हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१२ ☆ संतोष के मुक्तक – सीढ़ी अहम् की… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके विचारणीय  – संतोष के मुक्तक – सीढ़ी अहम् की आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१२ ☆

संतोष के मुक्तक – सीढ़ी अहम् की☆ श्री संतोष नेमा ☆

स्याही    से      सूरज   उगाते

कविता  में  तुम  चांद  सजाते

पढ़ने    वाले    रो   पड़ते    हैं

पर तुम खुद को कब पिघलाते

*

कागजों पर इबारत  गढ़ते  हो

दर्द मुहब्बत सच सब  पढ़ते हो

शब्दों  से जहाँ  बदलने  वालो

सीढ़ी  अहम की क्यों चढ़ते हो

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # १७ ☆ आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – २ ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – १।)

☆ मंजिरी साहित्य # १७ ☆

? – आलेख – समृद्ध संस्कृति की अद्भुत भूमि – २ ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

?

आगे बढ़ते हैंl आज बताती हूँ कि कैसे कच्छ राज्य की स्थापना हुई?

कच्छ सिंध प्रान्त का प्रशासनिक हिस्सा हुआ करता थाl पर जब अरबों ने इसी सिंध प्रान्त के राजा दाहिर के राउर किले पर आक्रमण किया तब वहाँ जबरदस्त युद्ध हुआl उस समय राजा की सेना में ब्राम्हण, राजपूत और जाट भी शामिल थेl जिसमे राजा दाहिर वीरगति को प्राप्त हुएl उनकी रानी लाड़ी ने बचे हुए सैनिको को एकत्रित कर किले के दरवाजे को अंदर से बन्द कर शत्रु का सामना कियाl पर जब शत्रु किले की दीवार तोड़ने लगा तब असहाय रानी ने जोहर का फैसला लियाl तब उनके साथ वहाँ उपस्थित सभी महिलाओं ने जोहर कियाl परन्तु दुर्भाग्यवश राजा की दो बेटियों को अरबों ने बंदी बनाकर खलीफ़ा को तोहफ़े में भेज दियाl और हिन्दू आबादी पर जरिया कर लगा दियाl इन सभी के चलते सम्मा राजपूत, ब्राम्हण परिवार के साथ कुछ जाट परिवारों ने सिंध छोडकर कच्छ में अपना ठिकाना बनाने का निश्चय कियाl उस समय कच्छ में वाघेला और काठी जातियाँ राज्य करती थींl इन राजपूतों ने यहाँ के शासकों को पराजित कर अपना प्रभुत्व स्थापित करना शुरू कियाl

एक बार फिर से सिंध ने कच्छ पर आक्रमण कियाl तब कच्छ के झारा पहाड़ियों पर घमासान युद्ध हुआ जिसमे सिंध को मुँह की खानी पड़ी परन्तु हजारों की मात्रा में हिन्दू जडेजाओं ने अपने प्राणो की आहुतियाँ भी दींl

कुछ दिनों में ये सभी राजपूत आपस में लड़ने झगड़ने लगेl जिसे देख इसी वंश के एक प्रतापी राजा राव खेंगरजी जी ने सभी को समझा बुझा कर एकत्रित किया और कच्छ राज्य की स्थापना कीl

इस तरह राव खेंगरजी प्रथम कच्छ पर शासन करने वाले जडेजा राजपूत वंश के प्रथम आधिकारिक संस्थापक भी कहलाएl राव साहब ने कच्छ के क्षेत्रफल, सुचारु अर्थव्यवस्था और भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रख अपने प्रान्त को बारह रियासतों में बाँट दियाl भुज को राजधानी घोषित कर दियाl ये रियासतें निम्न हैंl

1- अबडासा – ये कच्छ के महाबलशाली जागीरदारों का गढ़ थाl यहाँ के राजपूत भुज महाराजा के वंश घराने से थेl ये क्षेत्र इतना बडा था कि इसकी अपनी चार जागीरें थींl

2-अंजार – ये क्षेत्र सौराष्ट्र, गुजरात और सिंध को जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक मार्ग पर बसा था और इसी वजह से ये कच्छ की समृद्ध रियासत थीl आज भी यह संतों की भूमि कहलाती हैl यह क्षेत्र अपने पारंपरिक धातु बर्तनों के साथ अजरख और ब्लॉक प्रिंट हेतु प्रसिद्द हैl

2- बाणी या बन्नी – यहाँ सिंधु नदी की सहायक नदियों के साथ आई उपजाऊ मिट्टी ने इस क्षेत्र को एशिया के सबसे बड़े घास के मैदान में परिवर्तित कर दियाl यहाँ मिट्टी के गोल घर बनाये जाते है जिसे भुंगा कहते हैंl ये घर भूकंप और तूफानो से रक्षा करते हैंl यहाँ की मुतवा और हलेपोत्रा कढ़ाई विश्व भर में प्रसिद्द हैl

4- भुवड चौवीसी – यह क्षेत्र भुवड गाँव के पास के चौबीस गावों के समूह से बना थाl यहाँ के कारीगर पत्थरों पर नक्काशी कर उनमें प्राण फूंक देते थेl

5- गराडो – यह क्षेत्र शांत और रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण थाl इसे आज नखत्राना और लखपत कहा जाता हैl यह क्षेत्र बाहरी घुसपैठ को रोकने हेतु चौकी का काम करता थाl यह पहाडियों से घिरा हुआ थाl इसी क्षेत्र में कच्छ की कुलदेवी माँ आशापुरा निवास करतीं हैंl सबसे ज्यादा ओस गिरने से इस क्षेत्र को माकपट भी कहा जाता है

6- हालार चौवीसी – इस क्षेत्र की चौबीस जागीरों में किसान वर्ग रहता था जिसने कडी मेहनत कर अपने क्षेत्र को सबसे उपजाऊ बनायाl अच्छी फ़सल ने इसे समृद्धि बनाया और अपने राजा को सबसे ज्यादा राजस्व दियाl

7- कंठ – यह क्षेत्र ऊंचाई पर होने से राजधानी भुज का ढाल कहलायाl कंठ की पहाड़ियों में जडेजा राजा अपनी सेना के साथ मिलकर गोरिल्ला नीति अपनाकर शत्रु पर हमला बोल देते थेl

8- काँठो – मांडवी और मुंद्रा तटीय शहरों ने इसे कच्छ को समृद्ध, आर्थिक दृष्टि मजबूत और व्यापारिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना दियाl यह राजा की आय का मुख्य स्रोत थाl इसी क्षेत्र के सागर खेडू अपनी वीरता हेतु मशहूर थेl आज भी यहाँ के कारीगर समुद्री जहाज बनाते हैंl यहाँ खजूर, चीकू और नारियल की पैदावार होती हैl

9- खड़ीर – कच्छ के सफ़ेद रन के दलदल के बीच का यह क्षेत्र द्वीप थाl मानसून में चारों तरफ पानी भरने पर इसका सम्पर्क टूट जाता थाl इस क्षेत्र को अभेद सुरक्षा चक्र भी कहा जाता थाl धोलावीरा इसी क्षेत्र में हैl और आज सरकार ने इसे रोड टू हेवन नमक सड़क से जोड़ दिया हैl

10- मोथाडा – भुज और अबडासा के बेच का यह क्षेत्र बाजरा और ज्वार की पैदावार करता थाl

11- प्रांथल – आज यह रापर और भाचाऊ का क्षेत्र हैl व्यापारिक मार्ग होने से यहाँ राजा ने विशेष चौकीयाँ बनवाई थींl

12- प्रवर – रण के पास का यह क्षेत्र जिसकी जमीन में नमक की मात्रा अत्यधिक होने से यहाँ की भूमि बंजर बन गईl यहाँ लखपथ का किला थाl इस किले पर राजपूत सेना प्रति प्रहर पहरा देती थीl पहले यहाँ बंदरगाह था जहाँ सिंध और गुजरात के व्यापारी व्यापार करने आया जाया करते थेl नारायण सरोवर आज भी यहाँ का मुख्य पर्यटल स्थल हैl

—- क्रमशः

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३१ – कविता – क्या हुआ…? ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता क्या हुआ…? ।)

☆ शशि साहित्य # ३१ ☆

? कविता – क्या हुआ…? ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

क्या हुआ…?

क्यों सूख गई तेरी स्याही?

जब मेरी किस्मत में “कुछ” लिखने की बारी आई…

खुद तो ना रह सका प्रीत बिना,

फिर तेरी रचना क्यों अधूरी,

जब रच रहा था तू मुझे,

क्या तुझको मुझ पर दया ना आई…?

 

इधर समुंदर, उधर मरु-थल,

तेरी लीला समझ ना आई…

मुझको तो दिया भर भर के,

क्यों दूसरों की भावनाएं सूख गई…

खुद को गढ़ने की दी नेमत तूने मुझको,

दूसरों को जिम्मेदारी समझ ना आई…?

 

खूब रोई, खूब बिलखी,

तब “तूने” यह राज बताया…

नहीं चाहता, सखी ..

तेरी सच्ची भावना और प्रेम प्रीत,

किसी और के हिस्से में जाएं

दुख दिया, बना स्वार्थी,

सिर्फ मुझे तुम अपना मानो,

इसलिए यह रास रचाई…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # ३०२ – कालिदास दिन…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # ३०२ – विजय साहित्य ?

☆ कालिदास दिन…! कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कवी कालिदास दिन

आषाढाची प्रतिपदा

काव्य शृंगार तिलक

प्रासादिक ही संपदा. १

*

जोडोनीया दोन्ही कर

समर्पित शब्द फुले

स्वीकारावी शब्दार्चना

लाभू देत विश्व खुले. २

*

कुलगुरु कालिदास

काव्य शास्त्र अनुभूती

शब्द संपदा संस्कृत

अभिजात कलाकृती. ३

*

महाकवी कालिदास

काव्य कला अविष्कार

निसर्गाचे सहा  ऋतू

ऋतू संहार साकार.४

*

अलौकिक प्रेमकथा

मालविका अग्निमित्र

खंडकाव्य मेघदूत

सालंकृत शब्द चित्र. ५

*

शिव आणि पार्वतीची

कथा   कुमार संभव

अभिज्ञान शाकुंतल

प्रेमनाट्य शब्दोच्चय.६

*

राजा पुरूरवा आणि

नृत्यांगना  उर्वशीचे

अभिजात कथानक

निजरूप प्रतिभेचे. ७

*

मेघा बनवोनी दूत

यक्षराज आराधना

कालिदासे वर्णियेली

प्रेमसाक्षी संकल्पना. ८

*

अग्रगण्य  अभिव्यक्ती

कालिदास साहित्याची

शब्दोशब्दी सामावली

शब्द शक्ती सृजनाची. ९

*

चित्रकार, शिल्पकार

यांचे वंदनीय स्थान

साहित्यिक शिरोमणी

कालिदास दैवी  ज्ञान.१०

*

अशी प्रेरणा चेतना

व्यासंगात रूजलेली

कालिदासी साहित्यात

काव्यसृष्टी फुललेली. ११

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – २९ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची अभंग गाथा… भाग – २९ ☆ अरुणा मुल्हेरकर ☆

तुकारामांचा युक्तिवाद

दिवस रात्र विठू माऊलीचा ध्यास घेतलेल्या तुकाराम महाराजांची त्यांच्या देवाचे कधी दर्शन घडते आणि माऊलीच्या चरणी त्यांना कधी आसरा मिळतो अशी मनाची अवस्था झाली असताना त्यांनी त्यांच्या काही अभंगांतून खूप छान युक्तिवाद मांडला आहे. आज आपण असे काही अभंग पाहूया.

 नवां नवसांची/ झालो तुम्हासी वाणीची//

 कोण तुझे नाम घेते/ देवा पिंडदान देते//

 कोण होते मागे पुढे/ दुजे बोलाया रोकडे//

 तुका म्हणे पांडुरंगा/ कोणा घेतोसी वोसंगा//

देवाला उद्देशून तुकाराम महाराज म्हणतात,

” अहो देवा, आम्ही तुमची नवसासायासाने झालेली दुर्मिळ मुले आहोत. आमच्या वाचून तुमचे नाव घेणारे दुसरे कुणी आहेत का? आम्ही नसतो तर तुमचे पिंडदान कोण करणार? तुम्हाला परखड शब्दात जाब विचारणारे, रोखठोक बोलणारे आमच्या शिवाय दुसरे कोणीतरी आहे का? पांडुरंगा, आम्ही जर तुमची मुले नसतो तर तुम्ही कोणाला तुमच्या पदरात घेतले असते? “

आहे की नाही महाराजांचा हा मस्त युक्तिवाद? आम्ही तुमचे भक्त नसतो तर देवच जसा एकटा पडला असता, ही पांडुरंगाची मुले आहेत म्हणून त्यांना माय बापाच्या अंगा खांद्यावर खेळण्याचा अधिकार आहे.

 आता हा दुसरा अभंग पहा.

 जेणे तुज जाले रूप आणि नाव/

 पतीत हे दैव तुझे आम्ही//

 नाही तरी तुज कोण हो पुसते/

 निराकारी तेथे एकाएकी//

 अंधारे ते दीपा आणियेली शोभा/

 माणिकाची प्रभा कोंदणाची//

 धन्वंतरी रोगे आणिला उजेडा/

 सुखी काय चाडा जाणावे त्या//

 अमृतासी मोल विषाचिया गुणे /

 पितळ तरी सोने उंच नीच//

 तुका म्हणे आम्ही असोनिया जाण /

 तुज देवपण आणियेले//

 रोजच्या व्यवहारातील उदाहरणे देऊन तुकाराम देवाला सांगतात, ” अरे देवा, आम्ही तुझे दास आहोत, भक्त आहोत म्हणून तुझी ओळख आहे. ” ते काय म्हणतात? आम्ही पतीत आहोत. आणि आमच्यासाठीच देवा तुम्ही हे रूप धारण केले आहे. म्हणून आम्ही पतीतच तुझे दैवत आहोत. आम्ही जर नसतो तर तुझ्या निराकार, निर्गुण स्थितीला कोणी मानले असते? जसे की, अंधार आहे म्हणून दिव्याच्या प्रकाशाची शोभा आहे. वैद्याला रोग्यामुळे प्रसिद्धी मिळते. जर सर्व लोक निरोगी असते तर वैद्याची गरजच काय? विषामुळे अमृताची गोडी आहे, आणि पितळ आहे म्हणून सोन्याला श्रेष्ठता प्राप्त झाली आहे. तसेच आम्ही पतीत आहोत, म्हणून तुझे हे सगुण सुंदर रूप आहे.

या अभंगातून तुकाराम महाराज एक प्रतिभावंत कवी होते असे आपल्याला दिसून येते. परमेश्वराला मनविण्याची ही मोठी चतुर बुद्धी त्यांच्याकडे नक्कीच होती.

माणूस मायेच्या जंजाळात अडकून पडला आहे, जी माया अत्यंत नीच आहे. तुकाराम महाराज म्हणतात की देव खरंतर फार चांगला होता, परंतु या मायेने त्याला सुद्धा बिघडवले आहे. या मायेच्या संगतीत राहून देव लोकांना फसवण्याचे अनेक प्रकारचे खरे खोटे चाळे शिकला आहे. या मायेमुळे याच्यावर जगाचे कर्ज झाले म्हणून लोक याच्या नावाने हाका मारतात. ईश्वरा जवळ कोणी काही मागितले की ही माया ज्याचे त्याला मिळू देत नाही, उलट ती मागणाऱ्याला भ्रम निर्माण करण्याकरता त्याच्या अंगावर धावते.

थोडक्यात काय तर मायेत गुरफटलेल्या माणसाने ईश्वरालाही सोडले नाही, त्यालाच मायेच्या पाशात अडकविले. या कारणाने आम्हा भक्त मंडळींना परमेश्वराची भेट होत नाही.

हा फार मोठा सिद्धांत तुकाराम महाराजांनी सामान्य जनतेला पोट- तिडकीने सांगितला आहे.

 बहु होता भला/ परी या मायेने नासीला//

 बहु शिकला रंग चाळे/ खरे खोटे इचे वेळे //

 नव्हते आळविते कोणी/ तिने केला जग ऋणी//

 ज्याचे त्यासी नेदी देऊ/ तुका म्हणे धावे खाऊ//

विठ्ठलाची भक्ती करीत असताना वेद पठण केलेल्या पंडितांना ते मुळीच मानत नाहीत. ते म्हणतात,

पंडित म्हणता थोर सुख/

परी तो पाहता अवघा मूर्ख//

काय करावे घोकिले/

वेदपाठ वाया गेले//

वेदी सांगितले न करी/

समब्रह्म नेणे दुराचारी//

हा वेदींचा अनुभव/

तुका देखे जीव शिव//

एखाद्याला कोणी पंडित म्हणून संबोधिले तर त्याला त्याच्या विद्वत्तेचा अभिमान वाटतो पण विचारांती तो मूर्खच असतो. कारण नुसत्या वेदांची घोकंपट्टी करून त्याचा अर्थ कळत नसेल तर तो कसला पंडित? मोक्ष प्राप्तीच्या दृष्टीने त्याचे वेदपठण व्यर्थच आहे. वेदात सांगितले आहे की सर्व प्राणीमात्रांच्या ठिकाणी समत्वाने ब्रह्म विलसत असते, परंतु असा अनुभव येत नाही म्हणून असे पंडित हे खरंतर दुराचारीच. वेदातील मुख्य अनुभव म्हणजे जीव आणि शिव एकच असल्याचा अनुभव. तुकाराम महाराजांना प्रत्यक्ष असा अनुभव आला आहे. त्यांच्या दृष्टीने खरा पंडित असा असतो.

पंडित तोची एक भला/ नित्य भजे जो विठ्ठला//

अवघे समब्रम्ह पाहे/ सर्वांभूती विठ्ठल आहे//

रिता नाही कोणी ठाव/ सर्वांभूती वासुदेव//

तुका म्हणे तोचि दास/ त्या देखिला जाती दोष//

तुकाराम महाराज म्हणतात की जो खऱ्या खुऱ्या भावाने विठ्ठलाची नित्यनेमाने भक्ती करतो, तोच खरा पंडित, कारण तो विठ्ठलाला सर्व भूतमात्रांच्या ठिकाणी समत्वाने पाहतो. तो हे जाणतो की वासुदेव सर्वत्र व्यापून आहे. रिकामे असे कोणतेच ठिकाण नाही. असा मनुष्यच खरा विठ्ठलदास आहे, त्याच्या दर्शनाने सर्वदोष नाश पावतात.

संत तुकारामांचे जनतेला हेच आवाहन आहे की, जन हो, हातात टाळ घ्या, वीणा घ्या, त्यांना विठ्ठल स्वरूप माना आणि विठ्ठल नामाचा मुखाने सतत गजर करा.

क्रमशः… २९

© अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २९४ ☆ श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख # २९४ ☆

श्रावण मास की दस्तक – सुंदर रूप निखार : हरियाली ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

वर्षा की बूंदे सुखद, जीवन का आधार ।

हरियाली फैली रहे,  सुंदर रूप निखार ।।

*

बागों में झूले पड़े,   बारिश हो घनघोर ।

चंचल मन पर न चले, कभी किसी का जोर।।

श्रावण की पहली आहट के साथ ही लगता है मानो प्रकृति ने धरा के माथे पर हरियाली का तिलक सजा दिया हो। वर्षा की बूँदें केवल धरती की प्यास ही नहीं बुझातीं, वे मनुष्य के भीतर सोई संवेदनाओं को भी सींच देती हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में श्रावण केवल एक मास नहीं, बल्कि प्रकृति और आत्मा के पुनर्मिलन का पर्व माना गया है।

हमारे ऋषियों ने ऋतुचक्र के साथ जीवनचक्र को इस प्रकार जोड़ा कि उपासना भी हो, अनुशासन भी और पर्यावरण का संरक्षण भी। देवशयनी एकादशी से लेकर गुरु पूर्णिमा और हरियाली अमावस्या तक प्रत्येक अवसर हमें यही स्मरण कराता है कि सृष्टि से हमारा संबंध उपभोग का नहीं, आत्मीयता का है। वृक्ष केवल छाया नहीं देते, नदियाँ केवल जल नहीं बहातीं और वर्षा केवल मौसम नहीं बदलती—ये सब जीवन के मौन गुरु हैं।

आज जब विकास की दौड़ में हरियाली सिमटती जा रही है, तब श्रावण हमें ठहरकर यह प्रश्न पूछने का अवसर देता है—क्या हम प्रकृति से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना उसके उपहारों से?

यदि प्रत्येक व्यक्ति इस मास में केवल एक पौधे को अपना आत्मीय मान ले, जल और हरियाली के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ले, तो यह धरती फिर से मुस्करा उठेगी। श्रावण का सच्चा उत्सव मंदिरों की घंटियों से आगे बढ़कर तब पूर्ण होगा, जब हमारे मन, हमारे आँगन और हमारी धरती—तीनों फिर से हरे-भरे हो उठेंगे।

सपनों को मिलने लगा, एक नया आकार ।

हरियाली फैली रहे, सुंदर रूप निखार।।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२२ ☆ व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२२ ☆

? व्यंग्य – आम और खास के बीच वाली खस की चिक ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

शहर के चौराहे पर लगा नेताजी का स्टैचू आज भी वैसा ही है। उनका हाथ हवा में ऐसे ठहरा है, मानो किसी अदृश्य भीड़ को बरसों से समझा रहे हों, ” मैंने तुम्हें विकास का जो लॉलीपॉप दिया है, उसे चूसना क्यों छोड़ रहे हो?, लॉली पाप चूसते रहो, और मुंह बंद रखो”

उसी मूर्ति के चौराहे के कोने में मोची रामसहाय बैठा करता है । उसे बहुतों की टूटी चप्पलें मौके पर सिलनी होती हैं और इंटरव्यू देने जाते बेरोजगार लोगों के जूते चमकाने होते हैं।

आज उसके पास सिर उठाने की फुर्सत नहीं है। उसे उन ‘खास’ जूतों की पॉलिश करनी है, जो कल स्वतंत्रता दिवस की परेड में ‘आम’ सड़कों पर शान से धूल उड़ाते हुए चलेंगे।

राम सहाय को उसके बचपन की याद है। गर्मियों की दोपहरी में खास लोगों के बंगलो की  खिड़कियों और दरवाजों पर खस की खुशबूदार चिक लगाई जाती थी। वह खास लोगों को आम लोगों से अलग करने वाली एक अदृश्य, मगर ठंडी विभाजक रेखा थी । बाहर का ‘आम’ आदमी भरी दोपहरी में बाल्टी भर-भरकर पानी उस चिक पर छिड़कता था।भीतर ‘खास’ साहब मखमली कुर्सी पर पसरकर उस ठंडी बयार में कलमी आम को तक चूसकर आनंद लेते थे । बाहर सिंचाई करता ‘आम’ आदमी भी खस की महक को ही अपनी नियति मानकर तृप्त हो जाता था।

खस की महक की खुशी  ‘आम’ के पसीने और ‘खास’ के आराम के बीच का इकलौता साझा रिश्ता थी।

आज न खस की चिक बची, न वह सादगी। शीशे की वातानुकूलित दीवारों ने खस को रिप्लेस कर दिया है। इस कांच की दीवार ने संवेदनाओं को भी ‘फ्रीज’ कर दिया है। अब कोई किसी की खिड़की पर पानी नहीं छिड़कता, क्योंकि अब भीतर वालों को बाहर की गर्मी का एहसास ही नहीं होता।

पहले अंदर की खास लोगों की  बातें खस की चिक के उस पार आम व्यक्ति तक पहुंच जाती थी। अब कांच के पार आवाजें नहीं जाती ।

रामसहाय ने अब मेरी घिसी हुई टूटी चप्पल सिलना शुरू किया था ।

मैंने उस से पूछा, “रामू भाई, खस की चिक हट गई, अब क्या बचा?” उसने बिना नज़र उठाए जवाब दिया, “साहब, अब चिक नहीं, एल्गोरिदम की दीवार है। पहले हम पानी छिड़कते थे तो महक हमें भी नसीब होती थी। अब हम सिर्फ डेटा रिचार्ज करवाते हैं, ताकि ‘खास’ लोगों की डिजिटल चमक को लाइक कर सकें।”

कहने को सच है कि खास वह नहीं है जो बंगलों में बैठा है। खास तो वह है, जो यह तय करता है कि किस ‘आम’ को कितनी देर तक किस मुद्दे की हवा में भिगोकर खास बनाए रखना है। और रामसहाय इस तरह का ही खास आम है।वह निचोड़ा जाता है, बार बार नए तरीकों से नए लोगों द्वारा ।

चौराहे पर पकौड़े तलने वाले की कड़ाही में तेल तो एक ही खौल रहा है, पर ‘पकौड़े’ की गुणवत्ता पर राजनीति की मोहर लगी है। ‘खास’ काउंटर पर पकौड़े सजे-सजाए प्लेट में पहुंचते हैं। ‘आम’ काउंटर पर आदमी को अपनी थाली खुद ही ढोनी पड़ती है । यह ‘सेल्फ-सर्विस’ का दौर है।

‘आम’ आदमी का लाइन में खड़े होना लोकतंत्र की गरिमा है, और ‘खास’ का सीधे अंदर जाना वीआईपी शिष्टाचार है। अगर ‘आम’ आदमी  कुर्सी मांग ले, तो वह ‘अतिक्रमणकारी’ करार दिया जाता है, जबकि ‘खास’ का वहां बैठना ‘जन-संवाद’ की तस्वीर बन जाता है।

खस की चिक के साथ हमने वह सौंधी खुशबू खो दी है, जो वर्ग-भेद को कम से कम ‘महसूस’ तो करने देती थी। आज की एयर-कंडीशंड खामोशी में संवाद मर चुका है। ‘आम’ आदमी ‘खास’ बनने की ऐसी अंधी दौड़ में है कि वह यह भूल गया है कि वह खुद उस पेड़ का तना है, जिस पर ‘खास’ फल लटके हैं।

त्रासदी यह है कि ‘आम’ आदमी ने अब यह मान लिया है कि उसे कुल्हड़ ही नसीब होगा और ‘खास’ को चीनी मिट्टी का प्याला।

मिट्टी तो मिट्टी ही है, चाहे वह कप हो या कुल्हड़।

मेरी टूटी चप्पल सिल कर फिर एट माई सर्विस, ऑन रोड आ चुकी थी। मैं फटियाते हुए आगे निकला, सोच रहा था कि

जिस दिन ‘आम’ आदमी शीशे की दीवार हटाकर भीतर की बातों में हिस्सेदारी का साहस करेगा, उस दिन शायद सारी कृत्रिम व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।

तब तक, बस लॉली पाप चूसते हुए, मुंह बंद रख मुस्कुराते रहिए। हंसी अभी भी टैक्स-फ्री है। पर डर तो यह है कि कहीं अगली बजट मीटिंग में ‘हंसी कर’ न लग जाए। आखिर, ‘खास’ को अपनी लग्जरी गाड़ियों के लिए पेट्रोल और  खामोशी के लिए साउंड-प्रूफ दीवारों का खर्चा तो ‘आम’ के पसीने से ही निकालना है!

  

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # ३०३ ☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मानबाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंतउत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # ३०३ ☆ 

☆ शिशु कविता – चूहे राजा चले बाजार ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ 

चूहे राजा चले बाजार।

साइकिल पर वह हुए सवार।

थैला लिया साथ में अपना।

बाएँ ओर सड़क के चलना।

थैले में सामान को लाएँ।

पॉलीथिन को नहीं अपनाएँ।

कभी प्रदूषण नहीं बढ़ाएं।

 धरती माँ को स्वर्ग बनाएँ।।

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १५२ ☆ सुलगती रात ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “सुलगती रात” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १५२ ☆

सुलगती रात ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

धुआँ उठा है

कहीं रात सुलगी होगी।

 

तस्वीरों में

ओढ़े बैठे

कुछ नक़ली असली चेहरे

अभिव्यक्ति की

आजादी पर

बिठा रहे हैं बस पहरे

कौन सगा है

किस पर मूठ दगी होगी।

 

धार नदी के

सँग-सँग बहना

क्या बस नियति हुई ऐसी

घबराहट में

मौन सुलगते

स्थितियाँ मूक बधिर जैसी

कहाँ उगा है

सूरज,रात ठगी होगी।

 

ठोकर खाना

खाकर गिरना

गिर-गिर कर चलना दस्तूर

लिए विरासत

काँधे लादे

पग-पग उम्र हुई मजबूर

कहीं दगा है

कहीं रार उमगी होगी।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆ मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “मेरे पापा मिले क्या?“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७१ ☆

✍ कविता – मेरे पापा मिले क्या? ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

मेरे पापा मिले क्या?

एक बेटी के ये शब्द

सबको आहत करते रहे ,

और आहत मन से ही

बचाव कार्य में जुटे

पुलिस कर्मी

एनडीआरएफ जवान

नम आंखों से

बचाव कार्य में लगे रहे।

मेरा भाई मिला

मेरे पति मिले

प्रश्नों के अंबार लगे

उत्तर किसी के न मिले।

परिजनों की भीगी आंखें

गिरे हुए कचरे के पहाड़ को

ताकती हैं

निरखती परखती हैं।

 

पूरे शहर के निवासी

कितना कचरा उत्पन्न करते हैं

कि उसका पहाड़ बन जाए,

और जब गिरे तो

तीन मंजिला भवन को ढहा जाए।

कचरे के ढेर में दबे लोगों के

प्राण कैसे, कितने तड़पे होंगे

शरीर से कैसे निकले होंगे

क्या कचरे से बाहर आये होंगे

या कचरे में विचरण करते होंगे।

 

कौन जाने ?

जिस कचरे में रह नहीं सकते

उसमें दबने पर क्या

तकलीफ़ हुई होगी

कौन जाने?

मोशी पिंपरी चिंचवड़ पुणे

इसके साक्षी हैं।

और परिजनों की नम  आँखें

व सिसकियाँ

साक्षी हैं।

पर बेटी का प्रश्न गूंजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

 

प्रश्न तो अंतस् में यह भी उठता है

कि इतना कचरा

क्यों और कहाँ से आता है

पहले भी लोग रहते थे

पर इतना कचरा नहीं होता था।

घर से कचरा बहुत कम निकले

यह सोचना होगा

बेटी के प्रश्न का उत्तर

देना होगा

और सबको मिलकर

देना होगा।

नहीं तो हर कान में गूँजता रहेगा

मेरे पापा मिले क्या?

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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