हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 25 ☆ बिटिया की नोक-झोंक ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आचार्य जी  की एक रचना  बिटिया की नोक-झोंक। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 25 ☆ 

☆ बिटिया की नोक-झोंक ☆ 

बिटिया की नोक-झोंक

ताजा पुरवैया सी

?

अम्मा सम टोंक रही

चाहे जब रोक रही

ठुमक मचल करवा जिद

पूरी, झट बाँह गही

तितली सम उड़े, खेल

ता ता ता थैया सी

बिटिया की नोकझोंक

ताजी पुरवैया सी

?

धरती पर धरती पग

हाथों आकाश उठा

बाधा को पटक-पटक

तारे हँस रही दिखा

बेशऊर लोगों को

चुभे भटकटैया सी

बिटिया की नोंकझोंक

ताजी पुरवैया सी

?

बात मान-मनवाती

इठलाती-इतराती

बिन कहे मुसीबत में

आप कवच बन जाती

अब न मूक राधा यह

मुखर है कन्हैया सी

बिटिया की नोकझोंक

ताजा पुरवैया सी

?

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

३-५-२०२०

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नवरात्रि विशेष☆ हम द्वार तुम्हारे आये हैं ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित नवरात्रि पर्व पर विशेष देवी गीत –  हम द्वार तुम्हारे आये हैं । ) 

☆ नवरात्रि विशेष  ☆ हम द्वार तुम्हारे आये हैं ☆

माँ दरशन की अभिलाषा ले हम द्वार तुम्हारे आये हैं

एक झलक ज्योती की पाने सपने ये नैन सजाये हैं

 

पूजा की रीति विधानों का माता है हमको ज्ञान नही

पाने को तुम्हारी कृपा दृष्टि के सिवा दूसरा ध्यान नहीं

 

फल चंदन माला धूप दीप से पूजन थाल सजाये हैं

दरबार तुम्हारे आये हैं, मां  द्वार तुम्हारे आये हैं

 

जीवन जंजालों में उलझा, मन द्विविधा में अकुलाता है

भटका है भूल भुलैया में, निर्णय न सही कर पाता है

 

मां आँचल की छाया दो हमको, हम माया में भरमाये हैं

दरबार तुम्हारे आये हैं, हम द्वार तुम्हारे आये हैं

 

जिनका न सहारा कोई माँ, उनका तुम एक सहारा हो

दुखिया मन का दुख दूर करो, सुखमय संसार हमारा हो

 

आशीष दो मां उन भक्तों को जो, तुम से आस लगाये हैं

दरबार तुम्हारे आये हैं, सब  द्वार तुम्हारे आये हैं

 

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 25 ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 25 (सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 25) ☆ 

Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. Presently, he is serving as Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He is involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

Captain Raghuvanshi is also a littérateur par excellence. He is a prolific writer, poet and ‘Shayar’ himself and participates in literature fests and ‘Mushayaras’. He keeps participating in various language & literature fests, symposiums and workshops etc. Recently, he played an active role in the ‘International Hindi Conference’ at New Delhi.  He presided over the “Session Focused on Language and Translation” and also presented a research paper.  The conference was organized by Delhi University in collaboration with New York University and Columbia University.

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

In his naval career, he was qualified to command all types of warships. He is also an aviator and a Sea Diver; and recipient of various awards including ‘Nao Sena Medal’ by the President of India, Prime Minister Award and C-in-C Commendation.

Captain Pravin Raghuvanshi is also an IIM Ahmedabad alumnus.

His latest quest involves social media, which is filled with rich anonymous literature of nameless writers, shared on different platforms, like,  WhatsApp / Facebook / Twitter / Your quotes / Instagram etc in Hindi and Urdu, he has taken the mantle of translating them as a mission for the enjoyment of the global readers. Enjoy some of the Urdu poetry couplets as translated by him.

☆ English translation of Urdu poetry couplets of  Anonymous litterateur of Social Media# 25☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

तमाम उम्र गुज़र जाती है…

तराजू की तरह साहब,

कभी फ़र्ज़ भारी होते हैं

तो कभी दिली ख्वाहिशें…

 

The  whole  life passes on

Like a weighing scale, dear

Sometimes duty is heavier

Other times heart’s desires

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

बडी कशमकश है, ए खुदा!

थोड़ी  सी रहमत कर  दे,

या तो ख्वाब ही ना दिखा,

या फिर मुकम्मल कर दे..!

 

What a big dilemma I am in,

Have a little mercy, O’ God!

Either don’t make me dream,

Or just realise them for me!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

यादों को भुलाने में

कुछ देर तो लगती है

आँखों को सुलाने में

कुछ देर तो लगती है

 

किसी शख्स को भुला देना

इतना आसान नहीं होता

दिल  को  समझाने  में

कुछ देर तो लगती ही है…

 

It takes some time to

 forget the memories…

It  takes a  while  to

make the eyes sleep…

 

It’s not so easy

to forget someone

It  takes some time

to convince the heart…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ☆ सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆ क्योंकि मैं राष्ट्र माँ नहीं ☆ श्रीमती समीक्षा तैलंग 

श्रीमती समीक्षा तैलंग 

हम ई-अभिव्यक्ति पर एक अभियान की तरह प्रतिदिन “संदर्भ: एकता शक्ति” के अंतर्गत एक रचना पाठकों से साझा कर रहे हैं। हमारा आग्रह  है कि इस विषय पर अपनी सकारात्मक एवं सार्थक रचनाएँ प्रेषित करें। हमने सहयोगी  “साहित्यम समूह” में “एकता शक्ति आयोजन” में प्राप्त चुनिंदा रचनाओं से इस अभियान को प्रारम्भ कर दिया  हैं। आज प्रस्तुत है श्रीमती समीक्षा तैलंग जी की महात्मा गाँधी जयंती पर रचित एवं नवरात्रि पर्व पर एक विचारणीय लेख  “क्योंकि मैं राष्ट्र माँ नहीं”

☆  सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆ क्योंकि मैं राष्ट्र माँ नहीं

मैं जानती हूं बापू के वचन। और निबाह भी करती हूँ तब तक, जब तक कोई सामने से हमला न करे।

बुरा मत देखो-

लेकिन क्या करूँ तब, जब देखने वाले की आंख मुझ पर गलत निगाहें डालती है? देखने दूं उसे…? निहारने दूं अपनी काया को, जब वो उन्हीं गंदी निगाहों से अंदर तक झाँकने की कोशिश करता है? या शोर मचाऊं? कौन आएगा बचाने? निर्भया को कभी कोई बचाने नहीं आता। चीखती है वो। लेकिन सुनने वाले की रूह नहीं काँपती। वो उन आँखों का शिकार होती है हमेशा। बस उसकी एक ही गलती है, कि वो निहत्थी है। तो क्या करूं, बार बार निर्भया बनने तैयार रहूँ? या निर्भीक होकर उसकी आंखें दबोच उसके उन हाथों में धर दूं, जिससे वो अपराध करता है? या फिर अहिंसा की पुजारी होकर उसे बख़्श दूँ?

बुरा मत सोचो-
उन सबकी सोच का क्या करूं जो उन्हें स्त्री की तरफ घूरने पर मजबूर करती है। घृणित मानसिकता से उपजी सोच लडकियों के कपडों से लेकर उसकी चालढाल, उसकी बातों, सब पर वाहियात कमेंट्स करके जता देती है। खुद में सुधार की बजाए, उंगलियां हमेशा स्त्री की तरफ उठती हैं। क्योंकि वे कमजोर हैं। अपनी गलतियों पर परदा डालने के लिए उनकी सोच उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करती है। लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचती। मेरी सोच मुझे न घूरने के लिए कहती है और न ही पुरुषों पर टिप्पणी के लिए विवश करती है। क्योंकि मेरी सोच हीन भावना से ग्रसित नहीं। मेरी सोच स्वावलंबी है। फिर क्यों न मैं, ऐसी घटिया सोच रखने वाले को सबके सामने खींचकर एक तेज चपाट दूं? उसे सोचने का अधिकार केवल खुद पर है। मुझ पर कतई नहीं।

बुरा मत कहो-
मैं कहां कहती हूं बुरा…। जब वो नुक्कड़ पर खड़े होकर सीटी बजाते हैं। या फिर सडक रोककर आवारागर्दी करते हैं। ऊलजलूल बकते हैं। फिर भी मैं चुप रहूं? उनकी अश्लील बातों को सुनकर आगे बढ़ जाऊं? उनकी घिनौनी हरकतों को नजरंदाज़ कर दूं? उनके दिमाग में उपज रहे अपराध के प्रति सजग न होकर, वहां से चुपचाप निकलकर, उन्हें शह दे दूं? नहीं, मैं ऐसा आत्मघाती कदम उठाने के लिए कभी तैयार नहीं। मैं उसे उसके किए की सजा जरूर दूंगी। सहकर नहीं, डटकर…।

बापू तुम सच में महात्मा हो। अपनी इंद्रियों पर काबू रख सकते हो। लेकिन ये सब, महात्मा नहीं। इसलिए इनकी इंद्रियां इन्हें भटकाती हैं। लेकिन मुझे इन पर लगाम कसना जरूर आता है। अपनी आत्मरक्षा के लिए। क्योंकि मैं राष्ट्र-मां नहीं। मैं एक साधारण स्त्री हूं।

© श्रीमती समीक्षा तैलंग 

पुणे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेरू का मकबरा भाग-1 ☆ श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज  “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  कशी निवासी लेखक श्री सूबेदार पाण्डेय जी द्वारा लिखित कहानी  “शेरू का मकबरा भाग-1”. इस कृति को अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य प्रतियोगिता, पुष्पगंधा प्रकाशन,  कवर्धा छत्तीसगढ़ द्वारा जनवरी 2020मे स्व0 संतोष गुप्त स्मृति सम्मान पत्र से सम्मानित किया गया है। इसके लिए श्री सूबेदार पाण्डेय जी को हार्दिक बधाई। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – शेरू का मकबरा भाग-1 

दो शब्द रचना कार के – यों  तो मानव जाति का जब से ‌जन्म हुआ और सभ्यता विकसित होने से पूर्व पाषाण‌काल से ही मानव तथा पशु पक्षियों के संबंधों पर‌ आधारित कथा कहानियां कही सुनी जाती रही‌ हैं। अनेक प्रसंग पौराणिक कथाओं मे कथा  के अंश रुप मे विद्यमान रहे  है तथा यह सिद्ध करने में कामयाब रहे हैं कि कभी मानव अपनी दैनिक आवश्यकताओं  की पूर्ति के लिए पशु पक्षियों पर निर्भर था। जिसके अनेक प्रसंग रामायण महाभारत तथा अन्य काव्यों में वर्णित है चाहे जटायु का अबला नारी की रक्षा का प्रसंग हो अथवा महाभारतकालीन कथा प्रसंग।हर प्रसंग अपनी वफादारी की चीख चीख कर दुहाई देता प्रतीत होता है।

इसी कड़ी में हम अपने पाठकों के लिए लाये हैं एक सत्य घटना पर आधारित पूर्व प्रकाशित रचना जो इंसान  एवम जानवरों के संबंधों के संवेदन शीलता के दर्शन कराती है। आपसे अनुरोध है कि अपनी प्रतिक्रियाओं से अवश्य‌ ही अवगत करायेंगे। आपकी निष्पक्ष समालोचना हमें साहित्य के क्षेत्र में निरंतर कुछ नया करने की प्रेरणा देती हैं।

पूर्वांचल का एक ग्रामीण अंचल, बागों के पीछे झुरमुटों के ‌बीच बने मकबरे को शेरू बाबा के मकबरे के रुप में पहचानां जाता है। उस स्थान के बारे में एक किंवदंती प्रचलित है कि संकट से जूझ रहे ‌हर प्राणी के जीवन की रक्षा शेरू बाबा‌ करते है और वे सबकी मुरादें पूरी करते हैं। हृदय में बैठा यही विश्वास व भरोसा आम जन मानस को प्रतिवर्ष श्रावण पूर्णिमा के दिन शेरू बाबा के मकबरे ‌की ‌ओर खींचे लिए चला जाता है और श्रावण पूर्णिमा को उस मकबरे पर बडा़ भारी मेला लगता है।

आज श्रावणी पर्व का त्योहार है।  गाँव जवार के सारे बूढ़े‌ बच्चे नौजवान क्या हिन्दू क्या मुसलमान, सारे के सारे लोग अपने अपने दिल में अरमानों की माला संजोए मुरादों के ‍लिये‌ झोली फैलाए शेरू‌बाबा‌‌ के मुरीद बन उनके ‌दरबार मे हाजिरी लगाने को तत्पर दीखते रहे हैं। मकबरे की पैंसठवीं वर्षगांठ मनाई जा रही‌ है। मेला अपने पूरे शबाब ‌पर है। कहीं पर नातों कव्वालियों का ज़ोर है, तो कहीं भजनों कीर्तन का शोर। हर तरफ आज बाबा की शान में कसीदे पढ़ें जा रहें हैं।

आज कोई खातून‌ बुर्के के पीछे से झांकती दोनों आंखों में सारे ‌जहान का दर्द लिए दोनों हाथ ऊपर उठाये अपने लाचार एवम् बीमार शौहर के ‌जीवन की भीख‌ मांग रही है। तो वहीं कोई बुढ़िया माई‌ अपने‌ हाथ जोड़े, सिर को झुकाये इकलौते  सैनिक बेटे ‌की सलामती की दुआ मांग रही है। वहीं पर कई प्रेमी जोड़े हाथों में हाथ डाले पूजा की थाली उठाये शेरू बाबा के नाम को साक्षी मान साथ साथ जीने मरने  कसमें ‌खाते दिख रहे हैं।

इन्ही चलने वाले क्रिया कलापों के ‌बीच सहसा अक्स्मात मेरे जेहन में शेरू बाबा की आकृति  सजीव हो उठती है। और उसके साथ बिताए ‌पल चलचित्र की तरह स्मृतियों में घूमने लगते है। मैं खो जाता हूं ‌उन बीते पलों में और तभी वे पल मेरी लेखनी से ‌कहानी‌ बन फूट पड़ते हैं तथा शेरू के त्याग एवम् ‌बलिदान की गाथा उसे अमरत्व प्रदान करती‌ हुई पुराणों में तथा पंच तंत्र में वर्णित पशु पक्षियों की ‌गौरव गाथा बन मानवेत्तर संबंधों का मूल आधार तय करती दिखाई देती है। मैं एक बार फिर लोगों को सत्य घटना पर आधारित ‌शेरू का जीवनवृत्त सुनाने पर विवश हो जाता हूँ।

वो जनवरी का महीना, जाड़े की सर्दरात का नीरव वातावरण,कुहरे की चादर से लिपटी घनी अंधेरी काली रात का प्रथम प्रहर, सन्न सन्न चलती शीतलहर, मेरे पांव गांव से बाहर सिवान में बने खेतों के बीच पाही पर बने कमरे की तरफ बढे़  चले जा रहे थे, कि सहसा मेरे कानों से किसी‌ श्वान शावक के दर्द में ‌डूबी कूं -कूं की‌ आवाज टकराई, जिसनें मेरे आगे बढ़ते क़दमों को‌ थाम‌ लिया। टार्च की पीली रोशनी में उसकी दोनों बिल्लौरी आंखें ‌चमक उठी। मुझे ऐसा लगा जैसे उसे अभी अभी कोई उसे उस स्याह‌ रात में बीच सड़क पर ठंढ़ में मरनें के लिए छोड़ गया हो।

उस घनी काली रात में जब उसे आस-पास किसी मानव छाया के होने का एहसास हुआ तो वह मेरे पास आ गया और मेरे पांवों को चाटते हुए, अपने अगले पंजों को मेरे पांवों पर रख लोटनें पूंछ हिलाने तथा कूं कूं की आवाजें लगाया था ऐसा लगा जैसे वह मुझसे अपने स्नेहिल व्यवहार का प्रति दान मांग रहा हो। अब उसके पर्याय ने मेरे आगे बढ़ते कदमों को थाम लिया था।

मैं उस अबोध छोटे से श्वानशावक का प्रेम निवेदन ठुकरा न सका था। मैंने सारे संकोच त्यागकर उस अबोध बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया तथा उसे कंधे से चिपकाते पुनः घर को लौट पड़ा था। वह भी उस भयानक ठंढ़ में मानव तन की गर्मी एवम् पर्याय का प्रतिदान पा किसी अबोध बच्चे सा कंधे पर सिर चिपकाये टुकुर टुकुर ताक रहा था। यदि सच कहूं तो उस दिन मुझे उस बच्चे से अपने किसी सगे संबंधी जैसा लगाव हो गया था।

उस दिन घर-वापसी में मेरे घर के आगे अलाव तापते मुझे देखा तो उन्होने बिना मेरी भावनाओं को समझे मेरे उस कृत्रिम की हंसी‌ उड़ाई थी। उस समय मेरी दया करूणा तथा ममता उनके उपहास का शिष्य बन गई थी। लेकिन मैं तो मैं ठहरा बिना किसी की बात की परवाह किए सीधे रसोई घर में घुस गया और कटोरा भर दूध रोटी खिला उस शावक का पेट भर दिया।  उसे अपने साथ पाही पर टाट के बोरे में लपेट अपने पास‌ ही सुला दिया। वह तो गर्मी का एहसास होते ही सो गया।

उसके चेहरे का भोलापन तथा अपने पंजों से‌ मेरे पांवों को कुरेद कुरेद रोकना मेरे दिल में उतर चुका था। उस रात को मैं ठीक से पूरी तरह सो नहीं सका था। मैं जब भी उठ कर उसके चेहरे पर टार्च की रोशनी फेंकता तो उस अपनी तरफ ही टुकुर टुकुर तकते पाता। मानों वह मौन होकर मुझे मूक धन्यवाद दे रहा हो।

मैं सारी ‌रात जागता रहा था। भोर में ही सो पाया था। मैं काफी देर से सो कर उठा था।  लेकिन जब उठा तो उसे दांतों से मेरा ओढ़ना खींचते खेलते पाया था।

मैं जैसे ही उठ कर खड़ा हुआ तो वह फिर मेरे पांव से लिपटने खेलने-कूदने लगा था। इस तरह उसका खेलना मुझे बड़ा भला लगा था। जब मैं घर की ओर चला तो वह भी पीछे पीछे दौड़ता हुआ घर आ गया था। मात्र कुछ ही दिनों में वह घर के हर प्राणी का चहेता तथा दुलारा बनाया था ।बाल मंडली का तो वह खिलौना ही बन गया था। वह बड़ा ही आज्ञाकारी तेज दिमाग जीव था। वह लोगों के इशारे खूब समझता और मुझसे तो उसका बड़ा विशिष्ट प्रेम था। घर की बालमंडली ने उसे शेरू नाम दिया था।

—– क्रमशः भाग 2

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208, मोबा—6387407266

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे – श्रीचामुण्डेश्वरी चरणावली – 2 ☆ श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

नवदुर्गांच्या औषधी रुपांचे वर्णन आजच्या चारोळ्यांमध्ये आहे.

या चारोळ्या अष्टाक्षरी छंदात गुंफलेल्या असून ” रुणुझुणुत्या पाखरा ” या सिनेगीताच्या चालीवर म्हणायला खूप छान वाटतं.

– साधक उर्मिला इंगळे

☆ केल्याने होतं आहे रे ☆

???श्रीचामुण्डेश्वरी चरणावली -2???

मार्कण्डेय पुराणात

सांगितले आहे असे

दु:ख दैन्य ग्रहपीडा

देवी दूर करीतसे !!

 

नवरात्री पर्वकाल

उपोषण फलदायी

आदिशक्ती आदिमाया

आशीर्वाद नित्य देई !!

 

उपासना नवरात्री

आदिमाया देवीशक्ती

महालक्ष्मी महाकाली

बुद्धी दात्री सरस्वती !!

 

नवरात्री तिन्ही देवी

युक्त अशी नऊ रुपे

औषधांच्या स्वरुपात

जगदंबा सत्वरुपे !!

 

मार्कण्डेय चिकित्सेने

नऊ गुणांनी युक्त ती

ब्रह्मदेवही तिजला

दुर्गा कवच म्हणती !!

 

नऊ दुर्गांची रुपे ही

युक्त आहेत औषधी

उपयोग करुनिया

होती हरण त्याव्याधी !!

 

शैलपुत्री ती पहिली

रुप दुर्गेचे पहिले

हिमावती हिरडा ही

मुख्य औषधी वर्णिले !!

 

हरितिका म्हणजेच

भय दूर करणारी

हितकारक पथया

धष्टपुष्ट करणारी !!

 

अहो कायस्था शरीरीं

काया सुदृढ करिते

आणि अमृता औषधी

संजीवन आचरीते !!

 

हेमवती ती सुंदर

हिमालयावर असे

चित्त प्रसन्नकारक

जणू केतकीच दिसे !!

 

यशदायी ती श्रेयसी

शिवा ही कल्याणकारी

हीच औषधी हिरडा

शैलपुत्री सर्वा तारी !!

 

क्रमश:….

©️®️ साधक- उर्मिला इंगळे

सातारा

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ शोध मनातल्या मनाचा ☆ श्री राजेंद्र परांजपे

 ☆ कवितेचा उत्सव ? शोध मनातल्या मनाचा ? श्री राजेंद्र परांजपे ☆ 

 

अरे आहेस कुठे? कधीचा मी शोधतोय तुला!

माझ्यातल्या मला मी साद घालतो पुन्हा पुन्हा !

 

इतकी वर्ष झाली, कधीच निवांत भेटला नाहीस !

गप्पा मारू म्हंटल तर जरा जवळ बसत नाहीस !

 

तसं लांबूनच बघतो म्हणा, कधीकधी मी तुला !

वाटतोस जरा ओळखीचा पण खात्री नाही मला !

 

राहतोस तू माझ्याच मनात, कुठल्यातरी कोपऱ्यात !

पण कसं शोधू सांग, तुला मी इतक्या ह्या पसाऱ्यात?

 

तरीही हुडकून काढतोच कधीतरी तुला मी हिय्या करून !

आणि हिंडवतो तुला, माझ्याच कवितांच्या मखरांमधून !

 

पण मला माहित आहे तुझा अस्थिर, चंचल स्वभाव !

हळूच सटकतोस तिथून, आणि उंडारतोस गावोगाव !

 

बरेच दिवस तुला विचारीन म्हणतो, पण धीर होत नाही !

किती पेला संपला, किती आहे भरलेला, सांगशील काही ?

 

तुला तरी काय माहित म्हणा, तू तर माझ्यातच भरलेला !

कसा वेडा मी, विचारतोय माझ्याच मनातल्या मनाला !

 

© श्री राजेंद्र परांजपे

१३ मार्च २०२०

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ सुसाट वेग ☆ सौ.अंजली दिलिप गोखले

सौ.अंजली दिलिप गोखले

☆ जीवनरंग ☆ सुसाट वेग ☆ सौ.अंजली दिलिप गोखले ☆ 

एका दुपारी मी बागेतल्या झोपाळ्यावर बसून व.पुं. ची ” वहिदा” वाचत गुंग झाले होते. व. पु. वाचायचे म्हणजे रम्य तेवढेच गंभीर, खुसखुशीत अन् टचकन डोळ्यात पाणी आणणारे , खिळवून ठेवणारे. थोडक्यात काय भान हरपून जायचे. मी त्या दुनियेत पूर्णपणे हरवून गेले होते अन् तेवढ्यात कर्णकर्कश्य आवाज करत सुसाट मोटर सायकल वरून एक तरुण मुलगा आला. हा रस्ता बहुदा त्याला नवखा होता.कारण स्पीड ब्रेकर चा अंदाज न आल्याने तो आमच्या गेट समोर गाडी सकट सपशेल आडवा झाला. बापरे!पुस्तक बाजूला ठेवून मी पटकन गेटपाशी आले. खरंतर मी मी ती मोटर सायकल उचलू शकणार नव्हते की त्याला उठवू शकणार नव्हते. पण म्हणतात ना, ॲक्शन ला रियाक्शन! तशी माझी झटकन रिएक्शन झाली. तेवढ्यात समोर चे काका आले आणि त्यांनी त्या मुलाला उठायला मदत केली. उठल्या उठल्या झटकन त्याने गाडी उभी केली आणि त्या काकांचे आभारही न मानता सुसाट निघूनही गेला. काका माझ्याकडे पाहून हसले आणि आपल्या घरी निघून गेले. आमच्या दारासमोर काचांचा चुरा पडला होता. बहुदा त्याच्या गाडीचा दिवा आरसा जोरदार आपटल्याने आकार बदलून विखुरले होते.

शाळेतून आल्यावर मुलं आत येताना त्यांच्या बुटान बरोबर त्या काळाचा आत यायला नकोत म्हणून मी झाडू आणि केराची सुपली आणून गोळा केल्या. सहज माझे लक्ष त्या सु पली कडे गेले.  त्या आरशांच्या छोट्या छोट्या तुकड्यांमध्ये माझा चेहरा मला दिसायला लागला. मला ‘मुगले आझम’ ची आठवण झाली आणि त्या सुटली मध्ये मला ‘प्यार किया तो डरना क्या?’ हे गाणे दिसायला लागले. कदाचित वपुंची वहिदा वाचत असण्याचा तो परिणाम असावा.त्या काचा मी केराच्या बादलीत टाकून आले, पण ते गाणं काही डोक्यातून जाईना.’ प्यार किया तो डरना क्या’ माझं मलाच हसू आलं.मी आता प्यार का करणार होते? मन म्हणाले का नाही? प्रेम काय फक्त प्रियकर-प्रेयसी मध्येच असते? माझं माझ्या मुलांवर प्रेम आहे, बागेतल्या या झाडांवर प्रेम आहे, झाडाला इवलीशी कळी आली तरी अत्यानंद होतो मला.मग ती रोज थोडी थोडी मोठी होत उमलायला लागेपर्यंत माझी घालमेल सुरू असते.तिचे पूर्ण फूल उमलले की इतका आनंद होतो म्हणून सांगू. मग, आहेच माझ्या झाडांवर खूप खूप प्रेम.

क्षणात त्या सुसाट मुलाची मला आठवण झाली. त्याच्या आईचे हीत्याच्यावर खूप प्रेम असणारच ना. बाबांची मायाअसणारच ना? त्याला काही झाले असते तर? मीच कासावीस झाले. इतकी कशी बेछूट बेदरकार वागतात ही मुलं? काही विचारच करत नाहीत. एवढी महागडी गाडी घेऊन देणे सहजासहजी का जमले असणार त्याच्या पालकांना? पण मुलावरील प्रेमाखातरच  आपल्या सगळ्या इच्छा बाजूला ठेवून मुलाची आकांक्षा इच्छापूर्ण केली असेल त्यांनी. पण त्याला त्याची काही जाणीव नको का? आता माझे मन सुसाट धावायला लागले.

शांतपणे मी पुन्हा झोपाळ्यावर येऊन बसले. माझ्या मनात आलं, त्या मुलाला नाव ठेवायचा मला काय अधिकार आहे? माझ्या विचारांची मोटर सायकल अशीच बेफाम सुटली होती. काही कारण नसताना त्या मुलाचा मी राग राग करत होते. कदाचित काहीतरी तसेच महत्त्वाचे कारण असेल, कोणी दवाखान्यात असेल, कोणाला शाळेतून आणायचे असेल किंवा कोणाला तरी भेटायचे असेल त्याला. मी माझ्या विचारांच्या मोटर सायकलला करकचून ब्रेक लावला, एक दीर्घ श्वास घेतला आणि पुन्हा व. पुं.च्या ‘ वहिदा ‘मध्ये समरस झाले.

 

© सौ.अंजली दिलिप गोखले

मिरज

फोन नंबर ८४८२९३९०११

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ भुलाबाई….. ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे

☆ विविधा ☆ भूलाबाई….. ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे 

भूलाबाई हे पार्वतीचे भिल्ल म्हणजे आदिवासी स्त्री चे रुप.  आपण अनेक कथांमध्ये पार्वतीने शंकरासाठी केलेले तप ऐकले आहे पण इथे शंकराच्या रुपातले भूलोजी राणे पार्वतीचा अनुनय करताना दिसतात. त्यांची  पार्वती राणी रुसून बसते मग ते शंकर तिला स्वतः न्यायला जातात.  तिला झोपण्यासाठी सोन्याचा पलंग आणि मोत्याची मच्छरदाणी असते. तिच्या डोहाळ्यासाठी नाना रंगाच्या भरजरी चोळ्या शिवून त्यावर अत्तरे शिंपलेली असतात.  डोहाळे पुरवण्यासाठी सासू, सासरे, दिर जावा आणि नणंदा धावपळ करत असतात. एवढ्याने काय होणार म्हणून रुसलेल्या पार्वतीकडे शंकर महादेवाची रदबदली करण्यासाठी पहिल्या दिवसांपासून दस्तुर खुद्द खंडोबा, भैरोबा, सूर्य, चंद्र, बृहस्पती असे देव येतात सर्वात शेवटी गणेश आणि कार्तिकेय ही बाळे आल्यावर ती आपला रुसवा एकदाचा सोडते.

हे सगळं त्या भूलाबाईच्या गाण्यातून व्यक्त होते.  या काळात ती शंकरदेवांवर पण यथेच्छ तोंडसुख घेते.. त्याने घडवलेला दागिना कसा धड नाही,  त्याने आणलेले लुगडे कसे पोतेरे, फूले वेचून आणली तीही शिळी आणि बिनवासाची.. त्याला संसाराची कशी आच नाही… सतत डमरू वाजवणे किंवा गणांबरोबर नाचणे आणि तप करणे,  याशिवाय त्याला कसे काहीच येत नाही… अशा प्रकारची वैताग व्यक्त करणारीही काही गाणी आहेत.

शेवटी बिचारा शंकर विष्णू देवांकडून प्रपंचाची कौशल्ये शिकतो तेव्हा कुठे ही भूलाबाई त्याच्याबरोबर जायला तयार होते. भूलाबाई स्वयंप्रज्ञ आहे,  तिला काय हवे ते तिला स्पष्टपणे सांगता येते.  ती अन्याय सहन करत नाही. प्रसंगी वांड नव-याला धडा शिकविण्यासाठी माहेरी किंवा माहेरी भावजया बोलल्या तर सख्यांबरोबर किंवा थोडे दिवस एकटीने फिरून यायचीही तिची तयारी आहे.

मुलींना आत्मसन्मानाची कल्पना यावी आणि त्यांच्या आयुष्यात त्यांनी निर्भिडपणे वागावे यासाठीच कदाचित पहिली मुलगी असेल त्या घरी प्रामुख्याने भूलाबाई  बसवली जाते.  काही जणांकडे भूलाबाई घटस्थापना ते कोजागिरी पौर्णिमेपर्यन्त बसवतात. तर काही जणांकडे भाद्रपद ते शरद पौर्णिमा अशी महिनाभर भूलाबाई बसलेली असते. भूलाबाई म्हणजे खरे तर ‘शंकर पार्वतीची मूर्ती’ घराच्या दर्शनी भागातल्या कोनाड्यात बसवतात.  या काळात रोज तिला संध्याकाळी हळदी कुंकू आणि अक्षत लावून पूजा करतात.  त्यावेळी  बहुधा त्या दिवसात मिळणाऱ्या किंवा गुलबक्षी, चमेली किंवा जाईच्या फूलांचे बारीक मोरपंखीच्या पानांसकट बनवलेल्या माळा रोज पूजेच्या वेळी घालतात. या माळांमध्ये फूले,  पाने आणि बिया गुंफाव्याच लागतात. गोंड या आदिवासी जमातीत मात्र सगळ्या गावातल्या मुलींची एकच भूलाबाई बसवतात आणि रोज सगळ्याजणी  तिच्यासाठी रानफूलांच्या माळा घेऊन येतात.  त्यांची भूलाबाई म्हणजे मातीची पार्वतीची मूर्ती असते.

भुलाबाईच्या काळात मुली घरोघरी जाऊन टाळ्या वाजवून गाणी म्हणतात. खिरापतही चढती असते म्हणजे पहिल्या दिवशी एक,  दुसर्‍या दिवशी दोन अशा प्रकारच्या..आणि अर्थातच ओळखायच्याही असतात.

शेवटच्या म्हणजे बोळवणाच्या दिवशी मात्र तीस आणि तीन अशा खिरापती करायची पध्दत आहे.  एवढ्या खिरापती एकट्याने करण्याच्या ऐवजी सर्व मुली मिळूनही त्या भुलाबाईची सांगता करतात. जिच्या घरी भूलाबाई बसवतात तिला पांढरे किंवा निळे कपडे घेतात आणि मोत्याचा एखादा दागिनाही करतात.  खिरापतीमध्येही पांढ-या पदार्थांचे  प्राबल्य अधिक असते.

भूलाबाई देवी असली तरी तिला मानवी स्त्री च्या भावभावना आहेत. तिला नव-याचा राग येतो,  माहेरच्या अगदी शेणगोठ्यावरही तिचे प्रेम असते, तिच्या सख्या,  तिची मुले,  भाऊ बहिणी,  आई वडील…सासर माहेर हेच तिचे विश्व… पण त्यातही तिला तिचे स्वतःचे स्थान असले पाहिजे ही जाणीव आहे.. त्यामुळेच भूलाबाई  आपल्याला जवळची वाटते आणि खरं सांगायचं तर ईश्वराचे हे स्त्री- रूप फारच विलोभनीय आहे…

©  डॉ. मंजुषा देशपांडे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ सार्थक ☆ सुश्री आसावरी केळकर-वाईकर

सुश्री आसावरी केळकर-वाईकर

☆ विविधा ☆ सार्थक ☆ सुश्री आसावरी केळकर-वाईकर 

‘अगं आई, बास कर आता… काय बारीकबारीक पाकळ्या वेचतीहेस… चांगली फुलं पण निघालीत भरपूर.. दे आता पिशवी.. बाकी कचरा टाकून देते’ असं माझं जरा वैतागलं वाक्य! मागं एकदा आई माझ्याकडं आली असताना फुलांच्या छोट्या पिशवीतून देवपूजेसाठी फुलं काढत होती. बरीच फुलं पारच बावली आहेत असं लक्षात आल्यावर म्हटलं, ‘संध्याकाळी नवी फुलं आणूया. आज आता चांगली सगळी घेऊन टाक पुजेला आणि खराब झालेली टाकून देते. फार कुजली तर वास येत राहातो फ्रिजमधेही!’ ‘हो, तसंच करते’ म्हणत ती फुलं निवडू लागली. मी माझ्या उद्योगातून मधेच स्वयंपाकघरातून बाहेर आले तरी ही अजून अगदी शेवंतीच्या फुलांच्या गळलेल्या अतीबारीक पाकळ्यांतूनही चांगल्या पाकळ्या निवडतच होती. मुळात चार-सहा देव आणि चार-सहा फोटो इतकंच काय ते देवघर! बाजूला निघालेल्या चांगल्या फुलांचा बऱ्यापैकी ढीगच देवांच्या मानानं खूप होता आणि आई उगीच जीव का शिणवतेय ह्या विचारानं मी वैतागून तिला ‘बास कर’ म्हटलं. त्यावर ती मानही वरती न करता शांतपणे पाकळ्या निवडत स्निग्धपणे म्हणाली, ‘त्यांचा पण जन्म वाया जाऊ नये गं! अगदी बावलेलं काही वाहाता येणार नाही देवाला, पण ज्या पाकळ्या अजून जरा टवटवीत आहेत त्या तरी वाहाते.’ ‘जाऊदे, आपल्याला कुठं काय तोशीस आहे, करुदे काहीतरी’ असं मनाशी म्हणत मी परत स्वयंपाकघराकडं वळले… मात्र नंतर कधीतरी असे आपल्याही नकळत रुजलेले क्षण तरारून उगवून येतात अचानक!

तसंही काही गोष्टी ह्या आपल्याकडं अपरिहार्य असतातच… अगदी रट्टे देऊन गळी उतरवलेल्या! पान इतकं स्वच्छ असलं पाहिजे कि माणूस त्यात जेवलं आहे कि नाही कळू नये, भांडी घासायला टाकताना ती स्वच्छ निपटलीच पाहिजेच… अन्नाशी मस्ती करायची नाही म्हणजे पर्यायाने अन्नाच्या एकेका कणाचा जन्म सार्थकी लागला पाहिजे. साडी जुनी झाली कि पूर्वी त्याची गोधडी व्हायची, फाटलेल्या कपड्यांच्या पिशव्या व्हायच्या… धाग्याचा जन्म पूर्णपणे सार्थकी लागायचा.  वहीतल्या उरलेल्या कोऱ्या कागदांची दाभण-दोऱ्यानं विणून वरती छान कोरा कागद चिकटवून त्यावर नक्षी रेखून दिमाखदार होममेड वही व्हायची. त्यातही कोरे कागद प्रत्येकी चार भागांत कापून गृहपाठ उतरवून घ्यायला केलेली पिटुकली वही तर काळजाच्या फारफार जवळची असायची. आज पाच ते पंचवीस ते शंभर रुपयांपर्यंत किमान दर्जापासून बऱ्या, मध्यम ते उत्तम दर्जापर्यंत वह्या सहजी बाजारात मिळतात… पण मला त्या भावत नाहीत. कागदाचा पर्यायानं वृक्षराजाच्या काळजाचा एकेक कण सार्थकी लावताना त्याचे जे नकळत आशीष लाभायचे ते ह्या वह्यांमध्ये कुठून यायचे आणि त्याशिवाय आपलं काळीज त्याच्याशी कसं जोडलं जायचं!?

गतिमानतेची अपरिहार्यता, त्यातून बंद झालेली मनाची कवाडं, अती बरकतीसोबत येणारा अहंकार, कोडगेपणा आणि कोरडेपणा, काळजाची गुंतवणूक हरवलेली स्पंदनं.. ह्या सगळ्यातून जुन्या सोन्यांतलं झळाळलेपण मागं पडत गेलं, आपणं अंतर कोरडंठक्क झालंय, स्वत: किती दर्जेदार जगतोय असा विचारही मनात येत नाही तर हळवे धागे गुंफत दुसऱ्याचा जन्म सार्थकी लावण्याचा विचार फारच दूर! त्यातून भाळी येणारं नैराश्य, वैफल्य, एकाकीपणही आपण सोसत होतो्च… मात्र वेगानं फिरणाऱ्या जगण्याच्या ‘मेरी गो राऊंड’ला थोपवायचं कसं हाही प्रश्न होताच. काही ओढवून घेतलेली आणि काही काळानुरूप स्वीकारावी लागलेली अपरिहार्यता कळसावर पोहोचून खदाखदा हसून आपला अंत पाहात होती आणि एका क्षणी अनपेक्षितपणे हे ‘मेरी गो राऊंड’ थांबलं… थोड्याश्या भयशंकांमधेही जगणं किंचित स्वस्थावलं आणि काही अवधीनं जेव्हां चक्र उलट दिशेनं फिरू लागलं तेव्हां अंतरी नकळत रुजलेल्या जाणिवांना पालवी फुटू लागली. स्वस्थावलेपण विरत जात कुठंतरी क्षणांचा जन्म सार्थकी लागतोय असं मनात आलं आणि आईच्या वाक्याची आठवण झाली.

ज्या मृगजळामागे वेड्यासारखे धावत होतो ते अख्खं मृगजळ अचानक लुप्त झालं, धावणं थांबलं तरी जगणं थांबलं नाही, उलट ते मोहरू लागलं… जन्म सार्थकी लागल्या क्षणांचे भरभरून आशीर्वाद मिळूनच कदाचित तृप्तावलं, शांतावलं, सुखावलं. पुरवूनपुरवून वापरताना अन्नाच्या एकेका कणाला जपलं जाऊ लागलंय, घरट्याच्या कानाकोपऱ्याला गोंजारलं जाऊ लागलंय, बेदरकारपणे टाकाऊ म्हणून फेकल्या जाणाऱ्या गोष्टींतलं सौंदर्य टिपायला नजर सरावतेय आणि त्यातून सृजनाचे रंग उधळले जाताहेत, माळ्यावरच्या अडगळीतली अनमोल हिरे-माणकं खाली येत त्यांना पैलू पाडून कोंदणात सजवण्याचा नाद लागला आहे, देवघरातली बेगडी माळ दूर सारली जात सांजवात उजळू लागलीये, शुभंकरोतीच्या सुरांनी तिन्हीसांज सजू लागलीये. दूरस्थ नात्यांशी संवाद घडू लागलेत… सर्वांना सुखी ठेव म्हणताना त्यांच्यासाठी आठवणीनं हात जोडले जाऊ लागलेत. सोय असूनसुद्धा आता व्हिडिओ कॉल नको वाटू लागलाय, लवकरात लवकर एकदा ग्रहण सुटून जिवाशिवाच्या भेटीचीच जीव वाट पाहू लागलाय. बहुधा काळजचं रितेपण, संवेदनांचं शुष्कपण जाऊन घराचं घरपण, जगण्यातलं जिवंतपण परत येऊ लागलंय!

खरंतर हे सगळंसगळं अस्तित्वात होतंच.. मात्र त्याचं अस्तित्व जाणवून घ्यायला ना आपल्याकडे वेळ होता, ना मनाच्या बंद कवाडांना त्याची चाहूलही लागत होती. सुरेश भटसाहेबांच्या, उरले उरांत काही आभास चांदण्याचे आकाश तारकांचे उचलून रात्र गेली…. ह्या ओळींप्रमाणं आज आपण जेव्हां रिते झालो आहोत…. त्यावेळी मनाच्या कप्प्यात खोलवर रुजलेल्या ह्या गोष्टी आपल्यासाठी चांदण्यांचे आभास होऊन सामोऱ्या आल्यात. आज त्यातल्या तारकांची आभा आपल्याला जाणवायला लागली आहे. आता हे जपायला हवं असं कुठंतरी आत जाणवू लागलं तशी मी प्रहार ह्या अप्रतिम हिंदी सिनेमातल्या मंगेश कुलकर्णींच्या अप्रतिमच शब्दांशी पोहोचले…

हमारी ही मुठ्ठी में आकाश सारा, जब भी खुलेगी चमकेगा तारा

कभी ना ढले जो, वो ही सितारा, दिशा जिससे पहचाने संसार सारा

वाटलं, हाती येऊ लागलेलं आकाश आता मुठीत घट्ट पकडून ठेवायला हवं. त्यातल्या आपल्याच जिवाला लुभावणाऱ्या चांदण्या, तारका, नक्षत्रही हातून निसटता कामा नये. नैराश्याचा झाकोळ दूर करणारी ही रत्नमाला जपायला हवी. त्यातून संवेदना जिवंत होताहोता जगण्याला भान येईल… जे आजूबाजूलाही संवेदनशील डोळसपणे पाहायला शिकवेल… ज्यातून ज्ञानोबारायांच्या,

हे विश्वची माझे घर । ऐसी मती जयाची स्थिर ।

किंबहुना चराचर । आपणची जाहला ॥…. ह्या शब्दरत्नांच्या तेजार्थाचीही कदाचित अनुभूती मिळेल.

 

©  सुश्री आसावरी केळकर-वाईकर

चेन्नई

मो 09003290324

ईमेल –  asawarisw@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares