सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆ प्रकाशन संबंधी महत्वपूर्ण सूचना 📖 ☆ सम्पादक मंडल ई-अभिव्यक्ति ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

📖 प्रकाशन संबंधी महत्वपूर्ण सूचना !! 📖

कुछ अपरिहार्य कारणों से गुरुवार दि. १/१०/२६ से  दि. ४/१०/२६ (४ दिवस) तक ई-अभिव्यक्ति का प्रकाशन बंद रहेगा। 

आप सभी का इसी प्रकार स्नेह, प्रतिसाद और सहयोग अपेक्षित है।

 

– संपादक मंडल 

ई-अभिव्यक्ति 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १६२ ☆ प्रेम का प्रतिदान ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “प्रेम का प्रतिदान” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६२ ☆

☆ प्रेम का प्रतिदान ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

तुम्हारी हँसी उजली धूप की तरह

फैल गई थी चारों ओर

तुम्हारा अहसास विखर गया था

मलयानिल की गंध की तरह

तुम्हारे पाँव की पदचाप सुनकर

जाग उठे थे सप्तराग

तुम्हारे लरजते हुए होंठों पर

थिरक उठा था सामवेद का संगीत

तुम्हारे रेशमी केशों में

उलझकर रह गया था पवन

तुम्हारी दृष्टि में

समा गया था सारा ब्रम्हाण्ड

तुम्हारी समूची देहयष्टि से

जगमगा उठा था मेरा घर-आँगन

मैं आज भी बैठा हूँ

उन यादों के ढूह पर निहारता

शायद फिर लौट आए कोई दिन

जो दे सके प्रेम का प्रतिदान

और मैं जी सकूँ भोगा हुआ यथार्थ।

****

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ अभिव्यक्ति # 16 ☆ स्विच ☆ हेमन्त बावनकर ☆

हेमन्त बावनकर

(स्वांतःसुखाय लेखन को एक स्वरूप देने के प्रयास में इस रचना की रचना कोविड के समय में की गई थी.

आज पुनर्पाठ में एक दुःस्वप्न पर आधारित  और २४ अप्रैल २०२० को प्रकाशित कथा “स्विच ” पुनः प्रस्तुत कर रहा हूँ । यह आश्चर्य और विडम्बना है कि हम एक लम्बी मानवीय त्रासदी को सहन करने के बाद मानवीय संवेदनाओं और त्रासदी को भूल गए हैं । आखिर वह स्विच कौन सा है ? अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिये और पसंद आये तो मित्रों से शेयर भी कीजियेगा। अच्छा लगेगा।)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अभिव्यक्ति # 16 ☆

☆ कथा कहानी – स्विच ☆ हेमन्त बावनकर ☆

आज के अखबार की हेडलाइन्स ने चौंका दिया… देश के सभी धार्मिक स्थल के भक्त-निवासों को अस्पताल के वार्ड में तब्दील करने का निर्णय…  तालों में बंद ईश्वर की मौन अनुमति… सभी देवी देवताओं और नेताओं की बड़ी-बड़ी मूर्तियों के दानदाताओं द्वारा उतनी ही या उससे अधिक राशि अस्पताल और जनसेवाओं के लिए दान में देने का निर्णय…

बड़ा अजीब माहौल है… कोई मेरी ओर देख ही नहीं रहा… सब अपने आप में मशगूल हैं। मैं सोसायटी गेट से बाहर निकल रहा हूँ… गार्ड रोकना चाह रहा है… किन्तु, मैं अपने में ही मशगूल हूँ… बाहर निकल गया हूँ… सब कुछ शांत… पूरी सड़क सुनसान… सिर्फ दूध और दवा की दुकान खुली है और दारू की बन्द है… मुझे चिंता होने लगी है कि सरकार के आय का बड़ा स्रोत बन्द है तो जनता पर व्यय कैसे होगा ?… शायद दान से… वेतन में कटौती से… महंगाई भत्ते पर रोक से… पर पेंशनरों का तो सहारा ही यही है… कम से कम पेंशनरों को तो बख्श देते… बुढ़ापे में… पेंशनरों की वित्तीय समस्या का निर्णय वो लोग क्यों लेते हैं जो स्वयं का वेतन स्वयं निर्धारित करते हैं… पेंशनरों की समस्या का हल करने की समिति में कोई पेंशनर ही नहीं है… समस्या कटौती की नहीं है… समस्या भविष्य की योजना की है… कहते हैं बीमा करा लो… राष्ट्र का बीमा क्यों नहीं ?… सभी का स्वास्थ्य बीमा क्यों नहीं?… राष्ट्र का स्वास्थ्य बीमा क्यों नहीं ?… हमारा पेंशन फंड है… राष्ट्र का पेंशन फंड क्यों नहीं?…

मैं दुबारा देखता हूँ… मैंने सही देखा है दारू की दुकान बन्द है…  सड़क के किनारे फिल्मों के पोस्टर गायब हैं… सारे शहर में डॉक्टर, नर्सों, सफाई कर्मियों, पुलिसवालों के मुस्कराते चेहरों वाले पोस्टर लगे हैं। बड़े बड़े नेताओं के पोस्टर लगे हैं… सब में एक कॉमन बात दिखाई दे रही है, सब पोस्टर में बड़े अक्षरों में लिखा है COVID-19 और सबने मास्क पहन रखा है…

सारी की सारी सड़क साफ हो गई है… कहीं कोई कचरा नहीं… कोई प्लास्टिक बैग / पन्नियाँ नहीं… गैर पालतू जानवर आराम से घूम रहे हैं… जरा भूखे जरूर लग रहे हैं…  किन्तु, काटने नहीं दौड़ रहे… आज तालाब के किनारे वॉकिंग ट्रैक पर कोई वाक नहीं कर रहा… तालाब का पानी शीशे की तरह साफ कैसे हो गया?… कहीं धूल नहीं… हवा में प्रदूषण नहीं… ये क्या तालाब के किनारे मंदिर में बहुत बड़ा ताला लगा है… पुजारी का अता-पता नहीं है… तो पूजा कौन करता है? आगे अस्पताल खुला है… सब मुझे शक की नज़र से देख रहे हैं… जैसे गेट पर मेरी प्रतीक्षा के लिए हाथ में लेजर से बुखार नापने का यंत्र  लिए नर्स खड़ी है और कुछ नर्सिंग स्टाफ… उन्हें लगा मैं अंदर जाऊंगा… उन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ता हूँ… तिरछी नजर से देखता हूँ… शायद वे निराश हो गए…

आगे मॉल में एक मल्टीप्लेक्स है… बाहर बहुत बड़ा पोस्टर लगा है… पूरे पोस्टर पर लिखा है COVID-19…  शायद साइंटिफिक फंतासी फिल्म हो… सोचता हूँ देख ही लूँ… मॉल में इक्का दुक्का लोग घूम रहे हैं… दुकानें बन्द हैं… मल्टीप्लेक्स खुले हैं… सीधे सिनेमा हाल के गेट तक पहुँच जाता हूँ… कोई रोकता क्यों नहीं ?… सिनेमा हाल में चला जाता हूँ… शायद फिल्म शुरू हो गई है… अंधेरे में खाली सीट टटोलते हुए एक किनारे की खाली सीट पर बैठ जाता हूँ… फिल्म शुरू हो चुकी है… विदेश का कोई शहर है… अफरा तफरी मची हुई है… शायद कोई महामारी फैल रही है… बीच बीच में कोई वाइरस पूरे स्क्रीन पर उछल कूद मचाते रहता है… लोग एक दूसरे से हाथ मिला रहे हैं… गले लग रहे हैं… फ्लाइट पकड़ कर दूसरे देश जा रहे हैं… खुद भी बीमार हो रहे हैं… औरों को भी बीमार कर रहे हैं… अब तो मौतें भी हो रही हैं…

अचानक स्क्रीन पर आंकड़े आने लग गए…पहले विदेशों के… फिर अपने देश के… आंकड़े बढ़ते ही जा रहे हैं… अचानक जाना माना टी वी एंकर स्क्रीन पर आ गया… एक एक कर वक्ता आने लगे… बहस चालू हो गई… अरे! ये फिल्म में टी वी एंकर कैसे घुस गया… यहाँ भी टी आर पी… हाल में रोशनी बढ़ने लगी… सबने मास्क लगा रखा था… दस्ताने पहन रखे थे…

एंकर चीख चीख कर कह रहा था… अपनी सुरक्षा स्वयं करें… सार्वजनिक स्थानों पर मत जाएँ… मास्क पहन कर रहें… घर से बाहर न निकलें… घबरा कर उठ खड़ा होता हूँ… और अपने आपको बीच सड़क पर पाता हूँ…आवाज एंकर की नहीं थी… पुलिसवाले अपनी गाड़ी में माइक पर चीख चीख कर कह रहे थे… लॉक डाउन में घर से बाहर न निकलें… सरकारी नियमों का कड़ाई से पालन करें…अचानक पुलिस मुझे घेर लेती है… मैं बेतहाशा भागने लगता हूँ… तेज…और तेज…इतना तेज कि जिंदगी में नहीं दौड़ा…पुलिस के बूटों की आवाज कम होने लगती है… पलट कर देखता हूँ… कोई भी नहीं… चैन की सांस लेता हूँ जैसे ही पलटता हूँ… ये क्या?… एक इंस्पेक्टर खड़ा है और कुछ पुलिस वाले… पुलिस वाले जैसे ही डंडा उठाते हैं…इंस्पेक्टर रोक देता है… उम्र का लिहाज कर रहा हूँ… दुबारा नहीं छोडूंगा… हाथ जोड़ माफी मांग कर घर लौट आता हूँ…

घर पर कोई नहीं दिखते… बाबूजी बहुत याद आ रहे हैं… सीधे उनके कमरे में जाता हूँ… बाबूजी खिड़की के किनारे अपनी कुर्सी पर बैठकर अपनी डायरी लिख रहे हैं… वे मेरी ओर नाराजगी से देखते हैं… शायद उन्हें मेरा बाहर जाना अच्छा नहीं लगा… उनके कदमों में बैठ कर पाँव पकड़ कर माफी मांगने लगता हूँ…अरे ये क्या? बाबूजी तो हैं ही नहीं… बाबूजी तो वास्तव में हैं ही नहीं… तो वो कौन थे…उठ कर देखता हूँ बाबूजी की डायरी वैसे ही खुली पड़ी है… बाजू में उनका चश्मा… और डायरी में कलम… पढ़ने की कोशिश करता हूँ… अपनी आदत के अनुसार एक लाइन छोड़ कर सुंदर हस्तलिपि में एक एक पंक्तियाँ… पढ़ने की कोशिश करता हूँ… उनकी सर्वाधिक प्रिय पुराने फिल्मी गानों की एक-एक पंक्तियाँ… सब पंक्तियों के अंत में आँसुओं की कुछ बूंदें…

गांधीजी के जन्म के 150वें वर्ष पर…

आज है दो अक्तूबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान…

नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है… 

नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ… 

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झांकी हिंदुस्तान की… 

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा… 

ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आँख में भर लो पानी… 

हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के… 

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा… 

डायरी उठाने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढ़ाता हूँ तो सब कुछ गायब… डायरी… चश्मा… कलम…  सब कुछ… आँखें भर आती हैं… गला रुँध जाता है… रोने की कोशिश करता हूँ… गले से आवाज ही नहीं निकलती… गले से सिसकियाँ निकलने लगती हैं…

सुनिये… सुनिये… श्रीमति जी मुझे हिला कर नींद से उठा रही हैं… पूछ रही हैं… क्या हुआ? इतनी देर से क्यों रो रहे हैं? श्रीमति से लिपट कर रो पड़ता हूँ…

सोच रहा हूँ… आखिर यह स्वप्न है या दुःस्वप्न?  ईश्वर ने इस जटिल मस्तिष्क की रचना भी कितने जतन से की होगी। लोग कहते हैं कि सोचना बंद कर दो। अरे भाई! आपको सारे शरीर में कहीं कोई ऐसा स्विच दिख रहा है क्या कि- ऑफ कर दूँ और सोचना बंद हो जाए? यह तो मस्तिष्क में ही कहीं होगा तो होगा । यदि होगा तो जाते समय अपने आप ऑफ हो जाएगा…

© हेमन्त बावनकर

पुणे 

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – धूप… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – धूप… ?  श्री संजय भारद्वाज ?

एसी कमरे में

अंगुलियों के इशारे पर

नाचते तापमान में,

चेहरे पर लगा लो

कितने ही परतें,

पिघलने लगती है

सारी कृत्रिमता

चमकती धूप के साये में,

मैं सूरज की प्रतीक्षा करता हूँ,

जिससे भी मिलता हूँ,

चौखट के भीतर नहीं,

तेज़ धूप में मिलता हूँ..!

 ?

© संजय भारद्वाज   

(प्रात: 7:22 बजे, 25.01.2020)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️

💥 💥

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ THE SUN… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ THE SUN… ~”.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~ THE SUN… ~ ??

☆ 

You may hide in a cool dungeon,

and name it dark – comfort

You may drape the cold in mesmeric words

But I call it an illusion…

You paint your face with

vanity and pretence

The Sun spares no paint

it melts the mask

Never do I seek shade

I stand where the

scorching Sun burns

Vertical

Blinding

Mercilessly

Under a ruthless Sun,

no lie ever survives

Only you remain raw,

unvarnished,

as naked truth…

☆

~Pravin Raghuvanshi

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Founder Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६९ ☆ आप घर कह रहे जिसे मेरा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आप घर कह रहे जिसे मेरा…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६९ ☆

✍ आप घर कह रहे जिसे मेरा… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

मैं हूँ आहू की तिश्नगी की तरह

ज़ीस्त सहारा की है नदी की तरह

*

आप घर कह रहे जिसे मेरा

जेल की है वो कोठरी की तरह

*

एक बच्चे को क़ीमती सबसे

है खिलौनों की टोकरी की तरह

*

दोनों तारीफ़ उसकी करते हैं

हम्द है मुझको आरती की तरह

*

तुमको तस्लीम आदमी कर लूँ

पेश तो आओ आदमी की तरह

*

धूप हो छाँव हो न भूलें हम

रोज़ खिलना है इक कली की तरह

*

शे‘र मफ़हूम से न होगा बड़ा

लफ्ज़ गर है न सादगी की तरह

*

दोस्त इस्लाह और कुछ भी नहीं

एक कपड़े पै इस्तरी की तरह

*

अय अरुण हिज़्र का असर देखो

जनवरी लग रही मई की तरह

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७३ – शाश्वत सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक  विचारणीय कविता – शाश्वत सत्य…।)

☆ हेमंत साहित्य # ७३ ☆

✍ शाश्वत सत्य… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

यहाँ कुछ भी रहता नहीं

अनंत काल तक।

 

जब उठेगी दृष्टि, पीछे की ओर

तो सम्मुख होगा शाश्वत सत्य

कि,

बीता हुआ कल,

उसके पहले का कल,

या अभी- अभी बीता पल

अलग था

उससे जो दिख रहा है आईने में अभी।

 

क्या अमीबा ने सोचा होगा कभी

कि, उसके एककोषीय दुर्बल शरीर से

जन्म लेंगे कभी

जिराफ, हाथी, मगरमच्छ, अजगर

और घड़ियाल।

 

जीवन की इसी अनवरत यात्रा में

आदम की जात भी आई

उसी

एककोषीय जीवन से,

सतत बदलते रहने की

उस पुरातन परंपरा से।

 

कुछ भी नहीं बचा

जो रह गया हो

जैसा का तैसा।

विराट पहाड़ भी

किसी भूगर्भीय हलचल की

संतान हैं।

 

फिर,

आज का बवंडर

या सामने खड़ा तूफ़ान,

किसी की दहाड़

या आँखों की तपिश

इनका भी क्या ठिकाना?

 

सृष्टि के विराट क्रम में

उथल-पुथल भी क्षणिक है

तो शांति भी।

 

तूफ़ान आते हैं,

गुज़रने के लिए;

क्यूंकि

समय बदलता है करवट,

पल-पल।

 

यही तो है

संसार का सबसे पुराना सत्य

कि

यहाँ कुछ भी

नही है सदा के लिए।

 ☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८१ ☆ लघुकथा – बेटे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “बेटे…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ८१ ☆

✍ लघुकथा ☆ बेटे… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कहानी  – 

सूरज की तपिश ठंडी होती  जा रही थी और प्रकाश लालिमा में बदल कर सुमधुर वातावरण बनाता जा रहा था तभी राम नारायण अपने चिर-परिचित बरगद के नीचे बिछी बैंच पर बैठते जा रहे थे। वे बैठ भी नहीं पाए थे कि आवाज आई, “अरे राम, आ गए?”, उन्होंने एक नजर डाली और ओठों पर मुस्कान लाने का प्रयास करते हुए बैठ गए। तभी मनजीत सिंह उनके पास आ गए। यह उनके शाम की चौपाल की जगह थी, जहाँ रोज इकट्ठे होते और चर्चा किया करते। मनजीत ने राम नारायण का चेहरा उदास देखा तो पूछा कि सब खैरियत है न, चेहरा लटका क्यों है?

राम नारायण कुछ उत्तर देते कि उससे पहले कई आवाजें आसमान में तैर गईं। दोनों ने देखा चौपाल के अन्य साथी मुश्ताक, जोसेफ, गौतम, जहांगीर, महावीर, फ़ीरोज़ व एरियल हँसते बोलते चले आ रहे हैं। राम नारायण और मनजीत को शांत देखकर वे भी सहम गए और चुपचाप बैठ गए।  एरियल ज्यादा देर शांत न रह सके । वरी सांई कुछ तो बोलो। मनजीत ने चुप्पी तोडी और बोले ,”राम प्रा के बड़े बेटे की तबीयत अचानक खराब हो गई है।” “बस” एरियल चिहुंके। राम नारायण बोले, “भाई हिंदू धर्म में बेटों का बड़ा महत्व होता है खास कर बड़े बेटे का, क्योंकि वही पिता को मुखाग्नि देता है, पिंडदान करता है और पिता को मोक्ष दिलाता है। इसलिए बेटों का बहुत महत्व है।  बेटों को बुढ़ापे की लाठी माना जाता है। इससे बेटी का महत्व कम नहीं होता, वरन् वह कन्यादान का अवसर प्रदान करके माता पिता का जीवन सफल बनाती है।”

इस पर मुश्ताक बोले, ”  इस्लाम धर्म में बेटा बेटी दोनों को अल्लाह की नेमत माना जाता है। बेटी को रहमत और बेटे को नेअमत बताया गया है। रहमत का मतलब अल्लाह की दया है और नेअमत अल्लाह का इनाम है। बेटों को बुढ़ापे का सहारा तो माना जाता है क्योंकि बेटियाँ पराए घर चली जाती हैं।”  मुश्ताक चुप हुए ही थे कि जोसेफ बोल पडे, ” ब्रदर ईसाई धर्म में बेटा बेटी में कोई आध्यात्मिक अंतर नहीं माना जाता। दोनों  ईश्वर की संतान हैं।”  आगे एरियल बोले, ” यहूदी धर्म में सबसे बड़े बेटे को धार्मिक महत्व ज्यादा मिलता है। उसे पिता की विरासत में अन्य संतान की अपेक्षा दोगुना हिस्सा मिलता है।  धार्मिक कर्तव्यों के लिए बेटों का होना जरूरी माना जाता है। लेकिन अब अंतर आ गया है। बेटियाँ भी धार्मिक कर्तव्यों में हिस्सा लेने लगी हैं।”

“ओ बादशाहो, गुरु ग्रंथ साहिब में स्त्री पुरुष समानता पर बहुत जोर दिया गया है। इसलिए सिख धर्म में बेटा बेटी में कोई भेद नहीं होता।” गुरमीत सिंह ने अपनी सहज बुलंद आवाज में कहा। गौतम ने कहा, “बौद्ध धर्म में आदमी को मोक्ष स्वयं के कर्मों से मिलता है। बेटा बेटी का इससे कोई संबंध नहीं। हां, उन दोनों का अपना अपना महत्व तो होता ही है।” महावीर बोले, “जैन धर्म में भी बेटा बेटी में कोई भेद नहीं है।” सबकी बातें सुनकर फ़ीरोज़ गंभीरता से बोले, “पारसी धर्म में धर्म और पहचान दोनों पिता से चलती हैं। इसलिए पुत्र का महत्व ज्यादा है। उसे वंश चलाने वाला माना जाता है। लेकिन अब बेटियों को बराबर महत्व दिया जाने लगा है।”

चौपाल खत्म होने का समय हो गया। सबने उठते उठते कहा भाइयों समाज में स्त्री विमर्श पर खूब चर्चा होती है पर पुरुष विमर्श पर नहीं होती। वृद्धों पर बेटों के अत्याचार की चर्चा भी खूब होती है परंतु उनके त्याग, तनाव, भावना व श्रम की चर्चा नहीं होती। जब बेटा बेटी बराबर हैं तो हर क्षेत्र में बराबरी रहनी चाहिए। दोनों में किसी भी स्तर पर भेद नहीं देखना चाहिए। और एक दूसरे से हाथ मिला कर सभी अपने अपने घर चल दिए।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ११०७ ⇒ सपने के बहाने ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सपने के बहाने…“।)

?अभी अभी # ११०७ ⇒ आलेख – सपने के बहाने ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बंद आंखों से देखी जाने वाली फिल्म को आप स्वप्न कह सकते हैं। इसके शो दिन में भी हो सकते हैं और रात में भी। इसका रिमोट आपके पास नहीं, आपके अवचेतन मन के पास होता है।

इसके प्रदर्शन का समय भी पूर्व निर्धारित नहीं किया जा सकता। इसकी कोई शूटिंग इत्यादि नहीं होती। केवल एक ही व्यक्ति के लिए इसका सीधा प्रसारण किया जाता है और वे खुशनसीब सिर्फ आप होते हैं। आप ही प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और आपको ही नहीं मालूम, आप अपने आपको क्या दिखाने जा रहे हो।

सपनों का संबंध हमारे चित्त से होता है, आसक्ति, भावना, संवेदना, और दबी हुई इच्छाओं से होता है। मन संकल्प विकल्प करा करता है, कई हवाई किले बनाता है, जो घटना कभी नहीं घटी, वह स्वप्न में घट जाती है। आप कहते रह जाते हैं, ऐसा तो मैने सपने में भी नहीं सोचा था, और वही घटना वास्तविक जीवन में घट भी जाती है।।

होते होंगे लोगों के सच सपने, स्वप्न सिर्फ भूल जाने के लिए होते हैं। फिर ऐसा क्या होता है इन सपनों में, कि कभी कभी इनका जिक्र करने का मन होता है, किसी को बताने की इच्छा होती है। जो अपने होते हैं, उनसे ही सपने शेयर किए जाते हैं। केवल अपनों का ही अपने सपनों पर अधिकार होता है। कब हमारे मन पर कौन राज कर ले, स्वप्न में चले आए, अपना पराया, जान -अनजान, जीवित अथवा दिवंगत।

आजकल श्राद्ध पक्ष चल रहा है, श्रद्धा, तर्पण और समर्पण का दौर है। हमारे श्रद्धेय कौन होते हैं, हमारे प्रियजन, गुरुजन और स्वजन। चेतना अपना काम कर रही है और अवचेतन अपना। माता पिता के पश्चात् कल हमारे बड़े सदगुरु महाराज ब्रह्मलीन स्वामी विष्णुतीर्थ की पुण्यतिथि है और मेरे गुरु तुल्य अग्रज श्री हरिहर लहरी का निर्वाण दिवस भी कल ही तो था। हम कहीं जाएं न जाएं, जो मनमानी करे, हमारी नहीं माने, वह और कोई नहीं, हमारा मन ही तो है।।

अब अवचेतन मन की स्क्रिप्ट देखिए। रात को सोते ही स्वप्न कब शुरू हुआ पता नहीं चला ! जब आंख खुली तो स्वप्न जा चुका था। स्वप्न में वह सब कुछ नहीं था, जो दिन में, मेरे मन में घट रहा था। स्वप्न में अचानक मेरे अंग्रेज़ी के प्रोफेसर चंदेल प्रवेश कर गए। एक बार उनका प्रवेश हो जाए, तो फिर बाकी सबकी छुट्टी। वे उनके स्कूटर पर थे और उनके पीछे हमेशा की तरह मैडम चंदेल विराजमान थी। उन्हें मैने नहीं, मेरे एक मित्र ने देखा और उस ओर दौड़ लगा दी, जिस रास्ते से वे गुजरने वाले थे। कौन पागल नहीं था चंदेल सर के पीछे।

और उसने चंदेल सर को रास्ते में रोक ही लिया। प्रणाम किया, तब तक मैं भी अपनी साधारण चाल चलता हुआ, चंदेल सर तक पहुंच ही गया। स्वप्न में कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है। ये सन् 70 के चंदेल सर नहीं थे। थोड़े स्लिम और ट्रिम, और अधिक गोरे, और उस पर घुंघराले बाल उन्हें एक अलग ही लुक प्रदान कर रहे थे। मैं प्रणाम करने को झुका, तो उन्होंने सीने से लगा लिया। स्वप्न में वे सभी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, जो वास्तविक जगत में नहीं हो पाती। मैने चंदेल सर की तारीफ की। सर यह तो आपका पुनर्जन्म लग रहा है। उम्र भी चालीस से ज्यादा की नहीं।।

पास में ही एक स्थान पर मैडम चंदेल एक स्कूल जाने वाले बालक के साथ बैठी थी। बातचीत भी हुई होगी लेकिन सपने का सार यही निकला कि चंदेल सर ने अपने इंद्रपुरी का मकान छोड़ दिया और नया पता मुझे बताया। मेरे पास चश्मा और मोबाइल दोनों नदारद थे इसलिए मैने मेरे मित्र को चंदेल सर का पता नोट करने को कहा। इतने में चंदेल सर ने अपना नया पता, फोन नंबर और कुछ शब्दों में आशीर्वाद स्वरूप कुछ शब्द एक कागज पर लिखकर मुझे सौंप दिए। अचानक सपना खत्म हो गया। चंदेल सर चले गए। मैं न उनका पता पढ़ पाया, न फोन नंबर।

पचास वर्ष बाद भी अवचेतन मन अतीत को नहीं छोड़ पाता। जो हमें प्रिय होते हैं, वे कहीं भी चले जाएं, हमारे मन से नहीं जाते। यही प्रेम है, आसक्ति है, लगाव है, श्रद्धा है। जब हमारा अवचेतन मन सूक्ष्म जगत में विचरण कर सकता है तो जो हमारे परिजनों और प्रियजनों की आत्मा सूक्ष्म में विचरण कर रही है, क्या वे हमारी श्रद्धा और आदर भाव की साक्षी नहीं है। श्रद्धा और तर्पण पूरी तरह शुद्ध चित्त का मामला है। जो शुद्ध और पवित्र आत्माएं मुक्त हो जाती हैं, क्या वे हमारे लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं करती। जिनके स्मरण मात्र से हमें बल और प्रेरणा मिलती हो, उस पितृ लोक, गुरु लोक और वैकुंठ लोक को नमन।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १३१ – एक फूल और एक नई राह… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – एक फूल और एक नई राह।)

☆ लघुकथा # १३१ – एक फूल और एक नई राह ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

अनंत चतुर्दशी के दिन  शहर की सड़कें गणपति विसर्जन की तैयारियों से गुलजार थीं। कहीं ढोल-नगाड़े बज रहे थे, कहीं श्रद्धालु जयकारे लगा रहे थे—“गणपति बप्पा मोरया!”

सीता मंदिर से पूजा करके लौट रही थी। हाथ में पूजा की थाली थी, लेकिन मन वर्षों से एक अनकही पीड़ा से भरा था। विवाह को कई साल बीत चुके थे। हर दूसरे दिन कोई न कोई पूछ ही देता—“अभी तक कोई खुशखबरी नहीं?” वह मुस्कुराकर बात टाल देती, मगर हर सवाल उसके भीतर एक खालीपन छोड़ जाता।

आज मंदिर में उसने माँ गौरी के सामने बस इतना कहा था—“माँ, मेरी गोद भरना मेरे हाथ में नहीं है, पर मुझे किसी के काम आने का अवसर जरूर देना।”

वह सड़क पार करने ही वाली थी कि अचानक भीड़ के बीच एक छोटा बच्चा रोता हुआ दिखाई दिया।

“माँ… माँ…!”

लोग अपनी-अपनी धुन में आगे बढ़ रहे थे। बच्चा घबराकर इधर-उधर देख रहा था।

सीता तुरंत उसके पास पहुँची।

“बेटा, घबराओ मत। तुम्हारी माँ मिल जाएगी। मेरा हाथ पकड़ो।”

बच्चे ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

सीता उसे सड़क किनारे ले आई। पानी पिलाकर प्यार से पूछा, “तुम्हारी माँ कैसी दिखती हैं?”

बच्चा सुबकते हुए बोला, “लाल साड़ी… माथे पर बड़ी बिंदी…”

सीता ने आसपास नजर दौड़ाई। कुछ ही मिनटों बाद एक महिला बदहवास-सी दौड़ती हुई आई।

“मेरा बेटा! मेरा बेटा कहाँ है?”

बच्चा सीता का हाथ छोड़कर माँ की ओर दौड़ पड़ा।

महिला ने उसे सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

“बहनजी, आपने आज मेरी जान बचा ली। भीड़ में इसका हाथ छूटा तो लगा सब कुछ खत्म हो गया।”

सीता ने मुस्कुराकर कहा, “बच्चा मिल गया, बस यही बड़ी बात है।”

बच्चा माँ की बाँहों से झाँककर बोला, “आंटी, धन्यवाद!”

सीता कुछ क्षण उसे देखती रही। उसके चेहरे पर बरसों बाद सहज मुस्कान आई।

वापस लौटते समय सड़क किनारे फूलों की दुकान दिखाई दी। उसकी नजर लाल गुड़हलों पर पड़ी। उसने दो फूल खरीदे और थाली में रख लिए।

घर पहुँचते ही पति ने पूछा, “आज देर कैसे हो गई?”

सीता ने सारी घटना सुना दी।

कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली, “आज मुझे एक बात समझ आई।”

“क्या?”

“माँ होना केवल बच्चे को जन्म देना नहीं है। किसी रोते हुए बच्चे का हाथ थामना भी माँ होना है।”

वह रुकी, फिर धीमे स्वर में बोली, “हमारी गोद भरेगी या नहीं, मैं नहीं जानती। लेकिन अगर किसी बच्चे को माँ, घर और अपनापन चाहिए… तो क्या हम उसे अपना नहीं सकते?”

पति ने उसकी ओर देखा और उसका हाथ थाम लिया।

“इस बारे में आज से साथ मिलकर सोचेंगे।”

सीता की आँखें भर आईं। उसकी नजर थाली में रखे दो लाल गुड़हलों पर टिक गई।

सुबह वह एक फूल लेने निकली थी, शाम तक उसके हाथ में दो फूल थे।

एक उसकी बरसों पुरानी इच्छा का प्रतीक था, दूसरा शायद नई राह का संकेत।

बाहर गणपति विसर्जन की जयकार गूँज रही थी—”गणपति बप्पा मोरया!”

सीता ने आँखें बंद कर लीं।

आज उसने कोई मन्नत नहीं माँगी।

बस मुस्कुराकर कहा— “बप्पा, आज समझ गई… माँ बनने के लिए गोद भरना जरूरी नहीं, किसी का हाथ थामना जरूरी है।”

आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार वे कमी के नहीं, एक नई शुरुआत के आँसू थे।

 

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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