राजेशजी मन ही मन बुदबुदा रहे थे–कयामत की धूप है पर जाना तो पड़ेगा। श्रद्धांजलि अर्पित करनी होगी। मन, हां कहे या ना कहे, समाज के कायदे कानून निभाने ही पड़ते हैं। उन्होंने अल्मारी खोली और एक सफेद पुराना सा कुर्ता पाजामा निकाला। अवसर के अनुकूल परिधान पहनने ही पड़ते हैं। पड़ोसी चन्द्रप्रकाश को फोन किया साथ चलने के लिये। रमन इन दोनों का अच्छा मित्र है। लेखक होने के साथ समाज सेवक भी है।
वे रास्ते में बात करते हुये जा रहे थे। यार राजेश — रमन के पिता की उम्र 90 वर्ष थी ना। पकी उम्र में गये।
–मुझे एक बात समझ में नहीं आती लोग सबसे पहले मरनेवाले की उम्र क्यों पूछते हैं। नब्बे से ऊपर सुनते ही ऐसी मुद्रा बनाते हैं मानों मृतक बेचारा धरती पर रहकर गुनाह कर रहा था। अच्छा हुआ चला गया। ज्यादा जीकर भी क्या करता।
—-राजेश ऐसे सवालों के गणित में उत्तर नहीं दिये जा सकते। मरनेवाला कोई बेहद अपना हो तब भी क्या उनका यही जवाब होगा।
बातों बातों में उन्होंने चार किलोमीटर की दूरी कब तै कर ली पता भी नहीं चला। देखा तो श्मशान घाट सामने था।
रमन के पिता का शव रखा था फूल-मालाओं से सजा हुआ।
कुछ रिश्तेदार और आठ दस पत्रकार /समाज सेवक/ राजनीतिक कार्यकर्ता /लेखक प्रजाति के लोग।
शोक सभा में विलंब था। सब आपस में बतियाने लगे। किसी ने अपने सद्यः प्रकाशित नाटक संग्रह की खासियत बताई। दूसरा कुछ लोगों के कड़क इस्त्रीदार कपड़ों पर टिप्पणी कर रहा था। तीसरा जाति धर्म को लेकर अंत्यविधियों का अंतर बता रहा था। सारे कसमसा रहे थे कि कब कब श्रद्धांजलि सभा खत्म हो और पिंड छूटे।
इतने में नुक्कड़ वाले नेताजी भी आ गये जिनकी प्रतीक्षा हो रही थी।
फोटोग्राफर और माइक का इंतजाम हो चुका था। सभी को फिक्र थी कि कल के अखबार में वे प्रमुखता से नज़र आयें। वर्ना इतनी मशक्कत करके जानलेवा धूप में इतनी दूर आने का क्या फायदा।
वैसे भी दो मिनट खामोश रहकर शोक व्यक्त करना किसी हर्क्युलियन टास्क से कम नहीं लगता।
नेताजी ने बोलना शुरू किया। इतने में एक शव यात्रा श्मशान में प्रकट हुई। बैंड-बाजे के साथ। बैंड-बाजे शोख धुनें बजा रहे थे जैसे किसी शादी में बजाते हैं।
राजेश जी सकपका गये। वे समझ नहीं पाये आखिर माजरा क्या है !
चन्द्रप्रकाश का कहना था – यह मृतक की अंतिम इच्छा रही होगी। या फिर ओशो का अनुगामी रहा होगा।
उधर नेताजी परेशान निगलते बने न उगलते। बैंड बाजे की उग्र तेजतर धुनों के बीच लोगों तक उनकी आवाज नहीं पहुँच पा रही थी। एक तो शोकाकुल चेहरा बनाओ दूसरे सबसे महत्वपूर्ण उनके श्रीवचन अनसुने रह जाने की टीस।
खैर। राजेशजी, रमन से मिले और श्मशान के बाहर निकलते ही चन्द्रप्रकाश से बोले–एक बात का जवाब दोगे ?
–बोलो
— रमन ने पिताजी की मृत्यु की सूचना दी तो fb. पर 400 लोगों ने श्रद्धा सुमन अर्पित किये और श्मशान में केवल आठ ?
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका ज्ञानवर्धक आलेख– छंद शाला।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २७७ ☆
☆ आलेख – छंद शाला☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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छंद वाचिक होते हैं। वेदों की रचना कह-सुन-याद रखकर ही हुई। इसलिए वैदिक ज्ञान/ ऋचाएँ सदियों तक श्रुति-स्मृति पर आधारित रहीं।
कंठ से निकलनेवाली ध्वनि को उच्चार कहते हैं।
उच्चार दो तरह के होते हैं।
कम समय में बोले जानेवाले उच्चार को लघु तथा उससे दो गुने समय में बोले जानेवाले उच्चार को दीर्घ/गुरु कहते हैं। छंद रचना के लिए लघु उच्चार को इकाई या १ तथा गुरु उच्चार को २ गिना जाता है।
अपवाद स्वरूप कुछ ध्वनियाँ जैसे ॐ का उच्चार काल ३ होता है।
वैदिक ज्ञान बढ़ जाने पर उसे मौखिक रूप से याद रखना संभव न रहा। तब हर ध्वनि के लिए एक संकेत बनाया गया, इसे अक्षर (जिसका क्षरण न हो) कहा गया।
एकाधिक अक्षर मिलाकर विशिष्ट अर्थ अभिव्यक्त करनेवाले शब्द बने। अक्षर और शब्द आरंभ में वाचिक थे। शब्दों के सम्मिलन से वाक्य बने। अक्षरों व शब्दों के लयबद्ध वाचन से छंद और छंदों के प्रयोग से पद्य/काव्य (पहेली,छंद, गीत आदि) रचना हुई। वाक्यों के संयोजन से गद्य (कहावतों, मुहावरों,वार्ता, कथा, कहानी आदि) का सृजन हुआ। लोक गीत व लोक कथाओं का विकास इसी तरह हुआ। इस काल तक तुरंत रचना करनेवाले आशु कवि/आशु कथाकार ही भाषा और साहित्य का विकास कर रहे थे। लोक गायकों ने लोकगीत तथा लोक कथाकारों ने लोककथा विधाओं का विकास किया।
वनवासी/आदिवासी समूहों की भाषाएँ और साहित्य इसी काल में विकसित हुआ। लोक साहित्य के विकास में महिलाओं तथा पुरुषों की भागीदारी आरंभ से ही बराबर रही। इस दौर में घर, पनघट, खलिहान, चौपाल आदि तथा जन्म-मरण, दैनिक जीवन, ऋतु परिवर्तन। पर्व-त्योहार, मिलना-बिछुड़ना, सुख-दुख, आदि ऐसे स्थल व कारण थे जहाँ स्वानुभूति सृजन का रूप धारण कर लेती थी।
कालांतर में मानव ने खेती करना सीखा और खेतों के निकट झोपड़ी बनाकर रहने पर ग्राम्य सभ्यता का विकास हुआ। खेतों में फसलों की रक्षा करने के लिए बनाए गए मचानों पर खड़े कृषक बहुधा सवेरे अथवा शाम को प्रकृति दर्शन करते हुए या अपने एकांत को मिटाने के लिए कुछ ध्वनियों का लयबद्ध उच्चारण कर जोर से गाते थे, कहीं दूर कोई दूसरा कृषक उस पंक्ति को सुनकर बार-बार दोहरा कर उसी लय में अपने शब्द रखकर दूसरी पंक्ति गा देता था, फिर कोई तीसरा और चौथा व्यक्ति अपनी पंक्ति जोड़ देता था। ऐसी पंक्तियों में उच्चार क्रम, उच्चार काल तथा पंक्ति के अंत में समान ध्वनियाँ हुआ करती थीं। ऐसी दो पंक्ति की रचना को दोपदी, तीन पंक्ति की रचना को त्रिपदी”, चार पंक्ति की रचना को *चौपदी इत्यादि नाम दिए गए। इस समय तक रचनाकार समझदार किंतु निरक्षर (अक्षर लिखने की कला से अपरिचित) थे, अशिक्षित नहीं। यह परंपरा कबीर, रैदास, घाघ, भड्डरी, मीराबाई आदि तक देखी जा सकती है। भाषा और साहित्य के विकास में योगदान करनेवाले अनेक रचनाकार सीखने-सिखाने में सक्षम अर्थात सुशिक्षित किंतु निरक्षर थे।
मानव द्वारा रेत पर अँगुलियों से बिंदु, रेखा, वृत्त आदि अंकित करने पर लिपि का विकास आरंभ हुआ। रेत पर बनाई आकृति मिटने का समाधान पेड़ों की पत्तियों के रह को टहनियों के माध्यम से पत्थरों पर अंकित करने की विधि से किया गया जिसका परिणाम शैल चित्रों/शिलालेखों के रूप में आज भी उपलब्ध है। अक्षरों तथा अक्षरों के अर्थ युक्त सम्मिलन से बने शब्दों को पत्थरों पर अंकित करना लिपि के विकास का महत्वपूर्ण चरण है। कालांतर में शब्दों को लंबे समय तक न सड़नेवाले पत्तों पर भी लिखा गया। हमें प्राचीन ग्रंथ ताड़ पत्रों तथा भोज पत्रों पर लिखे हुए मिलते हैं।
स्मरण रहे कि लिपि के विकास के बहुत पहले वाचिक (बोल-चाल की) भाषा तथा छंद लोक में प्रचलित हो चुके थे।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “जलकुकड़ी/जल मुर्गी …“।)
अभी अभी # ९७६ ⇒ आलेख – जलकुकड़ी/जल मुर्गी श्री प्रदीप शर्मा
हमारा बचपन गोकुल की कुंज गलियों में नहीं, शहर के गली मोहल्लों में गुजरा !
पनघट ना होते हुए भी गुलैल से निशाना साधकर मटकी की जगह, फलदार वृक्षों से आम, इमली तोड़ना हमारे बाएं हाथ का खेल था। लड़ने झगड़ने और छेड़छाड़ के लिए हमें कभी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।
लड़ने की यही विशेषता बड़े होकर चुनाव लड़ने में हमारे बहुत काम आई।
आज पक्की दोस्ती, तो कल बोलचाल बन्द। तू चुगलखोर तो तू जलकुक्कड़। कट्टी तो कट्टी, साबुन की बट्टी। ला मेरे पैसे, जा अपने घर। लेकिन आज अगर वही कोई बचपन का दोस्त मिल जाए, तो ये लगता है, कि जहां, मिल गया।।
हम आज भी आपस में एक दूसरे को देखकर कभी खुश होते हैं, तो कभी जल भुन जाते हैं। महिलाओं की किटी पार्टियों की खबरें उड़ती उड़ती आखिर हम तक भी पहुंच ही जाती है। मत पूछो, मिसेज डॉली के बारे में, वह तो बड़ी जल कुकड़ी है। बहुत दिनों बाद जब यह शब्द सुना, तो शब्दकोश याद आया। अरे, यह तो एक पक्षी है, White brested Hen, यानी जल मुर्गी।
अगर मछली जल की रानी है, तो हमारी मुर्गी भी तो महारानी है। अगर मुर्गे को (cock) कॉक कहते हैं तो मुर्गी को Hen कहते हैं। अंग्रेजी के अक्षर ज्ञान में हमने पढ़ा है। The Cock is crowing.
मुर्गा ही बांग देता है, मुर्गी तो बस, पक पक, किया करती है। बड़ी विचित्र है यह अंग्रेजी भाषा। अगर cock के आगे pea लग जाए तो वह peacock, यानी मोर हो जाता है। Crow से याद आया, कौए को भी crow ही कहते हैं, लेकिन वह बांग नहीं देता, सिर्फ कांव कांव किया करता है।।
कुछ लोग गाय पालते हैं तो कुछ कुत्ता ही पाल लेते हैं। गोशाला और अश्व शाला तो ठीक, कुत्ते के लिए तो उसके मालिक का घर ही उसकी पाठशाला है। पालन पोषण पुण्य का काम है। लेकिन पापी पेट के लिए इंसान को मत्स्य पालन और कुक्कुट पालन भी करना पड़ता है। गाय को चारा और मछलियों को चारे में जमीन आसमान का ना सही, जल और थल का अंतर तो है ही। इस पर हम ज्यादा नहीं लिखेंगे क्योंकि जीव: जीवस्य भोजनं और वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति।
बड़ा अजीब है, यह जल शब्द भी। इसी जल से ही तो जीवन है। गर्मी में जहां यह शीतल जल अमृत है, वहीं जब सीने में जलन होती है तो आंखों में तूफान सा आ जाता है। जलते हैं जिसके लिए, तेरी आंखों के दिये।।
यही जल कहीं आग है, तो कहीं पानी है। जो आग दिल में जली हुई है, वही तो मंजिल की रोशनी है। लेकिन जब यही आग, यही जलन ईर्ष्या, द्वेष और नफरत की होती है तो जिंदगी में तूफान आ जाता है। किसी की खुशी से, उन्नति से, सफलता से जलना, अच्छी बात नहीं है। जल कुकड़ी बनें तो जल मुर्गी की तरह। और अगर आप जलकुक्कड़ हैं, तो भले ही आप पर घड़ों ठंडा पानी डाल दिया जाए, आप एक जल मुर्गी नहीं बन सकते।
अगर जलाएं तो अपना दिल नहीं, दिल का दीया जलाएं, जिससे आपका घर भी रोशन हो, और रोशन हो ये जहान, जिसमें हम रहते हैं यहां।।
– महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जयंती पर अंतर्राष्ट्रीय विमर्श संपन्न – ☆ साभार – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ –
भारत-ऑस्ट्रेलिया साहित्य सेतु थिएटर ऑन डिमांड के तत्वावधान में १५ अप्रैल २०२६ को हिंदी साहित्य के शलाका पुरुष साहित्य रत्न, महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जयंती के मांगलिक अवसर पर चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय साहित्य विमर्श एवं कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया।
इस सारस्वत अनुष्ठान का संयोजन हरिऔध जी की प्रपौत्री तनया अपर्णा वत्स ने किया। इस अनुष्ठान का श्री गणेश सरस्वती वंदना पश्चात् हरिऔध जी की ९४ वर्षीया प्रपौत्री आशा वत्स जी द्वारा आशीर्वचन व अतिथि स्वागत से हुआ। इस अंतर्राष्ट्रीय काव्य सम्मेलन में ४० कवियों ने हिस्सा लिया।
भारत के मध्य प्रदेश की संस्कारधानी ऐतिहासिक नगरी जबलपुर से जुड़े मुख्य अतिथि आचार्य इंजी. संजीव वर्मा “सलिल” जी । ५०० से अधिक ने छंदों का आविष्कार कर हिंदी पिंगल को समृद्ध करने वाले सलिल जी ने “हरिऔध” के उपनाम को उनके नाम का पर्याय बताते हुए कहा कि अयोध्या के सिंह तथा औध अर्थात अवध के हरि श्री राम एक ही हैं। साहित्य की सम सामयिक उपादेयता व प्रासंगिकता के निकष पर हरिऔध साहित्य को खरा बताते हुए आचार्य सलिल जी ने रचनाधर्मियों से आग्रह किया कि वे भाषिक शुद्धता पर लोकोपयोगी कथ्य को वरीयता देते हुए वह लिखें जो भावी पीढ़ी के लिए उपयोगी हो। विद्वान वक्ता ने हिंदी को विश्ववाणी बनाने के लिए हर विषय-विधा और विज्ञान की तकनीकी जानकारियों युक्त पुस्तकों और हिंदी में शिक्षण को हरिऔध जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि बताते हुए मध्य प्रदेश की तरह अन्यत्र भी इंजीनियरिंग-मेडिकल व अन्य विज्ञान विषय हिंदी में पढ़ाए जाने पर बल दिया।
आयोजन के अध्यक्ष श्रेष्ठ-ज्येष्ठ हिंदी साहित्यकार भगवान सिंह जी ने हिंदी को वर्तमान रूप में लाने के लिए हरिऔध जी के प्रयासों को सराहते हुए आम जन में प्रचलित भाषा का प्रयोग करने, लोकोक्तियों व मुहावरों का प्रयोग करने, भाषा में नए शब्द-प्रयोग करने को भाषिक विकास हेतु आवश्यक बताया।
उपाध्यक्ष की आसंदी से संबोधित करते हुए साहित्य भूषण डॉ. रामसनेही लाल शर्मा “यायावर” ने हरिऔध जी को मुक्तक (चौपदे) विधा का उन्नायक बताया।
मुख्य वक्ता विवेक अग्रवाल जी ने हरिऔध कालीन हिंदी की अब तक की विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए सटीक शब्द चयन को हरिऔध जी की विशेषता बताया।
विशिष्ट अतिथि रामकिशोर उपाध्याय ने हरिऔध जी की कविताओं को मुर्दे में प्राण फूँकनेवाला बताया।
विशिष्ट अतिथि हिमांशु राय एच. रावल ने अनुष्ठान को पूर्वज पूजन निरूपित करते हुए अन्य साहित्यकारों पर भी ऐसे आयोजन किए जाने का आह्वान किया तथा कहा-
“माँ के चश्मे से जब जहाँ देखा।
कोई न हिंदू न मुसलमां देखा।”
सारस्वत अतिथि डॉ. संगीता भारद्वाज “मैत्री” भोपाल ने वत्स परिवार द्वारा अपने पूर्वजों की अनमोल साहित्यिक विरासत को संँभालने व आगे बढ़ाने की सराहना की। उन्होंने अनेकता में एकता पर दोहे प्रस्तुत किए-
“नव किरणें नवचेतना, खुशियाँ आईं आज।
नया साल स्वागत करे,सफल सभी हों काज।।”
डॉ. नीलिमा रंजन भोपाल ने खुद की रचना पढ़ने का लोभ संवर्त करते हुए हरिऔध जी की “हिंदी भाषा” शीर्षक लंबी रचना के चयनित अंश का पाठ कर शब्द सुमन अर्पित किए।
कार्यक्रम का सुचारु संचालन अपर्णा वत्स जी ने तथा वक्ता परिचय सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक पवन सेठी जी मुंबई ने दिया। अपर्णा वत्स ने धरती तथा भारत का वंदन किया-
“मेरी पावन धरा को प्रणाम।
धरती के कण-कण को प्रणाम।।
नमन देश के सपूतों को प्रणाम।
भारत के गौरव को प्रणाम।।”
चिंतक-विचारक पवन सेठी जी गर्भित रहा।
आदरणीय पवन सेठी जी ने कहा कि “प्रिय प्रवास” में हरिऔध जी ने राधा और श्रीकृष्ण की अनूठी रूपछटा दिखाई है। उन्होंने “ज्योति कलश” रचना का पाठ किया।विनय विक्रम जी ने “मन भ्रमर की मंजरी तुम/तार सप्तक गा रहा हूँ” प्रस्तुत कर सराहना पाई।
सुभाष जी, मेलबॉर्न ने कहा कि आज एक योद्धा का जन्मदिन है। अवसर है, कि हम चिंतन करें, विचार करें कि हम हिंदी में लिखें। आपने कहा- “इंग्लिश आई शहर में होकर आज सवार। गाँव में सोती रही हिंदी पैर पसार।।”
डॉ. अलका अग्रवाल के अनुसार प्रिय प्रवास में प्रकृति की सुंदरता का सुंदर वर्णन किया गया है। उन्होंने हरिऔध जी की पंक्तियाँ
“नहीं बदलने देंगे हम
हरियाली को पतझड़ में “
प्रस्तुत की।
आदरणीय कुसुम जी ने कहा-
देवनागरी लिपि है जिसकी।
उस हिंदी का है अभिनंदन।।
कवि प्रदीप श्रीवास्तव भोपाल ने कहा- “हिंदी माथे की बिंदी, हम अपना फर्ज निभाते हैं /हिंदी में है नहीं त्रासदी, सब सुखांत कथाओं में।
श्री सुरेश पटवा जी भोपाल ने कहा “प्रिय प्रवास” सिर्फ काव्य नहीं, एक अनुभूति है, विरह का एक भाव जिस पर हरिऔध जी ने महाकाव्य लिख दिया, जो हिंदी जगत के लिए बहुत बड़ी देन है।
श्री गोकुल सोनी भोपाल ने देशभक्ति परक सुंदर कविता प्रस्तुत की-
“वक्त आ गया निकलो घर से, लेकर आज तिरंगा।
जय जय हिंदुस्तान, जय जय देश महान।।”
कवि बी के श्रीवास्तव भोपाल ने कहा कि जो पूर्णता से कार्य करे वही श्रेष्ठ है।
हरिऔध जी का हर सृजन हर रचना सर्वश्रेष्ठ है।
कवि मनोज गुप्ता जी भोपाल ने अमावस की काली रात पर कहा- “मैंने तुमको तम से प्रति क्षण दूर रखा।”
कवयित्री सरला वर्मा जी भोपाल की पंक्तियाँ थीं-
“जो चक्षु चर्म न देख सके, वह कर्म तुम्हें दिखलाते हैं।
स्वर्णिम जीवन के अक्षर तो, पुण्यों से रोपे जाते हैं।।”
सोनम झा जी ने रचना पढ़ी-
“एक तिनका बहुत है तेरे लिए।।”
सुमन जैन जी ने अनेकता में एकता पर अपनी कविता प्रस्तुत की-
“मैं तो मन की स्याही हूँ,
जो माँ शारदे की कलम में घुसकर ,
उसकी पोथी में फैल जाती है।।
कवि पुरुषोत्तम तिवारी “सत्यार्थी” भोपाल ने पढ़ा-
“देह में है प्राण जब तक,
द्वंद से लड़ता रहूँगा।
मैं अंधेरों का विरोधी,
सूर्य नित गढ़ता रहूँगा।
आयोजन की श्रीवृद्धि करते हुए कालजयी कवि श्री कुँवर बेचैन जी के पुत्र तथा पुत्र वधू भावना कुँवर ने सहभागिता की। भावना कुँवर जी की निम्न पंक्तियाँ सराही गईं-
अपने दिल से प्यार का पैगाम ही भेजा गया।
और वह बस नफरतों के बीज ही बोता गया।।
कवि प्रगीत कुँवर जी ने स्वरबद्ध अपनी पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं-
“न जाने क्या हुआ चेहरे में हर दिन ।
बदलते ही रहा शीशे में हर दिन।।
चुभाया तीर जो बातों का उसने ।
वही चुभता रहा सीने में हर दिन।।”
कवयित्री नीलम भटनागर जी ने कहा कि हरिऔध जी का प्रिय प्रवास पढ़कर और पढ़ाकर ही हम हिंदी में स्थान बना पाए हैं।
हिंदी हमारी पहचान है।
हमारी आन बान शान है।।”
इस भव्य कार्यक्रम का समापन करते हुए आशा वत्स जी की बड़ी पुत्री श्रीमती अंगिरा वत्स जी ने इस कार्यक्रम से जुड़े सभी विद्वत जनों वरिष्ठ, कनिष्ठ साहित्यकारों का हृदय से आभार ज्ञापित किया तथा हरिऔध जी की पाँचवी पीढ़ी में ईशानी वत्स के हरिऔध-साहित्य से लगाव व जुड़ाव का उल्लेख किया।
०००
साभार – आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, जबलपुर
≈संस्थापक संपादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (20 अप्रैल से 26 अप्रैल 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जयश्री राम। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्री हनुमान चालीसा जी की आज की चौपाई है:-
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
श्री हनुमान चालीसा की इन चौपाईयों के बार-बार संपुट पाठ करने से सूर्यकृपा विद्या, ज्ञान और प्रतिष्ठा मिलती है।
नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
आइये अब हम आपको इस सप्ताह, ग्रहों के विचरण की जानकारी देते हैं।
इस सप्ताह सूर्य मेष राशि में, मंगल, बुध और शनि मीन राशि में, गुरु मिथुन राशि में, शुक्र वृष राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। मेष राशि में सूर्य उच्च के होते हैं अतः उनके असर के कारण परिणाम बेहद चौंकाने वाले होंगे।
आइये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अत्यंत अच्छा रहेगा। स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। क्रोध की मात्रा में थोड़ी वृद्धि हो सकती है। इस समय सूर्य उच्च का होकर आपके लग्न भाव में बैठा है जिससे आपके कई कष्ट कट सकते हैं। आपको उनके लिए केवल थोड़ा प्रयास करना है। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतने पर सफलता मिल सकती है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष मदद प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल कार्यों की सफलता के लिए शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
वृष राशि
अविवाहित जातकों के लिए अच्छी खबर है। उनके विवाह के अच्छे-अच्छे प्रस्ताव आएंगे। पुराने प्रेम संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी। नए संबंध भी बन सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है परंतु उसके लिए विशेष और सावधानी पूर्वक प्रयास करने होंगे। धन आने का भी योग है, परंतु बुद्धिमानी पूर्वक धन का निवेश करना होगा। कर्मचारियों और अधिकारियों को अपने कार्यालय में तथा अपने अधिकारियों से शांत रहकर ही वार्तालाप करना होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से विशेष सहयोग प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल किसी भी कार्य मैं सफलता प्रदान करने वाली है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
मिथुन राशि
इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में सफलता का योग है। परंतु इस सफलता के लिए आपको सावधानी से कार्य करना होगा। धन प्राप्त होने का बहुत अच्छा समय है। आपके थोड़े से प्रयास से अच्छे धन की प्राप्ति हो सकती है। कार्यालय में आपकी स्थिति ठीक रहेगी। आपको प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। भाग्य से इस सप्ताह आप किसी तरह की उम्मीद ना करें बल्कि आपको अपने परिश्रम और अपने बुद्धि पर यकीन कर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल उपयोगी हैं। 20 और 21 अप्रैल को कार्यों को सचेत रहकर करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। आपको बड़े-बड़े कार्यो से धन प्राप्त होने की उम्मीद है। कार्यालय में आपको सफलता मिलेगी। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से इस बार आपको कभी सहयोग मिलेगा और कभी नहीं मिल पाएगा। इसलिए आपको चाहिए कि आप अपने कर्म पर ज्यादा विश्वास करें। दुर्घटनाओं से आपको सावधान रहना चाहिए। आपके माता जी को कष्ट हो सकता है। उनकी दवा में के प्रति आपको विशेष ध्यान देना चाहिए। परिवार के बाकी सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपको पेट में थोड़ी सी तकलीफ होने की संभावना है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल कार्यों को करने में मददगार हैं। 22 और 23 अप्रैल को आपको सावधानी पूर्वक कोई भी कार्य करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें तथा शनिवार में शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।
सिंह राशि
अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा है। कार्यालय में उनको अपने साथियों से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। उनके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाग्य से इस सप्ताह आपको अच्छी मदद मिलने की उम्मीद है। आपके जो भी कार्य भाग्य के कारण रुक रहे हो उनको इस सप्ताह करने का प्रयास करें। दुर्घटनाओं से थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। परंतु अगर कोई दुर्घटना होती है तो आपको ज्यादा चोट नहीं आएगी। आपको अपने और अपने जीवन साथी के स्वास्थ्य के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल विभिन्न प्रकार से लाभदायक है। 24 और 25 तारीख को आपको जागरूक रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
इस सप्ताह आपका भाग्य पूरी तरह से आपका साथ देगा। आपके कई कार्य अच्छे भाग्य के कारण आराम से हो जाएंगे। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा है। उनको व्यापार में अच्छा लाभ मिल सकता है। अधिकारीयों और कर्मचारियों को अपने सहयोगियों और अधिकारियों से सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। आपके स्वास्थ्य में मामूली परेशानी आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल कार्यों को करने के लिए फलदायक है। 26 अप्रैल को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। 24 और 25 अप्रैल को आपके पास धन आने का योग है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिवपंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए अति महत्वपूर्ण है। इस सप्ताह उनको अपने प्रत्येक प्रयास में सफलता प्राप्त होगी। इस सप्ताह आपको अपने संतान से कोई विशेष सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। भाई बहनों के साथ इस सप्ताह आपके संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा या पहले जैसा ही रहेगा। शत्रुओं को आप इस सप्ताह बड़े आसानी से पराजित कर सकेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। अपने कर्म पर विश्वास करें। दुर्भाग्य और सौभाग्य पर बिल्कुल ही विश्वास ना करें। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 अप्रैल परिणाम दायक है। 20 और 21 अप्रैल को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।
वृश्चिक राशि
अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह उत्साह भरा है। विवाह के नए-नए प्रस्ताव आएंगे। प्रेम संबंधों को भी गति मिलेगी। नए प्रेम संबंध भी बन सकते हैं। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग मिल सकता है। शत्रुओं को आप इस सप्ताह आसानी से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह कोई भी शत्रु आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता है। पिताजी या माताजी के स्वास्थ्य पर थोड़ा आपको सतर्क रहना चाहिए। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए। आपको पेट का कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 तारीख लाभप्रद हैं। 22 और 23 अप्रैल को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। आपके संतान के लिए सप्ताह सफलताओं से भरा हुआ है। वे जिस चीज में भी प्रयास करेंगे उनको सफलता प्राप्त होगी। छात्रों के लिए भी यह सप्ताह उत्तम है। उनको अपने परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंध में आपको तनाव हो सकता है। आपके जीवन साथी को थोड़ा कष्ट हो सकता है। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 अप्रैल परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
मकर राशि
इस सप्ताह आपको जन समुदाय के बीच में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इस कारण से यह सप्ताह जनप्रतिनिधियों के लिए उत्तम है। भाई बहनों के साथ आपके संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। गलत रास्ते से धन आने का योग है। आपके संतान के लिए भी यह सप्ताह उत्तम है। छात्र-छात्राओं को इस सप्ताह परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। आपके पेट में थोड़ी तकलीफ हो सकती है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह पराजित कर सकते हैं। भाग्य से इस सप्ताह आपको कभी लाभ होगा और कभी नहीं हो पाएगा। अतः आपको अपने कर्मों पर ज्यादा विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 25 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयुक्त है। 22, 23 और 26 तारीख को आपको सावधानी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
कुंभ राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने का योग है। व्यापारी इस सप्ताह थोड़ा सतर्क रहें। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। आपके भाई बहनों के लिए यह सप्ताह उत्तम रहेगा। आपको विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है। जन समुदाय के बीच में आपकी इज्जत का इजाफा होगा। छात्र-छात्राओं के लिए यह सप्ताह थोड़ा परेशानी भरा हो सकता है। आपको अपने संतान से इस सप्ताह सहयोग नहीं मिल पाएगा। आपका या आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य छोड़ा थोड़ा कम ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 20 और 21 अप्रैल विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। 24 और 25 अप्रैल को आपको अपने कार्यों के प्रति जागरूक रहना पड़ेगा, अन्यथा आपके कार्य सफल नहीं हो पाएंगे। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
मीन राशि
व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। उनके व्यापार में वृद्धि होगी। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। माता जी को थोड़ी सी तकलीफ हो सकती है। इस सप्ताह जनप्रतिनिधियों को अपने प्रतिष्ठा के प्रति थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। धन आने का उत्तम योग है परंतु इसके लिए आपको प्रयास भी करने पड़ेंगे। कचहरी के कार्यों में थोड़ा सतर्क रहें। दुर्घटनाओं के प्रति इस सप्ताह आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख लाभदायक है। 26 तारीख को आपको होशियार होकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए की आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।
हे स्टीकर ‘ Senior citizens ‘ ने आपल्या कार वर लावायचे. याचा अर्थ असा की, ही कार एक जेष्ठ काका चालवित आहेत. असा होतो.
अक्षय कुमार व राहुल द्रविड ची जाहिरात बघीतली.
मला खूप आवडली ही जाहिरात.
कारण समोरची कार कोण चालवतय ?? हे मागे येणाऱ्या वाहनात बसलेल्या वाहकला कळत नाही. दिसत नाही. समोरचे वाहन हळूहळू चालत असेल, तर मागच्या वाहनाला खूप त्रास होतो. आणि त्यात जर एखादा तरूण मुलगा बसला असेल तर त्याला तर ही ‘स्लो स्पीड ‘असह्य होते. त्याचे ‘patience’ च संपतात.
प्रत्त्येक गोष्ट ‘हाय स्पीड ‘ने करणारा हा तरुण वर्ग. यांच्या करिता कोणतिही गोष्ट हळूहळू करणे म्हणजे एक प्रकारची शिक्षाच असते.
मग ते हॉर्न वाजवून समोरच्या ड्रायव्हरला दम भरतात. त्याचे ब्लड प्रेशर वाढवतात.
समोरच्या कार मधील जेष्ठ नागरिक स्वतः ला सांभाळत, आपले दुखणारे पायाने ब्रेक दाबत कार चालवायची हिम्मत करतो.
“आता ‘reflexes’ हळू झाले आहेत. गर्दी बघीतली की जीव घाबरतो. दृष्टी अधू झाली आहे. कार पार्क करणे हे तर सध्या खूप मोठे संकटच आहे. “असं सर्व आपल्या मनाशी बोलतच असतो.
तरी तो हिम्मत करून मोठया आत्मविश्वासाने कार काढतो. ” आता मी रात्री तर ड्रायव्हिंग करणे सोडलेच आहे. डोळ्यावर प्रकाश डायरेक्ट पडला की त्रास होतो. ” हे तो जाणून आहे. आजही दिवसा ढवळ्या कार चालवायची हिम्मत आहे त्यांची. एक तर घरी कार आहे, तर तिला मधून मधून चालविणे पण गरजेचे आहे. नुसती उभी ठेवली तर खराब होईल. तिचा वर्षभराचा खर्च ही आहेच. आजींना बाहेर न्यायचे म्हणजे, कारने जाणे सोयीस्कर आहे. कारण स्कूटर वर बसणे आता आजींना जमत नाही. भीती वाटते. तेंव्हा या सर्व गोष्टींचा विचार करून जेष्ठ कार चालवतात.
आता ते, हे ‘E ‘ sticker आपल्या कारच्या मागे पूढे लावतील, तर मागून येणाऱ्या कारला हे कळेल, की समोरची कार कोणी तरी जेष्ठ काका चालवित आहे. म्हणून स्पीड कमी आहे. हे समजून तो हॉर्न वाजवणार नाही. व पूढे जायचा दुसरा मार्ग शोधेल.
खरंय, म्हातारपण आयुष्यातील एक वेगळीच फेज आहे. खूप जास्त किंवा खूप कमी आत्मविश्वास दोन्ही उपयोगाचे नाही. वयामानाप्रमाणे अगदी लहान सहान गोष्टींचा ही त्रास होतो. चिडचिड होते. लगेच उत्साह मावळतो. पेशन्स कमी होतात. त्यामुळे खूप मोठा आवाज, सारखा हॉर्न ऐकुन त्रास होतो. गोंधळायला होत. बी पी वाढत.
आता हे समजणे पण गरजेचे आहे की रस्ता तर सर्वांसाठीच आहे. आणि यंग मुलं आपल्या वयाप्रमाणेच वागतील. ते त्यांचे ‘natural ‘वागणे आहे. त्यांच्या करिता ऑफिसला जाणे. इतर कामे वेळेवर करणे गरजेचे आहे. त्यामुळे त्यांची पण चूक नाही.
फक्त एकच गोष्ट होण्यासारखी आहे. ती म्हणजे दोघांनी एकमेकांची सोय बघावी. मान द्यावा. व समजदारी दाखवावी. “दादागिरी करण्यापेक्षा समजदारी केंव्हा ही चांगली”.
प्रत्त्येक परिस्थितीतून निघायचा एक मधला मार्ग असतोच. जसे “उकळत्या पाण्यात आपले प्रतिबिंब दिसत नाही. पण तेच शांत पाण्यात व्यवस्थित दिसत. त्याचप्रमाणे शांत डोक्याने विचार केला तर मार्ग मिळतोच”.
आजचे तरूण उद्या जेष्ठ होणारच आहेत ना.
या सर्व गोष्टी सवयीचा भाग आहे. मानसिक, वैचारिक सवयी लावायच्या असतात. समाजात काही चालीरीती रुजवायच्या असतात.
नवयुवकांनी थोड़े लक्ष दिले, जेष्ठांना मदतीचा हाथ दिला, तर दोघांना आनंद होईल. आपण खूप दा स्वतः चाच विचार करून छोट्या छोट्या गोष्टींचा आनंद घेतो स्वतः ला ‘ जिंकलो ‘ असं समजतो. आनंदी होतो.
कधी कधी कार पार्क करताना, एका जागेवर दोन गाड्या पोचतात. एक तरूण मुलगा सवयीप्रमाणे पटकन त्या जागेत आपली कार पार्क करतो. व दुसऱ्या कार मधील जेष्ठ राहुन जातो.
कधी आपली जागा दुसऱ्याला देऊन तर बघावे. दरवाजा उघडून स्वतः आत जाऊन खाडकन दरवाजा बंद करण्या ऐवजी, दरवाजा उघडून दुसऱ्याला आधी आत जाऊ द्या. असे करून तर बघा. माझ्या साठी कोणीतरी दरवाजा उघडला आहे ही आनंदाची गोष्ट आहे.
स्वतः च्या आधी, थोडा दुसऱ्याचा विचार करून तर बघा, चांगले वाटेल.
आपल्या करिता आपण करतोच. थोडं स्वतः ला मागे ठेवून दुसऱ्या करिता केले तर, त्यात नुकसान कमी, आनंद जास्त मिळेल. दुसऱ्या ला महत्व देऊन तर बघा. जर तो दुसरा कोणी जेष्ठ असेल तर आनंद व आशिर्वाद दोन्ही मिळेल.
रस्त्यावर जेष्ठ सूखरूप राहतील. असे वागून तर बघा. सर्वांच्याच समस्या दूर होतील.
थोडा वेगळा विचार करायची गरज आहे. दुसऱ्या करिता आनंदाने जागा द्यायला, दुसऱ्यांकरिता दरवाजा उघडायला शिका.
Give a thought on life changing lesson—‘ HTDO ‘– “Hold The Door Open. “
“क्यों न थोड़ा-सा अलग बने, खुश रहने की वजह बने । “
म्हणतात ना,
” It is nice to be important. but it is more important to be nice. “
☆ “एक हृदयस्पर्शी सत्यकथा…” लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री मोहन निमोणकर ☆
एका शांत कॉलनीत ‘आप्पा’ एकटेच राहायचे. त्यांच्या पत्नीचे पाच वर्षांपूर्वी निधन झाले होते. त्यांची एकुलती एक मुलगी, ‘समीरा’, बंगळुरूमध्ये एका मोठ्या आयटी कंपनीत नोकरीला होती आणि नुकतीच ती लग्न करून तिथे स्थायिक झाली होती.
आप्पांची एक सवय होती. गेल्या अनेक वर्षांपासून, घड्याळात रात्रीचे बरोबर १० वाजले, की त्यांचा समीराला न चुकता फोन यायचा. फोनवरचे त्यांचे प्रश्न नेहमी तेच असायचे.
“हॅलो बाळा, ऑफिसमधून घरी पोहोचलीस का? जेवण झालं का तुझं?”
सुरुवातीला समीरा या प्रश्नांची प्रेमाने उत्तरे द्यायची. पण लग्नानंतर आणि नोकरीच्या वाढत्या ताणामुळे तिला आप्पांच्या या रोजच्या फोनचा प्रचंड कंटाळा येऊ लागला. कधी ती मित्रांसोबत बाहेर असायची, कधी नवऱ्यासोबत टीव्ही बघत असायची, तर कधी ऑफिसच्या मीटिंगमध्ये असायची. बरोबर १० वाजता आप्पांचा फोन वाजला, की तिची चिडचिड व्हायची.
एके दिवशी रात्री समीराचे तिच्या नवऱ्यासोबत काहीतरी क्षुल्लक कारणावरून कडाक्याचे भांडण झाले होते. ती रागातच बेडरूममध्ये येऊन बसली. तिचे डोके भणाणून गेले होते.
तेवढ्यात घड्याळात १० वाजले आणि तिच्या मोबाईलवर ‘आप्पा कॉलिंग’ असे नाव झळकले. समीराने रागाने फोन उचलला आणि आप्पा काही बोलण्याआधीच ती संतापाने ओरडली.
“बाबा, काय लावलंय तुम्ही हे रोज रोज? मी आता लहान शाळेत जाणारी मुलगी नाहीये! माझं लग्न झालंय, माझं स्वतःचं एक वेगळं आयुष्य आहे. रोज रात्री बरोबर दहा वाजता फोन करून माझी चौकशी करणं प्लीज बंद करा आता. मला माझा ‘स्पेस’ हवाय. मी सुरक्षित आहे. मला जेव्हा वेळ मिळेल, तेव्हा मीच तुम्हाला फोन करत जाईन. प्लीज मला रोज हा असा त्रास देऊ नका!”
समीराने न थांबता एका श्वासात सर्व राग आप्पांवर काढला.
पलीकडून काही सेकंद पूर्ण शांतता होती. आप्पांचा फक्त एक जड श्वास समीराला ऐकू आला. थोड्या वेळाने अत्यंत कांपऱ्या आणि दबक्या आवाजात आप्पा फक्त एवढंच म्हणाले, “बरं बाळा… झोप आता. काळजी घे स्वतःची. “
आणि फोन कट झाला.
त्या दिवसानंतर आप्पांचा रात्री १० वाजताचा फोन येणे कायमचे बंद झाले. ते फक्त सकाळी व्हॉट्सॲपवर एखादा ‘सुविचार’ किंवा फुलांचा फोटो पाठवायचे. समीराला खूप मोकळे आणि निवांत वाटले. “चला, सुटले एकदाची या रोजच्या कटकटीतून, ” असा विचार करून ती स्वतःच्या संसारात आणि नोकरीत मग्न झाली. ती स्वतःहून आप्पांना रविवारी कधीतरी पाच मिनिटे फोन करायची, तेव्हाही आप्पा अतिशय मोजकेच बोलायचे.
असेच सहा महिने उलटून गेले.
एके दिवशी पहाटे साडेपाच वाजता समीराच्या मोबाईलची रिंग वाजली. फोन पुण्याच्या शेजाऱ्यांचा होता. समीराने झोपेतच फोन उचलला आणि पलीकडचे शब्द ऐकताच ती जागीच थिजली.
आप्पांना झोपेतच सायलेंट हार्ट अटॅक आला होता आणि ते कायमचे हे जग सोडून गेले होते.
समीरा वेड्यासारखी रडत, पहिली फ्लाईट पकडून पुण्यात पोहोचली. घरातली ती गर्दी, ते रडणे आणि आप्पांचे ते शांत झोपलेले शरीर बघून समीराच्या काळजाचे तुकडे झाले. सर्व विधी पार पडले. नातेवाईक निघून गेले. चार दिवसांनी समीरा आप्पांची बेडरूम आवरत होती.
आप्पांच्या उशीखाली तिला त्यांचा तो जुना स्मार्टफोन आणि एक छोटीशी डायरी सापडली. समीराने ती डायरी उघडली. त्यातील एका पानावर आप्पांच्या थरथरत्या अक्षरातील ओळी वाचून समीराचा श्वासच कोंडला गेला.
आप्पांनी लिहिले होते:
“समीराच्या आईला जाऊन पाच वर्षे झाली. हे घर खायला उठतं. रात्री १० वाजले की मला घाम फुटायला लागतो, छातीत भयंकर धडधडतं. या एकटेपणाची आणि अंधाराची मला खूप भीती वाटते. पण जेव्हा मी रात्री बरोबर १० वाजता समीराला फोन लावतो, तिचा ‘हॅलो बाबा’ हा आवाज कानावर पडतो… तेव्हा माझ्या धडधडणाऱ्या काळजाला शांतता मिळते. माझा जीव भांड्यात पडतो. ती सुरक्षित आहे हे समजलं, की मला या रिकाम्या घरात रात्रीची शांत झोप लागते. “
समीराचे हात थरथर कापू लागले. तिने पुढचे पान पलटले. ती त्याच तारखेची नोंद होती, ज्या दिवशी तिने आप्पांना फोनवर रागावून सुनावले होते.
“आज माझ्या मुलीने मला फोन करू नको असं सांगितलं. तिला माझ्या प्रेमाचा आता त्रास होतोय. तिचं बरोबर आहे, ती आता मोठी झालीये. मी आजपासून तिला कधीच कॉल करून त्रास देणार नाही. पण… आता रात्रीची झोप कशी येणार? तिचा आवाज ऐकल्याशिवाय मला श्वास घेता येत नाही. “
समीराच्या डोळ्यांतून घळाघळा अश्रू वाहू लागले. तिने वेड्यासारखा आप्पांचा तो जुना मोबाईल हातात घेतला आणि त्याचा ‘कॉल लॉग’ (Call History) उघडून पाहिला.
मोबाईलची स्क्रीन बघताच समीराने एक भयंकर मोठी किंकाळी फोडली आणि ती जमिनीवर कोसळली!
गेल्या सहा महिन्यांत… ज्या दिवशी तिने आप्पांना ओरडले होते त्या दिवसापासून ते काल आप्पा जाईपर्यंत… रोज रात्री बरोबर १०:०० वाजता आप्पांनी समीराचा नंबर डायल केला होता! पण तो फोन ‘रिंग’ होण्याआधीच अवघ्या दोन सेकंदात त्यांनी तो ‘कट’ केला होता.
ती रोज रात्री आपला नंबर डायल करायचे, मोबाईलच्या स्क्रीनवर दिसणारा समीराचा फोटो बघायचे, आणि फोन लागण्याआधीच कट करायचे… जेणेकरून समीराला त्रास होऊ नये! पण स्वतःच्या एकटेपणाशी लढताना, फक्त नंबर डायल करून ते स्वतःच्या काळजाची समजूत काढत होते.
समीरा ढसाढसा रडत होती. ती उशीला घट्ट मिठी मारून ओरडत होती, “मला माफ करा बाबा! मी खूप स्वार्थी आहे. मला वाटायचं तुम्ही माझ्यावर ‘कंट्रोल’ ठेवण्यासाठी फोन करताय, पण तो फोन माझ्यासाठी नव्हता… तो तुमच्या स्वतःच्या जगण्यासाठी होता! बाबा, प्लीज मला एक कॉल करा… मला तुमचा आवाज ऐकायचाय!”
…
पण आता रात्रीचे १० वाजून गेले होते, आणि समीराचा फोन पुन्हा कधीच वाजणार नव्हता.
लेखक : अनामिक
प्रस्तुती : श्री मोहन निमोणकर
संपर्क – सिंहगडरोड, पुणे-५१ मो. ८४४६३९५७१३.
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈
☆ मोक्ष… भाग – १ – लेखिका : भारती ठाकूर ☆ प्रस्तुती – शशी नाईक-नाडकर्णी ☆
ही घटना आहे 27 नोव्हेंबर 2012 ची. नर्मदा किनारी नगावा नावाचे एक गाव आहे. गंमत आहे ना ! गावाचे नाव नगावा. तिथे अगदी नर्मदा किनाऱ्यावर केवट धर्मशाळेत शाळा मध्येच सोडून दिलेल्या मुलांसाठी आमचे एक अनौपचारिक शिक्षण केंद्र होते. आपण निशुल्क कोचिंग क्लास असे म्हणूया त्याला हवं तर. सकाळी दहा साडेदहा ची वेळ होती. मी वर्गात शिकवत होते. खिडकीतून बाहेर लक्ष गेले तर दोन परिक्रमावासी येताना दिसले. थोड्याच वेळात त्यांच्यापैकी एकाने वर्गाच्या खिडकीतून डोकावून मला विचारले, “भारती ठाकूर से मिलना था | कहा मिलेगी ?” मी हसून म्हटलं, “मीच आहे ती. दमून आला आहात. थोडं बसा, एवढा विषय संपवून मी येतेच. ”
जवळच्याच एका मंदिरात परिक्रमावासींची रहाण्याची सोय होती. तिथल्या ओट्यावर दोघेही माझी वाट बघत थांबले. थोड्यावेळाने मी तिथे पोहोचले. एकमेकांशी परिचय झाला. पुण्याचे राहणारे ते दोघेही सख्खे भाऊ होते. एक श्री माधव परांजपे आणि दुसरे श्री मुकुंद परांजपे. दोघांचीही वयं सत्तरीच्या आसपास असावीत. थोरल्या भावानी बॅगेतून एक वही काढली. त्यातल्या एका पानावर काही जणांची नावे लिहिली होती आणि वरती शीर्षक होतं नर्मदा परिक्रमेत या लोकांना अवश्य भेटणे आहे. त्या चार -पाच नावांमध्ये माझेही एक नाव होते. माझ्या नावासमोर त्यांनी माझा मोबाईल नंबर लिहिला.
त्या मंदिरात आमचे नेहमीच जाणेयेणे असल्यानेतिथली सगळीच मंडळी माझ्या ओळखीची होती. तिथल्या व्यवस्थापकांना मी सांगितलं, “ये हमारे पुना के मेहमान है । जरा अच्छेसे ध्यान रखना इनका |” आणि मी तिथून पुन्हा लेपाला परतले.
दुसऱ्या दिवशी सकाळी साडेपाच सहाच्या सुमारासच धाकट्या भावाचा म्हणजे श्री मुकुंद परांजपे यांचा फोन आला. “ ताई-दादा गेले. मी मुकुंद परांजपे बोलतोय” मला काही कळेना की कुठे गेले आणि इतक्या सकाळी ? मी विचारलं कुठे गेले? “ गेले म्हणजे दादा वारले काल रात्री. पहाटे अडीच तीनच्या सुमारास त्यांना हृदयविकाराचा झटका आला. आम्ही भटयाण येथे गोधारी आश्रमात थांबलो आहोत. काल नगाव येथे जेवण करून पुढे निघालो आणि संध्याकाळपर्यंत गोधारी आश्रमात पोहोचलो आणि तिथेच थांबलो. आम्हाला रात्री झोपायला स्वतंत्र खोली पण मिळाली. रात्री झोपेपर्यंत दादा व्यवस्थित होते. पहाटे अडीच तीनला मला त्यांच्या हालचालीने जाग आली. त्यांना श्वास घ्यायला त्रास होतोय हे मला जाणवलं. मी त्यांना प्यायला पाणी दिलं. एखाद-दोन घोट पाणी प्यायले असतील. पण लगेच त्यांचा प्राण गेला. आश्रमातल्या स्वामीजींनी डॉक्टरांना बोलावले पण काही उपयोग झाला नाही. प्राण गेला होता. काय करावे मला सुचत नाहीये. मी घरी पुण्याला कळवलं आहे. पण घरचे लोक कुठल्याही वाहनाने आले – अगदी विमानाने सुद्धा तरी त्यांना रात्रीचे नऊ-दहा वाजतील यायला. ” थोरल्या भावावर जीवापाड प्रेम करणाऱ्या या धाकट्या भावाची अवस्था मी समजू शकले.
मी म्हणाले, “तुम्ही काळजी करू नका. मी पोहोचते तिथे. मी आमच्या दोन कार्यकर्त्यांना काय घडलं ते सांगितलं आणि लवकर तयार व्हा आपल्याला निघायचे आहे अशी सूचना देखील दिली. ताबडतोब आम्ही तिथे पोहोचलो. तो दिवस होता कार्तिकी पौर्णिमेचा. गोधारी आश्रम नर्मदा किनाऱ्यावर परशुरामांची तपस्थली म्हणून प्रसिद्ध आहे. मी बरोबर जाताना भगवद् गीता आणि इतर काही स्तोत्रांची पुस्तकं आठवणीने बरोबर घेऊन गेले. करण दिवसभर त्या भावाशी काय बोलणार ?
दिवस उजाडला आणि एका परिक्रमावासीचे नर्मदा किनारी देहावसान झाले आहे ही बातमी आसपासच्या गावात वार्यासारखी पसरली. लोक दर्शनासाठी येऊ लागले. त्यांच्या बोलण्यातून समजले की नर्मदा किनारी परिक्रमावासीचा मृत्यू आणि तोही कार्तिक पौर्णिमेच्या दिवशी होणे याला भाग्य लागतं. या भाग्यामध्ये श्री परांजपे यांचं ॲडिशनल भाग्य हे होतं की ते चित्पावन ब्राम्हण होते आणि परशुरामांच्या तपस्थलीवर त्यांचा मृत्यू झाला.
दिवसभर लोक दर्शनासाठी येत होतेच. आश्चर्य म्हणजे कोणीही रिकाम्या हाती आलं नाही. कोणी आमच्यासाठी चहा आणत होते तर कोणी दूध. कुणी साजूक तूप. कुणी गोवऱ्यांची व्यवस्था करत होते तर कुणी प्रेतावर पांघरण्याचे वस्त्र. गावातल्या बायकांनी आठवणीने मला सांगितले, “ दीदी, आमच्याकडे भरपूर लाकूडफाटा आहे. स्वयंपाकासाठी आम्ही तो गोळा करून ठेवतो. ती लाकडे घेऊन जा. आमची पिकअप व्हॅन या कामासाठी उपयोगी पडली. भरपूर गोवऱ्या आणि लाकडे लोकांनी किनाऱ्यावर रचून ठेवली. तो संपूर्ण दिवस खूप अस्वस्थतेत गेला. दर तासाला त्यांच्या नातेवाईकांशी संपर्क चालू होता. त्यांचे इंदोर मधले परिचित श्री वाळुंजकर हे या परिवाराला भट्याणला घेऊन येणार होते. आम्ही त्यांच्याशीही संपर्कात होतो नर्मदा किनाऱ्यावर सरणाची तयारी चालू आहे आणि चिता रचली गेली आहे हे गोधारी आश्रमातल्या स्वामीजींना समजताच त्यांनी वेगळा पेच प्रसंग माझ्यापुढे उभा केला. श्री परांजपे परिक्रमेत होते. म्हणजे तो एक प्रकारचा सन्यासच असतो. आणि संन्यास घेतलेल्या व्यक्तीचे नर्मदा किनारी दहन होत नाही तर ते पार्थिव शरीर नर्मदेला अर्पण केलं जातं. पार्थिवाला जल समाधी दिली जाते.
अनेकदा अशी काही पार्थिव शरीरे जलसमाधी दिल्यानंतर नर्मदेच्या पात्रात असलेल्या खडकांमध्ये अडकतात आणि कुजतात हे मी वाचलं होतं, ऐकलं होतं आणि एक-दोन ठिकाणी बघितलेही होतं. त्यामुळे हे जलसमाधीचे खूळ लोकांच्या डोक्यातून निघावं अशी माझी इच्छा होती. मी तसा वाद घालूनही पाहिला.. लोकांचं म्हणणं असं कि शरीर सडतं हे खरं आहे पण ते मासे खाऊन टाकतात. त्यांना अन्न मिळतं. माझी समजूत पटेना. कारण तेच पाणी गावातले लोक हंडे भरून पिण्यासाठी आपल्या घरी नेतात. नर्मदेवर स्नानासाठी आलेले भक्त सुद्धा तेच पाणी पितात. त्यांचे काय ? खूप विचार केल्यानंतर एक युक्ती मला सुचली. कै. परांजपे यांच्या मुलाला मी इथे काय चर्चा चालू आहे लोकांमध्ये ते फोनवर सांगितलं. त्याला मी सांगितलं, की ‘ वडलांच्या चितेला अग्नी देणे हे मुलगा म्हणून माझं कर्तव्य आहे. आमचे सगळेच नातेवाईक अंत्यसंस्कारासाठी इथे पोहोचू शकणार नाहीत. माझी आई सुद्धा येऊ शकत नाहीये. अशावेळी किमान मला अस्थिकलश घेऊन जाता यावा म्हणून तरी पार्थिव शरीराचे दहन होणे आवश्यक आहे. ’– असे तू त्या स्वामीजींना सांग. महत्त्वाची गोष्ट म्हणजे या वादात मी जिंकले. गावकरी आणि ते स्वामीजी नर्मदा किनाऱ्यावर कै. परांजपे यांचा अंत्यसंस्कार करण्यास तयार झाले.
– क्रमशः भाग पहिला
लेखिका : भारती ठाकूर
नर्मदालय, लेपा पुनर्वास (बैरागढ) जिल्हा खरगोन, मध्य प्रदेश.
प्रस्तुती : शशी नाडकर्णी-नाईक
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈