(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘मन के धागे…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # ९२ ☆ मन के धागे… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘स्नान पर गंभीर चिन्तन‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२० ☆
☆ व्यंग्य ☆ स्नान पर गंभीर चिन्तन ☆
दो दिन पहले छपी एक खबर पढ़ कर दिल बाग़-बाग़ है। जो बात मैं बिना किसी मेडिकल डिग्री के दशकों से सिर्फ अपनी आत्मा की आवाज़ के हवाले से कह रहा था वही अब बड़े-बड़े मेडिकल डिग्री वाले दुहरा रहे हैं। ‘बड़ी देर की मेहरबां आते आते।’ फिर सोचता हूं ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ और ‘जब जागे तभी सवेरा’।
मसला यह है कि अमेरिका के दो त्वचा- विशेषज्ञों ने राय दी है कि आदमी के लिए नहाना कतई ज़रूरी नहीं है। उनके अनुसार नहाना उन्हीं के लिए ज़रूरी है जो शारीरिक श्रम करके पसीना बहाते हैं या धूल-मिट्टी में सनते हैं। बाकी लोगों के लिए अकारण नहाना पानी की बरबादी है। इन विशेषज्ञों का कहना है कि नहाने से रोग-प्रतिरोधक क्षमता घटती है, त्वचा के रोग पैदा होते हैं और रोम- छिद्र बन्द हो जाते हैं। एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के अध्ययन में सामने आया कि अत्यधिक स्नान से शरीर के सुरक्षा-कवच को हानि होती है और पाचन-तंत्र निर्बल होता है। इस अध्ययन के अनुसार ठंड में नहाना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।
एक भारतीय वरिष्ठ चिकित्सक के अनुसार भी स्नान जो है वह शरीर की ‘इम्युनिटी’ पर प्रतिकूल असर डालता है, रोगों से लड़ने की क्षमता को प्रभावित करता है और त्वचा संबंधी समस्याएं पैदा करता है। इन चिकित्सक महोदय का सुझाव है कि आदमी को हफ्ते में पांच दिन ही नहाना चाहिए। वैसे मेरा सोच है कि इस सुझाव को उल्टा करके दो दिन नहाने और पांच दिन न नहाने के मुकर्रर किये जाएं तो बेहतर होगा।
मुझे पता है कि इन डाक्टरों की राय पर मैं कितनी भी बगलें बजाऊं, मेरे देश के लोग नहाने के खिलाफ कही गयी इन बातों पर कान देने वाले नहीं हैं। वजह यह है कि हमारे देश में नहाने को धर्म से जोड़ दिया गया है। यहां स्नान के बड़े-बड़े उत्सव होते हैं। बिना नहाये देवता की पूजा करने या मन्दिर जाने की मुमानियत है। दो कदम और आगे बढ़कर मान लिया गया है कि पवित्र नदियों में नहाने से आदमी के जनम-जनम के पाप कट जाते हैं। अब ऐसी स्थिति में अमेरिका के डाक्टरों की फालतू नसीहत कौन मानेगा? मुझे भरोसा है कि अब तक देश के सभी घोषित- अघोषित पापी, उजागर या छिप कर, गंगा-स्नान करके पाप-मुक्त हो चुके होंगे। ये पापी यहां भले ही अपराधी माने जाएं, ‘वहां’ दूध के धुले बनकर, मूंछों पर ताव देते हुए जाएंगे और पहुंचते ही स्वर्ग में अपना दावा ठोकेंगे।
दुनिया की स्त्रियों को यह भ्रम है कि नहाने से उनका रूप-सौंदर्य महफूज़ रहता है। भ्रम-निवारण के लिए बताना ज़रूरी है कि मैंने एक लेख में पढ़ा था कि मध्यकाल में फ्रांस की स्त्रियां जीवन भर अपनी काया को पानी का स्पर्श नहीं होने देती थीं। पुरुष भी जीवन में एकाध बार ही नहाते थे। इसके बावजूद पूरी दुनिया में फ्रांसीसी महिलाओं के रूप और नफ़ासत का डंका बजता था। साबित होता है कि सौंदर्य की रक्षा के लिए स्नान बिलकुल ज़रूरी नहीं है।
एक अखबार में यह भी पढ़ा था कि इंडियाना में सर्दियों में नहाना कानून के खिलाफ़ है और बोस्टन में डाक्टर की सलाह के बिना नहाना गैरकानूनी है। हमारे देश में भी कुछ ऐसा ही कानून बन जाए तो स्नान-विमुख लोगों का मनोबल गिरने की स्थिति न बने। लेकिन उसी अखबार में यह भी पढ़ा कि इज़राइल में मुर्गियों के लिए शुक्रवार और शनिवार को अंडे देना गैरकानूनी है।
मैं तो फिलहाल तीन फुट आठ इंच के छोटू बाबा को अपना गुरू मान चुका हूं जो पिछले महाकुंभ में पधारे थे और जिन्होंने बत्तीस साल से स्नान नहीं किया था। उनका कहना था कि उन्होंने कोई व्रत लिया था और उसके पूरे होने पर उज्जैन में अपने गुरू के साथ स्नान करेंगे। उन्होंने अपने गुरू का नाम नहीं बताया, न ही बताया कि गुरूजी ने कितने दिन से स्नान नहीं किया। निश्चय ही गुरूजी चेले से दो चार हाथ आगे ही होंगे। छोटू बाबा ने यह भी नहीं बताया कि जब उन्हें महाकुंभ में नहाना नहीं था तो वे वहां किस लिए पधारे थे। जो भी हो, भक्त छोटू बाबा के चरण छूने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए उमड़ते रहे। बाबा जी ने सिद्ध किया कि नहाये बिना भी आध्यात्मिक ऊंचाई हासिल की जा सकती है।
जो भी हो, मेरी इस तकरीर या तकरार से यह न समझा जाए कि मैं नहाने के खिलाफ हूं। मुझे पता है कि यह स्नान-भक्तों का देश है और पानी में रहकर मगर से बैर लेना भला कौन चाहेगा?
(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– सिकंदर…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य क्षणिका # ९१ — सिकंदर —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
मैं सिकंदर को कहानियों से जानता हूँ। आज उसके लिए लिख रहा हूँ। तुम पराजित योद्धा के रूप में पीछे लौटे हो सिकंदर। तुम जहाँ खड़े हो यह तुम्हारी विजय की जमीन नहीं है। इस जमीन को पता नहीं था तुम किस इरादे से आगे बढ़े थे। अब पता है तुम क्यों वापस आए हो। फिर भी यह तुम्हें स्वीकार करेगी। जमीन होती ही ऐसी है। तुम हो, कोई और हो, हर किसी के लिए यह दो गज की जमीन सुरक्षित रखती है।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३२१ ☆ ऋतुराज…
हर क्षण तन छीज रहा,
हर क्षण मन रीझ रहा,
जितना छीजता, उतना रीझता,
छीजना, रीझना, स्वयं पर खीजना,
विरोध का आभास अथाह,
विरुद्ध का समानांतर प्रवाह,
तब पाट का आकुंचन होना,
समानांतर का मिलन होना,
अब न छीजना, अब न रीझना,
भीतर-बाहर मानो संत होना,
देहकाल में ऐसा भी वसंत होना…!
जीवन बहुआयामी है। वसंत केवल रंगों का समुच्च्य भर नहीं, अपितु विभिन्न राग-भावों का समग्र स्वरूप भी है। हर रंग का अपना अस्तित्व है, हर रंग का अपना महत्व है। जीवन में हर रंग की आवश्यकता भी है।
विचार करें तो रोटी, कपड़ा और मकान, मनुष्य की स्थूल अथवा प्रत्यक्ष मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। अभिव्यक्ति सूक्ष्म या परोक्ष आवश्यकता है। जिस प्रकार सूक्ष्म देह के बिना स्थूल का अस्तित्व नहीं होता, उसी प्रकार अभिव्यक्ति या मानसिक विरेचन के बिना मनुष्य जी नहीं सकता। अक्षर की इकाई को शब्द, वाक्य एवं भाषा के माध्यम से अभिव्यक्ति का, सूक्ष्म का सर्वाधिक सशक्त साधन बनाने वाली वागीश्वरी माँ सरस्वती का अवतरण दिवस है वसंतपंचमी।
पौराणिक आख्यान है कि ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना तो कर चुके थे पर सर्वव्यापी मौन का कोई हल ब्रह्मा जी के पास नहीं था। तब माँ शारदा प्रकट हुईं। निनाद, वाणी एवं कलाओं का जन्म हुआ। जल के प्रवाह और पवन के बहाव को में स्वर प्रस्फुटित हुआ। मौन की अनुगूँज भी सुनाई देने लगी। आहद एवं अनहद नाद गुंजायमान हुए। चराचर ‘नादब्रह्म’ है।
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतवायदक्षरम् । विवर्तते अर्थभावेन प्रक्रिया जगतोयतः॥
अर्थात् शब्द रूपी ब्रह्म अनादि, विनाश रहित और अक्षर है तथा उसकी विवर्त प्रक्रिया से ही यह जगत भासित होता है।
शब्द और रस का अबाध संचार ही सरस्वती है। शब्द और रस के प्रभाव का एकात्म भाव से अनन्य संबंध है। इसका एक उदाहरण संगीत है। आत्म और परमात्म का एकात्म रूप संगीत है। संगीत को मोक्ष की सीढ़ियाँ माना गया है। महर्षि याज्ञवल्क्य इसकी पुष्टि करते हैं-
वीणावादनतत्वज्ञः श्रुतिजातिविशारदः।तालश्रह्नाप्रयासेन मोक्षमार्ग च गच्छति।
वैदिक संस्कृति के नेत्रों में समग्रता का भाव है। कोई पक्ष उपेक्षित नहीं है। यही कारण है कि वसंत पंचमी रति और कामदेव का उत्सव भी है। इस ऋतु में सर्वत्र विशेषकर खिली सरसों का पीला रंग दृष्टिगोचर होता है। प्रकृति का चटक पीला रंग आकर्षित करता है पुरुष को। प्रकृति और पुरुष का एकात्म होना मदनोत्सव है।
मदन भाव से श्मशान वैराग्य तक, सृष्टि में सभी कुछ उत्सव है। जीवन के हर पक्ष को उत्सव की भाँति ग्रहण करने का संदेश है वसंत। हर भाव को समग्रता से, परिपूर्णता से जीने का प्रतीक है वसंत। यही कारण है कि ऋतुराज कहलाया वसंत।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
सरस्वती साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Against the Current…/विपरीत बहाव…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
~ Against the Current… ~
☆
We moved side by side
as our directions were the same
Yet our inner currents
were never alike…
For him, knowing
was a pause,
a place to stop
where he received the answer
For me, knowing
was a journey,
—an ever restless flow to
unravel the mystic realms
He found meaning
I became the meaning..!
विपरीत बहाव…
☆
समांतर चले
क्योंकि दिशाएँ समान थीं
पर अनुभूति एक-सी नहीं थी
उसके लिए जानना
एक विराम था
वह उत्तर पर रुका
मेरे लिए जानना
एक अनंत यात्रा…
मैं जिज्ञासा में बहता रहा
उसने अर्थ पाया
मैं अर्थ होता रहा…!
(Inspired by Shri Sanjay Bhardwaj Ji’s poem समांतर)
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – पूर्णिका – नेह नर्मदा।)
(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब) शिक्षा- एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)
☆ लघुकथा – “स्वाभिमान”☆ श्री कमलेश भारतीय ☆
सुबह सवेरे अखबार बांटने जब एक छोटा सा लड़का आने लगा तब मन में उत्सुकता जगी कि पूछ लूं कि पढ़ते लिखते क्यों नहीं? या पापा पढ़ाते क्यों नहीं? इस कंपकंपाती सर्दी में जब बच्चे रजाई से बाहर नहीं निकलते तब वह अखबार बांटने क्यों और किन मजबूरियों में आता है?
एक दिन जैसे ही वह अखबार फेंक कर जाने लगा तब मैंने रोक कर पूछा -रुकना, ऐ लड़के।
-कहिए।
-क्या स्कूल पढ़ने नहीं जाते?
-जाता हूं और नौवीं में पढ़ता हूं।
-फिर तुम्हारे पापा तुम्हें इस काम के लिए क्यों भेजते हैं?
-पापा बीमार हैं और मैं उनकी मदद करना चाहता हूं।
-कल सुबह मैं तुम्हें कुछ नोट बुक्स देना चाहता हूं।
-क्यों? मैं खुद कापियां किताबें ले सकता हूं , सर। जो नहीं ले सकते उन्हें दीजिए न।
इतना कह कर उसने साइकिल के पैडल पर पांव जमाया और अखबार बांटने चल दिया।
☆ लघुकथा ☆ ~ ए.सी. बस ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆
☆
शिशिर अपने कड़ाके भरी क्रूर शीतलहर के माध्यम से सबको अपने आगोश में लेने की पूरी कोशिश में लग गया था। सूर्य की किरणें डर कर न जाने कहां छुप गयीं थीं। शीतलहर की क्रूरता की स्थिति यह थी कि वह शरीर के मांस, मज्जा क्या हड्डियों के भीतर तक घुस कर जान खींचने को तैयार था। बुढ़ापे की ओर बढ़ चली रंजू की माँ बिस्तर से उठने की लगातार कोशिश कर रहीं थी,लेकिन उनके पैर के घुटने उन्हें उठने से बुरी तरह रोक रहे थे। वहीं छोटी बेटी रंजू को प्रत्येक दिन घर का खाना नाश्ता बनाकर हर हाल में प्रातः आठ बजे कोचिंग जाने के लिए निकलना ही होता था।
आखिरकार रंजू शहीद पथ पुल के नीचे साऊथ सिटी बस स्टॉप पर पहुंच गयी थी। कंधे से लटका स्कूल बैग, शरीर पर एक पतले से स्वेटर के अलावा और कुछ भी नहीं था। कई ऑटो वाले आए और चले गए लेकिन रंजू इतना हिम्मत नहीं जुटा सकी कि वह उन ऑटो में बैठ सके। कारण यह नहीं था कि उसका किराया ₹15 था। ट्रांसपोर्ट नगर तक का सिटी बस का किराया भी ₹11 /- था। जिसे देकर रंजू किसी तरह से अपने महीने के हिसाब किताब में जोड़कर चल सकती थी। कारण यह था कि शरीर को कंपा देने वाले जाड़े से बचने के लिए बस ही एक अच्छा साधन था। ऐसी ठण्ड में खुली ऑटो में चलना किसी बड़ी मुसीबत से कम नही था। एक के बाद एक- दो इलेक्ट्रिक ए.सी. बस आयीं और चली गई,लेकिन बेचारी रंजू यह हिम्मत नहीं जुटा पायी कि वह उन ऐसी बसो में बैठकर चली जाए। कारण वही जो उनका किराया साउथ सिटी से ट्रांसपोर्ट नगर ₹20/- था।
अचानक तीसरी एसी बस आयी और रुकी। तेज ठंडी हवाओं से दो चार हाथ कर रही रंजू ने अपने पांव बस की तरफ बढ़ाये लेकिन गरीबी ने फिर उसके पैरों को पीछे खींच लिया। सवाल ₹9/- बढ़ाने का था। लेकिन आज इस बार का दृश्य कुछ बदला सा था।
बस के कंडक्टर ने कहा बिटिया क्यों रुक गई, आओ बस में बैठ जाओ।
नहीं भैया, ! हम ₹20 /-नहीं दे सकते। ₹20/- हम गरीब घरों के स्टूडेंट की क्षमता के बाहर है।
अरे बिटिया ₹ 20 /- नहीं, ₹15 /- तो दे सकती हो न.. कंडक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा।
हां भैया..मैं ₹15 दे सकती हूं लेकिन आप ₹15 /-में तो नही ले जा सकते ..रंजू ने कहा।
आओ.. आओ जल्दी करो बैठ जाओ। हम ₹15 में तुझे ले जाएंगे और टिकट भी देंगे। बिटिया! अब ए.सी. (इलेक्ट्रीक) बस के किराए को सरकार ने ₹20 से घटकर ₹15 कर दिए है। अब तो इस रूट पर जनरल बसें चलती भी नहीं है। रंजू के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई और वह जाकर एसी बस में बैठ गयी।
रंजू आज बहुत खुश थी। आज वह पहली बार स्कूल जाने के लिए ए.सी. बस में बैठी थी।
(श्री सुरेश पटवा जी भारतीय स्टेट बैंक से सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर।)
यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २२ ☆ श्री सुरेश पटवा
5.उत्तराखंड तराई क्षेत्र – हरि के द्वार से नैनों के ताल तक
किसी क्षेत्र विशेष का भौगोलिक और ऐतिहासिक अध्ययन करके वहाँ मनोरंजक रूप से घूमना पर्यटन कहलाता है और बिना अध्ययन के कहीं जाना घूमना कहलाता है। हिमालय पर्वत और हिंद महासागर स्थित विभिन्न स्थानों का पर्यटन लोगों को हमेशा से लुभाता रहा है। हिमालय पर्यटन में जम्मू-कश्मीर लद्दाख़, हिमाचल, नेपाल, सिक्किम, भूटान अब तक घूम चुके थे और उत्तराखंड के बद्रीनाथ और केदारनाथ घूम कर कुमायूँ और गढ़वाल के तराई वाले हिस्से छूटे थे। 24-31 जुलाई 2021 के बीच इनके पर्यटन को निकले।
उत्तराखंड के तराई इलाक़ों की यात्रा हेतु भोपाल से 24 जुलाई को तीन बजे शताब्दी एक्सप्रेस से रवाना हुए। ग्वालियर में सहकर्मी रहे मित्र राजीव दुबे ट्रेन पर मिलने आए और चिप्स के पैकेट एवं पेप्सी की बड़ी बोतल थमा गए। कुरकुरी नमकीन चिप्स चबाते और पेप्सी के घूँट हलक के नीचे उतारते राजीव के साथ ग्वालियर में 2006 से 2010 के बीच गुज़ारे दिन की मानसिक जुगाली में मुरेना निकल गया। मुरेना निकलते ही पुल की धड़धड़ाहट से चौंक कर नीचे देखा तो चम्बल लबालब यौवन से लकदक नवयौवना की तरह इठलाती चली जा रही थी। पेप्सी का घूँट गले के ऊपर रोककर नदी का सम बहाव निहारते वह पुल निकल गया, जिसके नीचे अप्रेल 2010 की झुलसती दोपहरी में बैंक के ऑडिटर के साथ चिल्ड बियर और मुर्ग़ मुसल्लम की दावत का लुत्फ़ उठाया था। ऑडिटर साहब को डाकू देखना था, उन्हें जयप्रकाश नारायण के समक्ष ऐच्छिक समर्पित एक बुजुर्ग डाकू से उसी पुल के नीचे मिलवाया था जिसके ऊपर से ट्रेन गुज़र रही थी।
चिप्स की कुरमुराहट के बीच धौलपुर स्टेशन निकलते ही दिमाग़ में डाकुओं के क़िस्से कुडमुँड़ाने लगे। माधौसिंह और पान सिंह तोमर के अलावा अत्याचार सहती बैंडिट क्वीन फूलन देवी और उनके पीछे भागती पुलिस के सिपाही के पैरों से रोंदे चम्बल के बीहड़ रिमझिम फुहार से नहाते नज़र आ रहे थे। सोचते-सोचते झपकी लग गई। उसके बाद घर से लाया खाना खाकर सिटिंग चेयर को पीछे झुकाकर एक हल्की नींद निकाली ही थी, तभी सवारियों की रेलमपेल में आँख खुली तो देखा रेलगाड़ी आगरा कैंट स्टेशन पर खड़ी है। एक भारी भरकम सवारी भारी भरकम सामान सहित पूरा कुनबा लेकर चढ़ी। उनकी कुर्सियाँ तो पक्की थीं परंतु सामान को ऊपर रखने को लेकर झिकझिक होने लगी। उन्होंने दूसरों का सामान हटा कर अपना सामान ज़माना शुरू किया तो आसपास की सवारियाँ भड़कने लगीं। आख़िर में सवारियों के हिसाब से सामान की जगह तय होकर व्यवस्था बनने ही जा रही थी। तभी एक जनानी सवारी ने साथ वाले से पूछा- मोटा पागल है क्या? पीछे से किसी सज्जन ने फुसफुसाती चुटकी ली कि लगता है अस्पताल से छुट्टी कराकर आए हैं। आगरा वाले भारी भरकम भाई साहब के तेज कानों ने सुन लिया। आधा घंटा हंगामेदार माहौल रहा। लोग मास्क हटाकर तुमुल युद्ध में शरीक हो गए। आगरा वाले भाई साहब बोले हाँ! हम तो ठीक होकर आ गए। आपको भर्ती कराए देते हैं। चुटकी वाले भाई साहब नींद का बहाना करते चिमाई दावे पड़े रहे। मामला ठंडा हुआ, तब सबको मास्क नाक पर चढ़ाने का ध्यान आया। तब तक मथुरा स्टेशन से वैंडरों की “मथुरा के पेड़े और आगरा का पेठा” आवाज़ें आने लगीं। फिर एक झपकी के बाद नींद खुली तो ट्रेन निज़ामुद्दीन स्टेशन से गुजर रही थी।
रात्रि को साढ़े ग्यारह बजे नई दिल्ली स्टेशन पर वेटिंग लाउंज में दस रुपए प्रति घंटे के हिसाब से भुगतान करके कमर सीधी करने लेटे परंतु यात्रियों के आने-जाने से ख़लल होता रहा, लिहाज़ा मुश्किल से दो घंटे नींद लगी। करवट बदलते छह बजे तक समय बिताया। फिर पता चला कि देहरादून शताब्दी रेलगाड़ी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक के बजाय सोलह से रवाना होगी। प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से सोलह तक की दो किलोमीटर की दूरी तय करके ट्रेन में जा बैठे। ट्रेन नियत समय पर चल पड़ी।
देहरादून शताब्दी की यात्रा सुखद रही। रेलगाड़ी तय समय से चली। ग़ाज़ियाबाद, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, रुड़की, हरिद्वार होते हुए देहरादून समय से पहले पहुँच गई। प्लेटफ़ार्म से बाहर निकले तो एक लम्बी क़तार कोविड की जाँच के लिए लगी थी। हम भोपाल के बंसल अस्पताल से कोविड जाँच रिपोर्ट साथ लेकर चले थे, इसलिए बिना किसी परेशानी के बाहर निकल टेक्सी में बैठ स्टेट बैंक के गेस्ट हाऊस पहुँच गए।
देहरादून में इंदिरा मार्केट, तिब्बत बाज़ार, पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर दोनों तरफ़ दुकानों का जमावड़ा है। उत्तराखंड की राजधानी बनने के बाद देहरादून मैदानी इलाक़ों तरफ़ तेज़ी से बसना शुरू हो गया था। जिसकी रफ़्तार जारी है। हम शाम को शहर के हृदय स्थल घंटाघर पहुँचे। घंटाघर से लगे पल्टन बाज़ार घूमे वहाँ से एक रास्ता सीधा नगर के सबसे पुराने गुरुद्वारे पहुँचता है जहाँ गुरु रामराय ने दिल्ली से आकर डेरा रखा था। दून घाटी में डेरा रखने से यह स्थान देहरादून हो गया। वह गुरुद्वारा झण्डा गुरुद्वारा कहलाता है। वहाँ का होली पर मनाया जाने वाला रंग उत्सव प्रसिद्ध है। शाम को पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर घूमते रहे। रात को देहरादून के प्रसिद्ध के सी सूप बॉर में चाइनीज़ खाना खाकर आराम किया।
25 जुलाई को रविवार का दिन था। देहरादून में लॉकडाउन था इसलिए गेस्ट हाऊस से निकलना सम्भव नहीं था। नाश्ता करके एक अच्छी नींद निकाली। दोपहर को लंच के बाद जिम कार्बेट की किताबें पढ़ते रहे। कुछ कहानियाँ साथ वालों को पढ़कर सुनाईं। शाम को अरविंद भैया की नातिन श्रद्धा सिसोदिया की बिटिया श्रुति सिसोदिया तंवर दामाद साहब सहित पधारीं। तीन घंटे उनके साथ गुज़ारे। वे जाते-जाते बहरूज की बिरयानी का ऑनलाइन आर्डर दे गईं। नौ बजे के लगभग बिरयानी की डेलिवरी प्राप्त हुई। भोजन करके आराम किया।
मसूरी धनोल्टी
26 जुलाई 2021 को सुबह आठ बजे देहरादून गेस्ट हाऊस से मसूरी के लिए रवाना हुए। देहरादून 2001 में राजधानी और टेहरी बाँध बनने के बाद से तेज़ी से जनसंख्या के दबाव में फैलना शुरू हुआ था। वहाँ एक मात्र मुख्य सड़क राजपुर मार्ग के दोनों तरफ़ प्रीमीयम और साधारण फ़्लैट की भरमार हो गई है। आगे बढ़ने पर राजपुर रोड से एक रास्ता मसूरी को कट जाता है। मसूरी के लिए रास्ता कटते ही तराई से पहाड़ियों में यात्रा शुरू होती है। एक तरफ़ ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ गहरी खाईयों का न ख़त्म होने वाला सिलसिला आरम्भ होता है। चढ़ाई शुरू होते ही सड़क किनारे एक शिव मंदिर पड़ा। वहाँ सूचना लगी थी कि यह निजी मंदिर है इसमें कोई भी नगद या अन्य चढ़ावा न चढ़ाएँ। उल्टा आपको प्रसाद और चाय का सेवन कराया जाता है। बाजू में एक छोटा रेस्टोरेंट है जिसमें मंदिर की तरफ़ से पचास प्रतिशत अनुदान पर सामान मिलता है।
आधा घंटा चलने के बाद भट्टा जल प्रपात तक नीचे उतरने की ट्रोली सेवा की बुकिंग कुटिया आई। वहाँ से दो सौ रुपए का टिकट कटा कर ट्रोली में सवार हुए। ट्रोली का इंतज़ार कर रहे थे, तभी केंटीन वाला आया। उसकी चाय के दाम बीस रुपए था। यह सोचकर कि उनका रोज़ी रोज़गार का ज़रिया भी हम जैसे पर्यटक हैं। बीस रुपए की चाय गले के नीचे उतारी, तब तक ट्रोली का झूला आ गया। सवार होकर एक हज़ार फुट नीचे उतर चले। चारों तरफ़ बादलों से घेरे में लग रहा था कि स्वर्ग की यात्रा आरम्भ हो गई है। चिकोटी काट कर देखी तब पता चला कि पूरे होशोहवास में चीड़ चिनार देवदार के वृक्षों के बीच से हवा में तैरते चले जा रहे हैं।
रिमझिम बारिश की बूँदों के बीच भट्टा प्रपात पहुँचे तो पता चला कि मसूरी झील का पानी इस तरफ़ उतार पर झरना बनाकर एक प्रपात बनाता है। थोड़ी देर रुककर वापसी यात्रा करके टेक्सी में आ बिराजे। फिर तीखी चढ़ाई से गुज़रते हुए मसूरी पहुँच गए। परंतु हमने तय किया था कि अभी सीधे धनौल्टी जाएँगे जो मसूरी से और आगे तीस किलोमीटर ऊँचे पहाड़ों को पार करके आने वाला था। रास्ते में चार-दुकान पर्यटन स्थल आया। पता करने पर मालूम हुआ कि एक ऊँची पहाड़ी पर सचिन तेंदुलकर ने एक शाही फ़्लैट ख़रीदा था तब वे अपने दोस्तों के साथ यहाँ पधारे थे। उसी समय चार लोगों ने भीड़ की सेवा हेतु दुकान लगा ली थीं जिसमें सचिन ने साठ रुपए कप के हिसाब से दोस्तों के साथ चाय का सेवन किया था। वह स्पॉट चार-दुकान पोईंट नाम से प्रसिद्ध हो गया।
मसूरी बसावट की भी एक कहानी पता चली। देहरादून मध्य युग में औरंगज़ेब की सिक्खों में फूट डालने की नीति से बस चुका था। मसूरी बसने की राह देख रहा था। जिसे एक अंग्रेज ने शुरू किया। ईस्ट इंडिया कंपनी के लेफ्टिनेंट फ्रेडरिक यंग शिकार के लिए मसूरी आए। उन्होंने कैमल्स बैक रोड पर एक शिकार लॉज बनाया, और 1823 में दून के मजिस्ट्रेट बने। उन्होंने पहली गोरखा रेजिमेंट बनाई और घाटी में पहला आलू बोया। मसूरी में उनका कार्यकाल 1844 में समाप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने दीमापुर और दार्जिलिंग में सेवा की, अंत में एक जनरल के रूप में सेवानिवृत्त होकर आयरलैंड लौट आए। मसूरी में यंग का कोई स्मारक नहीं है। हालांकि, देहरादून में एक यंग रोड है जिस पर ओएनजीसी का तेल भवन खड़ा है। 1832 में, मसूरी भारत के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण का टर्मिनस था जो देश के दक्षिणी सिरे पर शुरू हुआ था। उस समय के भारत के महासर्वेक्षक जॉर्ज एवरेस्ट चाहते थे कि भारतीय सर्वेक्षण का नया कार्यालय मसूरी में स्थित हो। उसी वर्ष मसूरी में पहली बियर ब्रूवरी सर हेनरी बोहले द्वारा “द ओल्ड ब्रूवरी” के रूप में स्थापित की गई थी। 1850 में मैकिनॉन एंड कंपनी के रूप में सर जॉन मैकिनॉन द्वारा फिर से स्थापित किए जाने से पहले शराब की भठ्ठी दो बार खुली और बंद हुई। हिंद महासागर से बनकर उठे बादल पूरे देश में बारिश का मनभावन सुहावना मौसम रच कर हिमालय से रुककर तराई के इलाक़ों में अच्छी बारिश करते हुए पहाड़ों पर रुककर छाए रहते हैं। उन्ही के बीच से रास्ता गुजरता रहा।
मसूरी शांत और खूबसूरत जगह। हम समय बचाने के हिसाब से मसूरी पार करके सीधे धनौल्टी चले गए। धनौल्टी देवदार के जंगल से घिरा है। अब देवदार का जंगल ही इसकी पहचान बन चुका है। यहां रहने के लिए कुछ होटल बन गये है। गढवाल मंडल टूरिज्म का गेस्ट हाउस भी है। शहर की भीडभाड़ से दूर जाना चाहते हैं तो धनौल्टी अच्छी जगह है। मसूरी घूमने के बाद यहां ठहरा जा सकता है।
धनौल्टी काफ़ी शान्तिपूर्ण स्थल के रूप में भी जानी जाती है जिस कारण यहाँ पर्यटकों की भीड़ अधिक रहती है। लंबी जंगली ढलानें, ठंडी व शांत हवाएँ, स्थानीय लोगों द्वारा की जाने वाली मेहमान नवाजी, मनमोहक मौसम, बर्फ से ढंके पहाड़ यहाँ की ख़ास विशेषताओं में शामिल हैं, जो इस जगह को सुकूनभरी छुट्टियाँ बिताने के लिए एक आदर्श जगह बनाते हैं। देखने लायक़ जगहों में बारेहीपानी और जोरांडा फॉल्स, दशावतार मन्दिर, ईको-पार्क, सुरकंडा देवी, मन्दिर, हिमालयन वीवर्स, जैन मंदिर आदि शामिल हैं। सर्दियों में स्नो फॉल का मजा लेना चाहते हैं तो वहाँ जरूर जाएं। यहां देखने लायक कई जगह हैं। जैसे एप्पल गार्डन में घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं। यहां सालभर मौसम ठंडा रहता है। दिसंबर के बाद यहां बर्फबारी होना शुरू हो जाती है। धनोल्टी मै एडवेंचर से भरपूर 🏕️camping की अच्छी सुविधा है।
धनौल्टी से वापसी में मसूरी के दर्शनीय स्थल देखे। मसूरी में माल रोड प्रसिद्ध जगह है लेकिन बाज़ार बहुत महँगा है। देहरादून से माल लाकर वहाँ दुगुने-तिगुने दाम पर बेंचा जाता है। ख़रीदी के लिए देहरादून का पल्टन बाज़ार या इंदिरा मार्केट वाजिब है।
केम्पटी फाल याने जल प्रपात मसूरी से पंद्रह किलोमीटर है। एक बहुत छोटा पहाड़ी जल प्रपात चट्टानों को काटकर गिरता है। अंत में एवरेस्ट हाऊस देखने गए। यह एवरेस्ट के स्वामित्व में लगभग 11 वर्षों तक उनका निवास था। उन्होंने इसे जनरल व्हिश से खरीदा था। 1832 में बने इस घर को आज सर जॉर्ज एवरेस्ट हाउस एंड लेबोरेटरी या पार्क हाउस के नाम से जाना जाता है। यह घर पार्क एस्टेट में गांधी चौक/लाइब्रेरी बाजार (मसूरी में माल रोड के पश्चिमी छोर) से लगभग 6 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। इसके स्थान से एक तरफ दून घाटी और उत्तर में अगलर नदी घाटी और हिमालय श्रृंखला के मनोरम दृश्य दिखाई देते हैं। परंतु घाटियों में बादलों की जमघट होने के कारण हमें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। अप्रेल-मई के महीनों में जब आसमान साफ़ होता है तब घाटियों का दृश्य मनोरम होता है। दिसम्बर-जनवरी में बर्फ़वारी से घाटियाँ सफ़ेद चादर ओढ़ लेती हैं। भूमिगत पानी के कुंड हैं (या शायद बर्फ के भंडारण के लिए गड्ढे, क्योंकि क्षेत्र में पानी की कमी है) जो काफी गहरे हैं और घर के बाहर सामने के यार्ड में खुले पड़े हैं, कूड़े से भरे हुए हैं और फिसलने का खतरा है।
इंटीरियर को हटा दिया गया है लेकिन फायरप्लेस, छत, और दरवाजे और खिड़की के फ्रेम अभी भी बने हुए हैं। घर स्टील ग्रिल से सुरक्षित है और इसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता है। यह संपत्ति बेहतर रूप से जानी जाती है और पहुंच मार्ग में सुधार किया गया है, दीवारों को भित्तिचित्रों से ढक दिया गया है और समय-समय पर साफ किया जाता है। इसका पूरी तरह जीर्णोद्धार और रखरखाव वांछित है।
27 जुलाई 2021 का दिन हमने देहरादून के दर्शनीय स्थलों के लिए तय कर रखा था क्योंकि एक दिन कठिन यात्रा के बाद दूसरा दिन थोड़ा आराम भरा होना चाहिए, नहीं तो लगातार थकान से घूमने का मज़ा जाता रहता है और पर्यटक ऊब का शिकार होने लगते हैं। इस समय चारों तरफ़ से घनघोर बारिश की खबरें आ रही हैं। हालाँकि हमने जिन स्थानों को चुना है वे बारिश के मौसम में जोखिम भरी नहीं मानी जाती परंतु फिर भी मौसम का क्या भरोसा। यही बात यात्रा को रोमांचक बनाती है।
देहरादून गढ़वाल इलाक़े का प्रमुख शहर और उत्तराखंड की राजधानी है। देहरादून दून घाटी में हिमालय की तलहटी में स्थित है, जो पूर्व में गंगा की एक सहायक सोंग नदी और पश्चिम में यमुना की सहायक आसन नदी के बीच स्थित है। यह शहर अपने सुरम्य परिदृश्य और थोड़ी हल्की ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है और आसपास के क्षेत्र के लिए प्रवेश द्वार प्रदान करता है। शहर समुद्र तल से 2,100 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। देहरादून गढ़वाल शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है जिसे अंग्रेजों ने कुमायूँ-गढ़वाल के शासन का केन्द्र बना लिया था। इस शहर को उत्तराखंड हिमालय का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।
स्कंद पुराण में दून का उल्लेख केदारखंड नामक क्षेत्र के एक भाग के रूप में किया गया है, जो शिव का निवास स्थान है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन भारत में महाभारत महाकाव्य युग के दौरान, कौरवों और पांडवों के महान शिक्षक द्रोणाचार्य यहां रहते थे, इसलिए इसका नाम “द्रोणनगरी” पड़ा। शहर को देवभूमि (“देवताओं की भूमि”) के रूप में भी माना जाता है।
देहरादून उपनाम “दून वैली” का इतिहास रामायण और महाभारत की कहानी से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि रावण और भगवान राम के बीच युद्ध के बाद, भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण ने इस स्थल का दौरा किया था। इसके अलावा, महाभारत में कौरवों और पांडवों के महान गुरु, द्रोणाचार्य के नाम पर ‘द्रोणनगरी’ के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि उनका जन्म और निवास देहरादून में हुआ था। देहरादून के आसपास के क्षेत्रों में प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों से मिले साक्ष्यों को रामायण और महाभारत की पौराणिक कथाओं से जोड़ा गया है। ये अवशेष और खंडहर लगभग उतने ही पुराने माने जाते हैं। इसके अलावा, स्थान, स्थानीय परंपराएं और साहित्य महाभारत और रामायण की घटनाओं के साथ इस क्षेत्र के संबंधों को दर्शाते हैं। महाभारत की लड़ाई के बाद इस क्षेत्र पर पांडवों का प्रभाव था क्योंकि हस्तिनापुर के शासकों ने सुबाहू के वंशजों के साथ इस क्षेत्र पर सहायक के रूप में शासन किया था। इसी तरह, इतिहास के पन्नों में ऋषिकेश का उल्लेख है जब भगवान विष्णु ने संतों की प्रार्थना का जवाब दिया, राक्षसों का वध किया और संतों को भूमि सौंप दी। महाभारत के समय में चकराता नामक स्थान का ऐतिहासिक प्रभाव बताया जाता है।
सातवीं शताब्दी में, इस क्षेत्र को सुधानगर के नाम से जाना जाता था और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका वर्णन किया था। सुधानगर को बाद में कालसी के रूप में पहचाना जाने लगा। कालसी में यमुना नदी के किनारे के क्षेत्र में अशोक के शिलालेख पाए गए हैं जो प्राचीन भारत में इस क्षेत्र के महत्व को दर्शाते हैं। पड़ोसी क्षेत्र हरिपुर में, राजा रसला के समय से खंडहरों की खोज की गई थी जो इस क्षेत्र की समृद्धि को भी दर्शाते हैं।
ब्रिटिश राज के आरम्भिक दिनों में शहर का आधिकारिक नाम देहरा था। देहरादून दो शब्दों “देहरा” + “दून” से मिलकर बना है। देहरा शब्द “डेरा” से लिया गया है, जिसका अर्थ है शिविर और गढ़वाली भाषा में दून एक घाटी को कहते हैं। यह घाटी मध्य हिमालय और “शिवालिक” के बीच स्थित है। शहर की स्थापना तब हुई जब सातवें सिख गुरु, गुरु हर राय के पुत्र बाबा राम राय ने 1675 में इस क्षेत्र में अपना “डेरा” या शिविर लगाया। उस समय से आधुनिक देहरादून शहर का विकास शुरू हुआ। यह तब की बात है जब देहरा शब्द दून से जुड़ा और इस तरह इस शहर का नाम देहरादून पड़ा। आसपास की अन्य प्रमुख दून घाटियां कोटली दून, पाटली दून और पिंजौर दून हैं।
देहरादून के नाम का इस्तेमाल होने से पहले, जगह को पुराने नक्शों पर गुरुद्वारा (वेब द्वारा एक नक्शा, 1808) या गुरुद्वारा (जेरार्ड द्वारा एक नक्शा, 1818) के रूप में दिखाया गया है। जेरार्ड के नक्शे में उस स्थान का नाम “देहरा या गुरुद्वारा” रखा गया है। इस मूल सिख मंदिर के चारों ओर कई छोटे गाँव थे जो अब आधुनिक शहर के कुछ हिस्सों के नाम हैं।
देहरादून पर गजनी के महमूद ने 1024 में, 1368 में तैमूर लंग ने, 1757 में रोहिल्ला प्रमुख नजीबउद्दौला और 1785 में गुलाम कादिर ने आक्रमण किया था। नेपाली राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1806 में अल्मोड़ा, पठानकोट, कुमाऊं, गढ़वाल, सिरमुर, शिमला, कांगड़ा और देहरादून को एकजुट किया। पश्चिमी मोर्चे पर गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में पंजाब तक और पूर्वी मोर्चे पर सिक्किम राज्य से परे दार्जिलिंग तक एक संक्षिप्त अवधि के लिए नेपाल का हिस्सा रहा आया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी 1814 से 1816 तक ब्रिटिश-नेपाल युद्ध से उसे भारत में मिला लिया। युद्ध सुगावली की संधि पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुआ जिसमें नेपाल ने अपने नियंत्रण का लगभग एक तिहाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया था। अंग्रेजों ने 1816 में देहरादून प्राप्त किया और 1827-1828 में लंढौर और मसूरी का विकास किया। भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू देहरादून शहर के काफी शौकीन थे और अक्सर वहाँ जाते रहते थे। 1964 में दिल्ली में निधन से पहले उन्होंने अपने अंतिम कुछ दिन यहां बिताए। स्वतंत्रता आंदोलन के एक अन्य नेता, रास बिहारी बोस, जो ग़दर षडयंत्र भारतीय राष्ट्रीय सेना के प्रमुख आयोजकों में से एक थे जिसका मुख्यालय अपने शुरुआती दिनों में देहरादून में स्थित था। जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने के लिए 1915 में जापान जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
देहरादून का अफगान संबंध प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839) से जुड़ा है, जिसके बाद अफगान अमीर दोस्त मोहम्मद खान (अफगानिस्तान के अमीर) को अंग्रेजों ने देहरादून में निर्वासित कर दिया था। वह 6 साल से अधिक समय तक मसूरी में रहे। मसूरी नगरपालिका के अंतर्गत आने वाले बालाहिसर वार्ड का नाम दोस्त मोहम्मद के महल के नाम पर रखा गया है। प्रसिद्ध देहरादून बासमती को उनके साथ अफगानिस्तान के कुनार प्रांत से लाया गया था और इसे आज भी घाटी के व्यंजन के रूप में गिना जाता है।
चालीस साल बाद, दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद, उनके पोते, मोहम्मद याकूब खान को 1879 में निर्वासन के लिए भारत भेजा गया था। अपने दादा की तरह, उन्होंने अपने निवास के रूप में दून घाटी को चुना। याकूब औपचारिक रूप से देहरादून में बसने वाला पहला अफगान बना। वर्तमान मंगला देवी इंटर कॉलेज कभी काबुल पैलेस था जहाँ याकूब ने अपने जीवन के कुछ साल बिताए थे।
अफगान शाही परिवार ने देहरादून में उपस्थिति बनाए रखी। यह अफगानिस्तान के अंतिम से दूसरे राजा मोहम्मद नादिर शाह का जन्मस्थान था। दो विचित्र महल – देहरादून में काबुल पैलेस और मसूरी में बाला हिसार पैलेस – अफगानिस्तान के साथ इस संबंध की गवाही देते हैं। वे इन अफगान शासकों द्वारा 20 वीं शताब्दी के शुरुआती भाग में भारत में निर्वासन में बनाए गए थे। बाला हिसार पैलेस को अब मसूरी के विनबर्ग एलन स्कूल में बदल दिया गया है।
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने उल्लेख किया है कि उनकी दादी देहरादून में पली-बढ़ी हैं। “मैं टैगोर की बात करता हूं क्योंकि मुझे टैगोर से प्रशिक्षित मेरी दादी ने पाला था जो देहरादून में रहती थीं …,” डॉ गनी ने भारत की दृष्टि और उल्लेखनीय परिवर्तन के बारे में बात करते हुए कहा।
देहरादून शहर मुख्य रूप से दून घाटी में स्थित है और क्लेमेंट टाउन 1,350 फीट की ऊंचाई पर है और मालसी 2,300 फीट से ऊपर है जो शहर से 15 किमी दूर है। मालसी लेसर हिमालयन रेंज का शुरुआती बिंदु है जो मसूरी और उससे आगे तक फैला हुआ है। देहरादून जिले में जौनसार-बावर पहाड़ियाँ समुद्र तल से 12,100 फीट ऊपर हैं। मसूरी का पहाड़ी क्षेत्र समुद्र तल से 6,135 से 6,617 फीट की ऊंचाई तक जाता है। इसकी भू-आकृति विज्ञान और मौसम संबंधी विशेषताएं इसे कई प्राकृतिक खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। भूकंप के अलावा, यह क्षेत्र अक्सर भूस्खलन, बादल फटने, अचानक बाढ़, शीत लहरों और ओलावृष्टि से तबाह हो जाता है।
दून घाटी में रायवाला, ऋषिकेश, डोईवाला, हर्रावाला, देहरादून, हरबर्टपुर, विकासनगर, सहसपुर, सेलाकी, सुभाष नगर और क्लेमेंट टाउन सहित बस्तियां शामिल हैं। जिले में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान है जो हाथियों का घर है, मसूरी में बेनोग वन्यजीव अभयारण्य और आसन संरक्षण रिजर्व (आसन बैराज)। दून घाटी में तराई और भाबर के जंगलों के साथ-साथ शिवालिक पहाड़ियाँ और मसूरी और चकराता जैसे हिल स्टेशन युक्त कम हिमालयी रेंज हैं। जिले की सीमा उत्तर में हिमालय, दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों की राजाजी रेंज, पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी से लगती है। पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में स्थित शहरों में सहस्त्रधारा, लाखमंडल, गौतम कुंड, चंद्रबनी, कालसी और डाकपत्थर शामिल हैं।
यह जिला दो प्रमुख भागों में विभाजित है: शिवालिक से घिरा मुख्य शहर देहरादून और हिमालय की तलहटी में स्थित जौनसार-बावर। उत्तर और उत्तर पश्चिम में यह उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल जिले से, पूर्व और दक्षिण में पौड़ी गढ़वाल और गंगा नदी से, पश्चिम में, यह हिमाचल प्रदेश के शिमला और सिरमौर जिलों, हरियाणा के यमुनानगर जिले और टोंस और यमुना नदियाँ से घिरा है। दक्षिण में हरिद्वार और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले हैं।
स्वतंत्रता के बाद देहरादून और गढ़वाल और कुमाऊं के अन्य हिस्सों को संयुक्त प्रांत में मिला दिया गया था जिसे बाद में उत्तर प्रदेश राज्य का नाम दिया गया था। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी जिलों से उत्तराखंड राज्य (जिसे पहले उत्तरांचल कहा जाता था) बनाकर देहरादून को इसकी राजधानी बनाया गया।