हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७५ – “विपदा का क्या – क्या आशय है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “विपदा का क्या – क्या आशय है...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७५ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “विपदा का क्या – क्या आशय है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जितने बेटे उतने कमरे,

कहाँ रहेगी माँ , यह भय है ।

बेशक यह बूढ़ी अम्मा का,

सुविधा वंचित कठिन समय है ॥

 

माता जो निश्चेष्ट बैठकर

देख रही करतब ।

क्या ग्यारस, रविवार दिवस –

तिथि अखरा करते सब ।

 

जिन बहुओं के होने का

वह गर्व सदा करती ।

उनकी घनाक्षरी के आगे

चकित,अचंभित ज्यों छप्पय है।

 

सुबह नाश्ता, दोपहरी हो

या फिर संध्या की ब्यालू ।

क्रम से बटे तीन हिस्सों में

पर माँ के हिस्से आलू –

 

की चीजें उस मधुमेही को

मिलती रहती हैं प्रतिदिन ।

जान सकी, पति न रहने की

विपदा का क्या – क्या आशय है॥

 

तीनों बहुयें स्वांग किया

करती हैं लोगों के आगे ।

” अम्मा जैसी सासू माँ से

भाग हमारे हैं जागे ।”

 

कोई अगर ना देखे तो

मुह फेर चली जाया करती ।

मगर लोग भी जान गये

उनका यह केवल अभिनय है ॥  

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

15 – 03 – 20 26

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ६०☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ…” ।)

☆ शेष कुशल # ६० ☆

☆ व्यंग्य – “किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ – शांतिलाल जैन 

आदाब, नमस्कार. खुशामदीद ख़वातीन-ओ-हज़रात. सुनो सुनो. सात समंदर पार का दर्दनाक किस्सा सुनो. चश्म-ए-नम कर देने वाला किस्सा सुनो. दिल चीर देने वाला किस्सा सुनो. सीना चाक न कर दे तो नाम बदल देना किस्सागो का.

यूँ तो सुने आपने अब तक किस्से बादशाहों के, शहंशाहों के, राजाओं के, महाराजाओं के, निज़ाम के, सियासी रहनुमाओं के. आज सुनिए आप किस्सा-ए-अंकल सैम और मरहूम मासूम बच्चियाँ. एक रहे आए अंकल सैम, पढ़े लिखे अंकल सैम! सभ्य अंकल सैम! समृद्ध अंकल सैम! दुनिया के चौधरी अंकल सैम! पर्शिया में निज़ाम बदलवाने निकले अंकल सैम! असली मकसद तो तेल बेचना. तेल बेचने निकले अंकल सैम! तेल कब्ज़ाने निकले अंकल सैम! तेली नंबर-वन का मिशन लिए निकले अंकल सैम! क्रूर अंकल सैम! लालच में अंधे अंकल सैम! पर्शियन ख़वातीनों को आज़ाद कराने निकले, एक सौ पैसठ बच्चियों को फ़ानी दुनिया से आज़ाद करा बैठे.

वो कैसे किस्सागो ?

ख़वातीन-ओ-हज़रात, खुलुक खुदा का, मुलुक अंकल सैम का, हुकुम ट्रंप साहेब का. हुकुम हुआ मिसाईल चलाने का. टॉमहॉक चली तो गिरी जाकर मिनाब शहर के इलेमेंट्री स्कूल पर. अल्लाह को प्यारी हो गईं डेढ़ सैंकड़ा बच्चियाँ. न डॉलर जानती थीं न पेट्रो डॉलर. न टैरिफ न बेलेंस ऑफ़ पेमेंट. मरहूम बच्चियाँ. मासूम बच्चियाँ. अम्मी-अब्बू की उम्मीदों की बच्चियाँ. उनकी अँखियों की नूर बच्चियाँ. टूटे ख्वाबों की बच्चियाँ. उनके ख्वाबों में तालीम थी. ख्वाब टीचर बनने के. ख्वाब डॉक्टर बनने के. ख्वाब साइंटिस्ट बनने के. अम्मी जैसा घर बसाने के ख्वाब. अपने हिस्से की आधी दुनिया को खूबसूरत बनाने के ख्वाब. अंकल सैम की नफ़रत, हिंसा और क्रूरता से चूर चूर ख्वाब.

ख़वातीन-ओ-हज़रात,  बच्चियों से पुरानी दुश्मनी रही आई अंकल सैम की. एक्जोटिक आईलेंड पर छोटी छोटी बच्चियों के साथ मुँह काला करके आए थे, छोटी छोटी बच्चियों के स्कूल पर मिसाईल दाग बैठे. चमड़ी का रंग सफ़ेद मगर हरकतों में मुँह काला, हाथ काले, काला ही ठहरा मन. चले थे शांति का नोबेल लेने, अबोध बालिकाओं का वध कर बैठे. मस्ती के मंज़र एपस्टीन की फाईल में, तबाही का मंज़र स्कूल के दालान में. अधजले दुपट्टे, अधखाए लंच बॉक्स, बिखरे स्कूल बेग, बिखरी पॉकेट मनी, खून से लथपथ होमवर्क की कॉपियाँ, कॉपियों में यहाँ वहाँ चितरी बे-तरतीब ड्राईंग, गुस्सैल टीचर के मुँह चिढ़ाते रेखाचित्र, जुगराफियों के तितर-बितर नक़्शे, नक्शों पर खीचीं सरहदें बदलने की ज़िद में चली टॉमहॉक मिसाईल. काँप उठी कायनात, बच्चियों की चीख से नहीं, खामोश जन्नत नशींनी से. 

हाँ तो ख़वातीन-ओ-हज़रात,  इसके बाद किस्से में रह ही क्या जाता है. अलबत्ता, जंग जारी है. जंग के किस्से ख़त्म नहीं होते… रुंध जाए गला किस्सागो का तो किस्से को विराम लेना ही होता है. अलविदा.

अरे!! रुको रुको किस्सागो, चश्म-ए-नम तो हमारी भी हैं मगर इतना तो बताते जाओ उसी समय जंबूद्वीप में क्या हुआ?

कुछ नहीं हुआ ख़वातीन-ओ-हज़रात. एक होर्डिंग खड़ा था वहाँ, अपने सीने पर बड़े बड़े हर्फ़ों में एक जागतिक नारा चस्पाँ किए – ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’.  होर्डिंग ख़ामोश खड़ा रहा.

होर्डिंग अब भी ख़ामोश है.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२ – हास्य-व्यंग्य – “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २२

☆ व्यंग्य ☆ “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर याने मास्टर” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

शिक्षक “पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर” है। लोग मानते हैं कि शिक्षक से कुछ भी कराया जा सकता है। इसे यदि आप सम्मानजनक शब्दों में कहना चाहे तो शिक्षकों को सर्वगुण सम्पन्न भी कह सकते हैं। हमारे देश का सौभाग्य है कि चाहे यहां के पुराने राजा – महाराजा रहे हों अथवा आज के सरकारी प्रमुख सभी गुणों के पारखी होने के साथ साथ गुण ग्राहक भी हैं। इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है। अब मध्यप्रदेश सरकार ने कॉलेजों के परिसरों में आवारा पशुओं के प्रवेश को रोकने का जिम्मा प्राचार्यों को सौंप दिया है। 11 मार्च 26 को भास्कर समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार के अनुसार “प्रदेश के सभी सरकारी और निजी कॉलेजों तथा विश्वविद्यालय परिसरों में आवारा पशु और कुत्तों की एंट्री रोकने के लिए उच्च शिक्षा विभाग ने निर्देश जारी किया हैं। कॉलेजों में प्राचार्य या प्रभारी प्राचार्य को नोडल अधिकारी बनाया गया है, जो परिसर की सुरक्षा करने और वहां आवारा पशुओं को रोकने की व्यवस्था सुनिश्चित करेंगे। विभाग ने निर्देश दिए हैं कि नोडल अधिकारी का नाम और मोबाइल नम्बर परिसर में प्रदर्शित किया जाए। जरूरत पड़ने पर स्थानीय निकायों से सहयोग लिया जाए। समाचार बड़ा है अंत में क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालकों को सभी कॉलेजों में इन निर्देशों के पालन की जांच कर रिपोर्ट भेजने के लिए कहा गया है। बताया गया कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के एक प्रकरण में दिए गए निर्देशों के पालन में जारी किया गया है। लोग कहते हैं कि शिक्षक ठान ले तो क्या नहीं कर सकता ? जो सभ्यता – संस्कृति, देश और सरकार तक को बना और बिगाड़ सकता है क्या वह कालेज और विश्वविद्यालय के परिसरों से आवारा पशुओं, कुत्तों को नहीं भगा सकता क्या ? यहां विचारणीय यह है कि आवारा पशुओं को परिसरों से किस विधि से भगाया जाए, परिसर में “पशुओं का प्रवेश वर्जित” लिखे पोस्टर लगाने या उन्हें सम्मान पूर्वक भगाने से तो वे नहीं भागेंगे। उन्हें हट – हट कहते हुए भगाया जाए, छड़ी या डंडा दिखाकर अथवा मारकर  भगाया जाए आखिर परिसर में अवैध घुसपैठ करने वाले पशुओं को कैसे भगाया जाए, इसका उल्लेख सरकारी निर्देश में नहीं किया गया है। कुछ कालेज प्राचार्य भयभीत हैं कि यदि वे अपने सोचे किसी तरीके से आवारा पशुओं को भगाते हैं और यदि वह तरीका उन आवारा पशुओं के पालकों, पशु प्रेमियों अथवा सरकार को पसंद नहीं आता तब क्या होगा ?

अतः कुछ कॉलेजों के प्राचार्य स्टाफ मीटिंग करके, कुछ प्राचार्य क्षेत्रीय समाजसेवियों – नेताओं से विचार विमर्श करके आवारा पशुओं को परिसरों से भगाने का सर्वमान्य तरीका खोजना चाह रहे हैं। सरकारी आदेशों – निर्देशों को अपने चातुर्य से लंबे समय तक लटकाए रखने में  माहिर एक प्राचार्य ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि वे इस सरकारी आदेश पर सरकार से यह मार्गदर्शन मांगने पत्र भेज रहे हैं कि आवारा पशुओं को भगाने के लिए कौन – कौन से उपाय किए जा सकते हैं। किसी प्रकार का विवाद होने की स्थिति में नोडल अधिकारी के पास क्या विशेषाधिकार होंगे आदि – आदि।

मैं यह लिख ही रहा था कि आवारा कुत्तों पर नियंत्रण संबंधी नगर पालिका निगम, जबलपुर के सहायक आयुक्त सह स्वास्थ्य अधिकारी का एक पत्र भी वाट्स एप पर देखने मिला। इसे पढ़कर लगा कि शायद सुप्रीम कोर्ट के डर से आवारा पशुओं, कुत्तों आदि पर नियंत्रण को लेकर शासन – प्रशासन की नींद खुल गई है। नगर निगम ने समस्त शासकीय – अशासकीय शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मेडिकल कॉलेज, खेल स्टेडियमों, बस स्टेंडों, रेलवे स्टेशनों आदि को आवारा पशुओं, कुत्तों से मुक्त रखने नोडल अधिकारी नियुक्त करने दिशा निर्देश जारी किए हैं। परिसरों की बाउंड्रीवाल बनवाने – सुधारने, गेट लगाने/सुधारने, साफ सफाई रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। तीन माह में नगर निगम कमेटी सभी जगह निरीक्षण करके सुनिश्चित करेगी कि सब ठीक चल रहा है। कुछ हो न हो बाउंड्रीवाल और गेट आदि बनवाने/ सुधरवाने के टेंडर तो हो ही जाएंगे। इसमें कमीशन बाजी का अंदेशा तो है ही। अब आगे तीन माह बाद तब लिखूंगा जब नगर निगम का एक निरीक्षण हो जाएगा।

यहां एक बात और विचारणीय है कि जब इन परिसरों में आराम फरमा रहे आवारा पशुओं को सड़कों पर खदेड़ा जाएगा तब राहगीरों की सुरक्षा का क्या होगा। पुलिस आवारा पशुओं का चालान कटेगी क्या ?

 

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆ # “परीक्षा…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता परीक्षा…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५६ ☆

☆ # “परीक्षा…” # ☆

जीवन के हर मोड़ पर

हर पल हर क्षण

विधाता परीक्षा लेता है

एक सबक सबको देता है

छोटा हो या बड़ा

गरीब हो या अमीर

सबको एक मौका देता है

बचपन में पाठशाला होती है

मिडिल स्कूल होती है

उसके बाद हायर सेकेंडरी

उसके बाद कॉलेज में

आगे की पढ़ाई होती है

कॉलेज से निकलकर

जीवन के  अथाह सागर में

आपके ज्ञान की

तजुर्बा और

स्किल की आजमाइश होती है

स्पर्धा के इस युग में

गला काट प्रतियोगिता होती है

कुछ पास होते हैं

कुछ फेल होते हैं

दृढ़ निश्चय  वाले

निराशा में संयम नहीं खोते हैं

कई बार प्रयास करते हैं

कभी जीत तो कभी हार होती है

संघर्ष के इस दौर में

मेहनत और संकल्प से

हर कठिनाई पार होती है

ज्ञान के सागर की कोई सीमा नहीं है

ज्ञान प्राप्त करने का कोई फार्मूला

कोई तेज या कोई धीमा नहीं है

बस लगन, कड़ी मेहनत और समर्पण ही जरूरी है

इसके बिना लक्ष्य प्राप्त करने की जिद अधूरी है

यह आपके जीवन के हर ध्येय की समीक्षा है

जीवन भर हर व्यक्ति को कदम कदम पर देनी पड़ती परीक्षा है /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९९ – शब्द अनमोल… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता शब्द अनमोल।)

☆ अभिव्यक्ति # ९९ ☆ शब्द अनमोल☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

शब्दों से ही रूठे तुम,

शब्दों से ही मना लिया,

शब्द कितने घातक हैं,

शब्दों से ही बता दिया,

*

शब्द मरहम बनते हैं,

शब्द ही घाव देते हैं,

बोल से पहले सोचिए,

शब्द ही लगाव देते हैं,

*

जब इंसान लड़ते हैं,

शब्द मुस्कराते हैं,

शब्दों के तीर चलते हैं,

शब्द ही लहराते हैं,

*

तोल मोल कर बोलिए,

जब भी बोलें बोल,

शब्द तब ही बोलिए,

जब मौन से हों अनमोल.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ “जगातले सर्वात श्रीमंत मुख्याध्यापक…” – लेखक : अज्ञात ☆ शोभा जोशी ☆

शोभा जोशी 

? वाचताना वेचलेले ?

☆ “जगातले सर्वात श्रीमंत मुख्याध्यापक…” – लेखक : अज्ञात ☆ शोभा जोशी

“सरू, चाळीस वर्षं… तब्बल चाळीस वर्षं रक्ताचं पाणी केलं ग मी या पोरांसाठी! स्वतःच्या लेकरावाणी जपलं एकेकाला. पण आज माझा शाळेतला शेवटचा दिवस होता. निरोप समारंभ तर सोडाच, पण एकानेही साधं १ रुपयाचं गुलाबाचं फूलही दिलं नाही ग. मी काय कमी पडलो होतो का ग शिकवायला? का आजकालच्या पोरांच्या काळजात पाझरच उरला नाही? “

देसाई सर सोफ्यावर बसून लहान मुलासारखे धाय मोकलून रडत होते आणि त्यांची बायको त्यांना निमूटपणे सावरत होती.

​​देसाई सर… जिल्हा परिषदेच्या शाळेचे मुख्याध्यापक. शिस्तीचे पक्के, पण मनाने मेणासारखे मऊ. हातातल्या छडीचा मार आणि डोळ्यातलं प्रेम, दोन्हीही विद्यार्थ्यांनी अनुभवलं होतं. आज ३१ मार्च. देसाई सरांच्या रिटायरमेंटचा (सेवानिवृत्तीचा) दिवस.

सकाळपासून देसाई सर आरशासमोर उभे राहून तयारी करत होते. त्यांनी आपली जुना पण कडक इस्त्री केलेला पांढरा शुभ्र शर्ट आणि खाकी पॅन्ट घातली होती. मनात एक वेगळीच हुरहुर होती.

“आज नक्कीच शाळेत मोठा कार्यक्रम असेल. सगळी जुनी पोरं येतील, भाषणांवर भाषणं होतील, गळ्यात हारांचे ओझे असेल… ” या विचारानेच त्यांचे डोळे पाणावले होते.

​सर शाळेत पोहोचले. पण हे काय? शाळेचं फाटक उघडंच होतं, पण तिथे ना फुलांची सजावट होती, ना मंडप टाकला होता. पटांगण सुनं सुनं होतं. सर ऑफिसमध्ये गेले.

सहकारी शिक्षकांनी “गुड मॉर्निंग सर” म्हटलं आणि आपापल्या कामाला लागले. शिपाई रामूकाकासुद्धा नेहमीसारखेच चहा घेऊन आले.

देसाई सरांना वाटलं, ‘कदाचित सरप्राइज असेल. दुपारपर्यंत तयारी करतील. ‘

​दुपार झाली, शाळा सुटायची वेळ झाली. पण काहीच हालचाल नाही. शेवटची घंटा वाजली. मुलं दप्तरं घेऊन पळाली. शिक्षकांनी रजिस्टरवर सह्या केल्या आणि “सर, येतो आम्ही, निवांत भेटा आता, ” असं रुक्षपणे म्हणून निघून गेले.

देसाई सर आपल्या खुर्चीतून उठले. त्यांनी त्या रिकाम्या वर्गांकडे पाहिलं. भिंतीवरचे फळे, ती बाकडी… सगळं काही शांत होतं. त्यांच्या गळ्यात हुंदका दाटून आला. ‘ज्या शाळेला मी मंदिर मानलं, तिथे आज माझ्या जाण्याने कुणालाच काही फरक पडत नाही? ‘

जड पावलांनी, मान खाली घालून सर शाळेबाहेर पडले. रस्ताभर त्यांना लोकांचे चेहरा बघवत नव्हते. त्यांना वाटत होतं, आपण आयुष्यभर फुकट राबलो. कुणालाच कदर नाही.

​घरी येताना त्यांच्या डोक्यात एकच विचार चक्रावून गेला – ‘कर्ज’.

०देसाई सरांनी मुलीच्या लग्नासाठी आणि घराच्या दुरुस्तीसाठी बँकेतून ५ लाखांचे कर्ज काढले होते.

पेन्शनमधून अर्धे पैसे जाणार होते. म्हातारपण कसं जाईल, या चिंतेने त्यांना ग्रासलं होतं. पण त्याहीपेक्षा जास्त दुःख होतं ते ‘उपेक्षेचं’.

​घरी आल्यावर त्यांनी पत्नीसमोर मन मोकळं केलं आणि रडू लागले. तेवढ्यात दारावरची बेल वाजली.

सरांनी डोळे पुसले आणि दार उघडलं. समोर पोस्टमन उभा होता.

“देसाई साहेब, बँकेतून पत्र आलंय. अर्जंट आहे, सही करा. “

सरांच्या पोटात गोळा आला. ‘नक्कीच कर्जाच्या हप्त्याची नोटीस असेल. रिटायर झालो नाही, तोच बँकेने तगादा लावला, ‘ असं वाटून त्यांनी थरथरत्या हाताने पाकीट घेतलं.

​ते सोफ्यावर बसले आणि त्यांनी पाकीट फोडलं. आत बँकेचं अधिकृत पत्र आणि एक दुमडलेला कागद होता.

सरांनी बँकेचं पत्र वाचायला सुरुवात केली आणि… वाचता वाचता त्यांचे डोळे विस्फारले. त्यांचा स्वतःच्या डोळ्यांवर विश्वास बसेना. त्यांनी चष्मा पुसून पुन्हा वाचलं.

त्यात स्पष्ट लिहिलं होतं – “श्री. देसाई सर, तुमचे घराचे ५, ००, ००० (पाच लाख) रुपयांचे गृहकर्ज आज दिनांक ३१ मार्च रोजी पूर्णपणे परतफेड (Nil/Closed) करण्यात आले आहे. आता बँकेची तुमच्यावर कोणतीही देणी बाकी नाहीत. “

​सर गोंधळले. “हे कसं शक्य आहे? मी तर पैसे भरलेच नाहीत. “

त्यांनी तो सोबतचा दुसरा कागद उघडला. ते एक हाताने लिहिलेलं पत्र होतं.

​पत्र:

“आदरणीय देसाई सर,

आम्हाला माहीत आहे, आज तुम्ही शाळेतून रिकाम्या हाताने आणि जड अंतःकरणाने घरी गेलात. तुम्हाला वाटलं असेल की तुमच्या विद्यार्थ्यांची आठवणशक्ती कमी झाली आहे. पण सर, तुमची शिकवण आम्ही विसरलो नाही.

आम्ही सर्वांनी (तुमच्या आजी-माजी विद्यार्थ्यांनी आणि सहकारी शिक्षकांनी) मिळून ठरवलं होतं की, तुम्हाला हार-तुरे, शाल-श्रीफळ आणि पेढे देऊन तुमचा सत्कार करायचा नाही. त्या हार-फुलांची किंमत दोन दिवसात कोमेजून जाते.

त्याऐवजी आम्ही गेल्या सहा महिन्यांपासून ‘गुप्त वर्गणी’ जमा करत होतो. त्यात आम्हां विद्यार्थ्यांसोबत शाळेतल्या सगळ्या शिक्षकांनी, शिपायांनी आणि मुख्य म्हणजे तुमच्या मार्गदर्शनाखाली मोठमोठ्या पदावर असलेल्या तुमच्या माजी विद्यार्थ्यांनी तर खूप मदत केली. आम्हाला माहीत होतं की तुमच्या डोक्यावर कर्जाचं ओझे आहे आणि निवृत्तीनंतर तुम्हाला त्याची काळजी सतावणार आहे.

म्हणून, तुमच्या निवृत्तीच्या दिवशी, आम्ही तुम्हाला ‘ताणमुक्त’ आयुष्य भेट देत आहोत.

सर, तुम्ही आम्हाला घडवलंत, आता तुमचं म्हातारपण सुखात जावं, हीच आमची खरी गुरुदक्षिणा!

तुमच्यावर प्रेम करणारी… तुमची ‘कृतघ्न’ वाटलेली पोरं! “

​पत्राखाली शेकडो विद्यार्थ्यांच्या सह्या होत्या.

देसाई सर स्तब्ध झाले. त्यांच्या हातातून कागद गळून पडला.

तेवढ्यात घराबाहेर “देसाई सर आगे बढो, हम तुम्हारे साथ है! ” अशा घोषणा ऐकू आल्या.

सरांनी खिडकीतून बाहेर पाहिलं. संपूर्ण गल्लीत त्यांचे शेकडो विद्यार्थी, शिक्षक आणि गावकरी उभे होते. कुणी ढोल वाजवत होतं, तर कुणी डोळ्यात पाणी आणून बघत होतं.

​देसाई सर धावत बाहेर आले. त्यांनी कोणा एकाला नाही, तर समोरच्या गर्दीला हात जोडले आणि गुडघे टेकून जमिनीवर डोकं ठेवलं.

त्यांच्या डोळ्यातून आज दुःख नाही, तर अपार कृतज्ञतेचे अश्रू वाहत होते.

त्यांना उमजलं होतं – ‘माणसं जोडली की पैसा गौण ठरतो. हार गळ्यात नाही, तर लोकांच्या हृदयात असावा लागतो. ‘

आज देसाई सर जगातले सर्वात श्रीमंत मुख्याध्यापक होते.

लेखक : अज्ञात 

प्रस्तुती :  शोभा जोशी

कार्यकर्ती, जनजाती कल्याण आश्रम, पुणे महानगर. 

मो ९४२२३१९९६२ 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२७ ☆ व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – भुल्लन भैया की मूर्ति इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३२७ ☆

☆ व्यंग्य ☆ भुल्लन भैया की मूर्ति

हमारे शहर के रत्न भुल्लन भैया जन-जन के हृदय में निवास करते रहे। दो बार भारी बहुमत से एमैले का चुनाव जीते। चुनाव के समय दारू, कंबल, पैसे का मुक्त-हस्त से वितरण करते थे।उसके बाद भी कोई विरोध करे तो हाथ में डंडा या जूता धारण कर नये अवतार में प्रकट होते थे। उनके चेलों-चांटों की संख्या विशाल रही। पार्टी में ऊपर तक उनकी रसाई थी।

एक रात मित्रों के साथ ‘गीली’ पार्टी में हिस्सा लेकर लौटते भुल्लन भैया की कार एक नाले में प्रवेश कर गयी। ड्राइव करने वाला उनका मित्र भी सुरा के सुरौधे में था। परिणामत: दोनों ही स्वर्ग या नरक की राह पर निकल गये।

शहर में खबर फैलते ही खलबली मच गयी। बड़े-बड़े नेता भुल्लन भैया के संभावनाशील सुपुत्र लल्लन को धीरज बंधाने आने लगे। लल्लन भैया हिलक हिलक कर कहते थे, ‘ऐसे बिना बोले बताये चले गये। हम कुछ सेवा नहीं कर पाये।’ भुल्लन भैया के क्रिया-कर्म में भारी भीड़ उमड़ी। कई चेले आंसू बहाते और सस्वर विलाप करते देखे गये।

चुनाव-क्षेत्र में स्वर्गीय भुल्लन भैया का असर देखकर पार्टी ने लल्लन भैया को उनके पिताजी के स्थान पर स्थापित करने के प्रयास शुरू कर दिये। जल्दी ही लल्लन भैया में भी उनके स्वर्गवासी या नरकवासी पिता के गुण प्रकट होने लगे। मुहल्ले में उनकी अघोषित सल्तनत कायम हो गयी।

पिताजी के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करने के लिए लल्लन भैया ने जल्दी ही घोषणा की कि पास के चौराहे पर स्वर्ग या नरक वासी उनके पिताजी की विशाल मूर्ति लगेगी। धन्नासेठों से चन्दा इकट्ठा होने लगा। अपने रसूख और ताकत का इस्तेमाल कर लल्लन भैया ने जल्दी ही इतना धन इकट्ठा कर लिया जो मूर्ति के अलावा उनके चुनाव अभियान और दीगर खर्चों में काम आ सके। राजस्थान के एक कलाकार को मूर्ति का ऑर्डर दे दिया गया।

तीन-चार महीने में मूर्ति बनकर आ गयी। लल्लन भैया ने उसे चौराहे पर ऊंचे आधार पर स्थापित करवा दिया। मूर्ति के नीचे आठ दस पंक्तियों में भुल्लन भैया के गुणों और उपलब्धियों का बखान कर दिया गया। सिर्फ एक तरफ का पत्थर खाली रहा जिस पर मूर्ति के अनावरण का ब्यौरा और तारीख लिखी जानी थी। इसके बाद अनावरण के इंतज़ार में मूर्ति को पूरी तरह कपड़े से ढंक दिया गया।

इसके बाद लल्लन भैया अड़ गये कि उनके यशस्वी पिता की मूर्ति का अनावरण ‘राश्टपति’ या ‘उपराश्टपति’ के कर-कमलों से होगा, अन्यथा मूर्ति ऐसे ही ढंकी-मुंदी खड़ी रहेगी। नगर के सांसद महोदय को चेतावनी दे दी गयी कि उपरोक्त विभूतियों को बुलाने का इंतज़ाम करें, अन्यथा स्वर्गीय भुल्लन भैया के चुनाव-क्षेत्र में पार्टी के लिए सूखा पड़ जाए तो लल्लन भैया को दोष न दिया जाए। सांसद महोदय सांसत में पड़ गये। दिल्ली तक फोन बजने लगे। अंततः सांसद महोदय उपराष्ट्रपति जी की मंज़ूरी लेने में सफल हो गये।

उपराष्ट्रपति जी पधारे। अनावरण का कार्यक्रम शानदार संपन्न हुआ। लल्लन भैया फूले फूले घूमते थे। कार्यक्रम में उन्होंने एक पढ़े- लिखे दोस्त से लिखवाया हुआ स्वागत-भाषण पढ़ा, लेकिन पढ़ने में उनकी गाड़ी वैसे ही अटकने लगी जैसे किसी मोटर के आगे गड्ढे आने से अटकती है। उन्होंने दांत-दर्द का बहाना करके भाषण का कागज उसे लिखने वाले दोस्त को ही पकड़ा दिया। बाद में उन्होंने दोस्त को उलाहना दिया— ‘जरा ढंग का लिखते जो हम पढ़ सकते। इतने बड़े लोगों के सामने हमारी ‘इंसल्ट’ करा दी।’

अनावरण संपन्न हो गया। उपराष्ट्रपति जी के कार्यक्रम पर करदाता के कुल दो-तीन करोड़ खर्च हुए, जिसका लल्लन भैया गर्व से बखान करते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य क्षणिका# ९८ – तकदीर… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य क्षणिका “– तकदीर…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य क्षणिका # ९८  — तकदीर — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(रिश्तों पर आधारित मेरी एक भावनात्मक सोच)

उसने जीवन पर्यंत अपनी तकदीर की तुलना अमावस से की। उसके पास न कभी ठीक से पैसा आया और न सेहत उस पर कृपालु हुई। यही उसकी तकदीर को अंधेरे पक्ष में ढालता था। परंतु आज उसके लिए तकदीर की परिभाषा बदल रही थी। उसके अपने बेटे – बेटियाँ उसके कंठ में पानी डाल रहे थे। सब की आँखों में उसके लिए मोह की आभा थी। पत्नी रो कर कह रही थी मत जाओ! उसने अपनों का यह संसार तकदीर से ही तो पाया था। बंद होती उसकी आँखों की अंतिम भाषा में लिखा हुआ था, — “इतनी तकदीर तुम्हारे पास थी और तुम यही पहचान न पाए थे।”

© श्री रामदेव धुरंधर

14 – 03 — 2026

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२७ – सार्थक ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२७ ☆ सार्थक… ?

जीवन मानो एक दौड़ है। जिस किसी से पूछो, कहता है; वह दौड़ना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है। फिर बताता है कि अब तक जीवन में कितना आगे बढ़ चुका है। अलबत्ता कभी विचार किया कि आगे यानी किस ओर बढ़ रहे हैं? मनुष्य प्रतिप्रश्न दागता है कि यह कैसा निरर्थक विचार है? स्वाभाविक है कि जीवन की ओर बढ़ रहे हैं। सच तो यह है कि प्रश्न तो सार्थक ही था पर मनुष्य का उत्तर नादानी भरा है। जीवन की ओर नहीं बल्कि मनुष्य मृत्यु की ओर बढ़ रहा होता है।

भयभीत या अशांत होने के बजाय शांत भाव से तार्किक विचार अवश्य करना चाहिए। मनुष्य चाहे न चाहे, कदम बढ़ाए, न बढ़ाए, पहुँचेगा तो मृत्यु के पास ही। मनुष्य के वश में यदि पीछे लौटना होता तो वह बार-बार लौटता, अनेक बार लौटता, मृत्यु तक जाता ही नहीं, फिर लौट आता, चिरंजीवी होने का प्रयास करता रहता।

स्मरण रखना, मृत्यु का कोई एक गंतव्य नहीं है,  बल्कि यात्रा का हर चरण मृत्यु का स्थान हो सकता है, मृत्यु का अधिष्ठान हो सकता है। विधाता जानता है मनुष्य की वृत्ति, यही कारण है कि कितना ही कर ले जीव, पीछे लौट ही नहीं सकता। जिज्ञासा पूछती है कि लौट नहीं सकते तो विकल्प क्या है? विकल्प है, यात्रा को सार्थक करना।

सार्थक जीने का कोई समय विशेष नहीं होता। मनुष्य जब अपने अस्तित्व के प्रति चैतन्य होता है, फिर वह अवस्था का कोई भी पड़ाव हो, उसी समय से जीवन सार्थक होने लगता है।

एक बात और, यदि जीवन में कभी भी, किसी भी पड़ाव पर मृत्यु आ सकती है तो किसी भी पड़ाव पर जीवन आरंभ क्यों नहीं हो सकता? इसीलिए कहा है,

कदम उठे,

यात्रा बनी,

साँसें खर्च हुईं

अनुभव संचित हुआ,

कुछ दिया, कुछ पाया

अर्द्धचक्र पूर्ण हुआ,

भूमिकाएँ बदलीं-

शेष साँसों को

पाथेय कर सको

तो संचय सार्थक है

अन्यथा

श्वासोच्छवास व्यर्थ है..!

ध्यान रहे, जीवन में वर्ष तो हरेक जोड़ता है पर वर्षों में जीवन बिरला ही फूँकता है। आपका बिरलापन प्रस्फुटन के लिए प्रतीक्षारत है।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २७१ – ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७१ ☆

☆ ग़ज़लिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

जमाना जान गया पर मुझे पता ही नहीं

हुआ है इश्क़ अगर तो हुई ख़ता भी नहीं

.

अदाएँ देख अगर दिल हुआ दिवाना तो

जुनूने-इश्क से डरना कोई वजह तो नहीं

.

किया नहीं था, हुआ जो वो हो गया खुद ही

पता नहीं कि किया इश्क़ या किया ही नहीं

.

जिधर भी देखता तस्वीर एक ही दिखती

नहीं बाहर है कहीं दिल में वो बसा तो नहीं

.

नहीं वजूद रहा उससे अब अलग जब से

कहूँ कैसे कि कुछ हुआ तो पर हुआ ही नहीं

.

नदी की धार है वो घाट हूँ मैं ठहरा सा

जुदा होकर भी कभी मैं हुआ जुदा ही नहीं

.

कहो मत नाखुदा किस्सा-ए-इश्क को लोगों!

करे सजदा ‘सलिल’ उसको जो है खुदा भी नहीं

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१४-३-२०२६

संपर्क:

१. विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

२. ए ५०३ रुद्राक्ष, भोपाल

 

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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