मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – वेदना दिगंत ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी  एक भावप्रवण रचना “वेदना दिगंत )

☆ विजय साहित्य – वेदना दिगंत ☆

 

पिकवतो मोती |माझा बळीराजा ||

ढळे घाम ताजा | वावरात |

 

राब राबूनीया | खंतावला राजा ||

वाजलाय बाजा | संसाराचा.  |

 

पोर दूरदेशी  |  शिकावया गेली||

सावकारे केली | लुटालूट   |

 

ऋण काढूनीया  |  करतोया सण ||

पावसात मन | गुंतलेले   |

 

काळी माय त्याला  | देते दोन घास  ||

जगण्याची  आस  | दुणावली  |

 

माझा  बळीराजा  | जोजवितो  आसू     ||

खेळवितो हासू | लटकेच   |

 

कविराजा मनी |  सतावते खंत  ||

वेदना दिगंत   | बळीराजा   |

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (20) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(भगवत्प्राप्ति का उपाय और गुणातीत पुरुष के लक्षण)

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।

जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ।।20।।

देह जनित तीनों गुणो से उपर उठ प्राण

जन्म-मृत्यु दुखजस सेपा सकता निर्वाण।।20।।

 

भावार्थ :  यह पुरुष शरीर की (बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय- इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है) उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।।20।।

 

The embodied one, having crossed beyond these three Gunas out of which the body is evolved, is freed from birth, death, decay and pain, and attains to immortality.।।20।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 37 ☆ लघुकथा – सदा सुहागिन ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी स्त्री के मर्म पर विमर्श करती लघुकथा  सदा सुहागिन। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी  को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 37 ☆

☆  लघुकथा – सदा सुहागिन

लंबी छरहरी  काया,  रंग गोरा, तीखे नाक- नक्श, दाँत कुछ आगे निकले  हुए थे लेकिन उनकी मुस्कान के पीछे छिप जाते थे. वह सीधे पल्लेवाली साडी पहनती थीं, जिसके पल्लू से उनका सिर हमेशा ढका ही रहता. माथे पर लाल रंग की मध्यम आकार की बिंदी और मांग सिंदूर से  भरी  हुई.  पैरों में चाँदी की पतली – सी पायल, कभी- कभार  नाखूनों में लाल रंग की नेलपॉलिश भी लगी होती,   इन सबको  सँवारती थी उनकी मुस्कुराहट . मिलने पर वे अपनी चिर परिचित   मुस्कान के साथ कहती – कइसन बा बिटिया?  एक नजर पडने पर पंडिताईन भारतीय संस्कृति के अनुसार  सुहागिन  ही कहलायेंगी.

हर दिन की तरह वह सुबह भी थी, सब कुछ वैसा ही था लेकिन पंडिताईन के लिए मानों दुनिया ही पलट गई. पूरा घर छान मारा, खेतों पर भी दौडकर देख आई, आसपास पता किया पर पंडित का कहीं पता ना चला.वह समझ  ना पाई कि धरती निगल  गई कि आसमान खा गया. बार -बार खटिया पर हाथ फेरकर बोलती – यहीं तो सोय रहे हमरे पंडित, कहाँ चले गए. महीनों पागल की तरह उन्हें ढूंढती रही,  कभी गंगा किनारे, कभी मंदिरों में.बाबा,फकीर कोई नहीं छोडा. एक बार तो किसी ढोंगी बाबा के  कहने पर  पंडित का एक  कपडा  लेकर उसके पास  पहुँच गई. बाबा पंडित के बारे में तो क्या बताता पंडिताईन से पैसे लेकर  चंपत हो गया. उसके बाद से पंडिताईन ने  पंडित को ढूंढना छोड दिया. उन्होंने  मान लिया कि वह  सुहागिन हैं और अपने रख – रखाव से गांववालों को जता भी दिया.

पंडिताईन ने  अपने मन को समझा लिया, जरूरी भी था वरना छोटे – छोटे   बच्चों को  पालती कैसे ? खेत खलिहान कैसे संभालती. लेकिन गांववालों को चैन कहाँ. सबकी नजरें पंडिताईन के सिंदूर और बिछिया पर अटक जाती. एक दिन ऐसे ही किसी की बात कानों में पड गई – ‘ पति का पता नहीं और पंडिताईन जवानी में सिंगार करे मुस्काती घूमत हैं गाँव भर मां ‘. पंडिताईन  की आँखों में आँसू आ गए बोलीं- बिटिया! ई बतावा इनका का करे का है ? हमार मरजी हम सिंगार करी या ना करी ? हम सिंदूर लगाई, पाजेब पहनी कि  ना  पहनी ? जौन सात फेरे लिया रहा ऊ मालूम नहीं कहाँ  चला गवा हमका छोडकर,  तो ई अडोसी – पडोसी कौन हैं हमें बताए वाले.  मांग में लगे सिंदूर की ओर इशारा करके बोलीं –‘ जब  तलक हम जिंदा हैं तब तलक ई मांग में रही, हमरे साथ हमार सुहाग जाई.’

पंडिताईन सुहागिन हैं या नहीं, वह विधवा की तरह रहे या नहीं  ?  पंडिताईन ने किसी को यह तय करने का अधिकार दिया ही नहीं.

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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English Literature – Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 44 – Eklavya, a Nishadh? ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem  Eklavya, a Nishadh?. )

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 44

☆ Eklavya, a Nishadh? ☆

 

In the dark corners of the forest

Eklavya, a young man was raised,

Archery was his heart’s call

And since Drona was, for the skill praised-

 

To Drona, approached Eklavya to his blessings seek

“Please teach me!” was his earnest request.

“Teach yourself if you have in me faith,”

Said Drona, slightly in jest.

 

Eklavya’s passion was true

Drona’s words, seriously he took

Installing Drona’s effigy

Eklavya practices, while Drona looked!

 

Pandavas with Drona, on an expedition

And their hound barked and barked

Seeing the situation thus, Eklavya

Took his bow and arrows hit the mark.

 

The hound’s mouth was gagged

With his jaws opened wide

He could bark no more thus

Arjuna, his surprise, could not hide.

 

“Isn’t someone a better archer than me?”

Arjuna, from his teacher enquired.

Drona decided to investigate the matter

“Who was it who had so correctly fired?”

 

Seeing his own effigy, shocked he was

Eklavya, with a bow, prostrated

“Who is your teacher?” Drona asked

“You, sire!” Eklavya stated.

 

The shrewd Drona, for a fee asked

The naïve Eklavya, agreed without hesitation

“Give me the thumb of your right hand,”

Said Drona with a cunning self-possession!

 

Eklavya, true to his word, obliged

Sliced his thumb, placed it on his feet

Some call Drona’s decision prudent

Some call it dharma’s defeat!

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

Pune, Maharashtra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ तत्त्वमसि ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ तत्त्वमसि

अनुभूति वयस्क तो हुई

पर कथन से लजाती रही,

आत्मसात तो किया

किंतु बाँचे जाने से

कागज़  मुकरता रहा,

मुझसे छूटते गये

पन्ने  कोरे के कोरे,

पढ़ने वालों की

आँख का जादू

मेरे नाम से

जाने क्या-क्या

पढ़ता रहा…!

 

©  संजय भारद्वाज

प्रात: 9:19बजे, 25.7.2018

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 62 ☆ किसना / किसान ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक विचारणीय एवं भावप्रवण कविता  “किसना / किसान । श्री विवेक जी  ने इस कविता के माध्यम से सामान्य किसानों  की पीड़ा पर विमर्श ही नहीं किया अपितु  पीड़ितों को उचित मार्गदर्शन भी दिया है। इस अतिसुन्दर एवं सार्थक कविता  के लिए श्री विवेक जी  का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 62 ☆

☆ किसना / किसान ☆

किसना जो नामकरण संस्कार के अनुसार

मूल रूप से कृष्णा रहा होगा

किसान है,

पारंपरिक,पुश्तैनी किसान !

लाख रूपये एकड़ वाली धरती का मालिक

इस तरह किसना लखपति है !

मिट्टी सने हाथ,

फटी बंडी और पट्टे वाली चड्डी पहने हुये,

वह मुझे खेत पर मिला,

हरित क्रांति का सिपाही !

 

किसना ने मुझे बताया कि,

उसके पिता को,

इसी तरह खेत में काम करते हुये,

डंस लिया था एक साँप ने,

और वे बच नहीं पाये थे,

तब न सड़क थी और न ही मोटर साइकिल,

गाँव में !

 

इसी खेत में, पिता का दाह संस्कार किया था

मजबूर किसना ने, कम उम्र में,अपने काँपते हाथों से !

इसलिये खेत की मिट्टी से,

भावनात्मक रिश्ता है किसना का !

वह बाजू के खेत वाले गजोधर भैया की तरह,

अपनी ढ़ेर सी जमीन बेचकर,

शहर में छोटा सा फ्लैट खरीद कर,

कथित सुखमय जिंदगी नहीं जी सकता,

बिना इस मिट्टी की गंध के !

 

नियति को स्वीकार,वह

हल, बख्खर, से

चिलचिलाती धूप,कड़कड़ाती ठंडऔर भरी बरसात में

जिंदगी का हल निकालने में निरत है !

किसना के पूर्वजों को राजा के सैनिक लूटते थे,

छीन लेते थे फसल !

मालगुजार फैलाते थे आतंक,

हर गाँव आज तक बंटा है, माल और रैयत में !

 

समय के प्रवाह के साथ

शासन के नाम पर,

लगान वसूली जाने लगी थी किसान से

किसना के पिता के समय !

 

अब लोकतंत्र है,

किसना के वोट से चुन लिया गया है

नेता, बन गई है सरकार

नियम, उप नियम, उप नियमों की कँडिकायें

रच दी गई हैं !

 

अब  स्कूल है,

और बिजली भी,सड़क आ गई है गाँव में !

सड़क पर सरकारी जीप आती है

जीपों पर अफसर,अपने कारिंदों के साथ

बैंक वाले साहब को किसना की प्रगति के लिये

अपने लोन का टारगेट पूरा करना होता है!

 

फारेस्ट वाले साहेब,

किसना को उसके ही खेत में,उसके ही लगाये पेड़

काटने पर,नियमों,उपनियमों,कण्डिकाओं में घेर लेते हैं !

 

किसना को ये अफसर,

अजगर से कम नहीं लगते, जो लील लेना चाहते हैं, उसे

वैसे ही जैसे

डस लिया था साँप ने किसना के पिता को खेत में !

 

बिजली वालों का उड़नदस्ता भी आता है,

जीपों पर लाम बंद,

किसना अँगूठा लगाने को तैयार है, पंचनामें पर !

उड़नदस्ता खुश है कि एक और बिजली चोरी मिली !

 

किसना का बेटा आक्रोशित है,

वह कुछ पढ़ने लगा है

वह समझता है पंचनामें का मतलब है

दुगना बिल या जेल !

 

वह किंकर्तव्यविमूढ़ है, थोड़ा सा गुड़ बनाकर

उसे बेचकर ही तो जमा करना चाहता था वह

अस्थाई,बिजली कनेक्शन के रुपये !

पंप, गन्ना क्रशर, स्थाई, अस्थाई कनेक्शन के अलग अलग रेट,

स्थाई कनेक्शन वालों का ढ़ेर सा बिल माफ, यह कैसा इंसाफ !

किसना और उसका बेटा उलझा हुआ है !

उड़नदस्ता उसके आक्रोश के तेवर झेल रहा है,

संवेदना बौनी हो गई है

नियमों,उपनियमों,कण्डिकाओं में बँधा उड़नदस्ता

बना रहा है पंचनामें, बिल, परिवाद !

किसना किसान के बेटे

तुम हिम्मत मत हारना

तुम्हारे मुद्दों पर, राजनैतिक रोटियाँ सेंकी जायेंगी

पर तुम छोड़कर मत भागना खेत !

मत करना आत्महत्या,

आत्महत्या हल नहीं होता समस्या का !

तुम्हें सुशिक्षित होना ही होगा,

बनना पड़ेगा एक साथ ही

डाक्टर, इंजीनियर और वकील

अगर तुम्हें बचना है साँप से

और बचाना है भावना का रिश्ता अपने खेत से !

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 26 ☆ प्रचार का विचार ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “प्रचार का विचार।  वास्तव में श्रीमती छाया सक्सेना जी की प्रत्येक रचना कोई न कोई सीख अवश्य देती है। यदि प्रचारक में विपणन क्षमता है तो वह कुछ भी बेच सकता है ।  इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 26 ☆

☆ प्रचार का विचार

कहते हैं विचार में बहुत ताकत होती है। एक क्रांतिकारी विचार समाज में उथल-पुथल मचा सकता है। ऐसे ही एक नए- नए बने ; विचारक ने समाज सेवा का प्रस्ताव रख ही दिया। अब तो बिना प्रोडक्ट के ही चर्चा ने तूल पकड़ लिया। बहुत सारी सभाएँ हुयीं। प्रचार में खूब पैसा खर्च किया गया। पर कोई इन्वेस्टर आया ही नहीं। लोग फूल- माला लेकर बैठे रह गए। अब सबके चेहरों पर उदासी साफ देखी जा सकती थी।

तभी टीम के मैनेजर ने कहा देखो,फिर से जोर आजमाइश करो, प्रचार  का प्रसार होना ही चाहिए। सब लोग फिर ; पूरी ताकत से जुट गए। कर्म का रंग तो निखरना ही था। सो धीरे – धीरे लोग आने लगे कि चलो कम से कम यहाँ बैठ कर चाय नाश्ता ही करेंगे। जो आता उसका खूब स्वागत सत्कार होता। उसे सैम्पल के रूप में स्लोगन लिखा हुआ पोस्टर मिलता। पोस्टर के अंत में लिखा था कि जो जितने पोस्टर दीवार पर चिपकायेगा उसे उतना ही कमीशन मिलेगा, अब तो जो पढ़ता वो और लेने के चक्कर में जी हजूरी करता।

देखते ही देखते सारे पोस्टर बँट गए। अगली सुबह पूरे शहर की दीवारें भरी हुई थीं। लोगों को भी समझ में आया कि बंदे में दम है। देखो हम लोगों ने अपनी तरफ से खूब रोड़े अटकाए पर सब बेकार गए।

अब तो सबकी जुबान पर उसी के चर्चे थे। जब- जब किसी की चर्चा जोर पर होती है;  तब – तब पर्चा बिगड़ता ही, शायद नज़र लग जाती है। ये नज़र भी नज़र नहीं आती किंतु प्रभावशील अवश्य होती है। इसका तोड़ तो बस नज़र बट्टू काला टीका ही होता है। सो अगले दिन कुछ विघ्नसंतोषियों ने ये कार्य कर ही डाला। अब पुनः एक बार उदासी छा गयी।

पर मैनेजर तो गुणवान था सो उसने फिर से तोड़ निकाला अब कि बार प्रोडक्ट की झलक ही दिखा दी, सो हारी हुई बाजी फिर से जीत की ओर चल पड़ी। कहते हैं सफल व्यक्ति जितनी बार  गिरता है, उतनी बार पुनः नयी ऊर्जा से लबरेज होकर उठ जाता है। और नए उत्साह व साहस के साथ पुनः जुट जाता है अपने विचार के प्रचार में, सो ऐसा ही खेल चलता रहता है, लोग अपनी – अपनी डफली पर अपना – अपना राग अलापते रह जाते हैं जबकि कर्मशील इतिहास रच देते हैं।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 35 ☆ शस्य श्यामला माटी ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण कविता  “शस्य श्यामला माटी.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 35 ☆

☆ शस्य श्यामला माटी ☆ 

 

अपनी संस्कृति को पहचानो

इसका मान करो।

शस्य श्यामला माटी पर

मित्रो अभिमान करो।।

 

गौरव से इतिहास भरा है भूल न जाना।

सबसे ही बेहतर है होता सरल बनाना।

करो समीक्षा जीवन की अनमोल रतन है,

जीवन का तो लक्ष्य नहीं भौतिक सुख पाना।

 

ग्राम-ग्राम का जनजीवन, हर्षित खलिहान करो।

शस्य श्यामला माटी पर मित्रो अभिमान करो।।

 

 

उठो आर्य सब आँखें खोलो वक़्त कह रहा।

झूठ मूठ का किला तुम्हारा स्वयं ढह रहा।

अनगिन आतताइयों ने ही जड़ें उखाड़ीं,

भेदभाव और ऊँच-नीच को राष्ट्र सह रहा।

 

उदयाचल की सविता देखो, उज्ज्वल गान करो।

शस्य श्यामला माटी पर मित्रो अभिमान करो।।

 

तकनीकी विज्ञान ,ज्ञान का मान बढ़ाओ।

सादा जीवन उच्च विचारों को अपनाओ।

दिनचर्या को बदलो तन-मन शुद्ध रहेगा,

पंचतत्व की करो हिफाजत उन्हें बचाओ।

 

भारत, भारत रहे इसे मत हिंदुस्तान करो।

शस्य श्यामला माटी पर मित्रो अभिमान करो।।

 

भोग-विलासों में मत अपना जीवन खोना।

आपाधापी वाले मत यूँ काँटे बोना।

करना प्यार प्रकृति से भी हँसना- मुस्काना,

याद सदा ईश्वर की रखना सुख से  सोना।

 

समझो खुद को तुम महान  श्वाशों में प्राण भरो।

शस्य श्यामला माटी पर मित्रो अभिमान करो।।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 56 – तकनीक☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “तकनीक। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 56 ☆

☆ लघुकथा – तकनीक ☆

बिना मांगे ही उस ने गुरु मन्त्र दिया, “आप को किस ने कहा था, भारी-भारी दरवाजे लगाओं. तय मापदंड के हिसाब से सीमेंट-रेत मिला कर अच्छे माल में शौचालय बनावाओं.  यदि मेरे अनुसार काम करते तो आप का भी फायदा होता ?” परेशान शिक्षक को और परेशान करते हुए पंचायत सचिव ने कहा, “बिना दक्षिणा दिए तो आप का शौचालय पास नहीं होगा. चाहे आप को १०,००० का घाटा हुआ हो.”

“ नहीं दूं तो ?”

“शौचालय पास नहीं होगा और आप का घाटा ३५,००० हजार हो जाएगा. इसलिए यह आप को सोचना है कि आप १५,००० का घाटा खाना चाहते है या ३५,००० हजार का?”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

२४/०६/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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मराठी साहित्य – कविता ☆ सुजित साहित्य – सांगावा ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक भावप्रवण कविता  “सांगावा ”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆  सुजित साहित्य  –  सांगावा ☆ 

 

मोठा  अभंग

 

किती खोलवर             जीवनाचा  वार

संकटांचा भार              काळजात .. . . !

 

शब्दांनीच सुरू              शब्दांनी शेवट

चालू वटवट                  दिनरात.. . . . !

 

चार शब्द कधी              देतात आधार

वास्तवाचा वार              होऊनीया.. . . !

 

प्रेमामधे होई                 संवाद हा सुरू

अनुभव गुरू                 जीवनाचा.

 

नात्यांमधे शब्द              पावसाळी मेघ

नशिबाने रेघ                  मारलेली. . . . . !

 

एखादी कविता               मावेना शब्दात

सांगावा काव्यात             सांगवेना . . . !

 

© सुजित शिवाजी कदम

दिनांक  5/3/2019

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

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