हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ रक्षाबंधन विशेष – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण।)

☆ आलेख – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण  ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

रक्षासूत्र रक्षा करने वाला वह धागा है,जो नकारात्मक ऊर्जा, संकटों व बुरी नज़र से बचाता है। यह मनुष्य को धर्म, सत्य और अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। वेदों में इसे रक्षाबंधन भी कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार प्रथम प्रसंग में जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी तब दानवराज बलि, महाबली की पत्नी विंध्यावली ने बली की रक्षार्थ उनके हाथ में रक्षासूत्र बाँधा था तथा दूसरे प्रसंग देवासुर संग्राम में जब इन्द्र कमज़ोर पड़ गए तो इन्द्राणी शची ने मंत्रों से अभिसिंचित करके श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को इन्द्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा और उनकी विजय हुई। इस धागे को दाहिने हाथ की कलाई पर बाँधा जाता है क्योंकि दाहिना हाथ कर्म का प्रतीक है। श्रावण शुक्ला पूर्णिमा की तिथि को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह केवल बहन-भाई का त्यौहार ही नहीं है अपितु गुरू अपने शिष्य को, ब्राह्मण अपने यजमानों को और पत्नी अपने पति को भी रक्षासूत्र बाँधती है। आज के समय में रक्षासूत्र एक सुरक्षा कवच है। यह सुरक्षा बाहरी संकट नहीं है। भारतीय चिंतन में रक्षा का व्यापक अर्थ धर्म, सत्य,कर्तव्य,सम्बन्ध,मर्यादा, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा भी है। इसी प्रकार ‘ सूत्र ‘ शब्द केवल धागे का नाम नहीं, वह जोड़ने,बाँधने और सम्बन्ध स्थापित करने का प्रतीक है।

भारतीय संस्कृति में संस्कार का अर्थ कर्मकांड नहीं अपितु मनुष्य के जीवन को परिष्कृत करने, उसे सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूक बनाने की एक प्रक्रिया है। जन्म से मृत्यु तक हमारे यहाँ अनेक संस्कारों का उल्लेख मिलता है,जिनमें मंत्र, अग्नि, जल, पुष्प,अक्षत, दीप, तिलक और सूत्र का प्रयोग होता है, जो अनुष्ठान को सुन्दर बनाने के साथ अमूर्त विचारों को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। दीपक ज्ञान का, जल शुद्धता और जीवन, अग्नि पवित्रता और साक्षित्व,अक्षत पूर्णता,मंगल, तिलक शुभता  व सूत्र सम्बन्ध, संकल्प और संरक्षण का प्रतीक है। रक्षासूत्र इसी संकल्प को शरीर पर एक प्रतीक के रूप में धारण कराता है। जब किसी व्यक्ति की कलाई पर सूत्र बाँधा जाता है तो वह सूत्र उसके संकल्प की याद दिला सकता है कि मैं अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहूँ, सम्बन्धों का सम्मान करूँ, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलूँ और अपने परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी रहूँ। इस दृष्टि से रक्षासूत्र बाहरी बंधन नहीं, आंतरिक अनुशासन का प्रतीक है।

रक्षासूत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय सामाजिक अभिव्यक्ति रक्षाबंधन पर्व में दिखाई देता है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बाँधना पारिवारिक संस्कृति में स्नेह, विश्वास और पारस्परिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। राखी बाँधने की परम्परा परिवार को स्मरण कराती है कि रक्त सम्बन्ध केवल जैविक सम्बन्ध नहीं हैं,उनमें भावनात्मक दायित्व भी निहित है। यूँ तो इस पर्व की छवि इससे कहीं व्यापक है। भारतीय परम्परा में रक्षा का दायित्व केवल पुरुष का नहीं माना जा सकता। माता परिवार की रक्षा करती है, पिता परिवार का पालन करके दायित्व निभाता है, बहन भाई के सुख-दुःख में साथ देती है और भाई, बहन के सम्मान और सुरक्षा का ध्यान रखता है, मित्र भी संकट में सहायता करते हैं। इसलिए आधुनिक संदर्भ में रक्षासूत्र को परस्पर संरक्षण और सहयोग का प्रतीक बनाना अधिक सार्थक होगा। भारतीय परिवार व्यवस्था का आधार भावनात्मक सम्बन्ध और परस्पर उत्तरदायित्व भी रहा है अत: रक्षासूत्र पारिवारिक चेतना का दृश्य प्रतीक भी है, जो सम्बन्धों को व्यवहार में जीवित रखने का अवसर देता है। आज संयुक्त परिवारों का आकार घट रहा है,इस स्थिति में रक्षाबंधन जैसा पर्व परिवार के सदस्यों को पुन: जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। रक्षासूत्र सामाजिक समरसता, प्रकृति संरक्षण, लोक संस्कृति, पर्यावरणीय चेतना, स्त्री सम्मान के मध्य सेतु बन सकता है।

      किसी भी सांस्कृतिक प्रतीक का महत्व उसके भौतिक अस्तित्व से अधिक उसके अर्थ में होता है। यदि रक्षासूत्र केवल कलाई पर बँधा धागा बनकर रह जाए तो उसकी सांस्कृतिक शक्ति सीमित हो जाती है ,यदि वह  सम्बन्धों की याद दिलाए, कर्तव्य का बोध कराए, परिवार को जोड़े, सामाजिक समरसता बढ़ाए, प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा दे, स्त्री सम्मान का संदेश दे और मानवीय मूल्यों की रक्षा का संकल्प जगाए तो वह जीवंत संस्कृति का प्रतीक बन जाता है एतदर्थ रक्षासूत्र भारतीय संस्कृति की उस प्रतीकात्मक परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसमें छोटी-सी वस्तु के भीतर व्यापक जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने की क्षमता है। धागा भौतिक रूप से कमजोर हो सकता है किन्तु जब वह विश्वास, प्रेम, संकल्प और उत्तरदायित्व से जुड़ता है तो उसका सांस्कृतिक अर्थ अत्यन्त शक्तिशाली हो जाता है। रक्षासूत्र इसी जीवंत सांस्कृतिक स्मृति का सुन्दर प्रतीक है। आज आवश्यकता है कि इस पर्व के भीतर छिपे मानवीय मूल्यों को समझें और उन्हें वर्तमान जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ें!!

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रक्षाबंधन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – रक्षाबंधन ??

भाई-बहन के सम्बन्धों का उत्सव मनाने वाला रक्षाबंधन संभवत: विश्व का एकमात्र पर्व है। इस पर्व में बहन, भाई को राखी बांधती है। पुरुष भी परस्पर राखी बांधते हैं। पुरोहित द्वारा भी राखी बांधी जाती है। अनेक स्थानों पर वृक्षों को भी राखी बांधी जाती है। ‘भविष्यपुराण’ के अनुसार इंद्राणी द्वारा निर्मित रक्षा सूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र के हाथों बांधते हुए स्वस्तिवाचन किया था।  रक्षासूत्र का मंत्र है-

येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:

तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल:।

इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवीर महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे,(धर्म में प्रयुक्त किए गये थे)  उसी से तुम्हें बांधता हूं। ( प्रतिबद्ध करता हूँ)।  हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। चलायमान न होने का अर्थ स्थिर अथवा अडिग रहने से है।

प्रकृति के विभिन्न घटकों, समाज के विभिन्न वर्गों को रक्षासूत्र बांधना/ उनसे बंधवाना राष्ट्रीय एकात्मता का प्रदीप्त और चैतन्य है। भारतीय समाज को खंडित भाव से खंड-खंड निहारने वाली आँखों के लिए यह अखंड भाव का अंजन है।

एक विचारप्रवाह है कि वैदिक काल से  रक्षाबंधन रक्षासूत्र एवं प्रतिबद्धता का उत्सव रहा। विदेशी आक्रमणकारियों के भारत में प्रवेश के पश्चात स्थितियाँ बदलीं। आक्रांताओं से  अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए कन्याएँ, भाई को रक्षासूत्र बांधने लगीं। सहोदर की समृद्धि वह सुरक्षा के लिए कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भाईदूज या यमद्वितीया का त्योहार भी इसी शृंखला की एक कड़ी है।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Satire ☆ Witful Warmth # 108 – The Presidential Samosa… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Dr. Suresh Kumar Mishra, widely known in the world of satire by his pen name ‘Uratipt’, expresses his emotions and thoughts with profound honesty and depth. His multifaceted talent is evident in his contributions across various literary genres. He is not only a renowned satirist but also a poet and a children’s author.

His satirical writings have earned him a special place in the literary world. His satire, ‘Shikshak Ki Mout’, went massively viral on the Sahitya Aajtak channel, garnering over a million views and reads—a monumental achievement in the history of Hindi satire. His collection of satires, ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’ (A Straw and Fifty-One Eyes), is also highly acclaimed and includes his timeless work, ‘Kitabon Ki Antim Yatra’ (The Last Journey of Books). Other celebrated collections include ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’ (One Sheath, Many Swords), ‘Gapodi Adda’ (The Gossiper’s Den), and ‘Sab Rang Mein Mere Rang’ (My Colors in Every Hue). His satirical novel, ‘Idhar-Udhar Ke Beech Mein’ (In Between Here and There), is a unique and groundbreaking work focused on the third world.

His significant contributions to literature have been widely recognized. He was honored with the Best Young Creator Award, 2021 by the Telangana Hindi Academy and the Government of Telangana, an award presented by Chief Minister K. Chandrasekhar Rao. The Rajasthan Children’s Literature Academy also honored him for his children’s book, ‘Nanhon Ka Srijan Aasmaan’ (The Creative Sky of Little Ones). Additionally, he has received the Vyanga Yatra Ravindranath Tyagi Sopaan Samman and the Sahitya Srijan Samman from Prime Minister Narendra Modi.

Dr. Uratript has also played a pivotal role in writing, editing, and coordinating a total of 55 books for the Government of Telangana for primary school, college, and university levels. His work is included in university textbooks in Bihar, Chhattisgarh, and Telangana, where his satirical creations are part of the curriculum. This recognition underscores that young readers can identify and appreciate quality and impactful writing.

Key Accolades and Works

  • Viral Satire: ‘Teacher’s Death’ (over 1 million views)
  • Satire Collections: ‘Ek Tinka Ikyavan Aankhen’, ‘Mayaan Ek, Talwar Anek’, ‘Gapodi Adda’
  • Unique Satirical Novel: ‘Idhar-Udar Ke Beech Mein’
  • Awards: Shreshtha Navyuva Samman (Telangana), Sahitya Srijan Samman (PM Modi), and more.
  • Educational Contribution: Authored and edited 55 books for the Telangana government.

Some precious moments of life

  1. Honoured with ‘Shrestha Navayuvva Rachnakar Samman’ by former Chief Minister of Telangana Government, Shri K. Chandrasekhar Rao.
  2. Honoured with Oscar, Grammy, Jnanpith, Sahitya Akademi, Dadasaheb Phalke, Padma Bhushan and many other awards by the most revered Gulzar sahab (Sampurn Singh Kalra), the lighthouse of the world of literature and cinema, during the Sahitya Suman Samman held in Mumbai.
  3. Meeting the famous litterateur Shri Vinod Kumar Shukla Ji, honoured with Jnanpith Award.
  4. Got the privilege of meeting Mr. Perfectionist of Bollywood, actor Aamir Khan.
  5. Meeting the powerful actor Vicky Kaushal on the occasion of being honoured by Vishva Katha Rangmanch.

Today we present his satire The Presidential Samosa 

☆ Witful Warmth# 108 ☆

☆ Satire ☆ The Presidential Samosa… ☆ Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’ ☆

The Shanti Nagar Welfare Association election was no less thrilling than a national election. This time, the contest was between two stalwarts: the long-standing president, Mr. Cooper, and the neighborhood’s newly rich builder, Mr. Bhalla. Mr. Cooper’s stake was pinned on his longstanding reputation and honesty, while Mr. Bhalla’s main weapon was the lavish ‘Royal Samosa and Jalebi Party’ hosted on the eve of the election.

A debate had been organized in the society auditorium. The entire hall was divided into two factions. On one side was an army of senior citizens chanting slogans in support of Mr. Cooper, while on the other side was a group of youngsters enamored with Mr. Bhalla’s promises of free Wi-Fi and a modern gym.

The debate reached its peak. Mr. Bhalla took the microphone and declared in a booming voice, “Brothers and sisters, if I am elected president, I will install Italian marble in the society park, and the swimming pool water will be replaced every single week!”

The crowd applauded enthusiastically. Then came Mr. Cooper’s turn. He adjusted his old spectacles and spoke in a calm, soft voice, “Italian marble and swimming pools are fine, but the lock on our main gate has been broken for the last six months, and the security guard hasn’t been paid his salary for two months. Let us address these basic problems first.”

The atmosphere suddenly turned solemn. Just then, Mr. Bhalla’s supporters began distributing packets of samosas at the back of the auditorium. The aroma of piping hot samosas wafted through the air, and everyone’s attention shifted from the speeches to the food plates. It seemed as though Mr. Bhalla’s samosa was about to overpower Mr. Cooper’s honesty.

The voting process began. Everyone slipped their paper ballot into the box. Mr. Cooper sat quietly in a corner, sipping his tea, bracing himself for an inevitable defeat. At seven in the evening, the counting of votes commenced.

When the final results were announced, even the chief guest on stage gasped in utter disbelief. Mr. Cooper had secured a staggering ninety percent of the votes, while Mr. Bhalla received a paltry ten. A shocked Mr. Bhalla leapt up and shouted, “This is unfair! When everyone ate my samosas, how on earth did you all vote for Mr. Cooper?”

Just then, Mr. Gupta, the oldest resident of the society, walked up to the stage, took the microphone, and said, “Mr. Bhalla, thank you for the delicious samosas and jalebis! But it has been a long-standing tradition in Shanti Nagar that we feast on the food of wealthy candidates, but cast our votes for the honest man who would stand at the gate at two in the morning to fix the broken lock.”

The entire auditorium erupted into roaring laughter and thunderous applause. Accepting his defeat gracefully, Mr. Bhalla embraced Mr. Cooper and said, “Mr. President, next time, the chutney will be free from my side as well!”

****

© Dr. Suresh Kumar Mishra ‘Uratript’

Contact : Mo. +91 73 8657 8657, Email : drskm786@gmail.com

≈ Blog Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७९ ⇒ रक्षाबंधन विशेष – मामा का घर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मामा का घर।)

?अभी अभी # १०७९  ⇒ आलेख – मामा का घर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

समय बदलते देर नहीं लगती !

जो कभी नानी का घर था, समय के साथ मामा का घर हो गया। समय ने मामा को भी गाँव से शहर भेज दिया। अब जहाँ मामा, वहाँ मामा का घर।

माँ और मामा का भाई-बहन का रिश्ता रहता था। साल में केवल एक त्योहार, जो माँ और मामा को एक सूत्र में बाँधता था – राखी !

मेरी माँ, पाँच भाईयों में इकलौती बहन थी। कभी राखी पर किसी मामा के घर नहीं गई। लेकिन राखी हर साल, हर हाल में, भाइयों की कलाई तक पहुँच जाती थी।।

वह फ़ोन और मोबाइल का युग नहीं था ! लिफ़ाफ़े में ही राखी भेजी जाती थी। और साथ में जाता था, दो लाइन का पत्र, जो हर वर्ष मुझे ही लिखना पड़ता था। मैं चिढ़ता, नाराज़ होता, भाईयों को तुम्हारी चिंता नहीं, और तुम फिर भी हर साल !

दो लाइन की चिट्ठी का मजमून, अमूनन, यही रहता था। पूज्य भाई साहब !सादर प्रणाम। आप स्वस्थ होंगे। राखी भिजवा रही हूँ। बंधवा लें। भाभीजी को प्रणाम। आपकी बहिन।

आज माँ नहीं है ! पाँच मामाओं में से एक भी मौजूद नहीं है। जहाँ आज भी बहन नहीं पहुँच पाती, राखी ज़रूर पहुँच जाती है। फ़ोन पर बातचीत हो जाती है।

व्हाट्सएप्प के जरिए फोटोज की भी आवाजाही चला करती है। पीढियां बदल गईं। रिश्ते नहीं बदले !।।

आज भी नानियाँ हैं, बच्चे हैं, नानी का घर है। हां ! नानी की कहानियाँ ज़रूर बदल गई हैं ! आज की नानियाँ बच्चों को होमवर्क करवाती हैं, स्टॉप तक स्कूल छोड़ने जाती हैं। सब साथ-साथ पीवीआर में फ़िल्म देखने जाते हैं। हां, टिकट आज भी मामा ही लाते हैं।

रिश्ते हैं तो प्यार है। प्यार है तो त्योहार है। हमें आज के दिन इन प्यार के बंधनों की ही रक्षा करना है। रिश्ते जहाँ परवाह है, सम्मान है, एक दूसरे के लिए दिलों में प्यार भरा आग्रह है, स्नेहयुक्त अनुरोध है। हर घर में एक नानी-नाना हो, मामा हो, दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन हो। संस्कार हो, तो कहाँ से समाज में राग-द्वेष हो, विसंगति हो, विपरीत बुद्धि हो। हम आगे बढें, लेकिन अतीत की सुखद छाँव, वर्तमान को सहेजती, दुलारती, निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर करती रहे।

सभी को रक्षाबंधन पर्व की शुभकामना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार # १०९ – गीत – क्रंदन… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – क्रंदन

? रचना संसार # १०९ ?

☆ गीत – क्रंदन…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ?

शूलों की क्यों करते खेती,

होती निशदिन ही अनबन।

घर रण का मैदान बना अब,

गूँज रहा नभ में क्रंदन।।

*

धन-दौलत की चाह बुरी यह,

आज कहाँ हमको लाई।

हुआ मरूथल है ये जीवन,

सूखी घर की अँगनाई।।

भोगें फल अपनी करनी का,

बना शिला यह कोमल तन।

*

विपदाओं के इस जमघट में,

चैन जगत् भी खोता है।

नीयत में भी खोट छिपा है,

प्यासा पनघट रोता है।।

रुकने को भी ठाँव कहाँ अब,

ताप बढ़ा है भारी मन।

*

बाँहों में जो साँप पले थे,

उनको दूध पिलाया है।

मारा था उसने ही ख़ंजर,

जिससे हाथ मिलाया है।।

कंटक के पादप को सींचा,

पुष्ष खिलें कैसे उपवन।

*

आशाऐं सब धूल मिलीं हैं,

हँसने पर पाबंदी है।

पिस जाता है घुन गेहूँ सँग,

बाजारों में मंदी है।।

ओढ़ मुखौटे चालें चलती,

नित कौरव की यह पलटन।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – संस्मरण ☆🌼 ओणम की महक और बचपन की एक दुनिया ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌼 ओणम की महक और बचपन की एक दुनिया🌷

कुछ रिश्ते दूरियों से नहीं, यादों की गर्माहट से जीवित रहते हैं… 💛

ओणम का पर्व आते ही मेरे भीतर एक गहरी-सी उदासी में लिपटी, मीठी-सी खुशी जाग उठती है।

नॉस्टैल्जिया तो हम हर त्योहार पर ओढ़ लेते हैं—बचपन याद आया, पुराने दिन याद आए, और बस! लेकिन यह वाली याद कुछ अलग है। यह बहुत गहरी है—भावनाओं, रिश्तों और जाने कितनी परतों में फैली हुई। इसमें एक पूरा घर है, एक परिवार है, एक दोस्ती है और बचपन से लेकर आज तक की एक लम्बी यात्रा है। ❤️

मुझे आज भी वह पुराना-सा घर याद है—प्रवेश द्वार पर लकड़ी की जालियाँ, ऊपर ब्रिटिश ज़माने की छत की खपरैल और नीचे पत्थर का फर्श। सादगी में लिपटा हुआ, मगर अपने भीतर अपार अपनापन समेटे वह घर मेरे बचपन का एक बहुत प्रिय हिस्सा था।

वह मेरे बचपन के मित्र मुकुंदन का घर था।

हमने किंडरगार्टन से लेकर विश्वविद्यालय तक साथ पढ़ाई की। उसके घर में उसकी छोटी बहन, माँ और अच्छन थे—और न जाने कब मैं उस घर का मेहमान भर न रहकर परिवार की आत्मीयता का हिस्सा बन गया था। 🏡❤️

और फिर आता था ओणम।

उस दिन वह घर जैसे अचानक किसी मंदिर में बदल जाता। सजावट, फूल, पूजा की तैयारी और केरल की पारम्परिक वेशभूषा में सजे परिवार के सदस्य—सब कुछ देखते ही बनता था। घर में दिन भर मेहमानों का आना-जाना लगा रहता।

और मैं?

मैं अक्सर एक कुर्सी के कोने में बैठा, चुपचाप इस पूरे उत्सव का home witness बना रहता। 😊

बचपन से किशोरावस्था, फिर युवावस्था और देखते-देखते हमारे जीवन के मध्य वर्षों तक—हर साल ओणम आता रहा और अपने साथ वही आत्मीयता लेकर आता रहा।

फिर आती थी सद्या। 🍃

केले के पत्ते पर सजा वह भोजन अपने आप में रंगों, सुगन्धों और स्वादों का उत्सव होता था। मुझे उसका हर व्यंजन पसन्द था, लेकिन मेरा सबसे प्रिय था पायसम—विशेषकर वह मीठा व्यंजन जिसे मैं आज भी अपने बचपन की सबसे स्वादिष्ट स्मृतियों में गिनता हूँ।

माँ को मालूम था कि मुझे वह कितना पसन्द है।

वह प्यार से मेरे केले के पत्ते पर दूसरी बार डालतीं… फिर तीसरी बार।

और यह सिलसिला किसी एक-दो ओणम का नहीं था। वर्षों तक चलता रहा।

उस अतिरिक्त कटोरी में सिर्फ मिठास नहीं थी—उसमें एक माँ का स्नेह था। ऐसा स्नेह जिसका स्वाद उम्र बढ़ने के साथ कम नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है। ❤️

कैसे उड़ जाते हैं अच्छे दिन!

तब हम बच्चे थे। फिर किशोर हुए, जवान हुए और अब देखते-देखते बालों में सफेदी उतर आई है। हम दोनों वरिष्ठ नागरिकों की कतार में आ खड़े हुए हैं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया, लेकिन एक चीज़ नहीं बदल पाई—एक-दूसरे के प्रति वह अपनापन।

मुकुंदन अब अपने मूल स्थान, God’s Own Country—केरल, लौट चुका है। इस ओणम पर वह अपने परिवार के साथ वहीं सद्या का आनन्द लेगा।

और मैं?

मैं यहाँ इन्दौर में अपने पुराने साथी के साथ, केरल की ही जड़ों से निकले Indian Coffee House में सद्या का स्वाद लूँगा। 🍃🥥

भौगोलिक दूरी आज बहुत है।

लेकिन मुझे लगता है, इस ओणम पर हम दोनों के दिल उसी दूरी को नकार देंगे।

वहाँ केले के पत्ते पर सजी सद्या होगी… यहाँ उसकी याद।

वहाँ केरल की हवा में ओणम की खुशबू होगी… यहाँ स्मृतियों में वही सुगन्ध।

और शायद किसी क्षण, जब हम दोनों अपने-अपने पत्ते पर रखे किसी मीठे व्यंजन का स्वाद लेंगे, तो हमारे भीतर बचपन का वही पुराना घर फिर से जीवित हो उठेगा—लकड़ी की जालियों वाला, खपरैल की छत वाला, पत्थर के फर्श वाला…

और उस घर के किसी कोने में मैं अब भी बैठा रहूँगा—एक कुर्सी पर चुपचाप—मुकुंदन के घर की रौनक देखता हुआ और माँ के हाथों से तीसरी बार परोसे गए पायसम का आनन्द लेता हुआ। 😊❤️

कुछ रिश्ते समय के साथ पुराने नहीं होते।

वे बस यादों में और खूबसूरत होते जाते हैं।

इस ओणम पर शायद हम दूर हों, मगर हमारे दिल वही पुरानी लय में धड़केंगे—

उसी स्नेह, उसी आत्मीयता और उसी बचपन की सद्या की खुशबू के साथ। 🌼🍃❤️

शुभ ओणम मुकुंदन! 🌸

Happy Onam Everyone! 🌺

कुछ त्योहार कैलेंडर पर आते हैं।

कुछ सीधे दिल में उतर जाते हैं। ❤️

 

© श्री जगत सिंह बिष्ट 🥰

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३३६ ☆ भावना के दोहे – रक्षा बंधन ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – रक्षा बंधन)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३३६ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – रक्षा बंधन ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

रक्षा बंधन प्यार का, प्यारा सा त्योहार।।।

खुशियां भाई बहिन की, मना रहा संसार।।

 *

भैया घर पर आ रहे, यही बहन की चाह।

धागा राखी का लिए , देख रही है राह।।

 *

लगी द्वार पर टकटकी, देख रही हूँ राह।

राखी का त्योहार है, है बहना को चाह।।

 *

चौमासे की धूम है, हर दिन है त्यौहार।

संग सखी, भाई बहन, मिले पिया का प्यार।।

 *

धागा प्यारा लग रहा, है बहन का प्यार।

यह केवल धागा नहीं, रक्षा का त्योहार।।

 *

भाव समाहित हो रहे, मिलता है आशीष।

भाई आदर कर रहा, झुके सदा ही शीष।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # ३१७ ☆ संतोष के दोहे – रक्षा बंधन ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है संतोष के दोहे – रक्षा बंधन आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३१७ ☆

☆ संतोष के दोहे – रक्षा बंधन ☆ श्री संतोष नेमा ☆

राखी पावन पर्व है, धागे का त्यौहार

सजी कलाई प्रेम से, मिला बहिन का प्यार

*

रक्षा का बंधन बंधे, होता जो अनमोल

बहिन सुरक्षित हो सदा, भाई के यह बोल

*

भाई को आशीष दे, करती बहिन पुकार

ईश्वर से यह कामना, सुखी रहे परिवार

*

खुशियाँ लेकर आ गया, राखी का यह पर्व

भाई पर करतीं बहिन, सबसे ज्यादा गर्व

*

सावन सुखद सुहावना, सजे सावनी गीत

रक्षाबंधन,कजलियाँ, बांट रहे हैं प्रीत

*

भाई की यह कामना, मिले बहिन का प्यार

बहिन हमेशा खुश रहे, ईश्वर से दरकार

*

दिखने में दो तन दिखें, बहे एक सा खून

पावन राखी पर्व पर, खुशियाँ होतीं दून

*

इंद्रधनुष सी राखियाँ, भरतीं मन उत्साह

प्रेम बढ़ाती परस्पर, रिश्तों की यह राह

*

दे शीतलता चाँद सी, भ्रात-भगिनि का प्यार

दिल में भी “संतोष”हो, बढ़े प्रेम व्यबहार

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆ आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं।

आज प्रस्तुत है आपका आलेख वृद्धावस्था ।)

☆ मंजिरी साहित्य # २३ ☆

? आलेख – वृद्धावस्था ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ? ?

?

हमारी भारतीय संस्कृति में जीवन रूपी रथ के चार पहिये माने जाते हैंl

1-ब्रम्हचर्य

2-ग्रहस्थ

3- वानप्रस्थ

4- सन्यास

वृद्धवस्था शरीर में होने वाला प्राकृतिक परिवर्तन हैl इस समय व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती हैl शरीर में शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैंl साथ ही ऊर्जा क्षक्ति का क्षय होना शुरु हो जाता हैl

आज के समय में वानप्रस्थ की आयु 70 वर्ष हैl इस अवस्था में आते आते मानव के मन की स्थिति बड़ी विचित्र हो जाती हैl उसे अपनों से ही असुरक्षा, डर, संकोच के साथ निर्भरता का भाव झकझोर देता हैl वहीं वह कुछ नया करने की तमन्ना भी जगाए रखता हैl जो उसने युववस्था में नहीं किया उसे ही करने का निश्चय करता हैl

आज समाज वानप्रस्थ के पश्चात् सन्यास लेने की बात करता हैl पर क्या आज की परिस्थिति में सन्यास लेना सम्भव है?? यदि आदमी घर बार छोड़ भी दे तो क्या वह वास्तविकता में जंगल में रह पायेगा?? जंगल…… कौन सा जंगल?? प्राकृतिक घना पेड़ों से भरा जंगल ?? पर वह तो देखने में बहुत कम मिलता हैl आज तो जहाँ तक दृष्टि जाए वहाँ तक सीमेंट और कोंक्रीट के ही जंगल देखने को मिलते हैंl

आज की चकाचौध की दुनिया में वानप्रस्थ होना ही असम्भव सा है तो सन्यास तो बहुत दूर की बात हो गईl

आज वृद्धवस्था में हमें आयुनुसार स्वयं को ढालना बहुत जरूरी हो गया हैl वानप्रस्थ अर्थात मोहमाया से अलिप्त होने की शुरुवात और अपने अंतिम गंतव्य को ध्यान में रख अंतर्मुख होने की प्रक्रियाl सन्यास आश्रम हेतु आपको कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं अपितु संसार में रह कर ही यदि आपने अंतर्मुखी होने की कला सीख ली तो आप पूर्ण रूप से सन्यासी हो गएl

 ये जरूर है कि आयु बढ़ने के साथ हम सुविधाओं की तरफ ज्यादा बढ़ते हैं क्यूंकि हमें जीवन व्यापन में आसानी हो जाती हैl बढ़ती आयु के साथ कई वस्तुए तो आवश्यकता की श्रेणी में सम्मिलित हो जाती हैंl वास्तविकता तो ये हैं कई जब तक हमारे शरीर में प्राण हैं तब तक हम पूर्णतः मोहमाया का त्याग नहीं कर सकतेl अगर देखा जाए तो ये मोह ही हमको हमारे परिवार से जोड़े रखता हैl आयु के इस पड़ाव में कुछ गतिविधियां, कुछ आदतें अपने आप ही छूट जाती हैंl कुछ लोग तो आज भी 60 वर्ष की आयु के पश्चात कार्य करना बंद कर देते हैं या स्वयं को रिटायर समझकर किसी काम करने में रूचि ही नहीं रखतेl पर मेरा ऐसा मानना है कि जब तक शरीर में प्राण है काम करते ही रहना चाहिएl और अपनी रूचि भी बनाए रखना चाहिएl इससे शरीर तंदुरुस्त और मन भी प्रेरणा से भरा होगाl पर कुछ लोग आयु बढ़ने से नहीं वरन इसलिए वृद्ध हो जाते हैं क्यूंकि उनके पास जीवन जीने का कोई लक्ष्य ही नहीं होताl सादगी से जीवन व्यतीत कीजिए पर सादगी का मतलब ये नहीं कि आप जीवन से पलायन कर, कंजूस बनकर, अकर्मन्यता से या असामान्य अवस्था से जीवन व्यापन करेंl व्यस्त रहना और कर्म करना दोनों ही बातें जहाँ मानव का आत्मविश्वास बढ़ाते हैं वहीं समाज में सम्मान का पात्र भी बनाते हैंl अपनी उपयोगिता कभी भी खत्म ना करेंl स्वयं को संकुचित दायरे में रखने की जगह घरपरिवार और समाज हेतु सहयोग की भावना रखेंl वृद्धावस्था में हम जीवन को वास्तविकता में अधिक सार्थक और गरिमापूर्ण बनना चाहें तो संकीर्ण मनोवृत्ति को त्यागकर उसे व्यापक बनाना होगाl

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # ३७ – कविता – तेरा रह जाना… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘तेरा रह जाना।)

☆ शशि साहित्य # ३७ ☆

? कविता – तेरा रह जाना…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हर रंग धूमिल पड़ जाते हैं,

ताजा से बदल, फीके पड़ जाते हैं…

हर पल बदल कर, बीता हुआ बन जाता है…

हर सांस…. जीवन कम कर जाता है,

बूंद बूंद टपक कर सागर रीता जाता है…

सुबह हुई और सांझ ढली,

दिन यूं ही ढलता जाता है…

मनुज रूप का जीवन दुर्लभ,

बेकार ही बीता जाता है…

उठ जाग मुसाफिर.. अब तो गुन ले,

तू रह जाए” याद” वह राह पकड़ ले !!!!!,

कुछ ऐसे रंग भी होते हैं,

जो कभी ना फीके पड़ते हैं…

मेहनत कह लो, भक्ति कह लो,

ज्ञान कहो या दान ही कह लो…

परहित को जीवन आनंद बना लें,

दूजे होठों को मुस्कान थमा दें…

त्याग करें स्वार्थ का और सद्गुण को व्यवहार बना लें,

निश्चित फिर ये हो पाएगा,

अनंत काल तक रह जाएगा…

चला जाएगा… फिर भी तू “रह जाएगा”

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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