हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – कविता में विज्ञान…, आत्मकथ्य ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – कविता में विज्ञान…, आत्मकथ्य🙏 ? ?

(कुछ वर्ष पूर्व किसी पत्रिका ने कविता में विज्ञान पर आत्मकथ्य मांगा था। राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर आज उसे विनम्रता से साझा कर रहा हूँ।)

विज्ञान को सामान्यतः प्रत्यक्ष ज्ञान माना गया है जबकि कविता को कल्पना की उड़ान। ज्ञान, ललित कलाओं और विज्ञान में धुर अंतर देखनेवालों को स्मरण रखना चाहिए कि राइट बंधुओं ने पक्षियों को उड़ते देख मनुष्य के भी आकाश में जा सकने की कल्पना की थी‌। इस कल्पना का परिणाम था, वायुयान का आविष्कार।

सांप्रतिक वैज्ञानिक काल यथार्थवादी कविताओं का है।  ऐसे में दर्शन और विज्ञान में एक तरह का समन्वय देखने को मिल सकता है। मेरा रुझान सदैव अध्यात्म, दर्शन और साहित्य में रहा। तथापि अकादमिक शिक्षा विज्ञान की रही। स्वाभाविक है कि चिंतन-मनन की पृष्ठभूमि में विज्ञान रहेगा।

विलियम वर्ड्सवर्थ ने कविता को परिभाषित करते हुए लिखा है, ‘पोएट्री इज़ स्पॉन्टेनियस ओवरफ्लो ऑफ पॉवरफुल फीलिंग्स।’ कविता स्वत: संभूत है।  यहाँ ‘स्पॉन्टेनियस’ शब्द महत्वपूर्ण है। कविता तीव्रता से उद्भुत अवश्य होती है पर इसकी पृष्ठभूमि में वर्षों का अनुभव और विचार होते हैं। अखंड वैचारिक संचय ज्वालामुखी में बदलता है। एक दिन ज्वालामुखी फूटता है और कविता प्रवाहित होती है। 

अपनी कविता की चर्चा करूँ तो उसका आकलन तो पाठक और समीक्षक का अधिकार है। मैं केवल अपनी रचनाप्रक्रिया में अनायास आते विज्ञान की ओर विनम्रता से रेखांकित भर कर सकता हूँ।

‘मायोपिआ’ नेत्रदोष का एक प्रकार है। यह निकट दृष्टिमत्ता है जिसमें दूर का स्पष्ट दिखाई नहीं देता। निजी रुझान और विज्ञान का समन्वय यथाशक्ति ‘मायोपिआ’ शीर्षक की कविता में उतरा। इसे नम्रता से साझा कर रहा हूँ।

वे रोते नहीं

धरती की कोख में उतरती

रसायनों की खेप पर,

ना ही आसमान की प्रहरी

ओज़ोन की पतली होती परत पर,

दूषित जल, प्रदूषित वायु,

बढ़ती वैश्विक अग्नि भी,

उनके दुख का कारण नहीं,

अब…,

विदारक विलाप कर रहे हैं,

इन्हीं तत्वों से उपजी

एक देह के मौन हो जाने पर…,

मनुष्य की आँख के

इस शाश्वत मायोपिआ का

इलाज ढूँढ़ना अभी बाकी है..!

(कवितासंग्रह ‘योंही’ से)

 आइंस्टिन का सापेक्षता का नियम सर्वज्ञात है। ‘ई इज़ इक्वल टू एम.सी. स्क्वेयर’ का सूत्र उन्हीं की देन है। एक दिन एकाएक ‘सापेक्ष’ कविता में उतरे चिंतन में गहरे पैठे आइंस्टिन और उनका सापेक्षता का सिद्धांत।

भारी भीड़ के बीच

कर्णहीन नीरव,

घोर नीरव के बीच

कोलाहल मचाती मूक भीड़,

जाने स्थितियाँ आक्षेप उठाती हैं

या परिभाषाएँ सापेक्ष हो जाती हैं,

कुछ भी हो पर हर बार

मन हो जाता है क्वारंटीन,

….क्या कहते हो आइंस्टीन?

(कवितासंग्रह ‘क्रौंच’ से)

कविता के विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है,” कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता अवश्य ही होगी। इसका क्या कारण है? बात यह है कि संसार के अनेक कृत्रिम व्यापारों में फंसे रहने से मनुष्य की मनुष्यता के जाते रहने का डर रहता है। अतएव मानुषी प्रकृति को जाग्रत रखने के लिए ईश्वर ने कविता रूपी औषधि बनाई है। कविता यही प्रयत्न करती है कि प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पाए।’

न्यूक्लिअर चेन रिएक्शन की आशंकाओं पर मानुषी प्रकृति की संभावनाओं का यह चित्र नतमस्तक होकर उद्धृत कर रहा हूँ,

वे देख-सुन रहे हैं

अपने बोए बमों का विस्फोट,

अणु के परमाणु में होते

विखंडन पर उत्सव मना रहे हैं,

मैं निहार रहा हूँ

परमाणु के विघटन से उपजे

इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन,

आशान्वित हूँ हर न्यूक्लियस से,

जिसमें छिपी है

अनगिनत अणु और

असंख्य परमाणु की

शाश्वत संभावनाएँ,

हर क्षुद्र विनाश

विराट सृजन बोता है,

शकुनि की आँख और

संजय की दृष्टि में

यही अंतर होता है।

(कवितासंग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता’ से)

अपनी कविता के किसी पक्ष की कवि द्वारा चर्चा अत्यंत संकोच का और दुरूह कार्य है। इस सम्बंध में मिले आत्मीय आदेश का विनयभाव से निर्वहन करने का प्रयास किया है। इसी विनयभाव से इस आलेख का उपसंहार करते हुए अपनी जो पंक्तियाँ कौंधी, उनमें भी डी एन ए विज्ञान का ही निकला,  

ये कलम से निकले,

काग़ज़ पर उतरे,

शब्द भर हो सकते हैं

तुम्हारे लिए,

मेरे लिए तो

मन, प्राण और देह का

डी एन ए हैं !

(कवितासंग्रह ‘योंही’ से)

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Weekly Column ☆ Witful Warmth # 64 – The 1% Terror: A Gen-Z Horror Story… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, known for his wit and wisdom, is a prolific writer, renowned satirist, children’s literature author, and poet. He has undertaken the monumental task of writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Telangana government at the primary school, college, and university levels. His editorial endeavors also include online editions of works by Acharya Ramchandra Shukla.

As a celebrated satirist, Dr. Suresh Kumar Mishra has carved a niche for himself, with over eight million viewers, readers, and listeners tuning in to his literary musings on the demise of a teacher on the Sahitya AajTak channel. His contributions have earned him prestigious accolades such as the Telangana Hindi Academy’s Shreshtha Navyuva Rachnakaar Samman in 2021, presented by the honorable Chief Minister of Telangana, Mr. Chandrashekhar Rao. He has also been honored with the Vyangya Yatra Ravindranath Tyagi Stairway Award and the Sahitya Srijan Samman, alongside recognition from Prime Minister Narendra Modi and various other esteemed institutions.

Dr. Suresh Kumar Mishra’s journey is not merely one of literary accomplishments but also a testament to his unwavering dedication, creativity, and profound impact on society. His story inspires us to strive for excellence, to use our talents for the betterment of others, and to leave an indelible mark on the world.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his SatireThe 1% Terror: A Gen-Z Horror Story 

☆ Witful Warmth# 64 ☆

☆ Satire ☆ The 1% Terror: A Gen-Z Horror Story… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆ 

AFor today’s youth, “Moksha” or peace is not about reaching heaven. It is simply finding a charging point next to their table in a cafe. For a Gen-Z boy like Aryan, the world does not stop because of a big war. It stops when the top-right corner of his phone turns red and screams—”Battery 1%.” This 1% feels like a ticking bomb, and he has no idea who is holding the remote.

The moment the phone hits 1%, a “Mahabharat” starts at home. Aryan, who usually ignores his mom calling him ten times by saying “Hmm… coming,” suddenly jumps up. He leaps like Spiderman whose web has just snapped. You can see a deep fear in his eyes, like a climber stuck alone on a mountain. He runs from his room to the hall like he is running a 100-meter race in the Olympics.

The real comedy happens when he finds the charger, but the cable is “cheating” on him. It only works if he bends it at a very weird angle. Now, our Gen-Z hero stands like a frozen statue, holding the wire at a perfect angle. If he even breathes too fast, the charging stops! For thirty minutes, he stands as still as an old saint. The only difference is that the saint wanted God, but Aryan just wants his Instagram Reels.

The elders of the house watch this and hold their heads in frustration. His grandfather, Dadaji, says, “In our days, we used to study under a small lamp!” Aryan thinks to himself, “Dadaji, at least the lamp didn’t have buffering issues!” For Gen-Z, a ‘Low Battery’ is like the climax of a horror movie. He feels that if the phone turns off, the world will forget him, his Snapchat Streaks will break, and he will die a “digital death.”

When the phone finally hits 2%, a calm look comes over Aryan’s face. It is like a thirsty person finding water in a desert. This 1% fear is the biggest truth of today’s world— “Life may go, but the plug must stay!”

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जीवन का पाठ ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🍀जीवन का पाठ🍀

एक दिन की सच्ची कसौटी बहुत सरल है—

क्या हमारे कारण किसी ने अपने को अधिक सुरक्षित, अधिक प्रसन्न या अधिक हल्का अनुभव किया?

और उतना ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न—क्या हमारे शब्दों, कर्मों या विचारों से किसी का मन आहत हुआ, किसी को भय लगा, या किसी की गरिमा को ठेस पहुँची?

नैतिक जीवन की शुरुआत यहीं से होती है। ऊँचे सिद्धान्तों या बड़े उपदेशों से नहीं, बल्कि अपने वचन, आचरण और मन पर सजग पहरे से। यदि ये तीनों निर्मल रहें, तो जीवन में शान्ति का प्रवाह बना रहता है। यदि इन्हें असावधान छोड़ दिया जाए, तो प्रतिभा और सफलता भी दुःख से नहीं बचा सकतीं।

आइए, इन तीन द्वारों पर ठहरकर विचार करें।

🍀वचन का अनुशासन : ऐसे शब्द जो जोड़ें, तोड़ें नहीं

वाणी तीव्र होती है। एक बार निकला शब्द लौटकर नहीं आता। वह सीधे किसी के हृदय तक पहुँचता है।

इसलिए बोलने से पहले स्वयं से पूछना चाहिए—

क्या यह सत्य है?

क्या यह हितकारी है?

क्या यह कोमल है?

क्या यह उचित समय है?

कटु वचन पत्थर से भी गहरा घाव कर सकते हैं। असत्य क्षणिक लाभ दे सकता है, पर विश्वास खो देता है। आधा-सच, बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात, या जान-बूझकर तथ्य छिपाना—ये भी उतने ही हानिकारक हैं जितना प्रत्यक्ष झूठ। किसी की प्रतिष्ठा को गिराने या अपने लाभ के लिए सत्य को तोड़-मरोड़ देना अपने ही चरित्र को कलुषित करना है।

एक घटना स्मरणीय है।

एक युवक क्रोध से भरे शब्दों की वर्षा करता रहा। सामने खड़े शांत पुरुष ने सब सुना, पर प्रतिक्रिया नहीं दी। अंत में उन्होंने पूछा, “यदि कोई तुम्हें उपहार दे और तुम उसे स्वीकार न करो, तो वह किसके पास रहता है?”

युवक ने कहा, “देने वाले के पास।”

उन्होंने उत्तर दिया, “मैं तुम्हारे क्रोध को स्वीकार नहीं करता। वह तुम्हारे पास ही रहेगा।”

कितना सरल, कितना गहरा संदेश!

हम दूसरों के शब्दों को नियंत्रित नहीं कर सकते, पर अपने शब्दों का चयन अवश्य कर सकते हैं।

सही वाणी केवल असत्य से बचना नहीं है। यह ऐसी भाषा चुनना है जो विश्वास जगाए, मेल कराए, और हृदयों को जोड़े। जहाँ मौन शान्ति बचा सकता हो, वहाँ मौन ही श्रेष्ठ है।

शब्द सेतु भी बन सकते हैं, शस्त्र भी। निर्णय हमारे हाथ में है।

🍀कर्म का अनुशासन : शक्ति जो आश्वस्त करे, भयभीत नहीं

हमारा आचरण ऐसा हो कि कोई भी हमारे कारण भयभीत न हो।

सच्ची शक्ति दबाती नहीं, संरक्षण देती है। वह अधिकार का प्रदर्शन नहीं करती, वह विश्वास जगाती है।

नैतिक जीवन का अर्थ है—किसी भी प्राणी को शारीरिक या मानसिक पीड़ा न पहुँचाना। बल, पद या सामर्थ्य का उपयोग स्वार्थ के लिए न करना। किसी को डराकर, दबाकर या आहत करके प्राप्त की गई सफलता अन्ततः खोखली होती है।

कल्पना कीजिए, जब हम किसी कक्ष में प्रवेश करें तो बच्चों, बड़ों, यहाँ तक कि पशुओं के मन में भी सहजता का भाव हो। यह हमारी वास्तविक शक्ति का संकेत है।

एक प्रसंग में एक कुख्यात डाकू ने एक निर्भीक साधु को रोका। डाकू ने धमकी दी, “रुक जाओ!”

साधु ने शांत स्वर में कहा, “मैं तो रुक चुका हूँ—मैंने हिंसा छोड़ दी है। तुम अभी तक नहीं रुके।”

इन शब्दों ने डाकू के भीतर गहरा परिवर्तन जगा दिया।

यह है अहिंसा की शक्ति—जो बिना शस्त्र के भी हिंसा को शांत कर दे।

ऐसा आचरण जिसमें चोरी, छल, दुरुपयोग या किसी भी प्रकार की हिंसा न हो—वही समाज में विश्वास का आधार बनता है।

🍀मन का अनुशासन : मूल स्रोत

वाणी और कर्म मन से उत्पन्न होते हैं।

यदि मन अशांत है, तो वाणी कठोर और कर्म असावधान होंगे। यदि मन निर्मल है, तो वाणी मधुर और कर्म उदात्त होंगे।

कहा गया है—

“हम जो कुछ हैं, वह हमारे विचारों का परिणाम है। यदि कोई अशुद्ध मन से बोलता या करता है, तो दुःख उसका अनुसरण करता है जैसे बैल के पाँव के पीछे पहिया। यदि कोई शुद्ध मन से बोलता या करता है, तो सुख उसकी छाया की तरह साथ चलता है।”

क्रोध पहले विचार है, बाद में शब्द।

हिंसा पहले भावना है, बाद में कर्म।

इसलिए वास्तविक साधना भीतर से आरम्भ होती है।

मन की रक्षा का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं है, बल्कि उन्हें पहचानना है। जब ईर्ष्या उठे, उसे देखें। जब रोष जागे, उसे समझें। जब द्वेष आए, उसे पोषण न दें। जिन विचारों को हम खाद-पानी नहीं देते, वे धीरे-धीरे क्षीण हो जाते हैं।

यदि हम मन में सद्भावना का संकल्प रखें—कि सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित रहें—तो भीतर की भूमि बदलने लगती है।

निर्मल मन भोला नहीं होता, वह सजग होता है। वह द्वेष को स्थान नहीं देता।

🍀जीवन में इसका अभ्यास

यह शिक्षा केवल ग्रंथों के लिए नहीं, जीवन के लिए है।

किशोरों के लिए इसका अर्थ है—

🌱उपहास या बदनामी का हिस्सा न बनना।

🌱सोशल मीडिया पर अफवाह न फैलाना।

🌱दबाव में आकर असत्य न कहना।

साहस से सत्य का साथ देना।

वयस्कों के लिए इसका अर्थ है—

🌱लाभ के लिए सत्य को न तोड़ना।

🌱अधिकार का उपयोग विनम्रता से करना।

🌱यह स्मरण रखना कि बच्चे हमारे आचरण से सीखते हैं।

🌱ऐसा वातावरण बनाना जहाँ कोई स्वयं को छोटा या भयभीत न महसूस करे।

हम सबके लिए इसका अर्थ है—प्रतिक्रिया देने से पहले एक क्षण ठहरना।🌱

वह एक क्षण वर्षों के पछतावे को रोक सकता है।

🍀नैतिक जीवन की अविरल धारा

जब वाणी सत्य और कोमल हो, तो सम्बन्ध गहरे होते हैं।

जब कर्म अहिंसक और आश्वस्तकारी हों, तो विश्वास बढ़ता है।

जब मन निर्मल हो, तो भीतर शान्ति खिलती है।

इस मार्ग के लिए धन, पद या असाधारण प्रतिभा की आवश्यकता नहीं। केवल सजगता चाहिए।

कल्पना कीजिए—यदि प्रत्येक व्यक्ति यह संकल्प करे:

🌱“मैं अपने वचन से किसी को आहत नहीं करूँगा।

🌱मैं अपने कर्म से किसी को भयभीत नहीं करूँगा।

🌱मैं अपने मन में किसी के लिए द्वेष नहीं पालूँगा।”

तो घरों में शान्ति होगी, विद्यालयों में करुणा, और समाज में विश्वास।

विश्व की शान्ति मन की शान्ति से आरम्भ होती है।

मन की शान्ति विचारों की पवित्रता से।

विचार से वाणी जन्म लेती है।

वाणी से कर्म।

और कर्म से हमारा भाग्य।

हम सबके भीतर यह कोमल शक्ति विद्यमान है।

जब हम इसे सजगता से सँभालते हैं, तो हमारा जीवन ही नहीं, हमारे संपर्क में आने वाला प्रत्येक प्राणी भी उससे आलोकित हो उठता है।🌷

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३१ ⇒ दृष्टि दोष ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दृष्टि दोष।)

?अभी अभी # ९३१ ⇒ आलेख – दृष्टि दोष ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

Man is a bundle of habits. इंसान आदतों का एक पुलिंदा है। उसमें अगर खूबियां हैं तो विकार भी। वह कहीं मजबूत है तो कहीं कमज़ोर भी। कमजोर होते ही उसे रोग घेर लेते हैं और वह बीमार होने लगता है। भले ही उसकी नीयत साफ हो, समय के साथ उसकी नज़र कमज़ोर होने लगती है, जिसे दृष्टि दोष अथवा नेत्र रोग कहते हैं।

जो लोग नियमित रूप से विटामिन सी और डी के साथ नींबू, आंवला, त्रिफला, शहद, बादाम और डाबर च्यवनप्राश का सेवन करते हैं, उनकी नेत्र ज्योति तेज होती है। नैनों में कजरा और सुरमा, आजकल वैसे भी कौन लगाता है। रात रात भर जागना, अधिक ऑनलाइन व्यस्त रहना और अधिक पढ़ने लिखने से आंखों को दो से चार होने में ज्यादा वक्त नहीं लगता, अर्थात् आंखों पर जल्द ही चश्मा चढ़ जाता है।।

चश्मे नजर के भी होते हैं और धूप के भी। जिन्हें नजर लगती है उनकी पहले नजर उतारनी पड़ती है फिर उन्हें चश्मा पहनाना पड़ता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे मोटे चश्मे आजकल नहीं लगते। मोतियाबिंद होने पर, आंखों के अंदर ही आजकल लेंस लगा दिया जाता है जिससे आपकी दूर पास की दृष्टि ठीक हो जाती है।

ईश्वर ने हमें दो आंखें दी हैं, फिर भी हम वही देखते हैं, जो हमें देखना होता है। ऐ भाई जरा देखकर चलो, आंख वाले को ही बोला जाता है। बाजू ! समझो इशारे, हाॅरन पुकारे, और पलट, तेरा ध्यान किधर है, जैसे संबोधन भी आंख वालों के लिए ही तो होते हैं।।

मजरूह तो कह गए हैं कि तेरी आंखों के सिवा, दुनिया में रखा क्या है, यानी जहां आंख नहीं, वहां जीवन में अंधेरा ही अंधेरा ! और यह भी एक कटु सत्य है कि दुनिया के तीन करोड़ नेत्रहीनों में से एक करोड़ नेत्रहीन तो हमारे भारत में ही हैं। है न विचित्र बात, हमारी आंखें होते हुए भी हमें यह दिखाई नहीं देता। लेकिन ईश्वर को सब दिखाई देता है। परमात्मा का प्रकाश इनकी आत्मा तक भी पहुंचता है। दुनिया में कई सेवाभावी लोग और पारमार्थिक संस्थाएं इस अंधेरी दुनिया को जगमगाने में दिन रात एक कर रही हैं। जहां नेत्र नहीं, वहां उनकी मन की आँखें सब देखती हैं, अब सुनती हैं और आत्म विश्वास से इस दुनिया में, अपने कर्म, शुभ संकल्प और आत्म बल की एक ऐसी मिसाल पेश करती है कि हम आंख वालों की भी नजरें सम्मान, तारीफ, गर्व और प्रशंसा से सहसा झुक जाती हैं।

आंखों का संसार तो हमने देखा है लेकिन एक संसार ऐसा भी है, जहां तेरे मस्त मस्त दो नैन के अलावा भी बहुत कुछ है। जिसे हम दृष्टि कहते हैं, उसका इन दिखाई देने वालों चक्षुओं से कुछ लेना देना नहीं है। आप इन आंखों को बंद कर लीजिए। आंखों पे भरोसा मत कर ! दुनिया जादू का खेल है। आइए आपको दृष्टि के एक और ही लोक की सैर करवा दें।।

जिस दृष्टि की हम बात कर रहे हैं, वह तीन प्रकार की है। अंतर्दृष्टि, दूरदृष्टि और दिव्य दृष्टि। जाहिर है, इनका हमारी आंखों से कोई लेना देना नहीं है।

हमारे अंदर नजर डालने के लिए आज तक दुनिया में न तो कोई मशीन बनी है और न ही कोई आंख। हमारे शरीर विज्ञान में किसी मन की आंख का कोई जिक्र नहीं है। जब जरा गर्दन झुकाई, देख ली तस्वीरे यार।

हमारे आसपास एक दुनिया दृष्टिबाधित, मूक बधिर, दिव्यांग और स्पेशल चाइल्ड की भी है, जिन्हें ईश्वर ने वरदान स्वरूप छटी इंद्रिय भी दी है, उनकी अंतर्दृष्टि इतनी सशक्त होती है कि वे ऐसे ऐसे काम कर गुजरते हैं, जो हम कथित साधारण आम इंसान नहीं कर सकते।

सूरदास हों या अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन। हमारे कवि हृदय संगीतकार रवींद्र जैन भी तो प्रज्ञा चक्षु ही थे।

वैसे भी प्रज्ञा का संबंध हमारी अंतर्दृष्टि से ही अधिक होता है। आँखें होते हुए, वे बाहर तो ताका झांकी कर लेंगे, लेकिन उन्हें कभी अपने अंदर झांकने की फुर्सत नहीं मिलती।।

अब आते हैं हम दूर दृष्टि और पक्के इरादे पर। दृष्टि को विजन (vision) भी कहते हैं। एक कलाकार जिस दृष्टि से सृजन करता है, उसका संसार उसके अंदर ही निहित होता है।

कवि की कल्पना, राग, सुर, ताल, सृजन का संसार और एक कलाकार के कैनवस की कोई सीमा नहीं होती।

अच्छे दिनों के सपने देखना और दिखाना क्या दूर दृष्टि नहीं।

और अब अंत में हम आखिरकार दिव्य दृष्टि तक पहुंच ही गए। आखिर जहां न पहुंचे वहां पहुंचे रवि, क्या है। क्या डिजिटल युग में हम दिव्य नहीं हो रहे। जो काम संजय ने धृतराष्ट्र के लिए किया, वह काम तो हमारा टीवी और मोबाइल रोज कर रहा है।

लेकिन फिर भी अगर हमारी नीयत में खोट है, हम बेईमान और भ्रष्ट हैं तो क्या यह हमारा दृष्टि दोष नहीं। खुद पर हमारी नजर नहीं, और दूसरों की नजर में हम ऊपरउठना चाहते हैं, सम्मान पाना चाहते हैं।

भव्य और दिव्य में अंतर है ।।

नज़र कमजोर हो चलेगा, मंदबुद्धि हों, चलेगा, गरीब हो, तो भी चलेगा, लेकिन बुरी नजर वाला, दिल में खोट वाला, स्वार्थी, खुदगर्ज, पाखंडी और नफरत से भरा इज्जतदार, सफेदपोश इंसान नहीं चलेगा। कर्ता से दृष्टा की है यह महायात्रा ;

नजर, अब क्यों नजारे नहीं देखती

अपनों में क्यों परायों को देखती

खुदगर्ज है वह नजर

जो दुश्मनों पर मेहरबां नहीं होती

दोस्ती की कोई जुबां नहीं होती।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆ # “होली के रंग में…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “होली के रंग में…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५४ ☆

☆ # “होली के रंग में…” # ☆

 

रंग-बिरंगी पिचकारी में

रंग-बिरंगे रंग है

पिचकारी के रंगों से

भीग रहे अंग अंग है

 

गली गली में हुड़दंग है

तरुणाई  तो उदंड है

रंग गुलाल लगा नाच रहे हैं

जोश इनमें प्रचंड है

 

सजनी की है कंचन काया

साजन ने है रंग लगाया

आरक्त हो गए गाल गुलाबी

निखर गई है सजनी की काया

 

दोनों रंगों में घुल गए हैं

दिन दुनिया को भूल गए हैं

डूबे हुए हैं फाग की मस्ती में

बाहों में एक दूजे के झूल गए

 

भांग खाओ या मिठाई

या पी जाओ खूब ठंडाई

भांग की मस्ती जब चढ़ती है

तो बस चढ़ती है जाती है भाई

 

खूब रंगों से खेलो होली

संग हो प्रीतम या हमजोली

अभद्र आचरण को त्याग कर

भाई बोलो प्रेम की बोली

 

रंगों से है रंगीन जवानी

रंग नहीं तो जीवन है फानी

रंग है जीवन का मर्म

रंग बिना अधूरी है कहानी

 

रंगों में डूब जाओ यारों

रंगों में सब भूल जाओ यारों

एक गुलाल का टीका लगाकर

सबको गले लगाओ यारों /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९७ – कान्हा तेरी बंशी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘कान्हा तेरी बंशी।)

☆ अभिव्यक्ति # ९७ ☆ कान्हा तेरी बंशी☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

कान्हा तेरी बंशी मन बिसराए,

सारे जगत में सबको भाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जब जब राधा तान सुने ये,

दौड़ के जमना तट को आए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

जमना जल भी रुक रुक जाए,

बंशी बजाके रास रचाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

पशु पक्षी भी राह तकत हैं,

कब तू अपनी बंशी बजाए,

कान्हा तेरी बंशी…

 

बंशी तेरी,पर तू सबका,

सबका मन हर्षाए,

कान्हा तेरी बंशी..

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ वैदिक प्रकाशन द्वारा मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी सर्वश्रेष्ठ लेखक पुरस्कार 2026 से अलंकृत  – अभिनंदन ☆ ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ वैदिक प्रकाशन द्वारा मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी सर्वश्रेष्ठ लेखक पुरस्कार 2026 से अलंकृत  – अभिनंदन ☆

ई-अभिव्यक्ति के वरिष्ठ साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी को एकल पुस्तिका “शब्द सरिता का प्रवाह / कविता संग्रह” में उनके अमूल्य साहित्यिक योगदान तथा  लेखन एवं संकलन के क्षेत्र में उत्कृष्ट भूमिका के लिए वैदिक प्रकाशन द्वारा सर्वश्रेष्ठ लेखक पुरस्कार 2026 से अलंकृत किया गया।


💐 ई- अभिव्यक्ति परिवार की ओर से मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी  को इस विशिष्ट उप्लब्धि के लिए हार्दिक बधाई
💐

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ समई… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? कवितेचा उत्सव ?

☆ समई… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

तुझ्या बंगल्या शेजारी

माझी फाटकी झोपडी

तिथं गिरवतो रोज

जगण्याची बाराखडी

*

नाही अघळ पघळ

भूल थापांचा पसारा

माझा नेटका संसार

मीच मांडलाय सारा

*

तुझ्या देखण्या सुखाचे

नको लाऊ गालबोट

नाही आसपास माझ्या

ख-या खोट्याचा बोभाट

*

जगण्याची धडपड

माझ्या सत्वाची परीक्षा

नाही लपवा छपली

नाही मोक्षाची अपेक्षा

*

नाही नाचार खरा मी

यात नाही काही वाद

जीवाभावाच्या लोकांचा

मला मिळे प्रतीसाद

*

तुझा थाटमाट सारा

आहे व्यर्थ रोषणाई

माझ्या झोपडीत जळे

शांत चित्ताने समई

*

भले बुरे आतताई

सारे भोगलेत भोग

मोह निद्रेतून आता

आली खडाडून जाग

*

भला माझ्या मी घरात

सुखी नांदतो निवांत

तुझ्या ऐश्वर्याचा टाहो

माझ्या घुमतो कानात

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ प्रणयार्त… डॉ निशिकांत श्रोत्री ☆ रसग्रहण.. सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

? काव्यानंद ?

☆ प्रणयार्त… डॉ निशिकांत श्रोत्री ☆ रसग्रहण.. सौ राधिका भांडारकर ☆

काव्यानंद

अथर्ववेदात कामदेवाला सर्जनशील शक्तीचा संरक्षक मानले आहे. कामदेव म्हणजे तरुण स्त्री-पुरुषांच्या चित्तातील प्रेमाची अधिष्ठात्री देवता. ज्याचा जन्म ब्रम्हदेवाच्या हृदयापासून झाला.

मन्मथ, मदन, आनंद, कुशमेश्वर, प्रद्युम्न आणि कामदेवाची पत्नी रती म्हणून रतिकांत अशी कामदेवाची विविध नावे आहेत. कामदेव हे पुरुष प्रेमाचं प्रतीक आहे तर रती हे स्त्री प्रेमाचं प्रतीक आहे. कामदेव आणि रती दोन्ही प्रेम देवताच आहेत. आणि पर्यायाने सृजन अथवा उत्पत्ती देवता आहेत. विश्वाची निर्मिती तेव्हाच होईल जेव्हा स्त्री-पुरुषांमध्ये कामवासना प्रज्वलित होतील. या कामवासनेचा संभव रती आणि मदनदेवतेमुळे स्त्री-पुरुषांच्या शरीरात होतो जे अत्यंत नैसर्गिक आहे.

अशा प्रकारच्या कामभावनेने घायाळ झालेल्या एका तरुणीच्या प्रणयार्त मनस्थितीचे दर्शन देणाऱ्या अत्यंत संवेदनशील गीताचा आज आपण रसास्वाद घेऊया. गीतरचना अर्थातच डॉक्टर निशिकांत श्रोत्री यांची आहे आणि शीर्षक आहे प्रणयार्त.

☆ प्रणयार्त ☆

मयुरपिसांचा चंदनमंचक प्रणयातुर झाला

साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायला।।ध्रु।।

*

 धगधगत्या अंगा न साहवी तलम वस्त्र हलकी

 हिरमुसली होऊन बैसली फडताळी कंचुकी

 फुलती कलिका आर्त जाहली भृंगा भोगायला

 साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायला ।१।

*

ज्योत समयिची निरखुन बघते अनवरत्या देहा

 प्रणयदग्धता भाजुन काढी अवघ्या शयनगृहा

दवबिंदूंना आस लागली प्राशुनी घ्यायाला

साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायला ।।२।।

*

गवसणीस सोडून बैसला तानपुरा मोकळा

आहे केवळ ध्यास अंतरी स्पर्शसुखाचा मला

काळ तिष्ठला स्तब्ध होऊनी प्रणयाच्या साक्षिला

साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायला ।।३।।

*

डॉ. निशिकांत श्रोत्री.

 

या गीतातील धुंद, प्रणयोत्सुक, नशा चढलेली तरुणी जणू काही कामक्रीडेसाठी आवाहनच देत आहे. ती म्हणते,

 मयूर पिसांचा चंदन मंचक प्रणयातुर झाला

 साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायला ।ध्रु।

मोरपिसांचा मुलायम बिछाना असलेला हा चंदनाचा पलंगही माझ्या इतकाच कामक्रियेसाठी उत्सुक झालेला आहे. माझ्या अंगोपांगी संचारलेला हा कामाग्री शमवायला त्या सुगंधी मदनशरांचा वर्षावच व्हायला हवा.

पुढे ती म्हणते,

धगधगत्या अंगा न साहवी तलम वस्त्र हलकी

हिरामुसली होऊन बैसली फडताळी कंचुकी

 फुलती कलिका आर्त जाहली भृंगा भोगायला

साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायला

काम हा विकार असला तरी त्याची उत्पत्ती ही नैसर्गिक आहे. या गीतातील ही तरुणी या भावनावेगाने इतकी व्याकुळ झाली आहे की तिला अंगावरच्या तलम वस्त्रांचंही ओझं वाटतंय. अंगातली चोळी काढून टाकून तिला अनावृत स्थितीतच सौख्य वाटत आहे. उमलणाऱ्या फुलाला जशी गुणगुणणाऱ्या भ्रमराची ओढ असते तद्वत तिला प्रियकराच्या स्पर्शाची आर्त आस जाणवत आहे.

या चार पंक्तीत कवीची शब्दांवरची प्रभावी पकड जाणवते. किती काव्यमय पद्धतीने त्यांनी कामातुर तरुणीचे विवस्त्र पण चितारले आहे! कलिका आणि भुंगा या प्रतीकात्मक रूपकांविषयी आपण जरा नंतर विचार करूया.

ज्योत समयिची निरखुन बघते अनवरत्या देहा

प्रणय दग्धता भाजुन काढी अवघ्या शयनगृहा

दवबिंदूंना आस लागली प्राशुन घ्यायाला

 साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायाला

प्रियकराच्या स्पर्शासाठी आसुसलेली ही विरहिणीच आहे. या क्षणी तिच्यासोबत आहे ती समयिची प्रज्वलित ज्योत. जणू काही ती या प्रणयातुर नारीला निरखून पहात आहे. अवघ्या शयनगृहाला जणू काही पेटलेल्या या कामाग्नीची धग जाणवत आहे. तसेच अंतर्देहातून पाझरणार्‍या दवबिंदूनाही आता निराळ्या स्त्रोतात मिसळून जाण्याची घाई झाली आहे. नदीचं पाणी जसं सागराच्या प्रवाहात मिसळण्यासाठी उत्सुक असतं नेमकी हीच स्थिती इथे जाणवत आहे. आणि या विकारांची तृप्ती, शांती फक्त मदनशरांनीच होऊ शकणार आहे.

गवसणीचा सोडून बैसला तानपुरा मोकळा

आहे केवळ ध्यास अंतरी स्पर्श सुखाचा मला

काळ तिष्ठला स्तब्ध होऊनी प्रणयाच्या साक्षीला

 साद मन्मथा मदनशरांची येई शमवायला

प्रणयाच्या या धुंद, गंधित, निशेच्या परमोच्च बिंदूवर असताना देहावरच्या वस्त्रांचे तिला भान नाही. फक्त स्पर्श सुखासाठी तिचे अंतर्मन उत्कट झालं आहे. काळही जणू थांबलाय, स्तब्ध झालाय या निसर्गोत्पन्न प्रणयाचा सोहळा अनुभवण्यासाठी. ही प्रणयाची आर्तता संतोषण्यासाठी या रतीला फक्त मदनाचीच प्रतीक्षा आहे.

उत्तान शृंगार रसातलं हे तीन कडव्यांचं गीत वाचताना डोळ्यासमोरून एक शृंगारिक दृश्यच तरळत जातं.

वाहणाऱ्या हलक्या हवेच्या झुळुकेने शयनगृहाचे पारदर्शक पातळ पडदे डोलत आहेत.. कोपऱ्यातील समईच्या ज्योतीचा प्रकाशही जणू त्या नशेला पूरक ठरत आहे आणि अशा वातावरणात पुरुष स्पर्शासाठी सैरभैर झालेली ती विवस्त्र रमणी प्रियकराची वाट पाहत आहे… असे हे शब्द चित्र डोळ्यासमोरून झरकन जाते.

हे गीत वाचल्यानंतर क्षणभर तरी कुठल्याही नियमशास्त्राच्या आधारे त्याची तोडफोड करावी असं वाटलंच नाही. फक्त डोळे मिटावेत आणि कवीच्या तरल शब्दांची नशा अनुभवावी.

प्रतिभा, व्युत्पत्ती, अलंकार, छंद, वृत्त या काव्य कारणांना काव्य शास्त्रात खूप महत्त्व आहे आणि हे तंत्र प्रणयार्त या गीतात अगदी तंतोतंत साधलेले आहे.

मयूर पिसांचा चंदन मंचक प्रणयातुर झाला, हिरमुसली होऊन बैसली फडताळी कंचुकी, ज्योत समयिची निरखुन बघते अनवरत्या देहा, प्रणय दग्धता भाजून काढी अवघ्या शयनगृहा..

या काव्यपंक्तीत सहज होणारा चेतना गुणक्त्ती या अलंकाराचा अविष्कार केवळ सुंदर!

शिवाय हिरमुसली होऊन बसली फडताळी कंचुकी*या ओळीतील *हिरमुसली कंचुकी ही शब्दरचनाही खूप सूचक आहे. अंगावरची वस्र उतरवताना स्वाभाविक स्त्रीलज्जा किंवा संकोच व्यक्त करण्यासाठी योजिलेला हिरमुसली हा शब्द अतिशय कौशल्याने, काव्याचे सौंदर्य सांभाळून कवीने हलकेच वेचला आहे.

या गीतात कवीने ज्या मदनशरांचा उल्लेख केला आहे त्याबद्दल थोडा विचार करूया.

कामदेवाची अस्त्रे म्हणजे धनुष्य व बाण आहेत. त्याचे धनुष्य इक्षु दंडाचे (उसाचे) अत्यंत लवचिक असे आहे. रक्त कमल, नील कमल, आम्रमंजरी, अशोक पुष्प व मोगरा ही पाच गंधपुष्पे म्हणजे त्याचे पाच बाण आहेत. संमोहन, उन्मादन शोषण, तापन, स्तंभन हे सारे मदनाचे बाण आहेत. आणि कामक्रीडे मध्ये त्या त्यावेळी त्यांच्या अर्थपूर्ण सहाय्यकारी भूमिका आहेत. हे सर्व नीट अभ्यासले असता कवीने या गीतात केलेला मदन शरांचा उल्लेख औचित्यपूर्ण वाटतो.

कलिका आणि भुंगा ही प्रतीकात्मक रूपके आहेत. आणि ती स्त्री-पुरुषांच्या शृंगारिक अवयवांसाठी(कामेंद्रियांसाठी) सूचकतेने वापरलेली आहेत. तसेच कमलदलातला भुंगा हा लाक्षणिक अर्थाने संभोगाची कल्पना मांडतो.

गवसणीस सोडून बैसला तानपुरा मोकळा…. या काव्यपंक्तीत चेतना गुणोक्ती अलंकारासोबत हळुवारपणे विवस्त्रता व्यक्त करणारं रूपकही आहे. तानपुरा या शब्दात “तिच्या कायेची कमनीयता” दडलेली आहे. आणि गवसणी म्हणजे देहावरची वस्त्रे. लाक्षणिक अर्थाने वापरलेले हे शब्द काव्यरचनेला वेगळेच सौंदर्य प्राप्त करुन देतात.

हे संपूर्ण गीत मी जस जसे वाचत गेले आणि एकेका शब्दांची यथामती फोड करत गेले तेव्हा डॉक्टर श्रोत्रींच्या अचाट कल्पना बुद्धीची आणि सौंदर्य दृष्टीची झालेली जाणीव थक्क करणारी वाटली.

वास्तविक काव्यशास्त्रात शृंगार हा अत्यंत महत्त्वाचा रस आहे आणि कवींचाही शृंगार रस हा आवडताच आहे. मूळातच कामविकार हे सर्वसामान्य माणसाच्या दंपती जीवनात उद्भवतातच आणि सामाजिक व कौटुंबिक जीवनात कामशांतीचे महत्त्वही तितकेच आहे.

शृंगार समयी स्री आणि पुरुष यांच्या भावना निराळ्या असतात. शृंगारा अंती पुरुषाला जाणवते ती असीम तृप्ती. मात्र स्रीच्या बाबतीत तसे नसते. ती तृप्त न होता अधिक आर्त होते. आणि या गीतात ही आर्तता अतिशय तरल शब्दात कवीने टिपली आहे. हे विशेष आहे.

श्रृंगार रसाचा साहित्य कृतीमध्ये वापर करणे हे येरा गबाळ्याचे काम नव्हे. शब्दांच्या वापराला इथे खूप महत्त्व आहे. शृंगारमय प्रसंगाचे वर्णन करताना शब्दांची जर घसरण झाली तर सारी कलाकृती सवंग, अश्लील, आघळपघळ, ओंगळवाणी, अवाचनीय होईल. पण डॉक्टर श्रोत्रींचा शब्दप्रवाह हा चांदण्यासारखा शीतल आहे, तरल आहे, सुंदर आहे. सूचक आणि भावदर्शी आहे. मोगर्‍याची फुलं उधळावीत इतका सुखद आहे. त्यामुळे शृंगारतलं निसर्गतत्व त्यांनी अत्यंत आध्यात्मिक रित्या मांडलय म्हणूनच त्यांचं हे गीत म्हणजे मला शिंपला उघडून मोती उचलावा इतकं सुंदर वाटलं आणि वाचक हो! तुम्हालाही ते तसेच जाणवेल याची मला खात्री आहे.

© सौ. राधिका भांडारकर

ई ८०५ रोहन तरंग, वाकड पुणे ४११०५७

मो. ९४२१५२३६६९

radhikabhandarkar@yahoo.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – २ – रेडियो -☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी ☆

सुश्री विभावरी कुलकर्णी

🔅 विविधा 🔅

☆ वस्तू वस्तू जपून ठेव – २ – रेडिओ – ☆ सुश्री विभावरी कुलकर्णी

“नमस्कार श्रोतेहो… हे आकाशवाणीचे पुणे केंद्र आहे. सकाळचे पाच वाजून सत्तावन्न मिनिटे आणि बारा सेकंद झाले आहेत. आपल्या आजच्या सभेला सुरुवात करु या मंगलध्वनीने…

आणि मग तो मंगलध्वनी सुरु व्हायचा. अगदी लहानपणी पासून दिवसाची सुरूवात अशीच होते. आणि दर पाच मिनिटांनी बदलणारे कार्यक्रम वेळ सांगतात. सकाळच्या घाईत घड्याळ बघावे लागत नाही. ते काम रेडिओ ऐकला की आपोआप होते. शिवाय ते कार्यक्रम ज्ञानात भर घालतात हा खूप मोठा आणि महत्वाचा फायदा! आजही मला लहानपणी निवेदन करणारे निवेदक व त्यांचे निवेदन आठवते. सुधा नरवणे प्रादेशिक बातम्या द्यायला आल्या की शाळा कॉलेजला निघायची योग्य वेळ झाली हे लक्षात यायचे. आणि त्या बातम्या संपल्या की उशीर झाला असे समजायचे.

सकाळी सकाळी रेडिओ लावायची जुनी सवय बऱ्याच जुन्या आठवणी जाग्या करते. आज गाणे ऐकले शब्द शब्द जपून ठेव एकीकडे काम चालू होते. आणि इतके अर्थपूर्ण गाणे ऐकत असताना माझ्या मनात कसे विचार येतात याचे हसू आले. आणि जपून ठेवलेल्या वस्तू आठवायला लागल्या. आणि कुठे कुठे जीव अडकतो याची गंमत वाटली.

परवा सहज कपाट आवरताना जरा पिवळसर पडलेली कॅरीबॅग सापडली. उघडून बघितले तर रेडिओचे लायसन सापडले. आता असे वाटेल हा काय प्रकार आहे? पण पूर्वी (मी लहान असताना) रेडिओ साठी परवाना आवश्यक होता. एका वर्षा साठी १/२ रुपये पोस्टात भरून त्या पुस्तकावर तिकीट लावून आणावे लागायचे. आणि घरात टेबल सारखे मोठे रेडिओ असायचे तो नीट ऐकण्यासाठी ३/४ फूट लांबीची व २/३ इंचाची तांब्याची जाळी असलेली पट्टी घरात लावावी लागायची. आणि छोटा रेडिओ (ट्रांझिस्टर) सायकलच्या हॅण्डलला लावून लोक ऐटीत फिरायचे. आणि ज्याच्याकडे लायसन नसेल तो लपवून ट्रांझिस्टर नेत असे.

हे सर्वच रेडिओ मात्र नवनवीन कपडे घालायचे.

त्यात गृहिणीची कलाकुसर व दृष्टी याची जणू परीक्षा व्हायची. काही जणी तर त्यावर स्वहस्ते भरतकाम करायच्या आणि कौतुक मिळवायच्या.

आमच्या कडे मोठ्ठा रेडिओ होता. लांबून बघितले तर पुस्तकांचे कपाट वाटावे असा होता. मी कायम त्याच्या बटणावर पाय ठेवून वर चढून दूध प्यायला बसायची. मग जेवायला बसायची. ही बाल सवय त्याचा उपयोग कळायला लागल्यावर सुटली.

विशेष म्हणजे या रेडिओचे सर्वत्र दर्शन होते. शेतात, मळ्यात, चौकात, पारावर, बागेत कुठेही सूर ऐकू येतात. मधल्या काही काळात असे भय वाटत होते की सगळ्या आधुनिक साधनांच्या गदारोळात आपला रेडिओ लुप्त होईल का? पण रेडिओने आपले स्थान कायम ठेवले आहे. स्वरूप बदलले आहे. सुटसुटीत झाले आहे. पूर्वीच्या अडचणी (रेडिओ वापरातील) आता नाहीत. त्याने प्रत्येकाच्या मोबाईल मध्ये स्थान मिळवले आहे. आणि पेन सारखे छोटे स्वरूपही धारण केले आहे. आणि आता ऐकू येणारी स्टेशन्स सुद्धा वाढली आहेत.

काही वर्षांपूर्वी प्रसारित होणारे कार्यक्रम आधुनिक स्वरूप धारण करून पुन्हा प्रसारित होऊ लागले आहेत.

या रेडिओच्या अनंत आठवणी बऱ्याच जणांच्या मनात जागृत असतील.

रेडिओवर एक जाहिरात लागते. एक सखी दुसरीला विचारते, “कुटं ग शिकलिस एवढं ग्यान? ” लगेच दुसरी उत्तरते, “आपल्या रेडिओनं श्यानं केलंय की, तू बी ऐकत जा. ” हे ऐकून अगदी पटले. खरेच जे नियमित रेडिओ ऐकतात त्यांचे मन विविध माहिती, ज्ञान, आरोग्य, गृहिणींना मार्गदर्शन, मनोरंजन, यांनी भरून जाते. आणि या साठी वेगळा वेळ द्यावा लागत नाही. शिवाय डोळेही बिघडत नाहीत.

या रेडिओची सुरुवात भारतात १९२३ साली झाली. पण ती खाजगी कंपनी होती. आणि ती दिवाळखोरीत निघाली. नंतर १९३६ मध्ये ही कंपनी सरकारने ताब्यात घेतली आणि ऑल इंडिया रेडिओ असे नामकरण केले.

प्रासंगिक कार्यक्रम सादर करणे. हे तर रेडिओचे खास वैशिष्ट्य आहे.

रेडिओवर प्रसारित होणाऱ्या कार्यक्रमांवर लिहायचे म्हंटले तर एक वेगळाच लेख होईल.

आज जागतिक रेडिओ दिनाच्या निमित्ताने भारतातील रेडिओ विषयी काही लिहिण्याचा प्रयत्न केला आहे. हा विषय खूप मोठा आहे. जे माझ्या सारखे रेडिओ प्रेमी आहेत त्यांना नक्कीच असे वाटते, हा रेडिओ अजरामर होवो. या मनापासून शुभेच्छा!

© सुश्री विभावरी कुलकर्णी

मेडिटेशन,हिलिंग मास्टर व समुपदेशक, संगितोपचारक.

सांगवी, पुणे

📱 – ८०८७८१०१९७

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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