हिन्दी साहित्य – ☆ लघुकथा ☆ पहचान ☆ – डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

(डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी जी  लघुकथा, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ, बालकथा, बोधकथा, लेख, पत्र आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं.  आपकी रचनाएँ प्रतिष्ठित राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं. हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे पाठकों को आपकी उत्कृष्ट रचनाएँ समय समय पर पढ़ने को मिलती रहेंगी. आज प्रस्तुत है आपकी लघुकथा  “पहचान”.)

 

 ☆  पहचान ☆ 

 

उस चित्रकार की प्रदर्शनी में यूं तो कई चित्र थे लेकिन एक अनोखा चित्र सभी के आकर्षण का केंद्र था। बिना किसी शीर्षक के उस चित्र में एक बड़ा सा सोने का हीरों जड़ित सुंदर दरवाज़ा था जिसके अंदर एक रत्नों का सिंहासन था जिस पर मखमल की गद्दी बिछी थी।उस सिंहासन पर एक बड़ी सुंदर महिला बैठी थी, जिसके वस्त्र और आभूषण किसी रानी से कम नहीं थे। दो दासियाँ उसे हवा कर रही थीं और उसके पीछे बहुत से व्यक्ति खड़े थे जो शायद उसके समर्थन में हाथ ऊपर किये हुए थे।

सिंहासन के नीचे एक दूसरी बड़ी सुंदर महिला बेड़ियों में जकड़ी दिखाई दे रही थी जिसके वस्त्र मैले-कुचैले थे और वो सर झुका कर बैठी थी। उसके पीछे चार व्यक्ति हाथ जोड़े खड़े थे और कुछ अन्य व्यक्ति आश्चर्य से उस महिला को देख कर इशारे से पूछ रहे थे “यह कौन है?”

उस चित्र को देखने आई दर्शकों की भीड़ में से आज किसी ने चित्रकार से पूछ ही लिया, “इस चित्र में क्या दर्शाया गया है?”

चित्रकार ने मैले वस्त्रों वाली महिला की तरफ इशारा कर के उत्तर दिया, “यह महिला जो अपनी पहचान खो रही है….. वो हमारी मातृभाषा है….”

अगली पंक्ति कहने से पहले वह कुछ क्षण चुप हो गया, उसे पता था अब प्रदर्शनी कक्ष लगभग खाली हो जायेगा।

 

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर-5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) – 313 002

ईमेल:  chandresh.chhatlani@gmail.com

फ़ोन: 9928544749

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ तन्मय साहित्य # 18 – प्रत्याशी मीमांसा…… ☆ – डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

डॉ  सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

 

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है  एक सामयिक बेबाक रचना   “प्रत्याशी मीमांसा……। )

 

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य – # 18☆

 

☆ प्रत्याशी मीमांसा…… ☆  

 

वोट डालना धर्म हमारा

और कुकर्म तुम्हारे हैं

तुम राजा बन गए

वोट देकर तो हम ही हारे हैं।

 

एक चोर इक डाकू है

ठग एक, एक है व्यभिचारी

एक लुटेरा, हिंसक है इक

और एक अत्याचारी,

ये हैं उम्मीदवार तंत्र के

पंजीकृत ये सारे हैं

तुम राजा…………।

 

चापलूस है कोई तो

कोई धन का सौदागर है

कोई है आतंकी इनमें

तो कोई बाजीगर है,

वोट इन्हीं को है देना

ये खुद के खेवनहारे हैं

तुम राजा………….।

 

इनमें हैं मसखरे कई

कोई नौटंकी वाले हैं

कुछ ने पहन रखी ऊपर

शेरों सी नकली खालें है,

संत महंत, माफ़ियाओं के

हिस्से न्यारे-न्यारे हैं

तुम राजा……………।

 

कुछ राजा कुछ संत्री-मंत्री

इनमें कुछ षड्यंत्री हैं

हैं रागी तो कुछ बैरागी

कुछ औघड़िये तंत्री हैं,

बाना जोगी, सुविधाभोगी

खबरी ये हरकारे हैं

तुम राजा…………..।

 

इनमें राष्ट्र विरोधी कुछ

कुछ काले धंधे वाले हैं

कुछ एजेण्ट विदेशों के

कुछ के अपने मदिरालै हैं,

काले पैसों के इस दंगल में

कुछ अलग नजारे हैं

तुम राजा…………….।

 

नेताओं के नाती-पोते

कुछ के बेटे बेटी हैं

भरे पेट वालों के ही तो

कब्जे में मतपेटी है,

भूखे नंगे बेबस जन के

बनते सर्जनहारे हैं

तुम राजा………….।

 

जिनके चेहरे हैं उजले

वे सब गूंगे औ’ बहरे हैं

साफ छबि वालों के मुंह पर

आदर्शों के पहरे हैं,

जब्त जमानत उनकी

जो सीधे सादे बेचारे है

तुम राजा बन गए

वोट देकर तो हम ही हारे हैं।।

 

© डॉ सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – षष्ठम अध्याय (43) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

षष्ठम अध्याय

( योगभ्रष्ट पुरुष की गति का विषय और ध्यानयोगी की महिमा )

 

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्‌।

यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ।।43।।

 

वहां पूर्व संयोग से ,फिर लेकर नयी आश

कुरूनंदन जाता नहीं कोई व्यर्थ प्रयास।।43।।

 

भावार्थ :  वहाँ उस पहले शरीर में संग्रह किए हुए बुद्धि-संयोग को अर्थात समबुद्धिरूप योग के संस्कारों को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभाव से वह फिर परमात्मा की प्राप्तिरूप सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है ।।43।।

 

There he comes in touch with the knowledge acquired in his former body and strives more than before for perfection, O Arjuna! ।।43।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

 

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 13 ☆नया ज़माना ☆ – सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा

 

(सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी  सुप्रसिद्ध हिन्दी एवं अङ्ग्रेज़ी की  साहित्यकार हैं। आप अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय /प्रादेशिक स्तर  के कई पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं । हम आपकी रचनाओं को अपने पाठकों से साझा करते हुए अत्यंत गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार शीर्षक से प्रत्येक मंगलवार को हम उनकी एक कविता आपसे साझा करने का प्रयास करेंगे। आप वर्तमान में  एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर (सिस्टम्स) महामेट्रो, पुणे हैं। आपकी प्रिय विधा कवितायें हैं। आज प्रस्तुत है आपकी  कविता “नया ज़माना ”। )

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सुश्री नीलम सक्सेना चंद्रा जी का काव्य संसार # 13 ☆

 

☆ नया ज़माना 

ज़िंदगी के कदम कुछ परेशान, जिस्म लगता लाचार

हर कोई है चैन की खोज में, पर मिलता नहीं क़रार

 

बहला लेता है हर कोई दिल को, माना कि वो झूठ है

और इस दाग़ से लिपटे कपट की, लगती जाती कतार

 

नए ज़माने के नए रंग-ढंग हैं, किसको किसकी फिकर

पहले जो ठोस से खड़े थे रिश्ते, उनमें आ गयी दरार

 

हर कोई सोचता है अपनी-अपनी, नरमी खो गयी है

प्यार भी एक धोखे सा रह गया, मिट गया ऐतबार

 

सुकून अब कहाँ पाएंगी हवाएं, वो भी प्रदूषित हो गयीं

नीलम बैठे-बैठे सोच में खोयी है, कहाँ जा रहा संसार

 

© नीलम सक्सेना चंद्रा

आपकी सभी रचनाएँ सर्वाधिकार सुरक्षित हैं एवं बिनाअनुमति  के किसी भी माध्यम में प्रकाशन वर्जित है।

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन – ☆ संजय दृष्टि – प्राणज्योति ☆ – श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

 

(श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। अब सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकेंगे। ) 

 

☆ संजय दृष्टि  – प्राणज्योति

 

जगत में रहकर

जगत से निर्लिप्त रहने की

वृत्ति पर मुस्कराती रही,

विदेह होने के लिए

पहले देह होने का पाठ

प्राणज्योति पढ़ाती रही!

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य – ☆ काश ये हो पाता …. ☆ – डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

 

(आज प्रस्तुत है डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’ जी  द्वारा रचित एक सामयिक, सार्थक एवं सटीक व्यंग्य  “काश ये हो पाता …”।   व्यंग्य के अंत में  कमेंट बॉक्स में कमैंट्स देना न भूलें। )

 

☆ काश ये हो पाता …. ☆

 

भारतीय संस्कृति, हिन्दुधर्म, सनातन परम्पराओं तथा रिश्तों की प्रगाढ़ता से तो विदेशी भी अभिभूत रहते हैं परन्तु जमीनी हकीकत शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में नजदीकी भ्रमण से ही पता चलती है। हम अपने मियाँ मुँह मिट्ठू सदा से बनते आये हैं। अपनी तारीफों के पुल बाँधते लोग कहीं भी दिख जायेंगे। वैसे तो देश के मंत्री-संतरियों से लेकर आम आदमी तक विदेशों तक में अपना लोहा मनवाने और अपना झंडा गाड़ने का सामथ्र्य रखता है। अपने दृष्टिकोण और अपनी हर अच्छी-बुरी बात को सही मनवाना अपने बाँये हाथ का खेल समझता है। ऐसा ही एक वाक्या विगत दिनों मेरे साथ हुआ जब एक सज्जन ने अपने इस शहर की सड़कों, स्ट्रीट लाईट्स, सरकारी नलों, ट्रैफिक पुलिस और साहित्यकारों की विचित्र स्थितियों पर हमसे लम्बी चर्चा की। कई विषयों पर उन्होंने मुझे विस्तार पूर्वक समझाने की कोशिश की पर मेरी समझ के परे ही रहा।  उनका कहना था कि जबलपुर की सड़कों के गड्ढों से लोग परेशान कम लाभान्वित ज्यादा हो रहे हैं। मैंने जब बड़े विस्मयभाव से पूछा कि कैसे, तो उन्होंने बताना शुरू किया कि गड्ढों भरी सड़क पर चलते समय कूद-कूदकर गड्ढे पार करने और संतुलन बनाए रखने से लोगों की एक्सरसाइज होती है, जिससे मॉर्निंग अथवा ईव्हनिंग वाक पर जाने की जरूरत नहीं पड़ती, इस बचे हुए समय का उपयोग ये लोग बड़ी सिद्दत से किसी दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्यों में कर लेते हैं। इन सड़कों पर जब वाहनों का उपयोग किया जाता है तो गड्ढों द्वारा उत्पन्न हिचकोलों से लोगों का पाचन संस्थान और एक्टिव हो जाता है। भोजन को पचाने के लिए अलग से कोई डाईजिन टेबलेट्स या अन्य पाचक चूर्ण नहीं खाना पड़ता। इन गड्ढों के कारण लोगों के वाहन तेज रफ्तार से नहीं भाग पाते जिससे एक्सीडेंट के खतरे की गुंजाईश लगभग समाप्त हो जाती है। आप मानें या न मानें, ये गड्ढे स्पीड ब्रेकर का भी काम करते हैं, जिससे स्पीड ब्रेकर बनाने में खर्च होने वाले सरकारी पैसे तथा समय दोनों की बर्बादी रुकती है। ऐसे में आपके दिमाग में ये जरूर आया होगा कि जब तेज रफ्तार नहीं तो ट्रैफिक पुलिस की क्या आवश्यकता है। तब उनका मानना था कि यदि फायदे न होते तो ट्रैफिक पुलिस का गठन ही क्यों किया जाता? वैसे भी बिना गड्ढों वाली सड़कों पर ये पुलिस वाले ट्रैफिक व्यवस्था देखते ही कब हैं। हमने तो इन्हें बगुलों की तरह शिकार पर पैनी नजर रखते देखा है अथवा चंद पैसों के लिए लार बहाते देखा है। कतिपय पुलिस वाले एनकेनप्रकारेण चालान काटने का डर दिखाकर लोगों से पैसे ऐंठ लेते हैं और उन पैसों से अपनी जरूरतें तथा शौक पूरे करते हैं। होटलों तथा बार में लंच, डिनर, पीना-खाना इनके प्रिय शगल होते हैं। इससे एक ओर इनको होटल का लजीज खाना मिल जाता है वहीं घर में उनकी बीवियों को भी खाना न बनाने की वजह से आराम मिल जाता है। फिर यदि  सड़कों की मरम्मत हेतु जनता परेशान होकर गुहार लगाती है तो नगर निगम सड़कों के गड्ढे भरने के लिए ठेका दे देता है। ठेका में कमीशन बाजी होती है। जब कमीशन बाजी होगी तो गुणवत्ता निश्चित रूप से कम होगी ही। जहाँ गिट्टी-डामर या सीमेंट-रेत-गिट्टी लगाना चाहिए वहाँ आसपास का मलमा, मिट्टी और राखड़ वगैरह डालकर गड्ढे भर दिए जाते हैं। लोगों और संबंधित अधिकारियों की आँखों में धूल झोंकने के लिए ज्यादा हुआ तो मलमा और ईंटों के टुकड़ों से भरी गई सड़कों पर काली डस्ट डाल दी जाती है, जिससे यह समझ में नहीं आता कि इनमें केवल खानापूर्ति की गई है।

अब स्ट्रीट लाइट की बात करें तो स्ट्रीट लाइट से दबंग लोगों के घरों के सामने लगे सोडियम लेम्प, मरकरी लेम्प, हाई मॉस लाइट उनकी बिल्डिंगों को जगमगाते हैं। अपने जगमग घरों को देखकर ये लोग फूले नहीं समाते, वहीं आम लोगों की भी समझ में आता रहता है कि ये धन्नासेठों-राजनेताओं के मकान हैं। इससे यह भी होता है कि इन बिल्डिंग वालों को बाहर अतिरिक्त कोई लाईट नहीं जलाना पड़ती। कारपोरेशन का प्रकाश आँगन, लॉन या टेरिस पर आने-जाने, उठने-बैठने या मौज-मस्ती हेतु पर्याप्त होता है। स्ट्रीट लाईट वाले अक्सर लाईट बुझाना भूल जाते हैं, इससे फायदा ये होता है कि ये लाइटें उल्टे दिन में सूर्य को प्रकाशित करती रहती हैं। वहीं शाम को कर्मचारी द्वारा लाईट जलाने की जहमत नहीं उठाना पड़ती, इससे मानो कुछ कर्मचारियों की अघोषित छुट्टी हो जाती है और ये अपने दूसरे काम निपटा लेते हैं। लाईटें खराब न होने पर भी उन्हें बदलने के बहाने कीमती लाईट से संबंधित सामान इश्यू करा लिए जाता है, जिसे बेचकर कर्मचारी कुछ अतिरिक्त पैसे कमा लेते हैं। इससे उनके कई छोटे-मोटे सपने भी पूरे होते रहते हैं। मैंने सोचा इसमें भी क्या बुरा है, देश का पैसा देश में तो रहता है। लोग तो विदेशी स्विस बैंक में पैसे जमा करते हैं, जो उनके अलावा दूसरे के काम आता ही नहीं है। शिकायतें करने का दायित्व पब्लिक हमेशा की तरह एक-दूसरे पर छोड़ती है, जिससे कार्यवाही के अभाव में कर्मचारियों पर अंकुश नहीं लग पाता और सब यूँ ही चलता रहता है।

यही हाल सरकारी नलों एवं निगम के टैंकरों के होते हैं। इसी तरह की छोटी-छोटी छूटों या खामियों का फायदा उठाने में कुछ विशेष किस्म के माहिर लोग होते हैं। ये लाईट न होने या फाल्ट सुधारने के नाम पर नल-जल की सप्लाई बंद करवा देते हैं जिससे पानी के टैंकरों की बिक्री बढ़ जाती है। वाटर सप्लायर्स भी खुश हो जाते हैं। वहीं पत्नीव्रता पतियों की सारे घर के कपड़े धोने की छुट्टी स्वतंत्रता दिवस के रूप में बदल जाती है। शहर के अधिकांश नलों की टोंटियाँ लोगों के घरों में देखी जा सकती हैं। बूँद-बूँद पानी का महत्त्व समझने वाले बड़े शहरों के लोगों को ये सब देखकर आश्चर्य होता है। उन्हें हमारी खुशकिस्मती पर ईष्र्या होने लगती है, पर हमारे नगर निगम का तजुर्बा है कि बिना टोंटी के नलों से बहने वाला पानी वातावरण को शीतलता प्रदान करता है और पानी द्वारा उत्पन्न लहलहाती हरियाली से शहर की सुंदरता में चार चाँद लगते हैं। कहीं कहीं यह पानी छोटी-छोटी झीलों का रूप धारण कर लेता है जहाँ लोग श्वेत बगुलों को तैरते देख आनन्दानुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

हमारे एक दोस्त का कहना है कि जो आदमी अपनी बुद्धि का जितना उपयोग करता है उसकी जेब उतनी ज्यादा गर्म रहती है। पर मेरा मानना है कि बुद्धि के सदुपयोग से ज्यादा बुद्धि के दुरुपयोग से जल्दी और ज्यादा पैसा कमाया जा सकता है परन्तु यह काम सोने पर सुहागा तब हो जाता है जब इन परम बुद्धिमानों का जेल गमन होता है। वहाँ तो खाना-पीना और पैर पसार कर सोना सब मुफ्त उपलब्ध होने लगता है, समाचार पत्रों और मीडिया की हेड लाइन बनना उनके लिए आम बातें हो जाती हैं।

आगे साहित्यकारों के बारे में उन्होंने बताया कि आज के साहित्यकारों द्वारा दूसरों की रचनाएँ पढ़ने का शौक ही खत्म हो गया है। ये तो बस अपनी सुनाना चाहते हैं, जिससे आत्मावलोकन या स्वमूल्यांकन के अवसर ही नहीं आ पाते। इसीलिए किसी दूसरे की नई या पुरानी रचना को देखकर, उसमें कुछ फेरबदल कर या पात्र बदलकर कम मेहनत में रचना तैयार कर ली जाती है, जो कुछ साहित्यकारों के बीच अपनी धाक जमाने में काम आती है। ऐसे लोग भाषा के जानकार तो होने के साथ साथ अपने नकल-कौशल से अपना लोहा मनवाने का भी हुनर रखते हैं। इनसे पूछने पर इनका सीधा जवाब होता है कि रचना तो ऊपर से उतरती है, हम तो बस अपनी कलम चलाते हैं। परोक्ष रूप में उनके श्रीमुख से सच ही निकल जाता है कि वे बस अपनी कलम चलाते हैं। विचार तो पके-पकाये मिल ही जाते हैं। रात के 2,00 – 3,00 बजे तक जागने की बजाए दूसरों का, दूसरे देशों का साहित्य चुराकर अपना सीना ठोकते हुए ऐसे लोग अपने नाम से उस रचना को सुनाना ज्यादा आसान मानते हैं। पकड़े जाने पर उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे वाली कहावत सार्थक कर देते हैं। अक्सर इन सबका एक ही कहना रहता है कि मैंने नहीं उनने मेरी रचना चुराई है। ऐसे शब्दों के हेरफेर करने वाले लोग आज बहुतायत में देखे जा सकते हैं। आजकल यह भी देखा गया है कि लोग अपना बेशकीमती समय खपाकर जब एक रचना का सृजन करते हैं तो उसका प्रतिफल उन्हें न के बराबर मिलता है, लेकिन एक या दो रचना लेकर पूरा इंडिया घूमने वाले कवि, चुटकुलेबाज अनेक मिल जाएँगे। इतना सब कुछ करने और चिंतन-मनन के बाद अब हमारी भी तीव्र इच्छा होने लगी है कि ऐसी मेहनत किस काम की जो दो पैसे भी न दिला सके। इससे अच्छा तो आज मंच से तथाकथित नामी-गिरामी चुटकुलेबाज, कवि एक-दो मुक्तक की आड़ में 25-50 चुटकुले सुनाकर रुपये कमा लेते हैं, वाहवाही लूटते रहते हैं। हम ऐसे श्रोताओं को अतिरिक्त धन्यवाद देना चाहेंगे जो इन तथाकथित प्रसिद्धिप्राप्त चुटकुलेबाजों की आय के साधन हैं। लेकिन हमें तरस आता है अपने उन उत्तम और सच्चे साहित्यकारांें पर जो धन के महत्त्व को समझते हुए भी उनकी लाईन में जाना पसंद नहीं करते! और देखिए, जनता आखिरी तक इंतजार करती रह जाती है कि शायद अब एक आदर्श रचना उनसे सुनने मिलेगी मगर चुटकुलेबाज कभी अपने घटियापन से बाज नहीं आते। वे निम्न स्तरीय बातों या नेताओं पर बनाये चुटकुलों की झड़ी लगा देंगे लेकिन उस कवि सम्मेलन के नाम की सार्थकता एक दिशाबोधी कविता सुनाकर सिद्ध नहीं करेंगे। अरे भाई वे तो बस फिल्मी धुनों पर पैरोडी सुनाते हैं और जनता को चुटकुले सुना-सुनाकर बहलाते रहते हैं।

तथाकथित सज्जन की बातों से मेरा सिर चकराने लगा था। उनकी बातों में कुछ बात तो थी। मैंने उनसे कहा बस भी करो भाई। मुझे और भी काम हैं, इतना कहते हुए तेजी से उन्हें वहीं छोड़कर भाग निकला परंतु उनकी उल्टी बातें मुझे सीधा सोचने पर मजबूर कर रहीं थी। काश! एक बार फिर हमारे साहित्यकार बंधु अपने दायित्व को समझते। बिजली वाले, नगर निगम वाले या और सभी सरकारी कर्मचारी- अधिकारी अपना फर्ज निभाते तो समाज और देश की आधी से ज्यादा समस्याएँ वैसे ही समाप्त हो जातीं और सामान्य जनता राहत की साँस लेती। काश! ये हो पाता…, यही सोचता हुआ मैं अपने घर की ओर भाग रहा था।

 

© विजय तिवारी  “किसलय”, जबलपुर 

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 10 ☆ इस समय तक ☆ – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”  शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।  अब आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है  पुस्तक “इस समय तक ” पर श्री विवेक जी की पुस्तक  चर्चा।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 10  ☆ 

☆ पुस्तक – इस समय तक 

पुस्तक – इस समय तक

लेखक : धर्मपाल महेंद्र जैन, टोरंटो, केनेडा

कविता संग्रह इस समय तक क)

धर्मपाल महेंद्र जैन, टोरंटो, केनेडापृष्ठ १६०, मूल्य २५०, हार्ड बाउंड,  टेबल बुक

पृष्ठ  १६०, मूल्य २५०, हार्ड बाउंड,  टेबल बुक

प्रकाशक.. शिवना प्रकाशन सीहोर

☆ काव्य संग्रह : इस समय तक – चर्चाकार…विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

कवि के समाज सापेक्ष मनोभावो की कलात्मक अभिव्यक्ति ही कविता होती है. धर्मपाल महेंद्र जैन का अनुभव संसार व्यापक रहा है, वे झाबुआ जैसे गांव में जन्म लेकर आज टोरंटो में जा बसे हैं, ३५ वर्षो तक भारतीय बैंको में  जिम्ंमेदार पदो पर कार्यरत रहते हुये उन्होने लोगों को बहुत पास से पढ़ा हैं. शिवना प्रकाशन सीहोर ने इंटरनेट के माध्यम से और मुद्रण के स्तरीय पैमानो पर नये लेखको को वैश्विक मंच दिया है. इसी क्रम में इस समय तक कविता संग्रह के रूप में  माँ, प्यार, बेटी, शब्द, गांव, प्रकृति, सत्ता, आदमी जैसे शीर्षको के अंतर्गत विभिन्न उप शीर्षको से छोटी बड़ी कवितायें करीने से प्रस्तुत की गई हैं. शिवना प्रकाशन ने किंचित न या प्रयोग करते हुये चौकोर आकार की सुंदर सी पुस्तक के रूप में इन कविताओ को साफ सुथरी प्रिंटिग में सहेजा है.डा कमल किशोर गोयनका नें भूमिका में बहुत अच्छी तरह  कवि की रचनात्मक संवेदना को पहचाना  है. हर कविता एक सुविचार को रेखांकित करती है, व पाठक को वैचारिक सामग्री देती है, जिसे वह अपनी समझ के अनुसार पोषित कर  सकता है.

 

चर्चाकार.. विवेक रंजन श्रीवास्तव, ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं – # 20 – अधूरा ख्वाब ☆ – श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

 

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक अतिसुन्दर लघुकथा “अधूरा ख्वाब”।  श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ़ जी  ने  इस लघुकथा के माध्यम से  एक सन्देश दिया है कि – ख्वाब देखना चाहिए। यह आवश्यक नहीं की सभी ख्वाब अधूरे ही होते हों । कभी कभी अधूरे ख्वाब भी  पूरे हो जाते हैं। ईमानदारी से प्रयास का भी अपना महत्व है।) 

 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 20 ☆

 

☆ अधूरा ख्वाब ☆

 

जीवन लाल और धनिया दोनों मजदूरी करते थे। दिन भर काम करने के बाद जो मिल जाता उसे बड़े प्रेम से ग्रहण कर भगवान को धन्यवाद करते थे। उनकी एक छोटी सी बिटिया थी। वह भी बहुत धीरज वाली थी। कभी किसी चीज के लिए परेशान नहीं करती थी। बहुत कम उम्र में ही उसने अपने आप को संभाल लिया और सहनशक्ति, संतोष की धनी बन गई। उसके दिन भर इधर-उधर चहकने और खेलने कूदने के कारण जीवन लाल और धनिया अपनी बेटी को ‘चिरैया’ कहते थे।

चिरैया धीरे-धीरे बड़ी होने लगी आसपास के घरों में मां के साथ जाती। बड़े बड़े झूले लगे देख उसके बाल मन में बहुत खुशी होती कि, उसका अपना भी कोई बड़ा सा झूला हो, जिसमें बैठकर वह पढ़ाई करती, गाना गाती और माँ-बापू को भी झूला झूलाती। पर किसी के घर उसको झूले में बैठने की अनुमति नहीं मिलती थी।

गार्डन में लगा झूला देख मन  ही मन प्रसन्न हो जाती थी। कभी-कभी बापू के साथ झूल आया करती थी। पर उसका ख्वाब उसके मन में घर बना चुका था।

चिरैया बड़ी हो गई पास में ही एक अच्छे परिवार के लोग किराए से रहने आए। उनका सरकारी स्थानांतरण हुआ था। चिरैया की माँ उनके घर काम पर जाती थी। पर अब चिरैया बड़ी हो गई थी। उसे किसी के यहाँ जाना अच्छा नहीं लगता था।

एक बार बाहर से उनका पुत्र आया, रास्ते में जाते हुए चिरैया को देख उसे पसंद कर अपने मम्मी पापा से शादी की इच्छा बताई। पूछने पर पता चला वह तो अपनी धनिया की बिटिया है। मम्मी पापा अपने इकलौते बेटे की खुशी को तोड़ना नहीं चाह रहे थे। उन्होंने धनिया से उसकी लड़की का पसंद जानना चाहा। परन्तु, गरीब की क्या पसंद और क्या नापसंद।

चिरैया तैयार हो गई। घर में ही सगाई हो गई, और जीवनलाल ने हाथ जोड़कर समधी जी से कहा “मेरी बिटिया को बड़े झूले में बैठने का बहुत शौक है। अब आपके घर पूरा होगा। मैं आपको कुछ भी नहीं दे सकता। अब बिटिया आपकी बहू हो गई।” शहर में शादी होनी थी। जीवनलाल धनिया और चिरैया सभी को लेकर शहर आ गए।

उनका आलीशान बंगला देख कर इन लोगों का मन भर आया। सभी आसपास पूछने लगे कि लड़की के घर से क्या आया है। सज्जन व्यक्ति ने सभी से कहा “शाम को आइए घर  पर सब दिख जाएगा।”  माँ बापू दोनों एक कमरे में बैठे थे बंगला चारों तरफ से सजा हुआ था। शाम को बड़े से गार्डन के बीच बहुत बड़ा झूला लगा था। बहुत कीमती उस पर सोने चांदी, हीरो की हार पहने चिरैया बैठी थी। किसी राजकुमारी की तरह कीमती पोशाक पहन। दुल्हन को कीमती झूले पर बैठे देख सबकी आंखें देखती रह गई।

चिरैया तो बस अपनी सुंदरता लिए बड़ी- बड़ी आंखों से सब देख रही थी। बेटे के पिताजी ने सबका ध्यान आकर्षित कर कहा “यह खूबसूरत सी बिटिया और यह कीमती झूला हमारे समधी साहब के यहाँ से आया है।” पास खड़े जीवनलाल और धनिया बस अपनी बिटिया को झूले पर सोलह सिंगार किए बैठे अपलक देख रहे थे।

बरसों का अधूरा ख्वाब आज पूरा हुआ दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे।

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 5 – ☆ चंद्रकळा  – कवयित्री शांताबाई ☆ – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

 

(सुश्री ज्योति  हसबनीस जीअपने  “साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी ” के  माध्यम से  वे मराठी साहित्य के विभिन्न स्तरीय साहित्यकारों की रचनाओं पर विमर्श करेंगी. आज प्रस्तुत है उनका आलेख  चंद्रकळा  – कवयित्री शांताबाई। इस क्रम में आप प्रत्येक मंगलवार को सुश्री ज्योति हसबनीस जी का साहित्यिक विमर्श पढ़ सकेंगे.)

 

☆साप्ताहिक स्तम्भ – काव्य दिंडी # 5 ☆

 

☆ चंद्रकळा  – कवयित्री शांताबाई  ☆ 

 

काव्य दिंडीचा आजचा चौथा दिवस ! उद्यापासून दिंडीचा भोई बनून येत्येय माझी अष्टपैलू व्यक्तिमत्व लाभलेली रसिक विदुषी मैत्रिण, सौं अनघा नासेरी ! श्वेताने दिलेलं सस्नेह निमंत्रण आणि पर्यायाने

एका उत्सवात सामील झाल्याचा आनंद, त्या आनंदात पडलेली पावलं, आणि आता हळूच काढतं पाऊल घेण्याची आलेली वेळ. एक विचित्र हुरहूर मनाला लागली असतांनाच शांताबाईंची अपूर्व शब्दसाजातली, भावगर्भरेशमी, देखणी ‘चंद्रकळा’मनात भरली. तिचा गहिरा रंग, तिचा मुलायम स्पर्श एका अनोख्या भावविश्वात घेऊन गेला, आणि आठवणींचं मोहोळ उठलं ते त्या चंद्रकळेला बिलगूनच़! निर्व्याज निरागस बाल्य, मुग्ध किशोरावस्था, अवखळ, नवथर तारूण्य, परिपक्व, जवाबदार प्रौढ कर्तेपण, जीवनातल्या ह्या सा-याच टप्प्यांचे भावबंध ह्या चंद्रकळेतच गुरफटलेत ह्याची जाणीव झाली, आणि जाणीव झाली ती एका हळव्या टप्प्याची…मावळतीच्या वाटचालीची ! आयुष्यातला रंगोत्सव आता ओसरलाय, ऐन भरातल्या चंद्रकळेची गहिरी रंगछटा आता फिकट होतेय, तिची घप्प वीण आता विसविशीत झालीय, याचा अपरिहार्यपणे स्वीकार करतांना काळजात कळ उठतेच, चंद्रकळेची ओसरणारी रूपकळा बघून नकळतपणे एक खिन्न उसासा बाहेर पडतोच !

अप्रतिम वीणीची ही ‘चंद्रकळा’ शांताबाईंच्या तरल संवेदनक्षम स्पंदनांचा नादमय झंकारच ठरावा !

 

☆ चंद्रकळा ☆

 

आठवणीतिल चंद्रकळेचा

गर्भरेशमी पोत मऊ

गर्भरेशमी पदरापोटी

सागरगोटे नऊखऊ

 

आठवणीतिल चंद्रकळेवर

तिळगुळनक्षी शुभ्र खडी

कल्पनेत मी हलक्या हाती

उकलून बघते घडीघडी

 

आठवणीतिल चंद्रकळेचा

हवाहवासा वास नवा

स्मरणाने अवतीभवती

पुन्हा झुळझुळे तरूण हवा

 

आठवणीतिल चंद्रकळेच्या

पदराआडून खुसूखुसू

जरा लाजरे, जरा खोडकर

पुन्हा उमटते गोड हंसू

 

आठवणीतिल चंद्रकळेवर

हळदीकुंकू डाग पडे

संक्रांतीचे वाण घ्यावया

पदर होतसे सहज पुढे

 

आठवणीतिल चंद्रकळा ती

जीर्ण होऊनी आज विटे

उदास फिकट रंगाआडून

एक उसासा क्षण उमटे

 

© ज्योति हसबनीस,

नागपुर  (महाराष्ट्र)

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #21 – माझा परिचय ☆ – श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं।  आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता  “माझा परिचय”।)

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 21 ☆

 

☆ माझा परिचय ☆

 

प्रदूषणाने घटे तुझे वय

मी वनवासी नसे मला भय

 

ताड माड हे माझे स्वामी

सांगतील ते माझा परिचय

 

त्यांच्या चरणी सेवा माझी

मिळे सावली नाही संशय

 

वृक्ष वल्लरी सखे सोयरे

त्यांचे माझे नाते अक्षय

 

कसे जगावे वृक्ष सांगती

पानोपानी हिरवा आशय

 

फळा-फुलांची ही वनराई

त्यांची कत्तल तुझा पराजय

 

निसर्ग करतो वृक्षारोपण

नाही फोटो नाही अभिनय

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

ashokbhambure123@gmail.com

 

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