मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २९५ – सृजन संगत…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २९५ – विजय साहित्य ?

☆ सृजन संगत…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

हळवे अंतर

जपता जपता

जाणीव असावी

घडता घडता…! १

गिरवा अक्षर

धूळपाटीवर

स्वरादि व्यंजन

मना मनावर…! २

 *

जीवन संचित

संस्कार वारसा 

जपू मनांतरी

मौलिक आरसा…! ३

 *

गरजे पुरती

नसावीत नाती

मनांगणातील

उजळीत वाती…! ४

 *

जीव जीवावर

जगतो जडतो

संकट समयी

जगास नडतो…! ५

 *

प्रेमळ हृदयी

जाणीव असावी

स्वभाव कस्पटे

मुळीच नसावी…!  ६

 *

नसावी उणीव

नजरेचा धाक

ऐकू यावी सदा

हृदयाची हाक…! ७

 *

असायला हवी

नाराजी शब्दांत

प्रेमाचेच ‌बंध

गुंफलेले त्यात…! ८

 *

काका, मामा,नाती

आधाराचे हात

अक्षर धन हे

हवे दिनरात…! ९

 *

कमावले किती

जाणीव असावी

प्रेमळ जीवांची

उणीव नसावी …! १०

 *

गमावले किती

जाणीव असावी

सृजन संगत

उणीव नसावी…! ११

 *

काळाच्याही पुढे

धावणारे मन

उणीव नसावी

आठवांचे क्षण…! १२

 *

हिशोबात नको

व्यवहारी माया

झिजवावी प्रेमे

अविरत काया…!१३

 *

जाणीव असावी

आपल्या जनांची

उणीव नसावी

प्रेमळ मनांची….! १४

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆ कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “कितना शेष है चलना” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १४५ ☆

☆  कितना शेष है चलना ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

फिर समय ने हाँक दी

गाड़ी उमर की

और कितना शेष है चलना।

 

बोझ दिन का उठाए

हम रात भर जागे

स्वप्न आँखों में लिए

बुनते रहे धागे

भोर ने फिर खोल दी

खिड़की ख़बर की

साँझ तक बस स्वयं को छलना।

 

यादें सब ठहर गईं

आइनों के दर पर

प्रतिबिंबित होता है

चेहरों वाला घर

छतों के झरोखे से

झाँकते शहर की

खुली हुई हर किताब पढ़ना।

 

रोशनी के पृष्ठ पर

अंधकार व्याप्त

सुलगते हैं हाशिए

संभावना समाप्त

बाँच रही हैं रातें

इबारत सफर की

सूरज का भी तय है ढलना।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५२ ☆ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते “)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५२ ☆

✍ सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

ज़ुबाँ से अपनी जो भी तुम कहा नहीं  करते

तुम्हारे चश्म बयाँ सब वो क्या नहीं करते

 *

कभी वो अपनी न मंज़िल को पा सके यारो

जो अपने पैरों पै इंसाँ चला नहीं करते

 *

नज़र से सिर्फ हिक़ारत की देखते हो सभी

वहाँ बुलावा हो लेकिन  रुका नहीं करते

 *

है जिनका अज़्म मुक़म्मल पहुँचते मंज़िल पर

सफ़र तबील हो फिर भी थका नहीं करते

 *

अना में उसकी व मेरी रहेगा क्या अंतर

भले किया वो दगा पर दगा नहीं करते

 *

यक़ीन आप परख देख कर किया कीजे

घुने जो बीज है बो लो उगा नहीं करते

 *

है बेवफा वो तो तुहमत न आम कर दीजे

सभी हसीन गलत है वफ़ा नहीं करते

 *

बुझाने आग को तकलीफ जो उठा  न सको

अरुण है काफी जो उस पर हवा नहीं करते

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५६ – इन दिनों.… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – इन दिनों.।)

☆ हेमंत साहित्य # ५६ ☆

✍ इन दिनों.… ☆ श्री हेमंत तारे  

बड़ी तपिश है यार

इन दिनों.

साफ़ आसमाँ,

चिलके मारती धूप

और मानो,

क़फ़स में कैद हो हवा,

इन दिनों.

आज,

वो, सूखे कण्ठ लगा रही थी गुहार,

मांग रही थी पानी

क्योंकि

रिता रह गया था,

गलियारे में रखा सकोरा

जो भर देता था लबालब

मैं, हर रोज

इन दिनों.

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६५ ☆श्री कृष्ण भजन … ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम  – “श्री कृष्ण भजन “।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६५ ☆

✍ श्री कृष्ण भजन .. ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राधे राधे बोल, मनवा राधे राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल।

*

श्याम तेरी बंसी की मीठी ये तान है,

सुनके इसे झूमे सारा जहान है।

राधा के मनमोहन, मुरलीधर घनश्याम,

तेरे चरणों में ही मेरा सम्मान है॥

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

यमुना किनारे तूने रास रचाया,

गोपियों के संग प्रेम दीप जलाया।

माखन चुराकर हर लिया सबका मन,

भक्तों के जीवन को दिया खुशियों से भर ।।

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

गीता का ज्ञान दिया अर्जुन को रण में,

सत्य की राह दिखाई जीवन के क्षण में।

दीनों के सहारे, दुखियों के रखवाले,

तेरे बिना सूने सब मंदिर और शिवाले॥

*

राधे-राधे बोल, मनवा राधे-राधे बोल,

कृष्ण नाम की महिमा सबसे है अनमोल॥

**

मेरे भी जीवन में आओ नंदलाला,

भक्ति से भर दो ये मन की मधुशाला।

तेरी कृपा से ही हर काम बनेगा,

नाम तेरा लेते ही जीवन सँवरेगा॥

*

जय-जय श्री राधे, जय-जय श्री श्याम,

भक्तों के हृदय में बसते आठों याम॥

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११४ – संस्कारों की छाँव… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – संस्कारों की छाँव।)

☆ लघुकथा # ११४ – संस्कारों की छाँव श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

एक छोटे से गाँव में रामरतन दुबे नाम के एक सरल और कर्मनिष्ठ शिक्षक रहते थे। वे विद्यालय में पढ़ाने के बाद प्रतिदिन आश्रम जाकर गरीब बच्चों की सेवा और शिक्षा किया करते थे।

उनकी पत्नी मंजू संतान न होने के कारण चिड़चिड़ी और उदास रहने लगी थी। एक दिन गुरु माँ के कहने पर वह भी आश्रम गई। वहाँ बच्चों की मुस्कान, सेवा और शांत वातावरण ने उसके मन को बदल दिया। वह रोज आश्रम जाने लगी और बच्चों की सेवा में उसका मन रम गया।

धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदल गया। अब वह सबसे प्रेम और आदर से बात करने लगी। आश्रम के संस्कारों ने उसके जीवन में नई रोशनी भर दी। कुछ समय बाद उसे माँ बनने का सुख भी प्राप्त हुआ।

अपने बच्चे को गोद में लेकर वह अक्सर कहती—

“जीवन में धन से बड़ी संपत्ति अच्छे संस्कार होते हैं।”

सेवा में ही सच्चा सुख है।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३१५ ☆ सत्तरी… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३१५ ?

☆ सत्तरी ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सत्तरी आली आहे आणि मी तर—

अजून तिथेच घुटमळतेय,

तू आलास आयुष्यात,

त्या वळणावर,

आणि सगळा आसमंत…

घमघमून गेला तुझ्या येण्याचे !

गुणगुणत होते,

“सब कुछ लागे नया नया”

 

काहीतरी कारण हवे असते–

जगण्याला!

लग्न हे ही एक कारण!

 

आयुष्य पुढे पुढे सरकत राहिले,

काय खरे काय खोटे ?

मूक स्वीकारले पदरात पडलेले,

प्रत्येक दान—

ईश्वरी संकेत समजून!

 

आज तू नाहीस,

पण माझ्या सगळ्याच,

विशीतल्या आठवणी–‘

“तरोताज़ा” —-

मी उगाचच लावतेय हिशेब,

असे झाले नसते तर —-

तर तसेही झाले नसते!

आता सत्तरीत केली जरी–

परतीच्या प्रवासाची तयारी,

तरी मन आसक्तच!

भविष्याच्या गडद अंधारात,

हवाय मला चिमूटभर प्रकाश!

तुझ्याच पावलावर पाऊल ठेवून–

मी येतेच आहे,

पण —

गतजन्मीचे हे सारे पाश,

जेव्हा सुटतील तेव्हाच!!

कुणीतरी म्हटलंय ना —

“खाली हाथ आए है, खाली हाथ जाना है !”

तरीही—

आज सत्तरीत मी माझी विशी आठवतेय!!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २५ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

डॉ. शोभना आगाशे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ श्री रविंद्रनाथ टागोर यांची “गीतांजली”… भाग – २५ ☆ डॉ. शोभना आगाशे ☆

श्री रविंद्रनाथ टागोर  

रविंद्रनाथ टागोर व संगीत

रविंद्रनाथांना जन्मजात लाभलेल्या रूपसौंदर्यासारखंच सूर सौंदर्य देखील लाभलं होतं. ब्राह्मो समाजाचे आद्य गायक विष्णुचंद्र चक्रवर्ती हे त्यांचे पहिले गायन गुरू. यदुभट्ट यांच्याकडेही त्यांचे संगीत शिक्षण झाले मात्र कोणत्याही विशिष्ट प्रणालीत त्यांनी स्वतःला बांधून घेतलं नाही. त्यांनी जवळ जवळ २२३० स्वरचित गाण्यांना चाली लावल्या.

रविंद्रनाथांच्या कविता; नाद, सूर, लय घेऊनच त्यांच्या लेखणीतून प्रकट होत. ते त्यांच्या कवितेला कधी कविता म्हणत नाहीत, गीत म्हणतात. इंग्रजी गीतांजलीतील कविता खरंतर prose poetry किंवा गद्य काव्य या प्रकारातील आहेत पण तरीही त्यांनी तिला ‘गीतांजली, song offering’ म्हटलंय. कदाचित मूळ बंगाली कविता, ह्या गेय असल्यामुळे असेल. कविता व गेयता यांचं नातं अनादि कालापासून भारतीयांनी अनुभवलेलं आहे. आपली वेद, उपनिषदे सुद्धा गेय काव्य रूपातच आहेत.

रविंद्रनाथांनी सुरांचे सामर्थ्य लहानपणीच ओळखलं होतं. त्यांच्या कवितेचा भाव; सुख-दु:ख, हर्ष- शोक, भक्ती- प्रीती कोणताही असो, त्यांचे शब्द, सुरांचा साज लेऊनच वहीच्या मंचावर नर्तन करीत प्रवेश करत. कवितेचं गाणं होताना सुरांतून इंद्रधनुष्य निर्माण होत असतं असं त्यांना वाटे.

“मला गायला कधी येत नव्हतं असं मला आठवतच नाही. ” असं ते म्हणायचे. गाणं रचताना ते गात गात रचावं व रचता रचता तद्रूप होऊन जावं अशी तन्मयता, उन्मादावस्था त्यांनी अनेकदा अनुभवली व एकदा एका खाजगी पत्रात वर्णिली पण आहे. ही अलौकिक अशी अध्यात्मिक परमावस्था नाही काय?

रविंद्रनाथांना भारतीय अभिजात संगीताची चांगली जाण होती. अनेक रागरागिण्यांचे संस्कार घेऊन त्यांची गीतं प्रकट होत. पण लोकसंगीताच्या देखील असंख्य चाली त्यांच्या गीतांमध्ये दिसतात. बंगाली लोकसंगीत मुळात अतिशय समृद्ध आहे. बाऊल, भटियाली, कीर्तन, काका, कविगान, श्यामा संगीत, फकिरांची गाणी, सूफी गाणी, वैष्णव भक्तांची गाणी, भादू सारखी कहाण्यांची गाणी, पाँचालि, जात्रापाला असे अनेक प्रकार त्यात आहेत. आपल्या संगीतासाठी ख्याल, ध्रुपद, ठुमरी, दादरा, टप्पा इथपासून लोकसंगीतापर्यंतच्या; इतकंच नव्हे तर पाश्चात्य संगीतावर आधारित चाली देखिल वापरण्याची रविंद्रनाथांची प्रतिभा पाहून अभ्यासक देखील चकित होतात.

रविंद्र संगीताचा बंगाली संगीतावरील प्रभाव आज देखील ठळकपणे जाणवतो किंबहुना खरंतर रविंद्र संगीतापासून बंगाली संगीत वेगळं करताच येणार नाही. त्यांच्या संगीताकडे चित्रपट क्षेत्रातील सत्यजित राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, नितीन बोस, तपन सिन्हा, कुमार साहनी यांच्यासारखे अतिरथी, महारथी आकर्षित झाले नसते तरच नवल! त्यांनी आपल्या चित्रपटात रविंद्रनाथांची गाणी वापरली. इतकेच नव्हे तर कांही ब्रिटिश, युरोपियन व ऑस्ट्रेलियन चित्रपटांत देखील त्यांची गाणी वापरली गेली आहेत. मात्र आपल्या गीतातील शब्दच काय पण सूर देखील बदलणं त्यांना मंजूर नव्हतं. आज सुध्दा त्यांची गाणी जशीच्या तशी गायली जातात.

 (संदर्भ: रविंद्रनाथ तीन व्याख्याने, ले. पु ल देशपांडे)

——

गीत : ७३

DELIVERANCE is not for me in renunciation. I feel the embrace of freedom in a thousand bonds of delight.

Thou ever pourest for me the fresh draught of thy wine of various colours and fragrance, filling this earthen vessel to the brim.

My world will light its hundred different lamps with thy flame and place them before the altar of thy temple.

No, I will never shut the doors of my senses. The delights of sight and hearing and touch will bear thy delight.

Yes, all my illusions will burn into illumination of joy, and all my desires ripen into fruits of love.

——

☆  मराठी भावानुवाद : गीत : ७३

☆ 

सर्वसंगपरित्याग करुनि

कशास मी मुक्त व्हावे ?

हजार बंधनात सुखाच्या,

मुक्तीला आलिंगन द्यावे॥

 *

काठोकाठ रस तू भरिशी 

मातीच्या या घटाघटातुनी

अनेक रंगी तिला रंगविशी,

अनेक तशा सुवासातुनी॥

 *

तव ज्योतीने दीप उजळतील

मम जगती, राऊळी लावण्या

पंचेंद्रिये मम सजग राहतील

तुझे शब्द, स्पर्श जाणण्या॥

 *

तव दर्शनास आसुसलो रे,

कसा करीन मी बंद लोचना

सारी सुखे ही तुझी देणगी

याच जाणीवा आणि भावना॥ 

 *

आनंद इतुका मला हवा की

आभास सारे त्यात मिटावे

तव प्रेमाच्या अंतर्यामी

मनोरथ माझे फलित व्हावे॥

☆ 

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९८५०२२८६५८

—–

☆  गीत : ७४ ☆ 

THE day is no more, the shadow is upon the earth. It is time that I go to the stream to fill my pitcher.

The evening air is eager with the sad music of the water. Ah, it calls me out into the dusk. In the lonely lane there is no passer by, the wind is up, the ripples are rampant in the river.

I know not if I shall come back home. I know not whom I shall chance to meet. There at the fording in the little boat the unknown man plays upon his lute.

—–

☆  मराठी भावानुवाद : गीत : ७४ ☆ 

☆ 

लांब गेल्या सावल्या अन्

क्षितिजी टेकला दिनमणी

मावळतीची सुवर्णलाली

जलात नदीच्या आरसपानी॥

 *

सांजवेळी नदी किनारी,

घडा भराया जाईन म्हणते

उत्सुक सायंकाळ परंतु 

उदासवाणे गीत गाते॥

 *

तिन्हीसांजेच्या या प्रहरी

दूर कोण मज साद देते

वात लहर ती अवखळ भारी

पाण्यावर तरंग उठविते॥

 *

जाईन म्हणते, नसे माहिती 

परतुनि येईन की नाही

नदी किनारी, कुणा भेटण्या

जीव अनावर होतच राही॥

 *

गेले धावत निर्जन मार्गे

तोच उमटले मधु सूर बासुरी

एकल नावेमधे बैसला

अनोळखी जरी, खचित मुरारी॥

☆ 

भावानुवाद © शोभना आगाशे

संपर्क: ९४५०२२८६५८

—–

☆   गीत : ७५ ☆ 

THY gifts to us mortals fulfil all our needs and yet run back to thee un-diminished.

The river has its everyday work to do and hastens through fields and hamlets; yet its incessant stream winds towards the washing of thy feet.

The flower sweetens the air with its perfume; yet its last service is to offer itself to thee.

Thy worship does not impoverish the world.

From the words of the poet men take what meanings please them; yet their last meaning points to thee.

—–

☆   मराठी भावानुवाद : गीत : ७५ ☆ 

☆ 

 दान तुझे तुळस मंजिरी

उणे न कांही तुझ्या मंदिरी

भरभरुनि तू देतच जाशी

परतुनि ये ते तुझ्याच पाशी॥

 *

नदी वाहते शेतामधुनी

शमते तृष्णा गावामधुनी

अविरत वाहे, अखेर सरिता,

पादाभ्यंगा तुझ्याच करिता॥

 *

कुसुम गंधा पवन वाहतो

आसमंत हा पुलकित होतो

ध्येय अंतिम परंतु त्याचे

तुझ्याच पायी लीन व्हायचे॥

 *

तुझ्या पूजना सर्वस्व वाहतो

इथे परि कुणी नच गरीब होतो

भरभरून सुख जीवनी वेचतो

तुझीच किमया हे ही जाणतो॥

 *

 कवीच्या गीतांमधुनी अर्था

जो तो शोधी, पुरवित स्वार्था

परि अखेर जी गीते बोलती

कृष्ण भावना तुझीच की ती॥

☆ 

– क्रमशः भाग २५..

मूळ इंग्लिश काव्य : श्री. रविंद्रनाथ टागोर.

भावानुवाद : कवयित्री : © शोभना आगाशे

सांगली 

दूरभाष क्र. ९८५०२२८६५८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १४९ – बुन्देली कविता – ”जैसी करनी, जौन करत है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – जैसी करनी, जौन करत है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १४९ ☆

☆  बुन्देली कविता – जैसी करनी, जौन करत है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

जैसी करनी, जौन करत है

बैसइ भरनी बोइ भरत है

कब सें कइ ती दुरबा तक ले

अब लौ बैठो इतइ मरत है

 *

बच्चों खें दो जून खबाउत

जब दिन भर जाँगर पेरत है

 *

अंड-गंड नइयाँ खाबे कौ

इतनो भर लव, अब उछरत है

 *

मरो जात डुकरा ब्यारी खें

दिन को खाओ नोइ पचत है

 *

कौनउँ पहुना आ जाउत जब

बरा – भात उर दार बनत है

 *

केरा खें कितनउ सींचो तुम

भगवतकाटो तबइ फरत है

https://www.bhagwatdubey.com

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२१ – जीवन की बस यही अदा है… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “जीवन की बस यही अदा है…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२१ ☆

☆  जीवन की बस यही अदा है…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

जीवन की बस यही अदा है।

कब तक किसका साथ बदा है।।

 *

जियो जिंदगी जी भर यारो।

मन पर भारी बोझ लदा है।।

सत्य सनातन की यह बेला।

हनुमत जी की बड़ी गदा है।।

 *

कितना भी वह सत्य छुपा लें।

होना उसकी जीत सदा है।।

 *

नेक राह पर चलना सीखो।

मिले सफलता यदा-कदा है।।

 *

बंग भूमि की दुखद कहानी।

अधिक गरीबी यदा-तदा है।।

 

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

22/5/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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