मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मंगळसुत्र ☆ सौ. श्रेया सुनील दिवेकर

☆ विविधा ☆ मनमंजुषेतून ☆ मंगळसुत्र ☆ सौ. श्रेया सुनील दिवेकर ☆

लग्नात सप्तपदी चालून सातजन्म एकमेकांची साथ देण्याचे वचन घेतात दोघेजण, तेव्हा खोलवर मनात रुजते ती आपुलकीची, प्रेमाची, आणि त्याच बरोबर जबाबदारीची जाणीव. एकमेकांची सुख, दुःख,आता दोघांची होऊन जातातआणि नकळत माझे, तुझे हे आपले होऊन जाते. कोणते ही संकट आले, तर त्याला दोघांनी मिळून सामोरे जाऊन त्या संकटाशी दोन हात करायचे आहेत ह्याची जाणीव होते.

काळ्या मण्यांचा सुरेख दागिना जेव्हा आपला जोडीदार आपल्या गळ्यात बांधतो तेव्हा पावित्र्याची, कर्तव्याची, प्रेमाची जाणीव होते. सगळ्या दागिन्यात हा उठून दिसत असतो. मुहूर्तावर बांधलेला तो मुहूर्त मणी सगळ्या अलंकाराना मागे टाकतो आणि सौभाग्याचे लेणे म्हणून दिमाखात सजतो.

त्याचे पावित्र्य घेऊन जेव्हा नववधू घरचा उंबरठा ओलांडते तेव्हा ती घरची लक्ष्मी म्हणून गृह प्रवेश करते. तांदुळाने भरलेले मापटे जेव्हा ती ओलांडून आत येते तेव्हा माझे हे घर आनंदाने समृद्धीने सुखशांतीने भरून जाऊदे हीच मनोकामना करत असते.

ती ह्या नवीन घरात रूळायचा मनोमन प्रयत्न करत असते. फक्त हे करत असताना तिला साथ हवी असते ती आपल्या जोडीदाराची. त्याने समजून घेण्याची. ज्याच्या विश्वासावर ती आपली सारी माणसे, आपले माहेर मागे सोडून आलेली असते. नवीन घरात नवीन माणसांचे स्वभाव आवडीनिवडी समजून घेण्यासाठी तिला साथ हवी असते आता आपल्या मित्राची. म्हणजेच आपल्या नवर्‍याची.माझ्या मते जर आपला जोडीदार उत्तम मित्र बनू शकला तरच उत्तम जोडीदार बनू शकतो. नाही तर तिथे पुरुषी अहंकार डोकावतो.

एका गाडीची आता आपण दोन चाक आहोत आणि आपल्याला आता बरोबरीनं जायचे आहे हे जर त्याला उमगले तर खरच सुखी संसार होण्यासाठी कोणतीच अडचण येणार नाही. पण हे त्याला खरच उमगत असते का? का फक्त मणी गळ्यात बांधले म्हणजे आता ती आपल्या मालकीची झाली, आता तिने त्याच्या होला हो म्हणून फक्त चालत रहायचे त्याच्या बरोबर त्याची साथ नसतानाही?

त्या काळ्या मण्यांनां खरा अर्थ तेव्हा मिळतो जेव्हा नवरा आपल्या बायकोला आपल्या बरोबरीचा दर्जा देतो, मान देतो.मान देणे म्हणजे तिच्या प्रतेक म्हणण्याला होला हो करणे नव्हे, पण तिच्याही मनाचा, मतांचा आदर करणे, तिलाही भावनां आहेत ह्याची जाणीव ठेवणे .खांद्याला खांदा लावून जेव्हा दोघ संसाराचा गाडा ओढतात तेव्हा होतो खरा सुखी संसार.

आता नेहमी मला प्रश्न असा पडतो की ह्याची जाणीव खरच नवऱ्याला असते का?का असूनही तो डोळेझाक करतो सोईस्कर रित्या? कित्येक घरं अजूनही अशी आहेत जिथे अजुनी पुरुष प्रधान संस्कृती आहे. मी म्हणीन तेच आणि तसेच, जिथे बायकोच्या भावनांना शुन्य किंमत असते. की एकदा काळे मणी बांधले गळ्यात की तिच्यावर हक्क गाजवायला मोकळा होतो तो ?आपण जे सांगू ते तिने करायचे,तिच्या आवडीनिवडी बाजूला ठेवून?

जो हे गळ्यात बांधतो त्याला हीआपली सहचारिणी, अर्धांगिनी आहे ह्याची जाणीव असते का? आता तीची सुख दुःख ही आपली आहेत ह्याची कल्पना असते का?तिच्या भावनांची कदर खरच केली जाते का?

मंगळसूत्र नुसते काळे मणी नसून शक्ति असते तिची. दागिना नसून सौभाग्य असते तिचे. तिचा अभिमान असतो. ज्याच्या जिवावर ती आपले घर, आई, वडील सगळे सोडून आलेली असते ते फक्त त्याच्या विश्वासाच्या आधारावर. हा विश्वास टिकून द्यायचा की नाही हे सर्वस्वी जोडीदाराच्या हातात असते. तस झाल नाही तर तो नुसताच एक दागिना म्हणून गळ्यात राहतो.

एक सामान्य दागिना. फक्त काढता येत नाही म्हणून गळ्यात अडकवलेला.

सहज मनाच्या कोपऱ्यातून? 

 

©  सौ. श्रेया सुनील दिवेकर

(19.8.2020)

मो 9423566278

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (20) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

(कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन)

(तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)

 

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।

अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥

वही ज्ञान है सात्विक, सच्चा और पवित्र

विभिन्न भूलों को देखते अमर और अविभक्त ।।20।।

भावार्थ :  जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान॥20॥

 

That by which one sees the one indestructible Reality in all beings, not separate in all the separate beings-know thou that knowledge to be Sattwic (pure).

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 12☆ ‘सांसों के संतूर’ – आचार्य भगवत दुबे – मेरी प्रिय कृति ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

( आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  के सहकर्मी प्रतिष्ठित साहित्यकार  आचार्य भगवत दुबे जी द्वारा  लिखित सांसों के संतूर पर उनके विचार ।  हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  के  काव्य  विमर्श को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे।  ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 12 ☆

☆ ‘सांसों के संतूर’ – आचार्य भगवत दुबे – मेरी प्रिय कृति ☆

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आचार्य भगवत दुबे

मेरे प्रिय सहकर्मी आचार्य भगवत दुबे जी एक प्रतिष्ठित साहित्यकार हैं । स्वभाव से सरल स्नेहिल व मृदुभाषी व्यक्ति हैं ।

उनकी 30 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं । वे सभी सुरुचिपूर्ण और आनंद प्रद हैं । दुबे जी समाजसेवी भी हैं अनेकों साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं और निर्धारित तिथियों में कई समारोह भी आयोजित करते रहते हैं ।

Sanso ke Santoor by Acharya Bhagwat Dubey by [Dubey, Acharya Bhagwat]उनका लेखन विभिन्न विषयों पर तथा विभिन्न साहित्यिक विधाओं में हैं। मैंने उनकी कुछ पुस्तकें पढ़ी हैं । सांसों के संतूर दोहा छंद में लिखित उनकी एक सारगर्भित कृति है, जिसमें कवि की दूर दृष्टि तथा सामाजिक दोषों को दूर करने की पावन भावना परिलक्षित होती है । दोहा एक ऐसा छंद है जिसमें थोड़े शब्दों में मन की गहन अभिव्यक्ति व्यक्त करने की क्षमता है ।

पुराने अनेकों कवियों ने इसी में भक्ति और आध्यात्मिक भावनाओं को प्रकट किया है । कवि भगवत दुबे जी ने अपनी इस पुस्तक में सरल सार्थक शब्दों में समाज के विभिन्न क्षेत्रों की बुराइयों को सुधारने की दृष्टि से अपने पवित्र मनोभावना दर्शाई है । यह पुस्तक मुझे बहुत अच्छी लगी । साहित्यिक रचना कैसी हो, उनके मनोभाव सुनें

काव्य वही जिसमें रहे सरस रूप रस गन्ध

अगर नहीं तो व्यर्थ है नीरस काव्य प्रबंध

उन्होंने इसी शर्त का अपनी समस्त रचनाओं में निर्वाह किया है । मेरे कथन की पुष्टि में उनके कुछ भावपूर्ण दोहों का मधुर आनंद लीजिए

जीते जी ना कर सकी जो मां गोरस पान

करते उसकी मृत्यु पर पंचरत्न गोदान

 

माता तेरी गोद में सुख है स्वर्ग समान

फिर से बनना चाहता मैं बच्चा नादान

 

आज की सामाजिक दशा पर वे लिखते हैं

ज्ञान बुद्धि से हो गया बड़ा बाहुबल आज

गुंडों से भयभीत है सारा सभ्य समाज

 

रुग्ण हुई सद्भावना बदल गए आदर्श

बहुत घिनौना हो गया सत्ता का संघर्ष

 

ग्रामीण और शहरी व्यवहार में अंतर पर वे लिखते हैं

भिक्षुक अब भी गांव में पाते आटा दाल
शहरों में तो डांट कर देते उन्हें हकाल

पूरी पुस्तक में ऐसे ही हृदय को छूने वाले दोहे हैं ।

अपनी भावना को भी मैं एक दोहे में प्रकट कर अपने प्रिय कवि का अभिनंदन करता हूँ

भगवत जी की लेखनी तीक्ष्ण कुशल गुणवान

पाठक मन की चाह का रखती पूरा ध्यान

उन से और भी ऐसी रचनाओं की प्राप्ति की कामना सहित

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ क्यों जीयें भय से हम जीवन? ☆ श्री अमरेंद्र नारायण

श्री अमरेंद्र नारायण

(आज प्रस्तुत है सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं  देश की एकता अखण्डता के लिए समर्पित व्यक्तित्व श्री अमरेंद्र नारायण जी की एक भावप्रवण कविता क्यों जीयें भय से हम जीवन?)

☆ क्यों जीयें भय से हम जीवन?  

 

क्यों जीयें भय से हम जीवन ?

शंकित क्यों रहता अपना मन?

 

जीवन का मिला वरदान हमें,

आशीष प्रभु का है सम्बल

बाधायें भी टल जायेंगी

डरते जीयें हम क्यों हर पल?

 

डरना है नहीं,हमें लड़ना है

हर विपदा से,उसके भय से

शक्ति इतनी प्रभु ने दी है

हम जीतेंगे दृढ़ निश्चय से

 

यह हर पल का डरना कैसा?

जीवन का मधु खोने जैसा

निष्क्रियता,जड़ता,कायरता

के वश में है होने जैसा!

 

भयभीत न हों, शंका छोड़ें

आशीष प्रभु का हम मांगें

होगा सुखमय अपना जीवन

जड़ता,आलस,चिंता त्यागें!

 

©  श्री अमरेन्द्र नारायण 

शुभा आशर्वाद, १०५५ रिज़ रोड, साउथ सिविल लाइन्स,जबलपुर ४८२००१ मध्य प्रदेश

दूरभाष ९४२५८०७२००,ई मेल amarnar @gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 66 ☆ शक्तिपर्व नवरात्रि ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच –  शक्तिपर्व नवरात्रि ☆

शक्तिपर्व नवरात्रि आज से आरंभ हो रहा है। शास्त्रोक्त एवं परंपरागत पद्धति के साथ-साथ इन नौ संकल्पों के साथ देवी की उपासना करें। निश्चय ही दैवीय आनंद की प्राप्ति होगी।

  1. अपने बेटे में बचपन से ही स्त्री का सम्मान करने का संस्कार डालना देवी की उपासना है।
  2. घर में उपस्थित माँ, बहन, पत्नी, बेटी के प्रति आदरभाव देवी की उपासना है।
  3. दहेज की मांग रखनेवाले घर और वर तथा घरेलू हिंसा के अपराधी का सामाजिक बहिष्कार देवी की उपासना है।
  4. स्त्री-पुरुष, सृष्टि के लिए अनिवार्य पूरक तत्व हैं। पूरक न्यून या अधिक, छोटा या बड़ा नहीं अपितु समान होता है। पूरकता के सनातन तत्व को अंगीकार करना देवी की उपासना है।
  5. स्त्री को केवल देह मानने की मानसिकता वाले मनोरुग्णों की समुचित चिकित्सा करना / कराना भी देवी की उपासना है।
  6. हर बेटी किसीकी बहू और हर बहू किसीकी बेटी है। इस अद्वैत का दर्शन देवी की उपासना है।
  7. किसीके देहांत से कोई जीवित व्यक्ति शुभ या अशुभ नहीं होता। मंगल कामों में विधवा स्त्री को शामिल नहीं करना सबसे बड़ा अमंगल है। इस अमंगल को मंगल करना देवी की उपासना है।
  8. गृहिणी 24×7 अर्थात पूर्णकालिक सेवाकार्य है। इस अखंड सेवा का सम्मान करना तथा घर के कामकाज में स्त्री का बराबरी से या अपेक्षाकृत अधिक हाथ बँटाना, देवी की उपासना है।
  9. स्त्री प्रकृति के विभिन्न रंगों का समुच्चय है। इन रंगों की विविध छटाओं के विकास में स्त्री के सहयोगी की भूमिका का निर्वहन, देवी की उपासना है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।

? शारदीय नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएँ ?

 

© संजय भारद्वाज

(लेखन-10.10.2018)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अंको का खेल ☆ सुश्री हरप्रीत कौर

सुश्री हरप्रीत कौर

(ई- अभिव्यक्ति में उज्जैन से प्रसिद्ध कवियित्री एवं शिक्षिका सुश्री हरप्रीत कौर जी का हार्दिक स्वागत है। आप मुख्यतया सामायिक समस्याओं और अध्यात्मिक विषयों पर लिखना पसंद करती हैं। पुस्तकें पढ़ना और संगीत सुनना आपकी प्रिय अभिरुचि है। फिल्हाल कानपुर से लेखनी में सक्रिय हैं ।आज प्रस्तुत है अभिभावकों एवं छात्रों पर आधारित एक विचारणीय कविता ” अंकों का खेल”।)   

☆ कविता ☆ अंको का खेल ☆

 

क्यों हो रहा समाज संवेदनहीन,

रिश्तों में बढ़ रही दूरियाँ,

बचपन हो गया भावनाओं से विहीन.

इस अंधी दौड़ में बच्चों संग

भाग रहे अभिभावक

जिंदगी बन कर रह गयी

“अंको का खेल”

कोई पास कोई फेल.

हर पालनहार का बस स्वपन यही

मेरे बच्चे के नब्बे प्रतिशत अंक आने चाहिए,

उसे जिंदगी में पैसा बहुत कमाना चाहिए.

ना बन पाए वो आइंस्टीन या कलाम तो क्या

मदर टेरेसा और स्वामी विवेकानंद में

अब हमारी दिलचस्पी कहाँ,

मेरे बच्चे के नब्बे प्रतिशत अंक आने चाहिए

उसे जिंदगी में पैसा बहुत कमाना चाहिए

फिर क्यों हम शिकायत करते हैं

बच्चे अब मर्यादाओं का पालन

नहीं करते है.

किताबों में खो गया बचपन

जूझता रहा अंको के खेल से

संवेदनाओं  से हो के दूर

हम सभी है मजबूर

कहलाते हम उस सभ्य समाज का हिस्सा

जहाँ हो रहे हम अपनों से दूर

आहिस्ता आहिस्ता.

 

©  सुश्री हरप्रीत कौर

ई मेल preetisukh78@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ☆ सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆ अनेकता में एकता ☆ सुश्री स्वाति धर्माधिकारी

सुश्री स्वाति धर्माधिकारी

हम ई-अभिव्यक्ति पर एक अभियान की तरह प्रतिदिन “संदर्भ: एकता शक्ति” के अंतर्गत एक रचना पाठकों से साझा कर रहे हैं। हमारा आग्रह  है कि इस विषय पर अपनी सकारात्मक एवं सार्थक रचनाएँ प्रेषित करें। हमने सहयोगी  “साहित्यम समूह” में “एकता शक्ति आयोजन” में प्राप्त चुनिंदा रचनाओं से इस अभियान को प्रारम्भ कर दिया  हैं।  आज प्रस्तुत है सुश्री स्वाति धर्माधिकारी जी की एक प्रस्तुति  “अनेकता में एकता”

☆  सन्दर्भ: एकता शक्ति ☆ अनेकता में एकता ☆

इस देश के शांन की,

है यही विशेषता;

हम हैं इस देश के,

शक्ति हमारी एकता।।

 

राह में चुनौतियां आईं हैं,

जब भी कभी;

राष्ट्र था सर्वोपरी,

सर्वोपरी थी एकता;

राष्ट्र और ऊंचा उठे,

ऊंची उठे गणतंत्रता;

न गुलामी हम सहेंगे,

और न परतंत्रता।।

 

गर नज़र उठा के,

देखा किसी ने अब कभी;

दुनिया से मिट जायेगा,

नाम उसका हर कहीं;

“सत्यमेव जयते”,

इस राष्ट्र का आधार है;

ध्वज तिरंगा है हमारा,

प्रतीक हमारी एकता।।

 

देश की खातिर निछावर,

प्राण जिनने कर दिये;

याद में उनकी सदा,

हमने जलाए हैं दिये;

कर रहे प्रणाम हम,

उन वीरों को मन प्राण से;

संदेश वो जो दे गये,

हरदम रहे ये एकता।।

 

© सुश्री स्वाति धर्माधिकारी

प्राचार्या, सरस्वती शिशु मंदिर, घमापुर, जबलपुर।

मो. नंबर 9755538215

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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English Literature ☆ Stories ☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 11 ☆ Mr. Ashish Kumar

Mr Ashish Kumar

(It is difficult to comment about young author Mr Ashish Kumar and his mythological/spiritual writing.  He has well researched Hindu Philosophy, Science and quest of success beyond the material realms. I am really mesmerized.  I am sure you will be also amazed.  We are pleased to begin a series on excerpts from his well acclaimed book  “Samudramanthanam” .  According to Mr Ashish  “Samudramanthanam is less explained and explored till date. I have tried to give broad way of this one of the most important chapter of Hindu mythology. I have read many scriptures and take references from many temples and folk stories, to present the all possible aspects of portrait of Samudramanthanam.”  Now our distinguished readers will be able to read this series on every Saturday.)    

Amazon Link – Samudramanthanam 

 ☆ Weekly Column – Samudramanthanam – 11 – Shankha ☆ 

This churning was going on and on from many hundreds of years with many repeat cycles of human year ages. Now again in another cycle of time according to human year a day of the eighth day (Ashtami) of the Krishna Paksha (dark fortnight) in Shraavana or Bhadrapad (depending on whether the calendar chooses the new moon or full moon day as the last day of the month) come. It is the day on which in Dwapra yuga Lord Krishna was born. Yes, it is day of Krishna Janmasthmi.

Lord Brahma said to Narada muni, “Narada it is not right both of my children Sura and Asura are doing argue and fight on small things. It seems to me like they will end life of each other before completing of ‘Kshirasāgara’ churning and before amrita, liquid of immortality appears from this ocean. Is any way so that the distribution of gems which will emerge from this churning is fair enough without any fight?”

Narada said, “Narayana Narayana Narayana, my father almost all the gods, demigods, sage etc. are participating in this churning directly or indirectly except two, one is teacher of Suras Devguru ‘Brihaspati’ and other is teacher of Asura ‘Sukra’. Sura can’t deny command of ‘Brihaspati’ and Asura of ‘Sukra’”

Brahma said, “Narada muni, what a great idea you have suggested. Thank you. We will our self-go to Brihaspati and Sukra to bring them here”

After many requests of Lord Brahma, ‘Brihaspati’ and ‘Sukra’ finally ready to take charge of mentors of Churning of ocean from Sura and Asura side respectively.

Auspicious day of on the eighth day (Ashtami) of the Krishna Paksha (dark fortnight) in Shraavana, churning was on its peak around dusk time a sound like rocks collide with each other comes from the base of ‘Kshirasāgara’.

Both Sura and Asura jump from excitement. Some of them exclaimed something big and powerful is about to emerge from ocean.

Suddenly a big ‘Shankha’ conch start seeing over mouth Mandara peak.

 

© Ashish Kumar

New Delhi

≈  Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ लावणी ☆ सौ.अस्मिता इनामदार.

सौ. अस्मिता इनामदार

 ☆ कवितेचा उत्सव ☆ लावणी ☆ सौ.अस्मिता इनामदार ☆ 

 

जरतारीच्या साडीचा हा पदर हाती धरा

जिवलगा मला संगतीनं घेऊन फिरा ||

 

नवी नव्हाळी अंगी ल्याली

काया माझी मुसमुसलेली

जीव कसाहा आसुसला हो

नाही मनाला थारा..

जिवलगा मला संगतीनं घेऊन फिरा….

 

पिरतीची ही रीतच न्यारी

विरहाची ती सुरी दुधारी

जीव ओढतो तुम्हासाठी हो

लवकर या ना घरा…

जिवलगा मला संगतीनं घेऊन फिरा…

 

तुम्हासाठी मी सजले धजले

वाट पाहूनी डोळे थकले

किती दिसांनी तुम्ही आला हो

जाऊ नका माघारा…

जिवलगा मला संगतीनं घेऊन फिरा….

 

© सौ अस्मिता इनामदार

पत्ता – युनिटी हाईटस, फ्लॅट नं १०२, हळदभवन जवळ,  वखारभाग, सांगली – ४१६ ४१६

मोबा. – 9764773842

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ दिवनाली ☆ स्व. इंदिरा संत (इंदिरा दीक्षित) ☆ कवितेचे रसग्रहण सौ.अमृता देशपांडे

स्व. इंदिरा संत (इंदिरा दीक्षित)

इंदिरा संत

 ☆  कवितेचा उत्सव ☆ दिवनाली ☆ स्व. इंदिरा संत ☆ 

(या कवितेचे काव्यानंद मध्ये रसग्रहण सौ.अमृता देशपांडे)

सदोदित अवतीभवती तुझे असणे दरवळावे

म्हणून तुझ्याकडे एकच फूल मागितले

तर – माझ्या अंगणातील हिरवेगार वृक्ष

तिन्ही त्रिकाळी सतत बहरत राहिले ll

 

कानात अखंड गुंजत रहावा म्हणून मी

तुझा फक्त एक शब्द हवा म्हटले

तर – तू समुद्राच्या गाजत्या लाटांचे

फेनिल तुषारवेल माझ्या कानांवर गुंफलेस ll

 

तुझ्या स्पर्शाच्या अबीर- प्रसादासाठी मी

तुझ्यापुढे मनोभावे मान उंचावून धरली

आणि तुझ्या मध्यमेची कोमल लाली

माझ्या कपाळावर ज्योतीशी

उमटली ll

 

या तुझ्या सा-या अपरूपात मी

संध्या रंगासारखी उजळून गेले,

तेवती दिवनाली झाले ll

 

स्व. (इंदिरा दीक्षित) इंदिरा संत

(चित्र साभार मराठी विश्वकोश https://vishwakosh.marathi.gov.in)

(या कवितेचे रसग्रहण काव्यानंद मध्ये दिले आहे.)

सौ अमृता देशपांडे

पर्वरी- गोवा

9822176170

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित ≈

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