( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “तो जानें…“.)
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २६१ ☆
☆ जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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दर्शन के लिये, पूजन के लिये, जगदम्बा के दरबार चलो
मन में श्रद्धा विश्वास लिये, मां का करते जयकार चलो !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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है डगर कठिन देवालय की, माँ पथ मेरा आसान करो
मैं द्वार दिवाले तक पहुँचू, इतना मुझ पर एहसान करो !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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उँचे पर्वत पर है मंदिर, अनुपम है छटा, छबि न्यारी है
नयनो से बरसती है करुणा, कहता हर एक पुजारी है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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मां ज्योति तुम्हारे कलशों की, जीवन में जगाती उजियाला
हरयारी हरे जवारों की, करती शीतल दुख की ज्वाला !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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जगजननि माँ शेरावाली ! महिमा अनमोल तुम्हारी है
जिस पर करती तुम कृपा वही, जग में सुख का अधिकारी है !!
जय जगदम्बे, जयजगदम्बे !!
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तुम सबको देती हो खुशियाँ, सब भक्त यही बतलाते हैं
जो निर्मल मन से जाते हैं वे झोली भर वापस आते है !!
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख परखिए नहीं–समझिए। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३१४ ☆
☆ परखिए नहीं–समझिए… ☆
जीवन में हमेशा एक-दूसरे को समझने का प्रयत्न करें; परखने का नहीं। संबंध चाहे पति-पत्नी का हो; भाई-भाई का हो; मां-बेटे का हो या दोस्ती का… सब विश्वास पर आधारित हैं, जो आजकल नदारद है; परंंतु हर व्यक्ति को उसी की तलाश है। इसलिए ‘ऐसे संबंध जिनमें शब्द कम और समझ ज्यादा हो; तक़रार कम, प्यार ज़्यादा हो; आशा कम, विश्वास ज़्यादा हो’ की दरक़ार हर इंसान को है। वास्तव में जहां प्यार और विश्वास है; वही संबंध सार्थक है, शाश्वत है। समस्त प्राणी जगत् का आधार प्यार है, जो करुणा का जनक है और एक-दूसरे के प्रति स्नेह, सौहार्द, सहानुभूति व त्याग का भाव ‘सर्वे भवंतु सुखीन:’ का प्रेरक है। वास्तव में जहां भावनाओं का सम्मान है; वहां मौन भी शक्तिशाली होता है। इसलिए कहा जाता है कि ‘खामोशियां भी बोलती हैं और अधिक प्रभावशाली होती हैं।’
यदि भरोसा हो, तो चुप्पी भी समझ में आती है, वरना एक-एक शब्द के अनेक अर्थ निकलने लगते हैं। इस स्थिति में मानव अपना आपा खो बैठता है। वह सब सीमाओं को लांघ जाता है और मर्यादा के अतिक्रमण करने से अक्सर अर्थ का अनर्थ हो जाता है, जो हमारी नकारात्मक सोच को परिलक्षित करता है, क्योंकि ‘जैसी सोच, वैसा कार्य व्यवहार।’ शायद! इसलिए कहा जाता है कि कई बार हाथी निकल जाता है और पूंछ रह जाती है।
संवाद जीवन-रेखा है और विवाद रिश्तों में अवरोध उत्पन्न करता है, जो वर्षों पुराने संबंधों को पलभर में मगर की भांति लील जाता है। इतना ही नहीं, वह दीमक की भांति संबंधों की मज़बूत चूलों को हिला देता है और वे लोग, जिनकी दोस्ती के चर्चे जहान में होते हैं; वे भी एक-दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। उनके अंतर्मन में वह विष-बेल पनप जाती है, जो सुरसा के मुख की मानिंद बढ़ती चली जाती है। इसलिए छोटी-छोटी बातों को बड़ा न किया करें; उससे ज़िंदगी छोटी हो जाती है…बहुत सार्थक संदेश है। परंंतु यह तभी संभव है, जब मानव क्रोध के वक्त रुक जाए और ग़लती के वक्त झुक जाए। ऐसा करने पर ही मानव जीवन में सरलता व असीम आनंद को प्राप्त कर सकता है। सो! मानव को ‘पहले तोलो, फिर बोलो’ अर्थात् सोच-समझ कर बोलने का संदेश दिया गया है। दूसरे शब्दों में तुरंत प्रतिक्रिया देने से मानव मन में दूरियां इस क़दर बढ़ जाती हैं, जिन्हें पाटना असंभव हो जाता है और जीवन-साथी– जो दो जिस्म, एक जान होते हैं; नदी के दो किनारों की भांति हो जाते हैं, जिनका मिलन जीवन-भर संभव नहीं होता। इसलिए बेहतर है कि आप परखिए नहीं, समझिए अर्थात् एक-दूसरे की परीक्षा मत लीजिए और न ही संदेह की दृष्टि से देखिए, क्योंकि संशय, संदेह व शक़ मानव के अजात-शत्रु हैं। वे विश्वास को अपने आसपास भी मंडराने नहीं देते। सो! जहां विश्वास नहीं; सुख, शांति व आनंद कैसे रह सकते हैं? परमात्मा भाग्य नहीं लिखता; जीवन के हर कदम पर हमारी सोच, विचार व कर्म हमारा भाग्य लिखते हैं। इसलिए अपनी सोच सदैव सकारात्मक रखिए। संसार में जो भी अच्छा लगे, उसे ग्रहण कर लीजिए और शेष को नकार दीजिए। परंतु किसी की आलोचना मत कीजिए, आपका जीवन सार्थक हो जाएगा। वे सब आपको मित्र सामान लगेंगे और चहुंओर ‘सबका मंगल होय’ की ध्वनि सुनाई पड़ेगी। जब मानव में यह भावना घर कर लेती है, तो उसके हृदय में व्याप्त स्व-पर व राग-द्वेष की भावनाएं मुंह छिपा लेती हैं; सदैव के लिए लुप्त हो जाती हैं और दसों दिशाओं में आनंद का साम्राज्य हो जाता है।
अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। वह हमें किसी के सम्मुख झुकने अर्थात् घुटने नहीं टेकने देता, क्योंकि वह स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है और दूसरों को नीचा दिखा कर ही सुक़ून पाता है। सुख व्यक्ति के अहं की परीक्षा लेता है और दु:ख धैर्य की। इसलिए दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण व्यक्ति का जीवन ही सार्थक व सफल होता है। इसलिए मानव को सुख में अहं को निकट नहीं आने देना चाहिए और दु:ख में धैर्य नहीं खोना चाहिए। दोनों परिस्थितियों में सम रहने वाला मानव ही जीवन में अलौकिक आनंद प्राप्त कर सकता है। सो! जीवन में सामंजस्य तभी पदार्पण कर सकेगा; जब कर्म करने से पहले हमें उसका ज्ञान होगा; तभी हमारी इच्छाएं पूर्ण हो सकेंगी। परंतु जब तक ज्ञान व कर्म का समन्वय नहीं होगा, हमारे जीवन की भटकन समाप्त नहीं होगी और हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होगी। इच्छाएं अनंत है और साधन सीमित। इसलिए हमारे लिए यह निर्णय लेना आवश्यक है कि पहले किस इच्छा की पूर्ति, किस ढंग से की जानी कारग़र है? जब हम सोच-समझकर कार्य करते हैं, तो हमें निराशा का सामना नहीं करना पड़ता; जीवन में संतुलन व समन्वय बना रहता है।
संतोष सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम धन है। इसलिए हमें जो भी मिला है, उसमें संतोष करना आवश्यक है। दूसरों की थाली में तो सदा घी अधिक दिखाई देता है। उसे देखकर हमें अपने भाग्य को कोसना नहीं चाहिए, क्योंकि मानव को समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी, कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता। संतोष अनमोल पूंजी है और मानव की धरोहर है। ‘जे आवहिं संतोष धन, सब धन धूरि समान,’ रहीम जी की यह पंक्ति इस तथ्य की ओर इंगित करती है कि संतोष के जीवन में पदार्पण करते ही सभी इच्छाओं का शमन स्वतः हो जाता है। उसे सब धन धूलि के समान लगते हैं और मानव आत्मकेंद्रित हो जाता है। उस स्थिति में वह आत्मावलोकन करता है तथा दैवीय व अलौकिक आनंद में डूबा रहता है; उसके हृदय की भटकन व उद्वेलन शांत हो जाता है। वह माया-मोह के बंधनों में लिप्त नहीं होता तथा निंदा-स्तुति से बहुत ऊपर उठ जाता है। यह आत्मा-परमात्मा के तादात्म्य की स्थिति है, जिसमें मानव को सम्पूर्ण विश्व तथा प्रकृति के कण-कण में परमात्म-सत्ता का आभास होता है। वैसे आत्मा-परमात्मा का संबंध शाश्वत है। संसार में सब कुछ मिथ्या है, परंतु वह माया के कारण सत्य भासता है। इसलिए हमें तुच्छ स्वार्थों का त्याग कर अलौकिक आनन्द प्राप्त करने का अनवरत प्रयास करना चाहिए। इसके लिए आवश्यकता है… उदार व विशाल दृष्टिकोण की, क्योंकि संकीर्णता हमारे अंतर्मन में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों को पोषित करती है। संसार में जो अच्छा है, उसे सहेजना बेहतर है और जो बुरा है, उसका त्याग करना बेहतर है। इस प्रकार आप बुराइयों से ऊपर उठ सकते हैं। इस स्थिति में संसार आपको सुखों का सागर प्रतीत होगा; प्रकृति आपको ऊर्जस्वित करेगी और चहुंओर अनहद नाद का स्वर सुनाई पड़ेगा।
अंत में मैं कहना चाहूंगी कि जीवन में दूसरों की परीक्षा मत लीजिए, क्योंकि परखने से आपको दोष अधिक दिखाई पड़ेंगे। इसलिए केवल अच्छाई को देखिए; आपके चारों ओर आनंद की वर्षा होने लगेगी। सो! दूसरों की भावनाओं को समझने और उनकी बेरुखी का कारण जानने का प्रयास कीजिए। जितना आप उन्हें समझेंगे, आपकी दोष-दर्शन की प्रवृत्ति का अंत हो जाएगा। इंसान ग़लतियों का पुतला है और कोई भी इंसान पूर्ण नहीं है। फूल व कांटे सदैव साथ-साथ रहते हैं, उनके अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। सृष्टि में जो भी घटित होता है मात्र किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं; सबके मंगल के लिए कारग़र व उपयोगी होता है।
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – गुरुवर वंदना…।
रचना संसार # ८६ – गीत – गुरुवर वंदना… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – नवसंवत्सर।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता – मानवता अब हार रही है… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९६ ☆
☆ कविता – मानवता अब हार रही है… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘नदिया की धार…‘।)
☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – १२ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆
गाथेतून उमजणारी गीता (२)
सध्या आपण गाथेतून उमजणाऱ्या गीता तत्वाचे चिंतन करीत आहोत.
भगवंतांनी अर्जुनाला सांगितले की “करणारा तू कोण? नियतकर्माचे पालन करून तू ते कर्म कृष्णार्पण कर. कर्ता करविता हा एक भगवंतच आहे. हेच गीतेतले तत्त्व तुकाराम महाराज त्यांच्या अभंगातून भक्त जनांना सांगत आहेत. ते म्हणतात, “माझ्या वाणीतून अभंगांच्या रूपात जे बाहेर येते, ते सर्व बोल पांडुरंगाचेच आहेत. बोलविता धनी तोची आहे.”
ते म्हणतात,
झाली माझी वैखरी/ विश्वंभरी व्यापक/
मोकलीने जावे बाणे/ भाता जेने वाहिला/
आता येथे कैचा तुका/ बोले सिक्का स्वामींचा/
हे जे काही शब्द माझ्या मुखावाटे बाहेर पडत आहेत, ते माझे नसून मी तर स्वामींचा शिक्का आहे. ते माझ्याकडून वदवून घेत आहेत. भात्यातून बाण जसे बाहेर पडतात, त्याचप्रमाणे माझ्या मुखावाटे शब्द बाहेर पडतात इतकेच!
पिडलेती भ्रमे/ वाटा नकळती वर्मी/
तुका म्हणे भार/ माथा टाका अहंकार//
हरीच्या भेटीची आस लागलेल्या भक्तांना
तुकाराम महाराज सांगतात की तुमच्या मनातील देहाच्या अहंकाराचा भार जेव्हा तुम्ही टाकाल, तेव्हाच तुम्हाला हरी भेटेल.
संत तुकारामांनी खालील अभंगात गीतेतून होणारा बोध भक्तांच्या निदर्शनास आणून दिला आहे.
काय दरा करील वन/ समाधान नाही जव/
(जोपर्यंत अंतःकरणात समाधान नाही, ते वासना शून्य झालेले नाही, तोपर्यंत रानात, गिरीकंदरात जाऊन तपश्चर्या करण्याचा काहीही उपयोग नाही.)
रीधता धावा पेवा मधी/ जोडे सिद्धी ते ठायी/
(धान्य काढण्याकरता पेवामध्ये घाईघाईने शिरले, तरी लगेच अन्न मिळेल का? )
काय भस्म करील राख/ अंतर पाख नाही तो/
(मुळात अंतकरण जर शुद्ध नसेल, तर अंगाला नुसती राख फासून काय उपयोग? )
वर्ण आश्रमाचे धर्म / जाती श्रम झालिया/
(वर्णाश्रम-धर्मानुसार विहित कर्म करण्याचा कंटाळा केला, तर ते कर्म वाया जाईल)
सर्व संतांना हेच सांगायचे आहे की कोणतेही कर्म उच्च किंवा नीच नसते. समाजाची घडी व्यवस्थित राहण्यासाठी खरंतर वर्णाश्रम धर्म रचना केली गेली. परंतु पुढे मात्र ब्राह्मण म्हणजे उच्च आणि शूद्र म्हणजे नीच अशी भावना लोकांच्या मनात विनाकारण निर्माण केली गेली.
गीतेत भगवंतांनी अर्जुनाला सांगितलेला कर्म संबंध विच्छेद या ठिकाणी तुकाराम महाराज साधकांना सांगत आहेत.
तेही नव्हे जे करिता काही/ ध्याता धाई तेही नव्हे/
तेही नव्हे जे जानवी जना/ वाटे मना तेही नव्हे/
त्रास मानिजे कांटाळा/ अशुभ वाचाळा तेही नव्हे/
तेही नव्हे जे भोवती भोववे/ नागवे धावे तेही नव्हे/
तुका म्हणे एकची आहे/ सहजी पाहे सहज/
याचा अर्थ असा की, हे साधका तू जे काही करशील ती भक्ती नाही, कारण त्याचा कर्तेपणा तू तुझ्याकडे घेशील. ध्यान करणाऱ्याने मूर्ती समोर ठेवून जरी ध्यान केले, तरी ती भक्ती नाही, कारण त्यात तुझा अहंकार असेल. लोकांना परमार्थ समजावणे, मनाला जे वाटेल तीही भक्ती नव्हे. एकच तत्व महत्त्वाचे आहे, मुद्दाम ठरवून काहीही कर्म करण्याचा अभिमान स्वतःकडे न ठेवता तू जर सहजपणे पाहशील तर तीच खरी भक्ती होईल.
हेच तत्व अधिक स्पष्ट करण्यासाठी तुकाराम महाराज दुसऱ्या अभंगात काय सांगतात ते आपण पाहू.
जे जे जेथे पावे/ तेथे समर्पावे सेवे/
सहज पूजा याची नावे/ गणित अभिमान/
अवघे भोगिता गोसावी/ आधी अवसानि जीवी/
तुका म्हणे सीण /न धरिता नवे भिन्न//
जीवाने जर मी करणारा आणि मी भोगणारा
असा अभिमान बाळगला नाही तर भगवंताशी द्वैत राहत नाही.
विचारा वाचून/ न पाविजे समाधान/
देह त्रिगुणांचा बांधा/ माजी नाही गुण सुधा
देवाचिये चाडे/ देवा द्यावे जेजे घडे/
तुका म्हणे होते/ बहु गोमटे उचिते//
या ठिकाणी विवेकाविषयी महाराज जनसामान्यांना सांगत आहेत. ज्या ठिकाणी विचार नसेल, विवेक नसेल, त्या ठिकाणी समाधान प्राप्त होणार नाही. प्रपंच असार आहे आणि आत्माच सार तत्व आहे, असा विवेक झाल्याशिवाय संतोष तेथे नाही. त्रिगुणात्मक अशा या शरीरात कोणताच गुण परिपूर्ण नाही. म्हणून आपण केलेले कर्म हे कोणत्याही गुणांनी(सत्व, रज, तम) युक्त असले तरी ते देवालाच अर्पण करणे आवश्यक आहे. गीतेत भगवान हेच सांगतात की पार्थ, सर्व कर्म तू मला अर्पण कर.