श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – उकताहट…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “क्रेता…“।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह…“।)
अभी अभी # ११०० ⇒ आलेख – आग्रह, पूर्वाग्रह एवं दुराग्रह श्री प्रदीप शर्मा
कुछ लोग आग्रह के तो बहुत कच्चे होते हैं, लेकिन पूर्वाग्रह के बहुत पक्के । आग्रह एक ऐसा ग्रह है जो खुशामद पसंद है, आपका पेट भरा है फिर भी कोई प्यार से आपको एक रसगुल्ला खिला दे, रास्ते में एक अनजान सज्जन मिलते हैं, परिचय होता है, दिल मिलता है, और ऐसा आग्रह होता है कि आप उनके घर चाय के प्याले का आमंत्रण ठुकरा नहीं पाते । हमारे घर आना राजा जी ! क्या इस गीत में आपको आग्रह नजर नहीं आता ।
पूर्वाग्रह और दुराग्रह तो नाम से ही राहु केतु अथवा जुड़वा भाई लगते हैं । पूर्वाग्रह शब्द से ऐसा भ्रम होता है मानो यह आग्रह से पूर्व की स्थिति है । लेकिन ऐसा कुछ नहीं है । पूर्वाग्रह का आग्रह से कोई लेना देना नहीं है । अगर आग्रह का बस चले तो वह अख़बार में ज़ाहिर सूचना प्रकाशित करवा दे कि मेरा पूर्वाग्रह और दुराग्रह से दूर का भी रिश्ता नहीं है ।।
किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के बारे में पहले से ही कोई गलत धारणा बना लेना पूर्वाग्रह है । अज्ञान, अंध विश्वास और सही जानकारी के अभाव में भी यह स्थिति निर्मित हो सकती है । सिक्के के केवल एक ही पहलू की जानकारी रखना पूर्वाग्रह की स्थिति है । लगातार एक ही प्रकार की विचारधारा से प्रभावित होने के कारण भी व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रसित हो सकता है ।
संकुचित मानसिकता, संकीर्ण विचार और मन की अनुदार स्थिति से भी व्यक्ति पूर्वाग्रह का शिकार हो सकता है । यह एक लाइलाज बीमारी है । हमने कुछ ऐसे भ्रम जीवन में पाले हुए हैं, जिन्हें हम अपना आदर्श समझने लगे हैं । जब भी स्वस्थ, उन्मुक्त विमर्श होता है, हमारा दुराग्रह झलकने लगता है । जी हां, जो कभी पूर्वाग्रह था, उसने अब तक जड़ पकड़ ली है । दुराग्रह का वृक्ष फल फूल रहा है । घृणा और नफरत की भावना के अलावा और कुछ नहीं पनपता पूर्वाग्रह और दुराग्रह के जंगल में।।
आप जिस व्यक्ति से सहमत होते हैं वहां एक आग्रह होता है प्रेम, आस्था और विश्वास का । आपका मन जिस बात को स्वीकार नहीं कर रहा, वहां भी आपका उदार दृष्टिकोण नजर आता है । अच्छा, ऐसा है क्या । मैं तो कुछ और ही समझा था । कहीं कहीं तो भरोसा नहीं होने पर भी बात बिगड़ती नहीं । पहले तथ्यों को परखा जाता है।
लेकिन जहां पहले से ही असहमति है, मनमुटाव है, वहां किसी भी बात पर सच के पहले पूर्वाग्रह झांकने लग जाएगा । क्योंकि वहां भावना नहीं, दुर्भावना काम कर रही है । राजनीति और धर्म जो कभी आग्रह के सोपान थे, आज पूर्वाग्रह और दुराग्रह के रास्ते में भटक रहे हैं । यहां स्वस्थ संवाद, खुली बहस और पारदर्शिता वर्जित है । लकीर के फ़कीर बने रहें अथवा कुएं के मेंढक । बहुत सुखी रहेंगे ।।
इन तीन ग्रहों से भी ऊपर, एक ग्रह और है जिसका पेटेंट गांधीजी के पास था । जी हां, सत्याग्रह ! उन्होंने केवल सत्य के प्रयोग ही नहीं किए, सत्य का आग्रह भी किया । अंग्रेजों के खिलाफ यह हथियार कारगर भी हुआ हो, लेकिन आजादी के बाद यह आग्रह बहुत भारी पड़ने लगा । जगह जगह धरना, भूख हड़ताल, आमरण अनशन और आत्म दाह की धमकी ।
याद कीजिए, राजनीतिक पदयात्राएं, रथयात्राएं और अन्ना हजारे का सन 2011 में लोकपाल विधेयक आंदोलन । जिसमें जंतर मंतर पर अनशन में इनके साथ अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और सुप्रीम कोर्ट के आज के मानहानि पुरुष प्रशांत भूषण भी शामिल थे। लेकिन इसी आग्रह ने देश की तस्वीर बदल दी और जनता ने देश को कांग्रेस के पजों से छीनकर मोदी जी को तश्तरी में पेश कर दिया ।।
चार ग्रहों की यह तस्वीर आपको कैसी लगी । आपसे आग्रह है पूर्वाग्रह और दुराग्रह से मुक्त हो, केवल सत्य का आग्रह करें, सत्याग्रह, धरने अथवा अनशन का नहीं । जब तक सत्य का पता न चले, पूर्वाग्रह न पालें, दुराग्रह तो कतई नहीं ।
जहां शुद्धता की कोई गारंटी नहीं, नीर, क्षीर, विवेक का कोई संसाधन नहीं, केवल पूर्वाग्रह मुक्त हीरे की पारखी नजर ही काम आ सकती है । हम जानते हैं आप भी आग्रह के कच्चे हैं ..मन के सच्चे हैं ..!!!
(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा – गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी, संस्मरण, आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – ट्रैफिक जाम।)
सड़क पर पहुँचते ही गाड़ियों की लंबी कतार दिखाई दी। हॉर्न पर हॉर्न बज रहे थे, मगर सड़क जैसे साँस लेना भूल गई थी।
ड्राइवर बोला, “मैडम, आगे जाम बहुत लंबा है। शायद एक्सीडेंट हुआ है।”
बहू दर्द से कराह उठी।
अरुंधति की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उन्होंने घड़ी देखी। अस्पताल अब कुछ ही दूरी पर था, मगर रास्ता जैसे मीलों लंबा हो गया था।
“भैया, कोई दूसरा रास्ता नहीं है?”
“पीछे भी गाड़ियाँ फँसी हैं, आगे भी। निकलना मुश्किल है।”
तभी अरुंधति की नजर सड़क किनारे खड़े एक बच्चे पर पड़ी। उसके पास साइकिल थी।
“बेटा, अपनी साइकिल दे दोगे? मेरी बहू बहुत तकलीफ़ में है। मैं उसे किसी तरह अस्पताल पहुँचा दूँगी। तुम्हारा पता दे देना, मैं साइकिल वापस पहुँचा दूँगी।”
बच्चे ने मुस्कुराकर कहा,
“नहीं आंटी, साइकिल आपको ही मुबारक। मैं पैदल चला जाऊँगा। वैसे भी मुझे इसी अस्पताल में जाना है… मैं वहाँ वार्ड बॉय हूँ।”
अरुंधति की आँखें भर आईं।
किसी तरह बच्चे की मदद से बहू अस्पताल पहुँची।
इलाज शुरू हुआ तो डॉक्टर ने कहा, “थोड़ी और देर होती तो मुश्किल हो सकती थी।”
अरुंधति अस्पताल की खिड़की से बाहर देखने लगीं। सड़क पर वही जाम अब भी लगा था।
उनके मन में एक सवाल कौंधा- “हमने शहरों को इतना बड़ा तो बना दिया कि आसमान छू लें, लेकिन रास्ते इतने छोटे क्यों कर दिए कि किसी की साँस अस्पताल तक पहुँचने से पहले ही रुक जाए?”
अमेरिकेला येण्याची नाना व कमलताईंची पहिलीच वेळ होती. मुलगा फारच मागे लागला म्हणून ते तयार झाले खरे पण नवी सूनबाई, कशी असेल, कशी वागेल काही अंदाज येत नव्हता. ते येऊन पोचले तेव्हा हिना कामाला गेली होती. आपण येणार त्या दिवशीही अर्धा दिवस देखील सुट्टी टाकता येत नाही हा विचार दोघांच्या मनात येऊन गेला पण त्यांनी जयंतला काही विचारलं नाही. त्यांच्या आयुष्यात ढवळाढवळ करायची नाही हे ठरवून ते आले होते.
त्यांच्या मुलगा जयंत गेली बारा वर्षे अमेरिकेत रहात होता. जयंत हिनाला कुठल्याशा डेटिंग साईट वर भेटला व कोविडच्या काळात त्याचे लग्न झाले. त्यानंतर नील जन्माला आला व भारतात आई बाबांना भेटायला जाणे पुढे गेले. शेवटी जयंतनं आई बाबांनाच आग्रह करून अमेरिकेत बोलावले.
कमलताईंनी बेसनाचे लाडू केले. जयंतचे आवडते बेसनाचे लाडू! बाकी काही आणू नको अशी त्याची सक्त ताकीद होती. धडधडत्या ह्रुदयाने व थरथरत्या पावलांनी दोघांनी जयंतच्या घरात प्रवेश केला.
जयंत व हिनानं घर सुंदर सजवलं होतं. कलाकुसरीच्या वस्तूंनी सुशोभित केलं होतं. समोरच असलेला गजाननाचा भव्य फोटो बघून त्यांचं मन सुखावलं. तेवढ्यात हिना नीलला डे केअर मधून घेऊन घरी आली.
“आई-नाना, कसा झाला प्रवास? ” तिनं शुद्ध मराठीत विचारलं व कमलाताई आश्चर्यचकित झाल्या. नेहमी फोनवर एखादं दुसरं हिंदी वाक्य बोलणारी हिना किती सुरेख मराठी बोलते आहे असं मनात येतय न येतय तोच हिना म्हणाली, “मैत्रीणीकडे मराठी शिकते आहे. ” हिनाचे प्रयत्न बघून नानाही खूष झाले.
“किती छान आहे ना हिना? फोनवर बोलताना किंवा फोटोमधून फारसं काही कळत नाही. ” कमलताईंनी नानांकडे उत्तराच्या अपेक्षेने बघितले पण नानांना झोप लागली होती.
जेटलॅगमुळे दोघांनाही बराच वेळ झोप लागली. जयंत जेवणासाठी उठवायला आला.
“चला गरम गरम पोळ्या करतोय. या जेवायला. ” कमलताई व नाना स्वयंपाक घरात आले व कणिक मळणाऱ्या जयंतकडे पहातच राहिले. त्याने डाळ फोडणीस टाकली. तो भराभर पोळ्या करू लागला.
“जयंत, रायता बनव हं. ” हिनाचा आतून आवाज आला. ती नीलला झोपवत होती. हिना डावरी आहे असं कमलताईंच्या लक्षात आलं.. सारं काही करताना डावा हात पुढे होता. अगदी नीलला भरवतानाही! डाव्या हाताने भरवलेलं त्यांना कससच वाटलं.
हिना जेवून बाहेर येऊन काहीतरी वाचत बसली. जयंतनं सगळा स्वयंपाक करून जेवणं झाल्यावर मागचं आवरलं. हिना झोपायला गेल्यावर कमलताईंनी न राहवून विचारलं.
“जयंत, हिनाची तब्ब्येत बरी नाही का? स्वयंपाक तूच केलास म्हणून विचारते. ”
“नाही आई. तिला काही झालेलं नाही. तिला कुकिंग जमत नाही व आवडतही नाही. ” जयंत अगदी सहजपणे सांगत होता.
“पण खाण्याची आवड आहे ना? कुकिंग आवडत नाही म्हणजे? ” कमलताईंनी मनातला प्रश्न मनातच ठेवला पण मगाशी एकदम छान वाटणारी हिना आता मनातून उतरू लागली होती.
जयंत कामाला जाण्यापूर्वी नीलला तयार करत असे. आठ वाजता हिना तयार होऊन कामाला जात असे व नीलला डे-केअरला पोचवून साडेआठला जयंत कामाला जात असे.
हिनाचा डबा पण जयंतनं तयार केला होता.
“अहो घरातलं काहीही काम न करता नवऱ्याला सगळं करायला लावणं या मुलीला कसं बरं वाटतं? इकडची काडी तिकडं करत नाही. असे होतात का संसार? ” कमलताईंना सुचत नव्हतं.
“तुम्ही यात पडू नये असं मला वाटतं. जयंत आनंदी दिसतो आहे. त्यांना जे करायचे ते करू देत. ” नानांनी विचार करून सांगितलं. कमलताईंना ते पटलं नाही. त्यांनी स्वयंपाकाची सूत्रं हातात घेतली व सर्वांचा स्वयंपाक त्या करू लागल्या.
‘सासु सासरे असताना तरी एखादी चार गोष्टी करेल ना स्वयंपाक घरात जाऊन? शोभतं का हे वागणं? माझा मुलगा बिचारा मर मर राबतो आहे. आणि नाना म्हणतात तू यात पडू नको. आपण केवळ महिनाभर राहणार आहोत इथे. ’ कमलताईंना विचारांनी घेरलं होतं. चैन पडत नव्हतं.
एक दिवस जयंत व नाना नीलला घेऊन बाहेर गेले होते. कमलताईंनी धाडस करून हिनाशी बोलायचं ठरवलं.
“हिना तू कधीच कुकिंग करत नाहीस? ”
“नाही. ” एकच शब्द बोलून ती थांबली.
“बरय ग तुझं. आम्ही न आवडून कुणाला सांगणार. पर्यायच नसतो. संसार म्हटलं की बाईला सारं करावच लागतं. ” कमलताई यावर ती काय बोलते म्हणून वाट बघू लागल्या.
“जयंतला फार काम पडतं असं वाटतं म्हणून विचारत आहात ना? ” हिनाचा प्रश्न रास्त होता.
“आई, हा विषय कधी ना कधी निघणार याची खात्री होती. ” तिनं उजवा हात मनगटापासून बाहेर काढला. तो प्रोस्थेटिक हात होता. तिला कोपरापुढे हातच नव्हता. पण त्या हाताची बनावट इतकी सुरेख होती की कधी हा खोटा हात आहे असं वाटतचं नव्हतं.
कमलताईंनी धक्का बसला.. त्या गडबडल्या.. गोऱ्यामोऱ्या झाल्या.
“आई, आम्ही दोघं भेटलो व एकमेकांच्या प्रेमात पडलो. मला उजवा हात नाही हे मी जयंतला प्रथमच सांगितलं होतं. तरी तो मला भेटत राहिला. मी अशीच जन्मले आहे. डावा हात वापरून बऱ्याच गोष्टी जमत होत्या पण नील झाला तेव्हापासून त्याला उचलून डावा हात दुखत आहे. जयंत सगळी कामं करतो. त्यानं लग्न होण्यापूर्वी मला सांगितलं होतं की तो घरकाम करेल. मी बाहेरची कामं व माझी नोकरी सांभाळून त्याला जमेल तशी मदत करत असते पण तुम्ही असताना मला हा विषय नको होता. पण तुम्ही मायेपोटी विचारलंत. माझ्यावर टीका करण्यासाठी नाही हे मला समजतय सो इटस् ओके. ” हिनाचं बोलणं ऐकून कमलताईंना लाज वाटत होती.
जयंत व नाना घरी आले. हिनाचा प्रोस्थेटिक आर्म टेबलावर ठेवलेला बघून जयंतला सगळं समजलं.
जयंत हिनाशेजारी जाऊन उभा राहिला व म्हणाला,
“आई, हिचा उजवा हात मी आहे. ”
नानांना काय बोलावे कळत नव्हते. कमलताईंना हे सारं पाहून धक्का बसला होता. त्या स्तब्ध झाल्या होत्या.
क्षणभरापूर्वी वाटत होतं.. माझा मुलगा बिचारा मरमर राबतो. आता जाणवत होतं की तो राबत होता त्याच्या प्रेमासाठी. तिच्यातील कमी भरून काढण्यासाठी..
कमलताईंनी स्वयंपाकघरातून लाडवाचा डबा घेऊन बाहेर आल्या. टेबलावरील प्रोस्थेटिक आर्म ला जो पंजा होता त्यावर त्यांनी लाडू ठेवला.
“हिना मला माफ कर. तू स्वयंपाक करत नाहीस याबद्दल तुला मी कमी लेखत होते पण आज कळलं… हात नसला तरी माणूस संसाराला हातभार लावू शकतो. मी तुला नेहमीच्या चाकोरीत बसवलं आणि काहीही माहित नसताना उगीचच तर्क करत बसले. माणूस असाच असतो.. पूर्ण माहिती नसताना तर्क करणारा. बरोबर नाही हे.. ”
क्षणभर शांतता पसरली. मग कमलताईंनी जयंतकडे पाहिलं. “आणि खरंच.. हात असूनही… काही लोक समोरच्या माणसाचा हात धरायला शिकत नाहीत. ”
जयंत गोंधळून त्यांच्याकडे पाहू लागला. त्यांनी हिनाचा हात दंडाला पकडला. “मला तुझी ओळख करून घ्यायची आहे.
तुला सुनेच्या साच्यात बसवून नाही तर एक माणूस म्हणून. तू लहानपणापासून अपंग आहेस पण सांगू का? कितीतरी लोक शरीराने नाही पण मनानं अपंग असतात – माझ्या सारखे!
“आई, हिनाचा हात जन्मापासून असा नव्हता.. जरी तिनं ते सांगितलं तरी. आम्ही दोघं नायगारा बघायला चाललो होतो. मी गाडी चालवत होतो. गाडीला अपघात झाला व त्या अपघातात हिच्या हाताची ही तऱ्हा झाली. आता लग्न करायला नको असं हिना म्हणत होती. पण प्रेम केलं मी तिच्यावर. माझ्या चुकीने अपघात झाला होता पण ती एका शब्दाने मला काही म्हणाली नाही. ” जयंतचे डोळे भरून आले होते.
“आई मला अजिबात कुकिंग येत नाही असं नाही बरका. मी शिरा कसा करते बघाच म्हणून हिना स्वयंपाक घरात गेली.
जयंतला दोष न देता माझा हात लहानपणापासून असा आहे म्हणून सांगणाऱ्या हिना बद्दल कमलताईंच्या मनात प्रेम दाटून आलं..
नानांचं वाक्य आज त्यांना मनोमन पटलं होत.
‘जिथे तर्क संपतो, तिथे माणुसकी सुरू होते आणि त्या क्षणी आयुष्य बदलून जातं..
लेखिका : ज्योती रानडे
प्रस्तुती : शोभा जोशी
कार्यकर्ती, जनजाती कल्याण आश्रम, पुणे महानगर.
मो ९४२२३१९९६२
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
मोबाईल आले आणि फोन बुक नावाचे नविन काहीतरी समजले. आज पर्यंत इतरांनी लिहीलेले आम्ही वाचले. पण फोन बुकमध्ये आम्हीच लिहितो आणि गरज पडेल तसे आम्हीच वाचतो.
फोन बुकचे एक बरे असते, आपणच हवं ते नांव निवडतो आणि सेव्ह करतो. वारंवार ते बदलता देखील येते. आपल्या शाळेच्या दाखल्यासारखे ते कायम नसते.
फार फार वर्षांपूर्वीचे असे नाही, पण काही वर्षांपूर्वी जवळपास प्रत्येकाजवळ आणि प्रत्येक घरात (घरी फोन नसला तरीही) एक डायरी असायची. यात महत्वाचे फोन नंबर नावासह लिहिलेले असायचे. अशी एक छोटी डायरी खिशात देखील असे. हा लॅंडलाईन फोनचा जमाना होता.
नंतर काळ झपाट्याने बदलला, आणि मोबाईल फोन आला. या फोनमध्येच नांव लिहून ठेवण्याची सोय झाली. मग काय? माझे फोन बुक अस्तित्वात आले.
हिटलर माझी आई, वय वर्षे ८५. तिला देखील मोबाईल आला. तिला मोबाईलवरुन फोन करता येत नाही, पण आलेला घेता येतो. आता वयोमानानुसार तिला कमी ऐकू येते. काही गोष्टीत तिचा हट्ट असतो, तर काहीत मी सांगते म्हणून अशी हुकूमशाही. म्हणून तीचे नांव मी हिटलर असे सेव्ह केले आहे.
आता आईला देखील मोबाईल आला म्हटल्यावर बायको, मुले, भाऊ यांच्याजवळ देखील मोबाईल असणार हे ओघाने आलेच.
मुलांचे नंबर मी मागणी पुरवणी नंबर १ आणि मागणी पुरवणी नंबर २ असे सेव्ह केले आहेत. याचे कारण मी कितीतरी वेळा कितीतरी कारणांनी त्यांना फोन केले असतील. पण त्यांना काही हवे असल्यास त्यांचा मला फोन येतो, एरवी कमी. त्यांचे बजेट मंजूर झाल्यावर देखील ही मागणी जास्तीची (आणि त्यांच्या दृष्टीने रास्त असते.) असल्याने त्यांची नांवे मागणी पुरवणी अशी सेव्ह केली.
आता नंबर बायकोच्या फोनचा. तिचा स्वतःचा एक आणि ऑफिसने दिलेला एक, असे दोन नंबर तिचे आहेत.
फोन बुकमध्ये तिचे नांव मी बऱ्याचदा बदलले आहे. आपण तिला नाही तर किमान नावाला बदलवू शकतो याचे समाधान. (तिचेही माझ्या बद्दल हेच मत असेल याची खात्री आहे.)
आमच्या लग्नाचा वेळी मोबाईल नव्हते. नाहितर तिचे नांव लग्नाआधी राणी लग्ना नंतर महाराणी, आणि खूssssssप नंतर गा-हाणी किंवा संतवाणी असे कदाचीत सेव्ह केले असते.
सध्या तिचे नांव मी आकाशवाणी आणि वन वे असे सेव्ह केले आहे.
रेडिओ लावला तर आपल्याला त्यावर काय सुरू असेल ते आणि तेच ऐकावे लागते. आपल्याला आपले मत बोलून लगेच सांगता येत नाही. तसेच हिचा फोन आला किंवा आपण लावला तरी अगोदर ऐकावेच लागते. अगदी आपण फोन केला तरी, बरे झाले, तुमचा फोन आला. आत्ता तुम्हालाच फोन लावत होते. या वाक्यानेच सुरुवात होते. आपले सगळे ऐकून म्हणजे तिचे सांगून झाल्यावर (तिच्या लक्षात आले तर……..) ती विचारते…… हां…… फोन कशासाठी केला होता…….
आकाशवाणीचा कार्यक्रम आवडला नाही तर, निदान रेडिओ बंद तरी करता येतो. पण आपण फोन बंद केला तर तिकडून परत फोन येतो(च), आणि कार्यक्रमाचा उर्वरित भाग (माझी आवड) या सदराखाली ऐकावा लागतो.
आता तिचा दुसरा नंबर कोणत्या नावाने सेव्ह करावा? हा प्रश्न होता. (बायको असे म्हटले तरी पुरुषांना विनाकारण काही प्रश्न पडतात, तसाच हा प्रकार……) तो प्रश्न मी एकेरी वाहतूक या वाहतूक नियमांच्या फलकावरुन वन वे असा सेव्ह करून सोडवला. कारण परत तेच……. एकेरी वाहतूक या रस्त्यावर एकाच दिशेने जाता येते तसेच या फोनवर देखील फक्त ऐकावे लागते. बोलण्याची संधी कमीच…… एकेरी वाहतूक याचा अर्थ मला रस्त्यापेक्षा जास्त इथे समजला.
आता काही भावांचे आपसात पटते, किंवा काही वेळा पटत नाही. पण आमचे पटते आणि सगळ्या गोष्टीत त्याला माझ्या पेक्षा जास्त इंटरेस्ट असतो. थोडक्यात तो खाणेपिणे, गाणे यातला दर्दी आहे, आणि या गोष्टी करायची त्याला घाई म्हणजेच गर्दी असते. म्हणून भाऊगर्दी या वरुन मी त्याचे नांव भाऊदर्दी असे सेव्ह केले आहे.
बहिणीला फोन झाला की गप्पांमध्ये घरचा विषय निघतोच, त्यावर ती, आई काय करणार? तिचं वय झालंय, तिचं बरोबर आहे. माझ्या बद्दल बोलताना तज असं का केलंस? बायको बद्दल बोलतांना तिचं काय चुकले? असे आपल्यालाच प्रश्न करत आपले म्हणणे खोडून काढते……… म्हणून तिचे नांव खोडरबर म्हणून सेव्ह केले आहे. तिच्याशी बोलताना, बोलतोय का प्रश्नपत्रिका सोडवतोय तेच समजत नाही.
एक बहिण परदेशात असते. तिथल्या परिस्थिती बद्दल बोलतांना ती भरभरून बोलते. पण आपलं म्हणणं ऐकताना आपण जे काही भरभरून बोलत असू त्यामुळे तिला भडभडून येत असावे. पण फोनच्या माध्यमातून आम्ही सांस्कृतिक देवाणघेवाण करतो आणि परदेशाशी चांगले संबंध ठेवतो. तिचे नांव मी फाॅरेन एक्सचेंज असे सेव्ह केले आहे.
आता आपला भाऊ तसेच बायकोचे देखील भाऊ आहेतच नां…….. आता तिच्या मोठ्या भावाचा फोन आला तर घ्यावाच लागतो. कारण कौटुंबीक घडामोडी त्याच्याकडून समजतातच. पण इतरही अनेक गमतीजमती असतात. तो फोन घेण्याशिवाय पर्याय नसतो. पण कामात असलो तर तिच्या लहान भावाला मी थोड्यावेळाने करतो, असे सांगता येते. म्हणून मोठ्या भावाचा जंतरमंतर तर लहान भावाचा मध्यंतर म्हणून सेव्ह केले आहेत. दोनच भाऊ आहेत. तिसरा असता तर कदाचित त्यांच्या वागण्यानुसार गत्यंतर किंवा अवांतर असे म्हणून सेव्ह केला असता.
तशीच मित्रांची देखील आहेत. सगळीच सांगत नाही, वकील मित्राचा मिलाॅर्ड. डाॅक्टर मित्राचा जेवणानंतर, जेवणाअगोदर. व्यापारी मित्राचा आज रोख, कल उधार असे आहेत. पण काही मित्रांचे फोन नंबर मी संध्याकाळी ७ नंतर, गार… व्हा, आकाशी झेप घे, द्राक्षासव असे सेव्ह केले आहेत. अशा नावांच्या स्पष्टीकरणांची गरज नसावी. कारण यांच्याशी भेट झाल्यावर नंतर स्पष्ट बोलण्याचा प्रयत्न होतो. (सुज्ञास सांगणे नलगे)
आता घरातील मंडळींनी देखील फोन नंबर सेव्ह केले असतीलच. तर मुलीने मुलाचा (तिच्या भावाचा) इडियट. तर मुलाने मुलीचा (त्याच्या बहिणीचा) कटकट म्हणून सेव्ह केल्याचे समजले.
मी सहज सगळ्यांना विचारले. काय, तुम्ही माझा नंबर काय म्हणून सेव्ह केला आहे.
सगळ्यांनी एकदम आणि एका स्वरात उत्तर दिले आश्वासन…
काय करणार… मी माझ्या मोबाइलवर सेव्ह केलेली नांवे बदलायला घेतली, आणि त्यांच्या खऱ्या नावाने नंबर सेव्ह केले…
☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “हिऱ्याची अंगठी आणि मी…!!!” – भाग – २ ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆
(‘आजी तुम्हाला मुलाचा फोन नंबर माहित आहे का, पत्ता माहित आहे का? मी तुम्हाला सोडतो, ते वाट बघत असतील तुमची. ‘
‘मला समदं म्हाईत हाय बाळा, पन वाट चुकलेल्याची बघत्यात, सोडून दिलेल्याची न्हायी. माजी वाट बघणारं आता तिथं कुणी न्हायी’ तिने डोळ्याला पदर लावला.)
इथून पुढे – –
निरक्षर आजीने एकाच वाक्यात जीवनाचं कटू सत्य सांगितलं…. *वाट चुकलेल्याची बघत्यात, सोडून दिलेल्याची न्हायी… * माझ्या अंगावर काटा आला.
‘प्रतिष्ठित लोक सुद्धा असे वागतात, खरंच पटत नाही’ मी स्वतःशी पुटपुटलो आजीला ते ऐकू गेलं असावं. ती म्हणाली, ‘बाळा आपल्याकडून दुसऱ्याला काय हवं आसलं, तर दुसरी लोकं आपल्याला किंमत देत्यात, बसाय जागा देत्यात, तूच लय मोठा… तूच लय मोठा म्हून तोंडावर बोलत्यात, त्येला उगंचच झाडावर चढवत्यात… त्येला म्हणत्यात पर्तीशटा….!
‘पर्तीशटा देणाऱ्याला कायतर पायजे आसतं म्हणून त्यो दुसऱ्याला पर्तीशटा देतो…. आन ह्येला वाटतं मी लय परतीष्टीत झालो…! संस्कार महत्त्वाचे बाळा… चरित्र महत्त्वाचं…. पर्तीशटा न्हाय… आपल्याकडचं काई द्यायचं संपलं की लोकं आपल्याला बी पर्तीशटा द्यायची कमी करत्यात, न्हवं देतच न्हायित.. आरं हाड.. आसली पर्तीशटा काय कामाची…? त्या परास संस्कार आनी चरित्र महत्वाचं…
संस्कार आणि चरित्र असं मागून मिळत न्ह्याई रं, ते कमवावं लागतं, आन त्येच कायम राहतं… आशा मानसाला खोट्या पर्तीशटेची गरज नसती, त्यान्ला आपोआप आदर मिळतू…. आपुन गेल्यावर पर्तीशटा बी आपल्या संग जळून जाती… संस्कार आन चरित्र मात्र आपुन गेल्यावर बी हित्तच राहत्यात.. ‘ हित्तच, म्हणताना तिने उकिरड्यावर तीन-चार वेळा हात मारला…
मी आ वासून आजीकडे पाहत राहिलो. ‘आजी कुठे शिकलीस एवढं? शाळेत जाऊन आम्ही फक्त गणित, भूगोल, शास्त्र, इतिहास शिकत असतो. या गोष्टी आम्हाला कोणीच कधी शिकवल्या नाहीत, तू कुठे शिकलीस….? ‘
ती बोलली काहीच नाही, एका बोटाने तिने रस्ता, माणसं आणि उकिरडा दाखवला… परिस्थिती सर्व शिकवते बाळा हेच तिला म्हणायचं असावं.. ती पुढे म्हणाली, ‘कंच्याच साळंत आणि वर्गात चारित्र्य म्हंजी काय, मानूसकी म्हंजी काय ते शिकवीत न्हायित, फुडं जावून मोटा झाला कि मानसाचं वागणं – बोलणं आयीकलं कि समजतंय, आत्ता त्यो कंच्या वर्गात आन यत्तेत (ईयत्तेत) हाय….! ‘
सरस्वतीच्या रूपात एखाद्या आजीनं समोर यावं आणि आयुष्याचं तत्त्वज्ञान शिकवावं असं मला वाटायला लागलं. समोर सरस्वतीच बसलीये तर काहीतरी जाणून घ्यावं, म्हणून मी तिला विचारलं, ‘आजी संस्कार म्हणजे नेमकं काय…?
येडा का खुळा? या नजरेने तिने मला पाहून सांगितलं, ‘तू रोज आंगुळ करतो म्हणजे शरीराची सुद्धी करतो, रोज घर आणि अंगण झाडतो म्हणजे घराची आणि अंगणाची सुद्धी करतो, खरकटी भांडी घासतो म्हणजे भांड्याची सुद्धी करतो, जे नको हाय ते टाकून देनं, आन जे चांगलं हाय ते मनात ठेवनं, म्हंजे संस्कार….! ‘
संस्काराची याहून सोपी व्याख्या कुठली असेल….?
*’मनात संस्कार आनि वागन्यात मानूसकी ठिवली तर चरित्र आपोआप घडतंय बग’* उकिरड्या वरची हातात आलेली काडी घेऊन काहीतरी रेघोट्या मारत ती हे वाक्य बोलून गेली.
आजीच्या समोर उकिरड्यावर बसून मी संपूर्ण ब्रह्मांड पहात असल्याचा भास झाला..!
‘तू कंच्या साळंत जातूस? ‘ मला तीने सहज प्रश्न विचारला.
खरंच या शब्दांनी मला लाज वाटली… आयुष्यभर काय शिकलो होतो आणि आज तिने अर्ध्या तासात काय शिकवले… मला खरंच माझी लाज वाटली! तीला समजणार नाही अशा पद्धतीने गळ्यातला स्टेथोस्कोप दुसरीकडे लपवत, खाली मान घालून मी तिला म्हणालो, ‘आजी मी कंच्याच साळंत जात न्हायी…! ‘
तीने माझ्या खांद्यावर हात ठेवला आणि म्हणाली ‘घोड्या एवढा घोडा झालास तरी अजून कंच्याच साळंत जात न्हायीस… ‘ आत्ता प्रथमच तिच्या चेहऱ्यावरच्या सुरकुत्यांमध्ये हास्य पसरलं होतं.. मी सुद्धा केविलवाणा हसतो आणि उत्तर देतो ‘न्हायी मी कंच्याच साळत जात न्हायी’ हे आणखी खाली मान घालून बोललो आणि विषय बदलतो…
‘आपण पोलिसात जाऊन तुझ्या मुलाविरुद्ध तक्रार देऊया का? पोलीस बरोब्बर त्यांच्या भाषेत तुझ्या मुलाला सांगतील तुला सांभाळायला’ मी म्हणालो.
‘ती घाबरली, चेहऱ्यावरचं हास्य जावून सर्व सुरकुत्यांमध्ये भीती पसरली… ‘नको… नको… पोलीस मारत्याल त्याला, मी अजून चार बोटं न्हाई लावली माज्या लेकाला. त्याला बी तीन लेकरं हायत… बापाला मारताना बघून त्यान्ला कसं वाटल? ‘
पोलीस केस नको म्हणून आजीने माझे पाय धरले. पुन्हा शांत होऊन म्हणाली, ‘पोलिसांच्या भीतीने जरी त्यानं मला घरी न्हेली तरी तो प्रेमानं वागल का माज्याशी? बाळा मला भुकेला “घास” नको प्रेमाचा *भास* पायजे. भीतीनं आनि मारून मुटकून आई सांबाळण्यापेक्षा ती उकिरड्यावरच राहिलेली बरी…
माझा नाईलाज झाला.. एखाद्या वृद्धाश्रमात तीची सोय करायची म्हणून मी फटाफट फोन लावले, खूप वेळानंतर एका ठिकाणी सोय झाली, मी रिक्षा बोलावली. मी हाताला धरून तिला उठवत होतो, तिच्या अंगात त्राण नव्हते, त्यातूनही ती कण्हत म्हणाली, ‘तू जेवलास का रं सोन्या, जेवत जा बाळा टायमावर… ‘
इतका वेळ दाबून धरलेले अश्रू आता मात्र सावरू शकलो नाही. स्वतः दहा दिवस उपाशी राहून दुसऱ्या लेकराच्या भुकेची काळजी करणारी ही माऊली….! तिला आश्रमात सोडले, रिक्षातून उतरताना आभाळाकडे पहात हात जोडून खूप वेळ ती काहीतरी पुटपुटत होती.
मी हसत म्हणालो ‘आजी हा माझ्या मित्राचा वृद्धाश्रम आहे, तुला काहीही काळजी करायची कारण नाही. अध्ये मध्ये मी तुला भेटायला येथे येत जाईन, तुला कशाचीही कमी येथे पडणार नाही. देव तुझ्या सर्व इच्छा पूर्ण करेल बरं… ‘ मी पुन्हा हसत बोललो.
ती म्हणाली, ‘माजी मेली कसली आली विच्छा? आता माझ्या पोराला, सुनेला आणि नातवंडांना सुखाचं आयुष्य दे इतकंच शेवटचं मागितलं.. त्यो तर काय हितं भेटायला येणार नाही. ‘
ज्याने घराबाहेर काढून दिलं, त्याच्याच सुखाची अपेक्षा धरते, आईनं आज पुन्हा तीचं मातृत्व सिद्ध केलं…! तीने पदराने डोळे पुसले, यानंतर डोक्यावरचा पदर सावरत तीने माझे दोन्ही हात हातात घेतले, ते कपाळाला लावले, ‘कोण कुठला रं बाळा तू.. तुज नाव पण मला म्हाईत न्हाई… तू इतकी माजी येवस्ता केलीस… सुकी ऱ्हा माज्या राजा’ म्हणत ती आश्रमाकडे चालू लागली. आश्रमातला कार्यकर्ता तिला हाताला धरून आश्रमाकडे घेऊन जात होता. मी त्या माऊलीला पाठमोरी पहात हात जोडले. जाताना आजी त्याला सांगत होती, ‘चल बाबा, जगण्याचा “सोहळा” संपला आता मेल्यावर “कावळा” यायची वाट पाहायची..!!! ‘
मी काय बोलू??? उरल्या सुरल्या अश्रूंनी माझा शर्ट भरून गेला… अशा अब्जावधी रुपयांच्या अंगठ्या आणि सोन्याची नाणी मला रस्त्याकडेला तळमळत, उकिरड्यावर आणि गटाराशेजारी सापडतात. कशातही किंमत होणार नाही, अशा या सापडलेल्या हिऱ्यांच्या अंगठ्या आणि सोन्याची नाणी मी मनातल्या मनात म्युझियम करून जतन करून ठेवतो, आणि वेळ मिळेल तेव्हा त्याला शब्दरूप देतो. या अंगठ्यांना, ना वजन, ना आकारमान, ना रुपयातली किंमत.. तरीही त्या आहेत मौल्यवान आणि मूल्यवान…!
आता तुम्हीच सांगा माउली, ज्याला खूप वस्तुमान, आकारमान आणि वजन आहे असे शिव्या शाप, तिरस्कार मी सांभाळत बसू?? कि या मौल्यवान आणि मूल्यवान गोष्टींचं जतन, करू….??? मला मिळालेल्या शिव्या शापांबद्दल लिहू, सुरे लावणाऱ्या लोकांबद्दल लिहू, कि तोंडावर थुंकलेल्या आणि चप्पल फेकणाऱ्या लोकांबद्दल लिहू….??? कि इतिहासात कधीही नोंद न होणाऱ्या माणुसकीचं दर्शन घडवू…?
दिवसभरात मला मिळालेले 99 अपमान तिरस्कार मी रोज गाडून टाकतो जाळून टाकतो… आणि रोज नव्या दमानं उठून, उकिरडे, रस्त्याकडेची गटारे, अस्ताव्यस्त पसरलेले फुटपाथ, सुलभ शौचालयाच्या मागील बाजू मी हुंगत असतो, एखाद्या कुत्र्यासारखा….! न जाणो लोकांनी फेकलेल्या अशा मौल्यवान अंगठ्या आणि सोन्याची नाणी मला सापडतील आणि “माणूस” म्हणून मी सुद्धा कधीतरी “श्रीमंत” होऊन जाईन….!!!
तब्बल दहा वर्षांनी गणपतीसाठी सहकुटुंब भारतात आलो.घरचे बाप्पा विराजमान झाल्यावर आईसोबत गप्पा मारताना वाड्यातल्या गणपतीचा विषय निघाला.तेव्हा वाड्यात जायची इच्छा झाली.तिथं पोचलो तर खूप सारं बदललेलं.वाड्यांच्या जागी बिल्डिंग झालेल्या तरी दोनचार वाडे जुन्या काळाची साक्ष देत उभे होते. आम्ही रहायचो त्या वाड्याच्या जागी झालेल्या बिल्डिंगकडे पाहताना खूप साऱ्या आठवणी डोळ्यासमोर आल्या.इतक्यात समोरून साठीपार केलेल्या बाई गणपती घेऊन येताना दिसल्या.कोणीही सोबत नव्हतं.वयानुसार फरक झाला असला तरी मी प्रमीलाकाकूंना ओळखलं.हाक मारल्यावर काकू थांबल्या.
“गणपती बाप्पा मोरया!!”मी उत्साहानं म्हणालो
“मोरया,आपण??”ओळख सांगितल्यावर काकू एकदम खूष.आग्रहानं घरी घेऊन गेल्या.पंधरा बाय वीस फुटांची खोली होती.“अजूनही एकटीचं गणपती मंडळ चालूयं.”
“अध्यक्ष आणि कार्यकर्ती मीच.शक्य आहे तोपर्यंत चालवायचं.नंतरचं माहीत नाही.तुला तर माझा स्वभाव माहितीये.तुसडी म्हणून फेमस आहे.जरा जास्तच स्पष्ट बोलते.प्रत्येकाशी भांडलेय.लोक अंतर ठेवून वागतात.जास्त नादी लागत नाही.कोणी येत पण नाही ”
“आता उतरत्या वयात एकटेपणाचा त्रास होत असेलच”
“कसला त्रास उलट आयुष्यभर तोच सोबतीला राहिलाय”काकू भकास हसल्या.
“असं का बोलता.बहिणी आहेत की..”
“नावापुरती असलेली रक्ताची नाती म्हणजे अवघड जागेची दुखणी.सहन होत नाही अन सांगता येत नाही.”
“मूर्ती छान आहे”मी मुद्दाम विषय बदलला.
“आवडली ना.आई-वडील गेले.बहिणी संसारात रमल्या.नशिबात लग्नाचा योग नसल्यानं मी एकटी राहिले.तेव्हापासून वडिलांची गणपती सेवेची परंपरा चालवतेय.”
“वाडा जाऊन बिल्डिंग आली तरी तुम्ही मात्र तशाच आहात.”
“आणि शेवटपर्यंत अशीच राहणार.जी काही जमापुंजी आहे त्यात छान चाललंय.”
“तरीपण सोबत पाहिजे ना”
“आता दहा दिवस साक्षात गणपती सोबतीला आहेत.अजून काय पाहिजे.इतरवेळी नाही पण गणपतीत माझं दार सर्वांसाठी खुलं असतं.संध्याकाळची आरती तर मुलांच्या हस्तेच आणि रोज वेगवेगळा प्रसाद असतो.”
“हो.आठवतंय.लहानपणी मीसुद्धा दोनदा आरती केलीय.”
“पूर्वी वाड्यातली मुलं करायची आता बिल्डिंगमधली मुलं करतात.”
“तुमची गणपतीवर खूप श्रद्धा आहे.”
“तोच माझा एकमेव आधार.हा एकच पाहुणा नियमितपणे माझ्याकडं येतो.दहा दिवसाच्या मुक्कामात वर्षभराची ऊर्जा देतो.आमच्यात खूप गप्पा होतात म्हणजे मी बोलते आणि बाप्पा ऐकतात.मन मोकळं केल्यानं छान वाटतं.”
“नातेवाईक जाऊ दया.तुम्हांला मैत्रिणसुद्धा नाही.”
“खरं सांगू,आलेल्या वाईट अनुभवांमुळे कोणावरच विश्वास राहिला नाही.बहीणींनी फसवलं आणि वडिलांची प्रॉपर्टी आपसात वाटून घेतली अन हे घर मला दिलं.त्यालाही वारस म्हणून स्वतःचीच नाव लावली.मतलबी माणसांपेक्षा एकटेपणा बरा.”काकू बोलायच्या थांबल्या.मलाही काय बोलावं असा प्रश्न पडलेला.काहीवेळ शांतता होती. काकू म्हणाल्या “आवर्जून भेटलास,
बोललास खूप बरं वाटलं.शक्य झालं तर आरतीला ये” मी नकार देऊ शकलो नाही.नमस्कार करून निघालो.जाताना वळून पाहिलं तर तिसऱ्या मजल्यावरील खिडकीतून पाहणाऱ्या काकूंचा चेहरा निर्वीकार होता पण डोळे मात्र पाणावलेले.
“पाऊस” एकच पण प्रत्येकासोबत त्याचं नातं वेगवेगळं असतं – गणपतीचं बाप्पांचं सुद्धा तसंच !!