हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९२ ☆ द्वार हृदय के अब तो खोलो… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना द्वार हृदय के अब तो खोलो आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९२ ☆

द्वार हृदय के अब तो खोलो☆ श्री संतोष नेमा ☆

द्वार  हृदय  के  अब  तो  खोलो |

मीठे  स्वर   में   भी नित बोलो ||

रहे   न   बोली   में   कड़वाहट |

मन  में  मिश्री-सा   रस  घोलो ||

द्वार  हृदय  के  अब  तो खोलो।

*

घृणा-द्वेष   से   करो   किनारा।

हो   व्यवहार   सदा  ही  प्यारा।

लेकिन   धर्म – तराजू   में   तुम, |

मानवता  को   कभी   न  तोलो ||

द्वार  हृदय  के  अब  तो  खोलो ||

*

काम   करो   अच्छाई  के   तुम।

साथ   रहो   सच्चाई   के।  तुम।

छल -फरेब का छोड़  अनुशरण,

साथ  धर्म  के  अब  तो  हो  लो |

द्वार  हृदय  के  अब  तो  खोलो ||

*

हिन्दू-मुस्लिम   सिक्ख    इसाई।

सभी   एक  क्यों   बात  भुलाई।

रंग   खून   का   एक  सभी   का ,

भूलो    मत    समता    बड़बोलो ।

द्वार  हृदय  के  अब  तो   खोलो ||

*

समरसता   की   बात  करो   तुम |

नहीं  किसी  से   घात   करो  तुम ||

मिलता    है   संतोष   तभी   जब,

सिद्धांतों    से    कभी   न   डोलो |

द्वार   हृदय  के   अब   तो   खोलो

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “बावरे मन” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “बावरे मन” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

बावरे मन! करता फिरे तू मेरा-मेरा,

साथ न आए कोई भी, जब छूटेगा बसेरा।

*

माया के इस मेले में, तू खोया अनजान,

पल भर की है ये दुनिया, झूठा इसका मान।

तन-धन पर अभिमान करे, समझे इसे अपना,

साँस थमेगी एक दिन, टूटेगा हर सपना।

*

जिसे तू अपना कहता, वो अपने में मगन,

दुख की आँधी आए जब, रह जाएगा अकेला मन।

नाम-सुमिरन कर ले अब, यही सच्चा सहारा,

प्रभु बिन कोई नहीं है, जग सारा ही बेगाना।

*

संतों ने समझाया तुझको, जग है सपना-सा,

जो दिखता है आँखों को, वो है बस छलावा।

छोड़ दे ‘मेरा-तेरा’, कर दे मन को सादा,

तेरे भीतर ही बसता है, वो परम-पिता सारा।

*

बावरे मन! अब समझ ले, यही है सच्ची राह,

प्रभु चरणों में मिट जाए, जीवन की हर चाह।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३११ ☆ भावना के दोहे – ऋतु बसंत ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – ऋतु बसंत)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३११ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – ऋतु बसंत ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कलियाँ गाती गीत है, पहने नित परिधान।

भंवरे गुंजन कर रहे, बनते वह नादान।।

 *

ऋतु बसंत की आ गई, करें वृक्ष शृंगार।

लता झूमती पेड़ पर, करे प्रेम इजहार।।

 *

 प्रेम प्यार के गीत का, पल्लव गाते गान।

लता झूमती प्यार में, वृक्षों पर मुस्कान।।

 *

आया फागुन झूम के, लिखें फाग के गीत।

हुई विदाई शीत की, ओ प्यारे मनमीत।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १३ – कविता – स्वागतम्… नई पीढ़ी का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘स्वागतम्… नई पीढ़ी का।)

☆ शशि साहित्य # १३ ☆

? कविता – स्वागतम्… नई पीढ़ी का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हर नजर ठहर रही तुम्हारी तरफ..

हर सपना अब साकार हो जाएगा..

विश्वास आर्यावर्त के संस्कारों पर,

यह व्यर्थ जाया नहीं हो पाएगा..

धरोहर हो, विलक्षण संस्कृति की,

तो हर दिन सुनहरा हो जाएगा..

जब अंधेरा अवरोध पैदा करे,

सूरज को, साथ लेकर चला जाएगा..

स्वर्ण रश्मियां बिखरेगी राह में,

रास्ता और भी आसान हो जाएगा..

सब की दुआ और हिम्मत तुम्हारी मिले..

दुनिया के हर दिल पर राज हो जाएगा..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२२ ⇒ पवन-मुक्तासन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पवन-मुक्तासन।)

?अभी अभी # ९२२ ⇒ आलेख – पवन-मुक्तासन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पवन तो वैसे ही मुक्त है, हम उसे और मुक्त क्या करेंगे। पंच तत्वों में वायु भी एक प्रमुख तत्व है। हमारी सृष्टि और देह दोनों ही इन पंच-तत्वों से निर्मित हुई है। वायु जिसे आप हवा भी कह सकते हैं, मुक्त तो है ही, कलयुग होते हुए भी आज तक मुफ़्त भी है। हमने पानी तक तो बेच दिया, अब हवा की बारी है। मैंने एक पेट्रोल पंप पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा देखा, मुफ़्त हवा ! मुझे बड़ी खुशी हुई, सोचा चलो हवा तो मुफ्त है। ज़माने की हवा, और बढ़ते प्रदूषण में अगर कहीं ताज़ी हवा मिल जाए, तो मुँह से वाह ही नहीं, वाह वाह निकलता है।।

ओ बसंती पवन पागल ! ना जा रे ना जा, रोको कोई। लेकिन कौन रोक पाया इस पागल पवन को ! इसे मुक्त ही रहने दो। योग के आठ अंगों में से एक अंग आसन है, वैसे तो इंसान की जितनी योनियाँ, उतने आसन, लेकिन एक आसन पवन-मुक्तासन भी है, जो शरीर की अपान वायु को मुक्त कर, पान-अपान का संतुलन बनाए रखता है।।

हमारे शरीर में पान अपान वायु का ही नहीं, व्यान, उदान और समान का भी अस्तित्व है। अपान वायु को बोलचाल की भाषा में वायु विकार कहते हैं। जो नियमित प्राणायाम नहीं कर पाते, वे पवन मुक्तासन से ही काम चला सकते हैं।

रात में जो अधिक देरी से भोजन करते हैं, देर रात की पार्टियों में गरिष्ठ, स्वादिष्ट और स्पाइसी खाना सूत लेते हैं, वे वायु-विकार को भी न्यौता दे चुके होते हैं। केवल एक पान खा लेने से अपान का तो बाल भी बाँका नहीं हो पाता।।

सुबह उठते ही अगर थोड़ा कुनकुना पानी पीकर पवन मुक्तासन कर लिया जाए, तो दिन भर के वायु विकार से कुछ हद तक मुक्ति तो मिल ही जाए। पुराने घरों में सुबह सुबह बुजुर्गों के मुँह से मंत्रों के बीच, वातावरण में एक आवाज़ और गूँजती थी, जिसका, घर का हर सदस्य आदी हो चुका होता था। हाँ, छोटे छोटे बच्चे कुछ समझ नहीं पाते थे।

आयुर्वेद के हिसाब से हमारे शरीर की हर बीमारी की जड़ पेट की खराबी है। पेट में रात का खाना जो पच नहीं पाता, वह अपच, खट्टी डकार, एसिडिटी और वायु विकार को जन्म देता है। वैद्यराज मरीज की नाड़ी देखते ही कोष्ठबद्धता घोषित कर देते हैं, और इसबगोल और एनीमा पर उतर आते हैं।।

पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख, जेब में हो माया ! जेब में तो बहुत माल भरा है, और पेट में कचरा, तो ऊपर से तो सब अच्छा अच्छा, यानी गुड गुड, और अंदर पेट में गुड़-गुड़। और ऐसे में अगर पवन मुक्त हो गई, तो शरमासन और मुक्त-हँसासन। इससे बेहतर सुबह कुछ समय हल्के

व्यायाम, योगासन एवं प्राणायाम को दिया जाए, खुद भी खुली हवा में साँस लें और औरों को भी लेने दें।

कल शाम ही एक शोक-सभा में किसी ने गुप्त-पवन मुक्तासन कर दिया, कुछ ने आँखों के आँसू पोंछने के बहाने रूमाल निकाले, तो कुछ शोक सभा अधूरी छोड़कर ताज़ी बासंती हवा खाने हॉल के बाहर चले गए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८२ – अमर जाहले छत्रपती…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८२ – विजय साहित्य ?

☆ अमर जाहले छत्रपती…!

मर्द मराठी काळजात या

अमर जाहले छत्रपती.

माय जिजाऊ पोटी जन्मले

स्वराज्य रक्षक…हे नृपती ..(१)

*

गनिमी कावा शस्त्र घेऊनी

दिले  अभय ते रयतेला.

शौर्य, शक्तीचे मूर्त रूप हे

मावळ माती. .. दिमतीला..  (२)

*

प्रचंड गडी त्या स्वराज तोरण

इतिहासातील सुवर्ण चांदी .

माता, भगिनी, जाण ठेवली

रायगडी त्या. . .   स्वराज्य नांदी.. (३)

*

गडकोटांची हीच निशाणी

पराक्रमाची गाते गाथा

गड राखिले , गडी अर्पिले

दिगंत कीर्ती. . .  झुकतो माथा…  (४)

*

औरंग्याला जेरीस आणूनी

पाणी पाजले यवनाला

असा शिवाजी होणे नाही

काळ सांगतो . . . काळाला …(५)

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ संघर्ष… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ संघर्ष… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

संघर्षाचा प्रवास खूपच मोठा आहे.

तुझी उंची कमी आणि देहही

छोटा आहे.

पाहू नको आरशात, नको

निरखू रुप.

फसव्या आहेत प्रतिमा आणि

वेगळेच स्वरुप.

पायात काटा आहे निमूट

टाक काढून.

माहीत नाही पुढे आहे काय

ठेवले वाढून.

समजून घे दुःखाचा प्रपात

आहे मोठा.

आणि तुझ्या खिशातला रुमाल

आहे छोटा.

पायात असो बळ आणि

ओठी शीळ.

थेंब असो वेदनेचा राहो

काळजात पीळ.

 

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # जागते रहो… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # जागते रहो… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

मालकिन बाई जाग्या व्हा जाग्या व्हा… मध्यान रातीचा चांदवा डोईवर आलाय म्हंजी धनी घराकडं येन्याचा टाईम झालाय… आता येत असत्याल सोसायटीच्या मेन गेटवरून कधी लेफ्ट कधी राईट कडं झुकत.. तो गेटवरचा आगाऊ वाॅचमन बहाद्दूर बारा बेण्याचा हाय.. तो सायबास्नी ततचं आडवून ठूतो आणि सतराशेसाठ वंगाळ वंगाळ प्रश्न इचारून लै बैजार करून सोडतो… सायबास्नी आधीच लै चढलेली आनी त्यात ह्याची चवकशी… इचालरयं काय सायेब उत्तर काय देतात.. कश्याचा कशाला मेळच जमयाचा नाही.. तवा सायेबाचं टकूर सटाकलं मग बोलतात ये लै श्यान्या कोन पिलयं रं तू का मी… मगं माझ्यापेक्षाही तूच लै बडबडतोय कश्यापायी… गपगुमान गेट उघड मला माझ्या घराकडं जायाच़ आहे.. आधीच लै लेट झालाय… त्यात रोजचा हा खुटानात वाढूळ टाईम होतो… अन घरी गेल्यावर आमचा सिलेंडरचा स्फोट होतो… च्यामायला आमच्या पुरूषाची काही बी मर्दानगीची जिंदगीच राहिली नाही… अन तू रं माकड तोंड्या बेन्या.. रातच्याला गपगुमान शेपुट अंगाभवती गुंडाळून डोळं झाकून पडून राहयचं सोडून.. अगदी माझ्या येन्याच्या वेळेलाच जीव तोडून नि घसा फोडून जो भुंकायचा बिगुल वाजवून समंद्या सोसाटीला जाग आणतूस… मला काय चोर समजतोस काय रं तू रोज… इतकी वर्षे इथं राहतूय मला काय अजून बी वळखंना व्हयं रं… ये तू सकाळच्या पारी बटर नि बिसकुट खायच्या येळेला या चौकात… मग दावतू तुला चांगलाच धतुरा… आगाऊ भा*खाव मला वळखंत न्हाई… माजलास गड्या तू… माझ्यापेक्षा मालकिनीची लै काळजी घेतोस… तरीच म्हटलं मी सोसायटीच्या आत शिरतो न शिरतो तोच माझ्या फ्लॅटमध्ये दिवाळी सारखा चकाचक लाईटाचा उजेड कसा काय पडतू… तो तू बिगुल वाजवून मालकिनीला मी आल्याची वर्दी देतूस व्हयं रं… तरी बरं अजून माझं टकूरं ताळ्यावर असतयं… इतकं पिऊन तर्र होऊन बी मी आपल्या घराकडं बरोबरच जातू… अजून एकदा बी दुसऱ्याच्या घराची इतक्या रातच्याला बेल मारून झोप मोड केली न्हाई… अन तशी केली असती तर मला सोसाटीतनं कधीच हाकलला असता… थू तुझ्या कुत्र्या माझ्याशी बेईमानी करतोस अन मालकिनीला इमानदारी दावतोस… अरं तुझ्या मुळीच ती रात्री अपरात्रीला जागं होऊन माझ्याबरोबर भांड भांडून भुस्कट पाडते… अन मला तर त्या वक्ताला डोळ्यावर आलेली झोपेची झिंग नि खंबेवर खंबा संपवून जड झालेल्या डोक्यात चढलेली नशा यातनं काय बी बोलायचं सुधरतचं न्हाई… सारखं आपलं मॅडमला आय ॲम सो साॅरी.. ओके गुडनाईट याच्या पुढं गाडी सरकतच न्हाई… बाहेरच्या बाल्कनीत हा देह जाऊन पडतो तेव्हा निजानंदी तल्लीन होतो… मग दिवसा कधी जाग येते तेव्हा माझी बोलती बंद असते… कान उघडेच असतात नि बायको तिकडून एके फोरटी सेव्हनच्या फैरीवर फैरी झाडत राहते… मी कधीच शहीद झालेला असतो… पण तिचं समाधान काही झालेलं नसतं… आता आजपासून दारूच्या वाटेला जानार न्हाई नि रोज रातच्याला जंटलमन सारखं वेळेवर घराकडं येईन अशी जातमुचलक्यावर सुटका होते… अन रात्र झाल्यावर पुन्हा माझा मी राहतच नसतो.. मी देवदास होऊन जातो नि मन आधीच पोहचलेले असते मागाहून पायही तिकडेच वळतात… चार दिन कि जिंदगी है अपनी तो अपनेही हिसाबसे जियेंगे.. कल हो न हो… म्हणत एकेक जाम का प्याला रिचवत जातो… बार बंद झाल्यावर बाहेर आणून टाकतात मला तेव्हा भानावर येतो अरे बापरे लै रात्र झाली गड्या… गडाचे दरवाजे तर बंद झाले असतीलच… पण त्याशिवाय दुसरा कुठलाच थारा नसल्यानं पुन्हा पुन्हा इथचं यावं लागतयं… काय करणार साली जिंदगीभी ही ऐसी है… जिना यहा मरना यहा इसके सिवा जाना कहा… आणि तू कुत्र्या तर माझ्या वाईटावर टपकलेलाच असतो… मी लांबून येतानाचा वास आला कि तू जो केकटायला लागतोस बेंबीच्या देठापासून… घरातनं एकदा बायकोनं कायमचं हाकलून दिल्यावर का मलापन तुझ्यासारखं रस्त्यावर आलेलं बघितलं की तुझं समाधान हुनार आहे असा तर तुझा डावं नसंल ना!

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ८ … ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ८ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

अभंग वाणीतून कळलेले संत तुकाराम

अत्यंत तळमळीने पांडुरंगाची भक्ती करताना संत तुकाराम विठ्ठलाशी एकरूप झाले आहेत आणि वेळोवेळी त्यांच्या मुखातून जी अभंगवाणी निघाली आहे त्यातून आपल्यासारख्या साधक भक्तांना तुकाराम महाराजांच्या व्यक्तिमत्त्वाच्या अनेक पैलूंचे दर्शन घडत गेले आहे.

आता तरी पुढे/ हाचि उपदेश/

नका करू नाश/ आयुष्याचा//

सकाळच्या पाया/ माझे दंडवत/

अपुलाले चित्त/ शुद्ध करा//

हित ते करावे/ देवाचे चिंतन/

करूनिया मन/ एक विध//

तुका म्हणे लाभ/ होय तो व्यापार/

करा काय फार/ शिकवावे//

तुकाराम महाराज व्यवसायाने वाणी(व्यापारी) होते. त्यामुळे भक्तांना उपदेश करताना, ज्यामध्ये तुमचे हित आहे, असाच व्यापार तुम्ही करावा असे ते बोलतात. या ठिकाणी व्यापार या शब्दाचा अर्थ कर्म असाच घेणे योग्य ठरेल.

अर्थात स्वहिताचे कर्म करावे.

*शरणागत झालो/ तेणे मी पणा मुकलो//

आता दिल्याचीच वाट/ पाहू नाही खटपट//

नलगे उचित/ काही पहावे संचित//

तुका म्हणे सेवा/ माने तैसी करू देवा//

या ठिकाणी संसारातून मुक्त झाल्याची त्यांची अवस्था दिसते. त्यांच्यातील मी नष्ट होऊन परमेश्वरा जवळ त्यांनी पूर्णतया शरणागती पत्करली आहे. परमेश्वर जे देईल त्याचीच वाट पाहणे आहे असे ते म्हणतात. संचिता पासून सुखाची अथवा दुःखाची प्राप्ती होवो, त्यांना काही फरक पडत नाही. परमेश्वराची सेवा हा एकच त्यांचा ध्यास आहे.

खऱ्या अर्थी तुकाराम जाणून घ्यायचे असतील तर त्यांचे हे खालील १३ अभंग वाचले पाहिजेत. ते काय म्हणतात बघा…

कपट काही एक/ नेणे भुलवायाचे लोक//

तुमचे करितो कीर्तन/ गातो उत्तम ते गुण//

दावू नेणे जडी बुटी/ चमत्कार उठा उठी//

नव्हे मठपती/ नाही चाहूरांची वृत्ती//

नाही देवार्चन / असे मांडीले दुकान//

नाही वेताळ प्रसन्न/ काही सांगो खाणखूण //

नव्हे पुराणिक/ करणे सांगणे आणिक//

नाही जाळीत भणदी / उद्धव म्हणोनी आनंदी//

नेणे वादा घटा पटा/ करिता पंडित करंटा//

नाही हलवीत माळ/ भोवते मिळवूनी गबाळ//

आगमीचे नेणे कुडे / स्तंभन मोहन उच्चाटणे //

नोहे त्यांच्या ऐसा/ निरथवासी पिसा/

१) लोकांना कसे फसवावे, हे कपट मी जाणत नाही.

२) मी फक्त कीर्तन करतो आणि कीर्तनातून देवा, फक्त तुमचे गुणगान करतो.

३) लोकांना नादी लावणे हा माझा उद्देश नाही, म्हणून एखादी मुळी काढण्यासारखा कोणताही चमत्कार मी कधीच करत नाही.

४) माझे कोणीही शिष्य नाहीत, की जात वारा, मी माझे मोठेपण समाजात प्रस्थापित करण्याचा प्रयत्न करेन.

५) मी मठाधिपती नाही किंवा मला कोणतीही जमीन इनाम मिळालेली नाही.

६) धूप, दीप, गंधादी पुजा अर्चनेच्या कोणत्याही गोष्टींचे दुकान मांडून मी पसारा घातलेला नाही.

७) काही लोकांच्या खाणाखुणा सांगणारा कोणताही वेताळ माझ्यावर प्रसन्न नाही.

८) पुराणाचा आधार घेऊन लोकांना एक सांगावे आणि व्यवहारात वेगळेच वागावे असा ढोंगी पुराणिक मी नाही.

९) अंबाबाईच्या नावाने उदो करत डोक्यावर अग्नीचे खापर जाळणे मला माहित नाही.

१०) घटाकाश, मटाकाश, तंतू आणि पट असे जे वेदांतातील दृष्टांत आहेत त्यांचा अनुवाद करणारा करंटा पंडित मी नाही.

११) लोकांना भवती जमवून आणि त्यांच्यात बसून जपमाळ ओढण्याचे ढोंग करणाऱ्यातला मी नाही.

१२) वेदातील जारण, मारण, उच्चाटन इत्यादी प्रयोग मला माहित नाहीत.

१३) हरीच्या भक्ती वाचून इतर प्रकार करणारा नरकवासी वेडा मी नाही.

तुकाराम महाराज हे फक्त तनाने आणि मनाने हरीचे दास आहेत, भक्त आहेत.

संत तुकाराम एक प्रापंचिक माणूस, साधना करताना त्यांचे मन मध्येच साशंक होते. आपली भक्ती खरी आहे की मी भक्तीचे ढोंग!! करतो आहे अशी शंका त्यांच्या मनात उत्पन्न होते आणि ते अस्वस्थ होतात. पांडुरंगाला सांगतात…

गातो भाव नाही अंगी/ भूषण करावया जगी//

परी तू पतित पावन/ करी साच हे वचन//

मुखे म्हणावितो दास/ चित्ती माया लोभ आस//

तुका म्हणे दावी वेष/ पैसा अंतरी नाही लेश //

ते या अभंगात स्वतःचे दोष वर्णन करतात.

हे हरी, मी तुझे नाव घेतो, परंतु त्यासाठी योग्य असा भक्ती भाव माझ्यापाशी आहे का? जगात माझा लौकिक वाढावा म्हणून तर मी हे नामस्मरणाचे ढोंग करत नाही ना? अशी स्वतःविषयी ते शंका घेतात. तू पतीत पावन आहेस, तेव्हा तूच मला माझ्या चुकीतून सावर. मी जेव्हा माझ्या भक्त असण्याचे दाखवतो, स्वतःला तुझा दास म्हणवितो, तेव्हा मला असे वाटते की भक्तीचा लेशही माझ्यात नसून माझ्या चित्तात अजूनही माया मोह लोभ आहे.

देवाला तुकारामांची ही प्रामाणिक कबुली आहे.

भक्तीचा महिमा इतका अपार आहे, की त्यामुळे तुकाराम महाराज आणि पांडुरंग यांच्यातील द्वैतभाव हळूहळू कमी होत चालला आहे. महाराज म्हणतात,

बाहिर पडलो/ आपुल्या कर्तव्ये /

संसाराची जीवे/ वेटाळीलो//

एका मध्ये एक/ नाही मिळो येत/

ताक नवनीत/ निवडिले//

झाली दोन्ही नामे / एकची मथनी/

*दुसरीया गुणी/ वेगळाली//

तुका म्हणे दाखविली/ मुक्ताफळी/

शिम्पलेची स्वस्थळी/ खुंटलीया//

महाराज स्वतःची स्थिती या अभंगात वर्णन करतात. त्यांचे म्हणणे असे आहे की, केवळ या जीवदशेमुळे जन्म, मृत्यू, आणि संसार यात ते गुंतून पडले आहेत. पण आता प्रयत्नपूर्वक या सर्वातून बाहेर पडत आहेत. ताकापासून निघालेले लोणी ज्याप्रमाणे ताकात पुन्हा मिसळणे अशक्य, त्याचप्रमाणे आता एकदा संसारातून बाहेर पडल्यावर त्यात पुन्हा अडकणे नाही. एकाच्याच मंथना पासून वेगळ्या गुणांमुळे सार व असार हे दोन भाग झाले आणि त्यास दोन नावे पडली. एकदा मोती शिंपल्यातून वेगळा काढल्यावर त्याला पूर्ववत शिंपल्याशी जोडता येत नाही.

तुकाराम महाराजांची स्थिती या शिंपल्यातून बाहेर काढलेल्या मोत्यासारखी झाली आहे.

मोक्ष तुमचा देवा/ तुम्ही दुर्लभ तो ठेवा/

माझी भक्तीची आवडी/ नाही अंतरी ते गोडी//

आपल्या प्रकारा/ करा जतन दातारा/

तुका म्हणे भेटी/ पुरे एकची शेवटी//

तुकारामांना मोक्षाची हाव नाही. तो दुर्लभ आहे. ते देवाला सांगतात की देवा, मोक्ष काय आहे तो तुझ्यापाशीच ठेव. मला फक्त तुझ्या भक्तीची आवड आहे. तुझ्या भेटीसाठी माझा जीव व्याकुळ झाला आहे.

तुकाराम महाराजांच्या मनस्थितीची कल्पना या अभंगातून वाचकांना येते.

५००० अभंगाच्या या गाथेत वेळोवेळी तुकाराम महाराज आपल्या नजरेसमोर सतत उभे राहतात. त्यांच्याविषयी पुढील लेखात अजून जाणून घेऊ.

 क्रमशः…  

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ आत्मनिर्भर — भाग – १ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले ☆

डॉ. ज्योती गोडबोले 

? जीवनरंग ❤️

☆ आत्मनिर्भर — भाग – १ ☆ डॉ. ज्योती गोडबोले 

परवा मंगेशचं लग्न झालं. सोन्याच्या पावलांनी देविका घरी आली आणि माणिकला धन्य धन्य झालं.

एकुलता एक मुलगा. चांगला शिकलेला आणि खूप मोठ्या पगाराची नोकरी. पण म्हणतात तसे इतके वर्षं योगच नव्हते लग्नाचे.

किती विवाह मंडळात नावे घातली ओळखीच्या लोकांना सांगून ठेवलं पण लग्न काही जमेना.

माणिकचे यजमान साध्याच नोकरीत आणि यथातथाच नोकरी.

बिचाऱ्या माणिकनं नोकरी करून संसार पुढे रेटला.

असाही तिला काही फार पगार नव्हता पण तरी हातभार लागायचा तेवढाच.

माणिक जितकी उत्साही, आयुष्यात रस घेणारी, समरसून जगणारी तितकेच वामनराव आळशी, सुस्त आणि निरुत्साही.

रोज ऑफिस कसेबसे करून घरी आले की येऊन पेपर वाचत बसायचे.

कोणी मित्र नाहीत की कसला छंद नाही. छंद एकच. सतत चांगलंचुंगलं खायचं. बाहेरच्या आराम खुर्चीवर बसून माणिक स्वयंपाकघरात काय करते त्यावर लक्ष ठेवायचं. आणि खेकसायचं तिच्यावर.

बिचारी माणिक सहन करायची सगळं. तिला धड माहेरचा आधार नाही, आईवडील भाऊ बहीण कोणी नाही. ही अनाथ मुलगी काकांच्या घरी वाढली. काकाने हा बंगला आणि हा नोकरीचा मुलगा बघून करून दिलं माणिकचं लग्न.

कुलकर्णींनी ही दिसायला चांगली मुलगी लग्नाचा सगळा खर्च आपणच करून घरात आणली,

म्हणून माणिक आधीच दबलेली होती. त्यात अतिशय माणूसघाणे आणि विक्षिप्त वामनराव पदरी पडले.

तरी हसतमुख माणिकने लगेचच कॉलनीतल्या मैत्रिणी जोडल्या.

हसून खेळून त्यांच्याबरोबर आयुष्य आनंदात घालवू लागली माणिक.

 

यथावकाश माणिकला दिवस गेले आणि छानसा मुलगा झाला.

माणिकने कामावरून रजा घेतली.

माणिकच्या सासूबाई चांगल्या होत्या. आपला कर्तृत्वशून्य मुलगा त्यांना चांगलाच माहीत होता. त्या म्हणाल्या”मी संभाळीन ग लेकाला तुझ्या. जा ग तू रजा संपली की नोकरीला. हा वामन्या काही तुला साथ देणार नाही बघ. तू नोकरी सोडू नको माणिक. आणखी चांगली नोकरी शोधत रहा.”

माणिकने लहानमोठे कोर्सेस केले आणि एका ऑफिसमध्ये तिला खरंच चांगली नोकरी मिळून गेली.

शहाणी माणिक एकाच मुलावर थांबली. तिच्या सासूबाईंना तिचं फार कौतुक होतं. पगार वाढल्यावर माणिक सासूबाईंना हौसेने पॉकेटमनी देई आणिम्हणे, सासूबाई घ्या हो हे पैसे. करा थोडी मजा. ”

माणिकचा मुलगा शाळेत चांगली प्रगति करत होता.

आपली आई आणि आजी त्याचे सर्वस्व होते. बाबांपासून तो लांबच असे. वामनरावांशी त्याचे सूर फारसे जुळले नाहीत. त्यांनाही मंगेशचं कौतुक नव्हतं. समजच कमी होती त्यांना जरा.

मंगेश शाळा कॉलेजमध्ये चांगले यश मिळवत पुढे गेला. त्याची सगळी फी माणिकने भरली.

ठराविक रक्कम हातात ठेवली की वामनराव वर एक पैसा देत नसत.

मग माणिक कुठून पैसे आणते, काय करते याच्याशी त्यांना काहीही देणेघेणे नसे.

मंगेश कॉलेजला गेलाआणि थोडे कमी मार्क पडले त्याला बारावीला.

गव्हर्नमेंट कॉलेजमध्ये इंजिनिअरिंगला प्रवेश मिळणेआता अशक्य होते.

माणिकने आणि मंगेशच्या आजीने त्याला धीर दिला. दोघीनी आपलं सोनं विकायचं ठरवलं आणि मंगेशची सोय केली.

मंगेशच्या डोळ्यात पाणी आलं.

आई आजी, तुमचे उपकार मी कधीही विसरणार नाही ग. तो गहिवरून म्हणाला.

आजी म्हणाली “माझं सोड मंगेशा. पण या आईला कधी विसरू नको रे बाबा. फार सोसलंय बर पोरीने. ”आजी डोळे पुसत म्हणाली. “

नाही ग आजी. मीआईला कधीतरी अंतर देईन का? ”मंगेश गहिवरून म्हणाला.

मंगेशने मग मात्र मागे वळून बघितलं नाही. , खूप हुशार नसला तरी कष्टाळू होता मंगेश. अहोरात्र मेहनत करत तो चांगले मार्क्स मिळवत पास झाला.

मंगेशला एका कंपनीत चांगली नोकरी लागली. त्यामानाने बरा पगार होता मंगेशला.

मध्यमवर्गात वाढलेल्या आणि कमी अपेक्षा असलेल्या त्या कुटुंबाला तो पगारही खूप मोठाच वाटला.

दरम्यान अगदी छोट्याशा आजाराचे निमित्त होऊन मंगेशची आजी अचानक गेली. आता मात्र मंगेशचं लग्न व्हायला हवं असं माणिकला वाटायला लागलं.

तिशीजवळ आलेला मंगेश लहान नव्हता आता लग्नासाठी.

खूप खूप मुली बघितल्या माणिकने. पण मुलींच्या अपेक्षाच फार. शहरातल्या मुली तर इतक्या चढलेल्या की मंगेशचा पगार बघून त्या नकारच देत.

माणिक अगदी हताश झाली. तिचा मुली बघायचा उत्साह अगदी कमीच झाला. पण योग असावा तसे हे नागपूरजवळच्या मुलीचे स्थळ सांगून आले.

मुलगी एमबीए,, दिसायला बरी आणि मुख्य म्हणजे पुण्यात बदली मिळण्यासारखी होती. दिसायला डावीच होती देविका जोशी. पण सगळा विचार करून मंगेशने आणि माणिकने होकार दिला.

जोशींची परिस्थिती बेताचीच होती.

ठराविक रक्कम आम्ही तुमच्या हातात ठेवू. बाकी काही करू शकणार नाही. जोशी म्हणाले.

 

माणिक नाराज झाली पण मंगेश म्हणाला “असू दे ग आई. ती मिळवती मुलगी आहे. आपल्याच घरी येणार आहे ना. करू आपण जमेल तसा खर्च. ”

माणिकने पहिलाच मुलगा म्हणून खूप खर्च केला. आपल्या फंडातले खूप पैसे खर्च केले, सुनेला दागिने केले. खूप लोकांना हौसेने बोलावून बराच फंड रिकामा केला. मैत्रिणी सावध करत होत्या तरी त्यांचे न ऐकता.

नीला म्हणत होतीच. ”माणिक, अग काय हा खर्च? जरा विचार कर. असा तुझा घामाचा पैसा उधळू नकोस. एकुलता एक मुलगा असला म्हणून काय झालं? ”पण माणिकने ऐकलं नाही.

सून घरात आली. माणिकला सून नवीन असताना कौतुक वाटलं म्हणून तिला रोज हातात चहा, नास्ता, अगदी कौतुकाने रोज काय करू विचारून करी माणिक.

उन्हे डोक्यावर आली तरी यांची बेडरूम बंदच. , माणिकच्या घराचे सगळे रुटीन विस्कळित झालं.

एक दिवस वामनराव फिरून आले आणि दारातच पडले. त्यांना उठताच येईना. धावाधाव करून त्यांना मोठ्या हॉस्पिटल मध्ये अँडमिट केलं. त्यांच्यावर मणक्याची शस्त्रक्रिया ताबडतोब करायला हवी असं सर्जनने सांगितलं.

खर्च सांगितला पाच लाख रुपये.

माणिकचा पाऊण पैसा तर मंगेशच्या लग्नातच आणि घराच्या रिनोव्हेशन मधेच गेला होता.

मंगेशने न बोलता जमवाजमव करून सगळं बिल भरलं आणि वामनराव घरी आले. घरी आले ते उठूच शकले नाहीत. त्यांच्या पायातली ताकदच गेली होती.

डॉक्टरांनी सांगितले, मणके झिजले आहेत आणि आता त्या नर्व्हज् दाबल्या गेल्यामुळे हे आता चालू शकणार नाहीत.

माणिकला अतिशय वाईट वाटलं. तिने खूप प्रयत्न करून बघितले. आयुर्वेदिक होमिओपॅथिक सगळ्या चिकित्सा करून झाल्या पण वामनरावाना कधीच उभं रहाता आलं नाही.

मग आलं डायपर आणि सेवेसाठी बायका ठेवणं. त्यांचे भक्कम पगार आणि खर्च माणिकच्या मागे लागले. खर्चाने पिचून गेली माणिक.

मुलगा सून ठराविक रक्कम हातात ठेवत. बाकीचा डोईजड खर्च माणिक कुठून करणार?

एक दिवस माणिक मंगेशला म्हणाली”अरे मंगेश, जरा जास्त पैसे देत जा तू. निदान तुमच्या दोघांचे जेवणखाण डबे वीजबिल हे नको का तुम्ही द्यायला? किराणा दुप्पट लागतो हल्ली. मला झेपत नाही रे हा खर्च. ”

लगेच देविका म्हणाली, हे बघा आई, बाबांचे पाच लाख बिल मंगेशनेच भरलं ना?

आणि आमच्या लग्नात मंगेशने नव्हता तुम्हाला खर्च करायला सांगितला. सगळा फंड उधळून टाकलात. आम्हाला नाही जमणार जास्त पैसे द्यायला. ”न बोलता मंगेश आणि देविका निघून गेले. माणिक हताश झाली. तिचे आणि वामनरावांचे तुटपुंजे पेन्शन तिला पुरेंना.

अशी चार वर्षे गेली. माणिक चार वर्षात काळज्या कष्टानं म्हातारी झाली. वाकून गेली पाठीत माणिक.

मैत्रिणी येत धीर देत. तिला बदल म्हणून कार मधून फिरायला नेत. हळहळून म्हणत, बघ माणिक.

आम्ही सांगत होतो ते ऐकलं नाहीस. किती उधळपट्टी केलीस लग्नात. सगळा फंड घालवलास वाया. आहे का त्या सुनेला मुलाला त्याचं काही? ”

पाच वर्षे अशी अंथरुणात काढून एका रात्री वामनराव झोपेतच गेले.

सुटले असेच भाव होते सगळ्यांच्या तोंडावर. माणिक आता रिकामी झाली. चोवीस तास वामनरावांच्या सेवेत गुरफटलेली माणिक आता एकदमच रिक्त झाली. काहीच काम राहिलं नाही तिला.

पडून असलेल्या वामनरावांशी तिला सोबत होती. ती त्यांना पुस्तके वाचून दाखवायची. दोघेजण पत्ते खेळायचे. या आजारपणामुळेदोघेही जवळ आले होते एकमेकांच्या.

गप्पा मारत, मागच्या आठवणी काढत ते त्यात रमून जात.

वामनरावांनी तिची अनेकवेळा क्षमा मागितली. मी तुला समजू शकलो नाही माणिक. असं अनेकवेळा ते म्हणाले.

“माणिक, हा बंगला तुझ्या नावावर आहे. तू माझ्यानंतर इथेच रहा. कुठे सह्या करू नको आणि मंगेशला अजिबात देऊ नको घर. आपण मृत्युपत्र करु आणि मग आपल्या पश्चात देऊ त्यालाच. ”त्यांनी माणिकला सांगून ठेवलं. आज त्यांची आठवण येऊन माणिकला अगदी असहाय वाटलं. कशी का होईना, त्यांची सोबत होती तिला.

– क्रमशः भाग पहिला 

© डॉ. ज्योती गोडबोले

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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