुण कैसे प्रभावित करते हैं?

सत्य युग में सत्य के चार भाग थे और कुछ भी भ्रष्ट या धोखाधड़ी या बुरा नहीं था । सत्य हर जगह उपस्थित था, यह वैदिक युग और उससे पहले का समय था । दूसरे युग त्रेता युग होता है जिसमें तीन भाग अच्छे और एक बुरा होता है । इस युग में विभिन्न साम्राज्यों के अधीन विभिन्न विभिन्न क्षेत्र थे कुछ क्षेत्रों में अच्छे साम्राज्य स्थापित थे एवं कुछ अन्य में बुरे । जिनके बीच में कभी कभी टकराव हुआ करता था जिसमें अच्छे एवं सच्चे साम्राज्य के लोग बुरे और गंदे साम्राज्य के लोगों को परास्त कर देते थे । उदाहरण रामायण जिसमें भगवान राम के क्षेत्र अयोध्या में धर्म के अनुसार ही सब कार्य होते थे और लंका का क्षेत्र जिसमें धर्म विरुद्ध कार्य होते थे एवं जिसका राजा राक्षस रावण था वह क्षेत्र अयोध्या से दूर स्थान पर स्थित था। भगवान राम ने रावण को मार डाला और फिर से सच्चाई स्थापित की ।

तीसरा युग द्वापर होता है जिसमें दो भाग अच्छे और दो बुरे थे । उस युग में अच्छाई और बुराई और करीब आ गयी । उदाहरण महाभारत जिसमें एक ही परिवार में अच्छे और बुरे लोग उपस्थित  थे । कुछ परिवार के सदस्य पांडव अच्छे थे, और अन्य कौरव बुरे थे । पांडव और कौरव एक ही परिवार के थे । उनके बीच में संपत्ति को लेकर युद्ध हुआ जिसमें पांडव जीते और कौरव हार गए, और सच्चाई एवं धर्म फिर से स्थापित हुए । कलियुग में सभी लोग अच्छे और बुरे का संयोजन हैं । कोई भी शत प्रतिशत अच्छा नहीं है और कोई भी शत प्रतिशत बुरा नहीं है”

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 4 – अशोक कुमार ….1 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….1 पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 4 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : अशोक कुमार ….1 ☆ 

अशोक कुमार (1911-2001) हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता थे। हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में दादा मुनि के नाम से मशहूर अशोक कुमार उर्फ़ कुमुद लाल गांगुली का जन्म एक मध्यम वर्गीय बंगाली परिवार में 13 अक्टूबर 1911 को हुआ था। इनके पिता कुंजलाल गांगुली पेशे से वकील थे। उनके तीन पुत्र कुमुद ( अशोक कुमार), आभास (किशोर कुमार) और कल्याण (अनूप कुमार) एवं एक पुत्री सती देवी थी। अशोक कुमार ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश के खंडवा शहर में प्राप्त की, बाद मे स्नातक की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की लेकिन क़ानून की परीक्षा में फ़ेल हो गए तो बहन के पास बम्बई पहुँच गए। उनका विवाह बंगाली लड़की शोभा से कलकत्ता में हुआ था। इस दौरान उनकी दोस्ती शशधर मुखर्जी से हुई। भाई बहनो में सबसे बड़े अशोक कुमार की बचपन से ही फ़िल्मों मे काम करके शोहरत की बुंलदियो पर पहुंचने की चाहत थी, लेकिन वह अभिनेता नहीं बल्कि निर्देशक बनना चाहते थे। अपनी दोस्ती को रिश्ते मे बदलते हुए अशोक कुमार ने अपनी इकलौती बहन की शादी शशधर मुखर्जी से कर दी, जो उस समय  बांबे टॉकीज में काम कर रहे थे। सन 1934 मे न्यू थिएटर कलकत्ता मे बतौर लेबोरेट्री असिस्टेंट काम कर रहे अशोक कुमार को उनके बहनोई शशधर मुखर्जी ने बाम्बे टॉकीज में अपने पास बुला लिया।

जीवन नैया’ की शूटिंग के दौरान हिमांशु राय की बीवी यानी फिल्म की हीरोइन देविका रानी हीरो नजमुल हसन के साथ भाग गईं. बाद में दोनों में झगड़ा हो गया तो लौट आईं. राय ने अशोक कुमार से हीरो बनने के लिए कहा. लेकिन वे नहीं माने. बहुत समझाया और राय ने कहा कि वे ही उन्हें इस मुसीबत से निकाल सकते हैं. उन्हें यकीन दिलाया कि उनके यहां अच्छे परिवारों वाले, शिक्षित लोग ही एक्टर होते हैं तब अशोक माने और ये उनकी डेब्यू फिल्म साबित हुई.

जब अशोक हीरो बने तो उनके घर खंडवा में कोलाहल मच गया. उनकी तय शादी टूट गई. मां रोने लगीं. उनके पिता नागपुर गए. वहां अपने कॉलेज के दोस्त रवि शंकर शुक्ला से मिले जो तब मुख्य मंत्री थे. उन्होंने स्थिति बताई और अपने बेटे को कोई नौकरी देने की बात कही. शुक्ला ने दो नौकरियों के ऑफर लेटर दिए. एक था आय कर विभाग के अध्यक्ष का पद जिसकी महीने की तनख्वाह 250 रुपये थी.

पिता अशोक से मिले और एक्टिंग छोड़ने को कहा. अशोक हिमांशु राय के पास गए और उन्हें नौकरी के कागज़ दिखाए और कहा कि उनके पिता बाहर खड़े हैं और उनसे बात करना चाहते हैं. राय ने अकेले में उनके पिता से बात की. थोड़ी देर बाद उनके पिता उनके पास आए और नौकरी के कागज़ फाड़ दिए. उन्होंने अशोक से कहा, “वो (हिमांशु राय) कहते हैं कि अगर तुम यही काम करोगे तो बहुत ऊंचे मुकाम तक पहुंचोगे. तो मुझे लगता है तुम्हें यहीं रुकना चाहिए.”

1936 मे बांबे टॉकीज की फ़िल्म (जीवन नैया) के निर्माण के दौरान फ़िल्म के अभिनेता नजम उल हसन ने इसी कारणवश फ़िल्म में काम करने से मना कर दिया। इस विकट परिस्थिति में बांबे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय का ध्यान अशोक कुमार पर गया और उन्होंने उनसे फ़िल्म में बतौर अभिनेता काम करने की पेशकश की। इसके साथ ही ‘जीवन नैया’ से अशोक कुमार का बतौर अभिनेता फ़िल्मी सफर शुरू हो गया।

उन्होंने न तो थियेटर किया था, न एक्टिंग का कोई अनुभव था. ऐसे में अशोक कुमार के अभिनय में पारसी थियेटर का लाउड प्रभाव नहीं था. यही उनकी खासियत बनी. वे हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे और उनकी एक्टिंग एकदम नेचुरल थी. जो आज तक एक्टर्स हासिल करने की कोशिश करते हैं. इसके अलावा हिमांशु राय और देविका रानी ने भी उन्हें सबकुछ सिखाया. वे उन्हें अंग्रेजी फिल्में देखने के लिए भेजते थे. हम्प्री बोगार्ट जैसे विदेशी एक्टर्स को देखकर और उनकी स्टाइल व अपने विश्लेषण से अशोक ने अभिनय सीखा.

सुबह का नाश्ता वे ठाठ से करते थे. उनका कहना था कि एक्टर लोग पूरे दिन कड़ी मेहनत करते हैं और ब्रेकफास्ट दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन है. इसी से पूरे दिन दृश्यों को करते हुए उनमें ऊर्जा बनी रहती थी.

1937 मे अशोक कुमार को बांबे टॉकीज के बैनर तले प्रदर्शित फ़िल्म ‘अछूत कन्या’ में काम करने का मौका मिला। इस फ़िल्म में जीवन नैया के बाद ‘देविका रानी’ फिर से उनकी नायिका बनी। फ़िल्म मे अशोक कुमार एक ब्राह्मण युवक के किरदार मे थे, जिन्हें एक अछूत लड़की से प्यार हो जाता है। सामाजिक पृष्ठभूमि पर बनी यह फ़िल्म काफी पसंद की गई और इसके साथ ही अशोक कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री मे अपनी पहचान बनाने में क़ामयाब हो गए। इसके बाद देविका रानी के साथ अशोक कुमार ने कई फ़िल्मों में काम किया। इन फ़िल्मों में 1937 मे प्रदर्शित फ़िल्म इज्जत के अलावा फ़िल्म सावित्री (1938) और निर्मला (1938) जैसी फ़िल्में शामिल हैं। इन फ़िल्मों को दर्शको ने पसंद तो किया, लेकिन कामयाबी का श्रेय बजाए अशोक कुमार के फ़िल्म की अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया।

इसके बाद अशोक कुमार ने 1939 मे प्रदर्शित फ़िल्म कंगन, बंधन 1940 और झूला 1941 में अभिनेत्री लीला चिटनिश के साथ काम किया। इन फ़िल्मों मे उनके अभिनय को दर्शको द्वारा काफी सराहा गया, जिसके बाद अशोक कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री मे स्थापित हो गए।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 46 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं  “भावना के दोहे”। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 46 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

 

उथल-पुथल है हृदय में,

कर लो तुम संवाद।

जीवन हो तुम राधिके,

गूंजा अनहद नाद।।

 

जीवन में चारों तरफ,

फैला है अँधियार

बिना ज्ञान-दीपक भला,

कौन करे उजियार।।

 

इस अनंत संसार  का,

कोई ओर न छोर

हरि सुमिरन से ही मिले,

मंगलकारी भोर

 

कोरोना के काल में,

बढ़ी पेट की आग।

सुनने वाला कौन है

भूख तृप्ति का राग।।

 

जीवन के नेपथ्य से,

कौन रहा है भाग।

करो आज का सामना,

छोड़ कपट खटराग।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 37 ☆ बुंदेली गीत – बड़ो कठिन है बुजर्गों को समझावो …. ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  श्री संतोष नेमा जी  का  “बुंदेली गीत – बड़ो कठिन है बुजर्गों को समझावो …. ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 37 ☆

☆ बुंदेली गीत – बड़ो कठिन है बुजर्गों को समझावो .... ☆

 

कोरोना खों समझ ने पा रए का हुई है

परे परे कछु भव बतिया रए का हुई है

 

सरकार कहत रखो दो गज दूरी

गइया से जबरन रंभा रए का हुई है

 

निकर निकर खें घर सें बाहर झाँखे

हाथ धोउन में शरमा रए का हुई है

 

बऊ खुदई लगीं दद्दा खों समझावें

दद्दा बऊ को आँख दिखा रए का हुई है

 

हमने कही सोशल डिस्टेंस बनाओ

सुनतई सें हम खों गरया रए का हुई है

 

बतियाबे खों अब कौनउ नइयाँ

पूछत हैं सब कहाँ हिरा गए का हुई है

 

बड़ो कठिन है बुजर्गों को समझावो

सांची हम”संतोष” बता रए का हुई है

 

जीवन में गर चाहिए, सुख समृद्धि “संतोष”

माटी से नाता रखें,  माटी जीवन कोष

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य – धर्मवीर संभाजी महाराज जयंती विशेष – धर्मवीर शंभू ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  धर्मवीर संभाजी महाराज जयंती के  अवसर पर आपकी विशेष कविता  “धर्मवीर शंभू ” )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य ☆

☆ धर्मवीर संभाजी महाराज जयंती विशेष – धर्मवीर शंभू ☆

संस्कृत पंडित  । स्वराज्याचे वीर ॥

ज्ञानी शाक्तवीर   । शंभू राजे ॥ 1 ॥

 

नखशिख आणि   | सात सतकाचे ॥

बुधभुषणाचे । ग्रंथकार ॥ 2 ॥

 

भाषा व्याकरण  | धर्मशास्त्र निती ॥

तत्वज्ञान रिती । अभ्यासिली ॥ 3 ॥

 

धर्मवीर शंभू  । ओलीस राहिले ॥

संघर्ष साहिले ।  मोगलांचे ॥ 4 ॥

 

मल्लखांब कुस्ती   । मर्दानी खेळात॥

आखाडे  मेळ्यात  । तरबेज ॥ 5 ॥

 

सप्त हजाराचे  | मनसबदार ॥

कर्तृत्वास धार  | दशवर्षी ॥ 6॥

 

संभाषण कला | मुत्सद्दी पणाचे ॥

धर्म रक्षणाचे  |  बाळकडू ॥7 ॥

 

यवनी गोटात | शिरूनी जाणले॥

जेरीस  आणले ।  औरंग्यास ॥ 8॥

 

शिवाजी नंतर । स्वराज्य रक्षण  ॥

केले संरक्षण    ।  रयतेचे  ॥ 9 ॥

 

संभाजी राजांची  । येसूबाई राणी॥

कर्तृत्वाच्या खाणी  ।  स्वराज्यात   ॥ 10 ॥

 

कुलमुखत्यार  । राणी येसूबाई ॥

स्वराज्याची माई  ।  शंभू भार्या ॥ 11 ॥

 

भेदरला काळ ।  विरश्री मरण॥

संभाजी स्मरण । स्फूर्तीदायी   ॥ 12 ॥

 

(श्री विजय यशवंत सातपुते जी के फेसबुक से साभार)

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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