हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ वंदेमातरम् : औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़ ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – वंदेमातरम् : औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़।)

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय

☆ आलेख – वंदेमातरम् : औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़ ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

साहित्य केवल मनोरंजन या सौन्दर्य की अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं होता,वह इतिहास के निर्णायक क्षणों में समाज व राष्ट्र के अंतर्मन को भी स्वर प्रदान करता है। भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में साहित्य ने इसी प्रकार राष्ट्रीय चेतना के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 07 नवम्बर 1875 ई० को बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित राष्टगीत ‘ वंदेमातरम् ‘ साहित्यिक पत्रिका ‘ बंग दर्शन ‘ में प्रकाशित हुआ था तदन्तर सन् 1882 ई० में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘ आनंदमठ ‘ में शामिल किया गया था। सन् 1896 ई० में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में संगीत के साथ गाया था। सन् 1905 ई० में बंग-भंग विरोधी आंदोलन में यह व्यापक राजनीतिक उद्घोष बन गया और संविधान सभा द्वारा स्वतन्त्रता के पश्चात् 24 जनवरी 1950 ई० को इसे राष्ट्रगीत का दर्ज़ा दिया गया। उन्नीसवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक शोषण और सामाजिक-सांस्कृतिक संक्रमण से गुजर रहा था। अंग्रेजी शासन ने प्रशासनिक और राजनीतिक  नियंत्रण के साथ-साथ ऐसी औपनिवेशिक दृष्टि भी विकसित की, जिसमें भारतीय समाज को पिछड़ा और अक्षम सिद्ध करने की प्रवृत्ति दिखाई देती थी। ऐसे संक्रमणशील वातावरण में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने उपन्यास, निबंध और कविता के माध्यम से भारतीय समाज के सम्मुख उसकी सांस्कृतिक शक्ति और आत्मबोध के प्रश्न रखे। ‘ वंदेमातरम् ‘ इसी वैचारिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण परिणाम था।

‘वंदेमातरम्’ की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक विशेषता मातृभूमि का मानवीकरण है। माता का सम्बोधन राष्ट्र के साथ भावनात्मक सम्बन्ध स्थापित करता है। उन्होंने राष्ट्र को केवल भौगोलिक भूखण्ड न मानकर भावनात्मक,सांस्कृतिक और नैतिक सम्बन्ध में रूपांतरित किया। मातृभूमि के प्रति ये श्रद्धा का भाव धीरे-धीरे औपनिवेशिक शासन के प्रति असहमति और स्वतंत्रता की आकांक्षा से जुड़ गया। इस राष्ट्रगीत में  प्रकृति और राष्ट्र एक-दूसरे के पूरक हैं। धरती मातृरूप में आती है, हरे-भरे खेत राष्ट्र  समृद्धि का संकेत बनते हैं, जल जीवन और उर्वरता का प्रतीक बनता है, वायु स्वतंत्र और जीवंत जीवन का बिम्ब बनती है ,शक्ति और सौन्दर्य राष्ट्र की सामर्थ्य तथा सांस्कृतिक गरिमा को व्यक्त करते हैं। इस प्रकार प्रकृति वर्णन राजनीतिक अर्थ ग्रहण करता है। जिस भूमि पर विदेशी सत्ता का अधिकार है,वही भूमि साहित्य में माता के रूप में प्रतिष्ठित होती है। यही परिवर्तन औपनिवेशिक सत्ता की वैधता के सामने एक सांस्कृतिक प्रतिप्रश्न उपस्थित करता है। वंदेमातरम् का उद्घोष इसलिए भी प्रभावशाली बना क्योंकि वह तर्क से पहले संवेदना को सम्बोधित करता था। वह व्यक्ति को नागरिक या प्रजा के रूप में नहीं अपितु मातृभूमि की संतान के रूप में देखने की प्रेरणा देता था। यही साहित्यिक रणनीति उसे जनचेतना में गहराई तक ले गई। आनंदमठ उपन्यास में भी मातृभूमि की कल्पना राष्ट्रीय मुक्ति के विचार से जुड़ती है परिणामस्वरूप वंदेमातरम् केवल गीत न रहकर कथा के वैचारिक वातावरण का प्रतिनिधि बन पाता है। साहित्य की यही शक्ति है कि वह विचार को पात्रों,घटनाओं,प्रतीकों और भावनाओं के माध्यम से पाठक को अनुभव का हिस्सा बना देता है।

     सन् 1896 ई०को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा संगीत के साथ वंदेमातरम् का गायन एक महत्वपूर्ण घटना है,जिसने इस गीत को केवल साहित्यिक पाठक वर्ग तक सीमित नहीं रखा अपितु वह राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर पहुँच गया। महान कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर का गायन इस गीत के साहित्यिक व सांस्कृतिक प्रभाव को विस्तृत करता है, संगीत ने स्मरणीय बनाया, सामूहिक गायन ने इसे सामाजिक अनुभव में बदल दिया। इसी प्रकार 1905 ई० में बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना थी,जिसमें वंदेमातरम् एक प्रभावशाली प्रतिरोध उद्घोष के रूप में सामने आया। 07 अगस्त 1905 ई०को वंदेमातरम् का राजनीतिक नारे के रूप में प्रयोग हुआ और अक्टूबर 1905 ई०में इसके प्रसार के लिए ‘ वंदेमातरम् सम्प्रदाय ‘ जैसी संस्था बनी, जिसके सदस्य प्रभात फेरियों में इसे गाते थे। इन गतिविधियों के कारण यह गीत जनसंस्कृति का हिस्सा बन गया। यही सामूहिकता औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध जनमनोबल का आधार बनी। गीत से उद्घोष बनने की यात्रा में वंदेमातरम् की भाषिक संक्षिप्तता और भावनात्मक तीव्रता की विशेषता भी है,जिसके कारण छोटा-सा उद्घोष सामूहिक भावनाओं को व्यक्त करने में सक्षम हुआ। जब कोई व्यक्ति अकेले वंदेमातरम् गाता है तो वह अपनी मातृभूमि के प्रति सम्मान व्यक्त करता है और जब हजारों लोग उद्घोष करते हैं तो वही शब्द सामूहिक अस्मिता का प्रतीक बन जाता है। धीरे-धीरे यही गीत स्वतंत्रता आन्दोलन की पहचान से जुड़ गया।

      अंतत: हम कह सकते हैं कि साहित्य प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्यवाही का विकल्प नहीं होता किन्तु वह उन भावनाओं और विचारों को जन्म दे सकता है, जिनसे सामाजिक परिवर्तन की ऊर्जा उत्पन्न होती है। एक राजनीतिक आंदोलन को केवल संगठन नहीं बल्कि साझा कल्पना की भी आवश्यकता होती है। वंदेमातरम् ने भारत की ऐसी कल्पना प्रस्तुत की, जिसमें राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई था। औपनिवेशिक शासन के सामने प्रतिरोध करने के लिए केवल राजनीतिक संगठन पर्याप्त नहीं था। जनता के भीतर यह विश्वास उत्पन्न करना भी आवश्यक था कि वह स्वयं को बदल सकती है और स्वतंत्र भविष्य की कल्पना कर सकती है। वंदेमातरम् ने इसी मनोवैज्ञानिक स्तर पर प्रभाव डाला और औपनिवेशिक प्रतिरोध की साहित्यिक आवाज़ बन गया। मातृभूमि की प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सामूहिकता,स्वतंत्रता की आकांक्षा तथा भारत को हीन मानने वाली दृष्टि के सामने भारतीय आत्मसम्मान को स्थापित करना आदि अनेक प्रतिरोध के आयाम हैं। इन तत्वों ने ही स्वतंत्रता आन्दोलन की सांस्कृतिक भाषा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया था। इस प्रकार वंदेमातरम् भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन का केवल एक गीत ही नहीं था अपितु उस युग के आत्मसम्मान, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्रता आकांक्षा की साहित्यिक अभिव्यक्ति था।

■

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समय का फेर… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समय का फेर… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

जो बोया

लहलहा रहा है,

समय का फेर

समझ आ रहा है,

ताउम्र निगले जिसने

हरदम सूरज,

जुगनू की रोशनी में

अब दिन बिता रहा है

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६८ ☆ तीरगी शब की मिटाना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तीरगी शब की मिटाना है …“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६८ ☆

✍ तीरगी शब की मिटाना है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

आप सब बीती बनाएंगे चले जायेंगे

दर्द के गीत सुनाएंगे चले जायेंगे

*

हम है मज़दूर मुक़द्दर में है अपने झुग्गी

आपके घर को बनाएंगे चले जायेंगे

*

राहबर आज के हमराह न होने वाले

राह दुश्वार बताएंगे चले जायेंगे

*

आना जाना है लगा चार दिनों का मेला

सिलसिला हम भी निभाएंगे चले जायेंगे

*

ग़म ख़ुशी ज़ीस्त में आते है सदा महमाँ से

फ़िक़्र क्यों पैर टिकाएंगे चले जायेंगे

*

तीरगी शब की मिटाना है तो महताब उगा

ज़ोम बस जुगनू दिखाएंगे चले जायेंगे

*

एक तवायफ़ की न लाचारी को समझे कोई

लोग बस वक़्त बिताएंगे चले जायेंगे

*

पैरहन जिस्म किराए से मिला है सबको

मालिके रूह बुलाएंगे चले जायेंगे

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १४० – महिला कल्याण विभाग – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – महिला कल्याण विभाग।)  

☆  चुभते तीर # १४० – व्यंग्य  – महिला कल्याण विभाग ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

विकास भवन के महिला सशक्तीकरण प्रकोष्ठ के बाहर पीपल के पुराने चबूतरे पर बहत्तर साल की कौशल्या देवी हर बुधवार सुबह ठीक दस बजे आकर बैठ जाती थीं। उनकी कांपती गोद में लोहे की एक पुरानी सिलाई मशीन का जंग लगा गोल पहिया और बिना धागे की एक मुड़ी हुई सुई हमेशा रखी रहती थी। दफ़्तर का नया चपरासी जब भी उन्हें धूप में बैठा देखता तो चाय का कुल्हड़ मेज़ पर रखते हुए ठहाका लगाकर कहता कि “अम्मा जब आज छब्बीस अगस्त को महिला समानता दिवस के मौके पर बड़े साहब खुद नई सिलाई मशीनें और चेक बांटने आ रहे हैं तो इस लोहे के कबाड़ वाले पहिये को रोज़ अपनी छाती से लगाकर यहाँ अफ़सरों के आगे क्या तमाशा खड़ा करती हो।” कौशल्या देवी अपनी पुरानी धुंधली ऐनक को धोती के छोर से साफ करतीं और बहुत धीमी आवाज में मुस्कुराकर कहतीं कि “बेटा यह लोहे का गोल पहिया केवल कबाड़ नहीं है बल्कि इस पूरे महिला कल्याण विभाग की वो टूटी हुई धुरी है जिसने मेरी बेटी के स्वाभिमान को कागज़ों की स्याही में हमेशा के लिए दफ़न कर दिया है।” आसपास खड़े तमाम मुंशी और क्लर्क उनका उपहास उड़ाते हुए कहते कि “लगता है इस बुढ़ापे में अम्मा की मति मारी गई है जो समानता दिवस के पावन उत्सव को अपनी हठ की भेंट चढ़ाने चली आई हैं।” कौशल्या देवी किसी की बात का तनिक भी मलाल किए बिना उस लोहे के पहिये को अपनी कांपती उंगलियों से सहलातीं और चुपचाप गाड़ियों के काफिले का इंतज़ार करती रहती थीं।

महिला कल्याण विभाग के तमाम बाबू और अधिकारी कौशल्या देवी की इस साप्ताहिक मूक उपस्थिति से पूरी तरह वाकिफ थे और उन्हें एक सनकी वृद्धा मानकर पूरी तरह अनदेखा कर देते थे। दफ़्तर का बड़ा बाबू जब भी फाइलों का पुलिंदा लेकर निदेशक के केबिन की तरफ बढ़ता तो कौशल्या देवी बहुत उम्मीद से अपनी लाठी के सहारे खड़ी हो जातीं और हाथ जोड़कर कहतीं कि “बाबू जी क्या आज उस स्वरोज़गार अनुदान और सुरक्षा वाले कागज़ पर साहब के दस्तखत हो गए।” बाबू गुस्से में फाइलें पटकते हुए डांटकर कहता कि “अरे अम्मा जब तक डिजिटल पोर्टल पर आधार का ऑनलाइन सत्यापन पूरा नहीं होगा और तहसील से जांच रिपोर्ट नहीं आएगी तब तक कागज़ आगे नहीं बढ़ेगा और तुम इस जंग लगे पहिये को लेकर ताउम्र यहाँ चक्कर काटती रहोगी।” कौशल्या देवी बिना किसी प्रतिवाद के वापस अपनी जगह पर जाकर बैठ जातीं और उस लोहे के पहिये को अपनी हथेली पर घुमाने का निरर्थक प्रयास करने लगतीं जो हर बार लड़खड़ाकर उनकी गोदी में गिर जाता था। कस्बे के लोग आपस में तरह-तरह की बातें करते कि शायद अम्मा अपने किसी पुराने भत्ते के लिए यह सब कर रही हैं लेकिन किसी को भी उस पहिये और महिला समानता के इस भव्य जलसे के बीच छुपे भयानक रहस्य की ज़रा सी भी भनक नहीं थी।

दोपहर में अचानक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रमुख सचिव महोदय महिला समानता दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य राज्य स्तरीय सम्मेलन का उद्घाटन करने उसी विकास भवन पहुँचे। साहब की गाड़ी का सायरन बजते ही पूरे परिसर में खलबली मच गई और आनन-फानन में स्वागत के लिए नए बैनर टांगे जाने लगे ताकि कोई कमी न दिखाई दे। मंच पर दीप प्रज्वलन और नारी सशक्तिकरण पर लंबा भाषण देने के बाद जब सचिव महोदय पत्रकारों की भीड़ के साथ बाहर निकले तो उनकी नज़र चबूतरे पर शांत बैठी कौशल्या देवी पर पड़ी जिनकी गोद में वही जंग लगा पहिया रखा था। अपनी संवेदनशील और जनहितैषी छवि का प्रदर्शन करने के लिए सचिव महोदय तुरंत मीडिया कर्मियों को साथ लेकर कौशल्या देवी के पास पहुँचे और बड़े आदर से बोले कि “अम्मा आज महिला समानता दिवस पर हम मातृशक्ति को नमन करते हैं बताइए आपकी क्या पीड़ा है क्या आपको स्वरोज़गार योजना का लाभ नहीं मिल रहा है जिसे मैं तुरंत स्वीकृत करवाऊँ।” कौशल्या देवी ने अपनी पथराई आँखों से सचिव महोदय को देखा और अपने कांपते हाथों से वह जंग लगा पहिया आगे बढ़ाते हुए बोलीं कि “साहब जी अगर वाकई न्याय करना चाहते हैं तो ज़रा इस पहिये पर खुदी हुई सरकारी योजना की संख्या और यह मुड़ी सुई पहचान लीजिए।”

सचिव महोदय ने जब उस लोहे के पहिये को हाथ में लेकर गौर से देखा तो उस पर महिला स्वावलंबन योजना की मुहर के साथ उनकी खुद की पुरानी तारीख दर्ज थी। कौशल्या देवी की आँखों से आंसुओं के दो मोटे कतरे ढलककर उस ठंडे पहिये पर गिर पड़े और वे रुंधे गले से बोलीं कि “साहब पाँच साल पहले मेरी पढ़ी-लिखी बेटी ने अपने पैरों पर खड़े होने के लिए आपके इसी दफ़्तर से सिलाई केंद्र का लोन मांगा था। लेकिन आपके भ्रष्ट अफ़सरों ने उसे सिलाई मशीन देने के बहाने महीनों दफ़्तर के चक्कर कटवाए और बंद कमरों में उसका मानसिक और शारीरिक शोषण करने की कोशिश की। मेरी बेटी उस अपमान और बेबसी के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने समाज के डर से अपनी जुबान बंद कर ली और आज वह घर के एक कोने में मानसिक रूप से अपंग होकर जिंदा लाश की तरह पड़ी है। मैं रोज़ यह सिलाई मशीन का पहिया यहाँ इसलिए लाती हूँ ताकि आपके इस मंच को बता सकूँ कि साल में सिर्फ एक दिन भाषण देकर नारी को देवी कह देने से समानता नहीं आती जब तक कि तुम्हारे दफ़्तर की कुर्सी पर बैठे दरिंदे एक बेबस औरत के स्वाभिमान को सरेआम नोंचना बंद न कर दें।” यह सुनते ही सचिव महोदय का चेहरा शर्म से झुक गया और पूरा विकास भवन गहरे सन्नाटे में डूब गया।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७२ – उकताहट… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – उकताहट…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७२ ☆

✍उकताहट… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

इतना बुरा भी नहीं होता

किसी दिन बोर होना,

किसी कुर्सी,

किसी सोफ़े पर

यूँ ही पड़े रहना,

बिना खोले कोई किताब।

 

काम तो

कभी ख़त्म होते नहीं,

तैरते रहते हैं

दिल, दिमाग़ और

घर के कोने-कोने में।

 

फिर भी कभी

मन कहता है, आज रहने दो।

 

ऐसे में अक्सर

हाथ बढ़ता है फ़ोन की ओर,

उँगलियाँ ढूँढ़ लेती हैं

किसी अपने का नंबर,

जिससे मुद्दत से

न हुई हो गुफ़्तगू

बेवजह

बेहिसाब l

 

बात शुरू होती है

बेवजह,

और चल पड़ती है

बिना किसी हिसाब के।

 

उकताहट

इतनी बुरी भी अलामत नही,

यदा-कदा

यह भी दे जाती है ईनाम

किसी अपने से

जुड़ने का,

यूँ ही,

बेवजह,

बेहिसाब।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८० ☆ कविता – क्रेता… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता  – “क्रेता…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८० ☆

✍ कविता ☆ जीना… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

☆

सम्मान में खड़े होना

होता है शिष्टाचार ,

ईश्वर के आगे झुकना

है भक्ति का इज़हार।

*

भीड़ में खड़े हो अच्छा है

जय जय कार करना,

भीड़ का हिस्सा होना

नहीं श्रद्धा व्यक्त करना।

*

संत साधु महात्मा सेवक

भीड़ सबको चाहिए,

अपने सामने नतमस्तक

प्रश्न नहीं याचना चाहिए।

*

एक ऊपर विराजमान

सैकड़ों नीचे, कौन सी रीत

एक चेहरे पर दंभी मुस्कान

सैकड़ों पर एक दबी भीत।

*

एक पानी एक ही पवन

एक ही धरती एक आसमान ,

एक मानव एक ही जीवन

फिर पाना क्यों है असमान।

*

एक जीता शान से यहाँ

एक मांगता मौत यहाँ,

ऐसा क्यों है जगत में

कौन समझाएगा यहाँ।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ११०० ⇒ आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह…“।)

?अभी अभी # ११०० ⇒ आलेख – आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग आग्रह के तो बहुत कच्चे होते हैं, लेकिन पूर्वाग्रह के बहुत पक्के । आग्रह एक ऐसा ग्रह है जो खुशामद पसंद है, आपका पेट भरा है फिर भी कोई प्यार से आपको एक रसगुल्ला खिला दे, रास्ते में एक अनजान सज्जन मिलते हैं, परिचय होता है, दिल मिलता है, और ऐसा आग्रह होता है कि आप उनके घर चाय के प्याले का आमंत्रण ठुकरा नहीं पाते । हमारे घर आना राजा जी ! क्या इस गीत में आपको आग्रह नजर नहीं आता ।

पूर्वाग्रह और दुराग्रह तो नाम से ही राहु केतु अथवा जुड़वा भाई लगते हैं । पूर्वाग्रह शब्द से ऐसा भ्रम होता है मानो यह आग्रह से पूर्व की स्थिति है । लेकिन ऐसा कुछ नहीं है । पूर्वाग्रह का आग्रह से कोई लेना देना नहीं है । अगर आग्रह का बस चले तो वह अख़बार में ज़ाहिर सूचना प्रकाशित करवा दे कि मेरा पूर्वाग्रह और दुराग्रह से दूर का भी रिश्ता नहीं है ।।

किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के बारे में पहले से ही कोई गलत धारणा बना लेना पूर्वाग्रह है । अज्ञान, अंध विश्वास और सही जानकारी के अभाव में भी यह स्थिति निर्मित हो सकती है । सिक्के के केवल एक ही पहलू की जानकारी रखना पूर्वाग्रह की स्थिति है । लगातार एक ही प्रकार की विचारधारा से प्रभावित होने के कारण भी व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है ।

संकुचित मानसिकता, संकीर्ण विचार और मन की अनुदार स्थिति से भी व्यक्ति पूर्वाग्रह का शिकार हो सकता है । यह एक लाइलाज बीमारी है । हमने कुछ ऐसे भ्रम जीवन में पाले हुए हैं, जिन्हें हम अपना आदर्श समझने लगे हैं । जब भी स्वस्थ, उन्मुक्त विमर्श होता है, हमारा दुराग्रह झलकने लगता है । जी हां, जो कभी पूर्वाग्रह था, उसने अब तक जड़ पकड़ ली है । दुराग्रह का वृक्ष फल फूल रहा है । घृणा और नफरत की भावना के अलावा और कुछ नहीं पनपता पूर्वाग्रह और दुराग्रह के जंगल में।।

आप जिस व्यक्ति से सहमत होते हैं वहां एक आग्रह होता है प्रेम, आस्था और विश्वास का । आपका मन जिस बात को स्वीकार नहीं कर रहा, वहां भी आपका उदार दृष्टिकोण नजर आता है । अच्छा, ऐसा है क्या । मैं तो कुछ और ही समझा था । कहीं कहीं तो भरोसा नहीं होने पर भी बात बिगड़ती नहीं । पहले तथ्यों को परखा जाता है।

लेकिन जहां पहले से ही असहमति है, मनमुटाव है, वहां किसी भी बात पर सच के पहले पूर्वाग्रह झांकने लग जाएगा । क्योंकि वहां भावना नहीं, दुर्भावना काम कर रही है । राजनीति और धर्म जो कभी आग्रह के सोपान थे, आज पूर्वाग्रह और दुराग्रह के रास्ते में भटक रहे हैं । यहां स्वस्थ संवाद, खुली बहस और पारदर्शिता वर्जित है । लकीर के फ़कीर बने रहें अथवा कुएं के मेंढक । बहुत सुखी रहेंगे ।।

इन तीन ग्रहों से भी ऊपर, एक ग्रह और है जिसका पेटेंट गांधीजी के पास था । जी हां, सत्याग्रह ! उन्होंने केवल सत्य के प्रयोग ही नहीं किए, सत्य का आग्रह भी किया । अंग्रेजों के खिलाफ यह हथियार कारगर भी हुआ हो, लेकिन आजादी के बाद यह आग्रह बहुत भारी पड़ने लगा । जगह जगह धरना, भूख हड़ताल, आमरण अनशन और आत्म दाह की धमकी ।

याद कीजिए, राजनीतिक पदयात्राएं, रथयात्राएं और अन्ना हजारे का सन 2011 में लोकपाल विधेयक आंदोलन । जिसमें जंतर मंतर पर अनशन में इनके साथ अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और सुप्रीम कोर्ट के आज के मानहानि पुरुष प्रशांत भूषण भी शामिल थे। लेकिन इसी आग्रह ने देश की तस्वीर बदल दी और जनता ने देश को कांग्रेस के पजों से छीनकर मोदी जी को तश्तरी में पेश कर दिया ।।

चार ग्रहों की यह तस्वीर आपको कैसी लगी । आपसे आग्रह है पूर्वाग्रह और दुराग्रह से मुक्त हो, केवल सत्य का आग्रह करें, सत्याग्रह, धरने अथवा अनशन का नहीं । जब तक सत्य का पता न चले, पूर्वाग्रह न पालें, दुराग्रह तो कतई नहीं ।

जहां शुद्धता की कोई गारंटी नहीं, नीर, क्षीर, विवेक का कोई संसाधन नहीं, केवल पूर्वाग्रह मुक्त हीरे की पारखी नजर ही काम आ सकती है । हम जानते हैं आप भी आग्रह के कच्चे हैं ..मन के सच्चे हैं ..!!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३० – ट्रैफिक जाम… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – ट्रैफिक जाम।)

☆ लघुकथा # १३० – ट्रैफिक जाम ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

“मम्मी जी… पेट में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है।”

बहू की कराह सुनकर अरुंधति घबरा गईं।

“बेटा, चलो डॉक्टर को दिखाते हैं।”

“लेकिन मैं गाड़ी नहीं चला सकती।”

“कोई बात नहीं, ऑनलाइन टैक्सी बुला लेते हैं।”

टैक्सी आई और दोनों अस्पताल के लिए निकल पड़ीं।

सड़क पर पहुँचते ही गाड़ियों की लंबी कतार दिखाई दी। हॉर्न पर हॉर्न बज रहे थे, मगर सड़क जैसे साँस लेना भूल गई थी।

ड्राइवर बोला, “मैडम, आगे जाम बहुत लंबा है। शायद एक्सीडेंट हुआ है।”

बहू दर्द से कराह उठी।

अरुंधति की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्होंने घड़ी देखी। अस्पताल अब कुछ ही दूरी पर था, मगर रास्ता जैसे मीलों लंबा हो गया था।

“भैया, कोई दूसरा रास्ता नहीं है?”

“पीछे भी गाड़ियाँ फँसी हैं, आगे भी। निकलना मुश्किल है।”

तभी अरुंधति की नजर सड़क किनारे खड़े एक बच्चे पर पड़ी। उसके पास साइकिल थी।

“बेटा, अपनी साइकिल दे दोगे? मेरी बहू बहुत तकलीफ़ में है। मैं उसे किसी तरह अस्पताल पहुँचा दूँगी। तुम्हारा पता दे देना, मैं साइकिल वापस पहुँचा दूँगी।”

बच्चे ने मुस्कुराकर कहा,

“नहीं आंटी, साइकिल आपको ही मुबारक। मैं पैदल चला जाऊँगा। वैसे भी मुझे इसी अस्पताल में जाना है… मैं वहाँ वार्ड बॉय हूँ।”

अरुंधति की आँखें भर आईं।

किसी तरह बच्चे की मदद से बहू अस्पताल पहुँची।

इलाज शुरू हुआ तो डॉक्टर ने कहा, “थोड़ी और देर होती तो मुश्किल हो सकती थी।”

अरुंधति अस्पताल की खिड़की से बाहर देखने लगीं। सड़क पर वही जाम अब भी लगा था।

उनके मन में एक सवाल कौंधा- “हमने शहरों को इतना बड़ा तो बना दिया कि आसमान छू लें, लेकिन रास्ते इतने छोटे क्यों कर दिए कि किसी की साँस अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही रुक जाए?”

सड़क पर ट्रैफिक जाम था…

और शायद उससे बड़ा जाम हमारी व्यवस्था में……..।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३३१ ☆ माझा भारत…🇮🇳 ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३३१ ?

☆ माझा भारत…🇮🇳 ☆  प्रभा सोनवणे ☆

☆

शाळेत असताना पाहिला होता—

मनोजकुमारचा शहीद!

तेव्हापासून वीर भगतसिंगाची

राष्ट्रभक्ती,

काळजात खोलवर रुतलेली!

भगतसिंग, राजगुरु, सुखदेव!

देशासाठी प्राण अर्पून,

अमर झालेले!

इंग्रजाच्या जुलमी सत्तेविरुद्ध,

पुकारले होते बंड,

अनेक नौजवानांनी !

त्या राष्ट्रभक्तीने झपाटलेल्यांनी

दिली सर्वस्वाची आहुती !

 

खूप दिवस आठवत राहिली,

ती तीन क्रांतिवीरांची फाशी—

आणि

 “मेरा रंग दे बसंती चोला….”

  चे स्वर!

  सतत येत होते रडू… !

 दुसर्‍याच दिवशी शाळेत

म्हटलेली प्रतिज्ञा—

 

“माझ्या देशावर माझे प्रेम आहे

माझ्या देशातल्या समृद्ध आणि

   विविधतेने नटलेल्या

परंपरांचा मला अभिमान आहे…..”

 तेव्हाही ते शहीदच आठवले होते !

 

आज खूप दिवसांनी ते दिवस

आठवले…..

तसे पंधरा ऑगस्ट साजरा करताना—

आठवतेच की सारे,

वर्षानुवर्ष !

 

पण आज,

पुन्हा आठवले–

ते बलिदान,

काळजात रुतून बसलेले शहीद!

आणि सद्यस्थितीतही–

म्हणावेसे वाटले—-

माझा भारत महान!

☆

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ || झरा वारा || ☆ म. ना. दे. (श्री मयुरेश देशपांडे) ☆

म. ना. दे. (श्री मयुरेश देशपांडे)

? कवितेचा उत्सव ?

☆ || झरा वारा || ☆ म. ना. दे. (श्री मयुरेश देशपांडे) ☆

☆

चाले जैसा झरा, सोबतीला वारा,

निसर्गाचा पारा, वर खाली

* 

वर खाली वाट, धुके घनदाट

माखले लल्लाट, कर्मेधर्मे

 *

कर्मेधर्मे पळ, कष्टांचाच चळ

उठू देत वळ, तळहाती

 *

तळहाती जलं, अर्घ्य ते सोडलं

नातं जे जोडलं, जन्मा संगे

 *

जन्मा संगे वारा, पायाला भोवरा

श्वासांचा हा झरा, जिथवरं

☆

कवी : म. ना. देशपांडे

(होरापंडीत मयुरेश देशपांडे)

+९१ ८९७५३ १२०५९ 

https://www.facebook.com/majhyaoli/ 

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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