ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (27 जुलाई से 2 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (27 जुलाई से 2 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम।  हम सभी श्री हनुमान जी के भक्त अच्छी तरह से जानते हैं कि श्री हनुमान जी राक्षसों को समाप्त करने वाले हैं और वे श्री रामचंद्र जी को अत्यंत प्रिय है। साधु संत और सज्जन पुरुषों की वे रक्षा करते हैं। वैसे तो श्री हनुमान जी हमारे सभी कष्टों को दूर कर सकते हैं परंतु अगर आप श्री रामचंद्र जी से कोई कार्य करना चाहते हैं तो आप श्रीहनुमानजी को माध्यम बना सकते हैं। हनुमान जी से संपर्क श्री हनुमान जी से संपर्क का सबसे अच्छा साधन श्री हनुमान चालीसा है और श्री हनुमान चालीसा की आज की चौपाई है:-

साधु सन्त के तुम रखवारे |

असुर निकन्दन राम दुलारे ||

हनुमान चालीसा की इस चौपाई के संपुट पाठ करने से दुष्टों का नाश होता है, जातक रक्षा होती है और उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

“नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 27 जुलाई से 2 अगस्त 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।

इस सप्ताह सूर्य और गुरु कर्क राशि में, मंगल वृष राशि में, बुध मिथुन राशि और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे।

शुक्र प्रारंभ में सिंह राशि में रहेगा तथा एक तारीख को 5:54 प्रातः से कन्या राशि में गोचर करेगा। शनि प्रारंभ मीन राशि में मार्गी रहेगा तथा 27 तारीख के 11:29 दिन से वक्री हो जाएगा।

आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। आपको इस सप्ताह अपने संतान से कोई विशेष मदद नहीं मिल पाएगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक होंगे। उनसे आपके सहयोग भी प्राप्त होगा। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 तारीख उल्लेखनीय रूप से अनुकूल है। रविवार को दोपहर के बाद से आपको सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। धन आने की संभावना है। भाई बहनों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। भाग्य के स्थान पर आपको कर्म पर विश्वास करना चाहिए। भाग्य के सहारे नहीं बैठना चाहिए। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति भी इस सप्ताह जागरूक रहना चाहिए। अगर आप सचेत नहीं रहेंगे तो आपकी प्रतिष्ठा में कमी हो सकती है। आपके स्वास्थ्य में मामूली गड़बड़ी हो सकती है। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई, एक और 2 अगस्त कार्यों को करने के लिए उचित है। 27 और 28 जुलाई को आपको सचेत होकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। धन आने की पूरी उम्मीद है। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। अन्यथा नुकसान हो सकता है। इस सप्ताह आपको भाग्य से बहुत कम मदद मिल पाएगी। भाई बहनों से संबंध तनाव पूर्ण हो सकते हैं। व्यापारियों को लाभ हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 जुलाई और 2 अगस्त लाभदायक है। 29 और 30 तारीख को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर गरीबों के बीच में सफेद वस्त्रो का दान करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

 इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत उत्तम रहेगा। आपके कई कार्य आपके आत्मविश्वास के कारण हो जाएंगे। यह सप्ताह आपके संतान के लिए भी उत्तम है। उनका आपको अच्छा सहयोग मिलेगा। उनके कार्य भी संपन्न होंगे। छात्रों के लिए सप्ताह ठीक है। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 तारीख उत्तम है। अगर आप अपने लिए जीवनसाथी ढूंढ रहे हैं तो यह दोनों तारीख आपके लिए फल दायक रहेगी। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सचेत रहना चाहिए। भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में अत्यंत परिश्रम करने पर आपको सफलता मिल सकती है। व्यापार में लाभ का योग है। आपको भी धन लाभ होगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनके विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। संतान से आपको अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। परीक्षार्थियों को परीक्षा में अच्छी सफलता प्राप्त होगी। इस वर्ष आप का धन काफी अच्छे कार्यों में खर्च होगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई 1 अगस्त तथा 2 अगस्त के दोपहर तक का समय कार्यों के लिए लाभकारी है। 29, 30 जुलाई और 2 अगस्त की दोपहर के बाद के समय के दौरान आपको सावधान रहकर कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का सुंदर योग है। व्यापार में आपको लाभ होगा। व्यापारियों को इस समय का फायदा उठाना चाहिए। आपकी प्रतिष्ठा में सामान्य वृद्धि संभव है। अविवाहित जातकों के लिए यह समय अच्छा है। उनके विवाह के प्रस्ताव आएंगे। कचहरी के कार्यों में आपको सावधानी बरतना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपके संतान को थोड़ा कष्ट हो सकता है। संतान से आपके सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 जुलाई तथा 2 अगस्त के दोपहर के बाद का समय कार्यों को करने के लिए सफलता दायक है। 31 जुलाई तथा एक और दो अगस्त के दोपहर तक के दौरान आपको सजग रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अत्यंत उत्तम है। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उनको अपने अधिकारियों से सम्मान प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से भी मदद प्राप्त होगी। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। मामूली धन आने की उम्मीद है। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। ‌भाई बहनों के साथ संबंध थोड़ा कम ठीक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 जुलाई विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए शुभ है। 2 अगस्त के दोपहर के बाद से आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका भरपूर साथ देगा। आपके कई कार्य भाग्य के कारण हो सकते हैं। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुक रहे हों उनको इस सप्ताह करना चाहिए। आपका स्वास्थ्य इस सप्ताह उत्तम रहेगा। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। अधिकारी एवं कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान होकर कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई तथा 1 अगस्त एवं 2 अगस्त की दोपहर तक का समय कार्यों को करने हेतु लाभप्रद है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को थोड़े से प्रयास से ही पराजित कर सकते हैं। खून संबंधी रोगों से बचने का प्रयास करें। कचहरी के कार्यों को सावधानी पूर्वक कार्य करने से सफलता प्राप्त हो सकती है। भाग्य से आपको इस सप्ताह मामूली सहयोग ही मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 जुलाई तथा 2 अगस्त को दोपहर की बाद का समय कार्यों को करने हेतु आपके लिए प्रभावशाली है। सप्ताह के बाकी सभी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए उत्तम है। उनका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। अगर वह कोई कार्य करते हैं जहां से धन प्राप्त हो सकता है तो उनको धन प्राप्ति का अच्छा योग है। उनके व्यापार में लाभ होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कम सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। कचहरी के कार्यों में परिश्रम के बाद सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 29 और 30 जुलाई अनुकूल है। 27 और 28 जुलाई को आपको सजग रह करके कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कुंभ राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम है। उनका आपको अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। परीक्षाओं में उनको सफलता प्राप्त होगी। आपका या आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए, अन्यथा लोग आपकी प्रतिष्ठा को खराब करने का प्रयास कर सकते हैं। धन आने का मामूली योग है। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 31 जुलाई तथा एक और दो अगस्त की दोपहर तक का समय सफलता प्राप्त करने के लिए अनुकूल है। 29 और 30 जुलाई को आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग मिलेगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक-ठाक चलेगी। उनको परीक्षाओं में सफलता का योग है। आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। भाई और बहनों के साथ आपके संबंधों में थोड़ा तनाव आ सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह उत्तम है। भाग्य से भी आपको मदद मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। थोड़ा सा प्रयास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 जुलाई का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मददगार है। 31 जुलाई तथा एक और दो अगस्त को किसी भी कार्य को करने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ेगा। आपको चाहिए कि आप इस सप्ताह विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

 

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८१ आणि ८२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ८१ आणि ८२ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ८१ – – 

मना मच्छरे नाम सांडू नको हो ।

अती आदरे हा निजध्यास राहो ।

समस्तांमधे नाम हे सार आहे ।

दुजी तूळणा तूळिता ही न साहे ।।८१।।

अर्थ : हे मना, कोणत्याही प्रकारच्या मत्सराच्या आहारी जाऊन देवाचे नामस्मरण कधीही सोडू नकोस. इतरांचा हेवा करण्यात वेळ वाया घालवण्याऐवजी, अत्यंत आदराने व निष्ठेने भगवंताच्या नामाचा अखंड ध्यास घे. देवाचे नामस्मरण हेच सर्व श्रेष्ठ साधन आहे. त्याची तुलना अन्य कशाशीही करवत नाही.

(मच्छरे – मत्सराने, सांडू नको – सोडू नको, निजध्यास – मनाला ध्यास/ओढा लागणे, समस्तांमधे – ईश्वरप्राप्तीच्या सर्व साधनांमध्ये, दुजी – दुसरी, तूळिता – तुलना करता)

विवेचन : या श्लोकातही समर्थ नामाचा महिमा आपल्याला सांगतात. आधीच्या श्लोकात निर्धारपूर्वक ज्या मत्सराचा त्याग करायला समर्थांनी आपल्याला सांगितले, त्याचा उल्लेख या ठिकाणी पुन्हा येतो. मानवी स्वभाव असा आहे की जी गोष्ट आपल्याकडे नाही पण दुसऱ्याकडे आहे असे पाहिल्यावर त्या व्यक्तीबद्दल पहिली प्रतिक्रिया मनात येते ती म्हणजे मत्सर. हा मत्सर वाढत गेला की अनर्थ घडतो. नको त्या गोष्टी माणसाच्या हातून घडतात. गीतेत सांगितल्याप्रमाणे ‘ मत्सर ‘ हा आसुरी गुण आहे. मागील काही श्लोकात हिरण्यकश्यपूचे उदाहरण आपण पाहिले आहे. हिरण्यकश्यपू राजा होता, सामर्थ्यवान होता, स्वतःच्या शक्तीचा त्याला गर्व होता, इथपर्यंत सर्व ठीक आहे. पण जेव्हा लोक त्याची स्तुती करायची सोडून परमेश्वराची स्तुती करतात, तेव्हा मात्र त्याच्या मनात भगवंताच्या नामाविषयी मत्सर निर्माण होतो. मग प्रजेने आपलेच नाम घ्यावे, भगवंताचे नाम कोणी घेऊ नये असा आदेश तो काढतो. पण त्याचा स्वतःचा मुलगाच विष्णुभक्त असतो. शेवटी मत्सर आणि द्वेषामुळे हिरण्यकश्यपूचा नाश होतो हे आपल्याला माहिती आहे.

काही लोकांना नकळत नामाबद्दलही द्वेष असतो. नामाने असे काय होणार आहे? त्याला कशाला एवढे महत्व द्यायचे? मग नकळत नामाबद्दल मनात मत्सर निर्माण होतो. नाम घ्यायला सुरुवात केली असेल तरी मग असा मनुष्य नाम घेणे सोडून देतो. म्हणून समर्थ म्हणतात की बाबारे, मत्सराच्या अधीन होऊन नाम घेणे सोडू नकोस.

मत्सराच्या अधीन झालेल्या माणसाला नामाचे महत्वच कळलेले नसते. महत्व कळण्यासाठी नामाचे सामर्थ्य माहित असावे लागते. त्यासाठी संतांचा उपदेश मनापासून ऐकावा लागतो. तो उपदेश नुसता ऐकून चालत नाही तर तो पटला पाहिजे. इथे बळजबरी उपयोगाची नसते. हे महती जेव्हा पटते, तेव्हा भगवंताबद्दल, नामाबद्दल आदर निर्माण होतो. म्हणून भगवंताचे नाम आदरपूर्वक घेतले पाहिजे. त्यात प्रेम हवे. आणखी महत्वाची गोष्ट म्हणजे त्याचा ध्यास लागला पाहिजे. आपल्या आवडीची एखादी गोष्ट असते. मग तिचा आपल्याला ध्यास म्हणजेच छंद लागतो. हा छंद लागला म्हणजे मन पुन्हापुन्हा तिकडे ओढ घेते. कोणी सांगावे लागत नाही. तुकाराम महाराज म्हणतात, ” गोविंद गोविंद, मना लागलिया छंद. ” एखाद्या विद्यार्थ्याला अभ्यासाची आवड निर्माण झाली की त्याला कोणी अभ्यास कर म्हणून सांगावे लागत नाही. साधकाला नामाची गोडी लागली की मग नाम घ्या असे त्याला सांगावे लागत नाही.

परमेश्वर प्राप्तीची अनेक साधने आहेत. अनेक मार्ग आहेत. पण त्या सर्वांमध्ये ‘ नाम ‘ हे साधन श्रेष्ठ आहे. त्यासाठी कोणतीही उपाधी, कोणतेही साधन लागत नाही. जपमाळ नसली तरी चालते. आपले काम करताना देखील नाम जपता येते. ‘ हरी मुखे म्हणा, हरी मुखे म्हणा । पुण्याची गणना कोण करी ।। असे ज्ञानेश्वर माउली म्हणतात. त्याचे तात्पर्य हेच आहे. ते नाम सोपे रे रामकृष्ण गोविंद असे ते सांगतात ते याचसाठी. समर्थही आपल्याला हीच गोष्ट सांगतात. संतांच्या उपदेशात एकवाक्यता असते. लोककल्याणाची तळमळ आढळते. शब्द भलेही वेगळे असतील पण तात्पर्य एकच असते.

तेव्हा हे मना, कोणत्याही परिस्थितीत तू नाम घेणे सोडू नकोस. ते अत्यंत आदरपूर्वक घे. समस्त साधनांमध्ये ते सारभूत आहे. त्याची महती एवढी की त्याची तुलना अन्य कशाशीही होऊ नाही. ‘ नामपरते तत्व नाही रे अन्यथा. ‘ हे लक्षात ठेव.

स्वसंवाद : 

१. माझ्याकडे जे नाही आणि इतरांकडे आहे, ते पाहून माझ्या मनात नकळत ‘मत्सर’ किंवा हेवा निर्माण होतो का? त्यामुळे माझे मनस्वास्थ्य हरवते का?

२. संतांनी सांगितल्याप्रमाणे, माझ्या मनाला संसार किंवा इतर भौतिक गोष्टींऐवजी कधी भगवंताच्या नामाचा ‘निजध्यास’ (छंद) लागला आहे का?

३. नाम घेताना भगवंताबद्दल आदर आणि प्रेम माझ्या मनात असते का?

४. माउलींनी सांगितल्याप्रमाणे “नामापरते तत्त्व नाही रे अन्यथा” यावर माझा पूर्ण विश्वास बसला आहे का? की माझे मन अजूनही इतर साधनांच्या गराड्यात फिरत असते?

===== 

श्लोक क्र. ८२ – – 

बहू नाम या रामनामी तुळेना ।

अभाग्या नरा पामरा हे कळेना ।

विषा औषध घेतले पार्वतीशे ।

जिवा मानवा किंकरा कोण पूसे? ।।८२।।

अर्थ : रामनामाची तुलना अन्य कोणत्याही नामाशी होऊ शकत नाही. परंतु जी माणसे पारमार्थिक दृष्ट्या अभागी असतात, त्यांना (रामनामाचे हे महत्व) कळत नाही. अहो, प्रत्यक्ष भगवान शंकरांनी विषाचा दाह शांत करण्यासाठी रामनाम हे औषध म्हणून घेतले. मग आपल्यासारख्या सामान्य जीवांची त्यासमोर किंमत काय?

(तुळेना – तुलना होऊ शकत नाही, अभागी नर – पारमार्थिक दृष्टया दुर्दैवी व्यक्ती, पार्वतीशे – भगवान शंकर/ पार्वतीचे पती, किंकर – चाकर/दास)

विवेचन : या श्लोकामध्ये देखील अन्य श्लोकांप्रमाणे समर्थ रामनामाचे महत्व आपल्या मनावर ठसवत आहेत. श्रीराम हे समर्थांचे आराध्य दैवत. त्यामुळे साहजिकच त्यांना रामनामापुढे अन्य नामाचे महत्व वाटत नाही. रामनामाची तुलना अन्य कशाशीही होऊ शकत नाही असे त्यांना वाटते. आणि त्यांना असे वाटणे हे अगदी बरोबर आहे. रामरक्षेचा समारोप करताना बुधकौशिक ऋषींनी रामनामाचे महत्व सांगताना, ” सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ” असे म्हणतात. अर्थात या श्लोकात भगवान शंकर पार्वतीला रामनामाचे महत्व सांगताना म्हणतात की राम राम या नामातच माझा जीव रमतो. रामनाम हे विष्णूच्या सहस्त्र नामांची बरोबरी करणारे आहे. खरे तर रामनामाचे महत्व स्पस्ट करणारे एवढे मोठे उदाहरण दिल्यानंतर अन्य काही सांगण्याची आवश्यकताच राहत नाही. पण तरीदेखील माता जशी तळमळीने आपल्या मुलाला एखादी गोष्ट समजावून सांगते, तसेच समर्थ आपल्याला सांगत आहेत.

आपली ज्या देवतेवर श्रद्धा असेल, त्या देवतेचे नाम हे अत्यंत श्रेष्ठ आहे असे आपल्याला वाटले पाहिजे. आपण जर शंकराची भक्ती करीत असू तर ‘ ओम नमः शिवाय ‘ या मंत्रावर आपली दृढ श्रद्धा असली पाहिजे. आपण जर विष्णूचे भक्त असू तर ‘ ओम नमो भगवते वासुदेवाय ‘ या मंत्रावर आपली दृढ श्रद्धा असली पाहिजे. तसेच रामनामाचे महत्व श्रीरामाच्या भक्तांना वाटले पाहिजे. ते सांगण्यासाठीच समर्थांची एवढी तळमळ!

पण समर्थ म्हणतात,” जी माणसे पारमार्थिक दृष्टया अभागी असतात त्यांना रामनामाचे हे महत्व (सांगूनही) कळत नाही. म्हणूनही असे जीव अभागीच आहेत. मुखामध्ये रामनाम यायला किंवा त्याची गोडी वाटायला देखील काही तरी पूर्वसंचित हवे. मुखात रामनाम येणे किंवा रामनाम घ्यावेसे वाटणे हे खरोखरच भाग्याचे लक्षण आहे. ज्यांना तसे वाटत नाही ते जीव अभागी!

देवांनी आणि राक्षसांनी मिळून समुद्रमंथन केले. त्यातून दिव्य अशा चौदा रत्नांसोबतच हलाहल (जहाल विष) देखील बाहेर आले. त्यामुळे सर्व प्राणिमात्रांच्या आणि सृष्टीच्या अस्तित्वालाच धोका उत्पन्न झाला. भगवान शंकरांनी हे हलाहल प्राशन करून सर्व सृष्टी आणि प्राणिमात्रांचे रक्षण केले. पण त्यांचा अंगाचा तीव्र दाह होऊ लागला. तो कशानेच शांत होईना. त्या हलाहलाने त्यांचा कंठ निळा झाला. ते नीलकंठ म्हणून ओळखले जाऊ लागले. विषाचा दाह शांत होण्यासाठी त्यांनी शीतल चंद्र मस्तकी धारण केला. गंगेला देखील मस्तकी धारण केले. पण शेवटी रामनामानेच त्यांचा दाह शांत झाला.

जालीमातील जालीम विषाचा देखील ज्या औषधाने दाह शांत होतो, असे औषध म्हणजे रामनाम आहे. सर्व भव म्हणजे संसाराचे भय हरण करणारे, दुःख दूर करणारे असे हे औषध आहे. ज्याप्रमाणे श्रीरामाचा बाण अचूक शरसंधान करतो, तसे रामनाम म्हणजे रामबाण औषध आहे. आधुनिक विज्ञानाने देखील रामनामाचे महत्व मान्य केले आहे. आजचे मानसशास्त्र आणि न्यूरो सायन्स रामनाम हे प्रभावी साउंड थेरपी आणि ध्यान पद्धतीसाठी अत्यंत उपयुक्त असल्याचे स्पष्ट करतात. तणावमुक्तीसाठी रामनाम ऊर्जा प्रदान करणारे असल्याचे ही आधुनिक शास्त्रे मान्य करतात.

प्रत्यक्ष भगवान शंकर जेव्हा रामनामाच्या आश्रय घेतात तेव्हा आपल्यासारख्या सामान्य नराची काय कथा? संत तुलसीदासजी म्हणतात, ” रामनाम में पावत पावन, रवी तेजोमय चंद्र सुधा धन. ” रामनाम हे पावन करणारे आहे. ज्याप्रमाणे सूर्याचा तेज आणि चंद्राची शीतलता आपल्याला जीवन प्रदान करते, तसेच हे रामनाम सर्व सुख, परम शांती आणि ऊर्जा देणारे आहे.

स्वसंवाद :: 

१. ज्याप्रमाणे भगवान शंकरांनी विषाचा दाह शांत करण्यासाठी रामनामाचा आश्रय घेतला, तसा मी माझ्या आयुष्यातील राग, मत्सर किंवा चिंतेचा दाह शांत करण्यासाठी नामस्मरणाचा आधार घेतो का?

२. “मुखामध्ये रामनाम येणे किंवा त्याची गोडी वाटणे हे भाग्याचे लक्षण आहे,” हे लक्षात घेऊन मी माझ्या या परम भाग्याचा रोज सुयोग्य वापर करतो का?

३. माझ्या आराध्य दैवताच्या नामावर आणि मंत्रावर माझी संपूर्ण आणि अनन्य श्रद्धा आहे, की माझे मन अजूनही डळमळीत होत असते?

४. संत तुलसीदासांनी म्हटल्याप्रमाणे, रामनामातील सूर्याचे तेज आणि चंद्राची शीतलता अनुभवण्यासाठी मी दिवसातून काही क्षण तरी शांत चित्ताने नाम घेतो का?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ८१ आणि ८२

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२७६ ☆ आलेख – दीर्घ जीवी साहित्य रचा जावे तो बेहतर… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा लिखित – “आलेख   – दीर्घ जीवी साहित्य रचा जावे तो बेहतर…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २७६ 

☆ दीर्घ जीवी साहित्य रचा जावे तो बेहतर…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज स्मृतिशेष प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी की प्रथम पुण्य तिथि पर ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से सादर नमन) 

अपनी प्रशंसा अच्छी नही मानी गयी है. यही कारण है कि महाकवि कालिदास का भी कोई वास्तविक परिचय उपलब्ध नहीं है. जहां तक मेरे संक्षिप्त परिचय की बात है, मेरा जन्म १९२७ में हुआ. मैने आजादी से पहले का भारत देखा है, स्वाधीनता आंदोलन में किसी न किसी तरह भागीदारी की है. मण्डला के अमर शहीद स्व उदय चंद जैन न केवल मेरे सहपाठी थे वरन स्कूल में मेरे साथ एक ही बैंच पर बैठा करते थे. आजादी के बाद मैने देखा है कि जिस भारत में एक सुई भी मेड इन इंगलैंड आती थी वहां से आज चंद्रमा तक राकेट जा रहे हैं. मैने लालटेन युग जिया है, और आज मेरे नाती, पोते दुनिया में न्यूयार्क, दुबई, हांगकांग में हैं, मैं उनके साथ विदेशों में अनेक जगह हो आया हूं. शिक्षा जगत ने मुझे यह सुअवसर दिये कि मैने पीढ़ियो का निर्माण किया है. साहित्य जगत ने मुझे सेवानिवृति के बाद भी आज तक लगातार कुछ न कुछ नया रचने, लिखने अध्ययन करने की प्रेरणा दी है.

बाल्यकाल में ही हम मित्रों ने नवयुग पुस्तकालय की स्थापना की थी. मण्डला के पढ़े लिखे परिवार होने के कारण मेरे पिताजी के पास लोग जिले में स्वातंत्र्य साहित्य के लिये संपर्क करते थे. मुझे अध्ययन के प्रति बचपन से ही लगाव था. संस्कृत साहित्य में मुझे आनन्द आता था. बस इस तरह साहित्य से लगाव बढ़ता गया.

स्कूल के दिनो में मैं हाकी बहुत अच्छी खेला करता था. नये नये स्थान घूमना, किताबें पढ़ना, गार्डनिंग मेरी साहित्येतर रुचियां रही हैं.

छंद बद्ध काव्य मेरी सबसे पसंदीदा विधा है. चांद व सरस्वती में १९४६ में मेरी कवितायें छपी थीं. आज भी कविता लिख कर मुझे नई उर्जा मिलती है. संस्कृत नई पीढ़ी नही पढ़ रही हे, जबकि गीता जैसे वैश्विक ग्रंथ संस्कृत में ही हैं, इसलिये मैंने हिन्दी में प्रायः प्रमुख संस्कृत ग्रंथो के अनुवाद करने की ठानी, और इस तरह काव्य अनुवाद मेरी विधा बन गई. महाकवि कालिदास का मेघदूतम विश्व का अप्रतिम श्रंगार रस का काव्य है, इसमें विरह की वेदना और श्रंगार का अद्भुत सौंदर्य भी है, मैंने इसका श्लोकशः हिन्दी काव्य अनुवाद किया है, मुझे साहित्य से सुकून मिला. आत्म केंद्रित रहकर मैं साहित्य सेवा में आजीवन लगा रहा हूं. सेवानिवृति के बाद मेरी पाण्डुलिपियों को मेरे पुत्र विवेक रंजन ने पुस्तको के रूप में छपवाया.

मेरा विवाह लखनऊ में हुआ, मेरी पत्नी श्रीमती दयावती श्रीवास्तव की रुचियां भी लिखने पढ़ने की थीं. हम दोनो ने साथ साथ पढ़कर एम ए किया. साथ ही शिक्षा जगत में नौकरी की. उनकी भी पुस्तकें छपी. वे मुझे बराबर नया लिखने के लिये उत्साहित करती थी। मेरी यह इच्छाशक्ति कि मुझे आगे पढ़ना है, मेरी उन्नति में हमेशा सहायक रही. सामान्यतः विवाह के बाद मेरी पीढ़ी के लोग अपनी नौकरी से संतुष्ट हो जाते थे, पर हम निरंतर आगे बढ़ने के यत्न करते रहे. यही कारण है कि हम समाज को सुशिक्षित संस्कारी बच्चे दे पाये, और स्वयं अपनी शिक्षा से साहित्य व समाज में अपना स्थान बनाते बढ़ते गया। आत्म सुखाय तो हर कवि लिखता ही है. रचना प्रक्रिया प्रसव वेदना होती है, जिसमें विचारो की परिपक्वता, और उसकी समुचित विधा में अभिव्यक्ति शमिल होती है, किन्तु रचना का अंतिम उद्देश्य जनहित ही होता है. समाज में मेरी पहचान शिक्षाविद व साहित्यकार के रूप में ही है. बिना व्यक्तिगत रूप से मिले भी दुनिया के अनेक हिस्सो के पाठक मेरी रचनाओ के जरिये मुझे पसंद करते हैं, तथा दूरभाष, पत्र आदि से संपर्क व प्रशंसा करते हैं.

साहित्य ने अभिव्यक्ति के माध्यम बदले हैं. आज डेली सोप, फिल्म, टेलीविजन, आ गये हैं पर प्रकाशित पुस्तको का महत्व यथावत निर्विवाद बना हुआ है. मुझे तो बिना किताब पढ़े नींद नही आती. पुस्तकालय संस्कृति की पुनर्स्थापना मुझे आवश्यक लगती है. पाश्चात्य देशो में बुक रीडिंग हाबी के रूप में बनी हुई है, जैसे जैसे हमारे देश की संपन्नता बढ़ेगी हमारे यहां भी पुस्तक संस्कृती फिर से लोकप्रिय होगी ऐसा मेरा विश्वास है.

नये माध्यमो जैसे फेसबुक आदि ने नई पीढ़ी को विचार आते ही लिख डालने की आजादी दी है पर संपादन का महत्व होता है. युवा रचनाकारो को अपना लिखा बारम्बार पढ़कर सुधारकर तब रचना रूप में प्रस्तुत करने की आवश्यकता समझ आती है. यह देखकर मुझे प्रसन्नता होती है कि साहित्य अब केवल हिन्दी के शोधार्थियो की बपौती नही रह गया है. कितने ही इंजीनियर, डाक्टर, प्रोफेशनल्स अच्छे साहित्यकार बनकर उभर रहे हैं. स्पष्ट है कि साहित्य मनोभावों की अभिव्यक्ति का संसाधन है. और यह मनोवृत्ति प्रकृति दत्त होती है. भाषाई ज्ञान उसे संप्रेषण की शक्ति देता है. नये कवियो से मेरा यही आग्रह है कि साहित्य के सौंदर्य शास्त्र की समझ विकसित करें और परिपक्व लेखन करें तो वह दीर्घ जीवी साहित्य रच सकेंगे.

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६१ – लघुकथा – नेक इन्सान ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ नेक इन्सान ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज सुबह से ही काफी बरसात हो रही थी। वैसे तो नन्हा छोटू रुई वाली मिठाई की स्टिक लेकर सुबह ही घर से निकल गया था, लेकिन आज ग्राहक नदारत थे। सुबह से बरसात शुरू हुई तो बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। मनोहरलाल के समोसे वाली दुकान के आगे लगे टिन सेड में रखे बेंच का किनारा पकड़े छोटू बरसात के रुकने का इंतजार करता रहा। बरसात बिल्कुल ही बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। सुबह से घर से निकले छोटू को बड़ी तेज भूख लगी थी, लेकिन पाकेट में एक भी रुपया नही था कि कुछ खरीद कर खा ले। पॉकेट में पैसा कहां से होता, उसकी तो अब तक एक भी मिठाई नहीं बिकी थी।

मनोहरलाल की दुकान पर बरसात के मौसम में चटक समोसे खाने वालों की लाइन लगी हुई थी।

अबे, यहां क्या बैठा है, हट किनारे, … एक साहब ने उसे डांटे हुए कहा।

बेचारा छोटू क्या ही जवाब देता। उसने थोड़ा सा सरकने में ही भलाई समझी। इसी बीच कार पर सवार तीन चार लोग मनोहरलाल की दुकान पर समोसे खाने के लिए उतरे। उन्हें देखते हैं, मनोहरलाल उनकी आव भगत में लग गया। उसकी सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग जरूर कोई विशेष लोग होंगे। उनके बैठने का इंतजाम मनोहरलाल को करना था सो मनोहरलाल सो उसने कड़े तेवर दिखाते हुए छोटू को डांटते हुए कहा..

अबे, बार-बार कह रहा हूँ कि भाग यहां से, यह नालायक जाने का नाम नही ले रहा है..

कैसे जाऊँ चाचा.. इतनी तेज बरसात हो रही है भीग जाऊँगा, मेरी मिठाईयाँ भीग जाएगीं।

तेरी मिठाईयाँ भींग जाएगीं, इससे मुझे क्या लेना देना, .. हता है कि नही। चाचा यह मेरी भी तो दुकान थी.. छोटू के इतना कहते ही मनोहरलाल ने उसे एक तगड़ा सा थप्पड़ नन्हें छोटू के गाल पर जड़ दिया।

नन्हा छोटू तिलमिला कर बेंच से नीचे गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ में सन उठे। उसकी रुई वाली मिठाई कीचड में गिर कर पिचक गयी और ख़राब हो गयी। उस छोटे बच्चे की छोटी सी पूँजी बर्बाद हो गयी।

जमीन पर लुढ़का छोटू कभी खुद को देखता, तो कभी अपनी बर्बाद हो चुकी, रुई वाली मिठाई को देखता। उसने आरत दृष्टि से मनोहरलाल की ओर देखा। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा फूट पड़ी। वह बिल्कुल बेचारा और विवश था। वह कर ही क्या सकता था।

आइये बाबूजी, आपलोग लोग बैठिए, ऐसा बोलते हुए मनोहरलाल ने कार से उतरे चारों लोगों को बेंच पर बैठने का अनुरोध किया। जगह की दिक्कत जैसी की तैसी थी। ग्राहकों से सारे बेंच भरे हुए थे।

मनोहरलाल की इस गंदी सी हरकत को देखकर कार से उतरे भद्र से दिखते सज्जन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा . अरे मनोहरलाल ! तुमसे इस लड़के को मारा क्यों? यह लड़का किसका है?… शायद उस सज्जन ने बच्चे की यह बात सुन ली थी कि “चाचा यह मेरी भी दुकान तो थी।”

 मनोहरलाल अब क्या ही जवाब देता, वह उस व्यक्ति का मुँह देखने लगा। थोड़ा हिचकते हुए बोला, साहब ! ये महेश का लड़का है। सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

अरे मनोहरलाल..महेश कहाँ है? क्या वह दुकान पर बिल्कुल नहीं आता ? उसको देखे तो मुझे महीना हो गए। तूँ उसकी दुकान पर काम करता था, मैं यह समझ रहा था कि महेश तुम पर बहुत विश्वास करता है, इसलिए सारी दुकान तुम्हारी जिम्मेदारी पर छोड़ रखा है।

उस सज्जन ने जब दुबारा डांटते हुए मनोहरलाल से पूछा तो मनोहरलाल ने सारी बातें उस नेक इंसान को बता दी ..

बाबूजी, महेश अब इस दुनिया में नहीं है। उसके गुजरे लगभग छः महीने से ऊपर हो गए। यह लड़का महेश का ही लड़का है।

महेश का लड़का है !..अरे महेश की पत्नी भी तो बरसों पहले गुजर गई थी। और उसका यह लड़का इस हाल में। अब तो यह बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया होगा।

अबे नालायक तुम अपने मालिक से इस तरह की वफादारी निभा रहे हो। उसके बेटे की जिम्मेदारी निभाने की जगह, तुम इस छोटे लड़के से ऐसा व्यवहार कर रहे हो, उसको इस तरह से पीट रहे हो।

अभी के अभी खाली कर दे इस गुमटी को, नहीं तो तुम्हारी हड्डी पसली तोड़ दूँगा। बिल्कुल अभी के दफा हो जा यहाँ से, नहीं तो पुलिस बुलाकर तुम्हें बंद करता हूँ। मैंने यह दुकान ( बड़ी सी गुमटी ) तुम्हें नहीं दी थी, मैंने यह दुकान उस महेश को दी थी जो की एक नेक और सज्जन इंसान था। मेरे बचपन का दोस्त था।

उस सज्जन ने छोटे छोटू के दोनों हाथों को पड़कर उठाया और उसे अपने बाहों में समेट लिया। उनके कपड़े गंदे हो गए लेकिन उनको इससे कुछ लेना देना नहीं था। इस वक्त तो उसके बचपन के दोस्त महेश का बेटा, छोटू उसकी बाहों में था। छोटू और वह सज्जन दोनों ही रो रहे थे। धूर्त मनोहरलाल दुकान छोड़कर फरार हो चुका था। दुकान में बैठे अन्य ग्राहक इस नेकइंसान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

 दिनांक 23 जुलाई 2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

साँकल  से घुग़री 10 नवम्बर 2019

जबलपुर जिले की सीमा तक सतपुड़ा नर्मदा का बायाँ हाथ पकड़े हुए चलता है धरतीकछार गाँव के नज़दीक सनेर नदी संगम पर सतपुड़ा नर्मदा का हाथ छोड़कर आज़ाद कर देता है। झाँसीघाट से साँकल घाट तक नर्मदा स्वतंत्र प्रवाहित होती है फिर दमोह जिले से विन्ध्याचल आकर नर्मदा का दाहिना हाथ हीरापुर रेंज के रूप में बढ़कर थाम लेता है। यदि विन्ध्याचल महाशय रास्ते में न आते तो नर्मदा रायसेन जिले से होती हुई भोपाल जिले निकल जाती या बेतवा से  मिलकर यमुना से भेंट करके गंगा से गले मिल गंगासागर में एकाकार हो जाती। साँकल से अविनाश बेहतरीन फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अपना केमरा सभी के लिए भोजन, दवाई और विभिन्न खाद्य वस्तुएँ और हमारा चार्जर, चड्डी और बानियान लेकर जुड़ गए। 

अब हम लोग बरगी बाँध से आती नहर के किनारे-किनारे चलते हुए गुड़वारा पहुँचे। गाँव का नाम गुड़वारा बिलकुल सही है क्योंकि वहीं से करेली तहसील शुरू होती है चारों तरफ़ गन्ने के खेतों का सिलसिला पूरे इलाक़े में नज़र आता है। गुड़वारा के पहले एक किसान कैलाश दांगी किसानी का काम करते मिले उन्होंने हमें चाय पीने का निवेदन किया हम लोगों ने तत्काल उनके निवेदन को स्वीकार कर लिया उनके निवास स्थान पर उनके साथ चाय पीने के लिए चल दिए। उनका लड़का आईपीएस परीक्षा की तैयारी इंदौर में रहकर कर रहा है, वह गांव आया था उसके साथ उनका एक दोस्त भी आया हुआ था तीन-चार दिन पहले उनका दोस्त नर्मदा में स्नान के लिए उनके साथ गया और वह गहरे पानी में डूबने से उसकी मृत्यु हो गई इसलिए इस परिवार के सभी लोग दुःखी थे। उनके घर पहुँचकर चाय ग्रहण की, बरंडा में एक बड़ी गागर में इलेक्ट्रिक मथनी से मक्खन निकाला जा रहा था उसमें से निकला मही दो लीटर की बोतल में भरवा कर चल पड़े। जो दोपहर की बाटी-दाल के बाद गटक लिया। गुड़वारा से उतरकर नीचे नर्मदा घाट पर पहुँच स्नान करके साँकल से जुड़े नए साथी अविनाश दवे के द्वारा लाईं मैथीपूड़ी आँवला आचार के साथ खाईं और चल पड़े अगली मंज़िल की ओर, रास्ते में बुधघाट में एक किलोमीटर ऊँची पहाड़ी चढ़कर एक आश्रम पहुँचे वहाँ पड़ी कुर्सियों पर बैठ गए। एक सेवक ने पानी पिलाया। थोड़ी देर में साधु लिबास में शैतान नज़र आया, उसने आते ही घुड़कियाँ देनी शुरू कीं, और साफ़तौर से कह दिया कि न आप यहाँ नहा सकते हैं और ना भोजन परसादी की कोई व्यवस्था है। हम लोग नीचे उतर कर अगले पड़ाव की खोज में चल दिए। शाम को पाँच बजे घुग़री पहुँचे। जिस घाट रुकने की सोचते हैं वहीं घाट पर दो-तीन कुत्ते स्वागत करते हैं, फिर वे आपके साथ आश्रम तक आकर वहीं अड्डा जमा लेते हैं मानो हम उनके पाहूँने हों। दूसरे दिन सुबह थोड़ी दूर विदाई देने साथ आते हैं। साधु लिबास में शैतान से कुत्ते समझदार हैं, बेचारे स्वागत-विदाई में पूँछ हिलाते हैं।

घुग़री में एक परकम्मा कर चुके बम-बम बाबा के नाम से आश्रम चलाते हैं। वे गाँव से दान लेकर भोजन का सामान देते हैं। उन्हें मेहनताना पर भोजन बनाने की बात कही तो वे आटा-दाल एक गौंड़ के घर दे आए। आठ बजे भोजन बनकर आया तब ग्रहण किया। आश्रम के सामने चार विशाल बट वृक्ष आश्रम को एक छतरी की तरह ढँके हुए है, वृक्षों के पत्तों से छनकर आती चाँदनी की रोशनी एक अजीब सी रूमानियत पैदा कर रही थी, लिहाज़ा परकम्मा वासियों का प्रेमिल हृदय गीत-ग़ज़ल की लहरियों में गोते खाने लगे।

पिछले बीस-पच्चीस सालों में भारत के गाँवों का जीवन तेज़ी से बदला है। खेतों को बैलों से बखरने  और बैलगाड़ी की जगह ट्रैक्टर और लोडिंग वाहन ने ली है, हरेक किसान के घर एक-दो मोटर साइकिल और समृद्ध किसानों के पास जीप-कार आ गईं हैं। पुरुषों के पहनावे से धोती-क़मीज़ या कुर्ता ग़ायब हो चुके हैं। उनकी जगह जींस टी-शर्ट स्पोर्ट बानियाँन ले चुके हैं। लड़कियाँ जींस टाप पर आ गईं हैं। लड़के-लड़कियाँ आपस में खुले हैं, अब वे आपस में बातचीत करने लगे हैं। सरकारी स्कूल में सह-शिक्षा और मध्याह्न भोजन से खुलापन आया है लेकिन विकृति नहीं आई है इसका कारण घरों का सांस्कृतिक वातावरण और धार्मिक आस्था में पिरोए नैतिक मूल्य है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४० – कविता – फल धीरज का… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “फल धीरज का“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४०  ?

? कविता – फल धीरज का… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

दूजों के मामले में, टाँग मत अड़ाइये

पराये माल पे न आँख यूँ गड़ाइये

=2=

दिल है उसका भी,इंसान है वो भी

देख उसको त्यौरियाँ न यूँ चढ़ाइए

=3=

दूजों के मामले में दखल काए को देना

बनिये न ट्रम्प दूजों को न यूँ लड़ाइए

=4=

साँसों की चहलकदमी है जीवन का ये सफ़र

पाना है अगर मंज़िल, मत लडखड़ाइये

=5=

ज़ोरू के आगे ज़ोर से न बोलना कभी

सुविधा ये है कि नींद में बस बड़बड़ाइये

=6=

पूछ-परख ज्ञान की होती है हर तरफ़

जाइये मंचों को शिखर पर चढ़ाइये

=7=

इश्क़ के मकां में मेरे दिल के द्वार पर

नजाकत से कुंडी आप खड़खड़ाइये

=8=

आप हैं नगीना मेरा दिल है अँगूठी

इश्क़ का हसीन एक नग जड़ाइए

=9=

धीरज का फल है मीठा ‘राजेश’आप भी

इत्मीनान रखिये यूँ न हड़बड़ाइये

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१३ ☆ मुक्तक – ।। आज खुद अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१३ ☆

☆ मुक्तक ।। आज खुद अपने पांव कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

हर पल हर क्षण    बदल  रहा है आदमी।

पाने कोऔर हीऔर मचल रहा है आदमी।।

प्रभु तेरी दुनिया का क्या   रूप हो रहा है।

जाने किस ओर आज चल रहा है आदमी।।

=2=

दया दुआऔर भावना सब गौण हो गए हैं।

धन के समक्ष जैसे सब ही मौन हो गए हैं।।

पैसे की ही बोली भाषा समझते हैं लोगअब।

रिश्ते गहरे वाले जैसे अब कौन हो गए हैं।।

=3=

कमियां ही कमियां आज निकाल रहा आदमी।

दिल में नफरत के बीज बस पाल रहा आदमी।।

प्यार के लिए भी बहुत कम है यह एक जिंदगी।

फिर भी किस रूप में खुद को ढाल रहाआदमी।।

=4=

स्नेह प्रेम भावआज कर तार-तार रहा हैआदमी।

कई-कई मखोटेआज तो उतार रहा है आदमी।।

जाने कैसा भविष्य होगा   हमारे इस संसार का।

अपने ही पांव खुद कुल्हाड़ी मार रहा है आदमी।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १२ – हरी भरी वसुंधरा!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता हरी भरी वसुंधरा!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # १२ ☆

☆ हरी भरी वसुंधरा!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

हमें भली सदा लगे हरी भरी वसुंधरा ।

करे सभी प्रयास ये सुखे नहीं कभी जरा ।।

मृदा बहाव रोकते तने खड़े यहाँ घने ।

बचा रहे जहान को समान देवता बने ।।

*

कटाव वृक्ष का थमे नवीन संपदा बने ।

उमंग में रहे समाज पर्व ये नया मने ।।

लगे मुझे समान नार वृक्ष भी यहांँ कदा ।

करे महान कार्य देख दर्द भी सहे सदा ।।

*

सदैव नेह डोर बाँधती हरेक भावना ।

सजा रही जहान को मिले भले प्रताड़ना ।।

विडम्बना मिटे सभी करो प्रयास ये जरा ।

प्रसन्न नार वृक्ष हो हरी भरी वसुंधरा ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७९ आणि ८० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७९ आणि ८० ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. ७९ – – 

मना पावना भावना राघवाची ।

धरी अंतरी सोडी चिंता भवाची ।

भवाची जिवा मानवा भूलि ठेली ।

नसे वस्तूची धारणा वेर्थ गेली ।

अर्थ : हे मना श्रीरामांचे स्मरण पवित्र करणारे आहे. त्यांचे स्मरण कायम आपल्या अंतरात म्हणजे म्हणजे मनामध्ये ठेव. संसाराची चिंता सोडून दे. या संसाररूपी मायेची भूल मानवाला पडते. जी गोष्ट अस्तित्वातच नाही, अशा गोष्टीची कास धरणे व्यर्थ आहे.

(पावना – पवित्र, भावना- विश्वास/स्मरण, धरी – धारण कर, भवाची – संसाराची, भूलि – भ्रम, वेर्थ – व्यर्थ)

विवेचन : आधीच्या श्लोकात आपल्याला समर्थांनी देह, संसाराची व्यर्थ चिंता वाहू नका असे सांगितले. या श्लोकात ते आपल्याला हा संसार कसा नश्वर आहे ते सांगत आहेत. आपल्या मनामध्ये नेहमीच या संसाराबद्दल एक आंतरिक ओढ किंवा ममत्व असते. शिक्षण, नोकरी, विवाह, मुलेबाळे, पैसा, जमीनजुमला यातच आपल्या जीवनाचे सार्थक आहे असे आपल्याला वाटते. माणूस आयुष्यभर त्यासाठी धडपडत राहतो. परंतु या संसाराची व्यर्थता त्याला शेवटी लक्षात येते. पण त्यावेळी वेळ निघून गेलेली असते.

राघवाचे स्मरण, त्याच्यावरील दृढ श्रद्धा मनाला पवित्र करणारी आहे. कारण तो पतितांना पावन करणारा आहे. आपल्या अंतरात अनेक बऱ्या वाईट भावना, वासना ठाण मांडून असतात. परंतु भगवंताच्या नामाने वासना शुद्ध होत जाते. म्हणूनच समर्थ म्हणतात की हे मना पवित्र करणाऱ्या राघवाची श्रद्धा अंतर्यामी बाळग. त्यासाठी ‘ धरी अंतरी ‘ हे शब्द समर्थांनी वापरले आहेत. अंतर्यामी काय धारण करायचे?  तर राघवाचा विश्वास. आणि काय सोडायचे?  तर ‘ चिंता भवाची ‘ आपण संसारात असताना एवढे त्यात गुंतलेले असतो, की पुढे माझे कसे होईल, म्हातारपणी मुले मला विचारतील ना?  एक ना दोन अशा अनंत चिंता मन करीत राहते. संसाराची व्यर्थ चिंता करून उपयोग नाही. म्हणूनच ही चिंता टाकून द्यावी असे समर्थ सांगतात.

ही चिंता का टाकून द्यायची?  कारण जी गोष्ट मुळात नाहीच आहे, तिच्याबद्दल चिंता करून काय उपयोग?  मोहमायेमुळे हा संसार आपल्याला खरा वाटतो. त्याची भूल आपल्याला पडते. पण खऱ्या सत्यापासून आपण लांब जातो. वाळवंटातील तहानलेल्या माणसाला मृगजळ दृष्टीस पडते. तिथे आपल्याला नक्कीच पाणी मिळेल या आशेने तो त्याच्या शोधात पुढे पुढे जात राहतो. शेवटी त्याला लक्षात येते की आपल्याला जे पाणी वाटले होते, ते तर केवळ मृगजळ! मृगजळ म्हणजे भ्रम. पाणी नाही हे सत्य. त्याप्रमाणेच हा संसार! खरा वाटतो पण अखेरीस त्याची व्यर्थता लक्षात येते. खरी वस्तू एकच. ती म्हणजे भगवंताचे नाम. ते नाम पवित्र करणारे आहे. सत्याची जाणीव करून देणारे आहे. संसाराची व्यर्थता लक्षात आणून देणारे आहे. म्हणून हे मना, असे पवित्र नाम तू हृदयात धारण कर आणि संसाराची व्यर्थ चिंता सोडून दे. जी गोष्ट मुळात नाहीच तिची चिंता करण्यात काय अर्थ?

तुकाराम महाराज म्हणतात, “हेचि थोर भक्ती आवडते देवा, संकल्पावी माया संसाराची. “ भक्ती करणे म्हणजे जी गोष्ट आपल्याला अत्यंत प्रिय असते, ती परमेश्वराला अर्पण करावी. संसार, मुलेबाळे या गोष्टी आपल्या अत्यंत प्रिय असतात. त्यांच्यावर आपले जीवापाड प्रेम असते. हेच प्रेम भगवंताला अर्पण करावे. आणि भगवंताचे प्रेम अंतर्यामी धारण करावे.

स्वसंवाद :: 

१. ज्या शिक्षण, नोकरी, संपत्ती किंवा नात्यांना मी माझ्या ‘जीवनाचे सार्थक’ मानून बसलो आहे, ते खरंच चिरंतन सत्य आहे की केवळ एक तात्पुरता भ्रम (मृगजळ) आहे?

२. “म्हातारपणी माझे कसे होईल?  मुले मला सांभाळतील ना? ” अशा भविष्यातील ‘भवाच्या’ (संसाराच्या) व्यर्थ चिंतांमध्ये मी माझा आजचा दिवस आणि मनाची शांतता गमावत आहे का?

३. माझ्या अंतर्मनात साचलेला बऱ्या-वाईट वासनांचा कचरा साफ करण्यासाठी मी ‘पतितांना पावन करणाऱ्या’ राघवाच्या नामाचा आश्रय किती वेळा घेतो?

४. तुकाराम महाराजांनी सांगितल्याप्रमाणे, मी प्रपंचातील माझी सर्व आसक्ती आणि प्रेम भगवंताच्या चरणी अर्पण करून ‘निर्वासन’ भक्तीचा अनुभव घ्यायला तयार आहे का?

===== 

श्लोक क्र. ८० – – 

धरा श्रीवरा त्या हरा अंतराते ।

तरा दुस्तरा त्या परा सागराते ।

सरा वीसरा त्या भरा दुर्भराते ।

करा नीकरा त्या खरा मछराते ।।८०।।

अर्थ : हे मना, श्रीमहादेवांच्या अंतर्यामी वसलेल्या सीतापती श्रीरामांना आपल्या हृदयात धारण कर. श्रीरामांना अखंड हृदयी धारण करून पार करण्यास अतिशय कठीण असा संसाररूपी सागर तरून जा. जे कितीही भरले तरी अपूर्णच राहते अशा पोटाला (संसाराला)विसरून जा. मत्सराशी निग्रहपूर्वक झगडून साधुसंतांनी सांगितलेल्या मार्गाने जा.

(श्रीवरा – सीतापती श्रीराम /लक्ष्मीपती विष्णू, हरा अंतराते – महादेवांच्या अंतर्यामी वसलेल्या, दुस्तर – कठीण, परा – मोठा, सरा – अंश/छटा, दुर्भर – भरण्यास अतिशय कठीण, नीकरा – प्रयत्नपूर्वक/हट्टाने, खर – गाढव, मच्छराते – मत्सर)

विवेचन : या श्लोकाची रचना भाषिक दृष्टया फार सुंदर आहे. ‘ र ‘ या अक्षराची पुनरावृत्ती झाल्याने अनुप्रास अलंकार साधला गेला आहे. त्याशिवाय रचनेत सहजता आहे. श्रीवर म्हणजे भगवान विष्णू. श्री म्हणजे लक्ष्मी. राम हाही विष्णूचाच अवतार असल्याने येथे सीतापती राम असा देखील अर्थ घेता येतो. अशा या भगवंताला आपल्या हृदयात प्रत्यक्ष महादेव धारण करतात. त्या भगवंताला आपणही आपल्या हृदयी धारण करावे. श्रीरामांची योग्यता किंवा महती एवढी थोर की प्रत्यक्ष देवाधिदेव महादेव त्यांना आपल्या हृदयात स्थान देतात. त्यांचे ध्यान करतात. त्यामानाने आपण तर सामान्य माणसे! तेव्हा अशा या भगवंताला आपण देखील आपल्या हृदयात स्थान द्यावे.

समर्थ संसाराला संसार सागर म्हणतात. एक वेळ एखादी नदी पोहून पार करणे सोपे पण सागर पार करणे महाकठीण. हनुमंत सागर पार करून लंकेला पोहोचला होता. त्याने हृदयात रामनाम धारण केले होते. रामनाम ही एक अशी नौका आहे की जी आपल्याला हा महाकठीण असलेला भवसागर पार करण्यासाठी साहाय्यभूत ठरते. जो या नौकेत बसला, तो हा भवसागर तरून गेला.

पण हा भवसागर म्हणजे एक मायाजाल आहे. ते भल्याभल्यांना सोडवत नाही. भगवंताची माया अत्यंत प्रबळ आहे. एखाद्या कोळ्याच्या जाळ्यात मासे अडकावेत तसा माणूस या मायेच्या जाळ्यात अडकतो. रामकृष्ण परमहंसांनी याबाबत बोलताना एका ठिकाणी अतिशय सुंदर दाखला दिला आहे. ते म्हणतात जे मासे कोळ्याच्या अवतीभवती असतात, ते जाळ्यात अडकतात. पण जे मासे कोळ्याच्या पायाजवळ असतात, ते मात्र जाळ्यात अडकत नाहीत. आपण संसारी माणसे म्हणजे या संसारसागरातील मासे. मायारूपी जाळ्यात आपण अडकतो. पण आपण जर भगवंताच्या पायाशी राहिलो, त्याचे चरण जवळ केले तर मायेच्या जाळ्यातून आपण सहीसलामत सुटू शकतो.

देवाने आपल्याला पोट दिले आहे. पोट ही अशी गोष्ट आहे की ती कधी भरतच नाही. अग्निमध्ये आहुती टाकल्यानंतर अग्नी आणखी प्रज्वलित होतो. तसेच हे आहे. संसाराची आसक्ती देखील अशीच आहे. ती कधीच संपत नाही. म्हणून ती थोडी का होईना पण विसरण्याचा प्रयत्न करावा. ते सोपे नाही. पण भगवंत प्राप्ती करून घ्यायची असेल तर ती बाजूला ठेवता आली पाहिजे.

आपली संसाराची हाव कधी संपत नाही. ‘ हवेपण ‘ सुरूच राहते. त्यातून मग एखादी गोष्ट नाही मिळाली आणि ती दुसऱ्याकडे असेल तर मत्सर किंवा द्वेष निर्माण होतो. मत्सराला काही कारण लागत नाही. म्हणून त्याची तुलना समर्थ गाढवाशी करतात. परमार्थात तर मत्सर अतिशय हानिकारक. तेव्हा अशा मत्सराचा निकराने म्हणजे सर्वशक्तीनिशी सामना करायला हवा. त्यासाठी विवेक आणि वैराग्य ही दोन प्रभावी शस्त्रे आहेत. मत्सर आणि संसाराची आसक्ती टाकून देऊन श्रीरामाला हृदयी धारण करा म्हणजे हा भवसागर तरून जाल असे समर्थांचे सांगणे आहे. ‘ नाम आहे आदी अंती, नाम सर्व सार, आहे बुडत्याला नौका ठेवली आधार. ‘

स्वसंवाद :: 

१. मी या संसारसागरात ‘मायेच्या जाळ्यात’ अडकलो आहे हे मला जाणवते का?

२. “कितीही दिले तरी न भरणारे हे दुर्भर पोट (आसक्ती)” याच्या मागे धावताना, मी कधी समाधानाचा अनुभव घेतला आहे का?

३. जेव्हा मला एखादी गोष्ट मिळत नाही आणि ती दुसऱ्याकडे दिसते, तेव्हा माझ्या मनात नकळत ‘मत्सर’ निर्माण होतो का?

४. संसाररूपी जाळ्यातून सहीसलामत सुटण्यासाठी माझ्या ठायी भगवंताप्रती अनन्य शरणागती आहे का?

– क्रमशः श्लोक श्लोक ७९ आणि ८०

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३१ ☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख दर्द की इंतहा। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – कब रे मिलोगे राम / स्वर/ प्रस्तुति – योगाश्रम धाम भिवानी, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३१ ☆

☆ दर्द की इंतहा… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘दर्द को भी आधार कार्ड से जोड़ दो/ जिन्हें मिल गया है दोबारा ना मिले’ बहुत मार्मिक उद्गार, क्योंकि दर्द हमसफ़र है; सच्चा जीवन-साथी है; जिसका आदि-अंत नहीं। ‘दु:ख तो अपना साथी है’ गीत की ये पंक्तियां मानव में आस्था व विश्वास जगाती हैं; मन को ऊर्जस्वित व संचेतन करती है। वैसे तो रात्रि के पश्चात् भोर, अमावस्या के पश्चात् पूर्णिमा व दु:ख के पश्चात् सुख का आना निश्चित है; अवश्यंभावी है। सुख-दु:ख दोनों मेहमान हैं और एक के जाने के पश्चात् ही दूसरा दस्तक देता है।

समय निरंतर अबाध गति से चलता रहता है; कभी रुकता नहीं। सो! जो आया है अवश्य जाएगा। इसलिए ऐ मानव! तू किसी के आने की ख़ुशी व जाने का मलाल मत कर। ‘कर्म-गति अति न्यारी/ यह टारे नहीं टरी।’ इसके मर्म को आज तक कोई नहीं जान पाया। परंतु यह तो निश्चित् है कि ‘जैसा कर्म करता, वैसा ही फल पाता इंसान’ के माध्यम से मानव को सदैव सत्कर्म करने की सीख दी गयी है।

अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अनिश्चित् है। परंतु भविष्य सदैव वर्तमान के रूप में दस्तक देता है। वर्तमान ही शाश्वत् सत्य है, शिव है और सुंदर है। मानव को सदैव वर्तमान के महत्व को स्वीकारते हुए हर पल को ख़ुशी से जीना चाहिए। चारवॉक दर्शन में भी ‘खाओ-पीओ, मौज उड़ाओ’ का संदेश निहित है। आज की युवा पीढ़ी भी इसका अनुसरण कर रही है। शायद! इसलिए ‘वे यूज़ एंड थ्रो’ में विश्वास रखते हैं और ‘लिव इन’ व ‘मी टू’ की अवधारणा के पक्षधर हैं। वे पुरातन जीवन मूल्यों को नकार चुके हैं, क्योंकि उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी है। वे अहंनिष्ठ क्षणवादी सदैव हर पल को जीते हैं। संबंध-सरोकारों का उनके जीवन में कोई मूल्य नहीं तथा रिश्तों की अहमियत को भी वे नकारने लगे हैं, जिसका प्रतिफलन पति-पत्नी में बढ़ते अजनबीपन के एहसास के परिणाम-स्वरूप तलाक़ों की बेतहाशा बढ़ती संख्या को देखकर लगाया जा सकता है। सब अपने-अपने द्वीप में कैद एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हैं, जिसका सबसे अधिक ख़ामियाज़ा उनके आत्मज भुगत रहे हैं। वे मोबाइल व मीडिया में आकण्ठ डूबे रहते हैं और नशे की लत के शिकार हो रहे हैं जिसका विकराल रूप मूल्यों के विघटन व सामाजिक विसंगतियों के रूप में हमारे समक्ष है। संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों की अहमियत रही नहीं और अपहरण, फ़िरौती, दुष्कर्म व हत्या के हादसों में निरंतर इज़ाफा हो रहा है। चहुंओर संशय व अविश्वास का वातावरण व्याप्त है, जिसके कारण इंसान पल भर के लिए भी सुक़ून की साँस नहीं ले पाता।

दूसरी ओर अमीर-गरीब की खाई सुरसा के मुख की भांति बढ़ती जा रही है और हमारा देश इंडिया व भारत दो रूपों में विभाजित परिलक्षित हो रहा है। एक ओर मज़दूर, किसान व मध्यमवर्गीय लोग, जो दिन-भर परिश्रम करने के पश्चात् दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते और आकाश की खुली छत के नीचे अपना जीवन बसर करने को विवश हैं। दूसरी ओर बाल श्रमिक शोषण व बाल यौन उत्पीड़न का घिनौना रूप हमारे समक्ष है। एक घंटे में पांच बच्चे दुष्कर्म का शिकार होते हैं; बहुत भयावह व चिंतनीय स्थिति है। दूसरी ओर धनी लोग और अधिक धनी होते जा रहे हैं, जिनके पास असंख्य सुख-सुविधाएं हैं और वे निष्ठुर, संवेदनहीन, आत्मकेंद्रित व निपट स्वार्थी हैं। शायद! इसी कारण गरीब लोग दर्द को आधार-कार्ड से जोड़ने की ग़ुहार लगाते हैं, ताकि छल-कपट से लोग पुन: वे सुविधाएं प्राप्त न कर सके। उनके ज़हन में यह भाव दस्तक देता है कि यदि ऐसा हो जायेगा तो उन्हें जीवन में पुन: अभाव व असहनीय दर्द सहन नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि वे अपने हिस्से का दर्द झेल चुके हैं। परंतु इस संसार में यह नियम लागू नहीं होता। भाग्य का लिखा निश्चित् होता है, अटूट होता है, कभी बदलता नहीं। सो! उन्हें इस तथ्य को सहर्ष क़ुबूल कर लेना चाहिए कि कृत-कर्मों का फल जन्म-जन्मांतर तक मानव के साथ-साथ चलता है और उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए सुंदर भविष्य की प्राप्ति हेतू सदैव अच्छे कर्म करें ताकि भविष्य उज्ज्वल व मंगलमय हो सके।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares