हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२३ ☆ व्यंग्य – तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२३ ☆

☆ व्यंग्य ☆ तुमहिं छांड़ि गति दूसर नाहीं ☆

देश में विपक्षी नेता और मुख्यमंत्री बड़ी सांसत में हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं। बड़ी मुश्किल में हूं कि मैं किधर जाऊं।’ वजह यह है कि धर्म का अश्व सरपट  दौड़ रहा है और अपने धर्मनिरपेक्ष होने का दम भरने वाले नेता उसके पीछे घिसट रहे हैं।

पूरे राजनीतिक वातावरण में हड़कंप है। सत्ता पक्ष ने भव्य राम मंदिर बनवाकर उसका उद्घाटन किया, फिर  प्राण-प्रतिष्ठा हुई, और अंत में मंदिर पर धर्म-ध्वजा फहरायी गई। यानी भक्तों को तीन तीन बार आनंदित होने का और भक्ति रस में डूबने का मौका मिला। विरोधी दल सत्ता पक्ष की यह तुरुप चाल देखकर बेबस बिलबिलाते रहे। दर्शन करने नहीं गये तो राम-विरोधी होने का ठप्पा लगा। जनता के आक्रोश से बचने और ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए बड़े नेताओं ने छुटभइयों को भेज दिया।

इसके पहले महाकुंभ में अपनी सारी शक्ति झोंक कर सत्ता पक्ष साबित कर चुका था कि उसकी राजनीति के लिए धर्म का कितना महत्व है। उस समय भी कुंभ में न नहाने पर विपक्षियों की लानत-मलामत हुई थी।  

सत्तापक्ष को धर्म के बल पर मैदान मारते देखकर विपक्षी अकबकाये हैं। भारत धर्मप्रधान देश है, इसलिए धर्म के दांव की काट ढूंढ़ पाना मुश्किल है। ‘उगलत निगलत पीर घनेरी’ वाली स्थिति है। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों की ज़बान फिलहाल लड़खड़ा रही है। सब यह साबित करने में लगे हैं कि  वे नास्तिक नहीं हैं, वे भी दूसरों के बराबर रामभक्त हैं, लेकिन वे रामभक्ति का दिखावा नहीं करते। इसी चक्कर में राहुल गांधी को मंदिर मंदिर जाना और अपना जनेऊ दिखाना पड़ रहा है।

अपनी ज़मीन ख़तरे में देखकर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने अपने गृह नगर सैफ़ई में 50 फुट की भगवान कृष्ण की मूर्ति बनवायी है। यानी रघुवंशी राम के मुकाबले यदुवंशी कृष्ण को खड़ा किया है। उम्मीद है कि भगवान कृष्ण की कृपा से कम से कम यादवों का वोट पुख़्ता रहेगा।

उधर अभी तक आत्मविश्वास से भरीं, सत्ता को चुनौती देने वालीं ममता दीदी का आत्मविश्वास अब दरकने लगा है। कुछ दिनों पहले उन्होंने अपनी धार्मिकता दिखाने के लिए मंच पर चंडी  की सतुति की थी। अभी पढ़ा कि दीदी ने सिलीगुड़ी के एक कस्बे में महाकाल की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा का शिलान्यास किया। लगता है जैसे सभी नेता एक सुर में गा रहे हैं— ‘शरण में आये हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन।’ धर्म की राजनीतिक उर्वरता देखकर बंगाल में बाबरी मस्जिद के जिन्न को बोतल से बाहर निकाला गया है, जिसके जवाब में तत्काल गीता पाठ का कार्यक्रम हुआ।

यह भी पढ़ा कि राजस्थान के नाथद्वारा  के करीब गोवर्धन पर्वत पर हनुमान जी की 111 फुट ऊंची, उत्तर भारत की सबसे ऊंची मूर्ति बन रही है, जिसे 10 किलोमीटर दूर से देखा जा सकेगा। उधर बिहार के चंपारण में दुनिया के सबसे बड़े 33 फुट ऊंचे शिवलिंग की स्थापना की गयी है। इस शिवलिंग का निर्माण तमिलनाडु में हुआ, जिसमें 10 साल लगे।

सभी विपक्षी दल अपनी खोयी हुई ज़मीन हासिल करने की जद्दोजहद में लगे हैं और सत्तादल उन पर व्यंग्य करने का कोई मौका नहीं चूक रहा है। गड़बड़ यह हो रही है कि अपने को धार्मिक साबित करने की होड़ में ज़रुरी मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, हवा-पानी, शिक्षा- स्वास्थ्य, पेपर लीकेज के मुद्दों पर से नज़र हट रही है। सब धर्म की गंगा में डुबकी लगाने को ही अक्लमंदी मान रहे हैं। स्थिति  को देखकर शायर साक़िब लखनवी का शेर याद आता है— ‘बाग़बां ने आग दी जब आशियाने को मिरे, जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे।’

देश का युवक पूरी तरह भ्रमित और परेशान है। अयोध्या में एक युवक का वक्तव्य सुना कि युवाओं को नौकरी के लिए कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है,अयोध्या में ही भक्तों को चंदन लगाकर दो चार सौ रुपये रोज़ पैदा किये जा सकते हैं। प्रयाग के माघ मेले में एक बाबा, जो नौवीं पास बताये जाते हैं, साढ़े तीन और चार करोड़ की कारों में घूम रहे हैं। एक और बाबा पांच करोड़ के सोने के ज़ेवर शरीर पर लटकाये घूम रहे हैं। उनकी शिक्षा भी कार वाले बाबा की पढ़ाई के आसपास बतायी जाती है। उधर अपराधी जेल से लोगों के पास दस करोड़ की वसूली के नोटिस भेज रहे हैं। हत्या और बलात्कार के मामलों में सज़ा काट रहे सिरसा  वाले संत जी को 8 साल 4 महीने में 15 बार पैरोल मिली है, जिसका सदुपयोग वे भक्तों को प्रवचन देने में करते हैं। जब भी जेल से निकलते हैं, शान से काफिले में चलते है। अब वे दिन लद गये जब पाप करने वाला मुंह छिपाता फिरता था। अब पाप करने वाला तन कर, मूंछों पर ताव देता चलता है। देश के बैंकों से हज़ारों करोड़ लेकर भागे चतुर लोग विदेश में ऐश कर रहे हैं और अपनी पार्टियों की फोटो डालकर यहां की जनता को मुंह चिढ़ा रहे हैं।

ऐसे मैं देश का पढ़ा-लिखा युवा चक्कर में है कि वह किसकी तरफ देखे और किस से कोई उम्मीद करे। प्रसंगवश बता दूं कि एक बाबा छात्रों को बिना पढ़े पास होने का नुस्खा बता चुके हैं। सिद्ध हुआ कि देश के युवा को रोज़गार का कोई अन्य विकल्प भले ही न मिले, बाबा बनने का शानदार विकल्प तो खुला ही है।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९४ – रुके हुए आँसू… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– रुके हुए आँसू …” ।) 

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९४ — रुके हुए आँसू — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

विधवा माँ एक विधुर से पुनर्विवाह करती। आदमी का संतान न होना एक संयोग ही था। पर बेटी ने माना नहीं। बाद में बेटी की शादी हो गयी। बीस साल बीते। बीमार माँ अस्पताल में थी। बेटी ने अस्पताल पहुँचने पर माँ के पास एक अनजान आदमी को देखा। माँ ने उसे बताया इसी के साथ उसका पुनर्विवाह होना था। केंसर पीड़ित माँ इतना बोलते रो दी। बेटी के भीतर आज बहुत कुछ टूट गया, बिखर गया।

© श्री रामदेव धुरंधर

14 – 02 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२४ – आत्मबोध ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२४ ☆ आत्मबोध… ?

आत्म, शुचिता का सूचक है। आत्म आलोकित और पवित्र है। गंगोत्री के उद्गम की तरह, जहाँ किसी तरह का कोई मैल नहीं होता। मैल तो उद्गम से आगे की यात्रा में जमना शुरू होता है। ज्यों-ज्यों यात्रा आगे बढ़ती है, यात्रा के छोटे-बड़े पड़ाव मनुष्य में आत्म-मोह उत्पन्न करते हैं। फिर आत्म-मोह, अज्ञान के साथ मिलकर अहंकार का रूप देने लगता है। जैसे पेट बढ़ने पर घुटने नहीं दिखते, वैसे ही आत्म-मोही की भौंहे फैलकर अपनी ही आँखों में प्रवेश कर जाती हैं। इससे दृष्टि धुंधला जाती है। आगे दृष्टि शनै: शनै: क्षीण होने लगती है और अहंकार के चरम पर आँखें दृष्टि से हीन हो जाती हैं।

दृष्टिहीनता का आलम यह कि अहंकारी को अपने आगे दुनिया बौनी लगती है। वह नाममात्र जानता है पर इसी नाममात्र को सर्वश्रेष्ठ मानता है। ज्ञानी की अवस्था पूर्ण भरे घड़े की तरह होती है। वह शांत होता है, किसी तरह का प्रदर्शन नहीं करता। अज्ञानी की स्थिति इसके ठीक विरुद्ध होती है। वह आधी भरी मटकी के जल की तरह उछल-उछल कर अपना अस्तित्व दर्शाने के हास्यास्पद प्रयास निरंतर करता है। इसीलिए तो कहा गया है, ‘अधजल गगरी छलकत जाए।’

लगभग चार दशक पूर्व  एक अंग्रेजी फिल्म देखी थी। नायक दुर्घटनावश एक ऐसे कस्बे में पहुँच जाता है जहाँ जीवन जीने के तौर-तरीके अभी भी अविकसित और बर्बर हैं। नायक को घेर लिया जाता है। कस्बे का एक योद्धा, नायक के सामने तलवार लेकर खड़ा होता है। तय है कि वह तलवार से नायक को समाप्त कर देगा। अपने अहंकार का मारा कथित योद्धा, नायक का सिर, धड़ से अलग करने से पहले तलवार से अनेक करतब दिखाता है। भारी भीड़ जुटी है। एक ओर नायक स्थिर खड़ा है। दूसरी ओर से तलवारबाजी करता कथित योद्धा नायक की ओर बढ़ रहा है। योद्धा के हर बढ़ते कदम के  साथ शोर भी बढ़ता जाता है। अंततः दृश्य की पराकाष्ठा पर योद्धा ज्यों ही तलवार निकालकर नायक की गर्दन पर वार करने जाता है, अब तक चुप खड़ा नायक, जेब से पिस्तौल निकालकर उसे ढेर कर देता है। भीड़ हवा हो जाती है। ज्ञान के आगे अज्ञान की यही परिणति होती है।

अज्ञान से मुक्ति के लिए आत्म-परीक्षण करना चाहिए। आत्म-परीक्षण होगा, तब ही आत्म-परिष्कार होगा। आत्म-परिष्कार होगा तो मनुष्य आत्म-बोध के दिव्य पथ पर अग्रसर होगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६७ – लघुकथा – क्या रखा है नाम में? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – लघुकथा – क्या रखा है नाम में?)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६७ ☆

☆ लघुकथा – क्या रखा है नाम में? ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

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नाम व्यक्ति की पहचान होता है। शिशु को नाम माता-पिता या अन्य पारिवारिक बड़े जन देते हैं। हम सब समाज में अपने नाम से ही जाने जाते हैं। एक ही नाम एक से अधिक व्यक्तियों के हो सकते हैं। पहचान सुनिश्चित करने के लिए पिता, पति या गाँव के नाम तथा कुलनाम भी जोड़ लिया जाता है। नेकनाम होना तथा नाम कमाना सबकी चाह होती है जबकि गुमनाम, बदनाम होना कोई नहीं चाहता।

मेरे कार्यालय में एक अधिकारी आए जिनका नाम था राम लाल शर्मा। संयोगवश दफ्तर में एक भृत्य का भी यही नाम था। अधिकारी के कक्ष के बाहर उनकी नाम पट्टिका लगाई गई तो उन्होंने उसे हटाने का आदेश देते हुए कहा कि आर. एल. शर्मा आई.ए.एस. लिखवाओ।

एक बच्चे का नाम गरीब दास था। वह पढ़-लिखकर  नौकरी में लगा तो यह नाम चुभने लगा उसने शपथ पत्र देकर नाम बदल लिया। उसके रिश्तेदार आते तो उसे बचपन के नाम से पुकारते, यह उसे बहुत खराब लगता। माता-पिता से अक्सर बहस कर लेता और डाँट खाता।

कुछ लोग अपने पेशे को अपने व्यक्तित्व से अहमियत देते हैं, वे नाम के पहले डॉक्टर या प्रोफेसर लिखने लगते हैं। यह लत इतनी बढ़ जाती है कि केवल नाम लिखा या लिया जाने पर वे खुद को अपमानित या शर्मिंदा अनुभव करते हैं।

जब समाज में शिक्षा का प्रसार कम था तब नाम के साथ उपाधि बी.ए., एम.ए., विशारद, शास्त्री आदि लिखने का चलन था। मेरे एक पड़ोसी सेवा निवृत्त उच्च अधिकारी हैं, वे नाम पट्टिका पर अपना पदनाम लिखने का मोह नहीं छोड़ पाए। एक सामाजिक कार्यकर्ता खुद का परिचय पत्नी के पद से से पार्षद पति कहकर देते हैं।

एक दिन मेरी बेटी ने मेरे पिता श्री पूछ लिया कि व्यक्ति की सही पहचान नाम, कुलनाम या पदनाम क्या होती है? पिता जी बोले- पानी केरा बुदबुदा अस मानुस की जात, क्या धरा है नाम में? मनुष्य की सही पहचान उसके काम से होती है। दुनिया को काम ही प्यारा होता है, नाम या चाम नहीं।”

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©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३०९ ☆ मैं, मैं और सिर्फ़ मैं… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मैं, मैं और सिर्फ़ मैं। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३०९ ☆

☆ मैं, मैं और सिर्फ़ मैं… ☆

‘कोई भी इंसान खुश रह सकता है, बशर्ते वह ‘मैं, मैं और सिर्फ़ मैं’ कहना छोड़ दे और स्वार्थी न बने’ मैथ्यू आर्नल्ड का यह कथन इस ओर इंगित करता है कि मानव को कभी फ़ुरसत में अपनी कमियों पर अवश्य ग़ौर करना चाहिए; दूसरों को आईना भी दिखाने की आदत स्वत: छूट जाएगी।

मानव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझ आजीवन दूसरों के दोष-अवगुण खोजने में व्यस्त रहता है। उसे अपने अंतर्मन में झांकने का समय ही कहां मिलता है? वह स्वयं को ही नहीं, अपने परिवारजनों को भी सबसे अधिक विद्वान, बुद्धिमान अर्थात् ख़ुदा से कम नहीं आंकता। सो! उसके परिवार-जन सदैव दोषारोपण करना ही अपने जीवन का लक्ष्य स्वीकारते हैं। इसलिए न परिवार में सामंजस्यता की स्थिति आ सकती है;  न ही समाज में समरसता। चारों ओर विश्रृंखलता व विषमता का दबदबा रहता है, क्योंकि मानव स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में लिप्त रहता है और अपनी अहंनिष्ठता के कारण वह सबकी नज़रों से गिर जाता है। आपाधापी भरे युग में मानव एक-दूसरे को पीछे धकेल आगे बढ़ जाना चाहता है; भले ही उसे दूसरों की भावनाओं को रौंद कर आगे ही क्यों न आगे बढ़ना पड़े? सो! उसे दूसरों के अधिकारों के हनन से कोई सरोकार नहीं होता। वह निपट स्वार्थांध मानव केवल अपने हित के बारे में सोचता है और अपने अधिकारों के प्रति सजग व अपने कर्त्तव्यों से अनभिज्ञ दूसरों को उपेक्षा भाव से देखता है, जबकि अन्य के अधिकार तभी आरक्षित व सुरक्षित रह सकते हैं; जब वह अपने कर्त्तव्य व दायित्वों का सहर्ष निर्वहन करे। मैं, मैं और सिर्फ़ मैं की भावना से आप्लावित मानव आत्मकेंद्रित होता है। वह केवल अपनी अहंतुष्टि करना चाहता है तथा उसके लिए वह अपने संबंधों व पारिवारिक दायित्वों को तिलांजलि देकर निरंतर आगे बढ़ता चला जाता है; जहां उसकी काम- वासनाओं का अंत नहीं होता… और संबंध व सामाजिक सरोकारों से निस्पृह मानव एक दिन स्वयं को नितांत अकेला अनुभव करता है और ‘मैं’ ‘मैं’ के दायरे व चक्रव्यूह से बाहर आना चाहता है; स्वयं में स्थित होना चाहता है और प्रायश्चित करना चाहता है…परंतु अब किसी को उसकी व उसकी करुणा-कृपा की ज़रूरत नहीं होती।

इस दौर में वह अपनी कमियों पर ग़ौर करके अपने अंतर्मन मेंं झांकना व आत्मावलोकन करना चाहता है। परंतु उसे अपने भीतर अवगुण, दोष व बुराइयों का पिटारा दिखाई पड़ता है और वह स्वयं को काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में लिप्त पाता है। इन विषम परिस्थितियों में वह उस स्वनिर्मित जाल से बाहर निकल, संबंध व सरोकारों का महत्व समझ कर लौट जाना चाहता है; उन अपनों में; अपने आत्मजों में, परिजनों में… जो अब उसकी अहमियत नहीं स्वीकारते, क्योंकि उन्हें उससे कोई अपेक्षा नहीं रहती। वैसे भी ज़िंदगी मांग व पूर्ति के सिद्धांत पर निर्भर है। हमें भूख लगने पर भोजन तथा प्यास लगने पर पानी की दरक़ार  होती है और यथासमय स्नेह, प्रेम, सहयोग व सौहार्द की। सो! बचपन में उसे माता के स्नेह व पिता के सुरक्षा-दायरे की ज़रूरत व उनके सानिध्य की अपेक्षा रहती है। युवावस्था में उसे अपने जीवन- साथी, दोस्तों व केवल अपने परिवारजनों की अपेक्षा रहती है; माता-पिता के संरक्षण की नहीं। सो! अपेक्षा व उपेक्षा भाव दोनों सुख-दु:ख की मानिंद एक स्थान पर नहीं रह सकते, क्योंकि प्रथम भाव है, तो द्वितीय अभाव और इनमें सामंजस्य ही जीवन की मांग है।

जीवन जहां संघर्ष का पर्याय है; वहीं समझौता भी है, क्योंकि संघर्ष से हम वह सब नहीं प्राप्त कर पाते; जो प्रेम द्वारा पल-भर में प्राप्त कर सकते हैं। आपका मधुर व्यवहार ही आपकी सफलता की कसौटी है, जिसके बल पर आप लाखों लोगों के प्रिय बन कर उनके हृदय पर आधिपत्य स्थापित कर सकते हैं। विनम्रता हमें नमन सिखाती है; शालीनता का पाठ पढ़ाती है, और विनम्र व्यक्ति विपदा-आपदा के समय पर अपना मानसिक संतुलन नहीं खोता… सदैव धैर्य बनाए रखता है। अहं उसके निकट जाकर भी उसे छूने का साहस नहीं जुटा पाता अर्थात् वह ‘मैं, मैं और सिर्फ़ मैं’ के शिकंजे से सदैव मुक्त रहता है और आत्मावलोकन कर ख़ुद में सुधार लाने की डगर पर चल पड़ता है। वह अपनी कमियों को दूर करने का भरसक प्रयास करता है और कबीरदास जी की भांति ‘बुरा जो देखन मैं चला, मोसों बुरा न कोय’ अर्थात् पूरे संसार में उसे ख़ुद से बुरा व कुटिल कोई अन्य दिखाई नहीं पड़ता। इसी प्रकार सूर, तुलसी आदि को भी स्वयं से बड़ा पातकी ढूंढने पर भी दिखाई नहीं पड़ता, क्योंकि ऐसे लोग स्वयं को बदलते हैं; संसार को बदलने की अपेक्षा नहीं रखते।

कंटकों से आच्छादित मार्ग से सभी कांटो को चुनना अत्यंत दुष्कर कार्य है। हां! आत्मरक्षा के लिए पांवों में चप्पल पहन कर चलना अधिक सुविधाजनक व कारग़र है। सो! समस्या का समाधान खोजिए; ख़ुद मेंं बदलाव लाइए और दूसरों को बदलने में अपनी ऊर्जा नष्ट मत कीजिए। जब आपकी सोच व दुनिया को देखने का नज़रिया बदल जाएगा; आपको किसी में कोई भी दोष नज़र नहीं आयेगा और आप उस स्थिति में पहुंच जाएंगे… जहां आपको अनुभव होगा कि जब परमात्मा की कृपा के बिना एक पत्ता तक भी नहीं हिल सकता, तो व्यक्ति किसी का बुरा करने की बात सोच भी कैसे सकता है? सृष्टि-नियंता ही मानव से सब कुछ कराता है… इसलिए वह दोषी कैसे हुआ? इस स्थिति में उसे दूसरों को आईना दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

मानव ग़लतियों का पुतला है। यदि आप अपने जैसा दूसरा ढूंढने को निकलेंगे, तो अकेले रह जाएंगे। इसलिए दूसरों को उनकी कमियों के साथ स्वीकारना सीखिये … यही जीवन जीने का सही अंदाज़ है। वैसे भी आपको जीवन में जो भी अच्छा लगे, उसे सहेज व संजोकर रखिए और शेष को छोड़ दीजिए। इस संदर्भ में आपकी ज़रूरत ही महत्वपूर्ण है और ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’ तथा ‘जहां चाह, वहां राह… यह है जीने का सही राह।’ यदि मानव दृढ़-प्रतिज्ञ व आत्मविश्वासी है, तो वह नवीन राह ढूंढ ही लेता है और उस स्थिति में उसका मंज़िल पर पहुंचना अवश्यंभावी हो जाता है। सो! साहस व धैर्य का दामन थामे रखिए; मंज़िल अवश्य प्राप्त हो जाएगी।

हां! अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आपको सत्य की राह पर चलना होगा, क्योंकि सत्य ही शिव है, कल्याणकारी है…और जो मंगलकारी है, वह सुंदर तो अवश्य ही होगा। इसलिए सत्य की राह सर्वोत्तम है। सुख-दु:ख तो मेहमान की भांति आते-जाते रहते हैं। एक की अनुपस्थिति में ही दूसरा दस्तक देता है। सो! इनसे घबराना व डरना कैसा? इसलिए ‘जो हम चाहते हैं, वह होता नहीं और जो ज़िंदगी में होता है, हमें भाता नहीं’… वही हमारे दु:खों का मूल कारण है।’ जिस दिन हम दूसरों को बदलने की भावना को त्याग कर ख़ुद में सुधार लाने का मन बना लेंगे, दु:ख, पीड़ा, अवमानना, आलोचना, तिरस्कार आदि अवगुण-दोष सदैव के लिए जीवन से नदारद हो जाएंगे। इसलिए ‘परखिए नहीं, समझिए’ … यही जीने का सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। इसका दूसरा पक्ष यह है कि ‘जब चुभने लगें, ज़माने की नज़रों मेंं/ तो समझ लेना तुम्हारी चमक बढ़ रही है’ अर्थात् महान् व बुद्धिमान मनुष्य की सदैव आलोचना व निंदा होती है और वे सामान्य लोगों की नज़रों में काँटा बन कर खटकने लगते हैं। इस स्थिति में मानव को कभी भी निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रसन्नता से स्वयं को ग़ौरवान्वित अनुभव करना चाहिए कि ‘आपकी बढ़ती चमक व प्रसिद्धि देख लोग आपसे ईर्ष्या करने लगेंगे, परंतु आपको निरंतर उसी राह पर अग्रसर होते रहना चाहिए।’

ज़िंदगी जहां हर पल नया इम्तहान लेती है, वहीं  एक सुहाना सफ़र है। कौन जानता है, अगले पल क्या होने वाला है? इसलिए चिंता, तनाव व अवसाद में स्वयं को झोंक कर अपना जीवन नष्ट नहीं करने का संदेश प्रेषित है। स्वामी विवेकानंद जी के शब्दों में–’उठो! आगे बढ़ो और तब तक न रुको; जब तक आप मंज़िल को नहीं प्राप्त कर लेते। उस स्थिति में मन में केवल वही विचार रखें, जो तुम जो पाना चाहते हैं और केवल उसे ही हर दिन दोहराओ…आपको उस लक्ष्य के प्राप्ति अवश्य हो जाएगी।’

अंत में मैं कहना चाहूंगी कि ‘सिर्फ़ मैं’ के भाव का दंभ मत भरें; आत्मावलोकन कर अपने अंतर्मन में झांकें व दोष-दर्शन कर अपनी कमियों को सुधारने में प्रयासरत रहें… आप स्वयं को अवगुणों की खान अनुभव करेंगे। दूसरों से अपेक्षा मत करें और जब आपके हृदय में दैवीय गुण विकसित हो जाएं और आप लोगों की नज़रों में खटकने लगें, तो सोचें कि आपका जीवन, आपका स्वभाव व आपके कर्म उत्तम हैं, श्रेष्ठ हैं, अनुकरणीय हैं। सो! आप जीवन में अपेक्षा-उपेक्षा के जंजाल से मुक्त रहें…कोई बाधा आपकी राह नहीं रोक पाएगी। यही खुश रहने का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। परंतु यह तभी संभव होगा, जब आप स्व-पर से ऊपर उठ कर, नि:स्वार्थ भाव से पर-हित के कार्यों में स्वयं को लिप्त कर, उन्हें दु:खों से मुक्ति दिलाकर सुक़ून अनुभव करने लगेंगे। सो! दूसरों से उम्मीद रखने की अपेक्षा ख़ुद से उम्मीद रखना श्रेयस्कर है, क्योंकि इससे निराशा नहीं, आनंदोपलब्धि होगी और मानव-मात्र के सब मनोरथ पूरे होंगे।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८१ – नवगीत – परदेशी साजन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – परदेशी साजन…।

? रचना संसार # ८१ – गीत – परदेशी साजन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

आजा सजन बने परदेशी ,

 बरखा करे पुकार।

पावस ऋतु मनभावन आई,

 रिमझिम बरसे प्यार।।

 

नभ में गरज रहे बादल अब,

वन में नाचे मोर।

रिमझिम बूंदे शोर मचातीं,

मनवा भाव विभोर।।

श्यामल मेघ में चपला चमके,

भ्रमर करेंं गुंजार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

 

ढ़ोल नगाड़े गगन बजाता,

बादल गाते गीत।

साज संगीत नहीं सुहाता,

भूले सजना प्रीत।।

कोयल कू कू पीर बढ़ाती

छूटा है शृंगार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

 

अंग -अंग पुलकित धरती का,

जागा है अनुराग ।

ओढ़ हरी चुनरिया सजी है,

प्रियतम अब तो जाग।।

हँसी ठिठोली सखियों की अब,

चुभती है भरतार।

 

पावस ऋतु मनभावन आई,

रिमझिम बरसे प्यार।।

☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१० ☆ भावना के दोहे – जीवन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – जीवन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१० – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – जीवन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

चंचलता से चल रहा, मन का  यह अभियान।

पागल मन ही रख रहा, केवल अपना ध्यान।।

 *

नैतिकता का कर रहा, मन में शुद्ध विचार।

सत्यनिष्ठ जीवन रहे, रहती शक्ति अपार।।

 *

लोलुपता की आग में, झुलस रहा परिवार।

जीवन अब बचता नहीं, छूट रहा संसार।।

* 

मौलिकता देती रही, साहित्यिक उत्थान ।

मिथ्या कब साहित्य में, पाती है सम्मान।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९१ ☆ बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक – बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… । आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९१ ☆

☆ बुन्देली गीत – मैं तो राधे राधे गें हों… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

प्रेम भरा जिसने जीवन में, गुरु पद उन खों दें हों

राधे राधे जपा कृष्ण ने, मैं भी अब जप लें हों

जाकी शरण सबहिं जन चाहें, शरण तिहारी जें हों

पूजा पाठ भजन न जानू, प्रेमहिं मन भर लें हों

जब भी मिल हैं श्याम सलोने, देखत ही हरषे हों

भटक रहा है मन माया में, ओखों अब समझें हों

मन “संतोष” धन्य दर्शन से, जनम सफल कर लें हों

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १२ – कविता – राधा कृष्ण प्रीत… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘राधा कृष्ण प्रीत…‘।)

☆ शशि साहित्य # १२ ☆

? कविता – राधा कृष्ण प्रीत…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

कृष्ण तुम मीत हो,

राधा तुम  प्रीत हो,

जग में चहुं ओर,

फिर प्रेम की रीत हो,

निस्वार्थ भाव की,

जीत ही जीत हो,,

बज उठे मधुर तरंग,

प्रेम भरे गीत हों,,

दूरी भी कोई ना,

दिल को प्रतीत हो,,

सारे भाव ही अंतस,

से पूर्ण समर्पित हो,,

तुम मे मैं, और मुझमें ,

तुम परावर्तित हो,,

मन के प्रेम मंदिर में,

मूरत तुम्हारी प्रतिष्ठित हो,,

हर क्षण में सम्मिलित तुम,

ऐसा समय व्यतीत हो,,

कृष्ण तुम मीत हो,

संग राधा की प्रीत हो…

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८१ – मनमीत…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८१ – विजय साहित्य ?

☆ मनमीत…! ☆

☆

प्रेमाचे नाते,गुलाब जोडी

प्रेम देवता, वाढवी गोडी.

*

उत्कट उर्जा, असे केशरी

आकर्षणाची, प्रथम पायरी..!

*

मैत्री,आनंद, पिवळ्या‌ रंगी

वेलीवरती, नवीन ढंगी…!

*

कृतज्ञतेने आनंद वाटी

रंग गुलाबी,हृदयी दाटी…!

*

समर्पणाचा, लाल गुलाब

देई वचने, नसे रूबाब…!

*

श्वेत पांढरा, लक्ष वेधतो

शुद्ध भावना, नाते जपतो..!

*

उत्साह इच्छा, उत्कट भाव

रंग नारिंगी, वसवी गाव..!

*

आदर आणि,गूढ भावना

रंग जांभळा, पूर्ण कामना..!

*

सुख समृद्धी, प्रेम लाजरे

हिरव्या रंगी, होय साजरे…!

*

गुलाब काळा,दडून राही

वैर भावना, मनात‌ साही..!

*

गुलाब रंगी, मने सांडली

प्रेम भावना, तिथे नांदली..!

*

रंगामधूनी, उमले प्रीत

देई‌ शोधून, हा मनमीत…!

☆

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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